राजपथ - जनपथ
एआई का एक जलसा जंगल में
नई दिल्ली में आर्टिफिशियल महाकुंभ का आयोजन हो रहा है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा एआई समागम बताया जा रहा है। बड़े-बड़े मंच, नामी विशेषज्ञ, भविष्य की तकनीक पर लंबी चर्चा- सब कुछ हो रहा है। लेकिन क्या एआई सिर्फ सेमिनार और स्टार्टअप पिच तक सीमित है? या फिर वह जमीन पर लोगों की जान भी बचा रहा है? इस सवाल का एक जवाब छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से मिल रहा है।
उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व में तैनात 2017 बैच के आईएफएस अधिकारी वरुण जैन ने एआई का ऐसा इस्तेमाल किया है, जिसने मानव-हाथी संघर्ष की तस्वीर बदल दी। जहां पहले हाथियों के अचानक गांव में घुस आने से मौतें होती थीं, वहां अब मोबाइल पर पहले से अलर्ट पहुंच रहा है।
कुछ साल पहले तक स्थिति यह थी कि जब हाथी गांव की ओर बढ़ते थे, तो ढोल बजाकर या मुनादी कर सूचना दी जाती थी। यह तरीका धीमा था और कई बार देर हो जाती थी।
इसके देखते हुए जैन ने एआई आधारित छत्तीसगढ़ एलीफेंट ट्रैकिंग एंड अलर्ट सिस्टम तैयार किया। जून 2023 में लॉन्च इस प्रणाली में जंगल में गश्त करने वाले हाथी मित्र दल मोबाइल ऐप के जरिए हाथियों के पदचिह्न, मल या झुंड की लोकेशन दर्ज करते हैं। नेटवर्क मिलते ही डेटा अपलोड होता है और एआई तुरंत विश्लेषण कर 10 किलोमीटर दायरे के गांवों की पहचान कर लेता है।
इसके बाद व्हाट्सएप, एसएमएस और ऑटोमैटिक वॉइस कॉल के जरिए ग्रामीणों, पंचायत प्रतिनिधियों और कोटवारों को चेतावनी भेज दी जाती है। किसी अलग ऐप की जरूरत नहीं, बस मोबाइल नंबर रजिस्टर होना चाहिए।
दावा किया जा रहा है कि इस तकनीक के बाद उदंती क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष के मामलों में उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह मॉडल इतना सफल माना जा रहा कि अब इसे छत्तीसगढ़ के 15 हाथी प्रभावित वन मंडलों में लागू किया जा चुका है।
यह मॉडल केवल चेतावनी तक सीमित नहीं है। हाथियों की गतिविधियों के डेटा से कॉरिडोर मैपिंग, भोजन स्रोत विकसित करने और दीर्घकालिक वन प्रबंधन में भी मदद मिल रही है। भविष्य में वाइब्रेशन सेंसर जोडऩे की योजना है, जिससे हाथियों की हलचल पहले से पकड़ में आ सके।
आईएफएस जैन को इस पहल के लिए इको वॉरियर अवार्ड 2024 से सम्मानित किया जा चुका है। लोग सही कहते हैं कि अन्य तकनीकों, अविष्कारों की तरह एआई का भी सही दिशा में इस्तेमाल समाज को सुरक्षित बना सकता है।
आज जब एआई को लेकर डर और भ्रम दोनों हैं, नौकरी जाएगी या नहीं, मशीन इंसान से आगे निकल जाएगी या नहीं-तब अपने राज्य में मौजूद यह उदाहरण बताता है कि एआई इंसान का दुश्मन नहीं, सहयोगी बन सकता है।
अब डीजे भजन!
भजन गायन का अंदाज तेजी से बदल रहा है। मंचों पर तेज संगीत, लाइटिंग इफेक्ट और डांस के साथ भजन प्रस्तुत करने का चलन बढ़ गया है। दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में इस तरह का आयोजन बड़े पैमाने पर होने लगा है। अब रायपुर में भी इसकी शुरुआत हो रही है। यहां इंडोर स्टेडियम में होली के पहले 28 तारीख को डीजे बीट्स पर भजन संध्या का आयोजन किया गया है।
इस मौके पर फूलों की होली खेली जाएगी। इसके आयोजनकर्ताओं में से एक भाजपा प्रवक्ता उज्जवल दीपक हैं। इसमें सैकड़ों युवाओं के जुटने की उम्मीद जताई जा रही है। डांस के साथ भजन का ट्रेंड तेजी से फैल रहा है। इसको लेकर मतभेद भी हैं। कुछ लोग इसे भक्ति की गंभीरता से समझौता मानते हैं। हालांकि बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि डांस, और आधुनिक संगीत के जरिए युवा भक्ति से जुड़ते हैं तो इसमें बुराई नहीं है। कुल मिलाकर डीजे बीट्स पर भजन संध्या के आयोजन को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही है।
अरण्य में फिर सुपरसीड या... ?
बजट सत्र के बाद वन मुख्यालय में बड़ा फेरबदल होगा। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। इसके बाद पीसीसीएफ स्तर के दो अफसर तपेश झा और अनिल साहू भी क्रमश: जून और जुलाई में रिटायर होंगे। चर्चा है कि फेरबदल सीनियर आईएफएस अफसरों के रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर किया जा सकता है।
हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के लिए कौशलेंद्र कुमार और अरुण कुमार पांडे के नाम चर्चा में हैं। कौशलेन्द्र 92 बैच के हैं, तो पाण्डेय 94 बैच के हैं। मगर अरुण पाण्डेय वर्तमान में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के बाद नंबर-2 के पीसीसीएफ (वाइल्ड लाइफ) के पद पर हैं। इसके बाद 94 बैच के प्रेम कुमार, और ओपी यादव का नंबर है। दोनों ही पीसीसीएफ के पद पर हैं, लेकिन प्रेम कुमार भी जुलाई में रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की रेस से बाहर माना जा रहा है।
वैसे अरण्य में वर्तमान पीसीसीएफ श्रीनिवास राव समेत पूर्ववर्ती कई अन्य के सुपरसीड कर बनाने की भी परंपरा रही है। राव तो पांच सीनियर पीसीसीएफ को सुपरसीड कर हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बने थे। उनकी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दी गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। वो अपना कार्यकाल पूरा कर रिटायर हो रहे हैं। इस बार तो सरकार के पास विकल्प सीमित है, ऐसे में ज्यादा उठा पटक करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।


