राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : आगे-पीछे लिखा फ़लसफ़ा
16-Jan-2026 6:29 PM
राजपथ-जनपथ : आगे-पीछे लिखा फ़लसफ़ा

आगे-पीछे लिखा फ़लसफ़ा

पहले केवल ट्रक-बस या किसी और मालवाहक के पीछे फलसफे की बातें लिखी रहती थीं, बात के बरसों में टी-शर्ट के सामने भी यह लिखना शुरू हुआ, लोग बिना सोचे-समझे दार्शनिक की तरह बड़ी-बड़ी बातें टांगे घूमते हैं। लेकिन कुछ बातें बड़ी मजेदार रहती हैं।

टी-शर्ट के सामने लिखी बातें- ‘मैं आलसी नहीं हूं, बैटरी बचा रहा हूं।‘ ‘बैटरी खत्म होने को है, बाद में परेशान करें।’ ‘मैं बहस नहीं कर रहा हूं, सिर्फ यही बता रहा हूं कि मैं सही क्यों हूं।’ ‘मैं बूढ़ा नहीं हूं, मैं एंटीक हूं।’

एक लाइन टी-शर्ट के पीछे भी लिखी दिखती है- ‘मेरा पीछा मत करो, मैं खुद ही राह भटक चुकी हूं।’

गाडिय़ों के पीछे लिखा दिखता है, ‘हँस मत पगली, प्यार हो जाएगा।’ ‘धीरे-धीरे चलोगे तो बार-बार मिलेंगे, तेज चलोगे तो हरिद्वार मिलेंगे।’ ‘जरा कम पी मेरी रानी, बहुत महंगा है इराक का पानी।’ ‘बुरी नजर वाले तू सौ साल जिए, तेरे बच्चे दारू पी-पीके मरें।’ ‘सावधानी हटी, सब्जी-पूड़ी बटी।’

अभी एक ऐसा टी-शर्ट देखने में आया जिसके सामने लिखा है- ‘नेवर क्विट, डू युअर बेस्ट, ’ (कभी पलायन मत करो, अपनी सबसे कड़ी कोशिश करो)।

अब प्रेरणा, या मजे की इन बातों का क्या मतलब निकालना चाहिए, यह सडक़ों पर या दूसरी जगहों पर इन्हें पढक़र निकालते रहें।

चुनाव और धनबल

चुनाव लोकतंत्र का पर्व कहलाता है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि अधिकांश चुनावों में पैसा निर्णायक भूमिका निभा रहा है। महाराष्ट्र में म्युनिसिपल चुनाव प्रचार के लिए छत्तीसगढ़ से गए कुछ नेताओं ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि हाईप्रोफाइल बीएमसी(मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) के चुनाव में तो मर्सिडीज में घूमने वाले लोगों ने भी प्रत्याशियों से नगद-उपहार लेने में संकोच नहीं किया।

छत्तीसगढ़ में भी म्युनिसिपल, और पंचायत के चुनावों में धन बल का  काफी इस्तेमाल हुआ है। चुनाव में धन बल का इस्तेमाल अब निजी संस्थाओं में होने लगा है। करीब 60 साल पुराने रायपुर प्रेस क्लब के चुनाव में भी धन बल का खुलकर प्रयोग किया गया। यह चुनाव हाईकोर्ट के आदेश पर जिला प्रशासन की निगरानी में हुआ।

ये वही प्रेस क्लब है जहां शुरूआत में एक दशक पत्रकार निर्विरोध पदाधिकारियों का चुनाव करते थे। इस बार प्रेस क्लब का नेता बनने के लिए पत्रकारों में होड़ मची रही। चुनाव के दौरान मोतीबाग स्थित प्रेस क्लब बैनर-पोस्टर से पटा रहा। होटलों में पार्टियों का दौर खूब चला।

अध्यक्ष के बाद कोर कमेटी?

भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। छत्तीसगढ़  से सीएम विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरूण साव व विजय शर्मा के अलावा प्रदेश अध्यक्ष किरण देव समेत कुल 17 नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रस्तावक, और समर्थक बनेंगे।

पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी भी हैं। लिहाजा, उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर निर्वाचन को लेकर छत्तीसगढ़ के नेता उत्साहित हैं। इसी महीने नितिन नबीन की जगह नए प्रभारी की नियुक्ति भी हो जाएगी।

संकेत यह भी है कि छत्तीसगढ़ भाजपा की सबसे ताकतवर कोर कमेटी का पुनर्गठन भी होगा। कोर कमेटी में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह भी हैं, लेकिन अब वो स्पीकर के पद पर हैं लिहाजा उनकी जगह नई नियुक्ति भी हो सकती है। कोर कमेटी में सीएम विष्णुदेव साय के अलावा प्रदेश अध्यक्ष किरणदेव, दोनों डिप्टी सीएम के अलावा रामविचार नेताम, केन्द्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू सहित अन्य सदस्य हो सकते हैं। चर्चा है कि नई कोर कमेटी महीनेभर में अस्तित्व में आ जाएगी।

उदंती में इंद्रधनुषी गिलहरी

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की जंगल सफारी उस वक्त और खास हो गई, जब कुछ पर्यटकों की नजर एक बेहद खूबसूरत और दुर्लभ जाइंट गिलहरी पर पड़ गई। पेड़ की ऊंची डाल पर आराम फरमाती और फिर फुर्ती से छलांग लगाती इस गिलहरी ने देखते ही देखते सबका ध्यान खींच लिया। रंग-बिरंगा शरीर और लंबी, घनी पूंछ देखकर लोग रोमांच से भर उठे। कैमरे से कुछ अच्छी तस्वीरें भी ले ली गईं।

इसे आम बोलचाल में इंद्रधनुषी गिलहरी कहा जाता है। काले, भूरे, लाल और पीले रंगों का ऐसा अनोखा मेल कि देखने वाला ठहर जाए। आमतौर पर यह प्रजाति पश्चिमी घाट के जंगलों में पाई जाती है, इसलिए छत्तीसगढ़ के इस टाइगर रिजर्व में इसका दिखना अपने आप में बड़ी बात मानी जा रही है। महाराष्ट्र में इसे शेकरू कहा जाता है, जो वहां का राजकीय पशु भी है। यह गिलहरी दिन में ज्यादा सक्रिय रहती है और पेड़ों के बीच 15-20 फीट तक छलांग लगा सकती है। फल, बीज और पत्तियां ही इसका भोजन हैं। वन विभाग का कहना है कि जाइंट गिलहरी का यहां नजर आना इस बात का संकेत है कि जंगल का माहौल सुरक्षित और संतुलित है।

मेहनतकश लोगों से बना बेजोड़ पुल

जब शासन-प्रशासन की राह देखने के बजाय गांव खुद पहल करता है, तो विकास की राह अपने आप निकल आती है। कोंडागांव जिले के छोटे से गांव सोनाबाल ने यही कर दिखाया है। शिक्षा और आस्था के प्रति जिम्मेदारी समझते हुए ग्रामीणों ने श्रमदान से लकड़ी का बेली ब्रिज तैयार कर लिया, जो आज गांव के लिए जीवनरेखा बन चुका है। बरसात के दिनों में गांव के चारों ओर बहने वाले नालों में पानी भर जाने से रास्ते बंद हो जाते थे। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को होती थी, जिन्हें स्कूल पहुंचने में जोखिम उठाना पड़ता था। पिछले साल इसी समस्या से जूझने के बाद ग्रामीणों ने तय किया कि अब हर साल हालात और प्रशासन के भरोसे नहीं रहा जाएगा। गांव के लोगों ने सामूहिक निर्णय लिया और स्थानीय शिल्पकार ने पुल का डिजाइन तैयार किया। इसके बाद लकड़ी, औजार और मेहनत, सब गांव से ही जुटा। किसी ने सामग्री दी, तो किसी ने पुल निर्माण में हाथ बंटाया।

आज इस पुल को बने एक साल हो चुका है। बच्चे बेखौफ स्कूल जा रहे हैं, श्रद्धालु नियमित मंदिर पहुंच रहे हैं और ग्रामीण खुद पुल की देखरेख कर रहे हैं। सोनाबाल का यह पुल सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर गांव की जमीनी तस्वीर है, जो बताती है कि सामूहिक इच्छाशक्ति से असंभव भी संभव हो सकता है।


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