विचार / लेख
-रमणिक मोहन
संसद में बहुत ही सहज भाव से कह दिया गया कि कोई तो बताएं कि इन कानूनों में काला क्या है? हैरत होती है इस कथन पर। जून 2020 से किसान यही तो बताते चले आ रहे हैं। दिसंबर 2020 के शुरुआत में सरकार और किसान मोर्चा के बीच वार्ता में भी किसानों ने कानूनों में 39 ऐसे बिंदु गिनवाए-बताए थे जिन पर उन्हें आपत्ति थी। एक छोटी सी फ़ेहरिस्त यहाँ भी देखिए-इसे देख-पढक़र समझिएगा कि कुल मिलाकर क्यों ये कानून रद्द होने चाहिए।
1. आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव कर के खाद्य-पदार्थों पर इस की पकड़ ढीली कर दी गई है। खाद्य-उद्योग या निर्यात आदि में लगी कम्पनियों पर तो यह कानून अब लागू ही नहीं होगा यानी अब कम्पनियों द्वारा जमाखोरी पर कोई पाबंदी नहीं होगी। किसानों को तो इस का कोई फायदा होगा नहीं क्योंकि किसान तो फसल को सीधे खेत से मंडी ले जाता है।
फायदा तो बड़ी कम्पनियों को ही होगा। नुकसान आम आदमी, छोटे दुकानदार और व्यापारी को होगा। महंगाई बढ़ेगी।
2. करार खेती कानून की धारा 2 (डी), धारा 2 (जी) (द्बद्ब), धारा 8 (बी) और सरकार द्वारा सदन में रखे गए बिल के पृष्ठ 11 से साफ है कि अब कम्पनियाँ खुद खेती कर सकेंगी। छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर 50-100 एकड़ के खेत बना सकेंगी। पांच-दस साल में जमीन को चूस कर, उस को बंजर बना कर दूसरे गाँव-जिले में चली जायेंगी। जब कम्पनियाँ खेती करेंगी तो मशीनों का प्रयोग ज्यादा और इंसान के श्रम का कम होगा। कुछ किसान मजदूर बनेंगे पर ज़्यादातर बेरोजगार हो जाएँगे। अड़ोसी-पड़ोसियों के 2-4 एकड़ ले कर गुजारा करने वाला बेरोजगार हो जाएगा।
शहर में बेरोजगारों/छोटे दुकानदारों की लाइन और लंबी हो जायेगी।
3. ए.पी.एम.सी. मंडी में ज्यादातर उपज तो व्यापारी ही खऱीदता है न कि सरकार। पर अब मंडी बाइपास कानून के चलते छोटे आढ़ती या व्यापारी की जगह बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय कम्पनियाँ आ जायेंगी। नए कानून के चलते ए.पी.एम.सी./नियंत्रित मंडी का वही हाल हो जाएगा जो सरकारी स्कूलों और हस्पतालों का हुआ है, या जो मुफ्त जियो के आने के बाद बाकी टेलिकॉम कम्पनियों का हुआ। ये एकदम से बंद न होकर धीरे-धीरे बंद होंगी और भोजन महंगा हो जाएगा-जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य-सेवाएँ महँगी हो गई हैं।
4. सरकार 23 फसलों के एम.एस.पी. या न्यूनतम समर्थन यानी न्यूनतम जायज भाव की घोषणा करती है लेकिन अगर उसे वह न्यूनतम जायज भाव मिलता ही नहीं, तो इस का किसान को क्या फायदा?
किसान यही तो कह रहे हैं कि जिसे सरकार ख़ुद न्यूनतम जायज भाव मानती है, उस का मिलना भी सुनिश्चित करे।
5. नए कृषि कानूनों में क्या यह कम कालापन है? क्या यह इन को रद्द किए जाने के लिए काफी नहीं है?
सरकार जिन संशोधनों पर तैयार हुई है वो मुद्दे छोटे हैं, बुनियादी नीति में सरकार ने अब तक कोई परिवर्तन स्वीकार नहीं किया है।
6. यह भी ध्यान रहे कि अगर खेती में कम्पनियाँ घुस गईं और सरकार ने अपना पल्ला किसान से झाड़ लिया, तो अर्थव्यवस्था का कोई क्षेत्र, कोई मजदूर, कर्मचारी, छोटा दुकानदार, कारीगर सुरक्षित नहीं रहेगा। देश चंद रईसों का बंधक हो जाएगा।


