राजपथ - जनपथ
यूजीसी कमेटी में बृजमोहन भी तो थे
यूजीसी के हालिया नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। नियमों पर देशभर में विवाद खड़ा हो गया था। दिलचस्प बात यह है कि संसद की स्थाई कमेटी ने विवादित नियम का ड्राफ्ट तैयार किया था। इस कमेटी में रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल भी हैं। बृजमोहन के साथ ही भाजपा के दस सांसद रविशंकर प्रसाद, डी पुरंदेश्वरी, संबित पात्रा, हेमांग जोशी, बांसुरी स्वराज, और अन्य सदस्य कमेटी में हैं।
नियम जारी हुए, तो बवाल होना स्वाभाविक था। सुप्रीम कोर्ट के याचिकाओं में यह कहा गया कि यूजीसी के नियम जाति आधारित भेदभाव के दायरे को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित करके यूजीसी ने प्रभावी रूप से सामान्य या गैर आरक्षित श्रेणियों से संबंधित व्यक्तियों को संस्थागत संरक्षण, और शिकायत निवारण से वंचित कर दिया। जिन्हें उनकी जातिगत पहचान के आधार पर उत्पीडऩ या पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ सकता है।
यूजीसी के नए नियम का ड्राफ्ट तैयार करने वाली संसदीय समिति के सदस्य निशाने में हैं। कहा जा रहा है कि बृजमोहन और भाजपा सदस्यों ने भी नए नियम को लेकर किसी तरह की आपत्ति नहीं की। और अब जब विवाद खड़ा हुआ, तो सभी विशेषकर भाजपा सदस्यों ने चुप्पी साध रखी है। मगर सोशल मीडिया में उन्हें निशाने पर लिया जा रहा है। पूर्व प्रोफेसर घनाराम साहू ने तो यहां तक लिखा कि सुप्रीम कोर्ट विध्वंसकारी यूजीसी नियम बनाने वाले समिति सदस्यों को उनके पद के लिए अयोग्य घोषित करें तो देश स्वागत करेगा। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी यूजीसी नियम पर बहस होगी, और समिति के सदस्यों को जवाब देना पड़ सकता है।
अंतिम दिन की ढील कितनी कारगर?
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का महोत्सव आज 30 जनवरी 2026 को अपने समापन पर पहुंच रहा है। वैसे तो खरीदी 31 जनवरी तक करने की घोषणा थी, पर शनिवार को छुट्टी है। सरकार ने बड़ी उदारता दिखाते हुए अंतिम दिन टोकन लिमिट हटा दी और रात 9 बजे तक टोकन काटने की राहत दी। मगर, भौतिक सत्यापन की अनिवार्यता ने किसानों को असमंजस में डाल दिया है। किसान कह रहे हैं कि टोकन तो मिल जाएगा, लेकिन सत्यापन न होने पर उनकी उपज खरीदी से बाहर हो सकती है।
प्रदेश भर से आई खबरें बताती हैं कि हजारों किसान समर्थन मूल्य से वंचित रहने की कगार पर हैं। उठाव न होने से परेशानी दोगुनी हो गई है, केंद्रों में अव्यवस्था का आलम है, और टोकन न मिलने पर किसान सडक़ों पर उतर आए, यहां तक कि भूख हड़ताल तक करनी पड़ी है। कुछ जगहों पर तो किसानों ने राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिए, क्योंकि लिमिट बढ़ाने के बावजूद टोकन नहीं मिले। कोरबा जिले के दादरखुर्द का उदाहरण लें- यहां 700 किसान पंजीकृत हैं। मगर अंतिम दिन तक 250 किसान धान नहीं बेच पाए हैं। कारण बताया गया है कि उनका डेटा एग्रीस्टेक पोर्टल में फॉरवर्ड नहीं हो पाया। प्रदेशभर में क्या स्थिति है यह, आखिरी आंकड़ा खरीदी प्रक्रिया पूरी होने के बाद पता चलेगा। कुछ जगहों खबरें आ चुकी हैं कि समिति प्रबंधकों को अधिकारी चेतावनी दे रहे हैं कि टारगेट से ज्यादा धान खरीदी बिल्कुल नहीं करना है।
तूता में पूरी गृहस्थी
छत्तीसगढ़ के सबसे प्रमुख फोटो जर्नलिस्ट गोकुल सोनी दशकों तक अखबारी फोटोग्राफर रहे। अब उनका लेखन भी निखरते जा रहा है। फेसबुक पर वे आए दिन अपनी खींची तस्वीरों के साथ लिखते हैं।
ताजा तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा है- यह तस्वीर किसी धोबी घाट की नहीं है। अगर आप कभी नवा रायपुर गए होंगे, तो इस जगह को ज़रूर देखा होगा। राज्योत्सव मेला स्थल के सामने से गुजरते समय सडक़ के बीच लगे डिवाइडर पर और दूसरी ओर कटीले तारों में टंगे असंख्य कपड़े आपकी नजऱ में आए होंगे। दूर से देखने पर यह दृश्य कुछ अटपटा-सा लगता है और सहज ही मन में यही विचार आता है कि शायद आसपास के गांवों के लोगों ने यहां कपड़े सुखा दिए हों।
मैं भी लंबे समय तक यही समझता रहा। लेकिन कुछ दिन पहले जब जिज्ञासा बढ़ी, तो मैंने इस बारे में जानकारी ली। तब पता चला कि यही वह धरना स्थल है, जहां सरकारी कर्मचारी अपनी विभिन्न मांगों को लेकर लगातार धरना देते रहते हैं।
दरअसल, धरना देने वाले ये कर्मचारी महिला और पुरुष दोनों यहीं दिन-रात रहते हैं। रात में पास बने अस्थायी शेड के नीचे सो जाते हैं, सुबह पास ही स्थित तालाब में स्नान करते हैं, अपने कपड़े वहीं धोते हैं और फिर इन्हीं तारों पर उन्हें सुखा देते हैं। सडक़ के बीच लहराते ये कपड़े सिर्फ कपड़े नहीं हैं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और उम्मीद की खामोश कहानी कह रहे हैं। यह कहना कठिन है कि उनकी मांगें कब और पूरी होती हैं या नहीं, लेकिन इन तारों पर सूखते कपड़े मैं हर बार देखता हूं लगातार, बिना थके। वे याद दिलाते हैं कि व्यवस्था के बड़े-बड़े भवनों के बीच भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने अधिकारों के लिए साधारण हालात में असाधारण धैर्य के साथ डटे हुए हैं।शायद अगली बार जब हम वहां से गुजरें, तो इन कपड़ों को सिर्फ एक अजीब दृश्य न समझें, बल्कि उन लोगों के संघर्ष को भी महसूस करें, जिनकी उम्मीदें इन्हीं तारों पर टंगी हवा में झूल रही हैं। क्योंकि कभी-कभी सबसे सच्ची कहानियां शब्दों में नहीं, बल्कि ऐसे ही खामोश दृश्यों में लिखी जाती हैं।
आम आदमी पार्टी का क्या होगा?
छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी कोई करिश्मा नहीं कर पाई। दिल्ली के बाहर पंजाब में सरकार बनने के बाद बाकी राज्यों में भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी। छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में युवा जुड़े भी थे। छत्तीसगढ़ के संदीप पाठक को पंजाब से राज्यसभा में भेजा गया। ताकि यहां पार्टी का आधार मजबूत हो सके, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहां प्रमुख पदाधिकारियों के बीच आपसी खींचतान चलती रही, और गुरुवार को तो प्रदेश अध्यक्ष गोपाल साहू पार्टी छोडक़र चले गए।
बताते हैं कि गोपाल साहू को पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर ओबीसी विंग का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया था। इससे वो खफा हो गए, और फिर उन्होंने बाहर का रास्ता अख्तियार कर लिया। चर्चा है कि गोपाल साहू को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला काफी सोच विचार के बाद लिया गया। कहा जाता है कि पूर्व सीएम भूपेश बघेल की डिप्टी सीएम अरुण साव के खिलाफ टिप्पणी से प्रदेश साहू संघ ने सभी जिलों में प्रदर्शन का ऐलान किया था। इस पर साहू समाज के कई नेता नाराज थे कि समाज को राजनीतिक विवाद में घसीटा जा रहा है।
चर्चा है कि इन विवादों के बीच गोपाल साहू की पूर्व सीएम भूपेश बघेल से बातचीत भी हुई थी। इसके बाद से गोपाल साहू के आम आदमी पार्टी छोडऩे की अटकलें लगाई जा रही थी। गोपाल कोई फैसला लेते, इससे पहले ही पार्टी ने उनका पद नाम परिवर्तन कर स्वतंत्र दिया, और अब चर्चा है कि गोपाल साहू देर सबेर कांग्रेस से जुड़ सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।


