राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : रेरा बिल्डरों के हित में, जागो ग्राहक!
13-Feb-2026 5:59 PM
राजपथ-जनपथ : रेरा बिल्डरों के हित में, जागो ग्राहक!

रेरा बिल्डरों के हित में, जागो ग्राहक!

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के एक मामले की सुनवाई के दौरान रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी को लेकर कहा कि यह संस्था अब बिल्डरों के हितों को बढ़ावा देने वाली संस्था बन गई है और इसे बंद कर देना बेहतर होगा, क्योंकि यह डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों की ही मदद कर रही है, जबकि घर खरीदार निराश, हताश और ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। 

छत्तीसगढ़ में भी सीजी रेरा की स्थापना 2017 में हुई थी, और इसका उद्देश्य रियल एस्टेट सेक्टर को पारदर्शी बनाना, प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करवाना और खरीदारों की शिकायतों का निपटारा करना था। यह बिल्डरों को प्रोजेक्ट रजिस्टर करने, समयबद्ध डिलीवरी सुनिश्चित करने और खरीदारों को मुआवजा देने का प्रावधान करता है। छत्तीसगढ़ में सीजी रेरा ने अब तक कई प्रोजेक्ट्स को रजिस्टर किया है और शिकायतों का निपटारा किया है। मगर यह  केवल रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स से संबंधित शिकायतों पर ही कार्रवाई करता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के प्रकाश में सीजी रेरा के भी कुछ फैसलों पर सवाल उठे हैं। स्काई लाइफ रायपुर के फेज एक के मामले में सीजी रेरा ने खरीदार की क्लेम को खारिज कर दिया और डेवलपर की कैंसिलेशन और रिफंड की नीति को सही ठहराया। अथॉरिटी ने कहा कि खरीदार ने ऊंची राशि के भुगतान का कोई सबूत नहीं दिया और डेवलपर ने अनुबंध का उल्लंघन नहीं किया। आम तौर पर खरीदार बिल्डर के दावों की गहराई से जांच नहीं करता। न ही शिकायत होने पर जरूरी दस्तावेज जमा कर पाता है। अनुबंध की बारिकियों को भी पढ़ा नहीं जाता।

रेरा के पास बहुत सी शक्तियां हैं। वह अनियमितताओं के आधार पर जुर्माना तो लगा ही सकता है, प्रोजेक्ट में देरी होने पर उपभोक्ता को ब्याज दिला सकता है। रेरा के आदेश का पालन नहीं करने पर कारावास तक का प्रावधान है और प्रॉपर्टी बेचकर वसूली करने का भी। इसके अलावा रेरा कोई फाइनल अथॉरिटी भी नहीं है। रेरा ने खरीदार का कोई क्लेम खारिज किया तो उसे हाईकोर्ट में चुनौती भी दी जा सकती है। इसके अलावा रेरा की सुनवाई पर भरोसा न हो तो उपभोक्ता विवाद परितोषण आयोग में भी केस दायर किया जा सकता है।

रायपुर के ही प्लॉट बाय बैक के एक मामले में आयोग ने पाया था कि बिल्डर ने अनुचित व्यापार किया। आदेश दिया गया कि बिल्डर प्लॉट की दोगुनी कीमत लौटाए। कानून का लाभ उठाने के लिए उसके नियम-अधिनियमों के बीच गोते भी लगाने पड़ते हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ में अनेक प्रोजेक्ट्स देरी से चल रहे हैं। बिल्डर को खरीदारों से मिले फंड को डायवर्ट करने की भी शिकायते हैं। प्रोजेक्ट में देरी हो तो खरीदारों को ब्याज मिलना चाहिए, लेकिन रेरा की निगाह में ऐसे प्रोजेक्ट होने के बावजूद उपभोक्ताओं के लिए ऐसी सुविधा नहीं दी गई है। वहीं फंड डायवर्सन को लेकर रेरा में सख्त नियम है। खरीदारों से मिली 70 फीसदी राशि एक अलग बैंक खाते में जमा दिखाना है। शेष राशि से प्रोजेक्ट का काम करना है। प्रोजेक्ट में देरी इस अनियमितता की वजह से कई बार होती है। किसी भी कॉलोनी या प्रोजेक्ट की प्लानिंग या लेआउट, एक बार लॉंच होने के बाद तब तक नहीं बदला जा सकता, जब तक दो तिहाई खरीदारों से सहमति न ले ली जाए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से सबक लिया जा सकता है। पता होना चाहिए कि रेरा केवल अपने यहां रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स को लेकर सुनवाई करता है। हर प्रोजेक्ट के अनुबंध को ध्यान से पढऩा जरूरी है और सबूत साथ में रखा जाए। और यह ध्यान रखें कि रेरा के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया सकता है। वैसे, यह सुविधा बिल्डरों के पास भी है।

राहत की सांस

सरकार के पशुधन विकास विभाग की ओर से रायपुर जिले के 50 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण के लिए विशाखापट्टनम भेजा गया है। यहां किसान मुर्गी-बकरी पालन और मछली पालन की आधुनिक तकनीकों से अवगत होंगे।

बुधवार को धरसीवां, आरंग, अभनपुर और मंदिर हसौद क्षेत्र के किसान रवाना होने पहुंचे, लेकिन इस दौरान हंगामे की स्थिति बन गई। तीन-चार किसानों ने यह कहते हुए विरोध जताया कि यात्रा लंबी है और बस में एसी की सुविधा नहीं है। उनका कहना था कि लंबी दूरी के लिए बेहतर व्यवस्था का आश्वासन दिया गया था। विभागीय अधिकारियों ने किसानों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन कुछ किसान जाने से इनकार करते रहे। इसी बीच अभनपुर विधायक इंद्र कुमार साहू भी कुछ किसानों के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने नाराज़ किसानों को समझाने की कोशिश की, हालांकि प्रारंभिक तौर पर बात बनती नजर नहीं आई। फिर भी तीन-चार किसान लौट गए।

बाकी किसान विधायक की समझाइश पर बस में बैठकर विशाखापट्टनम के लिए रवाना हुए। विधायक इस बात से चिंतित थे कि किसानों की नाराजगी मीडिया की सुर्खियां न बन जाए। वो समझाने बुझाने में लगे रहे। और बस रवाना हुई, तो उन्होंने राहत की सांस ली। 

लखमा को इजाजत?

पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा के उस आवेदन पर विचार चल रहा है, जिसमें उन्होंने विधानसभा के बजट सत्र में शामिल होने की अनुमति मांगी है। स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने कवासी लखमा के आवेदन पर विधानसभा सचिवालय से अभिमत मांगा है। सचिवालय इससे मिलते-जुलते प्रकरणों का अध्ययन कर रहा है।

दरअसल, पूर्व मंत्री कवासी लखमा को सशर्त जमानत मिली हुई है। जमानत अवधि में उन्हें प्रदेश से बाहर रहना होगा। वो ओडिशा के मलकानगिरी में शिफ्ट भी हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने लखमा के विधानसभा की कार्रवाई में हिस्सा लेने पर फैसला स्पीकर पर छोड़ दिया है।

राज्य बनने के बाद जेल में बंद किसी विधायक को विधानसभा की कार्रवाई में हिस्सा लेने की अनुमति नहीं मिली है। जबकि खुद लखमा के अलावा देवेन्द्र यादव जेल में थे। हालांकि दोनों सदस्यों की तरफ से विधिवत आवेदन नहीं आए थे।

वर्तमान में कवासी लखमा का प्रकरण थोड़ा अलग है। उन्हें जमानत मिल चुकी है। कोर्ट इस मामले में स्थिति साफ कर दी है। जम्मू-कश्मीर  के सांसद इंजीनियर अब्दुल राशिद शेख का मामला लखमा जैसा ही है। हालांकि वो जेल में हैं। उनके मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने संसद की कार्रवाई में हिस्सा लेने के लिए कस्टडी पैरोल दी है।

शेख वर्ष-2017 में एनआईए द्वारा दर्ज किए गए आतंकी मामले में आरोपी हैं है। लखमा के मामले में विधानसभा सचिवालय ने अभी अभिमत नहीं दिया है, लेकिन पुराने उदाहरण को देखते हुए अंदाजा लगाया जा रहा है कि लखमा को सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने की अनुमति मिल सकती है। विधानसभा का बजट सत्र 23 फरवरी से शुरू हो रहा है। देखना है आगे क्या होता है।

असम बेहतर होगा

पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार के लिए प्रदेश के भाजपा नेताओं को भेजा जा सकता है। इसकी सूची भी बन रही है। मगर ज्यादातर भाजपा नेता बंगाल जाने से बचना चाहते हैं। वजह यह है कि पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा अन्य राज्यों की तुलना में काफी ज्यादा होती है। इस मामले में बंगाल ने बिहार को पीछे छोड़ दिया है।

पिछले विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय को टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने घेर लिया था। विजयवर्गीय किसी तरह बचे थे। उन्हें जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई थी। कुछ भाजपा नेताओं का सोचना है कि बंगाल में वैसे भी पार्टी की सरकार नहीं है। ऐसे में वहां चुनाव  प्रचार जोखिम भरा भी है। 

ये अलग बात है कि प्रदेश भाजपा के महामंत्री (संगठन) पवन साय बंगाल में डेरा डाले हुए हैं। वो करीब 50 विधानसभा सीटों के प्रभारी हैं। चूंकि पवन साय खुद बंगाल में मेहनत कर रहे हैं, ऐसे में यहां के नेताओं की वहां प्रचार में जाने के लिए मजबूरी भी है। फिर भी कुछ लोग चाहते हैं कि बंगाल के बजाए उनकी ड्यूटी असम में लग जाए। कुल मिलाकर भाजपा के अंदरखाने में इस पर काफी चर्चा हो रही है। 


अन्य पोस्ट