राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ :  डिप्रेशन की वजह
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : डिप्रेशन की वजह
08-Jul-2020 6:30 PM

डिप्रेशन की वजह

एक बड़ा अफसर अपनी मानसिक परेशानियों को लेकर एक मनोचिकित्सक के पास पहुंचा। बड़े सब्र से घंटे भर उसकी उलझनों को सुनने के बाद मनोचिकित्सक को जब यह पता लगा कि कुछ महीने पहले ही इस अफसर को बड़ी ताकत की कुर्सी से हटाकर किनारे किया गया है, और गाडिय़ां घर में बस दो रह गई हैं, नौकर-चाकर बस आधा दर्जन रह गए हैं, तो उसने डिप्रेशन (मानसिक अवसाद) की वजह पकड़ ली। 

अफसरों के साथ दिक्कत यह है कि उनमें से अधिकतर को सरकारी अमले और सरकारी काफिले का मीनिया हो जाता है, और जब कभी किसी कुर्सी के साथ ये सहूलियतें एक सीमा से अधिक नहीं मिल पातीं, तो वे डिप्रेशन में चले जाते हैं। 

अभी-अभी भारत सरकार की एक रिपोर्ट आई है कि राज्यों से वहां जाने वाले आईएएस-आईपीएस अफसर उस वक्त तक केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना नहीं चाहते जब तक राज्यों में उनके कलेक्टर और एसपी बने रहने का वक्त रहता है। इस वक्त तक इन कुर्सियों में दिलचस्पी इतनी रहती है कि केन्द्र सरकार की रूखी-सूखी नौकरी उन्हें बेकार लगती है। नतीजा यह है कि केन्द्र सरकार उस वरिष्ठता की खाली कुर्सियों को लेकर बहुत परेशानी में है। 

किसी बंगले के भीतर काम करने वाले लोगों की गिनती कई बार तो बाहर से हो जाती है कि वहां कितनी मोटरसाइकिलें खड़ी हैं। एक-एक अफसर के बंगले के बाहर आधा दर्जन से लेकर एक दर्जन मोटरसाइकिलें एक वक्त में दिखती हैं, जिससे उस शिफ्ट में मौजूद कर्मचारियों की कम से कम गिनती दिख जाती है। अब सरकारी अमला अजय देवगन तो है नहीं कि दो मोटरसाइकिलों पर सवार होकर पहुंचे। 

आज जब समझदार लोग कोरोना के खतरे के बीच अपने घर के कामकाज बिना नौकर-चाकर खुद कर रहे हैं, तब भी अफसरी मिजाज घर पर जमघट लगाकर चल रहे हैं। यह बात समझ में नहीं आ रही कि वे खुद उतने ही महफूज हैं जितने उनके घर काम करने बाहर से आने वाले लोग। 

नामी-बेनामी जमीनें, केन्द्रीय जांच एजेंसी

केन्द्र सरकार की एजेंसियां राज्य के कई बड़े अफसरों, और कई रिटायर्ड अफसरों की जमीन-जायदाद तलाश रही हैं, जिनमें नामी भी हैं, और बेनामी भी। कुछ ऐसे भूतपूर्व अफसर जांच के घेरे में हैं जिनके नाम खबरों में नहीं हैं। राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस बने हुए, और प्रदेश के सबसे ताकतवर अफसरों में से एक रहे हुए अफसर ने रायपुर-दुर्ग के बीच बहुत सी जमीनें विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक के भाई के नाम से खरीदी थीं, और अब पटवारी को खबर किए बिना इन जमीनों की जानकारी जुटाई जा रही है। खारून नदी के दोनों तरफ की जगह कई अफसरों की एकदम पसंदीदा रही है, और कुछ जमीनें तो ऐसी भी हैं जिन पर किले जैसी ऊंचे अहाते बन गए हैं। 

केन्द्र सरकार देश भर में जमीन के मालिक के नाम के साथ आधार कार्ड अनिवार्य करने जा रही है, और इसे लेकर भी बेनामी जमीनों को परेशानी आने वाली है। जमीन के एक कारोबारी ने बताया कि अब तो बयाना-चि_ी को लेकर भी नियम यह बन गया है कि दोनों पक्षों को रजिस्ट्री ऑफिस में मौजूद रहकर, फोटो खिंचवाकर, आंखों की पहचान देकर ही बयाना करना है। ऐसे में दूसरों के नाम से जमीन खरीदे हुए लोग जो मुख्तयारनामा अपने नाम का करवाकर अपनी मिल्कियत सुरक्षित मानते थे वे भी परेशान हैं। 

लेकिन किस इलाके में नेताओं और अफसरों की अधिक जमीनें हैं, किन इलाकों में उनकी औलादें जमीन की प्लाटिंग कर रही हैं, इसका अंदाज लगाना हो तो वहां बिना जरूरत के बनने वाली चौड़ी-चमचमाती सड़कों को देखना चाहिए, और उस इलाके में आने वाले दूसरे सरकारी प्रोजेक्ट देखना चाहिए। 

दो तरह के रोका-छेका चल रहे हैं

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बिना मास्क लगाए घूमने वाले लोगों को सड़कों पर ठीक उसी तरह रोका-छेका जा रहा है, जिस तरह सड़कों से जानवरों को घेरकर पकड़ा जा रहा है। आबादी का एक बड़ा इस हद तक बदमाश है कि मास्क, गमछा, या कोई और कपड़ा, मुंह पर बांधने को तैयार ही नहीं है क्योंकि कोरोनाग्रस्त होने पर जरूरत पड़ेगी तो वेंटिलेटर का मास्क मुंह पर लगाने के लिए सरकार तो है न। नतीजा यह है कि एक के देखादेखी दूसरे, अनगिनत लोग बिना मास्क के घूम रहे हैं, और अपने से परे दूसरों के लिए भी खतरा बन रहे हैं, खतरा हैं। ऐसे लोगों पर महज सौ रूपए जुर्माना लगाना उनकी बेइज्जती है। केरल सरकार ने सार्वजनिक जगहों पर बिना मास्क निकलने वालों पर 10 हजार रूपए जुर्माना रखा है। छत्तीसगढ़ में कम से कम एक हजार रूपए तो जुर्माना रखना ही चाहिए क्योंकि बाकी जनता की जिंदगी की भी कुछ तो कीमत मानी जाए, और डॉक्टर-नर्स, दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारी, और पुलिसवाले जो जनता में से ऐसे बदमाश लोगों को भी बचाकर रखने के लिए अपनी जान दे रहे हैं, उनकी भी तो कुछ कीमत मानी जाए। लोगों पर मास्क न लगाने पर हजार-हजार रूपए जुर्माना किया जाए, तो शायद थोड़ा सा असर भी होगा। सौ रूपए का जुर्माना तो वैसा ही है जैसा लोग किसी भजन गायक या कव्वाल पर लुटाकर चले जाते हैं। छत्तीसगढ़ के जानवरों पर रोका-छेका का असर शायद अधिक हो रहा है, बिना मास्क लोगों को रोकने-छेकने में पुलिस जान पर खेल रही है, और ऐसी जनता पर उसका असर शायद जानवरों से कम ही हैं। 

 

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