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रामदेव महाशय की चिकित्सकीय समझ पर एक प्रतिक्रिया
28-May-2021 6:28 PM
रामदेव महाशय की चिकित्सकीय समझ पर एक प्रतिक्रिया

cartoonist mika aziz


-आनंद बहादुर

रामदेव महाशय ने एलोपैथिक चिकित्सा के बारे में जो वक्तव्य दिया है उस पर विचार किया जाना जरूरी है, क्योंकि उन्होंने बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं जिनसे एलोपैथिक पद्धति का तथा उस पद्धति से इलाज करने-कराने वाले लोगों का बहुत अपमान हुआ है। उनके समर्पण और शहादत की खिल्ली उड़ी है और उनका हौसला और साहस टूटा है।

हम सब जानते हैं कि किस तरह अभी साल डेढ़ साल पहले कोरोना आया, और एकदम से, बिल्कुल एक काली आंधी की तरह पूरे विश्व पर छा गया। उससे पहले वायरस के इस म्यूटेंट रूप की कहीं कोई पहचान नहीं थी। पूरे विश्व में लाखों लोग रोज कोरोना से कॉल कवलित होने लगे। सिर्फ एलोपैथी ही नहीं, लोग हर प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों की शरण में गए, और विश्वास तथा अंधविश्वास से भरे हुए बहुत सारे तरीकों से इसका सामना करने की कोशिश की। इनमें से कुछ तो इतने हास्यास्पद हैं कि उनका उल्लेख तक करना उचित नहीं महसूस हो रहा है। दुनिया की सारी चिकित्सा पद्धतियां इसका इलाज करने का तरीका ढूंढने लगीं, जिसमें, जैसा तय ही था, बहुत जल्द एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में बढ़त हासिल कर ली। अन्य पद्धतियां अनुमानों और अटकलों के आधार पर आगे बढ़ीं। उन्होंने दावे तो बहुत किए लेकिन उनकी सफलता का कोई प्रमाणिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। कुछ ने तो बहुत सारी पुरानी पुरानी चीजों को खोजकर सामने रखना शुरू कर दिया, लेकिन उनसे दुनिया का दुख दर्द कम नहीं हुआ, न मरीजों में कोई विश्वास ही पैदा हुआ।

उधर एलोपैथी ने बिल्कुल वैज्ञानिक सोच और चिकित्सकीय तार्किकता के आधार पर अपना अनुसंधान शुरू किया और बहुत तेज गति से अपने रास्ते पर आगे बढ़ी। आज दुनिया में एलोपैथी पर लोगों को सबसे अधिक विश्वास है तो इसका कारण है कि यह बिल्कुल वैज्ञानिक आधार पर खड़ी चिकित्सा पद्धति है और उसकी चंगा करने की क्षमता अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियों से निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ है। जो लोग इसकी आलोचना करते रहते हैं, जब जान पर बन आती है तो वे भी एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के शरण में ही जाते हैं।

जब कोरोना आया तो अन्य चिकित्सा पद्धतियों की ही तरह एलोपैथी के पास भी इसका कोई जवाब नहीं था। लेकिन अपने हजारों सालों के संचित ज्ञान और अनुभव के आधार पर उसने उससे जूझने की कोशिश शुरू की। इसी बीच, जब हम कोरोनावायरस के बारे में अनभिज्ञ के होने के कारण बिल्कुल भंवर में थे, उसने उपलब्ध एंटीवायरल दवाओं और वायरस संबंधि अपने अनुभव तथा ज्ञान के आधार पर व्यावहारिक निष्कर्ष निकालते हुए कोरोना के मरीजों को ठीक करने की कोशिश की। लाखों की संख्या में एलोपैथिक अस्पतालों में उनकी सही देखभाल, सही पद्धति से ऑक्सीजन देने की कोशिश, उनके फेफड़े, हृदय, गुर्दे इत्यादि के संक्रमणों की जांच, सही नर्सिंग और उपलब्ध दवाओं की मदद से करोड़ों लोगों को निश्चित मौत से बचाया। क्योंकि वायरस बिल्कुल अज्ञात और नया था, इसलिए एलोपैथी के पास उस वायरस का कोई ज्ञात और ठोस इलाज नहीं था। लेकिन मरीजों को बरतने का उसका एक तरीका है, वायरस को फैलने से रोकने का जो एक ज्ञान उसके पास है, उसका इस्तेमाल उसने किया। उसने सबसे पहले वायरस की प्रकृति को डिकोड किया और बताया कि जब तक उसका इलाज नहीं निकल आता, तब तक किस तरह मास्क लगाकर,

फिजिकल डिस्टेंसिंग अपना कर, और हाथ को साफ रखकर, उससे बचा जा सकता है। आज हमारे पास इस बारे में जो भी जानकारी है, जिसकी सहायता से ज्यादातर लोग अपने आप को सुरक्षित रखने में कामयाब हुए हैं, वह ज्ञान भी एलोपैथी की ही देन है, किसी अन्य चिकित्सा पद्धति ने यह समझदारी हमें नहीं दी है। इस समझदारी को रामदेव महाशय हमारे लिए लेकर नहीं आए हैं।

इसी बीच, इतने सब को अंजाम देते हुए, एलोपैथी ने इस वायरस से लोगों को बचाने के लिए वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया शुरू की, और मानव इतिहास में जितनी तेजी से किसी एक वायरस की वैक्सीन कभी नहीं बनी थी, एक नहीं, दर्जनों वैक्सीन तैयार कर दुनियाभर को सौंप दिया। आज कोरोना के दंश से घायल, हताश-निराश मानवता के मुंह पर जो हल्की सी आशा की मुस्कान हम-आप देख रहे हैं, वह वैक्सीन और कोरोना की दवाओं की खबरों की बदौलत ही है, जो हम तक लगातार पहुंच रही हैं, और हमारा हौसला बढ़ा रही हैं। अभी हम उस सटीक दवाओं को हासिल नहीं कर पाए हैं जिनको लेते ही हमको रोना से मुक्त हो जाएं, लेकिन एलोपैथिक रिसर्च सतत् उस दिशा में आगे बढ़ रहा है और वह दिन अब ज्यादा दूर भी नहीं है। तब तक के लिए, जानकारी के अभाव में भी एलोपैथी ने बहुत संभलकर और समझदारी के साथ, वायरस के ट्रीटमेंट की एक सटीक तलाश शुरू की है, यह उसी का नतीजा है कि आज विश्व में प्रतिदिन दसियों लाख लोग कोरोनावायरस पीडि़त हो रहे हैं लेकिन मृत्यु दर कुछ प्रतिशत ही है। चूंकि करोड़ों लोग बीमार हो रहे हैं, तो दो चार प्रतिशत की मृत्यु दर भी कई लाख की संख्या हो जाती है। इसी को आधार बनाकर रामदेव महाशय ने ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया है। खुद उनके पास इसका कोई साक्ष्य नहीं है कि जो लोग आयुर्वेद सहित अन्य चिकित्सा की शरण में जा रहे हैं, उनमें कितने प्रतिशत ठीक हो रहे हैं। इसके अलावा कोई प्रणाम नहीं है कि जो लोग आयुर्वेद और अन्य चिकित्सा ले रहे हैं, उदाहरण के लिए जो लोग कोरोनिल ले रहे हैं, या गोबर-गौमूत्र चिकित्सा करवा रहे हैं, वे जरूरत पड़ते ही या साथ ही साथ एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति का सहारा नहीं ले रहे। वे क्रोसिन नहीं खा रहे हैं, वैक्सीन नहीं ले रहे हैं, रेमडेसिवीर नहीं ले रहे हैं। उनका अपना दावा केवल विज्ञापनबाजी और मनगढ़ंत लफ्फाजी पर आधारित है।

इसी बीच हमने देखा है कि कैसे एलोपैथिक मेडिकल स्टाफ, सीमा पर लड़ते सैनिकों की तरह कोरोना से युद्ध में अपना सब कुछ होम कर रहे हैं। वे लाखों अनजाने लोगों को बचाने में अपनी जान तक से खेल जा रहे हैं। उन्हें एहसास हौसला और भरोसा कहां से मिलता है? अपनी चिकित्सा पद्धति के प्रति उनका गहरा विश्वास ही उन्हें यह अदम्य साहस और हौसला दे रहा है। आज रामदेव महाशय के बयान ने उस साहस और हौसले को तोडऩे का प्रयास किया है। आज अगर रामदेव महाशय की बातों को मानकर तमाम एलोपैथिक मेडिकल स्टॉफ हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएं, तो सोचिए दुनिया भर के मरीजों की क्या दशा होगी? और इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? रामदेव महाशय के दम्भ से भरे  बयान ने उन सभी शहीद डॉक्टरों, नर्सों, और मेडिकल स्टाफ का ऐसा अपमान किया है जिसे भुलाना मानवता के इतिहास में असंभव होगा।

रामदेव महाशय शायद यह नहीं जानते हैं कि सामान्य लोगों से अलग, उनके जैसे प्रसिद्ध लोग दोहरा जीवन जीते हैं। एक जीवन अपने वर्तमान में और एक और जीवन इतिहास में। वर्तमान में तो अपने ताकतवर मित्रों की सहायता से वे जो चाहे कर लेते हैं, मगर इतिहास उनका हिसाब किताब बराबर कर के रख देता है। उस समय वे ताकतवर दोस्त काम नहीं आते। उस समय अरबों खरबों की वह तिकड़म से कमाई दौलत काम नहीं आती।


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