राजपथ - जनपथ
लूट से नींद हराम
पिछले दिनों रामानुजगंज के ज्वेलरी शॉप में दिनदहाड़े लूट के प्रकरण पर पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं। वैसे तो करीब 6 करोड़ के आभूषणों की लूट हुई थी लेकिन बिल सिर्फ 2 करोड़ 95 लाख के ही मिल पाए। यही वजह है कि पुलिस ने उतने ही आभूषणों की लूट का प्रकरण दर्ज किया है।
यह इलाका झारखंड से सटा हुआ है, और लुटेरे झारखंड की ओर भाग गए। बताते हैं कि लुटेरों में से एक को पकडऩे का सुनहरा मौका था लेकिन पुलिस उसकी घेराबंदी नहीं कर पाई। अब ताजा जानकारी यह है कि पुलिस ने लूट के आरोपियों का पता लगा लिया है। ये सभी झारखंड के डाल्टनगंज के पास के रहने वाले हैं। इनमें से दो मोस्टवांटेड हैं जिन पर रांची पुलिस ने पहले ही ईनाम घोषित कर रखा है।
दूसरी तरफ, लूट की घटना को लेकर प्रदेश के ज्वेलरी कारोबारियों में गुस्सा है। यह सब बीच बाजार में हुआ, और आसपास सैकड़ों लोग मौजूद थे। इससे कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं। पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस.सिंहदेव ने इस मामले पर राज्य सरकार को घेरा है। यह सरकार के ताकतवर मंत्री रामविचार नेताम का विधानसभा क्षेत्र है, लिहाजा नेताम घटना को लेकर रोजाना अपडेट ले रहे हैं। मगर जब तक लुटेरे, और आभूषण बरामद नहीं हो जाते, तब तक पुलिस की नींद हराम रहेगी।
संगठन का महत्व
सरकार के नए मंत्रियों पर भले ही उंगलियां उठ रही हैं, लेकिन संगठन से उन्हें कोई शिकायत नहीं है। पहले तीन मंत्री टंकराम वर्मा, श्याम बिहारी जायसवाल, और लक्ष्मी राजवाड़े को लेकर काफी कुछ कहा गया। इन सबके हटने-हटाने की चर्चा चलती रही, लेकिन फिलहाल इसकी संभावना नहीं है।
सुनते हैं कि तीनों मंत्री संगठन की सिफारिशों को प्राथमिकता से करने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि संगठन के प्रमुख पदाधिकारी उनसे संतुष्ट हैं। दोनों डिप्टी सीएम को छोडक़र श्याम बिहारी जायसवाल को रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव का प्रभारी बनाया गया है। ये अलग बात है कि जायसवाल का रायपुर दक्षिण इलाके से सीधे कोई नाता नहीं रहा है। मगर उनको लेकर यह कहा जाता है कि वो संगठन को लेकर गंभीर रहते हैं। जायसवाल, रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल को पूरे विश्वास में लेकर काम कर रहे हैं। जिससे संगठन के नेता भी संतुष्ट हैं। इसी तरह लक्ष्मी राजवाड़े को लेकर कहा जाता है कि उनसे किसी को शिकायत नहीं है, बल्कि उनके आसपास के लोगों से ही नाराजगी है।
कुछ इसी तरह टंकराम वर्मा पर भले ही ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर आरोप लग रहे हैं, लेकिन संगठन से आए नामों को उन्होंने पूरा महत्व दिया है। टंकराम वर्मा पर छत्तीसगढ़ी कार्यक्रमों की जिम्मेदारी है जिसे वे बेहतर ढंग से निभा रहे हैं। पार्टी के रणनीतिकार संतुष्ट हैं, तो किसी और की नाराजगी का क्या फर्क पड़ता है।
उद्दंडता रोकने पर निलंबन
दीपका थाना क्षेत्र के दो सहायक पुलिस निरीक्षकों को लगा होगा कि उन्होंने शायद कानून की किताब ज्यादा पढ़ ली। उतना ही हिस्सा पढऩा चाहिए जितना राजनैतिक, प्रशासनिक रसूख इजाजत देती है। हाल ही में दोनों को सस्पेंड कर दिया गया। दरअसल, दो युवक गणेश पंडाल के भीतर अपनी मोडिफाइड बाइक लेकर घुस गया और स्टंट दिखाने लगा। भीड़भाड़ इलाके में इस हरकत से लोग परेशान हुए। एएसआई खगेश राठौर, जितेश सिंह उन्हें पकडक़र थाने ले गए। मोटर व्हीकल एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए उस पर 5 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। नागरिकों तो लगा कि इन उद्दण्ड युवाओं को सजा देकर पुलिस ने सही किया, परन्तु राजनीतिक दबाव ऐसा आया कि बेचारे पुलिसवाले ही सजा भुगत बैठे। हाल ही में मुख्यमंत्री ने कलेक्टर-एसपी कांफ्रेंस में पुलिस को आदेश दिया था कि आम जनता के साथ अच्छा व्यवहार करें। मगर, उद्दंडता करने वालों को फूलों का हार पहनाने तो कहा नहीं गया है। अपराधों पर सख्ती से लगाम लगाने की बात भी कही गई है, मगर उसका पालन कितना हो रहा है, आजकल दिख ही रहा है।
रिश्वत की रिकॉर्डिंग
बीजापुर के आश्रम-छात्रावासों के अधीक्षकों से वसूली का मामला चर्चा में है। इसका एक आडियो भी फैला हुआ जिसमें मंडल संयोजक, अधीक्षकों से पैसे की डिमांड करते सुने जा सकते हैं।
पिछले दिनों इसी तरह के एक प्रकरण में कलेक्टर ने तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई है। बताते हैं कि मंडल संयोजक ने छात्रावास अधीक्षकों से फोन पे पर रिश्वत लिए थे। अधीक्षकों ने सप्रमाण इसकी शिकायत कलेक्टर से की थी।
फोन-पे पर लेन देन की पड़ताल शुरू हुई, तो अधीक्षकों पर बयान बदलने के दबाव बना है। मंडल संयोजक, स्थानीय बड़े नेता के करीबी हैं। ऐसे में दबाव पडऩे पर एक-दो अधीक्षकों ने आपसी लेन देन का मामला बता दिया।
बावजूद रिश्वतखोरी के आरोप को खारिज आसान नहीं है। क्योंकि रिश्वतखोरी के आरोप एक-दो नहीं बल्कि 25 अधीक्षक और अन्य कर्मचारियों ने लगाए हैं। चपरासी तक से फ़ोन पे पर रिश्वत लिए गए हैं। बारी बारी से सबके बयान लिए जा रहे हैं लेकिन कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है। अब आगे क्या होता है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
शिकायत ऐसी-ऐसी
कुशाभाऊ ठाकरे परिसर के सहयोग केंद्र में मंत्रियों की ड्यूटी लगाई गई है। सरकार के मंत्री अलग-अलग दिन कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुन रहे हैं। हालांकि मंत्रियों तक समस्या पहुंचाने की प्रक्रिया आसान नहीं है। इसके लिए कार्यकर्ताओं को पहले रजिस्टे्रशन कराना होता है। कई बार आवेदन अनुपयुक्त पाए जाने पर लौटा भी दिए जाते हैं।
सहयोग केंद्र में ज्यादा आवेदन ट्रांसफर को लेकर मिल रहे हैं। जिस पर फिलहाल रोक लगी हुई है। इससे परे कुछ ऐसे भी आवेदन आ रहे हैं जिसे पढक़र पदाधिकारी भी असमंजस में पड़ जाते हैं। ऐसे ही एक दवा व्यापारी अपना आवेदन लेकर सहयोग केंद्र पहुंचे।
व्यापारी की शिकायत थी कि पहले रायपुर से बिलासपुर तक दवा ले जाने के एवज में पुलिस को दो जगह दो-दो सौ रुपए देने पड़ते थे। कुल मिलाकर 4 सौ रुपए में काम हो जाता था। अब 5-5 सौ रुपए देना पड़ रहा है। यानी 6 सौ रुपए अतिरिक्त देना पड़ रहा है।
व्यापारी का कहना था कि पुरानी व्यवस्था को रहने दिया जाए। मगर सहयोग केंद्र के पदाधिकारियों ने आवेदन पढक़र मंत्री तक पहुंचने से पहले ही व्यापारी को समझाकर लौटा दिया। कुछ इसी तरह की शिकायतें पदाधिकारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
ट्रांसफर, पोस्टिंग पर बवाल
ट्रांसफर और पोस्टिंग हरेक सरकार में बड़ा कारोबार रहा है। कांग्रेस सरकार के जाते-जाते स्कूल शिक्षा विभाग में बड़े पैमाने पर प्रमोशन हुआ, जब पोस्टिंग की बात आई तो लाखों रुपये में मनचाही जगह खरीद ली गई। उसी समय स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय टेकाम से इस्तीफा लिया गया। उसके बाद संयुक्त संचालक स्तर के 5 अधिकारी सस्पेंड किए गए। निचले स्तर पर भी कई बाबू नप गए। पर समय के साथ-साथ रास्ता निकल ही आता है। करीब साल भर पुराने इस मामले की जांच हो रही है। शिक्षकों से पूछा जा रहा है कि उन्होंने क्या रिश्वत दी? किसे दी और कितनी दी। जब लिखकर देने की बात आ रही है तो शिक्षक पीछे हट रहे हैं। समझदार लोग लिखा-पढ़ी करके घूस नहीं लेते। फिर कानून तो घूस देने वाले को भी अपराधी मानता है। कहां तो, इस मामले में कांग्रेस सरकार ने एफआईआर दर्ज कराने की बात कही थी, लेकिन अब जो स्थिति है- उन सारे अधिकारी बाबू के साफ बच निकलने की जमीन जांच के दौरान तैयार हो रही है। जांच पूरी होते ही पूरी संभावना है कि सब के सब बहाल हो जाएंगे और दाग धुल जाएंगे।
इधर ताजा मामला राजस्व विभाग में हुए बड़ी संख्या में तबादले का है। कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ के प्रदेश अध्यक्ष नीलमणि दुबे ने कैमरे के सामने कहा कि कोई क्राइटेरिया नहीं है। किसी को साल में चार-चार बार स्थानांतरित कर दिया गया तो कई एक ही जगह पर सालों से जमे है। उन्होंने सीधे मंत्री पर ही घूस लेने का आरोप लगा दिया। आरोप प्रदेश अध्यक्ष की ओर से लगाया गया था, हडक़ंप तो मचना ही था। मंत्री या सरकार की ओर से कोई सफाई नहीं आई, बल्कि दुबे के ही संगठन के पदाधिकारियों ने लेटर हेड पर उनके आरोपों का खंडन कर दिया है। मामला, तहसीलदार, नायब तहसीलदारों का है। मंत्री को नाराज करके वे कैसे चैन से रहेंगे?
98 लाख का बस स्टॉप

यह संरचना किसी मंदिर या गुरुद्वारे का भ्रम होता है। मगर यह है एक बस स्टाप। ऊपर तीन गुंबद हैं, जिनमें सोने की पॉलिश की गई है। फ्लोर और दीवार ग्रेनाइट की है। इस बस प्रतीक्षालय को बनाने में 98 लाख की लागत आई है। कर्नाटक की समृद्ध विरासत और संस्कृति को दर्शाने के लिए सुरेश कुमार नाम के व्यवसायी ने इसे तैयार किया। इसे डॉ. राजकुमार और दो अन्य प्रतिष्ठित सिने कलाकारों के नाम पर समर्पित किया गया है। बेंगलूरु जाने वालों के लिए यह भी एक दर्शनीय स्थल है। मगर सोशल मीडिया पेज पर एक हैंडल में लिखा गया है कि अफसोस इसकी भी आजकल दुर्दशा हो रही है। यहां मवेशी बैठे रहते हैं। ठेले खोमचे वालों ने कब्जा कर रखा है।
खिलाडिय़ों के खिलाड़ी
बीते 24 वर्षों में सरकारों के साथ अपनी निष्ठा बदलने वाले खिलाडिय़ों के खिलाड़ी इन दिनों बहुत परेशान हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि वे सरकारी पिच पर पैर नहीं जमा पा रहे और कॉक की तरह हवा में गुलाटियां मार रहे। दरअसल पिछली सरकार के दौरान पाला बदलकर भगवा दुपट्टे वालों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वैसे उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सरकार बदल जाएगी। और जब बदली तब से भगवा ब्रिगेड में शामिल होने हर जतन कर रहे। दलीय तौर पर विफलता देख वह फिर से संघ का रैकेट पकडक़र उतरने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन वहां से भी खो कर दिए गए । एक पुराने ठाकुर साहब ने रिप्लेस कर दिया। और अब तो यह कहा जा रहा है कि खेलों के जरिए पुनर्वास असंभव है।
इधर तबादले, उधर चुनाव प्रचार
सरकार ने शुक्रवार को तहसीलदारों, और राजस्व निरीक्षकों की ट्रांसफर सूची जारी की। सूची जारी होने के बाद कुछ के तबादले के खिलाफ कोर्ट जाने की आशंका थी इसलिए सरकार ने पहले ही कैविएट दायर कर दिया।
राजस्व अफसरों के तबादले की खूब चर्चा हो रही है। तहसीलदारों की सूची में एक दिव्यांग भी हैं जिन्हें रायपुर से सीधे बीजापुर भेजा गया है। रायपुर के दो राजस्व निरीक्षकों को लेकर यह चर्चा है कि उन्होंने एक भाजपा नेता को जमीन के प्रकरण में अपेक्षित सहयोग नहीं किया। इस वजह से उन्हें दूसरे संभाग में भेज दिया गया।
राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा सूची जारी होने से पहले ही हरियाणा चुनाव प्रचार के लिए चले गए हैं। कई प्रभावित अफसर तबादला रुकवाने दूसरे मंत्रियों के बंगले घूम रहे हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
दक्षिण में शक्ति प्रदर्शन
रायपुर दक्षिण विधानसभा उपचुनाव को लेकर भाजपा, और कांग्रेस में हलचल मची हुई है। कांग्रेस से ज्यादा भाजपा में टिकट को लेकर खींचतान चल रही है। भाजपा के कुछ दावेदारों ने तो प्रचार भी शुरू कर दिया है। एक उत्साही युवा भाजपा नेता ने तो बकायदा वाल राइटिंग भी करना शुरू कर दिया है।
एक दावेदार ने तो अपने जन्मदिन के मौके पर जोरदार पार्टी देकर शक्ति प्रदर्शन किया था जिसमें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, और स्पीकर भी पहुंचे थे। एक अन्य दावेदार ने वार्डों में बैठक लेना शुरू कर दिया है। अब तक वो दस वार्डों में कार्यकर्ताओं की बैठक ले चुके हैं।
हालांकि इसका विरोध भी हो रहा है क्योंकि पार्टी का सदस्यता अभियान चल रहा है और दावेदार की बैठकों की वजह से अभियान पर असर पड़ रहा है। इसको लेकर शिकवा शिकायतें भी हो रही है। मगर जब तक अधिकृत तौर पर प्रत्याशी घोषित नहीं होता है तब तक शक्ति प्रदर्शन का दौर जारी रहेगा।
पदयात्रा का नुस्खा
पीसीसी कार्यकारिणी की शुक्रवार को बैठक हुई। इसमें अध्यक्ष दीपक बैज सभी से चर्चा कर तय किया कि वे इसी महीने से पदयात्रा शुरू करेंगे। जो आगे भी समय-समय पर जारी रहेगी। क्या उन्हें यह आभास हो गया है कि पदयात्रा से रास्ता सत्ता तक पहुंचता है। क्योंकि यह पड़ोस के आंध्रप्रदेश, तेलंगाना में आजमाया हुआ सफलतम नुस्खा रहा है । जहां इसकी शुरूआत स्व.वाईएस राजशेखर रेड्डी,फिर उनके बेटे जगन रेड्डी और पिछले पांच वर्ष वर्तमान डिप्टी सीएम पवन कल्याण ने एंड टू एंड पदयात्रा कर सीएम हाउस पहुंचे। इसी कदमताल से एबीवीपी के पूर्व छात्र नेता रहे रेवंत रेड्डी ने भी कांग्रेस में आकर कई मूल कांग्रेसियों को पछाड़ कर सीएम कहला रहे हैं। इनसे बैज की काफी निकटता है। कहीं ये गुरू मंत्र उन्हीं से तो नहीं लिया। संभव भी है क्योंकि हर माह दो बार तो दीपक हैदराबाद जाते ही है। मेल मुलाकात होती ही है। यह भी बता दें कि अपने ही पूर्व सीएम बघेल भी छत्तीसगढ़ में पदयात्रा कर चुके थे। और हाउस पहुंचकर ही दम लिया।
हाथी हमलावर हो तो किसका दोष?

सरगुजा जिले के उदयपुर में 12 हाथियों का दल विचरण कर रहा है। उदयपुर वही इलाका है जहां कोयला खदानों को मंजूरी दी गई है। हाथियों को देखने के लिए लोगों की भीड़ सडक़ पर जमा हो गई है। फॉरेस्ट गार्ड इन्हें भागने, दूर हटने के लिए कह रहा है लेकिन लोग नहीं सुन रहे हैं, बल्कि आवाज दे रहे हैं। कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें हाथियों को ललकारने, चिढ़ाने, उनके पास जाकर तस्वीर खींचने की कोशिश करने पर उसने हमला कर दिया है। अभी भीड़ है इसलिये शायद हाथी इनकी ओर न दौड़ें, मगर जब वे तब बदला ले लेते हैं जब उसे बीच जंगल में कोई मिल जाता है।
डीजे जोर से बजाने की मांग
उत्सवों के माहौल में ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ इस बार सरकार ने कुछ कड़े तेवर दिखाए हैं। जिलों में एसपी और थानों में थानेदारों ने डीजे, धुमाल के संचालकों को बैठकें लेकर चेतावनी दी है। इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के समय-समय पर दिए गए आदेश का हवाला दिया गया है। 55 डेसिबल से अधिक आवाज में डीजे बजाने पर जब्त कर लिया जाएगा। उसके आगे मालवाहकों को मोडिफाई कर डीजे लगाने पर भी जब्त करने का आदेश दिया गया है। अब प्रदेश भर में डीजे के कारोबार से जुड़े लोग गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें 55 डेसिबल से ज्यादा की अनुमति दी जाए। कार का हॉर्न भी 90 डेसिबल के करीब होता है। इस मांग पर शायद ही कोई रियायत बरती जाएगी, क्योंकि ध्वनि प्रदूषण का पैमाना भी कोर्ट ने ही तय किया है। यह बस्तियों, हाईवे, स्कूल, अस्पतालों, सब के लिए अलग-अलग है। अधिक तेज यानि नाचने वालों की अधिक भीड़, अधिक नशा और अपराध होने की आशंका भी उतनी ही ज्यादा। छत्तीसगढ़ में डीजे के नाम पर पुलिस वालों को भी नहीं बख्शा गया है। उनके साथ हाल ही में मारपीट की घटना रतनपुर में हुई थी। कई बार चाकूबाजी और यहां तक कि हत्या भी हो चुकी है। यदि सचमुच प्रशासन अपनी चेतावनी पर अमल करे तो आम लोगों को राहत मिलेगी।
भाजपा में नंबर वन
भाजपा में सदस्यता अभियान चल रहा है। पार्टी ने इस बार पूरे प्रदेश में करीब 50 लाख सदस्य बनाने का टारगेट रखा है। मगर यह आसान नहीं है क्योंकि सदस्य बनाने की पारदर्शी है और इसके लिए दबाव भी नहीं बनाया जा सकता है। इन सबके बीच पार्टी ने एक स्कीम भी लांच की है जिसमें कहा गया कि जो भी कार्यकर्ता 3 हजार सदस्य बनाएंगे, उन्हें सीएम के डिनर करने का मौका मिलेगा।
दूसरी तरफ, विधायक,और सांसदों को अपने क्षेत्र में क्रमश: 10 और 20 हजार सदस्य बनाने का टारगेट दिया गया है। मगर अब तक ज्यादातर विधायक और सांसद पांच सौ सदस्य भी नहीं बना पाए हैं। इन सबके बीच तमाम दिक्कतों के बाद भी पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर सबसे आगे निकल गए हैं। उन्होंने अब तक साढ़े 8 हजार सदस्य बना लिए हैं। उनका एक-दो दिन के भीतर टारगेट पूरा होने के आसार हैं। बाकी का परफॉर्मेंस क्या रहता है, इस पर नजरें टिकी हुई है।
सीएम की चेतावनी
सीएम विष्णुदेव साय ने कलेक्टर कॉन्फ्रेंस में अफसरों को भाषा में संयम रखने की नसीहत दी है। कलेक्टर से लेकर निचले अफसरों के व्यवहार को लेकर कई तरह की शिकायतें हुई है। पिछले दिनों एक महिला तहसीलदार के ऊपर गाज भी गिरी थी। ओवरटेक करने पर ट्रैक्टर चालक के साथ बदसलूकी करने के मामले में महिला तहसीलदार को सस्पेंड भी कर दिया गया।
धमतरी कलेक्टर नम्रता गांधी के खिलाफ भी कुछ इसी तरह की शिकायतें सामने आई है। स्थानीय व्यापारियों ने कलेक्टर पर अभद्र व्यवहार का आरोप लगाते हुए सीएम से लिखित शिकायत की थी। नम्रता के खिलाफ जिले के तहसीलदार भी आंदोलित हैं। बताते हैं कि पिछले दिनों कलेक्टर ने एक तहसीलदार के खिलाफ कमिश्नर से शिकायत की थी, और यह कहा था कि बिना बताए वो गैर हाजिर रहते हैं। कमिश्नर ने तहसीलदार को सस्पेंड कर दिया।
अब बात सामने आई है कि तहसीलदार ने मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए एसडीएम से बकायदा छुट्टी ली थी, और फिर कलेक्टर को मौखिक रूप से सूचना दी थी। बावजूद इसके तहसीलदार को गैर हाजिर बताकर सस्पेंड किया गया। कार्रवाई के बाद प्रदेशभर के तहसीलदारों ने ऑनलाइन मीटिंग की, और फिर कमिश्नर से मिलकर कलेक्टर के खिलाफ शिकायत का फैसला लिया है। कलेक्टर कॉन्फ्रेंस के पहले सीएम तक सारी बातें पहुंच चुकी थी। यही वजह है कि उन्होंने किसी का नाम लिए बिना सबको चेता दिया है।
वंदे भारत पर गोपनीयता
विशाखापट्टनम वंदे भारत एक्सप्रेस को लेकर निचले स्तर के आपरेशनल स्टाफ उहापोह से गुजर रहा है। डीआरएम समेत तमाम आला अफसर किसी भी तरह की जानकारी को निचले स्तर तक जाने नहीं दे रहे। इन कर्मचारियों को यह डर सता रहा है कि अफसर सूचना नहीं दे रहे और मौके पर काम न होने पर अपनी चमड़ी बचाने सस्पेंशन की गाज छोटे कर्मचारी पर गिरेगी। आखिर इतनी गोपनीयता किसलिए। ऐसा पहले कभी नहीं हुई।
अफसर राज्यपाल, सरकार सांसद सबको जानकारी दे रहे लेकिन जो ट्रेन चलाने के जिम्मेदार हैं वे नावाकिफ हैं। कर्मचारियों को आधिकारिक स्तर पर ट्रेन को लेकर कोई सूचना नहीं हैं। उद्घाटन कब होना, उसके बाद कब से रूटीन में चलनी है, टिकिट बुकिंग कब से शुरू करनी है, आदि- आदि। पहले कहा गया 15 सितंबर को पीएम मोदी टाटानगर से हरी झंडी दिखाएंगे। कल से चर्चा है 16 की शाम उद्घाटन होगा। उद्घाटन रायपुर में होगा या दुर्ग में, पता नहीं। दुर्ग स्टेशन में रंगरोगन, प्लेटफॉर्म पर टाइल्स बदलने जैसे खर्चीले काम शुरू कर दिए गए हैं। जबकि रायपुर में कोई तैयारी नहीं की गई।
जोखिम में जवान

बस्तर में यह जवान अपनी जान जोखिम में डालकर जमीन के भीतर बिछाए गए जिंदा आईईडी बम को बाहर खींचकर निकाल रहा है। इसका पहनावा देखिये- लोवर और टी-शर्ट- और बाइक में इस्तेमाल होने वाला सिर पर हेलमेट। यानि खुद की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। ऐसे विस्फोटक निकालते समय कई जवान बस्तर में हताहत हो जाते हैं। (बस्तर टॉकीज हैंडल से सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट)
अंधविश्वास के जाल में फंसा छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के कसडोल में जादू टोना का अंधविश्वास चार निर्दोष लोगों की जान ले गया। गनीमत रही कि परिवार के दो लोग घर से बाहर थे, वरना यह संख्या शायद छह हो जाती। एनसीआरबी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में अंधविश्वास और जादू टोने के चलते सबसे अधिक हत्याएं छत्तीसगढ़ में होती हैं। सन् 2021 में हुई ऐसी 74 हत्याओं में से 6 मानव बलि थीं।
21वीं सदी में हमारे राज्य के कई हिस्सों में लोग अब भी बलि दे रहे हैं। पुलिस हर साल 300 से ज्यादा मामले दर्ज करती है, जिनमें हत्या, बलवा, और सामाजिक बहिष्कार शामिल हैं। मई महीने में बलरामपुर में एक पिता ने अपने बेटे का गला काट दिया, क्योंकि उसे लगा कि यही सही है।
अब सवाल उठता है, सरकार क्या कर रही है? 2005 में टोनही प्रथा के खिलाफ कानून बना था, लेकिन हालात जस के तस हैं। कानून बनाना और उसका असर दिखना, दो अलग बातें हैं। सरकार चाहे तो साइबर फ्रॉड और ट्रैफिक नियमों की तरह जादू टोने के खिलाफ भी अभियान चला सकती है। समाज कल्याण विभाग का इस्तेमाल कर, स्कूल के पाठ्यक्रम में जागरूकता लाने वाले विषय शामिल किए जा सकते हैं। पर कौन करेगा? एक मात्र संगठन, श्रद्धा निर्मूलन समिति, इस मोर्चे पर व्यक्तिगत प्रयासों से काम कर रही है, और वह भी एक डॉक्टर के नेतृत्व में।
झारखंड एमपी-सीजी के हवाले !!
छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता झारखंड में पसीना बहा रहे हैं। पार्टी ने जब से केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रभारी बनाया है, तब से उन्हें दोगुना मेहनत करनी पड़ रही है।
शिवराज सिंह एक-एक विधानसभा की बारीक समीक्षा कर रहे हैं, और रोजाना फील्ड में काम कर रहे नेताओं के लिए उनके आफिस से निर्देश आ रहे हैं।
यही नहीं, पार्टी ने झारखंड की सीमा से सटे सरगुजा के कई नेताओं को वहां तैनात दिया है। उनसे विधानसभा टिकट के लिए नामों का पैनल लिया जा रहा है। यहां केन्द्रीय मंत्री तोखन साहू, दोनों डिप्टी सीएम अरूण साव व विजय शर्मा को भी वहां चुनाव प्रबंधन देखने के लिए कहा गया है। वित्तमंत्री ओपी चौधरी के पास पूरे दो जिले की सीटों की जिम्मेदारी है।
चौधरी चार दिन झारखंड में रहकर आए हैं। वे भी वीडियो कॉन्फ्रेंस कर स्थानीय नेताओं के संपर्क में हैं। कुल मिलाकर शिवराज सिंह ने पूरी पार्टी को झोंक दिया है। छत्तीसगढ़ के नेता, शिवराज सिंह की कार्यशैली की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।
राधिका को लेकर कांग्रेस में कलह
हाल ही में भाजपा में आई राधिका खेरा ने एक बार फिर यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर लोकसभा चुनाव के दौरान राजीव भवन में अपने साथ कथित बदसलुकी के मामले पर कांग्रेस नेताओं को जमकर कोसा। और जब कांग्रेस नेताओं ने उन्हें जवाब दिया, तो प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को मानहानि की नोटिस भिजवा दी। अब राधिका खेरा के मसले पर तो श्मशानघाट में कांग्रेस के दो नेताओं के बीच कहा सुनी भी हो गई।
हुआ यूं कि कांग्रेस के पूर्व प्रभारी महामंत्री सुभाष शर्मा के अंतिम संस्कार के मौके पर पार्टी के बड़ी संख्या में नेता-कार्यकर्ता मौजूद थे। सुभाष शर्मा करीब 10 साल से अधिक समय तक प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री रहे हैं। उनके अंतिम संस्कार के मौके पर जुटे नेता आपस में राधिका खेरा के आरोपों पर बातचीत कर रहे थे।
इसी बीच पार्टी के एक प्रमुख नेता ने जूनियर की तरफ इशारा करते हुए उन्हें राधिका खेरा का दोस्त बता दिया। फिर क्या था, जूनियर नेता भडक़ गए, और उसी अंदाज में पलटवार किया। जूनियर नेता ने पूछ लिया कि राधिका खेरा को सरकारी उत्सव में किसके कहने पर बुलाया जाता था। जूनियर के तेवर देखकर प्रमुख नेता भी खामोश रह गए। राधिका अब कांग्रेस नेताओं पर भारी पड़ दिख रही हैं।
भाजपा के ओजस्वी सांसद
केंद्र में मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल को याद करिये। भाजपा सांसदों से जब पूछा जाता था कि आप छत्तीसगढ़ के रेल यात्रियों के साथ हो रहे अन्याय को लेकर आवाज क्यों नहीं उठाते, तो जवाब मिलता था कि देश के विकास के लिए मालगाडिय़ों को समय पर चलाना, रेल लाइनों का आधुनिकीकरण जरूरी है। इसलिए ट्रेन यदि कैंसिल हो रहे हैं, देर से चल रही हैं तो उसे थोड़ा बर्दाश्त कर लेना चाहिए। सतर्क रहते थे कि कहीं जनता के असंतोष को हवा देंगे तो ऊपर बैठे लोग नाराज न हो जाएं। लेकिन मोदी के तीसरे कार्यकाल में कम से कम छत्तीसगढ़ के सांसद अपने बयानों और चि_ियों से लोगों का दिल जीतने में लगे हुए हैं। सांसद विजय बघेल को पेंशनर्स महासंघ के सम्मेलन में खूब तालियां मिलीं, जब उन्होंने कहा कि मेरी कोशिश रहेगी कि मोदी की गारंटी झूठी साबित नहीं हो। कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है। हमने महंगाई भत्ता, एरियर्स, केंद्र के समान गृह भाड़ा, 300 दिन का अवकाश नगदीकरण का वायदा किया है। अपनी हंसी मत उड़ाइये। मांगे पूरी न हुई तो कर्मचारियों के साथ खुद भी आंदोलन में उतर जाऊंगा। विधानसभा चुनाव में बघेल भाजपा की घोषणा पत्र समिति के संयोजक थे। सो, लोग घोषणाओं के पूरा नहीं होने पर उनसे ही सवाल करेंगे। जब कांग्रेस की सरकार थी तो ऐसी ही असहज स्थिति टीएस सिंहदेव के लिए हो गई थी। पर उन्होंने बघेल जैसा तेवर नहीं दिखाया, बल्कि सरकार का बचाव करते रहे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने रायपुर में हुई रेलवे जोनल सलाहकार समिति की बैठक में ट्रेनों की लेटलतीफी और लंबित परियोजनाओं को लेकर अफसरों की खूब खिंचाई की। कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य रंजीत रंजन भी इसमें शामिल थीं लेकिन विपक्ष में होने के बावजूद वे भी सांसद अग्रवाल की तरह मुखर नहीं रहीं। सांसद अग्रवाल ने संसद में भी इस बात को रखा था। उसके बाद भी बयान दिए। सीमेंट की कीमत बढऩे पर भी उन्होंने अपनी ही सरकार को घेर लिया। उनके बयान के बाद कांग्रेस को भी पता चला कि ऐसी किसी समस्या से लोग जूझ रहे हैं। उसने तत्काल हाथोंहाथ लेकर इस मुद्दे पर प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। बिलासपुर में केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने भी रेलवे के साथ बैठक में ट्रेनों के विलंब होने, रद्द होने व लंबित प्रोजेक्ट्स पर काम आगे नहीं बढऩे को लेकर तीखे तेवर दिखाए। उन्होंने अमृत भारत योजना के तहत बिलासपुर स्टेशन की पुरानी हेरिटेज बिल्डिंग को तोडक़र नया बनाने का विरोध भी सार्वजनिक कर दिया। इसके एक दिन बाद रेलवे ने साफ किया कि यह बिल्डिंग सुरक्षित रहेगी। इसे नहीं गिराया जाएगा। इसके पहले वह स्थिति स्पष्ट नहीं हो रही थी। कुल मिलाकर, सांसद इन दिनों साबित करने पर तुले हुए हैं कि सरकार चाहे उनकी अपनी ही पार्टी की क्यों न हो, लोगों के काम न हुए तो नाक में दम करेंगे। इसका संबंध आप केंद्र में इस बार अकेले भाजपा की नहीं- गठबंधन की सरकार है, उससे भी जोड़ सकते हैं।
मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए..

यूपी के बदायूं के एचपी इंटरनेशनल स्कूल की टीचर्स ने बच्चों को मोबाइल से दूर करने के लिए एक अवेयरनेस प्लान बनाया। वीडियो में एक टीचर आंखों पर पट्टी बांधकर रोती नजर आती है। टीचर के पूछने पर कहती है कि ज्यादा मोबाइल देखने से आंखो से खून आ रहा है। इससे बच्चे सहम जाते हैं। इस दौरान दूसरी टीचर बच्चों को मोबाइल देती है लेकिन बच्चे लेने से मना कर देते हैं। बच्चों से मोबाइल छुड़ाने का ये तरीका ठीक है या नहीं इस पर बहस हो सकती है। मगर, यह तो सच है कि छोटे बच्चों को भी खतरे के हद तक इसकी लत लग रही है। ये सब नर्सरी के बच्चे हैं।
तबादलों के आगे-पीछे
केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे अफसरों की वजह से मंत्रालय में छोटा सा फेरबदल हुआ। इसमें रजत कुमार को उद्योग विभाग का प्रभार दिया गया। रजत के साथ अमित कटारिया ने भी जॉइनिंग दी है, लेकिन वो डेढ़ महीने की छुट्टी पर चले गए हैं। फेरबदल में कुछ अफसर अपने पुराने विभाग लौटे हैं। मसलन, एसीएस रिचा शर्मा को वन के साथ-साथ खाद्य विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है।
रिचा, रमन सरकार में लंबे समय तक खाद्य महकमा संभाल चुकी हैं। इसी तरह आईएएस के वर्ष-06 बैच के अफसर अंकित आनंद को सचिव आवास-पर्यावरण विभाग के साथ ही साथ चेयरमैन, पर्यावरण संरक्षण मंडल का दायित्व सौंपा गया है। अंकित पिछली सरकार में भी दोनों जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
पिछली सरकार के रणनीतिकारों के करीबी रहे दो अफसर भीम सिंह, और भूरे सर्वेश्वर नरेन्द्र ने इस सरकार में भी अपनी जगह बना ली है। भूरे को निर्वाचन आयोग में भेजा गया था। लेकिन उन्हें जल जीवन मिशन संचालक का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। इसी तरह भीम सिंह को पंचायत सचिव के साथ-साथ सूडा के अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
आईएफएस अफसरों में पी. अरुण प्रसाद के नाम सबसे ज्यादा छह साल तक सीएसआईडीसी एमडी रहने का रिकॉर्ड है। अरुण प्रसाद सीएसआईडीसी के एमडी के दायित्व से तो मुक्त हो गए, लेकिन पर्यावरण संरक्षण मंडल के सदस्य सचिव का अहम दायित्व तो उनके पास यथावत रहेगा। सीएसआईडीसी एमडी का प्रभार विश्वेश कुमार को दिया गया है, जो कि वन विभाग में थे। इन सबके बावजूद एक सूची और आ सकती है। क्योंकि सचिव स्तर के अफसर डॉ. रोहित यादव इसी माह के अंत में आने वाले हैं।
निगम-मण्डल सनसनी
भाजपा में निगम-मंडलों की सूची जारी होने की चर्चा मात्र से विवाद खड़ा हो गया है। सुनते हैं कि सोशल मीडिया पर कुछ नामों को लेकर पार्टी के दो नेताओं के बीच आपस में बहस भी हुई। एक पुराने नेता को हस्तक्षेप कर विवाद को शांत करने के लिए आगे आना पड़ा। खास बात यह है कि सोशल मीडिया पर पार्टी के नेता खुलकर सूची को लेकर अपनी बात रख रहे हैं।
चर्चा तो यह है कि कथित सूची को लेकर चल रहे विवाद की जानकारी महामंत्री (संगठन) पवन साय, और क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय जामवाल को भी दी गई है।
पार्टी के रणनीतिकारों की कोशिश है कि पितृपक्ष से पहले कुछ प्रमुख नेताओं को पद दे दिया जाए, जिन्होंने टिकट नहीं मिलने के बावजूद विधानसभा चुनाव में काम किया था। मगर विवाद को देखते हुए अगर सूची अटक जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देखना है आगे क्या होता है।
सीट बेल्ट कस कर बांध लें..
हाल ही में, कारों की बिक्री में गिरावट की खबरें आ रही थीं। इसी बीच, टाटा मोटर्स ने अपने इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की कीमतों में 3 लाख रुपये तक की कटौती की घोषणा की है। कंपनी का दावा है कि वह इलेक्ट्रिक कारों की कीमत को पेट्रोल-डीजल कारों के बराबर लाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, सच यह है कि पेट्रोल और डीजल से चलने वाली कारें भी बड़ी संख्या में शोरूम और डीलरों के गोडाउन में पड़ी हैं। इनमें भी भारी छूट चल रही है। आमतौर पर डीलर्स चाहते हैं कि उनके पास आई गाडिय़ां 60 दिनों के भीतर बिक जाएं, लेकिन अब यह स्टॉक 80-90 दिनों तक फंसा हुआ है। डीलर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कहना है कि उनके पास स्टॉक रिकॉर्ड स्तर पर है, इसलिए अधिक छूट देकर बिक्री बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है।
कुछ मॉडलों जैसे वैगन आर की बिक्री में 19 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। हालांकि, ग्राहकों के लिए यह छूट फायदेमंद है, लेकिन ऑटोमोबाइल उद्योग पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि किसी फैक्ट्री में प्रतिदिन 50 कारें बनाने के लिए सेटअप तैयार है और बिक्री में कमी आती है, तो उसे कर्मचारियों की छंटनी या उत्पादन में कटौती का सामना करना पड़ सकता है।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां सार्वजनिक परिवहन की सुविधा बेहद सीमित है, निजी वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 2022 से 2023 के बीच राज्य में सभी प्रकार के वाहनों की बिक्री में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी, जिसमें से 50 प्रतिशत से अधिक निजी वाहन थे। बाइक, स्कूटर और कारों की बढ़ती संख्या से सडक़ों पर यातायात का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। चौड़ी सडक़ों, नए फ्लाईओवर और एक्सप्रेस-वे बनने के बावजूद ट्रैफिक की समस्या गंभीर होती जा रही है।
गणेश चतुर्थी से लेकर दीपावली तक त्योहारों के इस मौसम में कारों की बिक्री बढऩे की संभावना है, क्योंकि तब डीलर्स और निर्माता छूट और बढ़ा देंगे। दिसंबर में साल खत्म होने वाला ऑफर आएगा। मतलब, आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ की सडक़ों पर निजी गाडिय़ों का दबाव और बढऩे वाला है। वहीं, केंद्र सरकार द्वारा घोषित रायपुर और बिलासपुर की एसी इलेक्ट्रिक बसों की नई खेप की प्रतीक्षा खत्म नहीं हो रही है। तो, आने वाले दिनों में सडक़ों पर अधिक निजी वाहनों, खासकर कारों का दबाव, अधिक जाम, अधिक हादसे, अधिक वायु प्रदूषण देखने को मिल सकता है। दुपहिया में चल रहे हों तो हेलमेट पहनना और कार पर हों तो सीट बेल्ट बांधना अब ज्यादा जरूरी हो जाएगा।
एक-दूजे के लिए
अंतागढ़ नगर पंचायत के अध्यक्ष राधेलाल नाग सोमवार को अपनी गाड़ी समेत डूबते-डूबते बचे। नाग अपने ड्राइवर के साथ बोलेरो गाड़ी से पखांजूर की तरफ आ रहे थे, तब माहला नदी पार करते समय फंस गए, और फिर दो सौ फीट आगे बहकर एक पेड़ के सहारे बच पाए थे। इसी बीच बाढ़ का पानी तेज हो रहा था, जान जोखिम में थी तब सीएम विष्णुदेव साय के निर्देश पर तत्काल रेस्क्यू टीम वहां पहुंची, और ग्रामीणों की मदद से सकुशल निकल पाए।
राधेलाल नाग कांकेर लोकसभा सीट से भाजपा टिकट के मजबूत दावेदार थे, लेकिन अंतिम क्षणों में पार्टी ने उनकी जगह भोजराज नाग को प्रत्याशी बना दिया। भोजराज नाग कड़े मुकाबले में चुनाव जीतने में कामयाब रहे। राधेलाल टिकट नहीं मिलने पर थोड़े नाराज चल रहे थे। बाद में उन्होंने भोजराज नाग के लिए काम भी किया। अब जब राधेलाल मझधार में फंसे थे, तो भोजराज नाग और पूर्व मंत्री विक्रम उसेंडी समेत तमाम नेता वहां पहुंचकर उन्हें निकलवाने में अहम भूमिका निभाई। जान बची तो राधेलाल भावुक हो गए, और सीएम से लेकर भोजराज नाग और विक्रम उसेंडी के प्रति आभार जताया।
मोर्चे पर एक बैच के अफसर
नक्सलियों के खिलाफ चल रही निर्णायक लड़ाई में आईपीएस अफसरों का एक बैच से होना भी इस लड़ाई को अंजाम की ओर ले जा रहा है। यह एक संयोग है कि छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक नक्सलग्रस्त जिलों में से एक बस्तर से लेकर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के माओवाद प्रभावित जिलों में एक बैच के अफसर लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। 2014 बैच के अफसर अपने-अपने जिले को माओवाद मुक्त कराने की मुहिम को तेजी के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। बस्तर एसपी शलभ सिन्हा, गढ़चिरौली एसपी नीलोत्पल, बालाघाट एसपी नागेन्द्र सिंह और डिडौंरी एसपी वाहिनी सिंह एक ही बैच के आईपीएस हैं । माहभर पूर्व गोंदिया में पदस्थ रहे एसपी निखिल पिंगले भी इसी बैच के हैं।
बताते हैं कि इन सभी अफसरों की आपस में खूब जमती है। बालाघाट और गढ़चिरौली एसपी नक्सल लड़ाई के अगुवा बनकर अपने राज्य को नक्सल समस्या से मुक्त कराने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। वैसे बस्तर एसपी शलभ सिन्हा भी नक्सलियों को घेरने की रणनीति बनाने में माहिर माने जाते हैं। कांकेर एसपी रहे उन्होंने दक्षिण कांकेर के दर्शन नामक खूंखार नक्सली को अपनी सटीक रणनीति से ढ़ेर कर दिया था। बालाघाट एसपी नागेन्द्र के पास हॉकफोर्स का प्रभार भी है। डिंडौरी को नया ठिकाना बनाने की फिराक में बैठे नक्सलियों को एसपी वाहिनी सिंह से कड़ी चुनौती मिल रही है। श्रीमती सिंह बालाघाट एसपी नागेन्द्र की धर्मपत्नी है। एक ही बैच के अफसरों की आपस में अच्छे तालमेल होने से नक्सलियों के लिए बस्तर से लेकर बालाघाट रेंज तक संगठन तैयार करना आसान नहीं रह गया।
जय महाकाल
निगम मंडलों में नियुक्ति को लेकर सरकार और संगठन पिन ड्राप साइलेंस के मोड में है। दोनों ही इस समय 50 लाख के सदस्यता अभियान में व्यस्त है। जिसे अक्टूबर पूरा करना है। वैसे पार्टी खुद तय कर चुकी है कि दक्षिण उपचुनाव और निकाय चुनाव तक कुछ नहीं। इसके बावजूद पार्टी के अति महत्वाकांक्षी नेता गाहे बगाहे खबरें उड़ा रहे हैं। और उसमें अपने अपने नाम बड़े फंड वाले निगम मंडल के खुद तय कर रहे हैं । इनमें अधिकांश वे ही है जो 15 वर्षों के दौरान भी पदाधिकारी रहे हैं।
संगठन नेतृत्व ऐसे लोगों को चिन्हित भी कर रही है। तो कार्यकर्ता कह रहे हैं कि बांट दो फिर उन्हीं लोगों को। एक ऐसे ही कार्यकर्ता ने व्हाट्सएप में लिखा -हर रोज अखबारों में नाम पढऩे के बाद ज्वालामुखी भभक रही है। लावा आक्रोश का रूप ले रहा है। यदि प्रकाशित और वायरल नामों में से एक की भी नियुक्ति होती है तो परिणाम भुगतने शीर्ष नेतृत्व को तैयार रहना होगा.. जय महाकाल
स्मार्ट सिटी में कतार सिस्टम
रायपुर और बिलासपुर में स्मार्ट परियोजनाओं पर कई काम एक जैसे हुए हैं, जैसे इंटिग्रेटेड ट्रैफिक कंट्रोल कमांड सिस्टम। ये दोनों कंट्रोल रूम शहरों का कितना ट्रैफिक कंट्रोल कर पाते हैं यह अलग मुद्दा है लेकिन ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन की निगरानी कैमरे जरूर सख्ती से रख रहे हैं। कैमरे ने पकड़ा और कंट्रोल रूम से जुर्माने की रसीद कटकर सीधे वाहन स्वामी के दर्ज मोबाइल नंबर पर पहुंच जाता है। केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय ने कुछ वर्ष पहले ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माना निर्धारित किया था। जैसे रेड सिग्नल पार करने पर एक हजार से 5 हजार रुपये, गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन पर बात करने 10 हजार रुपये तक का जुर्माना है। आपातकालीन वाहनों जैसे एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड आदि को रास्ता नहीं देने पर भी अब जुर्माना बढ़ाकर 10 हजार रुपया कर दिया गया है। ऑनलाइन चालान मोबाइल फोन पर आता है और सूचित किया जाता है कि ट्रैफिक के दफ्तर में आकर पैसे जमा कर दिए जाएं। अब हो यह रहा है कि रायपुर, बिलासपुर दोनों ही जगहों पर जुर्माना पटाने वालों की लंबी लाइन लगी रहती है। हद तो यह है कि चेक या वॉलेट से भी पेनाल्टी स्वीकार नहीं की जाती। रकम नगद ली जा रही है। जब इंटिग्रेटेड सिस्टम लागू किया गया तो यह भी बताया गया था कि जुर्माने की राशि ऑनलाइन भी जमा की जाएगी। इसके लिए एक एनआईसी ने एक पोर्टल भी डेवलप कर रखा है। पर भेजे जाने वाले चालान में इसकी जानकारी नहीं दी जाती। नोटिस में यह लिखा होता है कि चालान नहीं जमा करने पर प्रकरण एक सप्ताह बाद कोर्ट में भेज दिया जाएगा। मगर, अधिकांश मामले अभी नहीं भेजे जा रहे हैं। ऐसा हुआ तो कोर्ट में मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी, क्योंकि हर दिन दर्जनों ई चालान जनरेट हो रहे हैं। जो लोग जुर्माना नहीं पटा रहे हैं उनकी भी संख्या हजारों में है। ट्रैफिक महकमे ने सीसीटीवी कैमरे के जरिये ट्रैफिक का उल्लंघन पकडऩे और ऑनलाइन चालान भेजने की व्यवस्था तो कर ली, मगर चालान भरने के लिए अब भी कतार लगवाई जा रही है।
वंदेभारत में मालगाड़ी का इंजन

पिछले दिनों दिल्ली से वाराणसी जाने वाली वंदेभारत एक्सप्रेस ब्रेकडाउन होने के कारण कई घंटे तक इटावा में खड़ी रही। इसके बाद मालगाड़ी का इंजन लगाकर उसे लूप लाइन में लाया गया, तब ट्रैक खाली हुआ और पीछे से आ रही शताब्दी, नीलांचल एक्सप्रेस आदि ट्रेनों को आगे रवाना किया जा सका। कानपुर से एक स्पेशल ट्रेन भेजी गई जिसमें वंदेभारत के यात्री प्रयागराज और वाराणसी भेजे गए। वंदेभारत का किराया इसलिये ज्यादा है क्योंकि इसका सफर आराम दायक है, बहुत कम स्टॉपेज हैं और रफ्तार सबसे ज्यादा है। समय बद्धता तो इतनी कि वंदेभारत के लिए कई बार मालगाड़ी भी रोक दी जाती है। मगर इस दिन वंदेभारत के यात्रियों को इटावा के बाद का सफर पैसेंजर और लोकल ट्रेनों में जैसे-तैसे पूरी करनी पड़ी। रेलवे का नियम ऐसे मामलों में सबके लिए एक बराबर है। तकनीकी समस्या के कारण ट्रेन को देर होती है तो यात्री के पैसे नहीं लौटाये जाते। चाहे वह पैसेंजर ट्रेन हो गया महंगी वंदेभारत।
सूचना आयोग और कोर्ट
खबर है कि मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति को लेकर राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र पाण्डेय हाईकोर्ट जा सकते हैं। यह पद पिछले दो साल से खाली पड़ा है। पाण्डेय ने विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सीएम विष्णुदेव साय से मिलकर प्रमुख लोकायुक्त, और मुख्य सूचना आयुक्त की जल्द नियुक्ति को लेकर ज्ञापन सौंपा था। सरकार ने प्रमुख लोकायुक्त की नियुक्ति तो कर दी है, लेकिन मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति होना बाकी है।
अब तक तीनों मुख्य सूचना आयुक्त एके विजयवर्गीय, सरजियस मिंज, और एमके राउत रिटायर्ड आईएएस रहे हैं। वीरेन्द्र पाण्डेय इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर किसी ब्यूरोक्रेट के बजाए न्यायिक सेवा अथवा सीनियर वकील की नियुक्ति की जाए।
पाण्डेय का तर्क है कि सूचना से जुड़े ज्यादातर मामले ब्यूरोक्रेट्स से जुड़े होते हैं, और सूचना देने में ही वो हील-हवाला करते हैं। सूचना आयोग से भी उन्हें एक तरह से संरक्षण मिल जाता है। रिटायर्ड जज अथवा सीनियर वकील की नियुक्ति से सूचना आयोग के काम में पारदर्शिता आएगी। अब सरकार क्या सोचती है, यह तो मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के बाद ही पता चल पाएगा। वैसे मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा सूचना आयोग में सूचना आयुक्त का एक पद पहले से ही खाली है। इसके लिए आवेदन मंगाए गए थे, और करीब 100 से अधिक आवेदन आए भी थे। मगर नियुक्ति रूक गई है। देखना है कि दोनों पदों पर नियुक्ति कब तक होती है।
अब महिला बड़ा मुद्दा है
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव हरियाणा, और जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र व झारखंड के चुनाव के लिए घोषणा पत्र तैयार करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इस काम में दोनों राज्यों के स्थानीय नेताओं के साथ-साथ अमिताभ दुबे भी उनका सहयोग कर रहे हैं। अमिताभ दुबे, दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दोस्त-पत्रकार सुमन दुबे के बेटे हैं। अमिताभ, कांग्रेस के रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। चर्चा है कि घोषणा पत्र में महिलाओं पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार लाने में महतारी वंदन योजना ने अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि उस वक्त कांग्रेस ने डॉ. चरणदास महंत, और टीएस सिंहदेव के सुझाव पर महिलाओं के लिए नारी न्याय योजना लाया गया था। पहले सीएम भूपेश बघेल इसके लिए तैयार नहीं थे, बाद में वे किसी तरह तैयार हुए, और पहले चरण के चुनाव के बाद इसकी घोषणा की गई। तब तक काफी देर हो चुकी थी।
खैर, भाजपा महाराष्ट्र में महतारी वंदन की तर्ज पर लाडली योजना ला रही है। इससे हर महिला के खाते में 1500 रुपए जमा होंगे। कुछ ऐसी ही योजना भाजपा की दूसरे राज्यों के लिए भी है। सिंहदेव और कांग्रेस के दूसरे रणनीतिकार भी महिला वोटरों को अपने पाले में करने के लिए इससे मिलती जुलती योजना लाने की तैयारी में है। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में महिलाओं की ताकत सिंहदेव देख चुके हैं। देखना है कि चुनाव वाले राज्यों के महिला वोटरों के लिए वे क्या कुछ कर पाते हैं।
दो आईपीएस पदोन्नत
राज्य पुलिस सेवा के दो अधिकारियों को आईपीएस में पदोन्नति को हरी झंडी मिल गई है। इनमें 1998 बैच के एएसपी प्रफुल्ल ठाकुर और विजय पांडे को आईपीएस अवार्ड हो गया है। दोनो अफसरों को 2014 बैच मिलना तय है। इसके आदेश जल्द जारी हो जाएंगे। इसके लिए पिछले दिनों दिल्ली में उच्च स्तरीय पदोन्नति समिति की बैठक हुई थी। इन्हें वर्ष 2022-23 में हुई रिक्तियों की पूर्ति के तहत पदोन्नति दी गई है । हालांकि ये दोनों, निर्धारित समय से तीन वर्ष देर से पदोन्नत हो पाए हैं। इसके पीछे, पैरा मिलिट्री फोर्स के दो अफसरों के छगपु में संविलियन और उनकी आईपीएस पदोन्नति कारण रही है। इसका रापुसे संघ ने रमन राज में बड़ा विरोध किया था। लेकिन सरकार ने अपने अफसरों की न सुनी। ये दोनों, अब तक पूरे राज्य कैडर के अफसरों की चेन टूटने का भी कारण बन चुके हैं ।
कोल घोटाले में फंसी डीपीसी
पुलिस के मुक़ाबले डिप्टी कलेक्टरों के आईएएस अवार्ड हर वर्ष होते रहे हैं। राप्रसे में तो 2008 बैच तक क्लियर हो गए हैं। वैसे इस कैडर में भी कोल घोटाले के चलते डीपीसी चार वर्ष से अटकी हुई है, क्योंकि पिछली सरकार ने सौम्या चौरसिया को आईएएस मिलने के पहले किसी और को आगे नहीं बढऩे दिया था। । इस बार भी, 5 जुलाई को डेट तय होने के बाद डीपीसी कैंसिल कर दी गई।
मेनका गांधी की अपील काम करेगी?

वन्यजीवों के प्रति गहरी संवेदना रखने वाली पूर्व सांसद मेनका गांधी ने सोशल मीडिया पर एक अपील की है। उन्होंने अचानकमार अभयारण्य में 10 साल पहले लाए गए सोनू हाथी को रिहा करने की मांग करते हुए पोस्ट डाली है जिसे केंद्रीय वन मंत्रालय और राज्य के चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन को टैग किया है। सोनू हाथी की कहानी बड़ी तकलीफदेह रही है। सन् 2015 में उसे अंबिकापुर से यह कहकर अचानकमार में कैद कर दिया कि वहां उसने कई मनुष्यों को मार डाला। उसके व्यवहार में बदलाव आएगा, तब उसे छोड़ा जाएगा। कुछ महीने बाद इस हाथी की अचानकमार से आई तस्वीर से घमासान मच गया। उसके पैर मोटी जंजीरों से बांध दिए गए थे, जिससे खून रिस रहा था। मामला हाईकोर्ट में भी चला गया। अदालत ने तब चार माह बाद,, इलाज हो जाने पर छोड़ देने का आदेश दिया था। मगर सोनू अब तक कैद है। अब मेनका गांधी ने इस ओर सरकार का ध्यान यह कहते हुए दिलाया है कि गणेश चतुर्थी पर एक हाथी के प्रति दया की जाए। छत्तीसगढ़ के अनेक वन्यजीव प्रेमी पहले से ही सोनू की रिहाई की मांग करते आ रहे हैं। हाईकोर्ट का आदेश भी है लेकिन उसे छोड़ा नहीं जा रहा है। वन विभाग के पास इसका कोई ठोस कारण हो भी तो उसे वह जाहिर नहीं कर रहा है।
मूर्ति में झलकती रचनात्मकता

दूसरे कई त्यौहारों की तरह गणेश चतुर्थी भी भव्य से भव्यतम होता जा रहा है। हर गली में दो चार गणेश जी विराजे हैं। पर घरों में छोटी सी गणेश प्रतिमा की स्थापना को बच्चों के व्यक्तित्व विकास से जोडक़र देखा जाता है। कुछ साल से पीओपी प्रतिमाओं की बाजार में भरमार होने लगी है, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। ऐसे में बच्चों को इस पर्व में अपने हाथों से मिट्टी की प्रतिमा बनाने के लिए कई स्कूल, घरों में प्रेरित किया जा रहा है। उनके बीच प्रतियोगिताएं भी रखी जा रही है। ऐसी ही एक बच्ची के हाथ में मिट्टी के गणेश जी, जो उसने खुद से बनाए। तस्वीर यदुनंदन नगर बिलासपुर के एक स्कूल की है।
नया रायपुर बसने की ओर
बरसों तक वीरान रहे नवा रायपुर में बसाहट तेजी से हो रही है। नवा रायपुर अब मंत्री-अफसरों की पहली पसंद बनते जा रहा है। कृषि मंत्री रामविचार नेताम तो वहां शिफ्ट होने की तैयारी कर रहे हैं। दो और मंत्री भी जल्द नवा रायपुर में शिफ्ट होने वाले हैं। इससे परे नवा रायपुर की ऑफिसर्स कॉलोनी भी गुलजार हो रही है। दर्जनभर से अधिक अफसर वहां शिफ्ट हो चुके हैं।
नवा रायपुर के सेक्टर-18 स्थित ऑफिसर्स कॉलोनी सर्व सुविधा युक्त है। यहां का बंगला, देवेन्द्र नगर के ऑफिसर्स कॉलोनी की तुलना में काफी बड़ा है। कई अफसरों ने तो बंगले में अतिरिक्त साज सज्जा कराई है। यही नहीं, हरेक बंगले में डीजी-सेट लगाए जा रहे हैं। ताकि बिजली गुल होने की स्थिति में बंगले की रौशनी बनी रहे।
जो अफसर वहां शिफ्ट हुए हैं, उनमें एसीएस सुब्रत साहू, रिचा शर्मा, अलरमेल मंगाई डी, सोनमणि बोरा, पुष्पेंद्र मीणा, चंदन कुमार, सारांश मित्तर, आर संगीता, कुलदीप शर्मा, ऋतुराज रघुवंशी, श्यामलाल धावड़े, अभिजीत सिंह, नूपुर राशि पन्ना, सीआरपीएफ के डीआईजी शशिप्रकाश सिंह, और निलंबित आईपीएस सदानंद कुमार हैं। मंत्रालय, विभागाध्यक्ष भवन नजदीक होने के कारण भी नवा रायपुर का बंगला अफसरों को रास आ रहा है।
बड़े-बड़ों पे एफआईआर
सरगुजा के बड़े कारोबारियों में हलचल मची हुई है। वजह यह है कि अंबिकापुर तहसीलदार ने पुलिस ने चार बड़े कारोबारियों के खिलाफ एफआईआर कराई है। कारोबारियों पर आरोप है कि उन्होंने राजस्व मंडल के आदेशों में छेड़छाड़ कर जमीन की अफरा-तफरी की कोशिश की।
आरोपियों में राजपुर के अशोक अग्रवाल भी हैं, जिनके यहां कुछ समय पहले ईडी ने दबिश भी दी थी। अशोक सरकारी विभागों के बड़े सप्लायर हैं, और कॉन्ट्रेक्टर भी हैं। उनकी दोनों ही प्रमुख दल भाजपा, और कांग्रेस में गहरी पैठ रही है। कलेक्टर के निर्देश पर एफआईआर हुई है, तो कारोबारियों में हडक़ंप मचा हुआ है।
यह बात भी सामने आ रही है कि पहले भी राजस्व मंडल के आदेशों में छेड़छाड़ कर कई और लोगों ने जमीन की अफरा-तफरी की है। पिछली सरकार में जमीन की अफरा-तफरी के प्रकरण में अमरजीत भगत के करीबी लोगों के खिलाफ एफआईआर भी हुआ था। ताजा मामला सामने आने के बाद कई और नए प्रकरण आ सकते हंै।
सीमेंट सिंडिकेट की मुनाफे की रेस
मॉनसून की वापसी की आहट होते ही कंस्ट्रक्शन का काम रफ्तार पकड़ रहा है। इधर सीमेंट कंपनियों ने एक साथ प्रति बैग सीमेंट की कीमत 50 रुपये बढ़ा दी है। 3 सितंबर से पहले जो सीमेंट 260 रुपये में मिल रहा था अब 310 रुपये का हो गया है। सरकारी प्रोजेक्ट के लिए दिए जाने वाले सीमेंट की कीमत भी 50 रुपये बढ़ाई गई है। जो लोग मकान बना रहे हैं, उन पर रेत के बाद यह दोहरा बोझ है। खनिज विभाग न तो रेत की कीमतों पर लगाम लगा सकी, न ही उसके अवैध भंडारण और परिवहन पर। दिखावे के लिए जब्ती की दो चार कार्रवाई होती है। सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कम से कम सीमेंट के मामले में आवाज उठाई है। उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री से, बल्कि प्रतिस्पर्धा आयोग से भी इसकी शिकायत की है। अग्रवाल सत्तारूढ़ दल के एक वरिष्ठ नेता हैं। देखना यह है कि उनकी बात का कहां तक असर होता है। हो सकता है, वृद्धि में 10-20 रुपये की कमी कर दी जाए, फिर भी मुनाफा तो सीमेंट कंपनियों का ही होगा। हाल ही में केंद्र सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए छत्तीसगढ़ को राशि दी है। इसके चलते एकाध महीने के भीतर ही आवासों के निर्माण में रफ्तार दिखाई देगी। मगर, यह रफ्तार धीमी हो सकती है। आवासहीनों का बजट बिगड़ सकता है।
विनाश रोकने की नन्ही सी कोशिश

हसदेव में नए कोल ब्लॉक में खनन शुरू करने के लिए पेड़ों की कटाई फिर शुरू हो गई है। यहां के आदिवासी लगातार आंदोलन कर रहे हैं। आज जो लोग हसदेव को बचाने के लिए जो लोग सडक़ पर हैं उनकी आधी जिंदगी शायद बीत चुकी हो। पर, इन तख्तियां थामे बच्चों को बचपन से ही विनाश देखना पड़ रहा है।
रेलवे से सांसद खफा
बिलासपुर में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे मंडल की बैठक में शुक्रवार को भाजपा सांसदों ने तेवर दिखाए। इस बैठक में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और ओडिशा के 10 सांसद सदस्य हैं। बैठक में 8 सांसद मौजूद थे। बैठक में भाजपा के सांसद इस बात को लेकर खिन्न थे कि रेलवे यात्री सुविधाओं के बजाए माल ढुलाई पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य, और राज्यसभा सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने रेलवे को 44 मील जमीन दान में दी थी। तब रेलवे का वादा था कि उस रूट की सभी ट्रेनें रायगढ़, और सक्ती में रुकेंगी। कोरोना काल में जिन ट्रेनों का रायगढ़ में स्टॉपेज था, वो बंद हो गया। उन्होंने तत्काल प्रभाव से ट्रेनों का रायगढ़ में स्टॉपेज शुरू करने पर जोर दिया।
बताते हैं कि रेलवे अफसर इस पर कुछ ज्यादा आश्वासन देने की स्थिति में नहीं थे। तब देवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि वो बैठक के बाद जनता को क्या कहेंगे? रेलवे बोर्ड के अफसर ने उन्हें समझाया कि ट्रेनों के स्टॉपेज पर तुरंत फैसला नहीं लिया जा सकता है। मगर इसका परीक्षण कर यथासंभव कदम उठाया जाएगा।
बैठक में पार्किंग के ठेके पर केन्द्रीय मंत्री तोखन साहू ने साफ तौर पर कह दिया कि पार्किंग का ठेका स्थानीय व्यक्ति को ही दिया जाना चाहिए। तोखन साहू सहित अन्य सांसदों की शिकायत थी कि रेलवे उनके पत्रों का जवाब नहीं देता है। कुल मिलाकर रेलवे अफसरों को सांसदों का कोप भाजन बनना पड़ा।
कांग्रेस में बदलाव के पहले...
नगरीय निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस से दर्जनभर जिलाध्यक्षों को बदलने की चर्चा चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज इस सिलसिले में पार्टी के प्रमुख नेताओं से रूबरू चर्चा भी कर रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं ने अपनी तरफ से नाम भी दिए हैं।
रायपुर शहर जिला अध्यक्ष के लिए कई नेता दौड़ में हैं। शहर अध्यक्ष गिरीश दुबे को अध्यक्ष के रूप में दो कार्यकाल हो चुके हैं। उनका बदलना तय माना जा रहा है। इसके लिए पूर्व संसदीय सचिव विकास उपाध्याय के अलावा सुबोध हरितवाल, श्रीकुमार मेनन, और विनोद तिवारी के नाम भी चर्चा है। मगर रायपुर दक्षिण के चुनाव की वजह से शहर अध्यक्ष की नियुक्ति कुछ समय के लिए टल भी सकती है।
दूसरी तरफ, रायपुर ग्रामीण अध्यक्ष उधो वर्मा के कार्यकाल को एक साल अधिक हो चुके हैं। हालांकि उधो वर्मा को लेकर कहीं कोई शिकायत नहीं है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू, और डॉ. शिव डहरिया उन्हें बदलने के पक्ष में नहीं है। मगर जिलाध्यक्षों के बदलाव की चर्चा से संगठन की गतिविधियां थोड़ी धीमी हो गई है। जिलाध्यक्ष बदले जाएंगे या नहीं, इस पर फैसला अगले कुछ दिनों में हो सकता है।
विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की चर्चा चल रही है लेकिन इसमें काफी देर हो चुकी है। कई सीटों पर पदाधिकारियों ने खुद चुनाव लड़ा और हार गए लेकिन वे अब तक पद पर जमे हुए हैं। इसकी गिनती प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज से ही शुरू की जा सकती है। बिलासपुर के जिला ग्रामीण अध्यक्ष विजय केशरवानी सहित कुछ अन्य इनमें शामिल हैं। एक ओर भाजपा ने जोर-शोर से सदस्यता अभियान शुरू कर दिया है, सबको नए सिरे से सदस्य बनाने जा रही है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अपनी कार्यकारिणी और जिला इकाईयों में फेरबदल नहीं कर पा रही है। प्रदेश के प्रभारी महासचिव सचिन पायलट की दिलचस्पी भी पूर्ववर्ती महासचिवों के मुकाबले कम दिखाई देती है। कुछ ही महीनों बाद नगरीय निकायों के चुनाव होने वाले हैं। अब यह सुनने में आ रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष चाहे न भी बदला जाए लेकिन जिलों में अध्यक्षों को बदला जाएगा, साथ ही प्रदेश कार्यकारिणी से भी कुछ पदाधिकारी हटाए जाएंगे और कुछ नए लोग लाए जाएंगे।
बस्तर का बिसर...

इन दिनों पूरे प्रदेश की तरह बस्तर में भी नदी नालों में खूब पानी है। मछलियां भी खूब मिल रही हैं। इस उपकरण को ‘बिसर’ कहा जाता है। बिसर एक पारंपरिक जाल की तरह होता है, जिसे पानी के प्रवाह में बिछाया जाता है। जैसे ही मछलियाँ इस के संपर्क में आती हैं, इसी में फंस जाती हैं। बिसर बस्तर के आदिवासी समाज की एक पुरानी और प्रभावी मछली पकडऩे की तकनीक है, जो प्राकृतिक संसाधनों के प्रति उनकी गहरी समझ को दर्शाता है।
हरियाणा और छत्तीसगढ़
हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस में प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया चल रही है। इनमें पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव अहम भूमिका निभा रहे हैं। हाईकमान ने उन्हें एक उच्च स्तरीय उपसमिति का सदस्य बनाया है। यह समिति, हरियाणा प्रदेश कांग्रेस की छानबीन समिति की अनुशंसाओं का परीक्षण कर सभी सीटों के लिए एक नाम का पैनल तैयार करने की जुगत में लगी है।
उपसमिति के मुखिया पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी महामंत्री केसी वेणुगोपाल हैं। सिंहदेव की हरियाणा कांग्रेस के दिग्गज भूपिंदर सिंह हुड्डा, कुमारी सैलजा, और अन्य नेताओं से मधुर संबंध हैं। सिंहदेव की बहन, और हिमाचल सरकार की पूर्व मंत्री आशा कुमारी हरियाणा की प्रभारी रही हैं।
दूसरी तरफ, टिकट को लेकर हरियाणा कांग्रेस के दिग्गजों में ठनी हुई है। इन सबके साथ समन्वय बनाकर सभी सीटों के लिए वेणुगोपाल, और सिंहदेव व अजय माकन गुरुवार सुबह से माथापच्ची कर रहे हैं। आज भी बैठकों का दौर जारी है। बताते हैं कि हुड्डा और सैलजा व अन्य नेताओं से सिंहदेव सीधे चर्चा कर रहे हैं। शनिवार को केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक है। इससे पहले हरियाणवी दिग्गजों के बीच एक राय बनाने की कोशिश हो रही है। अब इसमें कितनी सफलता मिलती है, यह तो एक-दो दिनों में स्पष्ट हो पाएगा।
कार्यकर्ता रह गए कद्दावर नेता
राजनीति में दशकों खपाने वाले नेता भी कई बार जनता के मिजाज को पहचानने में चूक कर जाते हैं। भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक नंदकुमार साय ने 30 अप्रैल 2023 को भाजपा से इस्तीफा दिया था और अगले दिन वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस सरकार ने उन्हें तुरंत राज्य औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाकर राज्य मंत्री का दर्जा भी दे दिया। लैलूंगा, कुनकुरी और पत्थलगांव में से किसी एक सीट से वे कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा चुनाव लडऩा चाहते थे, लेकिन उनकी दावेदारी चयन समिति ने खारिज कर दी। उसी वक्त तय हो गया कि कांग्रेस में साय के लिए जगह नहीं है। कांग्रेस की भारी पराजय से रही-सही कसर पूरी हो गई। चुनाव परिणाम के 15 दिन बाद ही उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद वापस भाजपा में लौटने का सही मौका देख रहे थे। भाजपा का सदस्यता अभियान शुरू होते ही उन्होंने पार्टी में वापसी कर ली। मिस्ड कॉल सिस्टम ऐसा है जिसमें किसी के सामने उन्हें जाने की जरूरत नहीं पड़ी। चूंकि उन्होंने खुद ही पार्टी छोड़ी थी, पार्टी ने उनके खिलाफ निलंबन या निष्कासन जैसी कोई कार्रवाई नहीं की थी इसलिये तकनीकी रूप से उनकी सदस्यता लेने में कोई बाधा ही नहीं थी। अब प्रदेश और पार्टी में उन्हें बहुत कुछ बदला-बदला सा लग रहा होगा। डॉ. रमन सिंह, जिनके खिलाफ वे पार्टी में रहते हुए भी आरोप लगा चुके थे, कि मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया- अब वे भी सत्ता के केंद्र में नहीं है। साय चाहते थे कि प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री हो, खुद को इसका विकल्प के तौर पर पेश भी करते थे। आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग तो पूरी कर दी गई है, भले ही मौका उनको नहीं मिला। कांग्रेस में जाने के बाद वे उसे फायदा नहीं पहुंचा पाए, भाजपा को भी नुकसान नहीं हुआ। कभी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे, पर आज वे उसी पार्टी में कार्यकर्ता के रूप में फिर सफर शुरू करेंगे, जिसे खड़ा करने में कभी पसीना बहाया था।
गुटखा खाने का पाठ पढ़ाते गुरुजी

छत्तीसगढ़ के स्कूलों की दुर्दशा इस कदर बढ़ चुकी है कि अब यहां की शर्मनाक घटनाएं सुर्खियों में भी जगह नहीं बना पातीं। शिक्षकों की हरकत आने वाली पीढिय़ों को गर्त में धकेल रही हैं। यह तस्वीर मस्तूरी की है, जहां एक शिक्षक ने स्कूल के पास की दुकान से गुटखा मंगवाने के लिए बच्चों को भेज दिया। हाल ही में प्रदेश का एक और मामला सामने आया था, जिसमें छात्राओं ने खुलासा किया कि उनका शिक्षक गुटखा चबाते हुए स्कूल आता है, जिसकी बदबू से उनको कमरे में बैठने में तकलीफ होती है। मस्तूरी की यह तस्वीर बता रही है कि राज्य के कई स्कूलों में शिक्षक बच्चों को संस्कार नहीं दे रहे, बल्कि बिगाडऩे का काम कर रहे हैं।
हाल ही में स्कूल शिक्षा विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किया था कि स्कूलों के 100 मीटर के भीतर किसी भी प्रकार की पान-तम्बाकू की दुकान नहीं होनी चाहिए। यह हर साल जारी होने वाला औपचारिक निर्देश है। जमीन पर इन आदेशों का पालन कहीं नजर नहीं आता। इसी मस्तूरी में कुछ महीने पहले एक और शर्मनाक घटना हुई थी जब एक शिक्षक स्कूल के स्टाफ रूम में बैठकर शराब के पैग चढ़ा रहा था। वह वीडियो वायरल हुआ और उसे नौकरी से बाहर भी कर दिया गया, पर ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के नाम पर कुछ नहीं हो रहा है। सवाल है कि इन शिक्षकों का गुटखा और शराब प्रेम इन बच्चों को कैसा भविष्य देगा?
अब बढ़ेगा शिक्षक भर्ती का दबाव
बीएड अभ्यर्थियों को सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिलने की खुशी ज्यादा दिन टिक नहीं पाई। सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें राहत नहीं मिल सकी। अब लगभग 3000 बीएड डिग्रीधारकों की नौकरी खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन होने पर इनकी नियुक्तियां रद्द होंगी और उनकी जगह डीएड अभ्यर्थियों को नियुक्त किया जाएगा। बीएड अभ्यर्थियों ने चयन परीक्षा पास की है, और स्कूलों में हज़ारों शिक्षक पद ख़ाली भी हैं, फिर भी ये फिर बेरोजगार होने जा रहे हैं।
भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में 57,000 शिक्षकों की भर्ती का वादा किया था। विधानसभा के पहले सत्र में तत्कालीन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने 33,000 रिक्त पदों पर भर्ती के विज्ञापन निकालने की घोषणा भी की थी। अब बीएड अभ्यर्थियों की मांग है कि उन्हें पात्रता वाले खाली पदों पर समायोजित किया जाए। लेकिन 3000 शिक्षकों का समायोजन कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। लाखों बीएड और डीएड डिग्रीधारी चुनावी वादों और विधानसभा में की गई घोषणाओं पर अमल के लिए दबाव बना रहे हैं। यह दबाव अब प्रदर्शन के रूप में जिला मुख्यालयों में दिखाई देने लगा है। 15 सितंबर तक का अल्टीमेटम दिया गया है। इसके बाद 21 सितंबर से रायपुर में धरना प्रदर्शन की योजना बनाई गई है।
स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधरे, इसके लिए शिक्षक भर्ती अनिवार्य है। बच्चे तक जिला मुख्यालयों में जाकर शिक्षकों की मांग कर रहे हैं। राजनांदगांव में तो ऐसे बच्चों को जेल भेजने की धमकी तक दी गई। भाजपा ने अपनी हर चुनावी घोषणा को मोदी की गारंटी के हैशटैग के साथ पेश किया था, लेकिन अब सारा मामला वित्तीय प्रबंधन में अटका हुआ है। हाल ही में वित्त मंत्री ओपी चौधरी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वे वैकेंसी नहीं निकाल पाने की विवशता जताते नजर आ रहे हैं।
साख की लड़ाई साख से !
सरगुजा संभाग के एक जिले के भाजपा विधायकों में गजब की एकता देखने को मिल रही है। ये तीनों विधायक एक राय होकर तबादले का प्रस्ताव देते हैं। ये अलग बात हैं कि तबादला प्रस्तावों को महत्व नहीं मिलने पर ये विधायक नाखुश भी हैं।
बताते हैं कि विधायकों ने पहले कलेक्टर को हटाने पर जोर लगाया था। इसमें सफलता नहीं मिली, तो डीएफओ को हटाने के लिए चि_ी लिख दी। डीएफओ को लेकर जानकारी जुटाई, तो पता चला कि डीएफओ ईमानदार हैं, और नियमों का सख्ती से पालन करते हैं। इसके बाद विधायकों की अनुशंसा को नजरअंदाज कर दिया गया।
विधायक ने फिर जिला शिक्षा अधिकारी के तबादले की सिफारिश की, लेकिन उन्हें भी नहीं बदला गया। जानकारों कहना है कि विधायकगण जिन अफसरों को हटाने की अनुशंसा कर रहे हैं, वो सभी अच्छी साख के हैं। यही वजह है कि विधायकों की अनुशंसाओं को दरकिनार कर लिया जा रहा है। हाल यह है कि तबादलों के चक्कर में विधायक अपनी साख खराब कर रहे हैं।
यूनिवर्सिटी को एक काबिल मिला
एनआरडीए के चेयरमैन एसएस बजाज ने अपने इस्तीफा देने बाद निजी क्षेत्र की तरफ रुख कर लिया है। बजाज को नया रायपुर बसाने का श्रेय दिया जाता है। रिटायर होने के बाद पिछली सरकार ने बजाज को एनआरडीए का चेयरमैन बनाया था।
साय सरकार ने उनकी सेवाएं यथावत रखीं। मगर उन्होंने 31 अगस्त को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सरकार ने उनका इस्तीफा मंजूर भी कर लिया है।
आईएफएस के 88 बैच के अफसर बजाज ने अब रावतपुरा निजी विश्वविद्यालय ज्वाइन कर लिया है। यहां रिटायर्ड आईएफएस डॉ. जितेन्द्र उपाध्याय पहले से ही हैं। वो रावतपुरा संस्थान के कर्ताधर्ता हैं। रावतपुरा संस्थान का मेडिकल कॉलेज भी शुरू हो गया है और और इसको मान्यता भी मिल गई है। ऐसे में संस्थान को बजाज के रूप में एक काबिल अफसर मिल गया है।
मोर्चा से अलग होगा मंत्रालय संघ
सिर मुंडाते ओले पड़े, डीए और एरियर्स को लेकर कर्मचारी संगठनों के बीच यही स्थिति हो गई है। प्रदेश भर के डेढ़ सौ से अधिक अलग अलग संघ एक होकर दो बड़े संगठन बनाए। एक फेडरेशन और दूसरा संयुक्त मोर्चा। साय सरकार के खिलाफ यह पहले आंदोलन को लेकर दोनों ने हड़ताल का चरणबद्ध पर आगे बढ़ रहे । दो खेमे में एक तोडऩा किसी भी सरकार के लिए आसान काम है। कल हुआ भी ऐसा। मोर्चा नेता कल सीएम से मिलने बुलाए गए और फिर वही आश्वासन देकर सरकार 9 तारीख का सामूहिक अवकाश का विरोध तुड़वाने में सफल रही। मोर्चे के इस फैसले पर सबकी नजर इसलिए भी रही कि इसमें मंत्रालय कर्मचारी संघ भी शामिल है। अब कहानी यहीं से शुरू होती है । इस फैसले पर मंत्रालयीन कर्मचारी अपने ही अध्यक्ष पर बिफर रहे हैं। और अध्यक्ष भी सहमत नहीं। अध्यक्ष को सफाई देते नहीं बन रहा।
उनका भी कहना है कि सीएम का आश्वासन उतना ठोस नहीं लगा,कि हड़ताल वापसी का निर्णय लिया जा सके। ऐसा ही आश्वासन डेढ़ माह पहले वित्त मंत्री दे चुके थे। उस पर क्या हुआ यह सबके सामने है। इसलिए वापसी के निर्णय से सहमति नहीं दी। और अचानक मोर्चा प्रमुख ने घोषणा कर दी। इसके बाद मंत्रालय कर्मचारी वाट्सएप पर अपने अध्यक्ष और मोर्चे की राजनीति पर लानत भेज रहे। यह देख अपनी स्थिति स्पष्ट करने अध्यक्ष ने दोपहर गेट मीटिंग बुला ली। सबका दबाव रहा तो मंत्रालय संघ, संयुक्त मोर्चा से अलग हो सकता है । उधर फेडरेशन को मोर्चे की फूट का इंतजार है। फेडरेशन के वाट्सएप ग्रुप में मोर्चा के खिलाफ काफी कुछ कहा जा रहा है।
ये लोग आंदोलन/प्रदर्शन/हड़ताल कि मात्र घोषणा बस करते है और डेट नजदीक आने पर चर्चा का बहाना करके हड़ताल वापस ले लेते है। ये इन लोगो की पुरानी परंपरा है जैसे मैसेज हे रहे हैं। इनका दावा है कि फेडरेशन के बैनर तले ही सब कुछ संभव हो पाएगा।

बस 15 दिन की बात और
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 20 मई को सरकार को आदेश दिया था कि पिछले 6 साल से लंबित पुलिस भर्ती के रुके परिणाम जारी कर सफल प्रतिभागियों को नियुक्ति पत्र दिया जाए। इसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को लगा था कि उन्होंने लड़ाई जीत ली। आज साढ़े तीन माह यानि 105 दिन हो रहे हैं, सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया है, जबकि मियाद 15 दिन पहले खत्म हो चुकी है। उनके घर पर सैकड़ों सफल अभ्यर्थी पहुंच गए, जमीन पर जाकर बैठ गए। मंत्री जी भी उनके साथ जमीन पर बैठे। उनका कहना है कि 370 उम्मीदवारों का चयन और किया जाना है, जिसकी प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई है। 10 दिन ज्यादा से ज्यादा 15 दिन में नियुक्ति आदेश जारी कर दिया जाएगा। भर्ती प्रक्रिया सन् 2017 में शुरू हुई थी। तब भाजपा की सरकार थी। इसके बाद पूरे पांच साल कांग्रेस की सरकार रही, तब भी भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। इस बीच जितने भी गृह मंत्री हुए, किसी ने भी नहीं कहा कि भर्ती रद्द की जाएगी। हर किसी ने आश्वस्त किया। किसी ने दो माह, किसी ने तीन माह का समय लिया। अब उप-मुख्यमंत्री और गृह मंत्री कह रहे हैं कि 15 दिन में नियुक्ति कर दी जाएगी। मगर धरने पर बैठे कई अभ्यर्थियों ने कहा कि उन्हें बार-बार आश्वासन मिल चुका है। हम 15 दिन इंतजार और कर लेंगे। वरना, फिर आकर इसी तरह बैठेंगे। यदि गृह मंत्री का आश्वासन पूरा हो जाता है तो मौजूदा भाजपा सरकार की यह किसी भी सरकारी नौकरी में पहला नियुक्ति आदेश होगा। ([email protected])
इस बार सावधानी से
भाजपा का सदस्यता अभियान तामझाम से शुरू हुआ। इस बार सदस्यता की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है। पिछली बार मिस्ड कॉल के जरिए सदस्यता बनाया गया था, और इसमें कई तरह की चूक हुई थी। टीएस सिंहदेव सहित कई कांग्रेस नेताओं को भाजपा का सदस्य बनाने की खबर भी चर्चा में रही। मगर इस बार पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी रखने की कोशिश की गई है।
प्रत्येक विधायकों को अपने विधानसभा क्षेत्र से 10 हजार और सांसदों को 20 हजार सदस्य बनाने हैं। सांसद, या विधायक या फिर अन्य पदाधिकारी के रेफरल लिंक दबाकर सदस्य बना जा सकता है। जो भी सदस्य बनेगा, उसे बकायदा ऑनलाइन सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा। यानी इस बार फर्जीवाड़ा की गुंजाइश नहीं के बराबर है। सांसद, और विधायकों को टारगेट पूरा करने के लिए काफी मेहनत करनी होगी।
सदस्यता अभियान के लिए कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में कंट्रोल रूम बनाया गया है। जिसकी जिम्मेदारी अनुराग सिंहदेव, और पूर्व विधायक नवीन मारकंडेय को दी गई है। दिल्ली पार्टी दफ्तर से भी पूरे अभियान की मॉनिटरिंग हो रही है। यानी इस बार जो भी सदस्य बनेगा, उसका पूरा ब्यौरा पार्टी के पास होगा। देखना है कि अभियान में कितनी सफलता मिलती है।
नंदकुमार साय और बैस की वापिसी
कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में सीएम विष्णुदेव साय ने अपनी सदस्यता का नवीनीकरण कराया। महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल रमेश बैस भी सदस्यता अभियान के मौके पर सीएम के बगल में बैठे थे। उन्होंने भी सदस्यता ली। बरसों बाद बैस भाजपा कार्यालय पहुंचे थे। सीएम, और प्रदेश अध्यक्ष व अन्य नेताओं का भाषण तो हुआ, लेकिन बैस जी को संबोधन का मौका नहीं मिला। ऐसे में आने वाले दिनों में उनकी क्या भूमिका होगी, इसको लेकर चर्चा है।
बैस की तरह दिग्गज नेता नंदकुमार साय ने भी ऑनलाइन सदस्यता लेकर पार्टी में वापसी की है। पिछले साल मई दिवस के दिन साय भाजपा छोडक़र कांग्रेस में शामिल हो गए थे। बाद में सरकार जाने के बाद वो कांग्रेस से अलग हो गए थे। सामान्य सदस्य तो बन सकते हैं। अगले महीने सक्रिय सदस्यता अभियान शुरू होगा। सक्रिय सदस्यता ऑफलाइन होगा। पार्टी या सरकार में पद के लिए सक्रिय सदस्य का होना जरूरी है। ऐसे में साय या अन्य बड़े नेता, सक्रिय सदस्य बनते हैं या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। कुछ हद तक इससे पार्टी का रुख भी पता चलेगा।
रैलियों की इंटेलिजेंस रिपोर्ट
बलौदाबाजार में जो हिंसा हुई, वह अभूतपूर्व और अप्रत्याशित थी। कम से कम प्रदेश की इंटेलिजेंस एजेंसी के लिए। जिस एजेंसी का काम है अंजाम से पहले भांप लेना, वो शायद नींद में थी। पर अब जब जाग गई है, तो हर राजनीतिक और सामाजिक सम्मेलन में उसे बलौदाबाजार जैसा खतरा दिखाई दे रहा है। मानपुर में जून महीने में हुए जमावड़े की तैयारी भी कुछ ऐसी ही थी। बलौदाबाजार हिंसा के बाद यह पहला बड़ा प्रदर्शन था, और पुलिस ने मैदान को ही नहीं, पूरे मानपुर और आसपास के गांवों को छावनी में तब्दील कर दिया। उस जेल भरो आंदोलन में प्रदर्शनकारियों से ज्यादा पुलिस दिखाई दे रही थी।
जशपुर में कल हुई राजी पड़हा की जनाक्रोश रैली भी कुछ ऐसी ही थी। आयोजकों ने 50 हजार लोगों के जुटने का दावा किया था, लेकिन भीड़ का आंकड़ा आयोजकों के दावे से काफी दूर था। प्रशासन ने सुरक्षा के नाम पर रणजीता स्टेडियम में सभा की मंजूरी नहीं दी, यह कहते हुए कि शहर के लोग परेशान होंगे। लेकिन लोग तो उस भीड़ से नहीं, बल्कि सुरक्षा इंतजामों से ज्यादा परेशान हुए। जगह-जगह बेरिकेड्स, नाकेबंदी और 12 फीट ऊंचे टिन के शेड्स ने लोगों का रास्ता रोक रखा था।
इंटेलिजेंस का काम तो यही है कि वह सही अनुमान लगा ले, चाहे भीड़ ज्यादा हो या कम। लेकिन लगता है कि इन दोनों मामलों में इंटेलिजेंस का अनुमान या तो काफी ऊपर उड़ गया या फिर जमीन से भी नीचे रह गया। मानपुर और जशपुर की भीड़ को लेकर खुफिया पुलिस ने क्या रिपोर्ट दी थी, यह तो उसे ही पता होगा, लेकिन यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों जिलों के कलेक्टर और एसपी को बलौदाबाजार हिंसा के बाद किस पर गाज गिरी थी, यह अच्छी तरह याद है।
फरियादी बच्चों को फटकार

टीचर्स नहीं होने के बावजूद जैसे-तैसे हमने 11वीं की परीक्षा पास कर ली, लेकिन इस साल तो 12वीं बोर्ड का एग्जाम देना है। टीचर्स नहीं होंगे तो कैसे पास होंगे, साल खराब हो जाएगा- इसी चिंता में डूबे डोंगरगढ़ ब्लॉक के आलीवारा स्थित हायर सेकेंडरी स्कूल के बच्चे जनदर्शन में फरियाद करने राजनांदगांव पहुंच गए। कलेक्टर संजय अग्रवाल ने उन्हें डीईओ अभय जायसवाल के पास भेज दिया। जायसवाल उन्हें देखकर तमतमा गए। आवेदन को देखकर फटकार लगाई- किसके कहने पर यह सब लिखा है, अंदर जाओगे तब समझ में आएगा। जेल भेजने की बात सुनकर बच्चे सहम गए और रोने लगे। उन्हें रोते देख रिपोर्टर वहां पहुंच गए। उन्होंने रोते-सुबकते पूरा वाकया बता दिया। वैसे, अहंकार में डूबे, बच्चों के प्रति संवेदनहीन इस लापरवाह अधिकारी पर कोई कार्रवाई शायद ही हो। क्योंकि, शिक्षा विभाग सबसे भ्रष्ट विभागों में से एक है।
शशि सिंह मजबूत
छत्तीसगढ़ की युवा महिला नेत्री सुश्री शशि सिंह युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की दौड़ में हैं। शशि सिंह का सोमवार को पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने इंटरव्यू भी लिया था। देशभर के कुल 15 युवाओं को बुलाया गया था। इनमें छत्तीसगढ़ से शशि के अलावा दुर्ग के मोहम्मद शाहिद भी हैं।
पार्टी के कई नेता शशि सिंह के दावे को काफी मजबूत मान रहे हैं। वजह यह है कि जिन युवाओं का राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए इंटरव्यू हुआ था उनमें आदिवासी वर्ग से अकेली शशि सिंह हैं। शशि सिंह युवक कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव हैं, और प्रदेश की उपाध्यक्ष भी हैं।
वो राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में साथ थीं, और करीब साढ़े 3 हजार किमी पदयात्रा की है। दिवंगत पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की बेटी शशि को कांग्रेस ने सरगुजा से लोकसभा प्रत्याशी बनाया था। उन्होंने साधन-संसाधनों की कमी के बावजूद कड़ी टक्कर दी है। वीरप्पा मोइली कमेटी ने भी उनके जुझारू तेवर को सराहा है। वर्तमान में वे जिला पंचायत की सभापति भी हैं। शशि सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष बने या न बने लेकिन कांग्रेस में उनका भविष्य उज्जवल दिख रहा है। देखना है आगे क्या होता है।
ऐसे में जीत कैसे ?
रायपुर दक्षिण उप चुनाव को लेकर कांग्रेस लिटमस टेस्ट मानकर मैदान में उतरना चाह रही है। भाजपा के इस अजेय सीट पर टक्कर नहीं जीत के दावे के साथ हरेक वार्ड में बिसात बिछा रही। पीसीसी चीफ स्वयं मुख्य रणनीतिकार बने हुए हैं। चीफ ने दक्षिण के 19वार्डों के लिए एक एक वरिष्ठ नेता को प्रभारी बनाया है। इनमें पूर्व सांसद पूर्व प्रत्याशी भी शामिल हैं। चीफ तीन बैठकें ले चुके हैं । पहली बैठक परिचयात्मक रही। दूसरी प्रगति की समीक्षा की।
पिछले सप्ताह हुई तीसरी बैठक में रणनीति को बूथ स्तर पर इंप्लीमेंटेशन को परखने की थी। पहली दो बैठकों में जो नहीं आए वो तीसरी में आए। जो दोनों में आए तीसरी में नहीं आए। और इंप्लीमेंटेशन के बारे में हम क्या बताएं। चीफ ने स्वयं सच्चाई का सामना किया। 19 में से केवल एक ही प्रभारी का ग्राउंड वर्क नजर आया। बाकी तो कार्यकर्ता कर रहे बोलते रहे। यहां तक कि दो पूर्व प्रत्याशियों की भी सक्रियता नजर नहीं आई। इनमें से एक इस बार भी दावेदारी कर रहे। इस तरह के ग्राउंड वर्क पर जीत की स्थिति समझी जा सकती है। पूछने पर कहा गया कांग्रेस प्रत्याशी, किस्मत और भाजपा के विरोध से जीतता है।
बेच कर ही मानेंगे नगरनार को?
नगरनार स्टील प्लांट का सन् 2003 में लालकृष्ण आडवाणी ने शिलान्यास किया था। लंबी प्रतीक्षा के बाद पिछले साल 3 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका लोकार्पण किया। देश के सबसे बड़े ब्लास्ट फर्नेस प्लांट में यह शामिल है। भिलाई स्टील प्लांट के बाद यह दूसरा ऐसा सरकारी उपक्रम है, जिसमें आने वाले दिनों में 25-30 हजार लोगों को प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रोजगार मिल सकता है। फिलहाल इसका नियंत्रण राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) के पास है। सरकार के पास करीब 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है। बाकी 40 प्रतिशत खुले बाजार में है। भिलाई स्टील प्लांट के बाद यह दूसरा ऐसा बड़ा सरकारी स्टील प्लांट है जिससे छत्तीसगढ़ की पहचान बनती है। लोकार्पण से पहले ही बार-बार इस बात की चर्चा उठ रही थी कि इस प्लांट से सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचने जा रही है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि सरकार इसे बेचने जा रही है। यह भी कहा गया कि यदि बेचना ही है तो इसे राज्य सरकार को बेचे, इसे वह खरीदने के लिए तैयार है। बस्तर में यह चुनावी मुद्दा बनने जा रहा था तब वहां के दौरे पर आए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे अफवाह बताया था कि सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं है। इसके बावजूद एक बार फिर इसके बेचने की चर्चा गरम हो गई है। इस बात की जोरों पर चर्चा है कि प्लांट के मूल्यांकन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसका मूल्य निर्धारित होने के बाद प्रस्ताव केंद्र को भेजने की तैयारी है। बस्तर में श्रमिक संगठन ही नहीं, आम लोग भी इससे चिंतित दिखाई दे रहे हैं।
स्कूली बच्चों को साइबर शिक्षा

मोबाइल फोन के माध्यम से होने वाले फ्रॉड, एक्सटॉर्शन और ब्लैकमेलिंग की घटनाएं आम लोगों के साथ-साथ पुलिस के लिए भी एक बड़ी चुनौती हैं। पढ़े-लिखे लोग भी साइबर ठगी के जाल में फंसकर लाखों रुपये गंवा रहे हैं। पुलिस के पास इस तरह की शिकायतों की जांच के लिए न तो पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ है और न ही आवश्यक संसाधन।
ऐसे में, ज्यादा महत्वपूर्ण है कि लोगों को जागरूक करके अपराधों को रोका जाए। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले में एडिशनल एसपी नेहा शर्मा ने हाल ही में आरक्षकों के लिए विशेषज्ञों से प्रशिक्षण रखवाया। गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले में पुलिस अधीक्षक भावना गुप्ता ने कई ओटीटी मूवी और सीरीज में अपनी पहचान बना चुके अभिनेता स्पर्श श्रीवास्तव का फेसबुक लाइव सेशन रखा। उन्होंने लोगों को साइबर अपराधों के प्रति जागरूक किया गया।
सक्ती जिले में एसपी अंकिता शर्मा ने स्कूली बच्चों को ‘साइबर बडी’ के रूप में तैयार करने का अभियान चलाया है, जिससे बच्चों को साइबर क्राइम के विभिन्न तरीकों के बारे में जानकारी दी जा सके। अधिकतर अभिभावकों ने बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन दे दिए हैं, जिससे वे ब्लैकमेलिंग और ऑनलाइन गेमिंग के शिकार हो रहे हैं। स्कूलों में चलाए जा रहे इस अभियान से बच्चे न केवल खुद को सुरक्षित रख सकते हैं, बल्कि अपने घर के बड़े-बुजुर्गों को भी सतर्क कर सकते हैं। साइबर ठगी का जाल अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ है। उनके शिकार गांव-शहर हर जगह मौजूद हैं। ऐसे में इन महिला पुलिस अधिकारियों की कोशिश से साइबर क्राइम रोकने में कुछ तो मदद मिल ही जाएगी।
कथावाचक के जरिये सीएम से गुहार
अगस्त के पहले सप्ताह में राजनांदगांव में हुए प्रख्यात कथावाचक पं. प्रदीप मिश्रा के शिवपुराण कार्यक्रम के आयोजकों में से एक मेजबान ने राज्य सरकार की लालबत्ती की पहली सूची में जगह पाने के लिए प्रदीप मिश्रा के जरिये सरकार से गुहार लगाई है। पं. मिश्रा के सप्ताहभर के कार्यक्रम में लालबत्ती इच्छुक मेजबान को खास मौके की तलाश थी।
पंडितजी से मिलने आए सीएम विष्णुदेव साय तक अपनी फरियाद पहुंचाने मेजबान को एक शानदार अवसर मिल गया। पं. प्रदीप मिश्रा ने मेजबान की ख्वाहिश को एक पत्र के माध्यम से सीएम तक लगे हाथ पहुंचा भी दिया। पंडित मिश्रा से अच्छे रिश्ते का फायदा उठाने के लिए मेजबान व्यक्ति ने मौका देकर चौका लगा दिया।
सुनते हैं कि सीएम को चि_ी देने की भनक भाजपा के कई खाटी नेताओं को बाद में लगी। अब लालबत्ती की उम्मीद में बैठे भाजपा नेताओं के मन में इस बात की धुकधुकी भी हो रही है कि कहीं ग्रामीण परिवेश के मेजबान के हाथ लाटरी न लग जाए। बताते हैं कि सीएम ने मेजबान की गुहार को लेकर खास संकेत नहीं दिया, अलबत्ता प्रवचनकर्ता के हाथों अपनी नैया पार होने की मेजबान को पूरा भरोसा है।
भाजपा सदस्यता और बैस !!
भाजपा का सदस्यता अभियान शुरू हो रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी दिल्ली में पार्टी की सदस्यता का नवीनीकरण कराएंगे। इससे परे सभी प्रदेशों में पार्टी के नेता भी अपनी सदस्यता का नवीनीकरण कराएंगे। छत्तीसगढ़ में भी सीएम विष्णुदेव साय, और सरकार के मंत्री व प्रमुख नेता तीन सितंबर को पार्टी की सदस्यता लेंगे।
छत्तीसगढ़ में पूर्व राज्यपाल रमेश बैस पर नजर है। यह अभी साफ नहीं है कि बैस पार्टी की सदस्यता लेंगे अथवा नहीं। पिछले दिनों दिल्ली में बैस की पीएम मोदी, और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात हो चुकी है। हालांकि शाह पिछले दिनों रायपुर में तीन दिन रूके तो रमेश बैस से मुलाकात नहीं हो पाई।
बताते हैं कि शाह के स्वागत के लिए बैस का नाम सूची में था, लेकिन पास उन तक नहीं पहुंच पाया। इसलिए वो स्वागत के लिए नहीं जा पाए। सात बार के सांसद बैस की पार्टी क्या कुछ उपयोग करेगी, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
जिम्मा बृजमोहन पर ही होगा?
सांसद बृजमोहन अग्रवाल की विधानसभा सीट रायपुर दक्षिण पर कब्जा बरकरार रखने के लिए भाजपा एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। उपचुनाव के तारीख की घोषणा भले ही नहीं हुई है, लेकिन संगठन ने प्रभारी नियुक्त करना शुरू कर दिया है।
वैसे तो प्रदेश उपाध्यक्ष शिवरतन शर्मा, और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को चुनाव का प्रभारी बनाया है, लेकिन प्रदेश संगठन ने वार्ड स्तर पर प्रभारी नियुक्त करना शुरू कर दिया है। सभी पार्षदों को उनके वार्ड का प्रभारी बनाया गया है, और हारे हुए प्रत्याशियों को उनके अपने वार्ड में जिम्मेदारी दी जा रही है।
प्रचार की कमान खुद बृजमोहन अग्रवाल संभालेंगे, और टिकट के दावेदार भी उनके दरवाजे मत्थे टेक रहे हैं। संगठन के रणनीतिकारों ने संकेत दिए हैं कि बृजमोहन की पसंद को ही तवज्जो दिया जा सकता है। यही वजह है कि दावेदार अपने समर्थकों के साथ उनसे मिल रहे हैं। विधानसभा उपचुनाव की घोषणा अगले कुछ दिनों में हो सकती है। इसके बाद चुनावी हलचल तेज होने के आसार हैं।
टीकाकरण का विरोध
छत्तीसगढ़ के कोटा तहसील में मलेरिया से चार मौतें हाल ही में हुई। कहीं पर झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज से यह नौबत आई थी तो कहीं सरकारी अस्पतालों में समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण। इसके बाद बिलासपुर कलेक्टर ने अस्पतालों की कॉम्बिंग चेकिंग कराई गई तो ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों से दर्जनों स्टाफ और डॉक्टर गायब पाए गए। कुछ लोगों का नोटिस दी गई, कुछ का वेतन काटा गया। अब इसी क्षेत्र में आंगनबाड़ी में टीकाकरण के बाद दो नवजातों की मौत हो गई और पांच शिशुओं की तबीयत खराब हो गई। ये टीके भविष्य में होने वाली बीमारियों से रोकथाम के लिए होती हैं। इस घटना का एक बुरा असर यह हुआ है कि अब टीका लगाने के लिए गांव पहुंचने वाले कार्यकर्ताओं का विरोध हो रहा है। माताओं को टीके के लिए समझाना मुश्किल हो गया है। वे मना कर रही हैं। जो होगा बाद में देख लेंगे। अभी तो अपने बच्चों की जान को खतरे में नहीं डालेंगे।
कोटा से लगे तखतपुर ब्लॉक में कुछ साल पहले नसबंदी कराने के बाद 13 महिलाओं की जान चली गई थी। इसके बाद पूरे प्रदेश में महिला नसबंदी पर असर पड़ा था। पुरुष नसबंदी का प्रतिशत तो कम रहता ही है। उस घटना के बाद कैंप लगाने और नसबंदी का लक्ष्य देने के सिलसिले पर रोक लग गई थी। जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम को इस घटना से बड़ा नुकसान हुआ। दो शिशुओं की मौत के बाद टीकाकरण का विरोध यहां हो रहा है, मगर स्वास्थ्य विभाग को शायद इसकी परवाह नहीं है।
मोबाइल कैमरे के जमाने में...

हर हाथ में मोबाइल फोन होने से हर कोई फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी कर सकता है, लेकिन इस तस्वीर में मौजूद लोग दिखाते हैं कि असली फोटोग्राफी एक गंभीर और श्रमसाध्य कला है, जो तकनीकी कौशल और रचनात्मकता की मांग करती है। इसके लिए, दृष्टि, धैर्य और सही समय की गहरी समझ की आवश्यकता होती है। हर क्लिक के पीछे एक कहानी, एक अनुभव छिपा होता है, जिसे एक अनुभवी फोटोग्राफर ही समझ सकता है। जंगल सफारी रायपुर की यह तस्वीर पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की है।
देवेंद्र वर्मा का महत्व वहां समझा
छत्तीसगढ़ विधानसभा के प्रमुख सचिव रहे देवेन्द्र वर्मा को मध्यप्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी मिली है। उन्हें संसदीय सलाहकार बनाया गया है। देवेन्द्र वर्मा अपने अपार संपर्कों, और संसदीय ज्ञान के लिए जाने जाते हैं।
देवेन्द्र वर्मा के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय, और बृजमोहन अग्रवाल जैसे दिग्गजों से घनिष्ठता रही है। और जब गौरीशंकर अग्रवाल विधानसभा के अध्यक्ष बने, तो उन्हें प्रमुख सचिव पद पर फिर से एक्सटेंशन देने की बात आई, लेकिन गौरीशंकर अग्रवाल राजी नहीं हुए।
हालांकि देवेन्द्र वर्मा को अध्यक्ष का सलाहकार पद की पेशकश की गई थी। लेकिन देवेन्द्र वर्मा तैयार नहीं हुए। इसके बाद भोपाल शिफ्ट हो गए। मध्यप्रदेश में नरेन्द्र सिंह तोमर के विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद देवेन्द्र वर्मा को अहम जिम्मेदारी मिलने की चर्चा रही। देवेन्द्र वर्मा का मध्य प्रदेश सरकार के ताकतवर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से घरोबा है। साथ ही सीएम मोहन यादव से भी अच्छे रिश्ते हैं। तमाम समीकरण उनके अनुकूल थे। इस वजह से उन्हें संसदीय सलाहकार बनाने में कोई दिक्कत नहीं हुई।
यहां भी होंगे सलाहकार?
छत्तीसगढ़ में भी संसदीय सलाहकार की नियुक्ति की चर्चा है। रमन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में मध्यप्रदेश विधानसभा के अफसर अशोक चतुर्वेदी को संसदीय सलाहकार बनाया गया था। इसके बाद वे लगातार पद पर बने रहे।
भूपेश सरकार ने अपने करीबी राजेश तिवारी को संसदीय सलाहकार बनाया था। साय सरकार ने अब तक किसी की नियुक्ति नहीं की, लेकिन कई नाम चर्चा में हैं। कुछ लोगों ने फिर चतुर्वेदी का नाम सुझाया है। इससे परे डॉ. सत्येन्द्र तिवारी के नाम की चर्चा है।
डॉ. तिवारी छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव रहे हैं, और संसदीय विषयों पर उनकी गहरी पकड़ है। वर्तमान में प्रशासन अकादमी में उनका लेक्चर होता है। इसी तरह डॉ. चंद्रशेखर गंगराडे के नाम की भी चर्चा है। देखना है कि साय सरकार किसे संसदीय सलाहकार बनाती है।
अच्छी साख वाले दो बढ़ेंगे
सरकार में जल्द ही एक प्रशासनिक फेरबदल हो सकता है। आईएएस के वर्ष-2005 बैच के अफसर रजत कुमार संभवत: अगले हफ्ते मंत्रालय में जॉइनिंग दे देंगे। इसी तरह पीएमओ में संयुक्त सचिव रहे आईएएस के वर्ष-03 बैच के अफसर डॉ. रोहित यादव भी हफ्ते-दस दिन में यहां जॉइनिंग दे रहे हैं।
दोनों अफसरों की वजह से प्रशासनिक फेरबदल होने की चर्चा है। रजत कुमार, रमन सिंह सरकार में सीएम सचिवालय में रहे हैं। वे कई अहम पदों पर काम कर चुके हैं। इसी तरह डॉ. रोहित यादव भी रायपुर, राजनांदगांव जिले के कलेक्टर रहे हैं। दोनों अफसरों की साख अच्छी है। लिहाजा, उन्हें अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।
राज्यपाल की सक्रियता
राज्यपाल रमेन डेका ने कल बिलासपुर में अफसरों की बैठक ली और उसी तरह से अधिकारियों को निर्देश दिया जैसा मुख्यमंत्री, मंत्री देते हैं। उन्होंने स्वास्थ्य, किसान, अपराध से जुड़े मुद्दों पर कई सवाल-जवाब किए। बिलासपुर से पहले वे दुर्ग और महासमुंद में भी बैठक ले चुके हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसा माहौल नया है। राज्यपाल प्राय: अधिकारियों को सीधे निर्देश देने से बचते हैं। किसी विषय पर यदि उन्हें हस्तक्षेप जरूरी लगता है तो वे मुख्यमंत्री या मंत्रालय के अधिकारियों के माध्यम से अपनी बात रखते रहे हैं। जैसे पूर्व राज्यपाल अनुसूईया उइके ने सूपेबेड़ा का दौरा करके फैली किडनी की बीमारी को लेकर चिंता जताई थी। चूंकि राज्य में भाजपा की सरकार है और केंद्र की ओर से नियुक्त राज्यपाल से उनका कोई टकराव नहीं है, इसलिए उनकी सक्रियता को लेकर कोई सवाल नहीं उठ रहा है। पर, यदि केंद्र और राज्य में सरकार परस्पर विरोधी दलों की होती तो इसे दखलंदाजी करार दे दिया जाता और काफी हंगामा खड़ा हो जाता। अब तो इंतजार किया जाना चाहिए कि किस दिन वे मंत्रालय में ऐसी बैठक बुलाते हैं।
खूबसूरती सबका हक

इस तस्वीर में भैंस मानो अपनी बारी का इंतजार कर रही हो। शायद सोच रही है कि आज जरा मेकओवर करवा ही लिया जाए, आखिर खूबसूरती पर तो सबका हक है! अब देखना यह है कि इस पार्लर की खूबसूरती भैंस पर चढ़ती है या उसकी मासूमियत पार्लर पर भारी पड़ती है। (सोशल मीडिया से)
पुराने बक्से खुले नहीं, नई खऱीदी!!
प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी है। रायपुर के डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल प्रबंधन ने पिछले दिनों एक उच्चस्तरीय बैठक में 50 वेंटिलेटर उपलब्ध कराने मांग की। इस पर बैठक में मौजूद स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल चौंक गए। उन्हें एक समीक्षा बैठक में बताया गया था कि कोरोना काल में तकरीबन सभी जिलों में बड़ी संख्या में वेंटिलेटर की खरीदी हुई है। हाल यह है कि कई वेंटिलेटर के बक्से खुल नहीं पाए हैं। ऐसे में फिर खरीदी प्रस्ताव पर सवाल खड़े किए। इसके बाद उन्होंने निर्देश दिए कि सभी जिलों में वेंटिलेटर का सत्यापन किया जाएगा, और जहां उपलब्ध नहीं है, वहां अतिशेष वेंटिलेटर भेजे जाएंगे।

राजधानी रायपुर के इस मकान मालिक के बोर्ड को देखकर वन्यप्राणी विभाग के लोग पहुंच सकते हैं कार्रवाई करने के लिए!
मेघालय से आ रहीं प्रभारी

एआईसीसी ने छत्तीसगढ़ के प्रभारी सचिव चंदन यादव और सप्तगिरी उल्का की जगह मेघालय की श्रीमती जारिता लैटफलांग और एस.ए.सम्पत कुमार की नियुक्ति की है। सम्पत कुमार तेलंगाना के पूर्व विधायक हैं, और वो छत्तीसगढ़ की सीमा के नजदीक महबूब नगर के रहवासी हैं।
संकेत साफ है कि सम्पत कुमार का उपयोग बस्तर में कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने के लिए किया जाएगा। वैसे भी बीजापुर और सुकमा जिले में तेलुगुभाषी वोटर बड़ी संख्या में हैं। इससे परे जारिता लैटफलांग पहले शशि थरूर की प्रोफेशनल कांग्रेस की पदाधिकारी रह चुकी हैं। यहां प्रदेश के कई नेताओं से उनका परिचय है। उनकी साख अच्छी है। कहा जा रहा है कि दोनों ही नेता संगठन को मजबूत करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
जेल-कटघरे में रहते बिहार-प्रभारी
एआईसीसी ने कांग्रेस के सचिवों की सूची जारी की। प्रदेश से सिर्फ दो नेता राजेश तिवारी, और देवेन्द्र यादव को ही जगह मिल पाई। तिवारी उत्तरप्रदेश के प्रभारी सचिव हैं, और वे पद पर बने रहेंगे। देवेन्द्र यादव को बिहार कांग्रेस का प्रभारी सचिव बनाया गया है।
देवेन्द्र भिलाई के विधायक हैं लेकिन उनका परिवार उत्तरप्रदेश से तालुक रखता है। बिहार में यादव समाज के वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। चर्चा है कि यादव वोटरों को साधने के लिए देवेन्द्र यादव को बिहार का प्रभारी सचिव बनाया गया है। ये अलग बात है कि देवेन्द्र यादव बलौदाबाजार आगजनी प्रकरण के चलते जेल में हैं। इसके अलावा वो कोल स्कैम में भी फंसे हुए हैं। कोर्ट-कचहरी के बीच देवेन्द्र बिहार में कितना समय दे पाते हैं यह देखना है।
साइन बोर्ड ही अस्तित्व के लिए जूझ रहा

अरपा नदी के ही अस्तित्व पर नहीं बल्कि उसके उद्गम का भी नामोनिशान मिटाने पर लोग आमादा हैं। पेंड्रा के एक खेत के पास से यह नदी निकली है, जिसमें कुछ हिस्सा एक निजी जमीन का है। यहां एक बोर्ड लगा था, जिसे दूसरी बार किसी ने चुरा लिया। कांग्रेस भाजपा दोनों ने अपनी-अपनी सरकार रहने के दौरान अरपा को बचाने के बड़े-बड़े वादे किए लेकिन हकीकत यह है कि यह लगातार सूखती सिकुड़ती जा रही है। काफी हिस्सा रेत माफियाओं के हवाले है, जिन्होंने इतनी खाई खोदी है कि तैरने के लिए उतरे बच्चों की मौत भी हो जाती हैं। इसे टेम्स नदी की तरह बनाने का सपना दिखाया गया। 2400 करोड़ रुपये की भारी भरकम योजना लाई गई, जो भाजपा की सरकार जाते ही फाइलों में बंद हो गई। हाईकोर्ट में अरपा को बचाने, यहां के अवैध उत्खनन को रोकने के लिए कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। पर अफसर, अगली सुनवाई के कुछ दिन पहले कागज तैयार कर जवाब देने के लिए पहुंच जाते हैं। अभी जिस जगह से बोर्ड गायब है, उस जगह को अधिग्रहित करने की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है, जबकि प्रशासन ने हाईकोर्ट में ऐसा करने की शपथ दे रखी है। जल-जीवन और पर्यावरण से जुड़े इस मुद्दे पर संवेदनहीन अफसरशाही हावी है।
अबूझमाड़ की तरक्की का रास्ता

देखिये, इस सडक़ को। यह अबूझमाड़ के ब्लॉक मुख्यालय ओरछा को जिला मुख्यालय नारायणपुर से जोडऩे वाली प्रमुख सडक़ है। इसमें इतने गड्ढे हैं, शायद गिन भी नही पाएंगे। यहां से प्रतिदिन डेढ़ सौ से अधिक वाहन और सैकड़ों लोग गुजरते हैं,लेकिन इस सडक़ की दशा सुधारने की दिशा में अब तक कोई पहल नहीं हुई है। ( पत्रकार मनीष गुप्ता की सोशल मीडिया ‘एक्स’ पोस्ट)
कमिश्नर पद पर उठापटक
बिलासपुर कमिश्नर (संभागायुक्त) पद पर जनक प्रसाद पाठक की पोस्टिंग के दो-तीन घंटे बाद ही मंत्रालय से नया आदेश जारी कर उनकी जगह महादेव कावरे को पदस्थ कर दिया गया। वह तो ठीक, लेकिन सिर्फ तीन सप्ताह में नीलम नामदेव एक्का को क्यों हटा दिया गया?
इस बात की चर्चा तो हो ही रही है कि पाठक से क्यों जिम्मेदारी वापस ली गई। उनके खिलाफ एक महिला के यौन शोषण का अपराध दर्ज है। इस समय वे हाईकोर्ट से मिली जमानत के चलते जेल से बाहर हैं। केस होने के बाद से पाठक को कोई भी ऐसा फील्ड नहीं दिया गया जिसमें आम जनता से सीधे मेल-मुलाकात करनी पड़े। ऐसी यह पहली पोस्टिंग थी। शिकायत करने वाली महिला जांजगीर की है, जो बिलासपुर संभाग के ही अधीन आता है। फिर हाईकोर्ट भी बिलासपुर में ही है। पता चला है कि पाठक का आदेश जारी होने पर कुछ भाजपा नेताओं ने तत्काल ऊपर शिकायत कर दी और मंत्रालय ने भी आदेश बदलने में देरी नहीं की।
इधर तीन सप्ताह में ही एक्का को हटाने के पीछे की कहानी भी सामने आ रही है। बिलासपुर शहर के ह्रदयस्थल पर एक बेशकीमती जमीन है, जो मिशन अस्पताल कंपाउंड के नाम से जाना जाता है। सौ साल से ज्यादा पुरानी इसकी लीज 10 साल पहले खत्म हो चुकी है। अरबों में इस जमीन की कीमत है। अस्पताल ठीक से चल नहीं रहा लेकिन यहां की जमीन दूसरे लैब, अस्पताल, मेले, ठेले और स्ट्रीट फूड के लिए किराये में दे दिए गए हैं। लीजधारक डॉ. रमन जोगी को प्रशासन की नोटिस मिली। इसके खिलाफ वे हाईकोर्ट गए, वहां से जब राहत नहीं मिली तो तत्काल कलेक्टर ने खाली करने का अल्टीमेटम दिया। लीजधारक ने 4 दिन का समय मांगा। बड़े-बड़े उपकरण, सामान आदि हटाने के नाम पर। प्रशासन ने व्यवहारिक दिक्कत तो समझते हुए समय दे दिया। मगर मियाद खत्म होने से पहले ही कमिश्नर एक्का की कोर्ट से बेदखली पर दी गई कलेक्टर की नोटिस पर स्थगन मिल गया। इसके दो दिन बाद ही एक्का का ट्रांसफर हो गया।
राह तकते भाजपा समर्थक वकील
भाजपा से जुड़े वकील नाराज चल रहे हैं। इसकी वजह यह है कि साय सरकार को 8 महीने हो चुके हैं, लेकिन रायपुर छोडक़र बाकी जिलों में अब तक सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति नहीं हो पाई है। अभी भी भूपेश सरकार द्वारा नियुक्त सरकारी अधिवक्ता पद पर बने हुए हैं।
रायपुर में लोक अभियोजक और अन्य सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति दो दिन पहले ही की गई है। विधि विभाग का प्रभार डिप्टी सीएम अरुण साव के पास है। बताते हैं कि नियुक्तियों में पार्टी संगठन का हस्तक्षेप रहता है। यही वजह है कि अभी तक विचार मंथन का दौर चल ही रहा है। इस वजह से नियुक्तियां नहीं हो पा रही है। प्रदेश में सरकार बदलने के बाद भी अदालत में कांग्रेस समर्थक वकीलों के दबदबा देखकर भाजपा से जुड़े वकीलों की नाराजगी स्वाभाविक है।
टिकट के पहले मारपीट
राजधानी के कटोरा तालाब में भाजपा के दो युवा व्यापारी नेता आपस में भिड़ गए। जमकर मारपीट हुई, और मामला थाने पहुंच गया। पुलिस पर दोनों पक्षों की तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बना। पुलिस ने तो अपनी तरफ से प्रकरण दर्ज कर लिया है। लेकिन अब दोनों ही युवा नेता तो अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
बताते हैं कि दोनों युवा नेता पार्षद टिकट के दावेदार हैं। एक तो चुनाव लड़ चुके हैं, और दूसरे के पिता पार्षद रह चुके हैं। दो महीने बाद निकाय चुनाव की बिगुल बजनी है। मगर घटना के चलते नई समस्या खड़ी हो गई है। दोनों व्यापारी नेताओं के बीच मारपीट के कई वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुए हैं। पार्टी के प्रमुख नेताओं तक प्रकरण संज्ञान में आ चुका है।
एक प्रमुख नेता ने दोनों दावेदारों से जुड़े लोगों को स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि मारपीट की वजह से पार्टी की काफी बदनामी हो गई है। दोनों में से किसी को टिकट देना जोखिम भरा होगा। क्योंकि इसके इतने वीडियो सोशल मीडिया में तैर रहे हैं कि आसपास के तीन-चार वार्डों में इसका असर पड़ सकता है। यानी मारपीट के बाद फिलहाल दोनों ही युवा टिकट की दौड़ से बाहर हो गए हैं। अब आगे क्या होता है, यह तो चुनाव नजदीक आने के बाद ही पता चलेगा।
सरकारी फैसला ऐसे वापस !!
आखिरकार स्कूल शिक्षा विभाग के स्कूलों, और शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण का फैसला कुछ समय के लिए टल गया है। विभाग ने सभी जिलों से कम दर्ज संख्या वाले स्कूलों की जानकारी बुलाई थी। ऐसे में करीब 4 हजार स्कूल बंद करने की स्थिति में थे। यही नहीं, करीब 10 हजार शिक्षक इधर-उधर हो सकते थे।
युक्तियुक्तकरण का फैसला सरकार के लिए जोखिम भरा हो सकता था। क्योंकि शिक्षकों ने युक्तियुक्तकरण के खिलाफ हड़ताल की तैयारी कर रखी थी। यह विभाग सीएम के पास है। नगरीय निकाय चुनाव नजदीक है, और हड़ताल की वजह से नुकसान का अंदेशा था। इस वजह से फिलहाल युक्तियुक्तकरण का फैसला टाल दिया गया है।
दूसरी तरफ, सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने बतौर स्कूल शिक्षा मंत्री करीब 3 हजार शिक्षकों, और अन्य स्टॉफ के तबादले का प्रस्ताव लोकसभा चुनाव आचार संहिता लगने से पहले भेजा था। इनमें ज्यादातर तबादले विधायकों और पार्टी नेताओं की अनुशंसा के अलावा मेडिकल ग्राउंड पर प्रस्तावित था। ये प्रस्ताव युक्तियुक्त करण की वजह से अटक गए थे। अब जब युक्तियुक्तकरण नहीं हो रहा है, तो तबादला प्रस्ताव का क्या होगा, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
सीनियर टीचर की बाइक

बहुत सी नौकरियों में सीनियर हो जाने के बाद भी प्रमोशन नहीं मिलता। एक ही पद पर खटते रहना पड़ता है। शिक्षा विभाग में शायद ऐसा ज्यादा होता है। इस शिक्षक को अपनी बाइक पर लिखकर बताना पड़ रहा है कि वह कितना वरिष्ठ है।
(सोशल मीडिया से)
क्यों हुए फेरबदल?
भूपेश सरकार की तरह साय सरकार में भी आईएएस अफसरों के तेज रफ्तार से तबादले हो रहे हैं। बिलासपुर कमिश्नर नीलम नामदेव एक्का को 22 दिनों के भीतर बदल दिया गया। सचिव स्तर के अफसर एक्का की पोस्टिंग मंत्रालय में की गई है, लेकिन उन्हें कोई प्रभार नहीं दिया गया है। यही नहीं, एक्का की जगह उच्च शिक्षा आयुक्त जनक पाठक को बिलासपुर कमिश्नर बनाया गया था, लेकिन दो घंटे के भीतर उनका तबादला निरस्त कर दिया गया। पाठक यथावत उच्च शिक्षा आयुक्त के पद पर बने रहेंगे।
रायपुर कमिश्नर महादेव कांवरे को बिलासपुर कमिश्नर का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। नीलम एक्का से पहले रायपुर कमिश्नर संजय अलंग बिलासपुर कमिश्नर के अतिरिक्त प्रभार पर थे। चर्चा है कि पाठक बिलासपुर नहीं जाना चाहते थे। इसलिए उनका तबादला निरस्त किया गया। एक्का को क्यों हटाया गया, इसकी कोई ठोस वजह सामने नहीं आई है। प्रशासनिक फेरबदल का क्रम आगे भी जारी रहेगा।
अफसरों की कहानी अनंत?
आईएएस के 2020 बैच के अफसर आनंद मसीह दो दिन बाद रिटायर हो रहे हैं। मसीह के साथ-साथ बीजापुर कलेक्टर अनुराग पाण्डेय भी रिटायर होंगे। मसीह का मामला थोड़ा दिलचस्प है।
मसीह के खिलाफ फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी हासिल करने का आरोप है। वो 91 में डिप्टी कलेक्टर बने थे। इसके बाद उन पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र लेने का आरोप लगा। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद जाति प्रमाण पत्र से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए गठित छानबीन समिति ने दो बार आनंद मसीह की जांच की थी।
दोनों बार समिति ने उनकी जाति प्रमाण पत्र को फर्जी करार दिया था। इसके बाद मसीह को हाईकोर्ट से स्थगन मिल गया। छानबीन समिति की अनुशंसा पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई, और मसीह को आईएएस अवार्ड भी हो गया। वो पूरी नौकरी करने के बाद रिटायर भी हो रहे हैं। दूसरी तरफ, बीजापुर कलेक्टर अनुराग पाण्डेय का तबादला तो महीने भर पहले ही हो गया था। मगर उनका तबादला निरस्त करने के बजाए मौखिक रूप से पद पर बने रहने के लिए कह दिया गया।
अनुराग की जगह संबित मिश्रा को बीजापुर कलेक्टर बनाया गया था। उन्हें जॉइनिंग से मना किया गया। मिश्रा संभवत: 1 सितंबर को बीजापुर कलेक्टर का चार्ज लेंगे। अनुराग पाण्डेय 6 महीने में अपने कामकाज को लेकर काफी सुर्खियों में रहे। बीजापुर में रेल लाइन के लिए उन्होंने प्रेजेंटेशन दिया था, और फिर भाजपा सांसद की पहल के बाद केन्द्र सरकार रेलवे लाइन के लिए सर्वे भी करा रही है।
यही नहीं, नक्सल धमकियों की वजह से पिछले दो दशक से बंद स्कूल भी खुले हैं। बीजापुर के युवाओं के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम भी काफी चर्चा में रहा है। ये अलग बात है कि विवादित भाजपा नेता अजय सिंह ने उन्हें पद से हटवाने की धमकी दी थी। और फिर ऑर्डर भी हो गया था। इसको लेकर काफी प्रतिक्रिया हुई थी। बाद में अजय सिंह को पार्टी से निकाला गया, और फिर उन्हें अपराधिक प्रकरणों की वजह से गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
आखिर नियुक्ति हो गई
सरकार ने हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज इंदर सिंह उपवेजा को प्रमुख लोकायुक्त बनाया है। राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र पाण्डेय ने नई नियुक्ति नहीं होने पर सवाल खड़े किए थे, और विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सीएम विष्णुदेव साय से मिलकर ज्ञापन भी दिया था।
प्रमुख लोकायुक्त जस्टिस टीपी शर्मा का कार्यकाल साल भर पहले खत्म हो गया था। नई नियुक्ति नहीं होने पर जस्टिस टीपी शर्मा यथावत पद पर बने हुए थे। नए लोकायुक्त जस्टिस उपवेजा बसना के रहने वाले हैं। वे रमन सिंह सरकार में विधि सचिव भी रह चुके हैं। यही नहीं, भूपेश सरकार ने उन्हें हाईकोर्ट जज से रिटायर होने के बाद पुलिस प्राधिकार समिति का चेयरमैन नियुक्त किया था। समिति के चेयरमैन के रूप में कार्यकाल खत्म होने के बाद साय सरकार ने उन्हें नई जिम्मेदारी दी है।
अमेरिका की उड़ान में रुकावट
उप-मुख्यमंत्री अरुण साव जिनके पास लोक निर्माण विभाग का प्रभार भी है- उनका पहला विदेश प्रवास खटाई में पड़ गया है। यह मौजूदा भाजपा सरकार के किसी मंत्री का भी पहला विदेश प्रवास था। इस दौरे में उनको न्यूयार्क, कैलिफोर्निया, वर्जीनिया आदि शहरों की सडक़ परियोजनाओं का अध्ययन करना है। विभाग के सचिव कमलप्रीत सिंह डॉ. कमलप्रीत सिंह भी उनके साथ जाने वाले हैं। यह दौरा 20 से 30 अगस्त तक निर्धारित था, लेकिन वीजा मिलने में देर हो गई। शनिवार, रविवार और कृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी के बाद 27 अगस्त को वीजा जारी हो जाने की उम्मीद थी। डिप्टी सीएम और सचिव 26 को दिल्ली रवाना हो गए। मगर, वीजा किसी कारण से अब तक नहीं मिला। यह देरी वीजा का आवेदन करने में देरी के चलते हुई, प्रक्रिया या दस्तावेजों में कोई कमी रह गई है या तकनीकी कारण यह अभी साफ नहीं हुआ है। यदि एक या दो दिन में वीजा जारी भी हो गया तो पहले से निर्धारित शेड्यूल के अनुसार हो नहीं पाएगा। अब नए सिरे से दौरा कार्यक्रम बनाना होगा।
पुल के नीचे भी नदी, ऊपर भी

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें हालिया बारिश के दौरान नासिक के गोदावरी नदी पर स्थित पंचवटी फ्लाईओवर पर बहते, नीचे गिरते पानी का नजारा है। पुल का निर्माण एलएंडटी और फुटपाथ का निर्माण अशोका बिल्डकॉन द्वारा किया गया है। हम अक्सर टैक्स में वृद्धि की शिकायत करते हैं, लेकिन यह मांग नहीं करते कि सरकार हमारे पैसे का सही इस्तेमाल करे। सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को मनोरंजक लहजे में पेश किया जा रहा है, पर यह हाल में करोड़ों की लागत से हुए अनेक घटिया निर्माण कार्यों का एक और नमूना है।
रईसों से रियायत
यूं तो पुलिस की हर कार्रवाई पर उंगली और प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहते हैं। लेकिन कल राजधानी में रसूखदार जुआरियों पर हुई कार्रवाई पर सैकड़ों, हजारों उंगलियां उठ रही हैं। इतनी तो बीते 24 वर्ष में नहीं उठीं होंगी। इनमें से कुछ उंगलियां ऐसी हैं- बेबीलॉन में जुआरियों के जुटने की खबर पहले देर रात तक सक्रिय रहने वाले पत्रकारों को नहीं मिलती तो कुछ होता ही नहीं है। पुलिस, सैल्यूट मारकर ससम्मान छोड़ देती। मीडिया के लोग होटल नहीं पहुंचते तो एक अदद एफआईआर भी न होती।
रिपोर्टर बार बार टीआई, सीएसपी, एएसपी और अंतत: एसएसपी तक को कॉल न करते तो महज दो लाख रूपए की जब्ती भी नहीं होती। और आखिर में मंगलवार को दिनभर सोशल मीडिया में किरकिरी न होती तो देर शाम तक रसूखदार जुआरियों के नाम घोषित नहीं होते। यह भी चर्चा है कि एक एक जुआरी का नाम लिखने से पहले पुलिस ने सभी के पिता से अनुमति ली गई । इस बात पर सहमति बनी कि परंपरागत रूप से एफआईआर के बजाए बिना वल्दियत के नाम जारी किए जाएंगे। बात दांव पर लगी रकम को लेकर भी उठ रही है। कुछ कहते हैं कि मात्र 1.98 लाख ही मिले। पत्ते इसी के लिए फेटे जा रहे थे। तो चर्चा में कुछ 11 लाख, कुछ 20 लाख बता रहे। यह हो भी सकता है क्योंकि जीतने वाले को सारा पेमेंट तो पेटीएम,फोन-पे और योनो एप से भी किए गए थे। अब साइबर सेल का काम है पता लगा ले।
दारूबाज़ गुंडे को पकड़ा तो सजा पुलिस को !!

ऐसे में शराब और नशे से समाज को कैसे निजात मिलेगी। एक तरफ पुलिस पर शराब जब्ती और दूसरी तरफ हंगामा करते नशेडिय़ों पर कार्रवाई का दबाव है। कार्रवाई करने पर नौकरी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का डंडा भी चल रहा है। कल अंबिकापुर में यही सब हुआ। पुलिस हवलदार देव नारायण नेताम, पब्लिक कंप्लेंट पर बस स्टैंड में हंगामा कर रहे राजू राजवाड़े को पकड़ लाया। उस पर कार्रवाई के लिए देवनारायण और थाना स्टाफ ने सारी प्रक्रिया पूरी की। लेकिन राजू राजवाड़े था कि पकड़े जाने के बाद से ही हंगामा बरपे हुए था। इस पर भी थाना स्टाफ ने एहतियात बरता और मोबाइल पर वीडियो रिकॉर्ड कर लिया । पर उन्हें क्या मालूम कि मंत्री का जेठ होना ही भारी पड़ सकता है उनके कर्तव्य पर। हालांकि मंत्री ने कहा था कि जेठ ही नहीं कोई भी कार्रवाई होगी।
लेकिन आकाओं को खुश करने एसपी साहब ने जेठ तो नहीं देव नारायण को अटैच कर दिया । और अब यह मामला वायरल वीडियो की तरह पब्लिक डोमेन में चला गया है। अंबिकापुर से जानकार बताते हैं कि देव नारायण एक हवलदार ही नहीं एक जनसेवक भी है। सभी के बीच उसका सम्मान है। कोरोना काल में अपनी जान की परवाह किए बिना उसने कइयों की जान बचाई थी। पर अब नेकी कर दरिया में डाल की स्थिति हो गई है। जन सामान्य में अटैचमेंट को लेकर जबरदस्त आक्रोश है। वाट्सएप पर कप्तान साहब की किरकिरी करने लगे हैं। सरगुजा के हर वर्ग के सोशल मीडिया में लाइन अटैच पर तीखी प्रतिक्रिया वायरल होती रही। साहब को जवाब देते नहीं बन रहा। पहले कहा जा रहा है कि अटैच रहेगा लेकिन लाइन में नहीं उसी थाने में काम भी करेगा। सुबह पुलिस ने एक मैसेज कर लाइन अटैच की खबरों का खंडन किया है।
राजस्व में मददगार कोचिये
प्रदेश की संस्कारधानी राजनांदगांव से एक रोचक खबर है कि यहां पर पिछले कुछ महीनों से शराब की बिक्री घट गई है। एक तरफ सरकार का समाज कल्याण, महिला बाल विकास जैसे विभाग और पुलिस के कई अधिकारी अपनी व्यक्तिगत रूचि से शराब के विरुद्ध अभियान चलाते हैं, पर कम बिक्री से सरकार का ही आबकारी विभाग चिंता में पड़ जाता है।
आबकारी विभाग नजर रखता है कि दुकान में सेल्समैन जल्दी सर्विस दे रहा है या नहीं। अभी-अभी एक नीति बनाई गई है, जिससे शराब के पॉपुलर ब्रांड दुकानों में आसानी से मिले, ताकि राजस्व बढ़े और पड़ोसी राज्यों से हो रही तस्करी रुके। आबकारी विभाग को शराब की बिक्री का लक्ष्य भी मिलता है। खबरों के मुताबिक राजनांदगांव में इस वित्तीय वर्ष के दौरान केवल मई माह ऐसा रहा, जब निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप शराब बिकी। मगर कुल बिक्री अब तक के लक्ष्य से 22 प्रतिशत कम हुई है। अफसरों ने इसकी वजह तलाशी तो पता चला कि कोचियों पर हो रही पुलिस कार्रवाई इसका बड़ा कारण है।
अवैध शराब जब्त करने का अधिकार आबकारी और पुलिस, दोनों के पास है। पर, उनके बीच तालमेल कभी नहीं बैठता। कोचियों को दोनों से रिश्ते रखने पड़ते हैं। संतुलन बिगड़ा तो जब्ती, गिरफ्तारी कर नकेल कसी जाती है। जब शराब बिक्री ठेकेदारों के हाथ थी, तो कोचिये उनके सेल्समैन की तरह काम करते थे। ऊपर से नीचे सेटिंग बनाए रखने का सिरदर्द ठेकेदार झेल लेते थे। सन् 2018 में सरकार बनाने वाली कांग्रेस शराबबंदी का वादा निभाने में विफल रही। उस समय जिस पैमाने पर अवैध शराब बिकी का जाल बुना गया, उसमें शामिल अफसर-कारोबारियों को कोचिये कहना भी सही नहीं होगा। जब पूर्ववर्ती रमन सरकार ने ठेकेदारों के हाथ से शराब बिक्री का काम छीना तो कहा कि कोचिये अब इस पृथ्वी पर नजर नहीं आएंगे। मगर, कोचियों का अस्तित्व कितना जरूरी है, यह आबकारी अफसरों को हो रही चिंता से पता चलता है।
एक साथ 6 की जान जोखिम में

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की गंगालूर तहसील के कमकानार गांव में सोमवार की सुबह 10 बजे एक गर्भवती महिला प्रसव से तड़पने लगी। ग्रामीणों ने डायल 112 और एंबुलेंस को फोन किया। किसी स्वास्थ्य कर्मी को भेजने की मांग की। मगर बीच में चिंतावगु नदी के कारण कोई मदद नहीं मिल पाई। नदी के ऊपर कोई पुल नहीं, नाव की भी व्यवस्था नहीं। पांच ग्रामीण तैयार हुए, गर्भवती को खाट पर लिटाया और उसे दूसरी ओर पहुंचाया। बस्तर संभाग के दूरदराज के गांवों में इस तरह के दृश्य आये दिन दिखाई दे रहे हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं में खाली सेंटर्स
छत्तीसगढ़ की पिछली कांग्रेस सरकार ने बेरोजगारों को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से प्रतियोगी परीक्षाओं में आवेदन शुल्क समाप्त कर दिया था। इसका उद्देश्य यह था कि जो लोग नौकरी की तलाश में हैं, उन पर आर्थिक बोझ कम किया जाए। इसका परिणाम यह हुआ कि पीएससी, व्यापमं और अन्य भर्ती परीक्षाओं में आवेदनों की संख्या बढऩे लगी।
लेकिन, समस्या यह है कि जितने लोग आवेदन करते हैं, उनमें से एक अच्छा खासा हिस्सा ऐसे युवाओं का होता है, जो परीक्षा देने आते ही नहीं। हाल ही में, पिछले रविवार को व्यापमं ने प्रयोगशाला सहायक और तकनीकी सहायक के पदों के लिए परीक्षा आयोजित की। रायगढ़ से खबर आई कि 6,000 से अधिक लोगों ने प्रयोगशाला सहायक के लिए आवेदन किया था, लेकिन पहली पाली में 2,500 से अधिक लोग परीक्षा देने नहीं पहुंचे। शाम की पाली में तो 2,900 से अधिक उम्मीदवार अनुपस्थित रहे। बिलासपुर में 35 हजार प्रतिभागियों में से 20 हजार अनुपस्थित रहे। अन्य जिलों में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली।
परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी को आवेदनों की संख्या के अनुसार प्रश्नपत्रों की छपाई करानी पड़ती है। उसी के अनुसार परीक्षा केंद्रों और पर्यवेक्षकों की संख्या भी निर्धारित होती है। लेकिन जब परीक्षार्थी आवेदन करने के बाद परीक्षा में शामिल नहीं होते, तो यह पूरा खर्च व्यर्थ हो जाता है।
आवेदन करने के बाद परीक्षा से मुंह मोडऩे के पीछे क्या वजहें हो सकती हैं? एक कारण यह है कि जब शुल्क निशुल्क हो गया, तो ऐसे लोग भी आवेदन कर देते हैं जो परीक्षा की तैयारी में नहीं होते। लेकिन क्या केवल परीक्षा शुल्क में छूट देने से ही उनकी सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है? एक-एक पद के लिए हजारों उम्मीदवार होते हैं और उन्हें प्रतियोगिता में सफल होने के लिए अच्छी कोचिंग, लाइब्रेरी, नोटबुक्स और किताबों की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा, परीक्षा केंद्र भी अक्सर जिला मुख्यालयों में होते हैं, जहां तक पहुंचने और वहां ठहरने का खर्च भी मामूली नहीं होता।
अभी हाल ही में लखनऊ से खबर आई है कि वहां सिपाही भर्ती परीक्षा में 2 लाख लोगों ने आवेदन किया था, लेकिन लिखित परीक्षा में केवल 63 हजार ही पहुंचे। ये वे प्रतिभागी हैं, जिन्होंने परीक्षा फीस भी दी। छत्तीसगढ़ में परीक्षा शुल्क माफ कर देने से सरकार पर बोझ बढ़ गया लेकिन इस छूट के बाद भी परीक्षा नहीं दिला पाने वाले बेरोजगारों के सिर पर कितना बोझ है, इसे समझा जा सकता है।
बड़े-बड़ों के कॉल
दीवाली के मौके पर जुआ खेलने का चलन है, और अब जन्माष्टमी पर भी जुआ खेला जाने लगा है। रायपुर के संपन्न परिवार के युवकों ने तो त्योहार के मौके पर शहर के एक बड़े होटल बेबीलॉन केपिटल को जुआ खेलने के लिए बुक कराया था। युुवकों को उम्मीद नहीं थी कि पुलिस बड़े होटल में दबिश दे देगी। मगर पुलिस होटल में पहुंच गई, और जुआ खेलते युवकों को हिरासत में ले लिया।
फिर क्या था, युवकों को छुड़ाने के लिए बड़े नेताओं के फोन आने लगे। चूंकि रकम ज्यादा थी, और यह मीडिया की जानकारी में भी आ गया था। इसलिए पुलिस ने आरोपी युवकों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। बड़े लोगों के फोन आने से इतना फर्क जरूर पड़ा कि पुलिस ने एक ही नाम को सार्वजनिक किया है। बाकी नाम को छिपा लिया। यही नहीं, जुआरियों की फोटो भी जारी नहीं की। बड़े लोगों के लिए आम तौर पर पुलिस ऐसा करती है।
मुनिया के सुर्ख लाल हो जाने का रहस्य

मुनिया पक्षी का नर जब सुर्ख लाल रंग का हो जाता है, जो इसे अन्य पक्षियों से विशिष्ट बनाता है। मात्र 10 सेंटीमीटर की यह छोटी चिडिय़ा, छोटे झुंडों में रहती है और समूह में लहरदार रफ्तार से उड़ान भरती है। इनमें से ‘लाल मुनिया’ अपनी विशिष्टता और आकर्षक रंगों के कारण सबसे अलग दिखाई देती है।
लाल मुनिया का मुख्य आहार घास के बीज और खेतों में गिरे अनाज होते हैं। ये छोटे तिनके एकत्र कर अपने घोंसले का निर्माण करती हैं। अंडे देने के बाद, यह मुनिया अपने समूह से अलग होकर घोंसले में समय बिताती है।
लाल मुनिया का नर और मादा सामान्य समय में एक जैसे रंग के होते हैं, लेकिन रोमांस की उत्तेजना में नर का रंग गहरा सुर्ख लाल हो जाता है, जिसमें सफेद छीटें दिखाई देती हैं। इस रंग परिवर्तन के कारण यह और भी आकर्षक लगती है, जैसा कि पहले से तीसरे क्रम की फोटो में देखा जा सकता है। बिलासपुर से लगभग 23 किलोमीटर दूर मोहनभाठा में प्राण चड्ढा ने यह तस्वीर ली।
इलाके में मौत, विधायक दावत में
दिग्गज कांग्रेस नेता टीएस सिंहदेव को हराकर पहली बार विधायक बने राजेश अग्रवाल इन दिनों भाजपा के ही नेताओं के निशाने पर हैं। इसकी पर्याप्त वजह भी है।
दरअसल, अंबिकापुर के उदयपुर इलाके के आदिवासी बाहुल्य गांव चैनपुर में उल्टी-दस्त फैला हुआ है। यह इलाका राजेश अग्रवाल के विधानसभा क्षेत्र में ही आता है। उल्टी-दस्त से हफ्तेभर में चार ग्रामीणों की मौत हो चुकी है। बताते हैं कि राजेश अग्रवाल को भाजपा संगठन के पदाधिकारियों ने सलाह दी, कि तत्काल वो प्रभावित गांव में जाएं, और पीडि़त परिवार को ढांढस बंधाए। साथ ही वहां चिकित्सा व्यवस्था का जायजा भी लें।
कहा जा रहा है कि राजेश अग्रवाल ने स्थानीय नेताओं को यह कह दिया कि फिलहाल वो जरूरी काम से रायपुर जा रहे हैं, और लौटने के बाद वहां जाएंगे। इसके अगले दिन उनकी फेसबुक पर भाजपा विधायक भावना बोहरा को पंडरिया ने जन्मदिन की बधाई देते तस्वीर सामने आई। इस पर भाजपा नेता बिफर पड़े। सोशल मीडिया पर विधायक के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार भी कर रहे हैं।
अंबिकापुर के एक प्रमुख भाजपा नेता कैलाश मिश्रा ने फेसबुक पर लिखा कि एमएलए जी आपके क्षेत्र में उल्टी-दस्त से मौत हुई पर आप उस गांव में नहीं गए, और 4 सौ किमी दूर जन्मदिन मनाने चले गए। एक अन्य ने लिखा सरकार बदलने के बाद भी उसका कोई असर नहीं दिखा है। सब पुराने सिस्टम में चल रहा। किसी गांव में चार लोग साफ पानी नहीं मिलने से बीमार होकर मर जाएं, और जनप्रतिनिधि उस गांव में न जाए इससे ज्यादा क्या दुर्भाग्य होगा।
हालांकि स्थानीय सांसद चिंतामणि महाराज जरूर संवेदनशील निकले और वे तुरंत प्रभावित गांव में जाकर पीडि़त परिवारों से मिले, और लोगों को हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। मगर राजेश अग्रवाल से स्थानीय नेताओं की नाराजगी बरकरार है। जो देर सबेर उन्हें भारी पड़ सकती है।
कई परीक्षाओं में धांधली
पीएससी राज्यसेवा भर्ती परीक्षाओं से परे कई और परीक्षाओं में धांधली के सुबूत मिले हैं। इसी कड़ी में भूपेश सरकार में संस्कृति विभाग में द्वितीय श्रेणी के सात पदों में भर्ती में गड़बड़ी का खुलासा हुआ है। आरटीआई से मिली जानकारी में यह बात सामने आई है कि विभाग के अफसरों ने गलत तरीके से चयनित अभ्यार्थियों को अनुभव प्रमाण पत्र दिए हैं। मीडिया से चर्चा में संस्कृति संचालक ने माना, कि गड़बड़ी की शिकायतों की जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी गई है।
अंदर की खबर यह है कि पीएससी के जिम्मेदार लोगों के साथ मिलकर विभागीय अफसरों ने पूरी गड़बड़ी की है। कुछ अभ्यार्थियों ने पीएससी से आरटीआई के जरिए जानकारी मांगी, तो पीएससी ने किसी भी तरह की जानकारी देने से मना कर दिया। अब इसके खिलाफ एक अभ्यार्थी ने सूचना आयोग में अपील की है। कुछ लोगों का दावा है कि विभाग के शीर्ष लोग इस गड़बड़ी में संलिप्त हैं। इसकी वजह से प्रकरण की सीबीआई जांच से रोका जा रहा है।
यही नहीं, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से आगमन के दौरान कुछ अभ्यार्थियों ने ट्वीट कर इस फर्जीवाड़े से अवगत कराया है। खुद भाजपा प्रवक्ता उज्जवल दीपक कई बार ट्वीट कर सीबीआई जांच की मांग कर चुके हैं। मगर पिछली सरकार में हुए इस घोटाले की जांच से साय सरकार क्यों परहेज कर रही है, इसकी वजह भी देर सबेर सामने आ सकती है।
शिकायतें सुन लेंगे पर सुलझाएंगे कैसे

भाजपा ने कार्यकर्ताओं जन सामान्य की मांग, समस्याएं सुलझाने एक बार फिर प्रदेश कार्यालय में सहायता केंद्र खोला है। इसमें सरकार के मंत्री के साथ संगठन के किसी एक पदाधिकारी की ड्यूटी भी लगाई गई है। अब तक को महामंत्री ही बैठ रहे हैं। लेकिन शुरुआत से अब तक तीन महीनों में मंत्रियों की बैठक कभी होती है कभी टल जाती है।
वैसे अच्छी पहल है, इसका स्वागत भी होना चाहिए पर भाजपा के कुछ नेता रमन सरकार के समय हुई इस पहल को भी याद करते हैं। उस समय जब कार्यकर्ताओं की भीड़ ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए उमड़ी तो सहायता केंद्र में बैठे संयोजक असहाय हो गए। बाद में बंद करना पड़ा। इसके बाद के कार्यकाल में यह व्यवस्था बंद कर दी गई। कांग्रेस ने भी मंत्रियों के लिए ऐसी व्यवस्था लागू की थी पर सबको पता है कि कार्यकर्ता कितने खुश हुए।
वैसे एक पदाधिकारी की सलाह यह भी है कि सहायता केंद्र के साथ-साथ गाइडलाइन भी जारी कर देनी चाहिए कि किस तरह की समस्याओं, शिकायतों के लिए लोग वहां पहुंच सकते हैं, जिसमें हल होने की पूरी गारंटी होगी। जहां तक ट्रांसफर पोस्टिंग की मांग आवेदन पर मंत्री यह कहकर बच रहे हैं कि बैन खुलने पर कर देंगे। वे जानते सरकार ने बैन न खोलने का अघोषित निर्णय लिया है।
ओपीएस से किसे कितना नुकसान होगा?
केंद्र में अब से 21 साल पहले न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) लाया गया तब इसके पीछे तर्क दिया गया था कि शेयर बाजार में कर्मचारियों की राशि लगेगी तो उन्हें पुरानी पेंशन से भी अधिक रकम रिटायरमेंट पर मिलेगी। इस रकम का प्रबंधन सरकार खुद या उसके द्वारा नियुक्त फंड मैनेजर करते थे। इसका फायदा शेयर मार्केट और उद्योगपतियों को तो मिला लेकिन रिटायर्ड हो रहे कर्मचारियों को पता चल रहा है कि इसमें तो उन्हें बड़ा नुकसान हो गया। पेंशन की राशि बहुत कम बन रही थी। कुछ लोगों को तो 5-6 हजार रुपये ही पेंशन बन रहे थे। आने वाले साल एनपीएस में शामिल किए गए कर्मचारियों के रिटायर होने का होगा। सरकार ने जो रकम शेयर बाजार में लगा दी थी, उसका असर भी तेजी से दिखाई देगा। यह मौजूदा सरकार के प्रति कर्मचारियों में चाहे वे रिटायर बाद में होने वाले हों, असंतष को बढ़ाएगा। यूपीएस को इसी स्थिति को संभालने की कवायद बताई जा रही है।
केंद्र इस नई योजना यूपीएस का जोर-शोर से प्रचार कर रही है। रेलवे को भी इसके प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है। मीडिया को यह बताने की तैयारी में लगे एक अधिकारी का कहना था कि जितना शोर हो रहा है, लगता नहीं उतना फायदा हो रहा है। यह नई योजना एनपीएस से कुछ बेहतर जरूर हो सकती है, पर ओपीएस की जगह नहीं ले सकती। ओपीएस में आखिरी सैलरी के आधार पर 50 प्रतिशत पेंशन तय होती थी, ओपीएस में बेसिक सैलरी के आधार पर होगा, जो वास्तव में ग्रास सैलरी का लगभग 45 प्रतिशत ही होता है। इसका 50 प्रतिशत तो ग्रास सैलरी के 25 फीसदी से ज्यादा होगा नहीं। इसके अलावा 25 साल की सेवा भी अनिवार्य कर दी गई है। आयु सीमा में छूट मिलने के कारण कई वर्ग जैसे, महिलाएं, अनुसूचित जाति, जनजाति, रिटायर्ड फौजी, दिव्यांग आदि को नौकरी देर से मिली और यदि वह 25 साल पूरा होने के पहले ही रिटायर हो गया तो उनको इसका फायदा मिलेगा नहीं। फिर भी इसे केंद्र का बड़ा फैसला बताया जा रहा है, तो मानना पड़ रहा है।
देशव्यापी शिक्षक भर्ती संकट

छत्तीसगढ़ के स्कूलों में 33 हजार शिक्षकों के पद रिक्त हैं। जाहिर है कि इनमें से अधिकांश खाली पद ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। शहरों के स्कूलों और शिक्षकों को तो युक्तियुक्तकरण के दायरे में लिया जा रहा है, जिनें छात्रों की संख्या कम और शिक्षकों की ज्यादा हो गई है। सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर इन पदों पर भर्ती की राह देख रहे बेरोजगार युवकों ने अभियान चला रखा है। इनकी मांग आज दोपहर इंडिया के टॉप ट्रेंड टॉपिक में चल रही थी।
बिना डरे सवाल पूछिएगा
कल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सल मोर्चे पर सात राज्यों के साथ रणनीतिक बैठक के बाद पत्रकारों से चर्चा की। निजी रिजार्ट का कांफ्रेंस हाल खचाखच भरा था। कुछ पत्रकार दिल्ली से भी बुलाए गए थे।
चर्चा करीब डेढ़ देर से शुरू हुई। देर से पहुंचने के लिए शाह ने माफी यह कहकर मांगी कि देर से आया हूं लेकिन जाने की जल्दी नहीं है, एक-एक का जबाव दूंगा, बिना डरे प्रश्न पूछिएगा। पत्रकारों ने डरते हुए एक-एक कर प्रश्न पूछे।
उनकी पसंद के सवाल भी पूछे गए। पत्रकारों में कश्मीर चुनाव, गठबंधन, धारा 370 के संबंध में पूछे, तो वामपंथी उग्रवाद के प्रश्न भी रखे, जिस पर उनके पास कामयाबी के कई आँकड़े थे।।
बाउंसर हैं या झांकी
बीते सात-आठ महीनों में अफसरों ने अपने अपने विभागीय मंत्रियों की कार्यप्रणाली, लहजे को भांप लिया है। उसी अनुरूप उनके नामकरण (निक नेम) भी कर दिया है। और अफसर इन्हीं नाम से एक दूसरे को मेसेज या सूचना देकर अलर्ट करते हैं। एक मंत्री को पटवारी, एक को कांट्रैक्टर, एक को मेट आदि आदि। इनमें से एक को दो-दो निक नेम दिए हैं। कुछ अफसर इन्हें बाउंसर तो कुछ झांकी कहते हैं। झांकी वो अफसर कहते हैं जिन्हें ऐसा कर देंगे वैसा कर देंगे कहने की मंत्री जी जैसी आदत है। लेकिन करेंगे कुछ नहीं। बाउंसर वो अफसर कहते हैं जिनकी कद काठी मंत्री की ही तरह 5.5 फीट के नीचे है और फैलकर चलने की आदत है।
अब तक चर्चा ही चर्चा
चर्चा है कि भाजपा के नेताओं-कार्यकर्ताओं में नाराजगी को दूर करने के लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं। इनमें निगम-मंडलों में नियुक्ति भी शामिल है। इन सबके बीच प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन की डिप्टी सीएम अरुण साव से अकेले में बातचीत भी हुई है।
चर्चा का ब्यौरा तो नहीं मिल पाया है, लेकिन साव से सदस्यता अभियान से लेकर रायपुर दक्षिण उपचुनाव, और निगम-मंडलों में नियुक्ति पर बातचीत का हल्ला है। अरुण साव प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, और पार्टी पदाधिकारियों की क्षमता से भी वाकिफ हैं।
कुछ लोगों का अंदाजा है कि संगठन या सरकार में जो कुछ भी बदलाव होना है, वह पखवाड़े भर के भीतर हो जाएगा। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो फिर नए साल का इंतजार करना होगा। देखना है आगे क्या होता है।
खाट सहित मरीज की यात्रा

इस तरह का दृश्य छत्तीसगढ़ में भी दूरदराज के इलाकों में देखा जा सकता है। जब सडक़ कीचड़ से भरे हों और कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल इसी तरह पहुंचाना पड़ता है। यह तस्वीर मध्यप्रदेश के रीवा की है।
गैंगरेप में पुलिस साफ-सुथरी?
पुसौर इलाके में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना कोलकाता में हुए रेप मर्डर से कम सिहरन पैदा करने वाली नहीं है। पुलिस ने इस मामले में एक नाबालिग सहित 7 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया है, जबकि आरोपियों की संख्या 11 बताई गई। अब यह चर्चा हो रही है कि वास्तविक संख्या इससे भी ज्यादा थी। दूसरी बात यह निकलकर आई है कि सभी आरोपी वारदात के समय नशे में धुत थे। गांव में जगह-जगह अवैध शराब की बिक्री होने की बात भी बात सामने आ रही है। गांव के बाहर शराब की अवैध भ_ी भी है। गांव ओडिशा बॉर्डर से लगा हुआ है, जहां से शराब-गांजा की तस्करी भी होती है। ऐसा नहीं है कि आरोपियों ने नशा नहीं किया होता तो जुर्म नहीं करते, जब अवैध शराब की बिक्री, तस्करी और भ_ी पर पुलिस रोक नहीं लगाए और इसे ऊपरी कमाई का जरिया बना ले तो फिर इन जघन्य वारदातों की जिम्मेदारी से वह नहीं बच सकती।
फोटो दिखाकर, समझदारी सिखाना

सोशल मीडिया के एक सबसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म फेसबुक का हाल यह है कि उस पर समझदारी की कुछ बातें लिखने और उन्हें पढ़वाने के लिए उनके ठीक नीचे किसी सुंदर युवती की अर्धनग्न तस्वीरें लगा दी जाती हैं। अब अगर कोई लिखे कि कौन सी किताबें पढऩा चाहिए, और जिंदगी में क्या पढऩे का क्या फायदा होगा, तो उस पर शायद ही लोगों का ध्यान जाए। दूसरी तरफ जब नीचे ऐसी तस्वीर लगी रहती है, तो लोग तुरंत ही देखने लगते हैं कि शायद उसी तस्वीर के बारे में कुछ लिखा गया है, और फिर वहां पर लोग कारोबारी बातें भी लिख सकते हैं, और पढऩे-लिखने के फायदों जैसे गंभीर लेख भी लिख सकते हैं। इनमें से किसी बात का नीचे की तस्वीर से लेना-देना नहीं रहता है।
धर्मजीत बने दिलजीत
भाजपा विधायक धर्मजीत सिंह पिछले दिनों अंबिकापुर पहुंचे, तो उनका सरकार के किसी मंत्री की तरह स्वागत हुआ। स्वागत की वजह भी थी कि उन्होंने सरगुजा में रेल सुविधाओं के विस्तार के लिए विधानसभा के हाल के सत्र में अशासकीय संकल्प लाया, और यह सर्वसम्मति से पारित भी हुआ।
धर्मजीत सिंह ने अंबिकापुर-रेनुकूट रेल लाईन की मांग विधानसभा में जोरदार तरीके से रखी। रेल सुविधाओं में विस्तार के लिए सरगुजा के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बकायदा संघर्ष समिति बनाई हुई है। समिति के सदस्यों ने धर्मजीत सिंह के प्रयासों की न सिर्फ तारीफ की, बल्कि उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव अंबिकापुर सीट से लडऩे का अभी से न्योता भी दे दिया।
धर्मजीत सिंह ने मुस्कुराकर अंबिकापुर से चुनाव लडऩे से मना किया लेकिन उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे सरगुजा में रेल सुविधाओं के विस्तार की मांग जारी रखेंगे, और कहा कि वे केन्द्रीय मंत्री तोखन साहू के साथ दिल्ली में केन्द्रीय रेलमंत्री से भी मिलेंगे। इससे अंबिकापुर के लोग काफी खुश हुए। धर्मजीत ने अपनी सक्रियता दिखाकर लोरमी-तखतपुर और फिर अंबिकापुर तक अपनी जमीन तैयार कर ली है। जुझारू नेताओं का जनता के बीच सम्मान होता है। उनकी हमेशा पूछपरख रहती है।
वार्ड आरक्षण दक्षिण चुनाव बाद ?

नगरीय निकाय चुनाव की हलचल शुरू हो गई है। चुनाव लडऩे के इच्छुक नेताओं की नजर वार्डों के आरक्षण पर टिकी हुई है। भाजपा ने औपचारिक रूप महापौर, और नगर पालिकाओं-नगरपंचायतों के अध्यक्षों के डायरेक्ट इलेक्शन की बात कही है, लेकिन सरकारी स्तर इस दिशा में कोई कार्रवाई शुरू नहीं हुई है।
सरकार देर-सवेर चुनाव प्रक्रिया में संशोधन के लिए अध्यादेश ला सकती है। अंदर की खबर यह है कि वार्डों के आरक्षण के लिए लाटरी रायपुर दक्षिण के उपचुनाव के बाद में निकलेगी। भाजपा के रणनीतिकारों को संदेह है कि वार्डों का आरक्षण पहले हो जाने पर दावेदार निष्क्रिय हो सकते हैं, और इसका सीधा असर चुनाव पर पड़ सकता है। यही वजह है कि निकाय चुनाव की प्रक्रिया रायपुर दक्षिण उपचुनाव के बाद ही शुरू हो सकती है।
कमल/कौशल्या विहार के लोग कहाँ जाएँ?

आरडीए की कमल विहार के रहवासियों की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। जब यह योजना लांच हुई थी, तब इसे मध्य भारत की पहली सेटेलाईट टाउनशिप बताया गया था। उस स्तर का काम भी हुआ। अंडरग्राउंड बिजली, टेलीफोन, नल, और ड्रेनेज सिस्टम बनाया गया। सडक़ें भी बेहतरीन हैं, लेकिन इस योजना के चलते आरडीए तकरीबन दिवालिया होने की कगार पर आ गया। आरडीए को अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए जमीन बेचनी पड़ रही है।
रख-रखाव नहीं होने की वजह से पूरा सिस्टम चौपट हो गया है। घंटों बिजली गुल रहती है। गंदगी का अंबार लगा हुआ है। रोजाना चोरी की घटनाएं हो रही हैं। ये अलग बात है कि यहां हाईप्रोफाइल लोग रहते हैं लेकिन वो भी समस्याओं का निराकरण करा पाने में विफल दिख रहे हैं। पिछले दिनों यहां के रहवासियों ने पहले सीएम विष्णु देव साय और फिर आवास पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी से मिलकर समस्याएं बताई।
चूंकि चौधरी रायपुर कलेक्टर और निगम आयुक्त रह चुके हैं इसलिए उन्हें समस्याओं की जानकारी भी है। उन्होंने तुरंत अफसरों को निर्देश भी दिए, और यह भी कहा कि आरडीए के कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लाले पड़ गए हैं। चौधरी से मिलकर कमल विहार के लोग गदगद होकर लौटे। मगर हफ्ते भर बाद फिर वही समस्या सामने आ गई। अब लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इसके निराकरण के लिए कहां जाएं? ये लोग इतने ऊंचे हैं कि अपनी दिक्कतों को लेकर धरना-प्रदर्शन में भी शरमा रहे हैं। देखना है कि आगे क्या होता है।
हर रोज एक वेरायटी का चावल

छत्तीसगढ़ धान का कटोरा है। यहां धान के करीब 16000 हजार से अधिक जर्मप्लाज्म हैं। यानी इतने किस्म के चावल की वेरायटियां है। लेकिन इनमें से पैदावार कुछ ही वेरायटियों की होती है । इनकी संख्या को लेकर दावे प्रतिदावे हैं। कोई कहता है सौ, तो कोई 160 से अधिक। अब प्रश्न इस बात का है कि इतनी वेरायटियों का चावल खाते कितने हैं। क्योंकि चावल मतलब मधुमेह का कारक कहा गया है। डॉक्टर्स तो नो राइस कहते हैं । इसे देखते हुए विश्वविद्यालय ने शुगर लेस राइस भी तैयार कर उत्पादन शुरू कर दिया है । हमारे प्रदेश में एक मैडम अफसर हैं जो हर रोज एक वेरायटी का चांवल खाती हैं। घर के स्टाफ से मंत्रालय पहुंची चर्चा से मुताबिक मैडम साहब 30 वेरायटी का चावल खाती हैं। यानी हर रोज एक वेरायटी। अब इनके नाम, स्वाद और पोषक तत्वों के बारे में तो मैडम ही बता पाएंगी। लेकिन स्टाफ के लिए तो चटखारे का विषय बन गए हैं ये वेरायटी।
दोनों पार्टी दारू में डूबी हुई !!
आम आदमी पार्टी की रायपुर दक्षिण, और स्थानीय निकायों के चुनाव पर नजर है। दक्षिण में पार्टी की रणनीति राज्यसभा सदस्य संदीप पाठक तैयार कर रहे हैं। पार्टी प्रदेश में आम चुनाव में ज्यादा कुछ नहीं कर पाई, लेकिन उपचुनाव और निकाय-पंचायत चुनाव में ताकत दिखाकर आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार कर रही है।
सुनते हैं कि उपचुनाव में दिल्ली सरकार के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया भी प्रचार के लिए आ सकते हैं। सिसोदिया आबकारी घोटाले में फंसे हैं, और हाल ही में जेल से छूटे हैं। आप, केन्द्र सरकार पर विरोधी दल के नेताओं को फंसाने का आरोप लगा रही है।
दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ में भी आबकारी घोटाला हुआ है। यहां भी कांग्रेस के कई नेताओं के खिलाफ आबकारी केस में प्रकरण दर्ज है। कई अफसर-कारोबारी जेल में हैं। इन सबके बीच उपचुनाव में आम आदमी पार्टी, आबकारी घोटाला को भी जोर शोर से उठाने की तैयारी कर रही है। अब यह देखना है कि छत्तीसगढ़ के आबकारी घोटाले पर आप नेता किस पर प्रहार करते हैं।
कलेक्टर कौन..!
बस्तर संभाग के एक जिले के कलेक्टर के खिलाफ स्थानीय भाजपा नेता काफी शिकायतें कर रहे हैं। कलेक्टर ने अपना ज्यादातर काम एडिशनल कलेक्टर को दे रखा है, और एडिशनल कलेक्टर को लेकर शिकायत यह है कि वो बिना लेन देन के कोई काम नहीं करते हैं।
बताते हैं कि भाजपा नेताओं ने मंत्री जी से पहले शिकायत भी की थी। मगर कुछ नहीं हुआ। एडिशनल कलेक्टर के खिलाफ पुराने प्रकरणों की फेहरिस्त तैयार की है, और मंत्री जी के दौरे पर उन्हें सौंपने की तैयारी चल रही है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कलेक्टर जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं। ताकि उनके दामन पर दाग न लगे, और फ़ायदा भी हो जाए। अब निकायों-पंचायतों के चुनाव नजदीक है इसलिए मंत्री जी भी कार्यकर्ताओं को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा पा रहे हैं। देखना है कि शिकायतों का क्या तोड़ निकालते हैं।
अभयदान और परफार्मेंस
फिलहाल के लिए अभयदान मिलने के बाद मंत्रियों में काम करने की होड़ है। उत्साह भी है। जिन नए नवेले मंत्रियों पर खतरा था वे अब अपनी जगह भी सुरक्षित रखना चाहते हैं और संगठन के सामने अपना काम भी साबित करना चाहते हैं। इसलिए जिलों के दौरे, अपने विभागीय दफ्तरों में बिना बताए दबिश देने लगे हैं। इसी उत्साह में एक मंत्री जी ने पहले एक बड़े उद्योग समूह के स्थानीय प्रतिनिधि को बुलाया, फिर कह दिया कि अपने मालिक से बात कराओ। स्थानीय प्रतिनिधि की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह सीधे मालिक को फोन करता। उसने ऊपर संदेश पहुंचाया। उन्हें क्या पता कि वाट्स एप में यह संदेश फॉरवर्ड होकर दिल्ली तक पहुंच जाएगा। बस फिर क्या था। मंत्री जी को बता दिया गया कि इतने ऊपर नहीं जाना है। जो बात छनकर आई है, उसमें मंत्री के ओएसडी ने ही चाबी भरा था।
पुराने स्वनामधन्य ओएसडी
भाजपा की 15 साल की सरकार जब गई तब मंत्रियों के हार के कारणों में ओएसडी नामक शब्द काफी चर्चा में रहा। कुछ स्वनामधन्य किस्म के अफसर अभी फिर से ओएसडी बन गए हैं। कुछ छाती ताने सामने हैं तो कुछ पर्दे के पीछे बंगलों में तैनात है। और हिसाब-किताब का काम इन्हें ही दिया गया।
कभी शिक्षा विभाग सम्हाल चुके ये साहब अब पानी का घनमीटर नाप रहे हैं। इनकी नियुक्तियों के समय ही आपत्ति आई, लेकिन मंत्रियों ने जैसे जैसे संगठन को मैनेज कर लिया, लेकिन कई ओएसडी के भगवान बनने की चर्चा फिर शुरू हो गई है। ऐसे ही एक एक ओएसडी को तो मंत्री ने बाहर कर दिया है। बाकी मंत्री संभलकर रहें, नहीं तो पिछले परिणाम अच्छे नहीं रहे हैं।


