राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : छत्तीसगढ़ का असम कनेक्शन
19-Feb-2026 6:01 PM
राजपथ-जनपथ : छत्तीसगढ़ का असम कनेक्शन

छत्तीसगढ़ का असम कनेक्शन

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रामेन डेका की पुत्री आयुष्मिता डेका ने सक्रिय राजनीति में कदम रख दिया है। असम की राजनीति में अपनी पहचान रखने वाले रामेन डेका भाजपा के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं। वे दो बार सांसद रह चुके हैं और असम प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाल चुके हैं। लंबे समय से उनके सक्रिय राजनीति में लौटने की अटकलें लगती रही थीं, लेकिन उन्होंने स्वयं आगे आने के बजाय अपनी पुत्री को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।

आयुष्मिता अमेरिका में कार्यरत थीं और हाल ही में नौकरी छोडक़र असम लौटी हैं। उन्होंने विधिवत भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। चर्चा है कि वे मंगलदोई लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत किसी विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतर सकती हैं। मंगलदोई दरांग जिले में आता है और इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व स्वयं रामेन डेका कर चुके हैं। यहां उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है और पूरा इलाका भाजपा का गढ़ माना जाता है। राजनीतिक हलकों में कयास है कि आयुष्मिता के लिए चुनावी राह बहुत कठिन नहीं होगी। हाल ही में राज्यपाल रामेन डेका की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता भी आयुष्मिता की राजनीतिक सक्रियता पर नजर रखे हुए हैं। पूर्व संसदीय सचिव विकास उपाध्याय इस समय असम कांग्रेस के प्रभारी सचिव हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को असम विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस का पर्यवेक्षक बनाया गया है। इन परिस्थितियों में राज्यपाल की पुत्री के संभावित चुनावी पदार्पण की चर्चा छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में भी तेज है।

बस्तर में जश्न का मौका आ गया?

दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी पारंपरिक लुंगी पहनकर बैलाडीला के एक दूर गांव में पहुंचकर ग्रामीणों के बीच बैठे, समस्याएं सुनीं और जरूरी सामान बांटा। यह प्रतीकात्मक जरूर है लेकिन बताता है कि डर की जगह संवाद ले रहा है।

यह लावा-पुरेंगल गांव है, जहां आज तक कोई विधायक या बड़ा अफसर नहीं पहुंचा। अब तक यह इलाका नक्सलियों के प्रभाव में था। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, कागर और ग्रीन हंट अभियानों में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, राज्य पुलिस और डीआरजी ने डेढ़ साल से काम किया। 2024 में नक्सली हिंसा 81 प्रतिशत तक घटने का दावा किया गया है। 2025 के आंकड़े आएंगे तो शायद यह संख्या और कम हो जाएगी। इस बीच सडक़ों, फोर्टिफाइड थानों, ड्रोन निगरानी और अपडेटेड सरेंडर नीति ने दबाव बनाया है। पीएम आवास के तहत हजारों घरों की मंजूरी मिली और सडक़ कनेक्टिविटी ने दूर गांवों को जोड़ा है, जहां बसें भी चलने लगी हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सल समस्या के पूरी तरह खात्मे की बात की है। इस समय 300 जवान फिर बचे-खुचे नक्सलियों की तलाश में हैं। 

मगर, अब असली चुनौती शुरू होने वाली है, जिसकी परीक्षा जनप्रतिनिधियों को देनी है। अटामी का दौरा उसकी शुरुआत मान सकते हैं।  सरेंडर नक्सलियों की सुरक्षा होगी? सम्मानजनक रोजगार मिलेगा और सामाजिक स्वीकृति मिलेगी। इतिहास बताता है कि 1980 के जनजागरण या 2005 के सलवा जुडुम जैसी गलतियां दोहराना महंगा पड़ेगा। समय से पहले जश्न खतरनाक है। लावा-पुरेंगल तक विधायक का पहुंचना उम्मीद जगाता है, पर स्थायी शांति और विकास के लिए नई ऊर्जा चाहिए, उससे भी कहीं अधिक, जितनी नक्सलियों के सफाए में खपाई गई है।


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