विचार / लेख
-कनक तिवारी
चुनावी बांड के मामले में अगर गोगोई आम चुनाव के पहले कोई फैसला करते तो पता नहीं किसकी सरकार बनती। राफेल विमान के मामले में कोई दूसरा फैसला होता तो? सबरीमाला मामले को पांच सदस्यों की संविधान पीठ में भेज दिया। राम मंदिर, बाबरी मस्जिद में एक पक्ष से सबूत मांगे। दूसरे पक्ष को कहा उनकी आस्था का मामला है। चार न्यायाधीशों ने तो उनके खिलाफ प्रेस कॉंफ्रेंस की। वह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में कभी नहीं हुआ। उसमें भी मामला जस्टिस लोया की हत्या का था।
राज्यसभा सदस्य बन जाने की लालच में जस्टिस गोगोई भूल गए कि कुछ अरसा पहले उन्होंने खुद कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के जज के रिटायर होने के बाद यदि उसे किसी सरकारी मदद से पद लाभ होता है, तो वह तो उसकी न्यायिक स्वतंत्रता पर एक तरह से कलंक होगा। इसी सिलसिले में प्रख्यात अध्येता मधु किश्वर ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी कि यह नियुक्ति अवैध, संवैधानिक और अनैतिक है। उन्होंने कई मुद्दों का स्पर्श किया।
उन्होंने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा का उल्लेख करते बताया कि लोकपाल में जो भी सदस्य नियुक्त होंगे (जिनके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज होंगे और सदस्य हाईकोर्ट के वर्तमान जजों में से भी हो सकते हैं। वे सब अधिकतम 70 वर्ष या 65 वर्ष तक जो भी अवधि प्रावधानित है) कार्यरत होंगे। उसके बाद सरकार उन्हें और किसी पद का लाभ नहीं दे सकती। यह इस अधिनियम में प्रावधान है।
तब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को एक असाधारण लाभ कैसे मिल सकता है? वे यह लाभ अपने जीवित रहने तक उठाते रहेंगे क्योंकि संविधान में सद्भावना के कारण संविधान सभा के सदस्यों ने इस तरह की कोई लिखित मुमानियत नहीं की थी। यह अलग बात है कि संविधान सभा की पूरी बहस को पढऩे के बाद साफ साफ नजर आता है कि राष्ट्रपति, सरकार और रंजन गोगोई के विवेक पर निर्भर रहा है कि उन्हें संविधान सभा के पुरखों की मंशाओं का आदर करना चाहिए था।
उनकी भ्रूण हत्या नहीं करनी चाहिए थी। अनुच्छेद 80 (3) कहता है राष्ट्रपति द्वारा खंड (1) के उपखंड (क) के अधीन नाम-निर्देशित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे, जिन्हें निम्नलिखित विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव है, अर्थात साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा। जस्टिस गोगोई इनमें से किस श्रेणी के लायक हैं, देश इसे पहले नहीं जानता था। इतिहास आगे भी नहीं जानेगा।
यह भी प्रसंगवश है:
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने ही परंपरा बनाई कि रिटायर होने के बाद कुछ वर्षों तक (कम से कम 2 वर्षों तक) कोई भी पद सरकार से जुडक़र नहीं लेना चाहिए। वरना अवाम को लगेगा किसी अहसान का बदला चुकाया जा रहा है। लोग पिछले फैसलों की उधेड़बुन में लग जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट में ज्यादा मुकदमे तो सरकार को ही लेकर होते हैं।
12 जनवरी 2018 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यवाही से कथित तौर पर व्यथित होकर सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने साझा प्रेस कॉफ्रेंस की थी। उसमें जस्टिस जे.चेलमेश्वर, मदन बी लोकुर, रंजन गोगोई और कुरियन जोसेफ थे। रंजन गोगोई के राज्यसभा सदस्य बन जाने के कारण मदन लोकुर और जोसेफ कुरियन ने उनके खिलाफ बयान दिए हैं। कुरियन जोसेफ ने कहा है कि गोगोई ने यह पद स्वीकार कर संविधान के बुनियादी ढांचे के साथ छेड़छाड़ की है। उन्होंने अवाम के मन में न्यायपालिका के प्रति एक तरह का अविश्वास पैदा कर दिया है। ऐसा लग रहा था कि उनके किसी कृत्य से खतरा तो है लेकिन यह खतरा इतनी जल्दी आ जाएगा। इस तरह इसकी उम्मीद नहीं थी। कुरियन जोसेफ ने कहा हमने देश के हित में काम करना शुरू कर दिया था। पता नहीं रंजन गोगोई ने ऐसा क्यों किया।
जोसेफ कुरियन ने कहा कभी जस्टिस गोगोई ने नैतिक साहस दिखाया था। अब वह न्यायपालिका की गरिमा के साथ इस तरह समझौता कर चुके हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह और सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज आरएस सोढ़ी ने भी रंजन गोगोई के कदम की कड़ी आलोचना की है। 12 जनवरी 2018 की संयुक्त प्रेस कॉफ्रेंस के बाद गोगोई ने कहा था कि हम देश की जनता को अपना कर्ज चुका रहे हैं। हैरत की बात है ठीक इसके उलट कदम उठा लिया।
रंजन गोगोई के साथ यह भी तो है कि एक के बाद एक उन्होंने मोदी सरकार को अपने फैसले एक तरह से तोहफे के रूप में भेंट किए। फैसलों की पूरी दुनिया में आलोचना भी हुई है। कई फैसले तो कानूनी मान्यताओं और सिद्धांतों पर भी उतने खरे नहीं उतरते। जज का अलग दृष्टिकोण किसी मुद्दे को या मामले को समझने में हो सकता है लेकिन सैद्धांतिकता के मामले में कोई संशय नहीं होना चाहिए। वैसे भी असम के, एनआरसी के मामले में उन्हें उसी राज्य का होने की वजह से न्याय करने नहीं बैठना चाहिए था। लेकिन वह बैठे रहे और फैसला भी इस तरह से नहीं आया कि जिससे कोई न्याय की समझ को ताजा हवा का झोंका लगा हो या रोशनी मिली हो।
सुप्रीम कोर्ट के जज पद से हटने के बाद सामान्य नागरिक की हैसियत में आ जाते हैं। तब जो अधिकार नागरिक को अनुच्छेद 19 वगैरह में मिले हैं, उनका भरपूर फायदा उठा सकते हैं। साधारण नागरिक की तरह किसी पार्टी के टिकट पर भी चुनाव लड़ सकते हैं। लोकसभा तथा राज्यसभा में पार्टी के कोटे से मंत्री भी बन सकते हैं। कई पूर्व जजों ने ऐसा किया भी है। जस्टिस गोगोई का मामला अलग है। यहां तो सीधे-सीधे प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति के जरिए अहसान का बदला चुका दिया है।
चुनावी बांड के मामले में अगर गोगोई आम चुनाव के पहले कोई फैसला करते तो पता नहीं किसकी सरकार बनती। राफेल विमान के मामले में कोई दूसरा फैसला होता तो? सबरीमाला मामले को पांच सदस्यों की संविधान पीठ में भेज दिया। राम मंदिर, बाबरी मस्जिद में एक पक्ष से सबूत मांगे। दूसरे पक्ष को कहा उनकी आस्था का मामला है। चार न्यायाधीशों ने तो उनके खिलाफ प्रेस कॉंफ्रेंस की। वह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में कभी नहीं हुआ। उसमें भी मामला जस्टिस लोया की हत्या का था।


