रायपुर
मूल उद्देश्यों से भटकता विवि, विशेष अधिनियम की भावना पर उठे सवाल
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 12 मई। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय एक समय देश में पत्रकारिता एवं जनसंचार शिक्षा के विशिष्ट केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था, लेकिन अब यही विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य और वैधानिक दायरे से भटकता नजर आ रहा है।
विश्वविद्यालय की स्थापना का स्पष्ट उद्देश्य पत्रकारिता, जनसंचार, मीडिया अध्ययन एवं उससे जुड़े विषयों में उच्च शिक्षा, शोध और प्रशिक्षण प्रदान करना था। हालांकि वर्तमान स्थिति इसके ठीक विपरीत दिखाई दे रही है। विश्वविद्यालय में अब एमबीए (ह्यूमन रिसोर्स), एमबीए (हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन), बीबीए, बी.लिब., एम.लिब., एम.ए. (हिंदी साहित्य ) तथा एम.ए. (छत्तीसगढ़ी) जैसे अनेक ऐसे पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं, जिनका पत्रकारिता एवं जनसंचार से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि विशेष अधिनियम के तहत स्थापित किसी विश्वविद्यालय द्वारा अपने मूल विषयों को दरकिनार कर असंबंधित पाठ्यक्रम चलाना अधिनियम की भावना और उद्देश्य दोनों के विपरीत है। विशेषज्ञ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि जब प्रदेश में सामान्य एवं पारंपरिक विषयों के संचालन के लिए रविशंकर विश्वविद्यालय, जैसे प्रदेश में अन्य राजकीय विश्वविद्यालय पहले से संचालित हैं, तब पत्रकारिता एवं जनसंचार के लिए स्थापित विशेष विश्वविद्यालय द्वारा गैर-प्रासंगिक विषयों का संचालन किस आधार पर किया जा रहा है। जानकारों के अनुसार इससे न केवल विश्वविद्यालय पर अनावश्यक वित्तीय भार बढ़ा है, बल्कि पत्रकारिता शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। सबसे अधिक सवाल एमबीए (हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन) पाठ्यक्रम को लेकर उठ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अस्पताल प्रशासन जैसे तकनीकी एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रम के संचालन के लिए नवा रायपुर में आयुष
विश्वविद्यालय और एम्स है। ऐसे पाठ्यक्रम के लिए विवि के पास स्वयं का अस्पताल, संबद्ध चिकित्सा संस्थान अथवा पर्याप्त प्रायोगिक अधोसंरचना होना अनिवार्य है। किंतु विश्वविद्यालय के पास ऐसी कोई समुचित व्यवस्था उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक शिक्षा देकर डिग्री प्रदान करना शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के भविष्य दोनों के साथ खिलवाड़ माना जा रहा है।
जिन उद्देश्यों को लेकर इस संस्थान की स्थापना की गई थी, वही विषय आज फैकल्टी और अन्य सुविधाओं के लिए उपेक्षा का शिकार होते दिखाई दे रहे हैं, जबकि गैर-प्रासंगिक पाठ्यक्रमों का विस्तार लगातार बढ़ रहा है। शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों ने राज्य सरकार तथा उच्च शिक्षा विभाग से मांग की है कि विश्वविद्यालय में संचालित सभी पाठ्यक्रमों की वैधानिकता, अधिनियम के अनुरूपता और शैक्षणिक आवश्यकता की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि समय रहते स्थिति की गंभीर समीक्षा नहीं की गई, तो यह विश्वविद्यालय अपने विशिष्ट चरित्र, शैक्षणिक विश्वसनीयता और राष्ट्रीय पहचान- तीनों को खो सकता है।
कुलपति डॉ मनोज दयाल का कहना है कि अन्य विषयों के पाठ्यक्रम लागू किए जा सकते हैं। यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी लागू हैं। जर्नलिज्म से सम्बद्ध पाठ्यक्रम खोले गए हैं ?। कोई दिक्कत नहीं है। उन्होंने बताया कि गुजरात के संस्कृत विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग, फिजिक्स साइंस आर्ट्स के भी पाठ्यक्रम संचालित होते हैं।आने वाले दिनों में सोशल साइंस, सायकोलॉजी के पाठ्यक्रम लागू करने जा रहे हैं।


