राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : होशियारी खुद के ही काम न आई...
25-Sep-2020 6:39 PM 8
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : होशियारी खुद के ही काम न आई...

होशियारी खुद के ही काम न आई...

सरकार के बुद्धिमान लोग कई बार चूक कर जाते हैं, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है। मध्यप्रदेश के रेरा चेयरमैन एंटनी डिसा को लीजिए, वे शिवराज सिंह चौहान के पिछले कार्यकाल में सीएस रहे। चौहान ने रिटायर होने के बाद उन्हें रेरा चेयरमैन की जिम्मेदारी दी। मगर एंटनी डिसा कमलनाथ के करीबी बने रहे। कमलनाथ के इलाके छिंदवाड़ा के कलेक्टर रहने के साथ-साथ उनके केन्द्रीय मंत्री रहते पीएस भी थे। शिवराज सिंह चौहान से भी एंटनी डिसा की अच्छी ट्यूनिंग रही।

सुनते हैं कि कमलनाथ सीएम बने तो एंटनी डिसा उनके अघोषित सलाहकार रहे। परदे के आगे से वे रेरा चलाते थे, और परदे के पीछे से सरकार। कमलनाथ और शिवराज सिंह चौहान में तनातनी चल रही है। कमलनाथ के करीबियों पर शिवराज सिंह सरकार की तिरछी निगाह रही है। चूंकि एंटनी डिसा के नियुक्ति आदेश में कार्यकाल का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। लिहाजा इस सरकार को मौका मिल गया और आज ही उनके कार्यकाल को खत्म कर पदमुक्त कर दिया गया।

कुछ इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी हो चुका है। यहां भी सहकारिता आयोग के चेयरमैन गणेशशंकर मिश्रा का भी कार्यकाल सीमित कर भूपेश सरकार ने उन्हें पद से बेदखल कर दिया था, चूंकि सहकारिता आयोग के चेयरमैन के कार्यकाल की अवधि तय नहीं थी। गणेशशंकर मिश्रा, पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के करीबी माने जाते रहे हैं। ऐेसे में मिश्रा को हटना ही था। उनसे चूक यह हुई कि पिछली सरकार में पॉवरफुल रहते हुए भी अपने कार्यकाल की अवधि निश्चित नहीं करा पाए।

दरअसल जब सत्ता की ताकत रहती है, तो उसका नशा मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के गांजे से भी अधिक असरदार होता है. मध्यप्रदेश में भी, और छत्तीसगढ़ में भी।

मरवाही की तकदीर में क्या लिखा है?

मरवाही उप-चुनाव के ऐलान के ठीक पहले जारी हुए राजभवन के एक पत्र ने राज्य-शासन को चिंता में डाल दिया है। मरवाही को नगर पंचायत का दर्जा देने के बीते माह की गई घोषणा पर उन्होंने आपत्ति जताई है और आगे की कार्रवाई रोकने कहा है। पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों पर फैसले राज्यपाल की सहमति के बिना नहीं हो सकते। बाकी मामलों में उन्हें मंत्रिपरिषद् के प्रस्तावों के अनुसार जरूर चलना पड़ता है पर इन क्षेत्रों की ग्राम-सभाओं, नगर पंचायतों यहां लागू होने वाले कानूनों के मामलों में कुछ अतिरिक्त अधिकार होते हैं। अब चूंकि चुनाव की अधिसूचना जारी हो गई है, मरवाही नगर पंचायत में वैसे भी चुनाव खत्म होते तक कोई नया काम नहीं हो सकता। मरवाही को नगर पंचायत का दर्जा देना एक राजनैतिक फैसला होगा पर गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले की स्थिति कुछ हटकर है। गौरेला-पेन्ड्रा मरवाही के मुकाबले अधिक विकसित क्षेत्र तो है ही, बल्कि ट्रेन रूट से भी जुड़ा है। जिला बनने से पहले ही यहां एडीएम, एएसपी की अलग नियुक्ति होती रही है। मरवाही अलग-अलग थलग है। नया जिला बन जाने के बाद भी। अब भी मध्यप्रदेश की सीमाओं से लगने वाले कई गावों के लिये इसका जिला मुख्यालय 70-80 किलोमीटर दूर है। इस लिहाज से मरवाही में यातायात, शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य सभी तरह की सुविधायें बढऩी चाहिये। वरना इस छोर पर रहने वालों को नये जिले का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पायेगा। यह सब ग्राम पंचायत बनाये रखते हो सकता है या नहीं, यह एक सवाल सामने है। बहुत सी ग्राम पंचायतों को इसी आश्वासन के साथ नगर पंचायत का दर्जा प्रदेश में दिया गया कि वहां सुविधायें बढ़ेंगी विकास होगा, पर ऐसा हुआ नहीं। बल्कि वे शासन की कई योजनाओं के फायदे से वंचित हो गये जो गांवों को मिलते थे। जिले के संतुलित विकास के लिये मरवाही को भी ध्यान में रखना होगा। कानूनी पक्ष क्या कहता है, 29 सितम्बर को राज्यपाल के समक्ष अधिकारी क्या तर्क रखते हैं, फिर निर्णय क्या होगा, इस पर मरवाही के विकास की दिशा तय होगी।

अब कहां गये सामाजिक संगठन..

जिन दिनों कोरोना महामारी ने प्रकोप दिखाना शुरू किया था अनेक धार्मिक, सामाजिक संगठन उदारता के साथ सामने आये थे। अगर ये नहीं होते तो हजारों किलोमीटर दूर से घर लौटने वाले मजदूरों की हालत और खराब हो जाती। लम्बे लॉकडाउन में भूख से तडफ़ते लोगों को खाना, कपड़े, जूते नहीं मिलते। यह काम पीपीई किट बांटने सार्वजनिक स्थलों पर ऑटोमैटिक सैनेटाइजर लगाने, सैनेटाइजर और मास्क बांटने तक बीते माह तक चला। इस बीच जगह जगह तालियों और फूलों से डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों, सफाई कर्मचारियों, पुलिस जवानों का अभिनंदन भी किया गया। पर अब सब रुक सा गया है। कोविड-19 महामारी की व्यवस्था में 16-18 घंटे ड्यूटी कर रहे एक डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर इसी को लेकर तल्खी जताई है। उन्होंने लिखा गया कहां गये, वे क्लब वाले, सद्भावना वाले अब तो हमें उनकी ज्यादा जरूरत है। इधर पुलिस भी बता रही है कि जो सोशल वर्कर, छात्र और युवा संगठन हमारे काम में हाथ बंटाने आते थे उनकी संख्या घटकर आधी रह गई है। ये सब हुआ क्यों?  समाजसेवा के काम में फुर्ती और उतनी ही फुर्ती से अख़बारों में तस्वीरें भेजने वाले एक सज्जन का कहना है कि अब कोरोना की असली मार हो रही है। उस वक्त ऐसा लगा कि कुछ दिनों की आंधी है गुजर जायेगी। हमारे काम धंधे पर भी असर होने लगा है, पहले तो हाथ खुले रखते थे। अब समझ में आ रहा है पहले अपना ही घर संभाल लो। दरियादिली आखिर कितनी लम्बी चले? 

 

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