राजपथ - जनपथ
राजभवन और कुलपति
एक राजकीय विश्वविद्यालय के कुलपति से राजभवन परेशान हैं। वो इसलिए कि कुलपति,दक्षिण अफ्रीकी देश फिजी गये थे। जहां कोई हिंदी सम्मेलन आयोजित था। लौटे साल बीत गया लेकिन कुलपति, कुलाधिपति को यह नहीं बता रहे कि उनकी अनुमति लिए बिना विदेश यात्रा क्यों और कैसे कर आए। राजभवन से कई चि_ियां भेजी गई, जवाब देने । लेकिन बैरंग लौट रहीं या लेटर बॉक्स में पड़ी हुई है। अब अफसरों को कौन बताए कि कुलपति, उस विश्वविद्यालय से आते हैं जहां से राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री की नियुक्ति को हरी झंडी मिलती है। बताएं कि कुलपति ऐसे विपरीत समय नियुक्त हुए थे जब प्रदेश में कांग्रेस का शासन था। जब वे उस सरकार से पार पा गए तो अब सब अपना है। इसलिए वे कहां किस काम से जाते हैं नहीं बताएंगे। और फिर फिजी में हिंदी सम्मेलन था। हिंदू, हिंदी और हिंदुस्तान के लिए सारे नियम बनाए जाते हैं।
संबलपुर का छेनापुड़ा

छत्तीसगढ़ भाजपा के नेता और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में ओडि़शा और झारखंड में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। इनमें सांसद, विधायक भी शामिल हैं। कुछ तो पूरी सक्रियता से काम कर रहे तो कुछ लॉग बुक भरने गए हैं। ओडिशा गए ऐसे ही नेताओं की शिकायत थी कि उनके रूकने ठहरने की व्यवस्था ठीक नहीं है। उन्होंने भाई साहब से व्यवस्था को लेकर शिकायत की, तो उन्हें बुरी तरह फटकार सहनी पड़ी। भाई साहब ने उन्हें लौट आने का विकल्प भी बता दिया ।इनमें रायपुर जिले के एक बड़े नेता चालाक निकले। यद्यपि उनकी लॉजिंग-बोर्डिंग का इंतजाम संबलपुर के रिसार्ट में किया गया था लेकिन वो इससे संतुष्ट नहीं थे। दो दिन उन्होंने वहां खूब प्रचार किया, बैठकें की और फोटो-वीडियो जारी करवाया, फिर स्थानीय नेताओं से वहां का प्रसिद्ध पकवान छेना-पुड़ा पैक करवा कर रायपुर लौट आए। चर्चा है कि प्रदेश संगठन, नेताजी के बिना बताए लौट आने से खफा है।
एक, दूसरे का काम न करने की ठानी
प्रशासन के दो अधिकारियों में शीत संघर्ष की चर्चा नवा और पुराना रायपुर में भी है । दोनो ही सचिव स्तर के हैं। बस पास आउट बैच का अंतर है। इस नाते एक जूनियर एक सीनियर है। शीत संघर्ष भी सरकारी काम काज को लेकर शुरू होकर मनभेद तक जा पहुंचा । एक ने मातहतों से कह दिया कि उसका कोई काम नहीं करना है । दूसरे ने अपने मातहतों से कहा कि उनके यहां से कोई भी स्वीकृति का प्रस्ताव आए तो क्वेरी पे क्वेरी करते जाओ। यह संघर्ष शुरू हुआ था किसी प्रस्ताव में त्रुटि सुधार को लेकर। जूनियर, इसे लटकाए हुए थे। अपने स्तर का काम होने के बाद भी जूनियर ने महामहिम से अनुमति के नाम पर रोक रखा था। जैसे तैसे हुआ लेकिन उसके बाद यह अघोषित निर्देश जारी कर दिए गए ।
होर्डिंग के लिए कोई पॉलिसी ही नहीं...

मुंबई के घाटकोपर में होर्डिंग गिरने से हुई भीषण दुर्घटना के बाद छत्तीसगढ़ के शहरों में लगे भारी-भरकम खतरनाक होर्डिंग्स की तरफ नगरीय प्रशासन के अफसरों का ध्यान गया है। रायपुर, कोरबा, भिलाई, अंबिकापुर, बिलासपुर आदि में होर्डिंग्स की स्ट्रक्चरल जांच की जा रही है। हैरानी इस बात पर हो सकती है कि जान-माल की हानि से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय पर राज्य सरकार की कोई एकरूपता वाली पॉलिसी ही नहीं है। नगर निगमों को जब टेंडर निकालना होता है तो देश-प्रदेश के किसी भी नगर-निगम की पॉलिसी को उठाकर उसमें थोड़ा बहुत सुधार कर निकाल देते हैं। इसमें ज्यादा जोर इस बात पर होता है कि कब-कब फीस पटानी होगी, नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना कितना लगेगा। दुर्घटनाओं को लेकर सिर्फ इतनी बात कही गई है कि इसका पूरा हर्जाना होर्डिंग लगाने वाली एजेंसी को भरना होगा। रायपुर नगर निगम क्षेत्र में एक अनुमान के मुताबिक केवल घरों के छत और सडक़ किनारों पर 8 हजार से अधिक होर्डिंग्स हैं। इसके अलावा यूनिपोल जगह-जगह लगाए गए हैं। निगम को इनसे करीब 11 करोड़ रुपये की सालाना आमदनी भी है। देश के दूसरे शहरों में यूनिपोल और होर्डिंग्स सडक़ों से कम से कम दो मीटर की दूरी पर लगाये जाने का नियम है। अस्पताल, स्कूल और अन्य व्यस्त चौराहों के लिए नियम कुछ और कड़े हैं। रायपुर शहर की कुछ प्रमुख सडक़ों पर इसका उल्लंघन हो रहा है। कोरबा नगर निगम ने कुछ साल पहले निकाले गए टेंडर में अधिकतम 20 फीट चौड़ाई और 10 फीट ऊंचाई के होर्डिंग्स की अनुमति दी गई थी जिसका निचला हिस्सा जमीन से कम से कम 8 फीट ऊपर होना चाहिए। कुछ नगर निगमों ने टेंडर निकाले तो एकमुश्त 5 साल के लिए अनुमति दी गई है। इसके स्ट्रक्चर की जांच कब-कब की जाएगी, इसका उल्लेख निविदाओं में बिल्कुल नहीं है। सिर्फ यही है कि दुर्घटना के लिए एजेंसी जिम्मेदार होगी। इससे भी बड़ी चिंता इस बात पर है कि हजारों की संख्या में अवैध होर्डिंग्स लगे हैं। बहुत से नगरीय निकायों के कर्मचारियों की मिलीभगत से यह फल-फूल रहे हैं। जगह की कमी के चलते छोटे शहरों को भी होर्डिंग से पाटा जा रहा है। बस स्टैंड, साप्ताहिक बाजार में ये लगे हैं, इस ओर अभी ध्यान नहीं जा रहा है।
जब बाघ का शिकार बहादुरी थी

1976 के बाद से वन्य जीवों का शिकार करना आपराधिक कृत्य हो गया। इसके पहले बहादुरी होती थी। गैरकानूनी इसलिये करना पड़ा कि कई पेशेवर लोग इस काम को करने लगे और तस्करी एक फलता-फूलता धंधा बन गया। इससे जंगल की हिफाजत करने वाले खूंखार जानवरों की संख्या तेजी से घटने लगी। इस समय देश आयातित चीतों से उसकी वंशवृद्धि की कोशिश कर रहा है, क्योंकि भारतीय चीते पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं। प्रदेश का मुंगेली जिले का अचानकमार अभयारण्य किसी जमाने में आज से कई गुना अधिक घना जंगल होता था। यहां भयानक जंगली जानवरों की खासी संख्या थी। शिकारियों के लिए यह पसंदीदा जगह थी। पर इसी जंगल के बीच बसे गांवों में आदिवासियों और जंगल को आग से बचाने के लिए तैनात मैदानी बल पर ये हमला भी कर देते थे। अभयारण्य के बीच बसे बिंदावल गांव में 10 अप्रैल 1949 की एक घटना एक चबूतरे में दर्ज है, जिसे मैकू मठ के नाम से जाना जाता है। मैकू फायर वाचर था। वे उसके कुछ साथी जब यहां से गुजर रहे थे तो एक बाघिन ने उन पर हमला कर दिया। बाकी साथी तो बच निकले लेकिन बाघिन ने मैकू को दबोच लिया। मैकू ने बहादुरी दिखाई। बाघिन से छूटने की खूब कोशिश की लेकिन वह मारा गया। उस समय अफसरों और कर्मचारियों के बीच आत्मीय रिश्ते मजबूत हुआ करते थे। मैकू की मौत से दुखी और बौखलाए तत्कालीन रेंज अफसर एम डब्ल्यू के खोखर ने उसी जगह पर एक मचान बनाकर डेरा डाल लिया। तीन दिन बाद उन्होंने आदमखोर बाघिन को अपने निशाने पर ले लिया। बाघिन की वहीं मृत्यु हो गई। बाद में मैकू की बहादुरी को यादगार बनाये रखने के लिए एक चबूतरा तैयार किया गया। बिंदावल और उसके आसपास के गांवों में लोगों से मैकू के किस्से रोचक अंदाज में सुने जा सकते हैं। करीब 75 साल बाद आज भी यह चबूतरा मौजूद है। आम लोगों के लिए अचानकमार का रास्ता बंद है लेकिन जो सैलानी अनुमति लेकर जाते हैं, उनमें यह मठ जरूर रोमांच भर देता है। मठ की यह तस्वीर वाइल्ड लाइफ प्रेमी प्राण चड्ढा ने अपने सोशल मीडिया पेज पर शेयर की है।
अफसरों की तैनाती
चर्चा है कि सीएस अमिताभ जैन के छुट्टी से लौटने के बाद प्रशासन, और पुलिस में छोटा सा बदलाव हो सकता है। एसीएस रिचा शर्मा केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौट चुकी हैं, और उन्होंने मंत्रालय में जॉइनिंग भी दे दी है। उन्हें विभाग मिलना बाकी है। इसी तरह पुलिस में भी आईजी स्तर के अफसर ध्रुव गुप्ता भी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौट आए हैं।
गुप्ता आईपीएस के 2005 बैच के अफसर हैं। वो महासमुंद, और कोरिया एसपी रह चुके हैं। लिहाजा, यहां जल्द ही पोस्टिंग हो सकती है। इससे परे ध्रुव गुप्ता के ही बैच के अफसर आईजी बीएस ध्रुव भी रिटायर हो गए हैं। इन सबको देखते हुए जल्द ही पुलिस और प्रशासन में फेरबदल हो सकता है।
पीडब्ल्यूडी की मनोकामना
पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर और ठेकेदारों को 4 जून का बेसब्री से इंतजार है। क्यों न हो उनका हक मारे जाने से जो बचने जा रहा है । नई सरकार के पहले बजट में घोषणा हुई थी कि अब शिक्षा विभाग में अलग इंजीनियरिंग विंग बनाया जाएगा। जो स्कूल भवन बनाने का काम विभागीय तौर पर करेगा। इससे भवन जल्द बनेगें। स्कूल शिक्षा विभाग और पीडब्ल्यूडी के बीच प्रशासकीय, वित्तीय स्वीकृति, बजट हस्तांतरण में होने वाली देरी से भवन निर्माण में सालों के विलंब को टालने में मदद मिलेगी।
इसके बाद तो मानो पीडब्ल्यूडी में ईएनसी से लेकर जेई पर गाज गिर गई थी। और स्कूल शिक्षा विभाग के अफसर में खुशी की लहर थी कि अब छपाई खरीदी के अलावा एक नया मद मिलेगा। क्यों न हो, लोनिवि का आधा बजट तो स्कूल शिक्षा विभाग के कंस्ट्रक्शन फंड से ही आता है। वैसे भी अजजा विभाग पहले ही निर्माण कार्य पीडब्ल्यूडी से छीन चुका है। नगर निगम के स्कूलों का निर्माण संधारण नगरीय निकाय विभाग के ही इंजीनियर करते हैं।
अब ये भी चला जाएगा तो पीडब्लूडी में एवं रेट टेंडर, रिएस्टीमेशन के जरिए कमाई जाती रहेगी। मगर ऐसा नहीं हो पाएगा। यह हम नहीं पीडब्ल्यूडी के ही अफसर कह रहे हैं कि 4 जून को उनकी मनोकामना पूरी हो रही है। यही सोचकर तो वोट किया है। भैया जीत रहे हैं। वो दिल्ली चले जाएंगे तो सब कुछ जैसा चल रहा वैसा चलता रहेगा।
तुम्हीं ने दर्द दिया तुम्ही...
पुलिस की एक एजेंसी की कार्रवाई चर्चा का विषय बनी हुई है। क्योंकि राज्य की नई सरकार जिस मुद्दे पर चुनाव लड़ी और जीती। उसमें कार्रवाई का जिम्मा इस एजेंसी का है। और उसने कई प्रभावशाली लोगों पर कार्रवाई भी की है। लेकिन पिछली सरकार में कुछ प्रभावशाली लोग थे, जिनसे 80000 से ज्यादा पुलिस परिवार नाराज था। क्योंकि कहीं न कहीं उन परिवार के सदस्यों को पांच साल सफर करना पड़ा। इन प्रभावशाली लोगों का नाम एक मामले में भी है। इनके खिलाफ जांच भी चल रही है। लेकिन जांच का जिम्मा इनके चाहते वरिष्ठ को दिया गया है।
इस वरिष्ठ ने जांच में फंसे एक चर्चित अधिकारी के करीबी लोगों को ही अपने पास रखा है। पीएचक्यू में चर्चा है कि जांच में फंसा अधिकारी ही अपनी पसंद की टीम बनाकर कार्रवाई करा रहे है। ताकि जांच चलती रहे और उन तक आंच भी न आए। यानी तुम्ही ने दर्द दिया तुम्ही दवा देना। यही वजह है कि आज तक उन्हें जांच या पूछताछ के लिए तलब नहीं किया है। उनके ठिकानों की जांच करने की जहमत नहीं उठाई है,जबकि उनकी शह में ही पूरा सिस्टम चलता रहा।
पूर्व भाजपाई की नसीहत...
छत्तीसगढ़ राज्य वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडेय का कहना है कि भाजपा कार्यकर्ता पार्टी के लिए कोई भी कुर्बानी देने के लिए तैयार रहता है। उसे घुट्टी में पिलाया जाता है कि पहले देश, फिर पार्टी। आज यह सिद्धांत शीर्षासन कर गया है। एक व्यक्ति ही पार्टी और देश है। एको अहं, द्वितियो नास्ती। कार्यकर्ताओं की दशा बंधुआ मजूदर से अधिक नहीं रह गई है..। फिर पांडेय भाजपा कार्यकर्ताओं से अपील करते हैं कि आप सभी देशभक्त हैं। व्यक्ति का बलिदान कर देश को बचा लें। आखिरी मौका है। इस बार चूक गए तो न आप बचेंगे, न देश और न पार्टी।
उन्होंने भाजपा छोडऩे के बाद गोविंदाचार्य के साथ स्वाभिमान पार्टी भी बनाई थी। सन् 2003 की घटना की चर्चा आज भी होती है जिसमें उन्होंने कांग्रेस के चुनाव हारने के बाद तब के मुख्यमंत्री स्व.अजीत जोगी पर भाजपा की खरीद-फरोख्त का मामला उजागर किया था। वे जोगी को छत्तीसगढ़ में गंदी राजनीति के जनक और डॉ. रमन सिंह को इस राजनीति का पोषक मानते हैं।
पांडेय बेबाकी से अपनी बात रखने और फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं। पांडेय आज भाजपा से अलग हो चुके हैं, पर इसके संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। आज उन्हें लग रहा होगा कि पार्टी में जो चल रहा है वह ठीक नहीं है।
नक्सल मोर्चे पर शाह की तारीफ
भाजपा सरकार बनने के बाद साढ़े 4 महीनों में 112 नक्सली मारे गए। आत्मसमर्पण और गिरफ्तारियों की संख्या भी अच्छी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस सफलता पर छत्तीसगढ़ सरकार को बधाई दी है। शाह की तारीफ सरकार को अच्छी तो लगी ही है, साथ ही नक्सल क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बलों का भी हौसला बढ़ा होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा सरकार बनने के बाद नक्सलियों के खात्मे की कार्रवाई में तेजी आई है। मगर, यदि सुरक्षा बल इस तारीफ का मतलब यह न निकाल लें कि ज्यादा लोगों को मार गिराने को सफलता मानी जाएगी। वरना कई गलतियां हो सकती हैं। निर्दोषों की जान जा सकती है। ऐसा कई बार हुआ है कि भीड़ में बेकसूर ग्रामीण कौन है और कौन नक्सली यह पहचान करना मुश्किल हो जाता है। बस्तर के पीडिया में हुए मुठभेड़ को लेकर यही बात कही जा रही है। इसमें मारे गए लोगों को आम ग्रामीण बताए जा रहे हैं। तेंदूपत्ता तोडऩे निकले लोगों की मौत हो गई। कुछ के दुधमुंहे बच्चे हैं। इनके नाम पर आधार कार्ड और जमीन भी है। मुठभेड़ को फर्जी बताने और बेकसूरों की मौत को लेकर कांग्रेस और सीपीआई ने आवाज उठाई है। मगर, इससे पहले ही स्थानीय ग्रामीण इसका विरोध कर चुके हैं। यह देखा गया है कि कोई भी सरकार निर्दोष लोगों के मारे जाने के आरोप को मानती नहीं। उन्हें लगता है कि जांच बाहर आएगी तो जिम्मेदार जवानों को सजा देनी पड़ेगी, जिससे वहां तैनात दूसरे जवानों का मनोबल टूटेगा। क्या ही अच्छा होता कि शाह नक्सलियों को मार गिराने की तारीफ करने के साथ-साथ निर्दोंषों का ख्याल रखने की बात कह देते।
सैलजा के खिलाफ छत्तीसगढ़ से
भाजपा कुछ भूतपूर्व कांग्रेस नेताओं को हरियाणा चुनाव प्रचार के लिए भेज रही है। यहां की सिरसा सीट से छत्तीसगढ़ कांग्रेस की प्रभारी रहीं सुश्री सैलजा चुनाव मैदान में हैं।
सैलजा का मुकाबला भाजपा प्रत्याशी अशोक तंवर से है, जो कि खुद एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। सैलजा के साथ काम कर चुके छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कई नेता पार्टी छोडक़र भाजपा में शामिल हो गए हैं। इन नेताओं को सैलजा के खिलाफ प्रचार के लिए भेजा जा रहा है। इससे पहले हरियाणा के ही कई लोग कोरबा आकर भाजपा के लिए प्रचार कर चुके।
विधानसभा चुनाव में सैलजा के खिलाफ यहां के कई कांग्रेस नेता मुखर रहे हैं। कुछ ने तो टिकट को लेकर लेन-देन का आरोप भी लगा दिया था। पूर्व विधायक बृहस्पति सिंह ने भी सैलजा पर गंभीर आरोप लगाए थे इस वजह से उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। अब कोरबा और सिरसा में प्रचार से पार्टी को कितना फायदा होगा, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद पता चलेगा।
स्मार्ट सिटी और पीआर
सांसद सुनील सोनी ऐंवैं ही स्मार्ट सिटी में केंद्र से मिली राशि के डकारने का आरोप नहीं लगाते रहे। कई तो वे साबित भी कर चुके हैं तो कुछ में केंद्रीय नगरीय विकास मंत्रालय और संसद की स्थाई समिति ने भी रायपुर स्मार्ट सिटी कंपनी के अफसरों को तलब कर हिसाब किताब मांग चुकी है । इसके बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं है। कारण है कि इसमें नियुक्त कथित प्रोफेशनल। ये सरकारी तो है नहीं कांट्रेक्चुअल स्टाफ है। जब तक प्रोजेक्ट है तब तक पद, वेतन। इसलिए बंद होने से पहले वेतन भत्तों के अलावा जितना बटोरना है बटोर लो। तभी तो कुछ मल्टीनेशनल कंपनी और विदेशों की नौकरी छोड़ यहां काम कर रहे।
खेल मैदान का खेल
गॉस मेमोरियल मैदान को लेकर एक समाज और एक कांग्रेस नेता के बीच तकरार, विवाद चल रहा है। समाज का आरोप है कि नेता अपने एक समर्थक को पार्किंग स्टैंड खुलवाकर उसका ठेका चाहता था। न मिलने पर खिलाडिय़ों के नाम पर कुछ लोगों को जमा कर प्रदर्शन करवाया। उनमें खिलाड़ी कितने थे ये फोटो देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। इस भीड़ में एक मंत्री का पीए भी शामिल था। समाज का दावा है कि मैदान पर लगातार खेल गतिविधियों हो रही हैं। विवाद जारी है लेकिन प्रदर्शनी लगाने वाले ने नेता के खिलाफ एफिडेविट देकर खेल ही पलट दिया है।
अपने यहां तो निपट गया चुनाव
दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटों पर 25 मई को मतदान होगा। वहां प्रचार अभियान पूरी रफ्तार पकड़ चुका है। इस बीच छत्तीसगढ़ की तरह वहां भी मतदाताओं से नतीजों के बाद चुनावी गारंटी का लाभ दिलाने के नाम पर फॉर्म भरवाये जा रहे हैं। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने इसे गंभीरता से लिया है। ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों ही मोड में भरवाये जा रहे फार्म के जरिये मतदाताओं के नाम, उम्र और अन्य व्यक्तिगत जानकारी ली जा रही है। दिल्ली पुलिस आयुक्त को उन्होंने ऐसी गतिविधि पर सख्ती से रोक लगाने का निर्देश दिया है। इसके बाद पुलिस आयुक्त ने भी यही निर्देश अपने मातहतों के लिए जारी कर दिया है।
छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने महतारी वंदन योजना के फॉर्म भरवाये। कांग्रेस ने महालक्ष्मी योजना के फॉर्म लोकसभा चुनाव के दौरान भरवाये। दोनों ही मामलों में इक्का-दुक्का कार्रवाई हुई पर यह काम बेखौफ चलता रहा। विधानसभा चुनाव के नतीजों पर महतारी वंदन योजना का असर सबने माना है। महालक्ष्मी योजना से कांग्रेस भी लाभ पाने की उम्मीद कर रही है। यदि फॉर्म भरवाने की प्रक्रिया दिल्ली में गलत थी तो छत्तीसगढ़ में भी होनी चाहिए थी। इसका मतलब तो यही हुआ यहां निपटे दोनों चुनावों में मतदाताओं पर असर डालने के लिए अनुचित साधन का
इस्तेमाल हुआ।
बेरोजगारों को भत्ते का इंतजार
सन् 2018 में कांग्रेस ने जिन चुनावी वायदों को सबसे देर से लागू किया उनमें बेरोजगारी भत्ता शामिल था। अप्रैल 2023 में यह वादा पूरा किया गया। लाखों आवेदनों में करीब 1.35 लाख युवाओं को भत्ते का पात्र माना गया और किश्तों का भुगतान चुनाव आते तक किया गया। नई सरकार की यह घोषणा थी कि पिछली सरकार की योजनाओं की समीक्षा की जाएगी। जो योजनाएं ठीक लगेगी, वह जारी रखी जाएगी। सरकार ने जिन योजनाओं को बंद किया उनमें नरवा, गरुवा, घुरवा बाड़ी, सुराजी योजना, आदिवासी परब योजना, गोधन न्याय योजना, छत्तीसगढिय़ा ओलंपिक जैसी योजनाएं शामिल हैं। संभवत: बेरोजगारी भत्ता भी इनमें शामिल है, क्योंकि रोजगार कार्यालयों में अधिकारियों का कहना है कि भत्ता देने के लिए नया निर्देश नहीं आया है, पर साफ-साफ बंद करने का आदेश भी नहीं मिला है। भत्ते से लाखों बेरोजगार वंचित भी रह गए थे। कांग्रेस सरकार पर आरोप लगा था कि उसने शर्तें इतनी कड़ी कर दी थी कि बहुत कम बेरोजगार लाभ ले सके। जिन्हें भत्ता नहीं मिल रहा है उनको लग रहा है कि शायद भाजपा सरकार उनकी भी चिंता कर रही है। कोई बड़ी योजना आएगी, इसलिये भत्ते का भुगतान रोका गया है। वहीं जिन्हें पात्र माना गया था, उन्हें इसके पूरी तरह बंद हो जाने की चिंता सता रही है।
पिकनिक कहीं और मनाएं..

चारधाम में मंदिरों के पट खुलते ही पहले ही दिन भीड़ के कारण अव्यवस्था फैल गई। यमुनोत्री का मार्ग 6 घंटे जाम रहा। यह पहाड़ी रास्ता है जिसमें सिर्फ खच्चर और पैदल यात्री चलते हैं। बीते कुछ वर्षों से पर्वतीय क्षेत्रों के तीर्थ स्थलों में जिस तरह से भीड़ बढ़ रही है, उससे न केवल दुर्घटनाओं बल्कि पर्यावरण संतुलन की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में कुछ तीर्थ यात्री यह भी आह्वान कर रहे हैं कि- ध्यान रहे, केदारनाथ कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है।
टॉयलेट में खड़े होकर सफर
जनरल डिब्बों में लम्बा सफर करना हो तो जगह कैसे भी हो निकाल ही ली जाती है। सोशल मीडिया पर वायरल इस तस्वीर के बारे में बताया गया है कि टॉयलेट की खिडक़ी से झांक रहा यह यात्री वहीं खड़े होकर यात्रा पूरी कर रहा है। उसे गोरखपुर से बांद्रा 1400 किलोमीटर से भी अधिक दूरी तय करनी थी।
भूतपूर्व के प्रचार में भूतपूर्व

पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष धर्मजीत सिंह उत्तर प्रदेश की जौनपुर लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी कृपाशंकर सिंह के प्रचार में गए हैं। कृपाशंकर सिंह पहले कांग्रेस में थे, और वो मुंबई कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद पहले विधानसभा चुनाव पार्टी ने प्रत्याशी चयन के लिए पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था। तब से धर्मजीत सिंह की कृपाशंकर सिंह से दोस्ती है। उस समय धर्मजीत सिंह विधानसभा के उपाध्यक्ष थे।
यह भी संयोग है कि दोनों ही कांग्रेस छोडक़र भाजपा में शामिल हो चुके हैं। और अब जब पार्टी ने प्रदेश के नेताओं को दूसरे राज्यों में प्रचार के लिए भेजा, तो धर्मजीत सिंह ने कृपाशंकर सिंह के प्रचार में जाने की इच्छा जताई। पार्टी ने धर्मजीत सिंह को जौनपुर भेजा है। पांच बार के विधायक धर्मजीत सिंह, अपने दोस्त कृपाशंकर सिंह की कितनी मदद कर पाते हैं, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
भांजे-भतीजों से परेशान अफसर
राज्य के एक नए नवेले नेताजी सुर्खियों में है। सुर्खियां उनके काम की और रिश्तेदारों की भी है। रिश्तेदार नेताजी के बंगले में सक्रिय रहते हैं। छह माह में रिश्तेदारी कारोबार में बदलते जा रही है। कोई भी अफसर नेताजी से मिलने बंगले आते हैं तो पहले रिश्तेदार मिलते हैं। रिश्तेदार अब जिलों में पदस्थ अधिकारियों को फोन कर काम बता रहे है कि मामा ने कहा है कि गाड़ी लगानी है। यहां का ठेका हमें ही चाहिए। चाचा ने कहा है कि सामान की सप्लाई हमें करना है। लगातार रिश्तेदारों के फोन से पांच विभागों के अधिकारी भी परेशान हैं किस भांजे, भतीजे या भाई की सुनें। जबकि इनमें से किसी के लिए आज तक नेताजी ने कॉल नहीं किया है।
पड़ोस में ड्यूटी
प्रदेश भाजपा के महामंत्री (संगठन) पवन साय रोजाना वीडियो कॉन्फ्रेंस कर ओडिशा, झारखंड, और उत्तर प्रदेश में प्रचार के लिए गए पार्टी नेताओं से चर्चा कर रहे हैं। उन्हें मार्गदर्शन भी दे रहे हैं कि वहां किस तरह प्रचार किया जाए।
भाजपा ने जाति समीकरण को ध्यान में रखकर अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी नेताओं को प्रचार की जिम्मेदारी दी है। मसलन, शिवरतन शर्मा ओडिशा के संबलपुर इलाके में ब्राह्मण बाहुल्य इलाके में पार्टी प्रत्याशी धर्मेन्द्र प्रधान के लिए वोट मांग रहे हैं, तो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय को उन इलाकों में प्रचार के लिए भेजा गया है, जहां यूपी, और बिहार के लोग ज्यादा संख्या में रहते हैं। इससे परे स्कूल शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल व्यापारी संगठनों की बैठक कर भाजपा प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे हैं।
प्रदेश के नेताओं को साफ तौर पर हिदायत दी गई है कि वो स्थानीय नेताओं से मेहमान नवाजी की अपेक्षा न पाले, और ठहरने की व्यवस्था खुद ही करें। तकरीबन सभी भाजपा विधायकों की प्रचार में ड्यूटी लगाई गई है।
दुकान नहीं अहाता सही...
छत्तीसगढ़ में शराब के शौकीनों को दारू खरीदने के बाद पीने की सहूलियत अब मिलने जा रही है। प्रदेश की 537 शराब दुकानों में 457 अहाता खोलने के लिए टेंडर जारी किए गए थे। जिनकी अधिक बोली आई उनके नाम पर टेंडर जारी कर दिया गया है। शराब नीति में सन् 2017 से ही अहाता की सुविधा देने का प्रावधान था, पर कांग्रेस की सरकार बनने के बाद अहाता कागजों में हटा दिए थे। सत्ता पक्ष के करीबियों को इन्हें चलाने का अघोषित अधिकार दे दिया गया था। शराब से ठेकेदारी खत्म कर सरकारी बिक्री करने के बाद आबकारी विभाग के अफसर कर्मचारियों को जो नुकसान हुआ था, उसमें थोड़ी सी भरपाई इन दुकानों से होने लगी थी।
प्रदेश में सरकार बदलने के बाद सभी जिलों में जो काम मंत्रिपरिषद् के गठन से पहले शुरू हो गया था, उनमें से एक था, अवैध अहातों को गिराना। इसके साथ ही तय हो गया था कि भाजपा सरकार नए सिरे से अहाता आवंटन करेगी। हालांकि सरकार आवंटन में ऑफलाइन प्रक्रिया नहीं अपनाई। ऑनलाइन टेंडर में सरकार को उम्मीद से ज्यादा राजस्व मिला है। अब यह बात सामने आ रही है कि कई बड़े अहाता उन लोगों को मिल गए हैं जो पहले शराब का ठेका लेते थे। ये ठेके सीधे-सीधे खुद के नाम पर नहीं लिए गए हैं। नाम अनजान हैं, छत्तीसगढ़ से बाहर के भी हैं। पर परदे के पीछे शराब ठेकेदार ही हैं। पहले शराब दुकानों को हथियाने के लिए यही तरीका अपनाया जाता था। इसे रोकने के लिए तत्कालीन भाजपा सरकार ने एक नियम भी बनाया था कि बोली लगाने वाले की पूंजी निवेश की क्षमता और स्त्रोत की जांच की जाएगी। अहाता में यह नियम लागू नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो राशि जमा करने में सक्षम है, ठेका लेने का पात्र माना गया है।
सांप की जिंदगी बच गई...
सदियों से यह आम धारणा बनी हुई है कि सांप दूध पीते हैं और पिलाना पुण्य का काम है। पर दुनियाभर में अनेक शोध हो चुके हैं, जिनसे पता चलता है कि सांप के लिए दूध जहर होता है, पी लें तो दम घुटकर मौत हो जाएगी। उसके आमाशय या आंत में दूध को पचाने वाले रसायन ही नहीं बनते। बीते एक पखवाड़े से कोरिया जिले के चारपारा में भीड़ जुट रही थी। ग्रामीण यहां के एक तालाब में डेरा डाले नाग-नागिन के जोड़े के सामने दूध रख जाते थे और उनकी पूजा कर रहे थे। एक व्यक्ति में नाग देवता पर ज्यादा ही श्रद्धा उमड़ आई। उसने उसे गले में लटकाने की कोशिश की। सांप ने उसे डस लिया और उसकी मौत हो गई। मौत के बाद वन विभाग हरकत में आया और उसने नाग-नागिन को वहां से हटाकर सुरक्षित जगह पर ले जाने का प्रयास किया। मगर गांव के कुछ लोग अड़ गए। वे यहां मंदिर बनाना चाहते थे। वन अमला लौट गया। लौटने की जानकारी कलेक्टर को लगी तो उन्होंने वन विभाग के अफसरों को फटकार लगाई। वन विभाग की टीम दोबारा पहुंची। अब दोनों सांपों का रेस्क्यू कर लिया गया है और उन्हें जंगल में सुरक्षित छोड़ दिया गया है। सांप के साथ खिलवाड़ करने के नतीजे में एक व्यक्ति की मौत जरूर हो गई लेकिन लगातार भीड़ पहुंचने से सांपों पर भी खतरा मंडरा रहा था। अब तक अपने लिए वे जंगल में कोई सुरक्षित ठिकाना ढूंढ चुके होंगे। ([email protected])
कई के खिलाफ शिकायत
विधानसभा चुनाव में भाजपा के कई प्रमुख नेताओं के खिलाफ भीतरघात की शिकायत हुई थी। मगर सरकार बनने के बाद इन शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया गया। जिन नेताओं के खिलाफ शिकायतें हुई थी, उनमें से कुछ को तो पार्टी ने अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में प्रचार की जवाबदारी दी थी। अब लोकसभा चुनाव में भी कई के खिलाफ अपेक्षाकृत सक्रिय नहीं रहने की शिकायत आई है।
चर्चा है कि पार्टी संगठन को चुनाव नतीजों का इंतजार है। यदि संबंधित क्षेत्रों में नतीजे अनुकूल आए, तो कोई बात नहीं, लेकिन खिलाफ गए, तो फिर स्थानीय नेताओं की जिम्मेदारी तय होगी। फिलहाल पार्टी संगठन के दो प्रमुख नेता पवन साय झारखंड, और अजय जामवाल मध्यप्रदेश में संगठन का काम देख रहे हैं। कुल मिलाकर चुनाव नतीजों पर ही सब कुछ निर्भर करेगा।
गिरोहबाज अधिकारी फिर सक्रिय
कांग्रेस सरकार के अंतिम महीनों में सामने आए 2800 से अधिक स्कूल शिक्षकों के प्रमोशन पोस्टिंग घोटाले के मुख्य किरदार रहे कई जिला शिक्षाधिकारी नई सरकार में सम्मानित अधिकारी हो गए हैं। हाईकोर्ट ने भी इस पर इन अधिकारियों को दोषी ठहराया था। तब विपक्ष में रहे भाजपा के विधायक, नेता पानी पी पी कर पूर्व शिक्षा मंत्री,मुख्यमंत्री को कोसते रहे। तब के एक मंत्री को कुर्सी तक गंवानी पड़ी। और छह माह के लिए बने शिक्षा मंत्री चार जेडी, इतने ही डीईओ तक को निलंबित किया।
उनका कहना था कि ये लोग एक गिरोह की तरह शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को बदनाम करते रहे। उनके रुख को देखते हुए कई डीईओ, आरोपी मंत्री के ओएसडी तक फरार हो गए थे। सरकार जाने के बाद महीनों तक दफ्तर नहीं आए। उम्मीद थी कि नई सरकार और कड़ी कार्रवाई करेगी। नए शिक्षा मंत्री पूरी तरह सफाई करेंगे। मगर जो सोचा जाता है वो भला कभी सच नहीं होता, पूरा नहीं होता। इन अफसरों ने छोटे भाइयों को पकड़ा और पूरी नाराजगी को धुएं में उड़ाने में सफल हो गए। इसमें ग्रीन, ब्लू, पिंक सभी रंग में रंगे गांधीजी की भी भूमिका रही। और अब ये सभी विभाग के सम्मानित अधिकारी होकर नए सिरे से घोटाला करने सक्रिय हो गए हैं। इतना ही नहीं ये सभी प्रशासन अकादमी में बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए प्रशिक्षण और उपाय तलाश रहे हैं।
खाक हुई कारों से सबक
पिछले एक सप्ताह में छत्तीसगढ़ में कार में आग लगने की दो घटनाएं हुई हैं। कोरबा और रायगढ़ के बीच हुए हादसे में कार चालक गाड़ी के भीतर फंसा रह गया, जबकि बिलासपुर से कोरबा के रास्ते में हुई दुर्घटना में पति-पत्नी की जान समय रहते गाड़ी से बाहर निकल जाने के कारण बच गई। दोनों ही दुर्घटनाओं के बाद लोगों की जिज्ञासा थी कि क्या ये इलेक्ट्रिक वाहन थे? ऐसा नहीं था। ये पेट्रोल या डीजल से ही चलने वाली गाडिय़ां थी। छत्तीसगढ़ के अधिकांश हिस्सों में इस समय तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास चल रहा है। गाडिय़ों को नेशनल हाईवे की सपाट सडक़ों पर पूरी रफ्तार से दौड़ाया जा रहा है। भीतर चल रहे एसी के चलते अंदाजा नहीं लगता कि गाड़ी कितनी हीट हो चुकी है। दोनों ही दुर्घटनाओं में शार्ट सर्किट की आशंका जताई गई है। शार्ट सर्किट तब होता है जब भीतर फैले तार पिघलकर आपस में जुड़ जाते हैं। गाड़ी के गर्म होने के पीछे लगातार ड्राइव और कूलेंट की मात्रा पर ध्यान नहीं देना भी है। इन दो दुर्घटनाओं ने गर्मी के दिनों में हिफाजत और सावधानी के साथ चलने के लिए सतर्क कर दिया है।
प्रत्याशी को नए घर की तलाश
बिलासपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार देवेंद्र यादव के खिलाफ भाजपा ने बाहरी होने का आरोप लगाया। यही आरोप कांग्रेस ने कोरबा की प्रत्याशी सरोज पांडेय पर लगाया था। अब यह पता चल रहा है कि देवेंद्र यादव बिलासपुर में नए घर की तलाश कर रहे हैं। उन्होंने कुछ कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दे दी है कि एक ठीकठाक घर ढूंढ लें। इसके बाद से लोग पूछ रहे हैं कि क्या अपनी जीत को लेकर देवेंद्र यादव इतने अधिक आशान्वित हैं? उनके समर्थकों का कहना है कि ऐसी बात नहीं है। यदि सांसद बने तो उन्हें तो सरकारी आवास वैसे भी मिल जाएगा। वे तो यहां स्थायी निवास दोनों ही परिस्थितियों में बनाना चाहते हैं। वजह यह बताई जा रही है कि बिलासपुर लोकसभा में उनके समाज के लोग बहुत हैं। कांग्रेस में ठीक ठाक ओबीसी नेता नहीं जो भाजपा को टक्कर दे सके। यदि इस बार मौका नहीं मिला तो वे सन् 2029 की तैयारी शुरू कर देंगे। तब तक बाहरी उम्मीदवार का इल्जाम भी धुल जाएगा। इस चुनाव में जीत हार को लेकर कांग्रेसी अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कह पा रहे हैं, क्योंकि 2014 और 2019 के चुनावों में डेढ़ पौने दो लाख के अंतर से कांग्रेस की हार हुई थी। पर वे यह जरूर कहते हैं कि तीन सप्ताह का समय मिलने के बावजूद यादव ने चुनाव अच्छी तरह से लड़ा। इतने अच्छे से शायद कोई स्थानीय उम्मीदवार लड़ नहीं पाता।
बाल विवाह रोकने के लिए

अक्षय तृतीया के आसपास छत्तीसगढ़ में बाल विवाह के कई मामले सामने आते हैं। लगातार चलाये जाने वाले जागरूकता अभियान और नई पीढ़ी में खुद से समझदारी बढऩे के कारण ऐसे मामले कम जरूर हो रहे हैं, पर यह प्रथा पूरी तरह बंद नहीं हुई है। ऐसे में कोंडागांव जिले में लोगों के बीच बाल विवाह के विरुद्ध संदेश पहुंचाने के लिए अनूठा अभियान चलाया जा रहा है। स्टेशनरी दुकानों में कापी किताब से साथ दिए जाने वाले कैरी बैग में बाल विवाह नहीं करने की जागरूकता के संदेश छाप दिए गए हैं। कॉपी किताब के खरीदार या तो स्कूली बच्चे होते हैं या फिर उनके अभिभावक। इसलिये यह संदेश बैग के जरिये सीधे उन तक पहुंच रहा है। ([email protected])
शहरी मतदाता यहाँ देखो
छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर व कोरबा के शहरी मतदाता भले ही चुनाव को लेकर उदासीन रहे, और कम संख्या में वोट डालने गए। मगर हैदराबाद और आसपास के शहरों में नजारा ठीक इसके उलट दिखा है।
हैदराबाद, और आसपास के शहरों में सोमवार को चौथे चरण में मतदान हुआ। यहां मतदान के लिए 1 हफ्ते पहले से ही सैकड़ों की संख्या में अमेरिका, ब्रिटेन व अन्य देशों में कार्यरत युवा यहां आए हुए हैं।
मतदान के बाद ज्यादातर लोग आज-कल में अपने-अपने कार्यरत देशों में रवानगी की तैयारी कर रहे हैं। इसकी वजह से फ्लाइट की टिकट आसमान को छू रही है।
हैदराबाद से न्यूयार्क के लिए फ्लाइट की टिकट सात लाख तक पहुंच गई है। जबकि आम दिनों में फ्लाइट टिकट एक लाख के आसपास रहती है। फिर भी मतदान कर युवा काफी खुश नजर आए। छत्तीसगढ़ के शहरी लोगों को इससे सीख लेनी चाहिए।
कमल की जगह केला !!
छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं को अन्य राज्यों में प्रचार के लिए भेजा गया है। इन्हीं में से सरकार के मंत्री रामविचार नेताम को झारखंड के गिरिडीह लोकसभा का प्रभार दिया गया है।
नेताम के साथ यहां के कई और नेताओं की ड्यूटी लगाई गई है। गिरिडीह लोकसभा सीट से भाजपा नहीं बल्कि सहयोगी दल ऑल इंडिया झारखंड स्टूडेंट यूनियन के प्रत्याशी चंद्रप्रकाश चौधरी चुनाव लड़ रहे हैं।
चौधरी मौजूदा सांसद भी हैं। उनका चुनाव चिन्ह केला है। अब छत्तीसगढ़ के नेताओं को कमल से परे केला का प्रचार करना पड़ रहा है। पार्टी का आदेश है, इसलिए वो इसका पालन भी कर रहे हैं।
पंच बनना भारी पड़ा
सरगुजा संभाग के एक भाजपा विधायक ने एक कारोबारी झगड़ा निपटाने के चक्कर में आफत मोल ले ली। हुआ यूं कि विधायक ने पिछले दिनों अपने समाज के दो कारोबारियों के बीच सुलह सफाई के बीच घर पर बैठक रखी। विधायक और कारोबारी सभी वैश्य समाज से आते हैं।
विधायक ने समझाइश दी कि आपसी विवाद से माहौल खराब हो रहा है। लेकिन कारोबारी नहीं माने, और विवाद बढ़ गया। और विधायक की मौजूदगी में जमकर हाथापाई हुई। मामला पुलिस तक पहुंच गया था कि विधायक ने हस्तक्षेप कर मामले को रफा दफा कराया। हाल यह हुआ कि समाज के चौधरी बनने के चक्कर में विधायक महोदय के खुद के घर का माहौल खराब हो गया।
हाथी मूवमेंट के लिए पहला अंडरपास
एलिफेंट कॉरिडोर के प्रस्तावित कार्य छत्तीसगढ़ में बहुत धीमे चल रहे हैं पर उनके स्वच्छ विचरण के लिए एक कोशिश पहली बार की जा रही है। अंबिकापुर से झारखंड को जोडऩे के लिए नेशनल 343 का काम इन दिनों जारी है। यह सडक़ जिस क्षेत्र से गुजरनी है वह हाथियों के विचरण वाला है। वन मंत्रालय से इसलिए सडक़ की मंजूरी नहीं मिल रही थी और काम रुका हुआ था। अब इस सडक़ के कुछ हिस्सों को ऊपर उठाकर बनाने का निर्णय लिया गया है। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों में अभयारण्यों से गुजरने वाली नेशनल हाईवे पर यह कार्य किया गया है, पर छत्तीसगढ़ में यह जंगल से गुजरने वाली पहली अंडरपास सडक़ होगी। इससे हाथियों के हताहत होने की संख्या तो कम होने की संभावना तो है, लेकिन उन पर दूसरे खतरे मौजूद ही हैं। हाथी प्रभावित क्षेत्रों से गुजरने वाली बिजली लाइन को सुरक्षित ऊंचाई तक उठाने की योजना पर इसलिये काम रुका हुआ है कि इसका खर्च कौन उठाए- वन विभाग या बिजली विभाग। सरगुजा-रायगढ़ जिले में हाथी मानव संघर्ष इतना बढ़ चुका है कि हाथियों को मार डालने की घटनाएं सामने आ रही है। हाथियों के हमले से भी आदिवासी मारे जा रहे हैं।
मुठभेड़ पर फिर गंभीर सवाल...
बीजापुर जिले के पीडिया में मारे गए कथित नक्सलियों की पुलिस ने पहचान बताते हुए उन पर घोषित ईनाम की भी जानकारी दे दी है। उनसे हथियार बरामद होने की बात भी कही गई है। दूसरी तरफ मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों ने जिला मुख्यालय में पहुंचकर विरोध दर्ज कराया। उनका कहना है कि ये साधारण ग्रामीण हैं जो तेंदूपत्ता तोडऩे के लिए जंगल की ओर गए थे। एक फड़ मुंशी का तो सनसनीखेज दावा है कि पहले इन्हें जंगल की ओर भागने के लिए कहा गया, फिर गोली चला दी गई। बस्तर में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी और बेला भाटिया पहुंची हुई है। सोरी का बयान आया है कि पुलिस अफसरों ने दुधमुंहे बच्चों को लेकर पहुंची महिलाओं के लिए भोजन का इंतजाम करने से इसलिये मना कर दिया क्योंकि वे नक्सली हैं। पुलिस ने कहा कि ये नक्सली लोग हैं, इनके भोजन की व्यवस्था वे नहीं करेंगे। जो लोग मारे गए हैं, उनमें से अधिकांश ने गुरिल्ला की वर्दी पहनी नहीं है। वे स्थानीय ग्रामीणों के कपड़ों में थे। पुलिस के पास इसका भी जवाब है कि नक्सलियों ने अपनी वर्दी पुलिस से बचने के लिए उतार दिये थे और ग्रामीणों के कपड़े पहन लिए थे।
प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद 100 से अधिक नक्सली अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं। हाल में एक साथ 27 कथित माओवादियों को जान गंवानी पड़ी। सुरक्षा बलों की पीठ सरकार ने थपथपाई। इसके बाद 12 लोगों को एक साथ मार गिराया गया है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में कई ऐसे मुठभेड़ों पर सवाल उठे थे। पूरे बस्तर में जगह-जगह आंदोलन किये गए। हमलों की विश्वसनीयता पर एक बार फिर सवाल खड़ा हुआ है। सरकार बदली है पर सरकार के प्रति ग्रामीणों और ग्रामीणों के बीच सुरक्षा बलों की विश्वास की कमी दूर नहीं हो रही है।
अब दिखाई नहीं देते

इस पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे, जो इस मोटे कपड़े की थैली से परिचित होंगे, इसे छागल कहा जाता है ये नाम सुनकर कई लोग चौंक पड़ेंगे कि पानी कपड़े की थैली में !! ये उन दिनों की बात है जब न बाजार में बोतल बंद पानी मिलता था ना पानी का व्यापार होता था।
गर्मी में पानी पिलाना धर्म और खुद का पानी घर से लेकर निकलना अच्छा कर्म माना जाता था, गर्मी के दिनों मे उपयोग आने वाली ये छागल एक मोटे कपड़े (कैनवास) का थैला होता था,जिसका सिरा एक ओर बोतल के मुंह जैसा होता था, और वह एक लकड़ी के गुट्टे से बंद होता था।
छागल में पानी भरकर लोग, यात्रा पर जब जाते थे, कई लोग ट्रेन के बाहर खिडक़ी पर उसे टांग देते थे, बाहर की हवा उस कपड़े के थैले के छिद्र से अंदर जाकर पानी को ठंडा करती थी। उसकी प्राकृतिक ठंडक बेमिसाल थी ।
गर्मी में लोको पायलट, बस-ट्रक, जीप ड्राइवर और यात्रियों की खिडक़ी के बाहर छागल लटकी रहती थी। किसान बैलगाड़ी, हाथ मेला श्रमिक के खल्ले पर छागल लटकाए मंडी की तरफ जाते देखे गए। ये हमारे पूर्वज की पानी व्यवस्था थी।
अंडर करंट
पिछले सप्ताह हुए वोटिंग के बाद प्रत्याशी, समर्थक कार्यकर्ताओं, समाज प्रमुख, रणनीतिकार सब संभावित नतीजों को लेकर गणित बाजी में लगे हुए हैं। सभी बूथों से पोलिंग एजेंट की शीट आने के बाद सबके अपने अपने दावे हैं। दुर्ग के मामले में कुर्मी समाज और साहू समाज अपने अपने अंडर करंट बता रहे हैं। साहू समाज कह रहा है कि स्व.ताराचंद साहू, ताम्रध्वज साहू के इतर पहली बार किसी नए को अवसर मिला है तो समाज ने झारा-झारा इस्तेमाल किया है। ताराचंद 4 बार, ताम्रध्वज एक बार सांसद रहे। शायद इसी डर से ताम्रध्वज को बाहर जाना पड़ा। समाज ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विरोधी गुस्से को डायल्यूट कर दिया है । इसी गुस्से की वजह से ही दुर्ग की पाटन छोड़ सभी हारना पड़ा। उधर कुर्मी समाज पहले ब्राह्मण और फिर एक ही परिवार को समर्थन से निकलना चाहा है। यदि ऐसा है तो मोदी लहर में नतीजे एक पेटी का अंतर रहे तो कोई बड़ी बात नहीं। इसमें अंडर करंट का असर कितना हुआ यह देखने वाली बात होगी। ([email protected])
केजरीवाल की क्रोनोलॉजी
आप नेता अरविंद केजरीवाल अंतरिम बेल पर जेल से बाहर निकलते ही पीएम मोदी और भाजपा के खिलाफ आग उगलने लगे हैं। 1 जून को वापसी से पहले मन की पूरी कोफ्त निकाल कर जाएंगे। कल उन्होंने दावा किया कि अमित शाह को प्रधानमंत्री बनाने मोदी यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को रास्ते से बाहर करेंगे, कहा कि मोदी की यह चाल अगले पांच वर्ष की नहीं दो महीने को भीतर होगी। इसके पीछे अरविंद ने छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश का दृष्टांत भी जोड़ा। कहा कि पहले डॉ. रमन सिंह को निपटाया, फिर शिवराज चौहान को। एक-एक कर निपटा रहे हैं। अब अगली बारी योगी की। केजरीवाल की इन भविष्यवाणियों पर लोगों ने प्रश्न किया कि जेल में किसके साथ थे भाई?
केजरीवाल को सुनने के बाद लोगों ने पिछले एक वर्ष की क्रोनोलॉजी को जोड़ा। वह यह कि विधानसभा चुनाव रमन सिंह को आगे किए बिना लड़ा। सीएम की बात आई तो रमन सिंह प्रस्तावक बना दिए गए और अंत में बना दिए गए स्पीकर। राजनांदगांव लोकसभा के लिए प्रत्याशी की बारी आई तो परिवारवाद नहीं चलेगा कहकर बेटे की टिकट काट दी गई। मंत्रिमंडल में अपने करीबी को शामिल नहीं करा सके, आदि आदि।
शांतिपूर्वक चुनाव से प्रेक्षक हैरान
देश के बाकी राज्यों की तुलना में विशेषकर तमिलनाडु, और केरल में चुनाव बिना किसी विवाद के शांतिपूर्वक निपट जाते हैं। इन राज्यों में चुनाव प्रेक्षक बनकर गए अफसर वहां के चुनाव प्रचार के तौर तरीकों से काफी खुश भी नजर आए।
छत्तीसगढ़ कैडर के सचिव स्तर के दो अफसरों को तमिलनाडु और केरल की एक-एक लोकसभा सीट का प्रेक्षक बनाया गया था। दोनों वहां प्रेक्षक बनकर महीने भर रहे। चुनाव आयोग के निर्देशानुसार दोनों ने अपना मोबाइल नंबर मीडिया में जारी किया था, ताकि किसी तरह की शिकायत उन तक पहुंच सके। पूरा चुनाव निपट गया, किसी ने मौखिक और न ही लिखित में उनसे कोई शिकायत की। चुनाव प्रचार का तरीका भी अलग था। राजनीतिक दल के नेता नुक्कड़ या बड़ी सभा के पहले बैनर-पोस्टर, झंडा लगाते थे। सभा निपटते ही उसे निकालकर साथ ले जाते थे। कहीं से कोई चुनाव का माहौल नहीं दिखता था। लोगों की जागरूकता देखकर अफसर काफी प्रभावित रहे।
वन विभाग का डीएमएफ यानी कैम्पा
वन विभाग में एक कैम्पा फंड होता है। यह किसी बड़ी योजना के लिए काटे गए पेड़ों की भरपाई के लिए वहीं आसपास या अन्यत्र नए पेड़ लगाने खर्च की जाती है। इस केंद्रीय मद के गठन काल से दुरूपयोग के कई किस्से उजागर हुए हैं, विधानसभा के सत्रों में भी गूंजते रहे हैं। इस फंड को वन विभाग का डीएमएफ कहा जा सकता है। इससे कुछ भी किसी भी काम के लिए खर्च किया जा सकता है। फिर क्या, जंगल दफ्तर के साहबों ने एक महामंत्री को स्कार्पियो खरीद कर दे दी।
सो साहबों ने महामंत्री को दौरे करने में हो रही दिक्कत बताने पर खरीद लिया गया। पड़ोसी जिले के नेताजी के प्रभार में राजधानी जिला है। ऐसे में भला दौरे कहां करेंगे। बस घर से आने जाने के लिए। वैसे इन नेताजी की जमीनों पर भी अच्छी पकड़ है। वैसे इनका कद भी अचानक ही ऊंचाई की ओर बढ़ा है।
यह कोई नई बात नहीं
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जेल से निकलने के बाद अपने पहले भाषण में छत्तीसगढ़ के स्पीकर व पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की वसुंधरा राजे सिंधिया का नाम लिया। केजरीवाल ने कहा कि आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की राजनीति मोदी ने सबसे पहले खत्म की उसके बाद इन नेताओं का कर दिया। इन तीनों राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आये तो भाजपा ने मुख्यमंत्री के रूप में नए चेहरों को लाकर सबको चौंका दिया। राजस्थान में तो मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा पहली बार के ही विधायक हैं। पिछले दशक से भाजपा की जीत का सिलसिला चला तो डॉ. सिंह और चौहान अपने-अपने राज्यों में लगातार मुख्यमंत्री रहे। चौहान के खाते में तो मध्यप्रदेश में सबसे लंबे समय तक सीएम रहने का रिकॉर्ड भी है। एक धारणा जरूर बन गई थी कि इन सब का कद इतना ऊंचा है कि और कोई नाम सामने नहीं लाया जाएगा। पर भाजपा ने न केवल सीएम बदले बल्कि मंत्रिमंडल में भी भारी परिवर्तन किया। कुछ समय पहले हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर बदल दिए गए। कर्नाटक में जब येदियुरप्पा को हटाया गया तो सुर बगावत के थे, पर वे पार्टी में बने रहे। गुजरात में केशुभाई पटेल ने नई पार्टी बना ली थी। ऐसा ही मध्यप्रदेश में उमा भारती ने किया और यूपी में कल्याण सिंह ने। मदन लाल खुराना तो बाहर ही कर दिए गए थे। झारखंड में बाबूलाल मरांडी करीब 14 साल तक पार्टी से बाहर रहे, तीन साल पहले वापस आए। कई दूसरे राज्यों में भी ऐसे उदाहरण हैं जब स्थापित समझे जाने वाले नेताओं को भाजपा ने एक झटके में बदल दिया। असम में सर्बानंद सोनोवाल-हेमंत बिस्वा, त्रिपुरा में बिप्लब देव-माणिक साहा आदि। सार यह है कि मोदी-शाह की जोड़ी का पार्टी में वर्चस्व नहीं था तब भी ऐसे फैसले लिये जाते थे। खुद मोदी को गुजरात का सीएम सन् 2001 में केशुभाई पटेल को हटाने के बाद बनाया गया था। मोदी के पहले और और उनके कुर्सी छोडऩे के बाद गुजरात में बार-बार सीएम बदले गए। केजरीवाल की मानें तो मोदी खुद ही एक साल बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी अमित शाह को सौंपने वाले हैं। योगी आदित्यनाथ भी चुनाव के दो माह बाद हटाए जाने वाले हैं। कुछ लोगों को लगता है कि लोकसभा चुनाव परिणाम के साथ न केवल योगी बल्कि तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के टिके रहने पर भी फैसला आ जाएगा।
साइबर ठगी में नादानी या लालच?
बढ़ती साइबर ठगी लोगों की एक बड़ी चिंता बनती जा रही है। कबीरधाम जिले के सहसपुर-लोहारा में व्हाट्सएप मैसेज और वीडियो लाइक करने के नाम पर एक युवक 7 लाख रुपये से अधिक रकम गंवा बैठा। इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ में पहले भी ठगी हो चुकी है। इसके बावजूद लालच और जानकारी के अभाव में नए-नए लोग शिकार बन रहे हैं। कुछ दिन पहले दिल्ली से सटे गुरुग्राम से पुलिस ने 11 ठगों को पकड़ा था, जिन पर आरोप है कि उन्होंने देशभर में इसी तरीके से लोगों को 15 करोड़ रुपये का चूना लगाया। वे वाट्सएप के अलावा ये इंस्टाग्राम और टेलीग्राम चैनल का भी इस्तेमाल कर रहे थे। लाइक, शेयर, फॉरवर्ड के अलावा शेयर ट्रेडिंग और क्रिप्टो करेंसी में भारी मुनाफे का लालच भी दिया जाता है। वाट्सएप ने हाल ही में बताया था कि साल जनवरी से मार्च तक ही भारत में 2 करोड़ 23 लाख संदिग्ध खातों को बैन कर चुकी है, जो पिछले साल से दोगुना है। मगर नए-नए नंबरों से ठगी शुरू हो जाती है। धोखाधड़ी की शुरूआत में छोटी रकम लगाने के लिए कहा जाता है और कुछ रुपये लौटाए भी जाते हैं। ठगी की रकम विश्वास जीत लेने के बाद लाखों रुपयों में पहुंच जाती है, जैसा कबीरधाम के मामले में हुआ है। हैरानी यह है कि कम-पढ़े लिखे लोग ही नहीं- बैंक और पुलिस में काम करने वाले भी झांसे में आ रहे हैं। स्मार्ट फोन और इंटरनेट अब हर किसी के हाथ में है, पर सतर्क नहीं रहने पर चूना लगना तय है। सोशल मीडिया पर पुलिस और दूसरे जागरूक लोग लगातार आगाह करते हैं कि अनजान लिंक पर न जाएं, कोई बड़ी कमाई का ऑफर दे रहा है तो भरोसा न करें। पर, लोगों को यह नसीहत पसंद नहीं आती।
तप से कम नहीं ट्रेन का इंतजार
गर्मी के दिनों में रेल यात्रियों को दी जा रही सुविधाओं की कई अच्छी तस्वीरें आ रही हैं। रेलवे ने कहीं-कहीं मिस्टिंग मशीन से छिडक़ाव की व्यवस्था की है। कहीं पर सामाजिक संस्थाओं की मदद से शीतल जल दिया जा रहा है। पर, यह एकतरफा तस्वीर है। मगर ऐसे भी स्टेशन हैं जहां न वहां शेड है, न पेयजल। ट्रेनों के विलंब से चलने से सफर कर रहे यात्री परेशान हो रहे हैं तो ऐसी ट्रेनों का इंतजार करते हुए 40 प्लस डिग्री सेल्सियस तापमान में यात्री झुलस रहे हैं। यह यूपी के प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन की तस्वीर है, यह यूपी के प्रतापगढ़ जंक्शन के एक प्लेटफार्म की तस्वीर है। ([email protected])
मोदी के लिए आरएसएस एक्टिव
लोकसभा चुनावों के बीच छत्तीसगढ़ में आरएसएस कार्यकर्ताओं में यह चर्चा है कि वे भाजपा के लिए नहीं, बल्कि मोदी के लिए एक्टिव हैं। दरअसल, राज्य में भाजपा की सत्ता में वापसी के बाद यह संदेश गया कि भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ आरएसएस ने भी बड़ी मेहनत की। इसके बाद सरकार के निर्णयों और नियुक्तियों में आरएसएस के दखल की बात होने लगी। इसके विपरीत आरएसएस के लोगों का कहना था कि उनकी सिफारिशें सुनी ही नहीं गई। कई कार्यकर्ता, अफसर आरएसएस की सिफारिशें लिए घूमते रहे, लेकिन उन्हें न ओएसडी का पद मिला, न ही ? मनचाही पोस्टिंग मिली। संभव है कि चुनाव के बाद आरएसएस इस मसले पर आंखें तरेरे।
बृजमोहन की डिमांड ओडिशा में
केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान राज्य की सीमा से सटे ओडिशा के संबलपुर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। वो प्रदेश भाजपा के सबसे ज्यादा समय तक प्रभारी रहे हैं। लिहाजा, यहां के छोटे-बड़े नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध हैं। प्रधान के चुनाव में यहां के नेताओं की भी दिलचस्पी है।
सुनते हैं कि प्रधान ने स्कूल शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को फोनकर प्रचार के लिए बुलाया है। बृजमोहन चुनाव प्रबंधन में माहिर माने जाते हैं। उनके साथ सीनियर नेताओं की एक टीम दो-तीन दिनों में संबलपुर पहुंचेगी। और प्रधान के चुनाव प्रचार का मोर्चा संभालेगी।
खास बात यह है कि संबलपुर इलाके में छत्तीसगढ़ी लोगों की संख्या अच्छी खासी है। ऐसे में कहा जा रहा है कि यहां के नेताओं के प्रचार से प्रधान को काफी फायदा होगा। अब छत्तीसगढ़ के नेताओं से प्रधान को कितनी मदद मिलती है यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद पता चलेगा।
एक अनार, सौ बीमार
चर्चा है कि लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल मंत्री पद छोड़ देंगे। राजनीतिक हल्कों में उनका चुनाव जीतना तय माना जा रहा है। खासबात यह है कि बृजमोहन की जगह लेने के लिए पार्टी के कई नेता अभी से जोड़-तोड़ में लग गए हैं।
बताते हैं कि कुछ नेताओं की तो बृजमोहन अग्रवाल से चर्चा भी हुई है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, और धरमजीत सिंह भी बृजमोहन से मिलने उनके घर गए और चुनाव को लेकर चर्चा हुई। धरमलाल कौशिक का नाम मंत्री पद के लिए प्रमुखता से लिया जा रहा था। लेकिन अंतिम समय में वो रह गए।
इसी तरह धरमजीत सिंह का नाम भी चर्चा में है। उनका नाम विधानसभा उपाध्यक्ष पद के लिए लिया जा रहा है। इससे परे पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने पहले और दूसरे चरण का चुनाव निपटने के बाद रायपुर लोकसभा में प्रचार की कमान सम्हाली थी।
चंद्राकर भी सीनियर हैं और खुद पीएम नरेन्द्र मोदी ने बस्तर की सभा में उन्हें काफी तवज्जो दिया था। ऐसे मेें उनकी स्वाभाविक दावेदारी है। दौड़ में पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल और राजेश मूणत, लता उसेंडी व विक्रम उसेंडी भी पीछे नहीं है। देखना है कि साय कैबिनेट के दो खाली पद पर किसको मौका मिलता है।
लेकिन मंत्री पद के साथ-साथ बृजमोहन अग्रवाल विधायक पद भी ख़ाली कर सकते हैं, अगर वे सांसद बन जाते हैं। इसलिए उनके आसपास वे लोग भी टिकट मिलते ही मंडराने लगे हैं जो रायपुर दक्षिण से चुनाव लडऩा चाहते हैं। बृजमोहन के छोड़े जाने वाले शून्य पर दर्जन-दर्जन भर लोगों की नजऱ है।
अगले साल से पीएमश्री टॉपर?
छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की 10वीं-12वीं बोर्ड परीक्षाओं में पिछली बार की तरह इस बार भी स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों के विद्यार्थियों ने खासी सफलता हासिल की। प्रथम श्रेणी में आने वाले विद्यार्थियों का औसत भी इन स्कूलों में बाकी के मुकाबले अच्छा रहा। शिक्षकों और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी इनमें भी रही, लेकिन दूसरे सरकारी स्कूलों के मुकाबले पढऩे का माहौल छात्र-छात्राओं को बेहतर मिला, जो नतीजों से साफ है। महंगी फीस वाले निजी स्कूलों से अच्छे नंबर लाने वाले छात्रों की संख्या बहुत कम रही।
दूसरी ओर पीएम श्री (पीएम- स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) सन् 2022 में घोषित केंद्र सरकार की योजना है। प्रदेश में अब तक 200 पीएम श्री स्कूल खुल चुके हैं। सन् 2024-25 में 400 और खोलने की तैयारी है। खबर यह है कि सरकार ने 311 पीएम श्री स्कूलों का प्रस्ताव केंद्र को भेजा है और इन स्कूलों को स्वामी आत्मानंद स्कूलों की जगह पर ही खोला जाएगा। कांग्रेस ने इसका विरोध किया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जिनकी यह प्राथमिकता वाली योजना थी, ने कहा है कि स्वामी आत्मानंद स्कूलों का नाम बदलना साधु-संतो का अपमान होगा। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने भी विरोध दिया है। एक पैरेंट्स एसोसियेशन की ओर से भी आपत्ति दर्ज कराई गई है।
स्वामी आत्मानंद स्कूलों के लिए शिक्षा विभाग ने पहले अलग से बजट नहीं रखा था। डीएमएफ फंड से इंफ्रास्ट्रक्चर और अस्थायी शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है। इनके टीचिंग और नॉन टीचिंग स्टाफ को सरकारी कर्मचारियों की तरह सुविधा नहीं है। दूसरी ओर पीएम श्री योजना का पूरा फंड फिलहाल केंद्र से मिल रहा है। सन् 2027 तक केंद्र सरकार इसका खर्च उठाएगी, उसके बाद राज्यों को जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी।
इस तरह से पीएमश्री स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों का भविष्य अधिक सुरक्षित दिखाई देता है, मगर सवाल इस बात का है कि क्या नाम बदलेगा? स्वामी आत्मानंद प्रदेश के शीर्ष विभूतियों में से एक हैं। पर यह नामकरण कांग्रेस के कार्यकाल में किया गया है। इन स्कूलों का नाम लेते ही भूपेश सरकार की याद आ जाती है। दूसरी तरफ अब प्रदेश में भाजपा की सरकार है। पीएम श्री से मोदी का नाम जुड़ा लगता है। बच्चों को इस सियासत से ज्यादा मतलब नहीं होगा। स्कूल चाहे स्वामी आत्मानंद नाम पर हो या पीएमश्री पर, पढ़ाई का माहौल ऐसा हो कि उन्हें उड़ान भरने का मौका मिले।
तपेदिक की दवा की दरकार
पिछले साल अक्टूबर में जब अखबारों में टीबी रोधी दवाओ की कमी की खबरें आईं तो केंद्र सरकार ने इसका खंडन कर दिया। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि सभी राज्यों में इसकी नियमित आपूर्ति की जा रही है और हमारे पास 6 माह का स्टाक है। पिछले महीने अप्रैल में जब राज्यों में संकट गहरा गया तो केंद्र ने हाथ खड़े कर दिये। उन्होंने राज्यों से कहा कि अपने स्तर पर निजी सप्लायरों से खरीदी कर लें। मगर, फार्मेसी वाले यह दवा रखते नहीं है। जिस दवा की मुफ्त में आपूर्ति की जाती हो उसका स्टाक भला वे क्यों रखें। हालत यह है कि देश के तमाम टीबी मरीजों को दवा नहीं मिल रही है। अकेले छत्तीसगढ़ में ऐसे 12 हजार मरीज हैं। विभिन्न रिपोर्ट्स को खंगालने से इतना ही पता चलता है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने दवा खरीद के लिए टेंडर जारी करने में देरी की। मगर इस बीच टीबी मरीजों की हालत बिगड़ रही है। टीबी का उन्मूलन राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक है। दवाओं की किल्लत ने इस लक्ष्य को वर्षों पीछे कर दिया है।
हाईवे के नीचे टाइगर...

मध्यप्रदेश के सिवनी से महाराष्ट्र के नागपुर तक जाने वाली सडक़ नेशनल हाईवे नंबर 44 घने जंगलों से गुजरती है। वन्य जीवों के विचरण वाले इलाकों में इस सडक़ को ऊंचा उठाकर नीचे पुलिया बना दी गई है ताकि बिना सडक़ क्रॉस किये वन्य प्राणी एक ओर से दूसरी ओर जा सकें। एक सैलानी ने इसी हाईवे के नीचे से गुजर रहे एक टाइगर की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली है। ([email protected])
राधिका और भूपेश फिर आमने-सामने?
भाजपा अब कांग्रेस की पूर्व प्रवक्ता राधिका खेड़ा को यूपी, और अन्य जगहों पर प्रचार के लिए भेजने की रणनीति बना रही है। चर्चा है कि यूपी में राधिका रायबरेली में रहकर भाजपा प्रत्याशी का प्रचार करेंगी।
कांग्रेस ने राहुल गांधी को रायबरेली से प्रत्याशी बनाया है। साथ ही पार्टी ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल को रायबरेली का पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। भूपेश वहां चुनाव प्रचार करेंगे। ऐसे में भाजपा राहुल और भूपेश के खिलाफ राधिका खेड़ा को प्रचार में उतारने की तैयारी कर रही है।
राधिका खेड़ा ने पिछले दिनों राजीव भवन में कांग्रेस के संचार विभाग के चेयरमैन सुशील आनंद शुक्ला से विवाद के बाद पार्टी छोड़ दी थी। उन्होंने सुशील पर बदसलूकी करने और राहुल गांधी की न्याय यात्रा के दौरान उन्हें (राधिका) शराब का ऑफर करने सहित कई गंभीर आरोप लगाए थे। राधिका ने भूपेश बघेल पर भी आरोपों की झड़ी लगाई थी। सुशील ने उन्हें मानहानि की नोटिस भी भेजा है लेकिन अब राजीव भवन का विवाद रायबरेली में भी गूंजने के आसार दिख रहे हैं।
पुराना बयान, नया बवाल
महादेव सट्टा केस में ईओडब्ल्यू-एसीबी ने हवलदार विजय पांडे के चारामा स्थित घर में छापेमारी की, और उसे सील कर दिया। चर्चा है कि पांडे पिछली सरकार के ताकतवर पुलिस अफसरों के करीबी रहे हैं। एक प्रकरण में तो उन्होंने एक पुलिस अफसर के खिलाफ शिकायत भी की थी। इसके बाद में पुलिस अफसर के खिलाफ कार्रवाई भी हो गई।
अब महादेव सट्टा केस में नाम आने से पहले हवलदार ने अपने पुराने बयान से पल्ला झाड़ लिया था, और इसकी सूचना वकील के माध्यम से विभाग को भेज दी थी। बावजूद इसके वो बच नहीं पाए। चर्चा है कि आने वाले दिनों में कई और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
अकेले काम की आदत
कोई भी काम किसी एक से नहीं हो सकता। इसीलिए तो कहा गया है कि अकेला चना...! और सरकारी दफ्तरों में तो संभव ही नहीं है। एक पूरी टीम काम करती है तो फाइल आगे बढ़ती है। लेकिन हम यहां दो दफ्तरों की बात बता रहे हैं जहां साहब लोग अकेले काम करना चाहते हैं, लेकिन हो नहीं पा रहा। इसे साहब लोगों की मातहतों से अस्पृश्यता नहीं कहा जा सकता । राजघराने जैसे सरनेम वाले एक साहब मरीजों का इलाज का काम करते हैं। उन्हें मातहत क्लर्क, अनुभाग अधिकारी, आदि-आदि पसंद नहीं हैं । अपने रूम में एक तरह से उनके आने पर रोक लगा दी है। उनके कमरे में केवल डिप्टी डायरेक्टर ही आ सकते हैं।
दूसरे साहब जंगल दफ्तर वाले हैं। इनका तरीका ही अलग है। दैनिक वेतन भोगी और छोटे कर्मचारियों से बचने साहब ने अपना पूरा दफ्तर ही नए शहर में शिफ्ट कर दिया। साहब ने काफी कोशिश की कि अरण्य भवन में एक कमरा मिल जाए,लेकिन वहां के पीठासीनों ने नहीं होने दिया । अब साहब जंगल सफारी मेंं दफ्तर बना लिया है। हालांकि ये उसी के साहब भी है।
बाबा की भक्ति ने संकट में डाला
धार्मिक आयोजनों का मोह राजनीतिक व्यक्ति नहीं छोड़ पाता। कथा-पुराण, प्रवचन हो तो बिना मेहनत भीड़ मिल आती है। मगर जब आचार संहिता लगी हो तो उम्मीदवार कुछ सतर्क रहता है। ऐसे कार्यक्रमों के कर्ता-धर्ता के रूप में अपना नाम सामने लाने से बचता है, ताकि खर्च उनके खाते में न जुड़े। कोरबा संसदीय सीट के चिरमिरी में बागेश्वर धाम के बाबा धीरेंद्र शास्त्री की हनुमान कथा हुई। कांग्रेस की शिकायत के बाद भाजपा प्रत्याशी सरोज पांडेय के खिलाफ जांच हुई। मनेंद्रगढ़ के सहायक रिटर्निंग ऑफिसर ने जब भाजपा प्रत्याशी से जवाब मांगा तो उन्होंने सफाई दी है कि कार्यक्रम उन्होंने नहीं बसंत अग्रवाल ने किया था। जबकि शिकायत के साथ जमा की गई प्रचार सामग्री के मुताबिक आयोजकों में बसंत अग्रवाल के अलावा सरोज पांडेय व स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल का भी नाम है। निगरानी दल की वीडियोग्राफी से भी इस बात की पुष्टि हो गई है। चुनाव खर्च में इस आयोजन के खर्च को जोड़ा जाए या नहीं इसका फैसला जिला निर्वाचन अधिकारी करेंगे। एआरओ ने अपनी रिपोर्ट उन्हें भेज दी है। प्रत्याशी के किस इंतजाम का कितना खर्च जोडऩा है, इसकी पूरी लिस्ट निर्वाचन विभाग में बनी रहती है। धीरेंद्र शास्त्री हेलीकॉप्टर से उतरे थे। विशाल पंडाल था। सारा खर्च निर्वाचन विभाग की चेक लिस्ट के हिसाब से जोड़ा जाएगा तो व्यय लाखों रुपये में पहुंचेगा। दूसरे चुनाव खर्चो का हिसाब अलग से है ही। प्रावधान यह भी है कि यदि सीमा से अधिक खर्च की पुष्टि हुई तो उक्त प्रत्याशी का निर्वाचन, यदि हुआ तो वह शून्य हो जाएगा।
टेम्पो फिर सडक़ पर...

ताजा राजनीतिक बयानबाजी ने लोगों को टेम्पो की याद दिला दी है। नई पीढ़ी को तो ठीक तरह से टेंपो के बारे में पता भी नहीं है। कुछ बरस पहले तक प्रदेश की सडक़ों पर डीजल से चलने वाली पों-पों करती, काला धुआं छोड़ती, ये किफायती सवारी गाड़ी दिख जाती थी, लेकिन अब गायब हो चुकी है। उसकी जगह पेट्रोल डीजल से चलने वाले ऑटो रिक्शा ने ले ली। और अब तो ई रिक्शा का दौर चल निकला है।
जिस कंपनी ने शुरुआत में भारत में टेंपो ब्रांड के वाहन पेश किए थे उसका नाम टेंपो लिमिटेड था। इसकी स्थापना 1949 में जर्मनी में हुई थी और 1951 में भारत पहुंच गया। टेम्पो ब्रांड से ही भारत में हल्के वाणिज्यिक वाहन बनाने के लिए भारत की प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स लिमिटेड के साथ भागीदारी हुई। 1971 में टेम्पो लिमिटेड ने अपना नाम बदलकर फोर्स मोटर्स लिमिटेड कर लिया। अब भी यह कंपनी फोर्स मोटर वैन, मिनी बस और कमर्शियल गाडिय़ां बनाती है। पर भारत में सवारी टेंपो का निर्माण सन् 2000 तक होता रहा। छत्तीसगढ़ में सवारी ढोने वाली टेंपो नजर नहीं आती, पंजाब और दूसरे राज्यों के कुछ हिस्सों में अब भी चल रही हैं। यदि भूले-भटके दिख जाए तो हो सकता है वह अडानी-अंबानी की हो। ([email protected])
हार-जीत काफी कम मतों से
मतदान के बाद जीत-हार को लेकर कांग्रेस, और भाजपा नेताओं के अपने-अपने दावे हैं। आखिरी की 7 सीटों में से कोरबा और जांजगीर-चांपा पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है।
कांग्रेस के रणनीतिकार पाली तानाखार, रामपुर, मरवाही और भरतपुर-सोनहत में भारी पोलिंग से गदगद हैं। पिछले चुनाव में विशेषकर पाली तानाखार और रामपुर ने कांग्रेस की नैया पार लगा दी थी। हालांकि भाजपा के लोग भी यहां बढ़त का दावा कर रहे हैं।
दूसरी तरफ, जांजगीर-चांपा सीट पर आखिरी के दिनों में भाजपा ने काफी ताकत झोंकी थी, और चर्चा है कि कुछ हद तक माहौल को अपने पक्ष में करने में कामयाब रही है।
कांग्रेस के लोग इस सीट पर भी जीत के दावे कर रहे हैं। कुल मिलाकर कोरबा, जांजगीर-चांपा के अलावा राजनांदगांव, और कांकेर सीट ऐसी है जहां हार-जीत काफी कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
नेता की रेत
भूपेश सरकार में अवैध रेत खनन के प्रकरण सुर्खियों में रहे हैं। उस समय कांग्रेस विधायकों पर संलिप्तता के आरोप लगे थे। सरकार बदलने के बाद भी अवैध रेत खनन को लेकर शिकवा-शिकायतें कम होने का नाम नहीं ले रही है। यद्यपि साय सरकार ने विधानसभा में कुछ शिकायतों पर सख्त कार्रवाई की घोषणा की थी।
ऐसी ही एक शिकायत पर राजनांदगांव जिले के सत्तारूढ़ दल के नेता की रेत से भरी गाडिय़ों को पुलिस ने रोक लिया, और दबाव में आने बिना कार्रवाई कर दी। यह कार्रवाई कांकेर जिले के एक थाने में हुई है। चर्चा है कि शिकायतकर्ता भी अपने ही थे। ऐसे में पुलिस ने कार्रवाई में देर नहीं लगाई। देर सवेर मामला राजनीतिक रंग ले सकता है।
कलेक्टर-एसपी का रिपोर्ट कार्ड
राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा ने कुछ आईएएस-आईपीएस को ठिकाने लगाया। कुछ को फील्ड पर नियुक्ति भी दी। अब चुनाव के दौरान सबका रिपोर्ट कार्ड चेक किया जाएगा। जो भी परिणाम होंगे, उसके आधार पर आकलन किया जाएगा कि उनका काम कैसा था। जाहिर है कि जो फील्ड पर हैं, वे लूप लाइन में लौटना नहीं चाहेंगे। इसलिए चुनाव आयोग के प्रोटोकॉल से किसी तरह बच-बचाकर लगे हुए हैं। बाकी चुनाव परिणाम से पता चल जाएगा कि आने वाले समय में कौन-कौन टाटा बाय-बाय होने वाले हैं।
नोटा भी मैदान में उतर गया..

ईवीएम में नोटा का विकल्प देने के बाद शायद पहला मौका होगा जब नोटा को वोट देने के लिए प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। इंदौर में कांग्रेस की स्थिति उस समय अजीब हो गई थी जब उसके अधिकृत प्रत्याशी अक्षय बम ने नाम वापस ले लिया। कांग्रेस का कोई डमी उम्मीदवार भी नहीं था। सुनने में आया कि भाजपा ने दूसरे कई उम्मीदवारों की भी नाम वापसी कराने की कोशिश की थी। अब भाजपा के मुकाबले के लिए मुख्य प्रतिद्वन्द्वी कांग्रेस का उम्मीदवार मैदान में जरूर नहीं लेकिन सूरत की तरह यहां निर्विरोध निर्वाचन नहीं हो रहा है। दो बातें पता चलेगी, पिछली बार 5 लाख से ज्यादा लीड लेकर जीतने वाले भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी ने चुनाव जीता था। इस बार उन्हें बम्पर मार्जिन से जीत मिल सकती है। दूसरी यह बात कि पिछली बार 0.02 प्रतिशत मतदाता ही थे, जिन्होंने नोटा में वोट दिया था। इस बार क्या नोटा में भी बंपर वोटिंग पड़ेगी?
उत्सव तो इनका भी था...
मतदान उत्सव के दिन प्रशासन को बड़ी संख्या में गाडिय़ों की जरूरत पड़ी। किल्लत कितनी हो गई थी इसका एक नमूना भई छत्तीसगढ़ में देखने को मिला। बिलासपुर में ड्यूटी कर रहे अर्ध सैनिक बलों के लिए खाना भिजवाने के लिए कचरा उठाने वाली गाड़ी ही लगा दी गई। निर्वाचन के काम में सारी सरकारी गाडिय़ां लगी रहीं, ट्रैवल्स एजेंसियों से भी गाडिय़ां बुक करा ली गईं, केंद्र सरकार के उपक्रमों से भी वाहन मंगाए गए। उसके बाद भी गाडिय़ां कम पड़ गई। बहुत सी पेट्रोलिंग टीमों के लिए गाड़ी मिलना मुश्किल हो गया तो थानों को व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दी गई। पुलिस जवान सडक़ों पर तैनात होते थे। ऐसी हर चारपहिया, वाहन खासकर जीप और छोटे मालवाहक रोक लिए गए जो खाली थे। गाड़ी के कागजात रख लिए गए और 12-14 घंटे का काम सौंप दिया गया। कहा गया, काम खत्म होने के बाद थाने में आकर गाड़ी के कागज ले जाना। कुछ गाड़ी मालिक दुखी नजर आए। उनका कहना था कि ठीक है, चुनाव जैसे जरूरी काम में उनकी गाड़ी कुछ घंटे के लिए पुलिस ने रख ली। मगर, हमसे उन्होंने दो चार हजार रुपये भी वसूल लिए। यह कहते हुए कि शुक्र करो सिर्फ ड्यूटी करने के लिए कह रहे हैं, गाड़ी की जब्ती नहीं बना रहे हैं। ([email protected])
दिग्गज घर बैठे
विधानसभा चुनाव में हार के बाद से कांग्रेस के कई दिग्गजों की सक्रियता बेहद कम हो गई है। इनमें पूर्व मंत्री अमरजीत भगत, और मोहम्मद अकबर शामिल हैं। ये दोनों दिग्गज तो एक तरह से लोकसभा चुनाव प्रचार से भी अलग रहे। यही नहीं, पूर्व नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव भी पारिवारिक वजहों से प्रचार में पूरा समय नहीं दे सके।
सीतापुर से 4 बार विधायक रहे अमरजीत भगत ईडी की जांच के घेरे में हैं। भूपेश सरकार में ताकतवर मंत्री रहे भगत सरगुजा सीट से टिकट की दावेदारी कर रहे थे। मगर ईडी की रेड की वजह से परेशानी में घिरे हैं। उन्होंने सरगुजा से कांग्रेस प्रत्याशी शशि सिंह के प्रचार में पूरा समय नहीं दे पाए।
भगत, शशि सिंह के नामांकन मौके पर कुछ देर साथ थे, लेकिन बाद में वो निकल गए। प्रचार के अंतिम दिनों में जरूर अपने क्षेत्र में दौरा किया, लेकिन अपेक्षाकृत सक्रियता नहीं दिखी। कुछ ऐसा ही हाल पूर्व नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव का भी रहा। उनके पारिवारिक सदस्य की बीमारी की वजह इलाज के लिए मुंबई में रहे। यद्यपि वीडियो कॉन्फ्रेंस कर चुनाव प्रचार में अपनी भागीदारी निभाने की कोशिश की।
पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर तो एक तरह से चुनाव प्रचार से गायब रहे। उन्होंने जरूर राजनांदगांव सीट से कांग्रेस प्रत्याशी भूपेश बघेल के प्रचार की रणनीति तैयार की थी, लेकिन अपने क्षेत्र कवर्धा नहीं गए। और तो और रायपुर में चुनाव के दौरान सक्रिय रहते थे, लेकिन इस बार वो कांग्रेस के पंडाल में नजर नहीं आए।
पायलट का रिपोर्ट कार्ड
कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट लोकसभा चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ को ज्यादा समय नहीं दे पाए लेकिन एक बदलाव को लोग महसूस कर रहे हैं कि चुनाव के दौरान कहीं कोई बड़ी गुटबाजी की खबर बाहर नहीं आई। सब अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं और जरूरत के मुताबिक एक-दूसरे की मदद करते भी नजर आ रहे हैं।
खबर है कि पायलट ने सारे बड़े नेता, वर्तमान व पूर्व विधायकों के अलावा स्थानीय गुट के नेताओं को आंखें दिखाकर कहा है कि वे मिलकर काम करें और किसी भी तरह की शिकायत नहीं आनी चाहिए। चुनाव के बाद वे सारे नेताओं का रिपोर्ट कार्ड चेक करेंगे। पायलट यह जानते हैं कि गुटों में बंटने का क्या नुकसान होता है। ऐसे में कांग्रेस के नेताओं को संभलकर रहना होगा, क्योंकि कोई रिपोर्ट कार्ड बनाए न बनाए हारने वाले जरूर यह बताएंगे कि चुनाव के दौरान कौन, कहां सक्रिय था और किसकी तरफ से बॉलिंग-बैटिंग कर रहा था।
बचे 26 दिन उठने वाले सवाल
छत्तीसगढ़ की सभी 11 सीटों पर मतदान हो जाने के बाद अब परिणाम की प्रतीक्षा है। नतीजा आने में कुल 26 दिन शेष हैं। इधर शाम 6 बजे मतदान खत्म हुआ और लोग एक दूसरे से पूछने लगे, किस दल को कितनी सीटें? छत्तीसगढ़ में क्या 11 में 11 सचमुच भाजपा को मिल पाएगी? कांग्रेस दो सीट से कम पर आ जाएगी, उतने में ही रह जाएगी या इस बार कुछ ज्यादा निकलने जा रही है? लोकसभा में कांग्रेस साफ हो गई तो किस-किस नेता की राजनीति खत्म हो जाएगी? यदि कांग्रेस पिछली बार से ज्यादा सीट लेकर आ गई और भाजपा की कम हो गई तो छत्तीसगढ़ के मौजूदा सरकार पर क्या फर्क पड़ेगा ? केंद्र में क्या एनडीए गठबंधन क्या सचमुच 400 पार या उसके आसपास पहुंचेगा? ऐसा होगा तो राहुल गांधी का भविष्य और इंडिया गठबंधन का क्या हश्र होगा? क्या फिर सचमुच आरक्षण खत्म हो जाएगा और संविधान बदल जाएगा? इसके उलट, एनडीए में स्पष्ट बहुमत का संकट तो खड़ा नहीं हो जाएगा? यदि ऐसा हुआ तो प्रधानमंत्री मोदी ही रहेंगे या गठबंधन वाले दल उनके बदले किसी और को चुनने का दबाव भाजपा पर बनाएंगे? क्या कुछ छोटी पार्टियां इंडिया से एनडीए में कूद जाएंगीं? भाजपा के कौन-कौन सीनियर लीडर पक्के तौर पर चुनाव जीतते दिख रहे हैं? मंत्रिमंडल में इनमें से किसे लिया जाएगा? मतदाताओं में पिछले चुनावों की तरह उत्साह दिखाई क्यों नहीं दे रहा था? जहां कम वोटिंग हुई है, वहां उसका फायदा किसे मिलेगा? कहीं-कहीं बंपर वोटिंग हुई है, उसका क्या संकेत है? यूपी और मध्यप्रदेश का रिजल्ट कैसा आने वाला है? पिछली बार की तरह क्या मध्यप्रदेश में भी भाजपा को क्लीन स्विप है? यूपी में क्या योगी आदित्यनाथ बीजेपी की सीटें बढ़ा पाएंगे? यूपी में कमजोर प्रदर्शन रहा तो योगी के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा? छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में जो नए नेतृत्व भाजपा ने सामने लाए हैं, वे क्या परिणाम के बाद स्थायी हो जाएंगे और पुराने लीडर हमेशा के लिए किनारे कर दिए जाएंगे?
पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र और उनकी ओर उठाए गए मुद्दों का नतीजों पर क्या असर होगा, इस पर भी चर्चा हो रही है। क्या एसटी-एससी समुदायों ने आरक्षण समाप्त करने और संविधान बदलने के विपक्ष के आरोपों पर यकीन किया है? क्या मतदाताओं ने भरोसा किया कि इंडिया गठबंधन की सरकार आई तो लोगों की संपत्ति छीनकर मुसलमानों में बांट दी जाएगी? क्या पिछड़े वर्गों के आरक्षण को छीनकर अल्पसंख्यकों को देने के भाजपा के आरोप ने मतदाताओं पर असर डाला है? छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना की वजह से महिलाओं के वोट क्या लोकसभा में भी भाजपा को मिले, विधानसभा की तरह? कांग्रेस की महालक्ष्मी योजना, वह क्या वैसा असर डालने वाली है, जैसा महतारी वंदन का था?
बचे चार चरणों के मतदान और काउंटिंग की तारीख पास आते-आते इन सवालों की सूची और लंबी होती जाएगी। ऐसा नहीं है कि सवाल करने वाला कुछ नहीं जानता और आपको जानकार मानता है। वह पूछता ही इसीलिए है कि वह आपके कमजोर आकलन से असहमत होकर, अपनी एक्सपर्ट टिप्पणी कर सके।
एग्जिट पोल का प्रसारण अंतिम चरण का मतदान खत्म होने के बाद एक जून की शाम से शुरू हो जाएगा। उसके बाद धडक़नें तेज होंगी, उतावलापन बढ़ेगा और चर्चा की दिशा बदल जाएगी। यह ईवीएम के खुलने तक चलेगी। फिर सरकार बनने तक इस पर बहस होगी कि नतीजा ऐसा क्यों आया।
मतदान केंद्र के बाहर भगवान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पीलीभीत यूपी में रैली के दौरान राम मंदिर के निर्माण और करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण का जिक्र किया था। इसकी शिकायत कांग्रेस ने चुनाव आयोग से की थी। आयोग ने मोदी को क्लीन चिट देते हुए कहा कि वह भाषणों में इन दोनों निर्माण कार्यों का उल्लेख करने को चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं मानता। यह धर्म के आधार पर वोट की अपील नहीं है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 5 मई को राधोगढ़ में चुनाव प्रचार के अंतिम दिन रैली निकाली, जिसमें भगवान राम की फोटो प्रदर्शित की गई थी। कांग्रेस ने फिर इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की। इस पर फैसला अभी नहीं आया है। अब वहां वोट भी पड़ चुके हैं। फैसला हो सकता है कि यूपी की रैली की तरह ही आए। मगर, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में वह प्रयोग भाजपा ने नहीं किया, जो गुजरात के गांधीनगर में हुआ। पत्रकार रवीश कुमार ने अपने ट्विटर हैंडल पर यह तस्वीर डाली है, जिसमें गांधीनगर सीट के एक मतदान केंद्र के बाहर भगवान राम के कट आउट लगे हैं। भाजपा के पंडाल से मतदाता पर्ची लें, भगवान का दर्शन करें और वोट डालें।
डीएमएफ फंड वाले जिले का हाल
कोरबा संसदीय सीट के सैला ग्राम पंचायत में ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार किया। सुबह 11 वोट डाले गए, उसके बाद पहले से घोषित चुनाव बहिष्कार का पालन करते हुए बाकी 600 मतदाताओं ने वोट डालने से मना कर दिया। पिछले 15 साल से इस गांव के लोग सैला से लैंगी के बीच सडक़ की मांग कर रहे हैं। पोड़ी-उपरोड़ा ब्लॉक का यह गांव है। पूरा कोरबा जिला खनिज उत्खनन से प्रभावित है। जिला खनिज न्यास कोष (डीएमएफ) में दंतेवाड़ा जिले के बाद सबसे अधिक राशि इसी जिले को मिलती है। इस फंड के करोड़ों रुपये अफसरों ने जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से अनाप-शनाप खर्च कर फूंक डाले। उसके एक छोटे से हिस्से से वह सडक़ बन सकती थी, जिसके लिए ग्रामीणों को मतदान का बहिष्कार करने के लिए मजबूर होना पड़ा। क्या यही है- मतदान का पर्व और लोकतंत्र का गर्व? ([email protected])
कुलपति नियुक्ति में कितनी राजनीति?
करीब 7 साल पहले बिलासपुर यूनिवर्सिटी, जो अब अटल विवि के नाम से जाना जाता है, उसमें बनारस विश्वविद्यालय के प्रो. सदानंद शाही की कुलपति पद पर नियुक्ति की गई थी। उस वक्त भाजपा की सरकार थी और राज्यपाल बलराम दास टंडन भी केंद्र की भाजपा सरकार की ओर से नियुक्त किए गए थे। पर भाजपा से संबद्ध छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने उनकी नियुक्ति के विरोध में प्रदर्शन किया। राजभवन ने उनके पदभार संभालने पर रोक लगा दी। रोक का कारण यह बताया गया था कि प्रोफेसर के रूप में उनका 10 साल का अनुभव नहीं है, न ही उन्होंने रिसर्च साइंटिस्ट के तौर पर 6 साल काम किया है। कुलपति के लिए यह जरूरी मापदंड था। मगर अभाविप ने जो विरोध किया था, वह इस आधार पर नहीं था। उसका कहना था कि प्रो. शाही वामपंथी विचारधारा के हैं। वे कुलपति बन गए तो विश्वविद्यालय में अपने ‘राष्ट्रविरोधी’ एजेंडे को पूरा करेंगे।
सन् 2018 में जब कांग्रेस की सरकार बनी उसके बाद कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर लगातार टकराव बना। तत्कालीन राज्यपाल अनुसुईया उइके पर कांग्रेस सरकार ने आरोप लगाया कि वे बाहरी लोगों को कुलपति बनाना चाहती हैं, स्थानीय विद्वानों की उपेक्षा हो रही है। तब राजभवन से सफाई आई कि 14 विश्वविद्यालयों में से 9 में स्थानीय कुलपति काम कर रहे हैं। बचाव में डॉ. रमन सिंह भी सामने आए थे। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस विश्वविद्यालयों में तो स्थानीय कुलपति की मांग करती है, मगर राज्यसभा में केटीएस तुलसी जैसे बाहरी लोगों को छत्तीसगढ़ से भेजती है, जो कभी यहां आते भी नहीं।
कामधेनु विश्वविद्यालय, पं. सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि, संत गहिरा गुरु विवि सरगुजा, सभी में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर टकराव होता रहा। स्थिति यह रही कि कई विश्वविद्यालयों में कुलपति कार्यकाल खत्म होने के बावजूद सेवा विस्तार पाते जा रहे हैं। ऐसे विस्तार के खिलाफ यूजीसी खिलाफ रहता है। इन्हें नीतिगत फैसले लेने के अधिकार कम होते हैं। कामधेनु विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय का नामकरण क्रमश: वासुदेव चंद्राकर और चंदूलाल चंद्राकर के नाम से करने की कोशिश भी कांग्रेस सरकार ने की, मगर राजभवन में यह फाइलें रुकी रही।
कुछ दूसरे गैर भाजपा शासित राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस सरकार ने राज्यपाल के अधिकारों में कटौती की कोशिश की थी, पर इन हस्ताक्षर भी राज्यपाल का ही होना था, जो नहीं हो पाया।
यह चर्चा इसलिये क्योंकि हाल ही में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालयों में पात्रता को नहीं, कुछ संगठनों से जुड़े होने की योग्यता को देखकर कुलपतियों की नियुक्ति की जा रही है। इसका विरोध करते हुए करीब 200 विश्वविद्यालयों के कुलपति ने एक पत्र लिखकर राहुल गांधी पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। राहुल गांधी के बचाव में कांग्रेस का बयान आया है कि आरएसएस और उसी तरह के संगठनों से जुड़े कुलपतियों को इंडिया गठबंधन की सरकार आने पर हटा दिया जाएगा। छत्तीसगढ़ में बीते पांच सालों में कुलपतियों और विश्वविद्यालयों पर आधिपत्य के लिए कुलाधिपति ( राज्यपाल) व सरकार के बीच तनातनी चलती रही, जिससे यह साफ है कि कुलपति की नियुक्ति में केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं देखी जाती, राजनीतिक झुकाव भी देखा जाता है। इन उच्च शिक्षा संस्थानों में सत्ता चाहे किसी की हो, अपना नियंत्रण चाहती हैं।
भाजपा-कांग्रेस में एक जैसा डर
छत्तीसगढ़ में 11 सीटों पर चुनाव बेहद रोचक मोड़ पर है। भाजपा 11 में 11 सीटें जीतने के लिए लड़ रही है। बोल भी रहे हैं कि इस बार 11 में 11 सीटें आ जाएंगी। डर भी रहे हैं कि आएगी कि नहीं? ऐसा इसलिए क्योंकि राजनांदगांव, कांकेर, महासमुंद, बस्तर, बिलासपुर और जांजगीर जैसी सीटों पर कांग्रेस ने जो प्रत्याशी तय किए हैं, वे भाजपा की एकतरफा जीत की उम्मीद पर पानी फेर रहे हैं। राजनांदगांव में पूर्व सीएम भूपेश बघेल कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। इससे दुर्ग और रायपुर लोकसभा सीट पर वे चुनाव हार चुके हैं। इस बार ऐसा कोई परिणाम आया तो संदेश जाएगा कि पूर्व सीएम की हार हो गई।
ताम्रध्वज साहू और डॉ. शिव डहरिया हाल ही में विधानसभा चुनाव हारे हैं। तब वे मंत्री थे, लेकिन दोनों ही सीटों महासमुंद और जांजगीर में परिस्थितियां उनकी ओर है। इधर, भाजपा के एक-एक मंत्री और सीनियर नेता भी दबाव में हैं। जब कांग्रेस की 68 सीट थी, तब 9 सीटों पर जीत मिली। इससे कम हुआ तो ऊपर तक संदेश गलत जाएगा।
ऑब्जर्वर बघेल और गहलोत
सन् 2018 की विधानसभा जीत के बाद से कांग्रेस हाईकमान का भरोसा भूपेश बघेल और अशोक गहलोत पर बढ़ता ही गया। इनमें भी भूपेश बघेल का वजन अधिक रहा। गहलोत के साथ थोड़ी खटास तब आ गई थी जब उन्होंने एआईसीसी का अध्यक्ष बनने से मना कर दिया था। मुख्यमंत्री रहते बघेल को कई राज्यों में कांग्रेस के चुनाव अभियानों को संभालने के लिए भेजा गया। इस बार बघेल को रायबरेली का तथा गहलोत को अमेठी का मुख्य पर्यवेक्षक बना दिया गया है। जैसी चर्चा है कि रायबरेली सीट कांग्रेस के लिए कुछ आसान है। इसलिये यदि यहां से राहुल गांधी जीत जाते हैं तो बघेल के खाते में एक कामयाबी जुड़ जाएगी। वहीं अमेठी में स्मृति ईरानी के खिलाफ गांधी परिवार के नजदीकी किशोरी लाल शर्मा को टिकट दी गई है। यदि कांग्रेस अमेठी की सीट पर ईरानी को हराने में सफल होती है तो यह रायबरेली से ज्यादा महत्वपूर्ण जीत होगी। ऐसे में गहलोत का कद बघेल के मुकाबले बढ़ा हुआ दिखेगा। बहरहाल, प्रतिष्ठा तो दोनों की दांव पर लगी है।
पांच नहीं छह का पंजा..

पंजे पर उंगलियों की संख्या वैसे तो पांच ही होती हैं, पर कहीं-कहीं छह उंगलियों वाले लोग भी होते हैं। दक्षिण भारत में एक चुनाव प्रचार के दौरान दीवार पर ऐसी ही छह उंगलियों वाला पंजा दिखा तो किसी ने सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया।
चिंताएं दो तरह की, हल एक
पिछले दिनों बिलासपुर में भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश की मौजूदगी में बैठक हुई। जब कार्यकर्ताओं से सुझाव मांगा जा रहा था, तब एक ने सुझाव दिया कि कांग्रेस से जो लोग आए हैं, उन्हें भी काम करने का मौका दिया जाए। बात सबको जंच गई। बैठक खत्म होने के बाद कुछ नेताओं की चिंता बाहर आई कि इतने सारे लोग पार्टी में आ जाएंगे तो करेंगे क्या? और क्या जिम्मेदारी देंगे। ठीक इसी समय भाजपा में शामिल हुए कांग्रेसियों के बीच इस बात की चर्चा होती रही कि भाजपा में आ तो गए हैं। ठीक-ठाक कुछ पद नहीं मिला तो करेंगे क्या? दोनों चर्चाओं का सार ऐसा निकला कि क्या करना है, सरकार है, कुछ न कुछ ठेका-वेका मिलता रहेगा। काम के रहेंगे तो बने रहेंगे, नहीं तो फिर लौट जाएंगे। हम लोगों को भी लगेगा तो गुंजाइश तलाशेंगे।
एक ने एक लाख का दावा किया बाकी...
कल मतदान के बाद मतदाताओं, प्रत्याशियों, समर्थकों को नतीजे के लिए इंतजार करना होगा। 4 जून को गिनती होनी है। तब तक इन 28 दिनों में नेताओं के पास फुल टाइम है। उससे पहले वे एक एक बूथ पर पड़े वोटों का आकलन करेंगे। पोलिंग एजेंट के मतदान शीट से मोटा मोटी हार जीत और अंतर निकाल लिया जाएगा। रायपुर की बात करें तो दावा 8 लाख से ऊपर का है। यहां पश्चिम के नेता को छोड़ शेष सात ने अपने क्षेत्र से लीड का कोई दावा नहीं किया है। क्या ये सभी पांच महीने में ही अपनी स्थिति समझ चुके हैं। सही भी है, सभी अब तक अपनी जीत का ही जश्न मना रहे, स्वागत सत्कार ही करवा रहे हैं। जन समस्या सुलझाने आचार संहिता की मजबूरी जो तैयार है। तो कुछ शराब, और रेत से तेल निकालने में बिजी हो गए हैं। देखना यह है कि इनके इलाकों से वोटों का अंतर कितना निकलता है।
इसको नहीं मिलना चाहिए
पिछले सप्ताह हमने बताया था कि 4 जून को रायपुर दक्षिण विधानसभा खाली होने वाली है। इसे देखते हुए शहर भाजपा के करीब चार दर्जन (45) नेता पूरी तरह से सक्रिय हैं। सभी ने भैया के लिए जी तोड़ मेहनत की। अब किसकी लॉटरी लगती है यह तो दिसंबर में? उप चुनाव के समय ही पता चलेगा। तब ये सभी अपनी अपनी दावेदारी को लेकर एक दूसरे को पटखनी देने हर दांव चलने लगे हैं। कुछ ने तो एक दूसरे का समर्थन करने रिंग बना लिया है। इन सबका एक ही लक्ष्य है कि डबल एस को रोकना है। कहने लगे हैं कि किसी को भी मिल जाए, इसे न मिले। ये अलग बात है कि डबल एस खुद की टिकट पक्की मानकर चल रहे हैं।
कांग्रेस का मापदंड दोहरा?

कांग्रेस की नेशनल मीडिया कोऑर्डिनेटर राधिका खेड़ा ने जब एक मई को पहला ट्वीट किया तो संकेत यही था कि प्रदेश कांग्रेस भवन में बैठे ‘दुशील’ और कथित रूप से उनका अपमान कर रहे हैं और उनको संरक्षण ‘कका’ से मिल रहा है। उनकी बात से यह पता चल रहा था कि राजीव भवन के किसी पदाधिकारी या पदाधिकारियों से उनकी खटपट हुई है। मगर, इस्तीफा देने की घोषणा करते हुए उन्होंने इस अपमान की जो वजह बताई है वह बिल्कुल अलग है। उन्होंने साफ किया है कि उन्हें सिर्फ पुरुषवादी मानसिकता के कारण नहीं, बल्कि रामलला का दर्शन करने अयोध्या जाने की वजह से अपमानित किया जा रहा था।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने जांच रिपोर्ट एआईसीसी को भेजी थी। हो सकता है कि खेड़ा से दुर्व्यहार करने वाले पदाधिकारी से एआईसीसी इस्तीफा मांग लेती, या फिर पार्टी से ही बाहर का रास्ता दिखा देती। मगर बैज की रिपोर्ट दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में खुल भी नहीं पाई होगी कि राधिका खेड़ा का इस्तीफा आ गया। रामलला के दर्शन के लिए जाने की वजह से अपमानित करने की उनकी बात यदि सच है तो यह मानना पड़ेगा कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने यह बयान दिखावे के लिए दिया कि जिसे दर्शन के लिए अयोध्या जाना है, जाएं उन्हें हम नहीं रोकेंगे। हमारी ओर से कोई मनाही नहीं है।
यह भी सवाल उठता है कि अयोध्या में राम मंदिर का दर्शन करने के लिए गए लोगों में से पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, दीपेंद्र हुड्डा और विक्रमादित्य सिंह जैसे नेताओं को लोकसभा टिकट कैसे मिल गई? वैसे अब तक कांग्रेस के तीन राष्ट्रीय प्रवक्ता पहले ही राम मंदिर उद्घाटन में कांग्रेस के शामिल नहीं होने को सनातन का अपमान बताकर पार्टी छोड़ चुके हैं। इनमें आचार्य प्रमोद कृष्णम्, रोहन गुप्ता और गौरव वल्लभ शामिल हैं। कांग्रेस के पक्ष को वर्षों तक इन्होंने बड़ी गहराई से प्रेस के सामने रखा, अब राधिका खेड़ा भी इनमें शामिल हो गईं। भाजपा ने इनकी क्षमता, प्रतिभा का उपयोग करना अभी शुरू नहीं किया है। वैसे एक और मुखर प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत्र तो मंदिर होकर भी आ चुकी हैं। वे रोजाना सोशल मीडिया और प्रेस कांफ्रेंस में कांग्रेस का पक्ष रख रही हैं, उन पर कोई आंच नहीं आई है।
प्रचार अभियान किसका तेज रहा?
सात मई को 7 सीटों में मतदान हो जाने के बाद छत्तीसगढ़ के सभी 11 सीटों में मतपेटियां करीब एक माह के लिए बंद हो जाएंगी। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही इस दौरान धुआंधार प्रचार किया लेकिन भाजपा के स्टार प्रचारक हर दिन कहीं न कहीं सभा लेते दिखे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक रात भी रुके। अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, जेपी नड्डा ने भाजपा की ओर से लगातार सभाएं लीं लेकिन मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सभाओं ने रिकॉर्ड तोड़ा। वे सभी 11 लोकसभा सीटों के कार्यकर्ता सम्मेलनों में शामिल हुए। छोटी बड़ी सभाओं को मिलाकर 45 दिन में 106 सभाएं लीं। यानि एक दिन का औसत दो सभाओं से अधिक रहा। इसके मुकाबले पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल राजनांदगांव में मतदान होने के बाद ही दूसरे क्षेत्रों में कुछ ही दिन के लिए बाहर निकल पाए। टीएस सिंहदेव तो चुनाव प्रचार के शुरुआती दौर में सरगुजा में मौजूद ही नहीं थे। आने के बाद भी वे प्रदेश के दूसरे स्थानों पर नहीं निकले। हालांकि राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खडग़े, प्रियंका गांधी और कन्हैया कुमार ने कई जनसभाएं लीं। कांग्रेस के राज्यसभा सदस्यों का छत्तीसगढ़ आना औपचारिक रहा। राजीव शुक्ला पत्रकार वार्ता लेकर दिल्ली वापस लौट गए। पत्रकार वार्ताओं के मामले में भी भाजपा आगे रही। वह न केवल प्रदेश मुख्यालय में बल्कि संभाग और जिला मुख्यालयों में लगातार प्रेस कांफ्रेंस कर प्रचार की धार चमकाने में लगी रही। नतीजा चाहे जो आए लेकिन भाजपा तीनों चरणों में प्रचार में कांग्रेस से आगे दिखती रही। ([email protected])
रेत माफिया में कार्रवाई, विधायक पर ही एफआईआर
राज्य में रेत माफियाओं का आतंक बढ़ते ही जा रहा है। नदियों में अवैध खनन किया जा रहा है। नदियों में जितना पानी नहीं, उससे 100 गुना ज्यादा रेत निकाला जा रहा है। इसमें बड़े माफिया सक्रिय है। उनके पीछे राजनेता है। कुछ माह पहले खनिज का अमला राजधानी के एक रेत घाट में कार्रवाई करने गया था। अमला कार्रवाई कर रही थी, तभी रेत माफियाओं के गुर्गे ने हमला कर दिया।
खनिज विभाग के अमले को दौड़ा दौड़ाकर पीटा गया। इसमें एक दर्जन लोग घायल हो गए। राजधानी हडक़ंप मच गया। इसकी पुलिस में शिकायत हुई। माफियाओं के गुर्गों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। खनन करने वाली मशीन और गाड़ी जब्त की गई। दो पोकलेन का नंबर भी एफआईआर में लिखा गया। जब पोकलेन की जानकारी आरटीओ से आई तो पुलिस भी चौंक गई।
पोकलेन माननीय विधायक के नाम पर था। इधर विधायक कार्रवाई रुकवाने के लिए जोर आजमाइश करने लगे। सीएम हाउस तक गए। हाउस से जानकारी मांगी तो बताया कि विधायक के लोग अवैध रेत खनन कर रहे है। इसमें सीधा उनका भी कनेक्शन हैं। फिर क्या विधायक उल्टे पाँव लौट गए। आज भी विधायक जी खिलाफ केस दर्ज है, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
घर से वोट में दिलचस्पी क्यों नहीं ?
बुजुर्ग और दिव्यांग मतदाताओं को वोट देने के लिए बूथ आने में होने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग ने पिछले विधानसभा चुनाव में एक नया कदम उठाया। उन्हें घर बैठे मतदान की सुविधा दी गई। लोकसभा चुनाव में भी यह सुविधा मिली है। सिर्फ यह किया गया कि इस बार बुजुर्गों की उम्र सीमा 80 से बढ़ाकर 85 कर दी गई। पर विकलांगता को 40 प्रतिशत ही रखा गया। तीसरे चरण में जिन 7 लोकसभा सीटों पर चुनाव हैं, उसमें ऐसे दिव्यांगों और बुजुर्गों की कुल संख्या एक लाख 91 हजार 196 है, जो घर से वोट डालने के पात्र थे। मगर, इसके लिए केवल 2927 आवेदन मिले। तीन मई तक इनके घर जाकर वोट डाले जाने थे, तब तक वोटिंग केवल 2687 लोगों ने की। पहले और दूसरे चरण में भी यही स्थिति थी। पहले चरण में शामिल बस्तर में 16 हजार 190 मतदाता घर से वोट डालने के पात्र थे। पर आवेदन कुल 254 ही मिले और उनमें से 223 ने वोट डाले। दूसरे चरण में जिन तीन सीटों पर चुनाव हुए उनमें 67 हजार 950 पात्र मतदाता थे, पर आवेदन 1346 मतदाताओं के आए और केवल 1267 लोगों ने वोट दिए। कुल मिलाकर योजना की सफलता एक प्रतिशत भी नहीं है।
सवाल यह है कि क्या बुजुर्गों और दिव्यागों में चुनाव को लेकर कोई उत्साह नहीं है, या फिर प्रक्रिया में ही कोई खामी है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में बिलासपुर की एक बुजुर्ग महिला मतदाता ने कुछ दिन पहले जिला निर्वाचन अधिकारी के खिलाफ केस लगा दिया था। उनका कहना था कि घुटनों में दर्द के कारण वह मतदान केंद्र नहीं पहुंच सकती। इसे देखते हुए उन्होंने घर से मतदान के लिए आवेदन दिया था लेकिन उस पर विचार नहीं किया गया। हाईकोर्ट में पेशी हुई तो निर्वाचन विभाग की ओर से बताया गया कि आवेदन तो मिला है, लेकिन निर्धारित प्रपत्र में नहीं है। हाईकोर्ट ने महिला के पक्ष में निर्णय दिया। यह एक सजग मतदाता का मामला है, पर अधिकांश अशक्त मतदाताओं को यह सुविधा नहीं है। अस्थायी बूथ उनके घर तक तभी लाया जाएगा, जब वह निर्वाचन दफ्तर में आवेदन दे। कई बुजुर्ग और दिव्यांगों के पास ऐसे सहायक नहीं होंगे जो इस कार्य में मदद करें। यदि सहायक हैं तो फिर वे तो बूथ में वोट देने के लिए ही जाना क्यों पसंद नहीं करेंगे?
घोड़े को नचाकर चुनाव प्रचार...

भीषण गर्मी में मतदाताओं का क्या, कार्यकर्ताओं को भी घर से निकल पाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में प्रचार की नई-नई तरकीब ईजाद की जा रही है। ये हैं बड़वानी मध्यप्रदेश से आने वाले भाजपा सरकार के पूर्व मंत्री 71 वर्षीय बालकृष्ण पाटीदार। वे खरगोन लोकसभा सीट के पार्टी प्रत्याशी गजेंद्र पटेल के प्रचार में घोड़े पर निकल रहे हैं। छोटी-छोटी नुक्कड़ सभाएं लेते हैं, सभाओं के लिए भीड़ जुटने में देर नहीं लगती। वे किसी भी गांव के चौराहे पर घोड़ा लेकर पहुंच जाते हैं और उसे नचाने लगते हैं। भीड़ जुट जाती है और वे वोट मांग लेते हैं।
नगरीय निकायों को सबक
प्रदेश के अधिकांश नगरीय निकायों में बनाए गए सामुदायिक भवनों की स्थिति कभी देखने जाएं तो पता चलता है वहां गंदगी पसरी है। बल्ब, ट्यूबलाइट, पंखे आधे काम कर रहे हैं आधे बंद हैं। शौचालय में पानी नहीं, सफाई नहीं। इनके निर्माण का उद्देश्य होता है वार्ड और शहर के लोगों को कम खर्च पर मांगलिक कार्य करने के लिए जगह मिल जाए। लोग इनकी दुर्दशा के कारण या तो किराये के होटल, गार्डन में जाने के लिए मजबूर होते हैं, या फिर अपने घर के सामने या छत पर टेंट लगा लेते हैं। यदि कोई किराये पर ले भी लेता है तो नगर निगम, पालिकाओं के अधिकारियों की रवैया ऐसा होता है, मानो ये सुविधा मुफ्त दी जा रही हो। मगर, नगर निगम अंबिकापुर के एक जागरूक नागरिक ने रास्ता दिखाया है। उन्होंने शादी के कार्यक्रम के लिए सरगुजा सदन को किराये पर लिया। कई राज्यों से मेहमान आए थे। जगह-जगह गंदगी, टूटी फूटी लाइट, आधे से ज्यादा पंखे बंद..। केयर टेकर और सफाई के लिए मात्र एक महिला कर्मचारी। नगर निगम के प्रभारी ने सूचना देने के बाद भी सुविधा बहाल नहीं की। बाहर से आए मेहमान बेहद परेशान हुए, मेजबानों की फजीहत हुई। नागरिक ने नगर-निगम के खिलाफ स्थायी लोक अदालत में केस कर दिया। नगर निगम आयुक्त, राजस्व अधिकारी और लिपिक के खिलाफ अदालत ने दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने, वाद का खर्च देने तथा किराये की रकम लौटाने का आदेश दिया है।
पूरे प्रदेश में जिन लोगों को भी आये दिन ऐसी असुविधा होती है, वे नगर निगम के अधिकारियों को इस खबर के बारे में बता सकते हैं और स्थिति नहीं सुधरती तो हर जिले में मौजूद स्थायी लोक अदालत में परिवाद ला सकते हैं।
रेल के मुद्दे पर पड़ेंगे वोट?
रेलवे को देश में सर्वाधिक आमदनी देने वाला जोन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में है। इसके बावजूद रेल सुविधाओं के नाम पर यहां की जनता के साथ छलावा हो रहा है। अब तो नई ट्रेन शुरू करने की बात ही नहीं होती। लोग यही मना रहे हैं कि जो ट्रेन निर्धारित हैं वे अचानक निरस्त न हों और घंटों विलंब से न चलें। कोविड काल के बाद सैकड़ों ट्रेनों को रद्द कर दिया गया था। बहुत से छोटे स्टेशनों में ठहराव समाप्त कर दिया गया था। इसे लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई तो स्थिति में कुछ सुधार हुआ, हालांकि अब भी कई स्टेशनों में स्टापेज दोबारा शुरू नहीं हुए हैं। कोविड काल के समय से ही ट्रेनों की लेटलतीफी बढ़ गई है। इस समय चुनाव का मौसम है। जिन शेष 7 सीटों पर चुनाव होने जा रहा है, लगभग सभी में ट्रेनों का परिचालन होता है। दूसरी ओर अभी एक सप्ताह से ज्यादा समय से ट्रेनों के घंटों विलंब से चलने के कारण यात्री त्रस्त हैं। कल पुणे-हावड़ा आजाद हिंद एक्सप्रेस 20 घंटे देर से चल रही थी। शालीमार, उत्कल, गोंदिया-बरौनी जैसी ट्रेन स्थायी रूप से घंटों विलंब से चलती हैं। मगर, शायद रेलवे को लगता है कि मतदाता समय पर ट्रेनों को चलाने में नाकामी को लेकर वोट नहीं करती। विधानसभा चुनाव के समय इस मुद्दे पर कांग्रेस ने रेल रोको आंदोलन भी चलाया था। कई कांग्रेस नेता एफआईआर दर्ज होने के बाद अब कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। रायपुर के कांग्रेस प्रत्याशी विकास उपाध्याय भाटापारा, तिल्दा आदि में संपर्क के दौरान इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं। बिलासपुर में तो हमर राज पार्टी के प्रत्याशी सुदीप श्रीवास्तव ने रेलवे की मनमानी को ही प्रचार अभियान का प्रमुख मुद्दा बना रखा है। पर रेलवे इस बात से निश्चिंत और इस बात से खुश है कि वह लदान में नए कीर्तिमान बना रहा है।
ट्रैफिक का नया प्रयोग भारी पड़ा
बस्तर में पहले चरण में ही मतदान हो चुका है, इसलिये कोई फैसला जनता को नाराज करे तो भी उसका प्रशासन पर असर नहीं होना है। ऐसा ही एक फैसला लेकर 3 मई से शहर के एसबीआई चौक से चांदनी चौक के बीच सडक़ को एकांगी मार्ग घोषित कर दिया गया। पांच साल पहले भी इसी तरह का फैसला लिया गया था, तब यह पता चला था कि समाधान यह नहीं है। यहां होने वाले ट्रैफिक जाम से बचने का रास्ता यह निकाला गया कि ट्रैफिक वन वे कर दिया गया। पहले ही दिन पता चल गया कि इससे तो परेशानी पहले से भी ज्यादा बढ़ गई है। एंबुलेंस भी फंस गई। व्यापारी कह रहे हैं कि क्या अपना व्यापार बंद कराने के लिए हमने भाजपा को जिताया था। दरअसल, जाम की स्थिति से बचने के लिए मुख्य मार्ग पर स्थित शराब दुकान को हटाने की मांग की जा रही है। पर, जैसा कि होता है कि जैसे किसी धार्मिक स्थल को जल्दी नहीं हटाया जाता, शराब की दुकानें भी हटाने से प्रशासन ने तमाम नियमों का हवाला देते हुए मना कर दिया।
ट्रक पर स्लोगन

एक ट्रक पर लिखे इस स्लोगन में हिंदी, अग्रेजी और गणित तीनों ही लिपि का इस्तेमाल किया गया है। उम्मीद है कि क्या लिखा गया है, आप समझ रहे हैं।
पोस्ट मास्टरों में हलचल
जून का महीना केंद्रीय विभागों में तबादलों का महीना कहा जाता है । जुलाई से शिक्षा सत्र के देखते हुए केंद्रीय विभाग समय पर तबादले कर देते हैं। इस बार डाक विभाग के रायपुर डिवीजन में पोस्ट मास्टर्स (पीएम)में हलचल बढ़ गई है। खासकर रायपुर शहर के उपडाकघरों के पीएम्स की नजर कचहरी शाखा पर लगी हुई है। अब तक यह डाकघर एक दबड़े नुमा कमरे में संचालित होता रहा। जहां उसने 50 साल से अधिक बिताए। अब यह उससे बड़े कक्ष में स्थानांतरित कर दिया गया है। कोर्ट परिसर में होने के कारण वकील, जज पुलिस वालों की आवाजाही बनी रहेगी। इससे सबसे परिचय भी बढ़ेगा। कानून वालों के बीच पकड़ बनेगी। सो विभाग के पुरुष पीएम यहां की कुर्सी हासिल करने में जुट गए हैं। अभी यहां मैडम पीएम हैं। शिफ्टिंग की पूरी मशक्कत उन्होंने पूरी शिद्दत से की। अब उसे भोगने पुरुष हाथ पैर मार रहे हैं। अब इस बात को सर्किल की बड़ी मैडम कितनी गंभीरता से लेती हैं यह तो तबादला सूची में ही दिखाई देगा।
वोट से परहेज वाले अफसर

इन दिनों पूरे देश में एक एक वोट को लेकर मशक्कत चल रही है। दिल्ली आयोग से लेकर बीएलओ तक सभी जुटे हुए हैं कि घरों से हरेक वोट निकले। उसके बाद भी 60-70-75 प्रतिशत ही वोटिंग हे रही। शेष 40-25 फीसदी वोट, विभिन्न पारिवारिक कारणों, से नहीं पड़ते। तो कुछ मेरे एक वोट से क्या नफा नुकसान हो जाएगा की सोच में तो कुछ किसी दल, नेता कार्यकर्ता विशेष से नाराजगी से मतदान नहीं करते। इन सबसे हटकर छत्तीसगढ़ में एक ऐसे भी आईएएस हुए हैं जिन्होंने कलेक्टर रहते कई चुनाव कराए लेकिन कभी मतदान नहीं किया। बाद में वे मुख्य सचिव भी बने। इसके पीछे उनकी किसी से कोई नाराजगी नहीं थी। उनके पूरे सेवा काल में मप्र से लेकर छत्तीसगढ़ तक कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस की सरकारें रहीं। वे सबके लिए ब्लू आईड रहे। सभी नेता उनका सम्मान करते। उनके जैसा निष्पक्ष कोई नहीं रहा। हर सरकार में कई नामचीन योजनाएं उन्होंने लागू कराया। छत्तीसगढ़ के कई बड़े शैक्षणिक संस्थान उनकी पहल पर ही स्थापित हुए हैं। बात वोट न करने से शुरू हुई थी। एक बार एक चीफ सेक्रेटरी ने इस पर पूछने पर कहा, वोटिंग कर देने से मन निष्पक्ष नहीं रह जाता। इसलिए मतदान तो रिटायरमेंट के बाद ही करूंगा। अब वो कर रहे या नहीं पता नहीं चल पाया है। उम्मीद है कर रहे होंगे। हमने एक राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को कतार में लगकर वोट डालते देखा था।
नई कोयला खदान चुनाव के बाद
कुछ बड़े फैसलों पर अमल चुनाव आचार संहिता के कारण नहीं हो पा रहा है। इनमें एक है कोल ब्लॉक का आवंटन। कोयला मंत्रालय नौवें दौर की नीलामी की घोषणा कर चुका है। नीलामी प्रक्रिया चुनाव के चलते रोक दी गई है। इनमें कोरबा जिले के करतला ब्लॉक के दो ब्लॉक, नॉर्थ और साउथ भी शामिल हैं। ये दोनों कोल ब्लॉक आठवें दौर की नीलामी सूची में भी शामिल किए गए थे, पर ग्रामीणों ने विरोध जताया था। तब इनकी नीलामी रोक दी गई थी। स्थानीय आदिवासी किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं छोडऩा चाहते। यहां घना जंगल है। हाथी तथा भालुओं का विचरण क्षेत्र भी है। लोकसभा चुनाव के बाद यदि विरोध होता भी है तो इसका बहुत ज्यादा असर सरकार पर पडऩे की उम्मीद कम ही है। इसलिये इन दोनों खदानों को फिर नीलामी सूची में रख लिया गया है।
टी-शर्ट तो काम आएगी...

लोग लाख नसीहत दें कि विवेक से अच्छे से सोच-विचार कर मतदान करें, लेकिन तात्कालिक लाभ का असर तो वोटिंग पर पड़ता ही है। जब चुनाव मैदान में उतरे मुख्य मुकाबले वाले दल पैसे खर्च करते हैं तो कई जरूरतमंदों का भला हो जाता है। यह तस्वीर किसी मजदूर की है जो सोशल मीडिया पर वायरल है। भाजपा को प्रचार मिल रहा है, मजदूर को टी- शर्ट मिल गई। दोनों का भला हो रहा है।
स्वागत को लेकर कहा-सुनी
रायपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली बलौदाबाजार विधानसभा सीट पर इस बार भाजपा की जीत हुई। राज्य बनने के बाद हुए चुनावों में यह उसकी दूसरी जीत है। भाजपा को सुहेला और तिल्दा से बढ़त मिली थी। इस क्षेत्र के विधायक टंकराम वर्मा तिल्दा से आते हैं और उन्हें मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। भाजपा यह लीड बनाए रखने की ही नहीं, बल्कि उसमें कुछ जुडऩे की उम्मीद लेकर चल रही है। इसी बीच कार्यकर्ताओं के बीच मनमुटाव सामने आ रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय कल पार्टी प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल के प्रचार के लिए बलौदाबाजार पहुंचे थे। सुहेला और तिल्दा के कार्यकर्ता और समर्थक भी सभा में पहुंचे। पर मुख्यमंत्री के जाने के बाद बखेड़ा खड़ा हो गया। सुहेला से पहुंचे कार्यकर्ताओं ने संगठन के पदाधिकारियों पर जमकर नाराजगी जताई। उनका कहना था कि सीएम के स्वागत के लिए सुहेला इलाके से पहुंचे पार्टी कार्यकर्ताओं को मंच पर नहीं बुलाया गया। बलौदाबाजार से तो लीड मिलती नहीं पर यहीं के लोग पूरे कार्यक्रमों में हावी रहते हैं। उनका यह भी आरोप था कि मंत्री को भी प्रचार अभियान में किनारे लगाने की कोशिश की जा रही है। वैसे तो भाजपा सभी 11 सीटों पर जीत के दावे कर रही है, पर जिन्हें लेकर निश्चिंत है उनमें रायपुर सीट शामिल है। उम्मीद है अनुशासित लोगों की पार्टी के नेता कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर कर लेंगे।
कांग्रेस की गारंटी मालूम नहीं किसानों को
कांग्रेस नेता राहुल गांधी बिलासपुर की जनसभा के बाद चकरभाठा एयरपोर्ट के रास्ते पर सडक़ से गुजर रहे किसानों के पास रुक गए थे। वे उनके परिवार से मिलने घर गए, वहां चाय पी। सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर कल इसे साझा करते हुए राहुल गांधी ने लिखा है कि- एक बार फिर उस हिंदुस्तान से मिला जो नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं से बहुत दूर है। यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि कांग्रेस का मेनिफेस्टो किसानों, आदिवासियों, महिलाओं, युवाओं सबके दिलों को छू रहा है। इंडिया गठबंधन की सरकार हिंदुस्तानियों की सरकार होगी।
वह आदिवासी समाज के बुधराम का घर था। राहुल गांधी के आने की खबर मिलने पर कुछ और ग्रामीण वहां पहुंच गए थे। बुधराम ने बताया कि उसकी खेती की जमीन का कागज नहीं है जिसके चलते उसे अपना धान बाजार में औने पौने दाम पर बेचना पड़ता है। राहुल गांधी ने एकत्र लोगों से पूछा कि क्या उन्होंने कांग्रेस का मेनिफेस्टो पढ़ा है? किसानों ने कहा, नहीं पढ़ा। एक ने जरूर कहा कि किसानों के बारे में उसमें कुछ है। तब राहुल गांधी ने उन्हें एमएसपी की कानूनी गारंटी और किसानों की कर्ज माफी के बारे में बताया। महिलाओं को उन्होंने महालक्ष्मी योजना की जानकारी दी। मनरेगा में 400 रुपये मजदूरी मिलेगी, यह भी बताया।
ग्रामीणों ने बताया कि पिछले 4 महीने से उन्हें मनरेगा का पैसा नहीं मिला है। दिन भर में डेढ़ सौ 200 कमाते हैं। हम कहां से एक हजार रुपए में गैस भरवाएंगे। सब चीज महंगी कर दी गई है। महिलाओं ने मांग रखी कि पेयजल के लिए बांध से पानी टंकी और पाइपलाइन दीजिये, पानी खराब आता है। वहां मौजूद कुछ किसानों ने बताया कि उनकी खेती की जमीन रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है इसलिए उन्हें खुले बाजार में धान बेचना पड़ता है और एमएसपी पर बड़े किसान ही बेच पा रहे हैं।
राहुल गांधी ने उनसे पूछा कि बीमार होने पर कहां जाते हो। जब लोगों ने बताया कि प्राइवेट अस्पताल जाते हैं। तब उन्हें हर गरीब के लिए 25 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा की गारंटी के बारे में राहुल ने बताया। बीकॉम फर्स्ट ईयर की छात्रा को राहुल गांधी ने बताया कि हर ग्रेजुएट को एक साल की अप्रेंटिस नौकरी मिलेगी।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल उनके साथ थे। उन्होंने बताया कि हमने उनकी सहूलियत के लिए ग्राम पंचायत के प्रस्ताव के आधार पर एसटी एससी प्रमाण पत्र बनाने का प्रावधान किया था, जिसे इस सरकार ने बंद कर दिया है। हमारी सारी योजनाएं बंद कर दी गई हैं।
इस पूरी चर्चा से यह बात साफ हुई कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में दी गई गारंटियों की जानकारी जिला मुख्यालय से लगे और एयरपोर्ट के रास्ते पर पडऩे वाले गांव में भी मतदाताओं तक नहीं पहुंची है। राहुल एक गांव में रुके, ग्रामीणों को इस बारे में बताया-पर कांग्रेस के प्रचार अभियान पर सवाल तो खड़ा हो गया है कि उनके जमीनी कार्यकर्ता प्रचार के लिए कहां जा रहे हैं और कांग्रेस की घोषणा के बारे में किसे बता रहे हैं।
गरीब का कोई नहीं...

राजधानी के एक रसूखदार परिवार के यहां सगाई समारोह का आयोजन किया गया। इसमें आए मेहमानों को हुक्का परोसा गया। किसी ने इसका वीडियो बनाकर पुलिस को भेज दिया। पुलिस भी सगाई कार्यक्रम में जा धमकी। पुलिस को देखकर हडक़ंप मच गया। पुलिस भी वर्दी का रौब दिखाने लगी। सबको थाना चलने के लिए कहां गया। आयोजक भी हड़बड़ा गए। उन्होंने धीरे से तीन वेटर आगे कर दिए। बोले इन तीनों पर कार्रवाई कर केस को रफा दफा कर दीजिए। पुलिस भी रहस्यमय वजह से तीनों गऱीबों को उठाकर ले गई और कार्रवाई कर दी। तीनों वेटर मिन्नते करते रहे। हाथ पैर जोड़ते रहे, लेकिन थानेदार को गरीब पर कार्रवाई करते हुए रहम नहीं आई। उन्होंने आयोजक और फार्म हाउस मालिक को पकड़ा ही नहीं। यह कार्रवाई राजधानी में बहुत चर्चा है कि गरीब का कोई नहीं होता। अब इसमें कोई रहस्य तो है नहीं।
दुबारा जगह कैसे बने?
जगदलपुर के पूर्व विधायक संतोष बाफना इन दिनों मायूस हैं। वजह यह है कि पार्टी नेता उन्हें तव्वजो नहीं दे रहे हैं। पिछले दिनों जगदलपुर में चुनाव प्रभारी नितिन नबीन सहित कई नेताओं का प्रवास हुआ लेकिन किसी ने उनकी पूछ परख नहीं की।
दरअसल, विधानसभा टिकट कटने पर खुले तौर तेवर दिखाए थे और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी किरण देव का प्रचार करने से मना कर दिया। और पूरे चुनाव में जगदलपुर से बाहर रहे। अब परिस्थितियां बदल चुकी है। किरण देव, संतोष बाफना के विरोध के बाद भी चुनाव जीतने में कामयाब रहे। और अब वो प्रदेश भाजपा की कमान संभाल रहे हैं।
किरण के अध्यक्ष बनने के बाद संतोष बाफना के लिए जगह नहीं बन पा रही है। उन्होंने पिछले दिनों पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के साथ अपना दर्द बयां किया। चंद्राकर ने उन्हें समझाइश दी कि उन्हें किसी से पूछे बिना प्रचार करना चाहिए। पहले पार्टी चाहती थी तो वो प्रचार से दूर हो गए थे अब लोकसभा में पार्टी का काम करना चाहते हैं तो पार्टी को उनकी परवाह नहीं है।
बड़ी नेत्री कहने का मतलब...
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चुनाव प्रचार के दौरान किसी-किसी प्रत्याशी के बारे में कह देते हैं- इन्हें जिताएं, बड़ा आदमी बनेगा, भविष्य उज्ज्वल है। विधानसभा चुनाव के दौरान अमित शाह ने प्रत्याशी ओपी चौधरी के बारे में कहा था- इन्हें जिताइये बड़ा आदमी बनेंगे। कोरबा में प्रचार के दौरान प्रत्याशी लखन लाल देवांगन के बारे में कहा था, इन्हें जितायें, इनका भविष्य उज्ज्वल है। सरकार बनने के बाद हालांकि चौधरी को लेकर चर्चा डिप्टी सीएम की थी पर वित्त जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला। इसी तरह देवांगन के पास भी उद्योग, श्रम, वाणिज्य जैसे बड़े विभाग हैं। अब लोकसभा प्रत्याशी सरोज पांडेय के लिए कटघोरा में सभा लेने के दौरान शाह ने कहा है- लोग विकास के लिए हमारे नेता को बड़ा बनाइये, आपके यहां तो जो उम्मीदवार हैं, वह पहले से ही बड़ी नेत्री हैं। भाजपा कार्यकर्ता कह रहे हैं कि यह इशारा है कि केंद्र में यदि फिर भाजपा की सरकार बनीं और सरोज पांडेय जीत गईं तो उन्हें मंत्रिमंडल में लिया जाएगा। मगर, दूसरी ओर कुछ लोग कह रहे हैं कि पांडेय को बड़ी नेत्री तो पहले ही मान लिया गया है, और बड़ा बनाएंगे यह तो नहीं कहा। ([email protected])
बिना जुर्म काम मुमकिन
छत्तीसगढ़ में एक ताजा गिरफ्तारी भारतीय संचार सेवा के एक बड़े अफसर, मनोज सोनी, की हुई है, जिन्हें ईडी ने 140 करोड़ के कस्टम राईस मिलिंग घोटाले में गिरफ्तार किया है। मनोज सोनी मार्कफेड में एमडी थे, और यह घोटाला उसी समय का बताया जा रहा है। उनके पहले कुछ आईएएस अफसर भी अलग-अलग घोटालों में ईडी के गिरफ्तार किए हुए जेल में हैं। इनमें कोरबा में कलेक्टर रही रानू साहू भी एक हैं। कोरबा में किरण कौशल भी कलेक्टर थीं, और बाद में वे मार्कफेड में एमडी भी रहीं। इन दोनों ही कुर्सियों पर उनके बाद बैठने वाले लोग जेल में हैं, लेकिन किरण कौशल पर आंच नहीं आई है। ये सारी ही नियुक्तियां भूपेश सरकार के समय की है, मतलब यह कि मुख्यमंत्री के नाम पर सौम्या चौरसिया राज चल रहा था। लेकिन न तो कोरबा कलेक्टर रहते, और न ही मार्कफेड एमडी रहते किरण कौशल ने अपने हाथ जलाए। नतीजा यह है कि जब उनके बाद इन कुर्सियों पर आने वाले लोग जेल में हैं, वे ईडी के छापों से मुक्त अपना सामान्य कामकाज कर रही हैं। यह समझने की जरूरत है कि सत्ता के किसी दबाव के बाद भी अफसर बिना जुर्म किए भी काम कर सकते हैं।
मार्कफेड की कुर्सी पर बैठे एमडी की लिस्ट देखें, तो किरण कौशल के बाद के दोनों एमडी अब जेल में हैं।
शादी समारोह में बच्चे की मौत
मार्च के पहले सप्ताह में दिल्ली से सटे गुरुग्राम के एक रेस्टोरेंट में डिनर के बाद माउथ फ्रेशनर खाने से पांच लोगों का मुंह जलने लगा और खून बहने लगा। उन्हें खाने के लिए ड्राई आईस दी गई थी। इस मामले में रेस्टोरेंट के मैनेजर की गिरफ्तारी हुई और दो अन्य लोगों के खिलाफ भी अपराध दर्ज किया गया। दक्षिण भारत के दावणगेरे का एक वीडियो बीते महीने वायरल हुआ था जिसमें एक बच्चे को धुएं वाला पदार्थ परोसा गया। पीने के बाद वह दर्द से चीखने लगा। उसे अस्पताल में इलाज के बाद बचा लिया गया था। एक आनंद मेले में बच्चे को स्मोक बिस्किट के नाम पर इसे खाने के लिए दिया गया था। अब राजनांदगांव के एक शादी समारोह में एक बच्चे ने ड्राई आईस खा ली। उसकी मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान मौत ही हो गई। पता चला है कि दूल्हा-दूल्हन की एंट्री के दौरान वीडियोग्राफी करते समय धुआं निकालने के लिए ड्राई आईस का इस्तेमाल किया गया था, जिसे बाद में खुले में फेंक दिया गया। गुरुग्राम और दावणगेरे के मामलों में कुछ नया और एक्साइटिंग आइटम खिलाने के उद्देश्य से ड्राई आइस का इस्तेमाल किया गया। राजनांदगांव में इंवेट मैनेजरों तथा समारोह की व्यवस्था देख रहे लोगों की लापरवाही सामने आई है। ड्राई आईस खाने की चीज नहीं है। यह पानी से नहीं बनता। बर्फ का तापमान सामान्य तौर पर माइनस 4 डिग्री सेल्सियस होता है तो ड्राई आइस का माइनस 80 डिग्री। बर्फ पिघलती है तो पानी बन जाती है लेकिन यह पिघले तो कार्बन डाय ऑक्साइड। वैसे तो औद्योगिक क्षेत्रों व मेडिकल स्टोर में इसका अधिक उपयोग है, पर शादी समारोहों में जहां फ्रिज नहीं होते, भोजन को ताजा रखने के लिए काम लाया जाता है। फोटोशूट में भी इसका उपयोग होता है जैसा राजनांदगांव में हुआ। शायद यह नई तरह की दुर्घटना अब आयोजकों को जिम्मेदार और मेहमानों को सतर्क रहने की सीख देगी।
एक प्रवेश की तैयारी?

भाजपा ने कल राजधानी में बुद्धिजीवी सम्मेलन आयोजित किया है। इसमें दो दर्जन से अधिक पेशेवर सीए, वकील, डॉक्टर, जैसे प्रोफेशनल्स ग्रुप के लोगों को आमंत्रित किया गया है। इसे संबोधित करने महाराष्ट्र के दिग्गज नेता विनोद तावड़े आ रहे हैं। यह हुई सामान्य सूचनात्मक खबर।
अब यह बता दें कि तावड़े राष्ट्रीय स्तर पर बनी उस समिति के संयोजक हैं जो भाजपा प्रवेश के इच्छुक अन्य दलों के राष्ट्रीय नेताओं की पड़ताल कर भगवा दुपट्टा पहनाती है। रायपुर आते ही उन्हें कांग्रेस की एक नेत्री राधिका खेरा को भगवा दुपट्टा पहनाने का अवसर मिलता दिख रहा है। कल ही अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बाद पार्टी छोडऩे की घोषणा कर चुकी हैं। और भाजपा ने प्रवक्ता केदार गुप्ता ने भी उन्हें कांग्रेसियों से बचने की सलाह देते हुए मोदी की गारंटी दी है कि छत्तीसगढ़ में उन्हें कुछ नहीं होगा।
एक हाथ दे दूसरे से ले
चुनाव में लाखों खर्च करने वाले नेता अब खर्च निकालने में जुट गए हैं। पिछले दिनों हमने इस जुगाड़ में सक्रिय रायपुर जिले के ही दो नेताओं की बात इसी कॉलम में की थी। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए पार्टी सूत्रों ने दुर्ग संभाग के नेताजी की जानकारी दी है। बताया गया है कि चुनाव में नेताजी को घर से तो एक लाख भी खर्च नहीं हुए होंगे। उनकी जीत में तन मन धन तीनों ही पार्टी ने ही लगाया था। लेकिन वे खर्च निकालने कोई चूक नहीं कर रहे। हाल में नेताजी एक सामाजिक कार्यक्रम में गए। समाज के जिला अध्यक्ष ने सामाजिक भवन निर्माण के लिए निधि से अनुदान मांगा। नेताजी मंच पर ही सौदेबाजी में उतर आए। हां, ना के बीच 50 हजार का सप्रेम भेंट मिलने के बाद ही 10 लाख के अनुदान की घोषणा कर मंच से उतरे। नेताजी ये लिए चुनाव में अहम भूमिका निभाने वाले यह अध्यक्ष अब बड़े नेताओं को सब बता रहा है।यह और कोई नहीं विधायक हैं।
भ्रष्टाचार का बीज
बीज निगम ने एक फर्म को हाइब्रिड बीज सप्लाई का काम दिया है, जिसके दस्तावेज ही संदिग्ध बताए जा रहे हैं। फर्म को उसके टर्नओवर से कई गुना अधिक का सप्लाई आर्डर दिया गया । इस फर्म का का तीन साल का टर्नओवर लगभग 31 लाख रुपये है और उसे 14 करोड़ का काम मिला है। इसे बीज निगम के निविदा विभाग में पदस्थ एक अधिकारी का कारनामा बताया जा रहा है। ये वही अधिकारी हैं, जो एक मामले में निलंबित हो चुके हैं।
जिस कंपनी को काम मिला है, उसके पास न ही कोई लाइसेंस है, न ही उसकी गुणवत्ता के लिए जरूरी मार्का का कोई अस्तित्व है इस पूरे मामले में हॉर्टिकल्चर के अंबिकापुर, सूरजपुर, कोरिया, बलरामपुर, कोंडागांव, जगदलपुर, बालोद, गरियाबंद के जिला स्तर के अधिकारियों ने भी सप्लाई में खूब मदद की। मामले की शिकायत उच्च स्तर के अधिकारियों तक पहुंची है गड़बड़ी करने वाले अब इस मामले में बीज की सप्लाई दिखाकर भुगतान की तैयारी में भी जुटे हैं।
भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण...

सात मई को छत्तीसगढ़ की शेष सात लोकसभा सीटों पर होने जा रहे मतदान में ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी हो, इसके लिए जागरूकता के कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले जशपुर जिले के प्रवासी मजदूरों को जिला प्रशासन की ओर से पोस्टकार्ड भेजा जा रहा है। इसमें काव्यमय निमंत्रण है। इन श्रमिकों से मतदान के लिए घर लौटने का आग्रह किया गया है। अब पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र और डाक विभाग के लिफाफे चलन में कम रह गए हैं। ऐसे में लगता है कि इसका अलग असर होगा। वरना श्रम विभाग के पास पंजीकृत प्रवासी श्रमिकों के मोबाइल नंबर भी हैं। इस निमंत्रण पत्र से यह भी पता चल रहा है कि कभी 15 पैसे में मिलने वाले पोस्टकार्ड का दाम अब 50 पैसे हो चुका है।
विधायक का नाम वसूली में !
स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट स्कूलों की उत्कृष्टता पर स्टाफ और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के चलते सवाल तो पहले से ही उठने लगे थे लेकिन अभनपुर से जो मामला सामने आया है उसने तो रही-सही कसर पूरी कर दी है। पालकों ने प्राचार्य टी लाल के खिलाफ उच्चाधिकारियों से शिकायत की। नवमीं कक्षा में पूरक आए बच्चों को पास करने के लिए उनसे 15 से 20 हजार रुपये मांगे गए। रुपये नहीं देने पर फेल करने की धमकी दी गई। शिकायत के मुताबिक प्राचार्य ने फोन पे से भी रुपये लेने में कोई झिझक महसूस नहीं की। इसी से लेन-देन की बातें पुख्ता हुई। यह भी पता चल रहा है कि जांच अधिकारियों से प्राचार्य ने कहा कि उन्होंने विधायक के लिए यह वसूली की है। किस विधायक के लिए? अभनपुर विधायक को साफ कर देना चाहिए कि प्राचार्य गलत बोल रहे हैं, क्योंकि सबसे पहले लोगों का ध्यान तो स्थानीय विधायक की तरफ ही जाएगा।
एकला चलने की सलाह
चर्चा है कि पूर्व मंत्री चंद्रशेखर साहू चुनाव प्रबंधन में अपनी भागीदारी चाहते हैं। साहू को विधानसभा टिकट नहीं दी गई थी। वो तीन बार विधायक, और एक बार महासमुंद से सांसद रहे हैं। रमन सरकार में मंत्री भी रहे। साथ ही चंद्रशेखर साहू पीएससी के सदस्य भी रहे हैं। संगठन में भी अहम जिम्मेदारी मिलती रही है। साहू प्रदेश किसान मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे। मगर वो कार्यकर्ताओं के पसंदीदा नहीं रहे।
चंद्रशेखर साहू को लेकर पार्टी के भीतर यह कहा जाता है कि जब भी वो पॉवरफुल रहे। उनका व्यवहार एकदम बदल जाता है। यही वजह है कि अभनपुर सीट से उनकी टिकट काटकर नए चेहरे इंद्र कुमार साहू को प्रत्याशी बनाया गया, तो कार्यकर्ताओं में स्वागत किया। इंद्र कुमार साहू कांग्रेस के ताकतवर नेता धनेन्द्र साहू को हराने में सफल रहे।
दूसरी तरफ, चंद्रशेखर साहू को संगठन में कोई जिम्मेदारी नहीं मिली है। उन्हें महासमुंद में प्रचार के लिए कहा गया था। महासमुंद का चुनाव निपटने के बाद रायपुर लोकसभा में अपनी भूमिका चाहते हैं। चर्चा है कि पार्टी के कई प्रमुख नेताओं से उनकी चर्चा हुई है। विधानसभा वार जिम्मेदारी बंट चुकी है। अब चंद्रशेखर साहू को सलाह दी गई है कि वो कार लेकर अकेले चुनाव प्रचार में निकल जाए।
उम्मीदवारों के खिलाफ मामले
चुनाव प्रचार के बीच में प्रत्याशियों के खिलाफ कई गड़े मुद्दे सामने आ जाते हैं। सरगुजा में कांग्रेस प्रत्याशी शशि सिंह के खिलाफ कथित तौर पर जमीन कब्जे का मामला उछला, तो भाजपा प्रत्याशी चिंतामणि महाराज के खिलाफ आत्मानंद स्कूल बनवाने के नाम पर अवैध वसूली का मामला सामने आ गया।
चिंतामणि महाराज लूंड्रा, और सामरी से विधायक रहे हैं। एक पत्र वायरल हुआ है जिसमें पंच-सरपंचों ने आत्मानंद स्कूल खोलने के लिए 51 हजार रूपए लेने का आरोप लगाया था। और इसकी शिकायत सीएम तक की थी। अब चुनाव में इसका कितना असर होता है, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद पता चलेगा।
इसमें नहीं, उपचुनाव में दिलचस्पी
कहावत है एक अनार सौ बीमार। मगर रायपुर दक्षिण में सौ नहीं 55 कम है। बाकी बचे 45 को 4 जून का इंतजार हैं। इनमें सांसद से लेकर पार्षद तक शामिल हैं।
लग रहा पहली बार विकल्प बनने का अवसर मिल रहा है। क्यों चूकें। सभी भैया को जिताने जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। भैया का बताया हर काम कर रहे। कोई काम छोटा या स्टेटस से कम नहीं मान रहे। गांव-गांव, गली- गली घूम रहे। खासकर दक्षिण क्षेत्र के मोहल्लों का तो कई राउंड का जनसंपर्क कर चुके हैं।
भले ही स्वयं का घर उस क्षेत्र में न आता हो। अब सबको भैया के इस्तीफे और दीपावली के आसपास उप चुनाव का। अब देखना यह है कि इन 45 में कौन भैया की पसंद होता है या सीट घर के लिए सुरक्षित रखते हैं। जो दावेदार नहीं वे भैया के करीबी एक महाराज को उपयुक्त और जिताऊ प्रत्याशी बताने लगे हैं।
हिलते-डोलते विधायक
एक विधायक की दिनचर्या, जनसंपर्क अभियान की खूब चर्चा है। पहली ही बार में चुनाव क्रैक करने वाले ये नए नवेले माननीय स्वयं के राजनीति में रमने की बात भी कहते हैं। इनके जनसंपर्क के तौर तरीके पर पटरी न बैठने से इनका एक सुरक्षाकर्मी पीएसओ ने तबादला ले लिया है। अमूमन ऐसा होता नहीं है।
सशस्त्र बल के जवान तो पीएसओ बनने जोड़ तोड़ करते हैं लेकिन यहां मामला उलट निकला। बताते हैं कि जनसंपर्क के दौरान विधायक जी क्षेत्र के जिस भी नेता, कार्यकर्ता के यहां जाते हैं, हिलते डुलते निकलते हैं। उसके बाद उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता है । वाई कैटेगरी के सुरक्षाधारी इन नेताजी के एक एक कर्मी छोडऩे लगें तो सुरक्षा एजेंसी की दिक्कतें बढ़ जाएंगी।
बूथ का हिसाब करोड़ों में !
चुनावी रैलियां, पोस्टर-बैनर, टीवी रेडियो के विज्ञापन पर खर्च तो अपनी जगह हैं मगर असल खर्चीला काम है अपने पक्ष के मतदाताओं को घरों से निकालकर मतदान केंद्र तक पहुंचाना। इसमें जिसे सफलता मिलती है, जीत का सेहरा उसके सिर पर बंधता है। इसीलिये हर गंभीर प्रत्याशी और दलों का लक्ष्य होता है कि बूथ को मजबूत किया जाए।
इंदौर के कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम का नामांकन वापस लेना और फिर भाजपा में शामिल होना इस समय चर्चा में है। कांग्रेस छोडऩे की वजह तो उन्होंने भी दूसरे कांग्रेसियों की तरह सनातन धर्म के प्रति निष्ठा को बताया है, लेकिन छन कर कुछ दूसरे कारण भी सामने आए हैं। इनमें से एक है, मतदान के दिन बूथ पर खर्च कितना किया जाए। अक्षय कांति करोड़पति हैं। पार्टी को शायद उम्मीद थी कि चुनाव का सारा खर्च वे बिना झिझक उठाएंगे। उन्हें वोटिंग के दिन बूथ पर होने वाले खर्च के बारे में भी बता दिया गया। पहले कहा गया कि चार एजेंटों के लिए 6000 रुपये और इतना ही खर्च लगभग 30 कार्यकर्ताओं के भोजन पानी के लिए। यानि एक बूथ पर सिर्फ मतदान के दिन 12 हजार रुपये खर्च। इंदौर में लगभग 2500 बूथ हैं। मतलब करीब 3 करोड़ रुपये। कहा जाता है कि इसके बाद प्रत्याशी को बताया गया कि एजेंट 6000 में नहीं मिल रहे हैं, उनको 10 हजार देना पड़ेगा। प्रत्याशी सोच में पड़ गए। खर्च करीब 4 करोड़ पहुंच रहा था। वह सीट जहां से कांग्रेस पिछले 40 सालों से हारती रही है, शायद प्रत्याशी को इतनी रकम बहा देना सही सौदा नहीं लगा।
बूथ मैनेजमेंट बहुत संवेदनशील मामला होता है। अधिकांश प्रत्याशी अपना बूथ मैनेजमेंट खुद ही देखते हैं। एजेंटों तक पैसे सही तरीके से बांटे जाएं इसके लिए विश्वासपात्र लोगों की ड्यूटी लगाई जाती है। क्योंकि, इसमें कई बार अमानत में खयानत हो जाती है। प्रत्याशी खर्च करने के बावजूद चुनाव नहीं निकाल पाता।
इंदौर के मामले ने एक अंदाजा लगाने का मौका दिया है कि आखिर प्रत्याशियों का खर्च चुनाव आयोग की निर्धारित सीमा से अधिक कैसे पहुंच जाता है। अपने छत्तीसगढ़ में तीसरे चरण में जिन सात सीटों पर चुनाव हो रहे हैं उनमें भी हर एक सीट पर 22-23 सौ मतदान केंद्र हैं। इंदौर से कुछ कम ज्यादा यहां भी उतना ही खर्च होना है। जब कोई पार्टी किसी प्रत्याशी को मजबूत बताकर मतदान में उतारती है तो मजबूती का मतलब उसकी वित्तीय मजबूती भी होती है।
गुड़ाखू और चेपटी की चिंता
पब्लिक मीटिंग में भीड़ को स्टार प्रचारक के आते तक रोके रखने के लिए कवासी लखमा काफी हैं। 29 अप्रैल को सकरी में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सभा से पहले उन्होंने मंच संभाला। शुरुआत में प्रधानमंत्री की नकल करते हुए- भाइयों और बहनों...। फिर भाजपा सरकार की महतारी वंदन योजना पर बोलने लगे। कहा- एक हजार रुपये तो महीने का गुड़ाखू और चेपटी ( देसी शराब की छोटी बोतल) भी नहीं मिलती। मोदी की गारंटी पर कहा- एक गारंटी जरूर है, वह है बीवी छोडऩे की। लखमा ने और भी बातें की जिन पर विवाद भी हो सकता है इसलिये इतना ही ठीक है।
लकड़ी का चॉपर...

पेड़ को तराशे गए लकड़ी के हेलीकॉप्टर की इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर डालने वाले कुछ लोगों ने बताया कि यह बस्तर का है। सर्च करने पर पता चलता है कि दुनिया भर में इस तस्वीर और संबंधित वीडियो को ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर शेयर किया जा रहा है। कुछ ने दावा किया है कि ओरिजनल वीडियो नेशनल जियोग्राफिक चैनल ने रिलीज की है। कुछ का कहना है कि यह वास्तविक नहीं है, एआई से तैयार किया गया है। यदि सचमुच एआई से तैयार किया गया हो तो बुरी बात नहीं है। कम से कम इसमें डीपफेक का मामला तो नहीं बनता, जिसने इन दिनों नामी हस्तियों को परेशान कर रखा है। जो भी हो, जहां के भी बच्चे हों-प्रकृति की गोद में वे खुश दिखाई दे रहे हैं और जो लोग तस्वीर को देख रहे हैं, उनका भी मन खिल रहा है। ([email protected])
व्यापारी और छापेमारी
प्रदेश की 7 सीटों पर चुनाव प्रचार रफ्तार से चल रहा है। कांग्रेस, और भाजपा के प्रत्याशी सभा-सम्मेलनों में शिरकत कर रहे हैं। इन सबके बीच सरगुजा में भाजपा ने व्यापारी सम्मेलन रखा था। पिछले कई दिनों से सम्मेलन को सफल बनाने कोशिशें चल भी रही थीं।
सम्मेलन की तैयारियों के बीच अंबिकापुर में आधा दर्जन व्यापारियों के यहां सेंट्रल जीएसटी का छापा डल गया। इससे व्यापारी नाखुश तो थे ही, लेकिन सम्मेलन में शामिल हुए। भीड़ के लिहाज से व्यापारी सम्मेलन काफी सफल रहा। सम्मेलन में भाजपा प्रत्याशी चिंतामणी महाराज के साथ ही प्रदेश के महामंत्री (संगठन)पवन साय ने शिरकत की।
सम्मेलन में छापेमारी को लेकर व्यापारियों का दर्द छलक ही गया। उन्होंने सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन जीएसटी से जुड़ी विसंगतियों को दूर करने की गुजारिश की। भाजपा के नेता व्यापारियों की उमड़ी भीड़ को देखकर खुश थे, क्योंकि विधानसभा चुनाव के ठीक पहले सम्मेलन में सौ व्यापारी भी नहीं आए थे। अब व्यापारियों का कितना समर्थन मिलता है, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
यहूदियों की याद !!!

पहले और दूसरे चरण का चुनाव निपटने के बाद भाजपा ने पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को रायपुर लोकसभा का जिम्मा दिया है। चंद्राकर बस्तर क्लस्टर के प्रभारी थे। इसमें कांकेर, बस्तर, और महासमुंद की सीट आती है। तीनों जगह चुनाव हो चुके हैं। ऐसे में पार्टी अजय चंद्राकर का उपयोग रायपुर, और अन्य सीटों पर कर रही है।
चंद्राकर का चुनाव प्रचार की शुरुआत में सिंधी समाज के नेताओं के साथ बड़ी बैठक की। इस बैठक में सिंधी समाज के संघर्ष को याद दिलाया, और सिंधियों की तुलना यहूदियों से की। उन्होंने कहा बताते हैं कि जिस तरह यहूदियों और फरीसियों को अपना वतन छोडक़र दर-दर भटकना पड़ा था। उसी तरह आजादी के बाद नेहरू-लियाकत समझौते के तहत सिंधी समाज को सिंध छोडऩा पड़ा।
उन्होंने हिंदुस्तान में आने के बाद संघर्ष किया, और विशेषकर व्यापारिक जगत में अपना अलग मुकाम हासिल किया। अजय की इतिहास पर अच्छी पकड़ है, और उन्होंने जब सिंधियों को उनके पूर्वजों के संघर्ष को याद दिलाया, तो कार्यक्रम में मौजूद समाज के लोगों ने खूब तालियां बजाई। अजय चंद्राकर ने सिंधी समाज के शत प्रतिशत मतदान पर जोर दिया।
राजधानी से नाखुश पायलट
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट रायपुर लोकसभा में कांग्रेस प्रत्याशी के चुनाव प्रचार से नाखुश हैं। उन्होंने एक बैठक में कह दिया कि रायपुर में तो कांग्रेस का माहौल ही नहीं दिख रहा है। जबकि रायपुर से जोरदार प्रचार होना चाहिए था, ताकि इसका असर आसपास की सीटों पर भी दिखे।
चर्चा है कि रायपुर लोकसभा प्रत्याशी विकास उपाध्याय, और मेयर एजाज ढेबर की बिल्कुल भी नहीं बनती। एक तरह से दोनों के बीच बोलचाल भी बंद है। ढेबर के करीबी पार्षद भी कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
पायलट ने हिदायत दी है कि सभी रायपुर नगर निगम के सभी 10 जोन में कार्यक्रम होना चाहिए। इन कार्यक्रमों में वो खुद भी शामिल होंगे। अब पायलट की फटकार का थोड़ा बहुत असर देखने को मिल रहा है। कुछ जगह पोस्टर लगना शुरू हो गया है। आगे किस तरह का प्रचार होता है, यह तो जल्द फैसला होगा।
बचाव के एवज में प्रस्ताव
पीएससी -21 में हुई अनियमितता के साथ अफसर नेता पुत्र,पुत्रियों और दामादों के चयन की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है। सीबीआई अफसर जांच शुरू करने ही वाले हैं। इसे देखते हुए चयनित और उनके परिजन अपने अपने तरीके से बचाव में लग गए हैं। हाल में चयनित पति-पत्नी, अपने पिता को लेकर पूर्व मंत्री और विधायक से मिलने गए। और अपने चयन को साफ सुथरा बताते हुए फंसा दिए जाने की बात कही। और विधायक जी से मदद मांगी । तीनों ने यहां तक कह दिया कि आप चाहो तो हम भाजपा में शामिल हो जाएंगे।
मॉडल ऑफ द स्टोरी, यह है कि क्या चयन में वाकई में लेनदेन हुआ था। क्या ये लोग अयोग्य रहे और चयन हो गया। या जमकर पेपर लीक या फिर इंटरव्यू बोर्ड में सेटिंग रही आदि आदि। और भाजपा में शामिल होने का ऑफर देकर क्या ये बच जाएंगे। जैसे कि इलेक्टोरोल बॉण्ड, और अन्य घोटाले वाले भाजपा में शामिल या चंदा देकर बच निकले, कहीं वैसा तो नहीं इरादा नहीं था। लेकिन इस जांच की गारंटी मोदी ने दी थी। इसलिए नेताजी ने कोई आश्वासन नहीं दिया।
सहज हैं पार्टी बदलने वाले?
दूसरे दलों, विशेषकर कांग्रेस छोडक़र जाने वालों में कई पूर्व विधायक और पंचायत तथा नगर-निगमों के मौजूदा पदाधिकारी शामिल हैं। अब ये भाजपा में तो आ गए हैं लेकिन उनको कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जा रही है। इन दिनों भाजपा के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री शिवप्रकाश प्रदेश के दौरे पर हैं। उन्होंने इस स्थिति को भांप लिया है।
चुनाव संचालकों और जिला अध्यक्षों को वे बैठकों में हिदायत दे रहे हैं कि जो नए लोग शामिल हुए हैं उनको भी सक्रिय किया जाए, काम दिया जाए। संगठन के सामने दुविधा यह है कि यदि नए-नए पार्टी में शामिल लोगों को अधिक वजन दिया गया तो वर्षों से पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं को अपनी उपेक्षा महसूस होगी। कांग्रेस से भाजपा में गए एक नेता का कहना है कि यहां काम करने का तरीका कांग्रेस से अलग है। जरूरी नहीं है कि हर बड़े कद का आदमी मंच पर बैठे, उन्हें सामने लगी कुर्सी में भी बैठना पड़ सकता है। दूसरी बात, पार्टी बदलने से पहले उन्होंने अपने समर्थक कार्यकर्ताओं से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया था। ऐसे बहुत से लोग हैं जो उनके फैसले से असहमत हैं। इनके बीच जाने में अभी संकोच हो रहा है।
राजधानी में चुनाव बहिष्कार

दूरदराज के गांवों में सडक़ पानी बिजली जैसी मूलभूत सुविधा की गुहार लगाते-लगाते लोग थक जाएं और विरोध में चुनाव बहिष्कार करने की चेतावनी दें तो बात वाजिब लगती है लेकिन राजधानी रायपुर में भी ऐसी हालत है। चंगोराभाठा इलाके के सत्यम विहार कॉलोनी के लोगों ने खराब सडक़, बेतरतीब बिजली पोल व जाम नालियों के मुद्दे पर चुनाव बहिष्कार का बैनर टांग दिया है। उनका कहना है कि सात-आठ साल हो गए वे इसी स्थिति में हैं। पार्षद, विधायक, सांसद सबसे फरियाद कर चुके, लेकिन समस्या हल नहीं हुई। सब नेता चुनाव के समय आते हैं-भैया, दीदी, माता, बोलकर हाथ जोड़ते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं। अब बहिष्कार के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। रायपुर को राजधानी होने के साथ-साथ स्मार्ट सिटी का दर्जा भी मिला हुआ है। एक तरफ नया रायपुर और रायपुर शहर की वीआईपी सडक़ें चकाचक दिखाई देती हैं तो दूसरी तरफ सडक़, नाली बदहाल हैं।
आ गया है बासी खाने का उत्सव

गर्मी के दिनों में बोरे-बासी खाना छत्तीसगढ़ के लोगों की आदत में शामिल है। इसे भले ही गरीबों का भोजन कहा जाए इसके फायदे से कोई भी तबका अनजान नहीं हैं। राजनीतिक फायदे के लिए ही सही, पिछली कांग्रेस सरकार ने जिन छत्तीसगढ़ी परंपराओं और आदतों को उभारा था, उनमें बोरे-बासी भी एक था। एक मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर खास तौर पर बोरे-बासी खाने का प्रदेशभर में अभियान चलता था। सोशल मीडिया पर लोग बासी-बोरे खाते हुए फोटो शेयर करते दिखे थे। क्या मंत्री, क्या विधायक, क्या कलेक्टर, क्या एसपी..सबकी सोशल मीडिया पर तस्वीरें आती रही हैं। अब प्रदेश में सरकार बदल चुकी है। लोग बासी-बोरे खाते हुए तस्वीरें भले ही न डालें, मगर पीढिय़ों से खाए जाने वाले बासी-बोरे की गुणवत्ता में सरकार बदलने से कोई बदलाव नहीं आया है। स्वाद और गुण वही है। रात में भिगोये भात का पानी सुबह निकालकर नया पानी डालें, जरूरत के मुताबिक नमक डालें- अचार, मठा या चटनी लें। प्याज खाते हों तो थोड़ा उसे भी डाल लें। फिर देखिये खाकर, स्वाद वही मिलेगा...। गर्मी में फायदेमंद भी है। सुनने में यह जरूर आया है कि कुछ जिलों के गढक़लेवा के मेनू से बासी-बोरे को हटाया जा चुका है। इसलिए इधर-उधर न भटकें। यह घर पर ही आसानी से तैयार हो जाता है।
तबादलों के पहले की खामोशी
राजधानी में कलेक्टोरेट को छोड़ दें तो बाकी प्रशासनिक दफ्तरों में खामोशी है। महानदी भवन से लेकर इंद्रावती भवन तक रूटीन की ही फाइलें दौड़ रही हैं। इसमें भी स्टाफ ज्यादा रुचि नहीं ले रहा है। आचार संहिता का बहाना बनाकर ज्यादा से ज्यादा काम को टालने की कोशिश हो रही है। अफसर भी इसलिए रुचि नहीं ले रहे हैं, क्योंकि दो माह बाद एक बार फिर फील्ड से लेकर मुख्यालयों में बदलाव होना है।
जो फील्ड पर हैं, वे अपनी पोस्टिंग बचाने या बेहतर पाने की आस में हैं और जो लूप लाइन में हैं, वे फील्ड पोस्टिंग की उम्मीद से हैं। इस बार तबादले परफार्मेंस बेस्ड होंगे। यानी 11 सीटों के नतीजों का नफा नुकसान देखा जाएगा। जहां हार होगी वहां के कलेक्टर, एडिशनल कलेक्टर, एसपी-एडिशनल एसपी को नवा रायपुर लौटना पड़ सकता है। सभी सीटें आने पर भी जिलेवार समीक्षा होगी, और कमजोर प्रदर्शन होने पर संबंधित जिला प्रशासन पर गाज गिरना तय है।
मे-डे, बदल जाएगी थाली
तीन दिन बाद अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस मे-डे मनेगा। यह दिन छत्तीसगढ़ में पिछले चार वर्षों तक नए अंदाज में मनता रहा है। अघोषित रूप से इसे बोरे बासी दिवस कहा जाने लगा था। यह नाम भी 2018 में सरकार बदलने के बाद कांग्रेस सरकार ने दिया था।
चार वर्ष तक गांव जंगल, महल झोपड़ी तक में अफसर-नेता ने सरकार को दिखाने के लिए बासी की थाली सजाते रहे। इसकी तैयारी महीने भर पहले से करते थे।
यह बासी मानो अफसरों के सीआर का हिस्सा जैसी रही। सबने खाया और सेल्फी सरकार तक पहुंचाया। अब यह बीते दिनों की बात हो गई। सरकार जो बदल गई है। परंपरा के दिखावे के चोचले से नई सरकार दूर है। वह असल में श्रम के सम्मान, कल्याण के लिए नई योजना लाने जा रही है। जिसका खुलासा आचार संहिता खत्म होने के बाद होगा।
दोनों उम्मीद से हैं
प्रदेश में पहले और दूसरे चरण की कुल 4 सीटों पर चुनाव हो चुके हैं। बाकी 7 सीटों पर 7 मई को मतदान होगा। दिल्ली में कांग्रेस के रणनीतिकार मानकर चल रहे हैं कि प्रदेश में कम से कम 4 सीट पर जीत हासिल होगी।
ये बात अलग है कि राज्य बनने के बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वर्ष-2019 में रहा है। तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, और 11 में से मात्र 2 सीटें जीत पाई थी। वह भी तब जब कांग्रेस सरकार ने किसानों का कर्ज माफ किया था। किसानों को बोनस और 25 सौ रुपए क्विंटल में धान खरीद हुई थी।
दूसरी तरफ, भाजपा के लोग मानकर चल रहे हैं कि प्रदेश में सभी सीटों पर कमल खिलेगा। मगर यह भी सच है कि वर्ष-2014 में मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी, तब भी कांग्रेस एक सीट झटकने में सफल रही थी। इस बार क्या होता है, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।
कामचलाऊ हिफाजत

वैसे तो दुपहियों पर बच्चों को किसी भी तरह से लेकर जाना कुछ हद तक खतरनाक होता ही है, लेकिन मध्यम वर्ग या निम्न-मध्यम वर्ग की मजबूरी रहती है कि बच्चों को कहीं साथ ले जाना है, तो या स्कूटर पर सामने खड़ा किया जाए, या मोटरसाइकिल की टंकी पर बिठाया जाए, या पीछे बिठाकर अपना बड़ा सा पेट उनकी छोटी बांहों के घेरे में कुछ हद तक थमा दिया जाए। लोग अपने-अपने हिसाब से तय करते हैं कि कम खतरनाक क्या है। कई मामलों में तो आगे या पीछे बिठाए गए बच्चे हवा लगने से सो भी जाते हैं, और उन पर बहुत बड़ा खतरा रहता है। ऐसे में आज रायपुर के जयस्तंभ चौक पर दिखा यह नजारा थोड़ी सी सावधानी बताने वाला है कि पीछे बिठाए बच्चे को चुन्नी या गमछे सरीखे किसी कपड़े से दुपहिया चला रहे व्यक्ति ने अपने पेट से बांध रखा है। अब यह कानूनी रूप से सबसे महफूज बात तो नहीं है लेकिन कुछ हद तक सुरक्षा तो इससे मिली ही है। तस्वीर/ ‘छत्तीसगढ़’
बस्तर भी कोई छिपने की जगह है?
बस्तर को लेकर बाकी लंबे समय से धारणा रही है कि यह अबूझ इलाका है। पर्यटन के अनेक ठिकाने हैं, पर नक्सलियों का हर तरफ खौफ है। बाकी देश दुनिया से यह कटा हुआ इलाका है। मुंबई के अभिनेता साहिल खान ने जब मुंबई पुलिस के शिकंजे से बचने के लिए जगदलपुर में छिपने का इरादा बनाया तो शायद उसके दिमाग में यही बात रही होगी। कहा जा रहा है कि मुंबई एसटीएफ टीम ने उसे कथित रूप से महादेव सट्टा ऐप में संलिप्त होने की वजह से गिरफ्तार किया। जिस छत्तीसगढ़ की गली-गली में महादेव सट्टा ऐप जाना पहचाना नाम हो चुका हो, वहां की कोई भी जगह सुरक्षित कैसे रहेगी? छत्तीसगढ़ से तो इससे जुड़े आरोपी फरार हैं। कुछ दिन पहले कोलकाता से छत्तीसगढ़ पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया। छत्तीसगढ़ के लिए वे वहीं से सट्टा ऑपरेट कर रहे थे। एक्ट्रेस तमन्ना भाटिया के बाद हाल के दिनों में यह मुंबई पुलिस की दूसरी गिरफ्तारी है। हालांकि इसके सरगना बताये जाने वाले मुकेश चंद्राकर की दुबई में हुई शादी में बॉलीवुड के एक से एक नामी सितारों ने परफॉर्मेंस दिया था। इन पर यह भी आरोप लगा कि उन्होंने अपनी फीस हवाला के जरिये भारत में नगदी में हासिल की। इनमें से कई लोगों से पूछताछ हो चुकी है पर कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। शायद, जांच एजेंसियां मान रही हो कि सट्टा के कारोबार से उनका सीधा संबंध नहीं है। जबकि तमन्ना भाटिया की तरह साहिल खान पर भी आरोप लगा है कि उन्होंने महादेव बेटिंग ऐप को प्रमोट किया।
कितनी चर्चा चाहिए विधायक को?
विधायक रिकेश सेन सैलून में बाल काटते हुए दिखे थे तब चर्चा हुई। फिर, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत के मोदी के खिलाफ दिए गए बयान पर कंह दिया कि कोई भी उनके परिवार के बाल नहीं काटेगा। (बाद में उनकी इस चेतावनी को समाज के दूसरे नेताओं ने खारिज कर दिया।) इसके बाद वे एक गार्डन में पहुंच गए, जहां युवक-युवतियों को साथ बैठकर समय बिताने पर उन्होंने ऐतराज किया। मगर, ऐसा लगता है कि वे इतनी चर्चा और विवादों से संतुष्ट नहीं हैं। बीते हनुमान जयंती के दिन कथित रूप से उन्होंने धर्मांतरण कराने वालों के बारे में कहा कि उनका सिर काट देना चाहिए। उनके इस बयान की कांग्रेस ने निंदा की है, पर भाजपा में चुप्पी है। बस, इतना ही है कि पहले के बयान और गतिविधि उकसाने वाले नहीं थे। कांग्रेस ने तो चुनाव आयोग से शिकायत करने की बात कही है, पर असल मुद्दा यह है कि उनकी पार्टी इस मामले को किस तरह लेती है।
संतुलन के साथ सफर

तरबूज इन दिनों बाजार में खूब आ रहे हैं। इसे हाथ में पकड़े-पकड़े कैसे ले जाना मुश्किल काम है। पर, ऐसा नहीं सोचेंगे यदि आप सचमुच सिर पर बोझ उठाने के लिए तैयार हो जाएं। पेंड्रा से अमरकंटक की ओर जाते हुए यह तस्वीर प्रिया महाडिक ने ली है। ([email protected])
उम्मीदें बहुत हैं...
वो दिन हवा हो गए, जब रायपुर कलेक्टोरेट में अफसर साढ़े 5 बजे के बाद बस्ता बांध लिया करते थे। मगर हाल के दिनों में उन्हें अलर्ट रहना होता है। पता नहीं कब साब (कलेक्टर) का फोन आ जाए। कलेक्टर डॉ. गौरव कुमार सिंह कलेक्टोरेट की साख को बेहतर करने की कोशिश में जुटे हैं, जहां पिछले बरसों में काफी गिरावट आई है। उनके कुछ पूर्ववर्तियों को लेकर काफी बुरी चर्चाएं होती है।
मध्यप्रदेश के समय में बतौर कलेक्टर रहे अजीत जोगी, सुनिल कुमार, डीआरएस चौधरी, देवराज सिंह विरदी, और फिर राज्य बनने के बाद अमिताभ जैन, विवेक देवांगन, सुबोध सिंह, व ओपी चौधरी ने बेहतर कार्यशैली से लोगों के बीच में अलग ही छवि बनाई थी। दूर-दराज से आए लोग काम न होने पर भी संतुष्ट होकर लौटते थे। मगर पिछले बरसों में कलेक्टरों की कार्यशैली ऐसी रही है कि आम आदमी तो दूर मातहत ही परेशान रहे हैं। ऐसे में डॉ.गौरव कुमार सिंह से काफी उम्मीदें दिख रही है।
गौरव को आए कुछ ही समय हुए हैं, लेकिन उन्होंने थोड़े समय में ही अलग ही कार्यशैली का परिचय दिया है। पदभार संभालने के बाद वो प्रयास विद्यालय जाकर वहां आईआईटी, जेईई, और नीट की तैयारी में जुटे विद्यार्थियों के साथ खाना खाया, और तमाम व्यवस्थाओं की बारीकियों से अवगत हुए। जाति प्रमाणपत्र और राशनकार्ड सहित अन्य के लिए इधर-उधर न भटकना पड़े, यह सुनिश्चित भी किया है।
उन्होंने मातहतों साफ तौर पर निर्देश दिए हैं कि बेवजह किसी को भटकना न पड़े, इसके लिए हरसंभव कोशिश करें। वो खुद भी ऑफिस के पूरे वक्त काम करते दिख रहे हैं। पिछले दिनों गुढिय़ारी में पॉवर कंपनी के भंडारगृह में आग लगी तो वो जख्मी हो जाने के बावजूद मौके पर डटे रहे, और तडक़े आग बुझने के बाद घर गए। फिर तीन-चार घंटे बाद वापस आकर आगजनी से प्रभावितों को मदद करवाई।
11 में 11, या दो कम बता रहे
आजकल विट्री साइन दिखाने वाले नेताजी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से पोस्ट हो रही हैं। ऐसे ही भाजपा के एक नेताजी की तस्वीर जब सोशल मीडिया पर आई तो उनके समर्थक ने पूछ लिया, भैयाजी 11 में 11 सीटें जीतने का दावा है, ? या फिर से दो कम होने का संकेत दे रहे हैं। नेताजी ने पहले तो 11 में 11 जीतने का दावा किया, फिर धीरे से कहा कि एक-दो सीटें कमजोर हैं। हो सकता है कि पुराना रिजल्ट ही आए।
कामकाज ऐसे ही

तबादले के बाद ही हर पिछले अफसर की वर्कएफिशिएंसी पता चलती है। यह आंकलन और कोई नहीं विभाग के मातहत क्लर्क, सेक्शन इंचार्ज, अंडर सेक्रेटरी जैसे मातहत ही करते हैं। हाल में कुछ मंत्रालयीन मातहत लंच पर अपने साहबों की वर्किंग स्टाइल के चटखारे ले रहे थे। वित्त वाले ने कहा कि अब जाकर फाइलों से भरी आलमारियां खाली हुईं हैं। मैडम तो हर फाइल आलमारी में पैक करवाते जा रहीं थीं। यहां कि उन्होंने डीए देने का औचित्य पूछकर उस फाइल को भी बंद कर दिया था। शिक्षा विभाग वाले ने कहा कि पुराने साहब तो बहुत ही सोफेस्टिकेटेड थे। वे सीएम के भी सचिव रहे हैं । जो सीएम के आदेश होते वही फाइल करते। नए साहब एक एक फाइल पढक़र अपनी नोटिंग के साथ मंत्री की नोटिंग पर भी ओवर राइटिंग करते हैं । हमारे यहां भी फाइल डिस्पोजल तेज हो गया है । यही मैडम रहीं तो हर फाइल आलमारी में होती थी। इस पूरे वाकए का लब्बोलुआब यह निकला कि सरकारी कामकाज ऐसे ही चलता है ।
बालोद में योगी निकले वोट देने..

मतदान के दौरान कई दिलचस्प नजारों में एक दिखा कांकेर लोकसभा क्षेत्र के बालोद में। यहां के एक मतदाता राजेश चोपड़ा की शक्ल यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलती-जुलती है। वे कल मतदान के लिए उनकी ही गेटअप में वोट देने के लिए सपत्नीक पोलिंग बूथ पहुंचे। चोपड़ा उन लाखों लोगों में से एक हैं, जो आदित्यनाथ को महान व्यक्तित्व का धनी मानते हैं।
बैंक बैलेंस नहीं, हौसला देखिये

नामांकन फॉर्म के साथ सभी लोकसभा प्रत्याशियों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा भी दिया है। इससे पता चलता है कि ज्यादातर उम्मीदवार करोड़पति, लखपति हैं। पर मैदान में एक निर्दलीय महिला प्रत्याशी ऐसी भी है, जिसका ब्यौरा जानकर कोई भी हैरान हो सकता है। कोरबा सीट से निर्दलीय लड़ रही शांति बाई मरावी ने जो विवरण दिया है, उसके मुताबिक उनके दो बैंक खाते हैं। एक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का, जिसमें सिर्फ दो हजार रुपये जमा है। बैंक ऑफ बड़ौदा की पेंड्रा ब्रांच में भी एक दूसरा खाता है, मगर उसमें एक रुपये भी नहीं है। उसके पास 1.5 एकड़ कृषि भूमि है, 10 ग्राम सोना और 50 ग्राम चांदी है। हाथ में नगदी सिर्फ 20 हजार रुपये है।
यह पता नहीं कि उसका नाम गरीबी रेखा की सूची में शामिल है या नहीं पर करोड़पति उम्मीदवारों के बीच मैदान में उतरने का फैसला किस उद्देश्य से उसने लिया? यह जानने के लिए जब लोगों ने उनके मोबाइल नंबर पर कॉल किया तो फोन बंद मिला। कुछ लोग उनको ढूंढते हुए घर के पते पर पेंड्रा भी पहुंच गए, पर वहां ताला लटका मिला। अब लोग अटकल लगा रहे हैं कि शांति मरावी ने गंभीरता से चुनाव लडऩे के लिए नामांकन भरा है या फिर उम्मीदवारों की सिर्फ संख्या बढ़ाने के लिए। कितने मतदाताओं तक वह पहुंच पाएंगीं, यह बाद की बात है पर अभी उनकी लोगों में खासी चर्चा तो ही रही है।
चुनावी मुद्दा नहीं बना स्टेडियम

अंबिकापुर में 24 अप्रैल को हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी आमसभा से पहले एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। शहर के बीच स्थित महात्मा गांधी स्टेडियम में मोदी को उतारने के लिए हेलीपैड बना दिया गया। नगर निगम के महापौर अजय तिर्की और पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने इसका विरोध किया। कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा गया। बताया गया कि शहर के छात्रों और युवाओं के लिए खेलने की यह एकमात्र जगह है, हेलीपैड बनाकर इसे बर्बाद किया जा रहा है। महापौर का कहना था कि नगर-निगम के पास इतनी राशि नहीं है कि दोबारा इसे ठीक कर सके। प्रशासन पेशोपेश में पड़ गया कि कहीं चुनाव के मौके पर यह कोई मुद्दा न बन जाए। अंतिम समय में हेलीकॉप्टर उतारने की जगह भी नहीं बदली जा सकती थी, क्योंकि एसपीजी ने इसी जगह को क्लीयरेंस दी थी। विरोध के बावजूद हेलीपैड वहीं बनाया गया। यह जरूर हुआ कि मोदी के जाने के तुरंत बाद मैदान की मरम्मत शुरू कर दी गई और शनिवार को इसे पहले जैसा कर दिया। प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाई, भाजपा को राहत मिली कि यह उसके खिलाफ मुद्दा नहीं बना।
मतदान पर्व पर छूट के ऑफर
मतदान का प्रतिशत बढऩे से संबंधित जिले के निर्वाचन अधिकारियों को आयोग की शाबाशी मिलती है। सामाजिक संगठनों, युवाओं, महिला समूहों के बीच स्वीप के जरिये छत्तीसगढ़ में लोगों को जागरूक करने का अभियान इन दिनों हर जिले में चल रहा है। इसके लिए कई नारों में एक यह भी है- मतदान का पर्व, देश का गर्व।
दो विधानसभा क्षेत्रों बिलासपुर लोकसभा की कोटा सीट और कोरबा लोकसभा की मरवाही सीट में बंटे जीपीएम (गौरेला-पेंड्रा-मरवाही) में लगेगा कि यहां मतदान सिर्फ नाम का पर्व नहीं है। सचमुच पर्व जैसा मनाएं, ऐसी तैयारी हो रही है। दशहरा दिवाली पर बाजार निकलें तो जगह-जगह छूट के ऑफर दिखाई देते हैं। इस बार यही ऑफर वोट देने पर मिलने वाला है। जिले के चेम्बर ऑफ कामर्स ने बीते दिनों बैठक ली और उसके बाद घोषणा की है, मतदान करने वालों को खरीदारी में 10 प्रतिशत की छूट दी जाएगी। इससे जुडऩे वाले दुकानों की घोषणा भी जल्द कर दी जाएगी। इस जिले में 7 मई को मतदान है। इसके बाद मतदाता पहचान पत्र और उंगली की स्याही दिखाकर सामानों में छूट हासिल कर सकते हैं।
वैसे यह आइडिया अकेला नहीं है। देश की जिन 88 सीटों में 26 अप्रैल को मतदान हुआ है उनमें से एक राजस्थान की जोधपुर लोकसभा सीट भी है। वहां के एक मुख्य बाजार में भी इसी तरह की छूट देने की खबर चल रही है। लेकिन, खास तौर पर जिक्र कर होना चाहिए ‘सोशल’ नाम के एक फूड चेन, रेस्तरां का। यहां वोट डालकर पहुंचने वालों को अगले 24 घंटे तक एक मग बीयर फ्री मिलेगी और उससे ज्यादा जो खायेंगे-पियेंगे तो उसमें 20 प्रतिशत का डिस्काउंट मिलेगा। कुछ मतदाताओं को यह जानकर अफसोस हो सकता है कि इस रेस्तरां की कोई ब्रांच छत्तीसगढ़ में नहीं है। सिर्फ नोएडा, बेंगलूरु, हैदराबाद, पुणे, इंदौर, मुंबई, दिल्ली एनसीआर, चंडीगढ़ और कोलकाता के मतदाता इसका फायदा ले सकते हैं।
रुक-रुक कर उभरती आहत भावना

कांग्रेस से जितने भी इस्तीफे हो रहे हैं उनमें कई दूसरे कारणों के अलावा प्राथमिकता के साथ यह जरूर दर्शाया जा रहा है कि पार्टी ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन का निमंत्रण ठुकराकर गलत किया। इस कदम से हिंदुओं की भावनाओं को कुचला गया। छत्तीसगढ़ किसान कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रामविलास साहू ने कल अपने पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को भेजे गए पत्र में भी उन्होंने पार्टी छोडऩे के कई कारणों में सबसे पहला यही बताया है।
राम मंदिर की स्थापना 22 जनवरी को हुई थी। इस घटना को अब तीन माह से अधिक बीत चुके हैं। इसके पहले ही कांग्रेस नेतृत्व ने उद्घाटन समारोह का निमंत्रण ठुकरा दिया था। पर, ऐसा लगता है कि कांग्रेस छोडऩे वालों की भावनाएं तत्काल आहत नहीं हुई। धीरे-धीरे हो रही है। और यदि भावनाएं आहत उसी वक्त हो गई थीं, उसके बावजूद पार्टी नहीं छोड़ पाए थे, तो यह बहुत बड़ी बात है। पार्टी के फैसले से वे नाराज थे, उसके बावजूद बने रहे। दिलचस्प यही देखना होगा कि मतदान के तीनों चरणों के निपट जाने के बाद कितने लोग कांग्रेस को छोड़ेंगे।
बयानों से समझिए चुनावी रुझान
हाल ही में कांग्रेस-भाजपा के कुछ नेताओं के वीडियो सामने आए हैं, जिसमें उनके तल्ख अंदाज की आलोचना हो रही है। महानदी,इंद्रावती भवन में बैठे कुछ आईएएस अफसर और मीडियाकर्मियों के बीच जब रुझान को लेकर चर्चा हुई तो वहां मौजूद एक अफसर ने कहा कि बयानों से समझिए कि किसकी हालत टाइट है। एक नेताजी ने मीडियाकर्मी से ही दुर्व्यवहार किया तो दूसरे का समाज के लोगों के साथ बातचीत का तल्ख रवैया सामने आया है। इन दोनों ही जगहों पर प्रत्याशियों की हालत मुश्किल बताई जा रही है।
कबाड़ में जुगाड़
एक नए नवेले विधायक महोदय कबाड़ में जुगाड़ खोज रहे है। आमदनी के लिए पुलिस वालों पर दबाव बना रहे है कि उनके इलाके में कबाड़ चलने दिया जाए। अवैध शराब बेचने वालों पर कार्रवाई न करें। यार्ड में छापा न करें। रेत की गाडिय़ों को न रोकें। इससे पुलिस और प्रशासन वाले परेशान हो गए हैं क्योंकि सरकार का दबाव है कोई भी गैर कानूनी काम नहीं होना चाहिए। पिछली सरकार की तरह सिस्टम नहीं चलेगा। लेकिन नए नवेले विधायकों को इससे कोई मतलब नहीं। वे तो सिर्फ अपने जुगाड़ में लगे हुए। इलाके के छोटे छोटे ठेकेदार भी परेशान हैं।
चिंतामणि की चिंता

सरगुजा सीट से भाजपा प्रत्याशी चिंतामणि महाराज को अजीब स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के कई स्थापित नेता उन्हें नापसंद कर रहे हैं। इसका नजारा कई जगह देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री के स्वागत के बैनर-पोस्टर से चिंतामणि महाराज गायब रहे।
दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री, चिंतामणि महाराज के पक्ष में सभा लेने आए थे। दरअसल, कांग्रेस से आए चिंतामणि महाराज को प्रत्याशी बनाना पार्टी के कई नेताओं को नहीं पसंद आ रहा है। चिंतामणि महाराज को इसका अंदाजा भी है। यही वजह है कि वो स्थापित नेताओं के बजाय अपनी खुद की टीम पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। इन सबके बावजूद कांग्रेस बहुत ज्यादा फायदा उठा पाने की स्थिति में नहीं दिख रही है। पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव प्रदेश से बाहर हैं। और दूसरे ताकतवर नेता अमरजीत भगत भी ज्यादा सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में क्या होगा, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद पता चलेगा।
रेणुका से पूछताछ
पीएम नरेंद्र मोदी ने अंबिकापुर में सभा के बाद पूर्व केन्द्रीय मंत्री रेणुका सिंह से कुछ देर अलग से चर्चा की, तो वहां कानाफूसी शुरू हो गई। रेणुका सिंह को भरतपुर-सोनहत विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया था। रेणुका सिंह को जीत के बाद सीएम का दावेदार माना जाने लगा था। मगर सीएम बनना तो दूर मंत्री बनने से भी रह गईं।
सुनते हैं कि पीएम ने रेणुका सिंह से सरगुजा, रायगढ़ और कोरबा लोकसभा का हाल जाना। चर्चा है कि विधानसभा चुनाव के वक्त भी अंबिकापुर प्रवास के दौरान पीएम ने ग्राम दतिमा हेलीपेड पर रेणुका सिंह से चुनाव की स्थिति को लेकर चर्चा की थी।
रेणुका सिंह ने उन्हें बताया था कि सरगुजा संभाग की 14 में से 12 सीटें भाजपा जीत सकती हैं। चुनाव नतीजे रेणुका के अनुमान से भी बेहतर रहा, और सभी 14 सीटें भाजपा की झोली में चली गई। इस बार भी उन्होंने पीएम को तीनों लोकसभा सीटों को लेकर आश्वस्त किया है। देखना है कि तीनों सीटों के नतीजे रेणुका सिंह के अनुमान के मुताबिक आते हैं, या नहीं।
नड्डा-योगी की सभाओं का हाल !

भाजपा के स्टार प्रचारकों की ताबड़तोड़ सभाएं हो रही है। अब तक पीएम नरेंद्र मोदी की 4 सभाएं हो चुकी है। इसके अलावा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, अमित शाह, और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की तीन-चार सभाएं हो चुकी है। इनमें से नड्डा, और योगी आदित्यनाथ की एक-एक सभा को छोडक़र बाकियों में अच्छी खासी भीड़ जुटी है।
नड्डा की दुर्ग, रायपुर के चंदखुरी, और बिलासपुर में सभा थी। चंदखुरी, और बिलासपुर तो भीड़ के लिहाज से सफल रही, लेकिन दुर्ग की सभा में डेढ़ हजार लोग भी नहीं थे। 90 फीसदी कुर्सियां खाली रही। इससे नड्डा भी खफा हो गए, और चर्चा है कि प्रदेश संगठन ने स्थानीय नेताओं को तलब भी किया है।
कुछ यही हाल योगी आदित्यनाथ की कोरबा की सभा का भी रहा। भाजपा के फायर ब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ के यहां प्रशंसकों की कमी नहीं है। उनकी कवर्धा, और बिलासपुर की सभा में अच्छी खासी भीड़ जुटी। मगर कोरबा में तो हजार लोग भी नहीं पहुंचे। पार्टी संगठन ने भीड़ कम आने पर स्थानीय नेताओं से पूछताछ की है। आने वाले दिनों में जिन इलाकों में सभाएं होनी है, वहां भीड़ सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त संसाधन भेजे जा रहे हैं। फिर भी अब तक प्रचार के मामले में भाजपा, कांग्रेस से बीस नजर आई है।
विधायकों की जरूरत नहीं
रायपुर लोकसभा सीट में भाजपा के तमाम विधायकों को दूसरे क्षेत्रों में प्रचार के लिए भेजा गया है। रायपुर पश्चिम के विधायक राजेश मूणत राजनांदगांव, दुर्ग समेत अन्य लोकसभा क्षेत्र के क्लस्टर प्रभारी हैं, लिहाजा वो अलग-अलग क्षेत्रों में दौरा कर रहे हैं।
रायपुर उत्तर के विधायक पुरंदर मिश्रा की ड्यूटी बसना में लगाई गई है। जबकि मोतीलाल साहू को महासमुंद भेजा गया है। इसी तरह अभनपुर के विधायक इंदरसाव को धमतरी में ध्यान देने के लिए कहा गया है। धरसीवां के विधायक अनुज शर्मा के कार्यक्रम पूरे प्रदेशभर में हो रहे हैं। इस वजह से वो भी अपने क्षेत्र में ज्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं। ये अलग बात है कि प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल की समानांतर टीम पूरे लोकसभा क्षेत्र में काम कर रही है, और वो प्रचार के मामले में काफी आगे भी चल रहे हैं। उत्साही बृजमोहन समर्थक प्रदेश में सबसे ज्यादा वोटों से जीत का दावा कर रहे हैं। देखना है कि आगे क्या होता है।
पीआरओ के कमरे में आईपीएस
छत्तीसगढ़ गठन के बाद पहली बार ऐसी स्थिति बनी है, जब पुलिस मुख्यालय में कई सीनियर अफसर खाली बैठे हैं। भाजपा की सरकार बनने के बाद जब आईपीएस अफसरों के तबादले हुए, तब सभी को पुलिस मुख्यालय अटैच किया गया, लेकिन कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। इस वजह से एडीजी से लेकर एसपी तक के पास काम नहीं है। खुफिया विभाग के दो-दो अफसर खाली हैं। एक-दो को ही स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी दी गई है। अफसरों की इतनी संख्या के कारण बैठने के लिए भी जगह नहीं है। एक आईपीएस को पीआरओ के कमरे में बैठाया गया है। वैसे, कांग्रेस की सरकार में भी दो अफसर कुछ महीनों के लिए खाली थे, लेकिन बाद में उन्हें अच्छी पोस्टिंग भी मिली थी।
अब हर घर योगी-मोदी का भाषण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन का तूफानी दौरा करके लौट गए हैं। इसके पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सभाएं हुईं। ये दोनों नेता भाजपा के स्टार प्रचारकों से भी बढक़र हैं। उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ती है। दोनों के भाषणों से यह साफ हो चुका है कि भाजपा की उन मुद्दों पर बड़ी निर्भरता है जिनका मोदी और योगी आदित्यनाथ ने अपने ओजपूर्ण भाषणों में जिक्र किया। कांग्रेस के घोषणा पत्र के संबंध में, अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण और राम मंदिर निर्माण के संबंध में। इनकी जनसभाओं में भीड़ भी अच्छी उमड़ी, डिजिटल, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में जबरदस्त कवरेज भी हुआ। पर, क्या इतने से माहौल बनेगा? पार्टी के वार रूम में उनके छत्तीसगढ़ में दिए गए भाषणों की छोटी-छोटी क्लिप तैयार की जा रही है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भाषणों के कुछ क्लिप भी तैयार किए जा रहे हैं। कुछ क्लिप दूसरे चरण के मतदान के पहले तैयार हो चुके और वायरल भी हो गए हैं।
प्रदेशभर में भाजपा और हिंदुत्ववादी संगठनों के हजारों वाट्सएप ग्रुप हैं और उनमें लाखों की संख्या में लोग जुड़े हैं। ये क्लिप लोगों को मोबाइल फोन पर भेजे जा रहे हैं। फिर जिन्हें मिल रहा है इसे वे और आगे फॉरवर्ड कर रहे हैं। मोदी और योगी के भाषणों में कांग्रेस के घोषणा पत्र को लेकर कई विवाद थे। कांग्रेस ने कहा है कि जो तथ्य दोनों नेताओं ने रखे वे पूरी तरह झूठ हैं। विशेषकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संबंध में किए गए दावे पर कि उन्होंने देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का बताया था। कांग्रेस ने बताया कि मंगलसूत्र छीनने, लोगों की संपत्ति का सर्वे कराने और मुस्लिमों में बांटने वाला बयान सिरे से गलत है। पर, यह बयान कितने लोगों तक पहुंचा? मोदी-योगी का भाषण हर किसी के मोबाइल पर आ रहा है, और कांग्रेस की जवाबी सफाई एक दिन की सुर्खी लेने के बाद मीडिया से गायब !
सेहत बिगाडऩे की मामूली सजा
शहद सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। बहुत से लोगों की सुबह की खुराक में यह शामिल है। पर यदि कोई 100 प्रतिशत शुद्ध बताकर शहद या ऐसी कोई दूसरी खाद्य सामग्री बेचे तो?
सन् 2020 में कोरिया जिले के एक जागरूक ग्राहक ने खाद्य विभाग से शिकायत की थी कि यहां की दुकानों में 100 प्रतिशत शुद्ध बताकर जो शहद बेची जा रही है, वह नकली है। शहद के अलावा भी दूसरी चीजें मिलाई जाती हैं। शिकायत खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम 2006 के तहत दर्ज की गई। चार साल एसडीएम की कोर्ट में केस चला। अभियुक्त विक्रेता, थोक विक्रेता और निर्माता पर कितना जुर्माना लगा? सिर्फ 5-5 हजार रुपये का।
जितनी कमाई भ्रामक जानकारी देकर शहद बेचने से हुई होगी, उसके मुकाबले इस जुर्माने का उनकी सेहत पर क्या असर होने वाला है? कानून ही ऐसा है। ऐसे मामलों में बहुत अधिक जुर्माना होगा तो 25 हजार रुपये का। गंभीरता को देखते हुए अधिक से अधिक 6 माह की सजा। सजा और जुर्माने के खिलाफ अपील भी हो सकती है।
जब शिकायत की जांच और सजा की प्रक्रिया में चार साल लगें और सिर्फ 5-5 हजार जुर्माने से आरोपी छूट जाते हों तो लोगों को शिकायत करने में रुचि ही कहां से आए? यह तो एक शहद का मामला है, जाने कितनी ही तरह के रोजाना इस्तेमाल में लाई जानी चीजों पर ग्राहकों को संदेह होता है। पर यदि शिकायत करने की ठान भी लें तो मिलने वाली सजा से निराशा हो सकती है।
संतोष के खिलाफ असंतोष...

राजनांदगांव सीट पर भाजपा के स्टार प्रचारकों की कई सफल सभाएं हो चुकीं। पर मौजूदा सांसद के खिलाफ एंटीइंकमबेंसी भी दिखाई दे रही है। कई गांवों की अलग-अलग तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें दिखाया गया है कि गांव पहुंचने के रास्ते पर बैरियर लगा दिए गए हैं और सांसद संतोष पांडेय को निष्क्रिय बताते हुए उन्हें गांव में प्रवेश करने से मना किया गया है।
आला अफ़सरों का कनेक्शन
ये एक संयोग है कि केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसी एनआईए, और एनएसजी के नए चीफ सदानंद दाते व नलिन प्रभात छत्तीसगढ़ में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
दाते आईपीएस के 90 बैच के अफसर हैं। उन्हें बेहद काबिल अफसर माना जाता है। दाते मुंबई में आतंकवादी हमले के खिलाफ अभियान में अहम भूमिका निभाई थी। वो लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के आईजी भी रहे। इस दौरान राज्य पुलिस से सीआरपीएफ का तालमेल बेहतर रहा, और सुरक्षा बलों के सहयोग से नक्सल प्रभावित इलाकों में काफी निर्माण कार्य भी हुए।
दूसरी तरफ, नलिन प्रभात आईपीएस के 92 बैच के अफसर हैं वो भी सीआरपीएफ के डीआईजी के रूप में बस्तर में पोस्टेड रहे हैं। सदानंद दाते के उलट नलिन प्रभात के कार्यकाल में राज्य पुलिस के साथ सीआरपीएफ का तालमेल अच्छा नहीं रहा। उनके कार्यकाल में नक्सल विस्फोट में करीब 73 सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए थे। नलिन प्रभात की कार्यप्रणाली पर काफी सवाल भी उठे थे। वो प्रकरण के जांच के घेरे में भी आए लेकिन उन्हें क्लीनचिट मिल गई। अब वो एनएसजी संभाल रहे हैं।
सब फूल छाप
एक जानकारी के अनुसार अब तक तेइस, चौबीस हजार लोग फूल छाप हो चुके हैं। यह सिलसिला जारी है । इस दावे के साथ दो दिन पहले भाजपा कांग्रेस के प्रवक्ता टीवी डिबेट से बाहर निकले। भाजपा प्रवक्ता ने कांग्रेसी से कहा अब राजीव भवन में कोई नहीं बचा तुम भी आ जाओ। और हाथ पकड़ ठाकरे परिसर ले जाने लगे। कांग्रेसी ने कहा जो गए हैं वो कारोबारी नेता थे, डिपार्टमेंट में बिल अटके पड़े हैं। मेरा कोई बिल नहीं दिल है कांग्रेस में। हां दिल से एक भाजपाई, और शरीर से कांग्रेसी नेता को ले जाओ, हमारा काम आसान कर दो। ये कौन हैं- नेता ने पूछा,तो जवाब मिला, राजधानी के एक पूर्व महापौर। सही है दोबारा महापौर बनने का मौका नहीं मिला, विधानसभा की टिकट नहीं मिली, लोकसभा के लिए भी मना कर दिया गया। नाराजगी स्वाभाविक है। बताते हैं भाजपाई डोरे लेकर सक्रिय हो गए हैं। देखना है यह प्रवेश 7 मई से पहले होता है या नहीं।
भाजपा प्रवेश, एक सच्चाई यह भी
भाजपा प्रवेश करने की इन दिनों कांग्रेसियों में होड़ लगी है। इनके प्रवेश के पीछे न तो राम मंदिर, न मजबूत देश, न सनातनी परंपरा और न ही तुष्टिकरण नीति। ये सब आरोप हम अखबार वालों को बयान देने के तत्व हैं।
और प्रवेश करने के बाद पुराने नेताओं को तराजू भर भर उलाहनाएं, लांछन, आरोप लगाने के लिए। इसे वे लेटर बम का नाम दे रहे हैं तो तीर भी बता रहे। यह सब कुछ नए भाजपा को खुश करने के लिए करना पड़ रहा है । बताया जा रहा है कि इनमें से कुछ, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं, पूर्व मंत्रियों को बताकर भाजपा प्रवेश किया है। इसके पीछे विभागों में अटके लाखों के बिल, कारण हैं। एक नेता के तो तीन विभागों नगरीय प्रशासन,महिला बाल विकास और लोनिवि में बिल पेंडिंग हैं। इन्होने पूर्व मंत्री से कहा भैया कांग्रेस में रूमाल सम्हाले रहना, बिल क्लीयर होते ही लौट आऊंगा।
अब दिख रहा भ्रष्टाचार...
बस्तर विधानसभा क्षेत्र में जल जीवन मिशन का काम 20 प्रतिशत भी पूरा नहीं हुआ है। कई जगह टंकियां बन गई हैं, पाइप लाइनें बिछ गई हैं लेकिन अब तक घर घर पानी पहुंच नहीं रहा है। कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ग्रामीणों के बीच दौरे में यह मान रहे हैं कि योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। ऐसा कहकर वे अपनी ही पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। विधानसभा के पिछले कार्यकाल में भी उन्होंने यहां का प्रतिनिधित्व किया था। क्या उन्होंने निगरानी नहीं की, या फिर सरकार अपनी होने की वजह से आवाज नहीं उठाई? अब जब भीषण गर्मी में परेशान लोग शिकायत कर रहे हैं तो उन्हें ध्यान आ रहा है कि योजना में भ्रष्टाचार हुआ, 80 प्रतिशत काम अधूरा है।
इस योजना के पूरे प्रदेश में करोड़ों रुपये के टेंडर रद्द किए गए हैं, करोड़ों का भुगतान भी रोका गया है। शायद डीएमएफ के बाद सबसे ज्यादा मौज जल जीवन मिशन के अफसरों ने ही किया है। अभी हालत यह है कि अधिकांश जिलों में घर घर जल पहुंचाने की योजना में काम आगे बढ़ नहीं रहा है। कुछ भ्रष्टाचार की जांच के चलते तो बाकी चुनाव व्यस्तता के चलते।
सुबह-सुबह के सुंदर पोस्ट...
सुबह-सुबह वाट्सएप पर आने वाले खूबसूरत गुडमॉर्निंग और प्रेरक संदेश से सीख लेते चले तो एक साधारण आदमी असाधारण बन सकता है। जो ऐसे संदेश भेजता है उसके बारे में तो उम्मीद की ही जा सकती है कि वह खुद उन प्रेरणादायी विचारों को अमल में लाता होगा। तभी तो आपका भला चाहते हुए आपके लिए संदेश भेजने का समय निकालता है। यह अलग बात है कि बना बनाया संदेश देने वाले ऐसे कई ऐप प्ले स्टोर पर उपलब्ध हैं, इन्हें ब्रॉडकास्ट करने के लिए कुछ खास मेहनत नहीं करनी पड़ती। हाल ही में कांग्रेस के एक पूर्व विधायक ने अपनी 40 साल की निष्ठा को रद्दी की टोकरी में डालकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। अगले दिन सुबह वाट्सएप पर रंग बिरंगी आकृतियों से सजा एक संदेश उनके शुभचिंतकों को मिला- सिद्धांतों पर कायम रहना कठिन जरूर है, लेकिन आपका सिद्धांत ही आपके स्वाभिमान का रक्षक है।
मोदी ही एकमात्र गारंटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास पर राजधानी रायपुर में जगह-जगह बड़े बड़े बिलबोर्ड और पोस्टर लगे। मोदी की आदमकद तस्वीर के साथ और कोई नहीं। न पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, न और राज्य का और कोई नेता। सोशल मीडिया पर ऐसे कई पोस्टर्स की तस्वीर खींचकर डाली गई है। तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ का कहना है कि अब भाजपा मतलब मोदी, मोदी मतलब भाजपा। भाजपा जीतेगी तो मोदी की बदौलत। यदि नहीं जीत पाई तब पता चलेगा कि कौन अध्यक्ष था, कौन चुनाव संचालक था। किस पदाधिकारी की कौन सी जिम्मेदारी दी गई थी। ([email protected])


