राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : जल है तो कल है...
14-Dec-2025 6:21 PM
राजपथ-जनपथ : जल है तो कल है...

जल है तो कल है...

धर्म की कुछ बातें भी पर्यावरण की भी हो सकती हैं। अब जैसे छत्तीसगढ़ में दिखी इस गाड़ी के पीछे लिखा है, सारी समस्या का हल, एक लोटा जल।

अब यह जल सूरज को चढ़ाने की बात हो रही है, या एक लोटा जल बचाने की बात हो रही है, या किसी प्यासे को पिलाने की बात हो रही है, यह तो नहीं पता, लेकिन यह तो तय है कि पर्यावरण के हिसाब से आने वाले दशकों में जल सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है, देशों के बीच जंग भी पानी को लेकर होगी, ऐसा भी कई लोगों का अंदाज है।

शाह का मिशन बस्तर

नक्सलियों के खिलाफ अभियान चल रहा है। इन सबके बीच केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह लगातार बस्तर दौरा कर रहे हैं। जब भी उन्हें बस्तर में किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया जाता है, तो वो हामी भर देते हैं। शाह पिछले दिनों डीजीपी-एसपी कॉन्फ्रेंस में शिरकत करने रायपुर आए थे, तो उस वक्त डिप्टी सीएम अरुण साव ने बस्तर ओलंपिक के समापन समारोह में शामिल होने का आमंत्रण दिया था। शाह ने तुरंत सहमति दे दी, और वो शनिवार को बस्तर ओलंपिक के समापन कार्यक्रम में उपस्थित हुए।

शाह का बस्तर दौरा हो रहा है, तो कांग्रेस के नेता सवाल भी उठा रहे हैं। पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने पूछ लिया, कि शाह बार-बार बस्तर क्यों आ रहे हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि वो (शाह) मणिपुर क्यों नहीं जाते हैं? पूर्व सीएम  ने आरोप लगाया कि बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के साथ ही अडानी की एंट्री हो जाएगी। पूर्व सीएम के बयान पर भाजपा की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन अमित शाह ने बस्तर ओलंपिक के समापन मौके पर अपने इरादे साफ किए।

उन्होंने कहा कि अगले पांच साल में बस्तर के सात जिले प्रदेश के सबसे विकसित आदिवासी जिले बनेंगे। शाह ने अपने उद्बोधन में बस्तर प्लान से भी अवगत कराया, और बताया कि किस तरह सरकारी संस्थाओं के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जाएगा। उन्होंने वनोपज आधारित उद्योग लगाने, पर्यटन को बढ़ावा देकर बस्तर को विकसित करने के लक्ष्य की जानकारी दी। शाह ने साफ तौर पर संकेत दिए कि वो बस्तर की विकास योजनाओं की सीधी मॉनिटरिंग कर रहे हैं। सहकारिता विभाग, अमित शाह के पास है। ऐसे बस्तर के विकास में सहकारी संस्थाओं की भूमिका अहम होगी। देखना है कि आगे क्या होता है।

घरवालों का इंतजाम

एक आदमी अपने घर में लोगों को लगातार यह बोल-बोलकर निराश करते रहता था कि उसकी जिंदगी का अब कोई ठिकाना नहीं है। जब कोई दिन में चार बार ऐसी बात करे, तो उसका असर तो खत्म होना ही था। एक दिन रात को खाने के साथ टेबिल पर उसे एक छोटा सा सीलबंद प्याला भी मिला जिस पर लेबल लगा था- गंगाजल।

उसने हैरान होकर पूछा कि यह क्या है?

परिवार ने कहा कि आपकी तबियत ठीक नहीं रहती है, आप ही सारे वक्त ऐसा बोलते हैं, इसलिए थोड़ी सी तैयारी कर रखी है।

लिवर को यकृत कहना कैसा लगेगा?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में उठाए गए कई कदमों से एक यह है कि हिंदी के गौरव को बढ़ाने और प्रचार-प्रसार के लिए ज्यादा से ज्यादा पाठ्यक्रम हिंदी में हों। कई हिंदी भाषा-भाषी राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाते हुए मेडिकल जैसी कठिन पढ़ाई को भी हिंदी में शुरू करने का फैसला किया। इनमें मध्य प्रदेश सबसे पहला राज्य था- जहां मेडिकल की किताबें हिंदी में आ गई और पढ़ाई शुरू हो गईं। इसके बाद राजस्थान, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकारों ने भी घोषणा की। छत्तीसगढ़ में भी हिंदी में पढ़ाई का पूरा इंतजाम कर लिया गया। भावनात्मक तौर पर यह एक अच्छा फैसला था क्योंकि इन राज्यों के अधिकांश युवा हिंदी से ही हायर सेकेंडरी परीक्षा पास किए हुए होते हैं। अंग्रेजी माध्यम से भी पढ़े हों तब भी हिंदी से उनका गहरा संपर्क होता है, मातृभाषा है। मगर, हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई छात्र करना नहीं चाहते। छत्तीसगढ़ में बीते सत्र में पूरे प्रदेश के केवल 2 छात्रों ने हिंदी में परीक्षा देने का विकल्प चुना था, जबकि अभी जो सत्र चालू हुआ है- उसमें एक भी छात्र नहीं है। डीएमई ने खुद यह बात मीडिया से कही है। यह जानकारी भी दी है कि हिंदी पढ़ाई के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पूरा तैयार किया गया है। मध्यप्रदेश सहित दूसरे राज्यों का भी यही हाल है- जहां हिंदी में पढ़ाई और परीक्षा नगण्य है। किताबें लाइब्रेरियों में रखी गईं, यहां तक कि परीक्षा शुल्क में छूट जैसे प्रोत्साहन भी दिए गए, फिर भी छात्र दूर भाग रहे हैं।

मेडिकल टर्मिनोलॉजी दरअसल अंग्रेजी पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल, रिसर्च पेपर, दवाइयां, उपकरण और ग्लोबल स्टैंडर्ड सब अंग्रेजी में हैं। हिंदी अनुवाद बोलें तो हिंदी नहीं हिंग्लिश है जैसे लिवर को लिवर ही लिखना पड़ रहा है।  इसे यदि यकृत लिखकर पढ़ाया जाए तो छात्र और शिक्षक दोनों सिर पकड़ लेंगे। इधर, नीट-पीजी की प्रवेश परीक्षाएं तो हिंदी में शुरू हुई नहीं हैं। इंटरनेशनल रिसर्च पेपर, नई किताबें सबसे पहले अंग्रेजी में छपकर आती हैं। हिंदी में तो सिर्फ पाठ्यक्रम की किताबें मिल रही हैं, यदि प्रैक्टिस, रिसर्च और करियर का दायरा बढ़ाने की जरूरत हुई तो अंग्रेजी की ओर देखना पड़ेगा।  यही वजह है कि हिंदी पृष्ठभूमि वाले छात्र भी अंग्रेजी चुन रहे हैं।

10 करोड़ दिलों तक पहुंची लावण्या

पिछड़े वर्ग से आने वाली जगदलपुर के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक की बेटी रील क्रिएटर लावण्या दास मानिकपुरी इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त हलचल मचा रही हैं। अपने घर के छोटे से कमरे में, सीमित संसाधनों के बीच बनाई गई उनकी इंस्टाग्राम रील जिसमें वह अफगान जलेबी गाने पर कमर पर तलवार संतुलित करते हुए नृत्य करती दिख रही हैं। 3 दिसंबर को रिलीज इस रील ने आज करीब 10 दिनों में 10 करोड़ से ज्यादा व्यूज़ बटोर लिए हैं। इस एक मिनट की रील पर 60 लाख से अधिक लाइक्स भी आ चुके हैं और उनके फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढक़र 15 लाख से ज्यादा हो गई है। कुछ दिन पहले तक जिनका नाम सीमित दायरे में था, आज वही लावण्या देश-विदेश में देखी और सराही जा रही हैं।

लावण्या के पास न बड़ा स्टूडियो है, न भारी संसाधन। बस मेहनत और अभ्यास ने उसे मशहूर कर दिया। उसके और भी कई रील्स हैं, जो करोड़ों में देखे जा चुके हैं। सोशल मीडिया नायाब चीज है। यहां प्रतिभा की तरफ लोगों का ध्यान गया तो रातों-रात मशहूर हुआ जा सकता है। 


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