विचार / लेख
-प्रकाश दुबे
शुक्रवार 12 फरवरी को दोपहर बाद वेब विमर्श में बाधा पहुंचाने का पुराना तथा परखा हुआ तरीका अपनाया गया। संघर्ष क्षेत्र में समाचार संकलन पर पहली वक्ता मालिनी सुब्रमण्यम अपनी बात शुरू करतीं उससे पहले अजीब आवाजें आनी शुरू हुईं। भोंडे गीत-संगीत के साथ अश्लील मुद्राओं वाली तस्वीर झलकने लगीं। विचार की चाह करने वालों को हमलावर अपने खजाने की अभद्रता परोसने लगे।
एक तरफ नक्सलवाद के नाम पर हिंसा और उसके मुकाबले अतिवादी संगठनों का सफाया करने की आड़ में कुछ स्वार्थी सरकारी महकमों के शोषण की घटनाएं कई दशक से हो रही हैं। टकराव और संघर्ष में फंसे इलाकों की वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित कर लोकतंत्र को मजबूत बनाने के दायित्व से संवाद माध्यम पीछे नहीं हट सकते। छत्तीसगढ़ की जेल में बंद पत्रकार माओवादी होने या उनसे संबंध रखने के नाम पर जेलों में बंद किए गए। आरोप की सत्यता जानने के लिए सरकार और स्वैच्छिक संगठनों के प्रयासों के बीच संपादकों की संस्था ने पहल की। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पत्रकार-प्रताडऩा की छानबीन के लिए एक तथ्यान्वेषण समिति भेजने का निर्णय किया।
चार पांच वर्ष पुरानी बात है। एडिटर्स गिल्ड के तीन सदस्यों की समिति ने जेल में बंद पत्रकारों से मुलाकात करने के साथ ही राजधानी रायपुर और प्रभावित क्षेत्र के अनेक पत्रकार संगठनों, संपादकों आदि से चर्चा की। पुलिस और प्रशासन का पक्ष जाना। समिति ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डा रमन सिंह से भी मुलाकात की थी। राजधानी के शहर रायपुर में स्थानीय अखबारों के संपादकों ने शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी में वरिष्ठ नौकरशाहों ने पल्ला झाड़ते हुए कह दिया-गिरफ्तार लोग पत्रकार हैं ही नहीं। स्थानीय संपादकों ने मुख्यमंत्री के समक्ष अफसरों की गलतबयानी का भांडा फोड़ा।
स्पष्ट कहा- वे पत्रकार हैं। हमारे लिए समाचार भेजते हैं। पुलिस का वरिष्ठ अधिकारी पत्रकारों को धमकाता था। उसे शायद फर्जी एनकाउंटर और प्रताडऩा की खबरें भेजने वाले पत्रकारों को दुरुस्त करने के इरादे से ही तैनात किया गया था। इस पुलिस अधिकारी ने जगदलपुर में पत्रकार मालिनी के निवास पर जाकर उत्पात मचाकर परेशान करने के लिए फर्जी पत्रकार बना दिए। उन्हें सरकारी सहायता और मान दिया जाने लगा। परेशान मालिनी को छत्तीसगढ़ छोडऩा पड़ा। तथ्यान्वेषण समिति की जांच रपट सार्वजिनक होते ही गंभीर प्रतिक्रिया हुई। बंदी पत्रकारों को छोडऩा पड़ा। इसके साथ ही अनेक निरपराध आदिवासियों की मुक्ति का रास्ता आसान हुआ। प्रशासन और उनके आका शांत नहीं बैठे।
गिल्ड की तथ्य अन्वेषण रपट सार्वजनिक होने के कुछ दिन बाद कार्यसमिति के सदस्य और फैक्ट फांइंडिंग कमेटी के एक सदस्य विनोद वर्मा को छत्तीसगढ़ पुलिस ने दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया। उन पर किसी मंत्री का चरित्र हनन करने की साजिश रचने का आरोप मढ़ा। मुख्यमंत्री तो विधानसभा चुनाव में सत्ता से जाते भये। पत्रकारों को दुरुस्त करने के काम पर लगाया गया पुलिस अधिकारी अभी सेवा में कायम है। मजे कर रहा है।
इस पृष्ठभूमि में डर कर नहीं बैठा जा सकता। संपादकों की संस्था ने फिर एक बार पहल की। महामारी के दौर में सार्वजनिक संवाद और संपर्क संभव नहीं है। इसलिए वेबिनार का सहारा लिया। वर्ष 2020 के अंतिम चरण में उपेक्षित पूर्वोत्तर की स्थिति पर चर्चा से शुरुआत की। पूर्वोत्तर के विशेषज्ञ पत्रकारों ने स्थिति का विश्लेषण किया। प्रयास की सराहना से उत्साह बढ़ा। कल शुक्रवार का विषय माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में पत्रकारिता की समस्या पर केन्द्रित था। गिल्ड के महासचिव संजय कपूर ने आरंभ में ही कहा था कि सीमा पर अपना पराया पहचाना जा सकता है। नक्सली क्षेत्रों में मित्र या शत्रु की पहचान नहीं हो सकती। पत्रकारिता के लिए इस विषम परिस्थिति में हर पल परीक्षा का क्षण है।
मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, झारखंड, ओडिशा आदि राज्यों में माओवादियों का प्रभाव है। कुछ क्षेत्रों में समाचार जुटाना, चुनाव कराना, विकास काम कराना मुश्किल होता है। इस समस्या पर विमर्श होता तो शासन, प्रशासन और पत्रकारिता समेत सबका भला होता। फैसल अनुराग, पी वी कोंडल राव, मिलिंद उमरे, तमेश्वर सिन्हा, पूर्णिमा त्रिपाठी ने इन क्षेत्रों में काम किया है। झारखंड-बिहार में फैसल की बेबाक, निष्पक्ष कलम का लोहा माना जाता है। अनसुनी आवाजें नाम से आरंभ की गई श्रंखला में उपेक्षित क्षेत्रों की स्थिति का विश्लेषण करने से पहले सुनियोजित शोरगुल से किसको परेशानी है? साइबर सेल पता लगा सकता है, यदि उसकी गहराई में जाकर जांच करने में दिलचस्पी हो। पत्रकार और संपादकों के साथ ही पाठक इतना समझ गए कि दो टूक राय देने में अड़ंगे आते हैं। गिल्ड संपादकों का अराजनीतिक संगठन है। इस प्रसंग को लेकर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर आक्रमण जैसा शोर मचाने का लाभ नहीं है। हाल ही में कुछ संपादक देशद्रोह के अभियुक्त बनाए जा चुके हैं। वैचारिक आयोजन में हुड़दंग मचाकर दखलंदाज क्या साबित करना चाहते थे?
संपादकों के कार्यक्रम को निशाना बनाने की हिमाकत यानी हैकर्स प्रहार पर अनेक जन सहानुभूति जताएंगे। रोने-कलपने जैसी कोई बात नहीं। हैकर्स तो कुछ मंत्रियों और मंत्रालयों तक के खाते हैक कर चुके हैं। संभवत: संचार मंत्री उनके निशाने पर आए थे। ऐसे में विचार का खाता उड़ाने यानी अकाउंट हैक करने या विचार पर अश्लील बमबारी की हरकत नई घटना नहीं है। नई बात यह है कि हुड़दंगिए निडर होकर आपके संवाद उपकरणों पर हमला करते हैं। देश के कानून और संविधान के प्रावधानों पर कुठाराघात करने के लिए अश्लील तस्वीरों का प्रयोग करते हैं। वह भी आदिवासियों के बीच सक्रिय रही महिला वक्ता के मुंह खोलने से भी पहले। अपराध रोकने में शासन की तकनीकी ताकत को अंगूठा दिखा सकते हैं। पिछले अनुभव से वे इस निष्कर्ष तक आसानी से पहुंच चुके हैं कि विचार पर कुठार चला कर बचने के तरीके खुले हैं। कलम, कंप्यूटर और कैमराजीवी पहले भी कीमत चुकाते आए हैं। अक्षर-विश्व में कदम रखते समय चेतावनी दी जाती है-इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। अफसोस उन सबको होगा, उनकी गर्दन लज्जा से झुकेगी जो अभिव्यक्ति की आजादी की कुर्बानी की बदौलत भाग्य विधाता बनते हैं। जो इसे बचाए रखने का वचन देते हैं।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


