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छत्तीसगढ़ एक खोज : पच्चीसवीं कड़ी : माधवराव सप्रे
10-Jul-2021 2:00 PM
 छत्तीसगढ़ एक खोज : पच्चीसवीं कड़ी : माधवराव सप्रे

-रमेश अनुपम
माधवराव सप्रे जेल से माफी मांगकर छूटने के पश्चात भिक्षा मांगकर अपने जीवन का निर्वाह करने लगे। भिक्षा की इस प्रवृत्ति को मधुकरी कहा जाता था। इसके लिए उन्हें घर-घर जाकर भिक्षा मांगनी पड़ती थी। एक तरह से यह उनका प्रायश्चित था।

रायपुर आने के पश्चात वे अपने मित्र केशवराव पाध्ये के मकान में रहे। रायपुर में रहते हुए उन्होंने बुढापारा में ‘रामदासी मठ’ तथा बालिकाओं की शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए 8 जनवरी सन 1911 श्री जानकीदेवी महिला पाठशाला की स्थापना की। 

रायपुर में अपने एकांतवास के दिनों में भी उन्होंने ‘सरस्वती’, ‘मर्यादा’  जैसी पत्रिकाओं के लिए अनेक महत्वपूर्ण लेख लिखना बंद नहीं किया।

रायपुर आने के पश्चात माधवराव सप्रे की धर्मपत्नी श्रीमती पार्वती देवी पति की चिंता करते-करते स्वयं क्षय रोग जैसी असाध्य  बीमारी से पीडि़त हो गई। माधवराव सप्रे की आर्थिक स्थिति इस तरह की नहीं थी कि वे अपनी धर्मपत्नी की समुचित इलाज की व्यवस्था कर पाते। इलाज के अभाव में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पार्वती देवी का 14 जुलाई सन 1911 को रायपुर में निधन हो गया। माधवराव सप्रे के लिए श्रीमती पार्वती देवी उनके जीवन का सबसे बड़ा संबल थी। रायपुर आने के बाद श्रीमती पार्वती देवी ने ही आगे बढक़र उन्हें  संभाला था। उन्होंने अपने पति के  लिए जो कुछ भी बेहतर संभव था, वह सब किया। 

पार्वती देवी अपने पति के दुख, ग्लानि और अंतर्वेदना को भली-भांति समझती थी। माधवराव सप्रे की चिंता और बेचैनी को उनसे बेहतर  और कौन समझ सकता था। पार्वती देवी के असमय निधन से जैसे माधवराव सप्रे के जीवन में सर्वत्र अंधेरा छा गया।

अपने अज्ञातवास के अंधकार से निकलने का अवसर उन्हें 5 नवंबर सन 1916 को हिंदी साहित्य सम्मेलन के जबलपुर अधिवेशन में मिला। 
जबलपुर में सेठ गोविंद दास से उनका परिचय प्रगाढ़ हुआ, इस शहर ने उसे मान और सम्मान दिया। 

जबलपुर में 7 अक्टूबर सन 1917 के दिन लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के भाषण के अवसर पर माधवराव सप्रे भी उपस्थित थे। तिलक का भाषण अंग्रेजी में हुआ, मंच पर उनके साथ माधवराव सप्रे ने उनके भाषण का अविकल हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया, जिसे विशाल जनता द्वारा बेहद  सराहा गया।

यह जबलपुर की  ऐतिहासिक घटना सिद्ध हुई, जिसे वहां के नगरवासी  कभी भुला नहीं सके। तिलक उसी समय छ: वर्ष के कारावास से मुक्त हुए थे और इलाहाबाद में कांग्रेस की बैठक में सम्मिलित होने के पश्चात जबलपुर आए थे।

सेठ गोविंद दास जबलपुर में शारदा भवन पुस्तकालय की स्थापना कर चुके थे। इसी भवन में सन 1920 में हिंदी मंदिर की स्थापना की गई।  माधवराव सप्रे की प्रेरणा से हिंदी मंदिर की ओर से एक मासिक पत्रिका ‘श्री शारदा’ का प्रकाशन भी 21 मार्च सन 1920 से प्रारंभ किया गया। सेठ गोविंद दास तब तक  माधवराव सप्रे की प्रतिभा से भलीभांति परिचित हो चुके थे। एक रत्न ने दूसरे रत्न  को पहचान लिया था।

सेठ गोविंद दास ने सन 1920 में ही माधवराव सप्रे का परिचय बीस वर्षीय नवयुवक द्वारका प्रसाद मिश्र से करवाया। द्वारका प्रसाद मिश्र उन दिनों इलाहाबाद के म्योर सेंट्रल कॉलेज में बी.ए. के छात्र थे, महात्मा गांधी के आह्वान पर वे पढ़ाई छोडक़र स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े थे। 

सेठ गोविंद दास ने उन्हें हिंदी मंदिर में ही रहने और कांग्रेस का इतिहास लिखने की जिम्मेदारी सौंपी थी।

माधवराव सप्रे की प्रतिभा और स्वाधीनता के प्रति उनकी समर्पण भावना से द्वारका प्रसाद मिश्र अभिभूत थे। उस दिन से लेकर वे जीवनपर्यंत माधवराव सप्रे को ही अपना गुरु और आदर्श मानते रहे।

द्वारका प्रसाद मिश्र आजादी के पश्चात अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्हें एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में देश भर में अपार ख्याति मिली। श्रीमती इंदिरा गांधी के निकट के राजनीतिज्ञों में उन्हें स्थान मिला।उन्हें राजनीति का चाणक्य कहा जाता था ।

माधवराव सप्रे हाथ पर हाथ धरकर चुप बैठ जाने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनके भीतर जैसे हिंदी पत्रकारिता की अग्नि प्रज्जवलित  होती रहती थी। उन्होंने  जबलपुर से ही 17 जनवरी सन 1920 से ‘कर्मवीर’ का संपादन, प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। संपादन की जिम्मेदारी युवा  माखनलाल चतुर्वेदी को सौंपी गई। माधवराव सप्रे ने उन्हें खंडवा से जबलपुर पहले ही बुलवा लिया था। माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिभा से वे पूर्व से ही परिचित थे, इसलिए ‘कर्मवीर’ पत्र के लिए उन्हें उनसे उपयुक्त और कोई प्रतीत नहीं हुआ।

‘कर्मवीर’ देखते ही देखते हिंदी पाठकों में लोकप्रिय होने लगा।देश के स्वाधीनता आंदोलन में ‘कर्मवीर’ की भूमिका को रेखांकित किया जाने लगा।

पर ‘कर्मवीर’ का आर्थिक पक्ष धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया। आर्थिक  अभाव यहां भी पत्र के बंद हो जाने का कारण बना। कर्ज भी काफी बढ़ चुका था। ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन लगभग असंभव हो गया था, अंतत: दो वर्षों के बाद ही सन 1922 में ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन बंद करना पड़ा। (बाकी अगले हफ्ते)


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