राजपथ - जनपथ
( तस्वीर-प्राण चड्ढा)
आदिम अवस्था में बैगा समुदाय
यह तस्वीर अमरकंटक की है, जहां नर्मदा नदी का उद्गम होता है। एक बैगा जनजाति की महिला दिख रही हैं, जो अपनी सिर पर बहुत बड़ा बोझ उठाए हुए हैं। यह बोझ गरुड़ पेड़ की जड़ से भरा है, जो जंगल से इक_ा की गई एक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी है। जनजाति समुदाय जंगल पर निर्भर रहता है। ऐसी ही जड़ी-बूटियां, जंगली सब्जियां व फल बेचकर वे अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं।
बैगा देश की सबसे पिछड़ी और विशेष रूप से संवेदनशील जनजाति (पीवीटीजी) में से एक हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश के बालाघाट, मंडला, डिंडोरी और अनूपपुर जिलों में इनकी अच्छी-खासी आबादी है। ये जंगल से औषधीय पौधे इक_ा करते हैं और बाजार में बेचने कस्बों और साप्ताहिक हाट-बाजारों में पहुंचते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति अब भी बहुत कमजोर है। गरीबी, शिक्षा की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव इनकी जिंदगी की बड़ी चुनौतियाँ हैं।
इस महिला के माथे पर अंग्रेजी के वी आकार का गोदना देखा जा सकता है। बैगा जनजाति की महिलाओं में यह गोदना बहुत आम है। इसे बचपन में, लगभग 8-10 साल की उम्र में लगवाया जाता है। यह सीता रसोई या अग्नि का प्रतीक माना जाता है और बैगा होने की पहचान देता है। गोदना पूरे शरीर पर लगाए जाते हैं, जो उनकी संस्कृति, पहचान और सुंदरता का हिस्सा हैं। बैगा महिलाएं इन्हें अपनी स्थायी संपत्ति मानती हैं, जो मरने के बाद भी उनके साथ रहती है।
बात करें अमरकंटक की तो यहां आजकल बड़े-बड़े आश्रम और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कांक्रीट की बड़ी-बड़ी संरचनाएं खड़ी हो चुकी हैं, लेकिन बैगा समुदाय का उत्थान उतनी तेजी से नहीं हुआ। प्रोजेक्ट बैगा जैसी सरकारी योजनाएं चलीं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर जोर था- पर असर सीमित है। यह महिला भी ठंडी हवा और शीत लहर में कठिन परिश्रम कर रही है।
यह फोटो हमें बैगा जीवन की सादगी, संघर्ष और मजबूती दिखाती है। साथ ही यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास के बीच इनकी स्थिति को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है?
कुंजाम तैयार होंगे...
बस्तर में नक्सलियों का सफाया हो रहा है। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई अंतिम चरण में है। केन्द्र सरकार ने 31 मार्च से पहले नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा कर चुकी है। इससे परे यहां विकास के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो रही है। भाजपा तो सक्रिय है ही, लेकिन कांग्रेस भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। चर्चा है कि कांग्रेस के रणनीतिकार पूर्व विधायक मनीष कुंजाम को अपने पाले में करने की कोशिश में जुट गए हैं।
सीपीआई लीडर कुंजाम दो बार विधायक रह चुके हैं। बस्तर में अब सीपीआई की पकड़ काफी कमजोर हो गई है। खुद कुंजाम सीपीआई लीडरशिप से नाखुश बताए जाते हैं। विधानसभा चुनाव में तो उन्हें तकनीकी कारणों से सीपीआई का अधिकृत चुनाव चिन्ह तक नहीं मिल पाया था। इसके कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा। चर्चा है कि बस्तर की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए मनीष कुंजाम सीपीआई का साथ छोड़ सकते हैं। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व, कुंजाम को अपने साथ जोडऩे के लिए रूचि दिखा रहे हैं।
बताते हैं कि कुंजाम के कांग्रेस प्रवेश के लिए बस्तर में सक्रिय रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ता प्रयासरत हैं। हालांकि इस तरह की कोशिशें पहले भी हुई थी। वर्ष 2018 के पहले तो राहुल गांधी के कुछ करीबी लोगों की कुंजाम से चर्चा भी हुई थी, मगर बात आगे नहीं बढ़ पाई। अब बस्तर के हालात बदल रहे हैं, और पूर्व मंत्री कवासी लखमा जेल में है। ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकारों को कुंजाम के रूप में एक बड़े चेहरे की जरूरत महसूस हो रही है। देखना है कि कुंजाम कांग्रेस में शामिल होने तैयार होते हैं या नहीं।
छोटी विधानसभा का बड़ा बजट सत्र या....

संसद और मप्र विधानसभा के बजट सत्र की घोषणा हो चुकी है लेकिन छत्तीसगढ़ में अभी इंतजार करना होगा। हालांकि संसदीय कार्य विभाग से सत्र आहूत करने का प्रस्ताव सरकार को बढ़ाए सप्ताह बीत गया है। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव और अन्यान्य राजनीतिक कारणों से अधिसूचना के लिए अभी 5-7 दिन और लग सकते हैं। संसद सत्र दो चरणों में अप्रैल मध्य तक होगा वहीं मप्र का बजट सत्र 16 फरवरी से 9 मार्च तक। 230 विधायकों वाले मप्र विधानसभा की 12 ही बैठकें होंगी। इसी दौरान बजट पेश और पारित किया जाएगा। इतनी बड़ी विधानसभा के इतनी कम बैठकों की चर्चा छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में भी हो रही है। कांग्रेस विधायक दल के वरिष्ठ नेताओं का कहना था कि कहीं यहां भी ऐसा न हो जाए। वैसे भी छोटी विधानसभाओं की कम बैठकों की चर्चा भी होती रहती है। इस पर सरकारी पक्ष का कहना रहता है अधिक बैठकें कर हमारे कामकाज को लेकर विपक्ष को घेरेबंदी का अवसर क्यों दिया जाए। इसकी शुरुआत कांग्रेस सरकारों के पहले कार्यकाल से की गई थी। बहरहाल इन चर्चाओं से दूर छत्तीसगढ़ में 20 बैठकों वाले सत्र की चर्चा, विधानसभा के गलियारों में चल रही है। अब देखना है कि सरकार कितनी बैठकों पर सहमति देती है। चर्चाओं के अनुसार सत्र 16 या 23 फरवरी से शुरू हो सकता है और बजट होली अवकाश से पहले पेश किया जाने की संभावना है। और होली के बाद विभाग वार मांगे पारित कर 20 मार्च के आसपास सत्रावसान कर दिया जाए। ताकि उसके बाद राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जा सके। 9 अप्रैल से पहले राज्यसभा के लिए छत्तीसगढ़ से दो सीटों पर चुनाव होने हैं।
सांसद ने मांगा भी तो क्या मांगा?
कांकेर के सांसद भोजराज नाग अक्सर अलग-अलग वजहों से चर्चा में रहते हैं। इस बार भी मुख्यमंत्री की मौजूदगी में मंच से कुछ ऐसा कह दिया जिसकी वजह से लोग हैरान रह गए। मकर संक्रांति मेले में पहुंचे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के समक्ष एकमात्र मांग यह रखी कि पखांजूर में एग्रीकल्चर कॉलेज खोला जाए। इसके अलावा उन्होंने और कोई मांग सीएम से नहीं की। वास्तविकता यह है कि पखांजूर में पहले से ही एग्रीकल्चर कॉलेज खुल चुका है। सन् 2023 से इसका संचालन हो रहा है। आगामी सत्र के लिए प्रवेश की प्रक्रिया चल रही है। ऐसा नहीं है कि वे कॉलेज के लिए भवन की मांग कर रहे थे। क्योंकि भवन की स्वीकृति भी पहले से मिल चुकी है और उसका भी निर्माण कार्य चल रहा है। सीएम के जाने के बाद लोगों ने सांसद से सवाल किया कि यहां तो एग्रीकल्चर कॉलेज शुरू हो चुका है, क्या आप एक और एग्रीकल्चर खोलने की मांग कर रहे हैं? नाग ने स्वीकार कर लिया कि उन्हें मालूम नहीं था कि यहां एग्रीकल्चर कॉलेज खुल चुका है..। कांकेर संसदीय सीट और जिले की ढेर सारी समस्याएं होंगी- सीएम के सामने मांग रखने का मौका मिला था, पर सांसद अपने क्षेत्र की जरूरतों से वाकिफ नहीं लगे। उन्होंने वह मांग कर डाली, जो मांग पहले ही पूरी हो चुकी है।


