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छत्तीसगढ़ एक खोज : सत्तावनवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष
26-Feb-2022 5:11 PM
छत्तीसगढ़ एक खोज : सत्तावनवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष

- रमेश अनुपम

20 जून सन् 1966

के.एल.पांडेय जांच आयोग की सुनवाई में बस्तर पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना उपस्थित हुए।

राजेंद्रजीत खुराना ने जांच आयोग को बताया कि ‘अपरान्ह 1.30 बजे के आसपास नियंत्रण कक्ष में उन्हें कलेक्टर ने बताया कि भोपाल से मुख्य सचिव का मैसेज आया है कि प्रवीर चंद्र भंजदेव को डी.आई.आर के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया जाए।’ इस पर बस्तर कलेक्टर की प्रतिक्रिया थी कि प्रवीर चंद्र भंजदेव को गिरफ्तार करने का यह उपयुक्त समय नहीं है।

मध्यान्ह भोजन के पश्चात गोरेलाल झा एडवोकेट द्वारा पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना से कुछ सवाल पूछे गए।

जिसके जवाब में खुराना ने कहा कि ‘उन्हें यह विदित नहीं है कि महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव 25 मार्च को 4.30 या 5.00 बजे के बीच राजमहल के बाहर आए थे या नहीं।’

उन्होंने आयोग से यह भी कहा कि ‘उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि पुलिस वालों ने महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को धक्के देकर राजमहल के भीतर धकेल दिया था।’

पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने इस बात से इंकार किया कि ‘उस समय पुलिस द्वारा दो बार फायर भी किए गए थे।’

आगे उन्होंने इस बात से भी मना किया कि ‘उन्होंने एस.एस.पी को फोन पर यह कहा है कि प्रवीर चंद्र भंजदेव दुस्साहसी हैं तथा वे आत्मसमर्पण नहीं करेंगे।’

गोरेलाल झा द्वारा यह पूछने पर कि क्या पुलिस द्वारा राजमहल के अहाते में स्थित कंकालीन मंदिर पर कोई फायरिंग की गई है ?

पुलिस सुप्रीटेंडेंट ने इस बात से इंकार करते हुए जांच आयोग को बताया कि ‘पुलिस द्वारा कंकालीन मंदिर में कोई फायरिंग नहीं की गई है।’

गोरेलाल झा ने जस्टिस के.एल.पांडेय को बताया कि ‘कंकालीन मंदिर के खंभों पर 4 गोलियों के निशान अब भी मौजूद हैं। उन्होंने आयोग को बताया कि उन्होंने तथा आर.एस.वाजपेयी ने राजमहल के अहाते में स्थित कंकालीन मंदिर में जाकर मंदिर की दीवारों पर चार गोलियों के निशान स्वयं देखे हैं।’

जस्टिस के.एल.पांडेय ने वकील गोरेलाल झा को आश्वासन दिया कि वे स्वयं कंकालीन मंदिर जाकर उन गोलियों के निशान को देखना चाहेंगे।

गोरेलाल झा के एक सवाल के जवाब में पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने आयोग को बताया कि ‘उनकी जानकारी में यह तथ्य नहीं है कि 25 मार्च को पूरे राजमहल में अंधेरा था। विद्युत आपूर्ति और जल प्रदाय को पूरी तरह से स्थानीय प्रशासन द्वारा बाधित कर दिया गया था।’

उन्होंने आयोग को यह भी बताया कि ‘उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि पुलिस के जवानों के लिए 50 टॉर्च लाइट इसलिए खरीदे गए थे ताकि वे राजमहल के भीतर घुस सकें।’

जस्टिस के. एल.पांडे द्वारा बार-बार यह पूछने पर कि बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की मृत्यु कब और कैसे हुई है ?

पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना द्वारा बार-बार यही दोहराया गया कि ‘प्रवीर चंद्र भंजदेव की मृत्यु कैसे और कब हुई उसकी कोई जानकारी उन्हें नहीं है।’

पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने जांच आयोग को यह अवश्य बताया कि ‘26 मार्च से लेकर 7 अप्रैल तक दोनों राजमहल पुलिस के अधिकार क्षेत्र में थे।’

28 जून 1966 को तत्कालीन बस्तर कलेक्टर एस.पी.सिंह जांच आयोग के समक्ष उपस्थित हुए।

एस.पी.सिंह ने 2 जून को मोहम्मद अकबर से कलेक्टर का चार्ज लिया था। इससे पहले वे बस्तर में ही एडिशनल कलेक्टर के पद पर आसीन थे। बस्तर गोलीकांड के समय वे बस्तर में ही पदस्थ थे।

कलेक्टर एस.पी.सिंह ने जांच आयोग को बताया कि ‘25 मार्च को अपरान्ह 11.15 बजे जब वे पुलिस स्टेशन में बैठे हुए थे, उसी समय पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना के पास ए.ओ.एम. मुक्तेश्वर सिंह का एक टेलिफोनिक मैसेज आया। जिसमें मुक्तेश्वर सिंह ने पुलिस सुप्रीटेंडेंट को बताया कि राजमहल में एकत्र आदिवासियों ने पुलिस पार्टी पर अटैक कर दिया है। मुक्तेश्वर सिंह ने अतिरिक्त पुलिस बल की मांग भी की थी।’

 

इसकी सूचना टेलीफोन के माध्यम से तत्कालीन कलेक्टर मोहम्मद अकबर को दी गई। कलेक्टर ने कहा कि हमें एक बार राजमहल जाकर वस्तुस्थिति का निरीक्षण करना चाहिए।

कलेक्टर मोहम्मद अकबर, पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना तथा अन्य उच्च अधिकारी राजमहल पहुंचे। उन्होंने देखा कि शहर की सभी दुकानें बंद है और स्थिति काफी तनावपूर्ण है।

एस.पी.सिंह ने जांच आयोग को बताया कि ‘कलेक्टर मोहम्मद अकबर और पुलिस सुप्रीटेंडेंट राजेंद्रजीत खुराना ने देखा कि पच्चीस तीस आदिवासी तीर कमान लेकर राजमहल के गेट पर खड़े हुए हैं और पुलिसवालों पर तीर बरसा रहे हैं।’

तत्कालीन कलेक्टर एस.पी.सिंह ने जांच आयोग को बताया कि ‘कलेक्टर मोहम्मद अकबर ने उन्हें उस समय पेट्रोलिंग ड्यूटी का कार्यभार सौंपा था।

इसलिए वे जब राजमहल पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक भारी-भरकम पुलिसवाला खून से लथपथ लाठी लेकर राजमहल के गेट से बाहर ‘मार डाला मार डाला ‘चिल्लाता हुआ भाग रहा है।’
 
दोपहर 1.30 से लेकर 4.30 बजे तक उन्होंने देखा कि कुछ निहत्थे आदिवासी जो बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के थे, वे राजमहल छोडक़र वापस लौट रहे थे।

उन्होंने आयोग को बताया कि ‘पश्चिमी गेट पर तैनात पुलिस बल को उन्होंने निर्देश दिया कि जो आदिवासी राजमहल छोडक़र जा रहे हैं उन्हें जाने दिया जाए।’

जांच आयोग को आगे की जानकारी देते हुए कलेक्टर एस.पी.सिंह ने बताया कि ‘3 बजे के आस-पास उत्तरी गेट पर रविशंकर वाजपेयी और लाडली मोहन निगम को पुलिस वालों ने राजमहल के भीतर जाने से रोक रखा था। पुलिसवालों ने उन्हें यह भी जानकारी दी कि ये लोग आदिवासियों को उकसाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने पुलिस वालों को निर्देश दिया कि इन्हें तत्काल पुलिस स्टेशन ले जाया जाए।’
(बाकी अगले हफ्ते)


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