रायपुर

कमउम्र के प्रेम, सेक्स, और शादी, आते हैं खतरों-चुनौतियों के साथ..
14-Sep-2025 4:22 PM
कमउम्र के प्रेम, सेक्स, और शादी, आते हैं खतरों-चुनौतियों के साथ..

राजस्थान में एक एससी-एसटी अदालत की जज ने दो अभियुक्तों को उम्रकैद सुनाई है। इनमें से एक मरने वाले की पत्नी का प्रेमी था, जिसने अपना छिन गया प्रेम पाने के लिए, या हिसाब चुकता करने के लिए प्रेमिका के पति को मार डाला। यह पति 19 साल का था, पत्नी 16 साल की थी, और शादी हुए कुछ साल हो चुके थे। मतलब यह कि इस लडक़े-लडक़ी का यह बाल विवाह सरीखा हुआ था, और जाहिर है कि उस उम्र में न तो वो कोई पसंद बनाने के लायक थे, और न ही नापसंद को खारिज करने की पारिवारिक और सामाजिक ताकत उनमें रही होगी। ढाई साल से तो यह मामला ही चल रहा था। और जब यह कत्ल हुआ था, उस वक्त यह पत्नी कुल 16 साल की थी, इसलिए उसे किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश किया गया था।

मतलब यह कि यह असफल प्रेम-प्रसंग के बाद हुआ कत्ल बनने के पहले ही यह बाल विवाह का एक जुर्म बन चुका था। कमउम्र लडक़े-लड़कियों की शादी के बाद जब वे बालिग होते हैं, तो आगे की जिंदगी में ऐसे जोड़ों में कई तरह के तनाव खड़े होते हैं। देश के कुछ राज्यों से ऐसे बाल विवाह के बाद जो लोग ऊंची सरकारी नौकरियों मेें पहुंचते हैं, तो उनमें से कई लोग बचपन की शादी को भूलकर नए मिले सरकारी ओहदे की शान-शौकत के मुताबिक दूसरी बीवी ढूंढ लेते हैं। राजस्थान में ऐसे कई बाल विवाह के बाद कई दूसरी शादियों के मामले सामने आते हैं।

कमउम्र के प्रेमसंबंध से लेकर बाल विवाह तक हर किसी में कई तरह के खतरे रहते हैं। अभी छत्तीसगढ़ में 16 बरस की एक लडक़ी ने खुदकुशी कर ली। परिवार ने बताया कि वह तीन बरस से एक मुस्लिम लडक़े के साथ प्रेमसंबंध में थी, और वह उस पर बुर्का पहनने का दबाव डालता था। लडक़ी के परिवार की शिकायत में पूजा-पाठ के विरोध करने जैसा भी कुछ जिक्र है। लेकिन जो बात कुछ हैरान करती है, वह यह है कि 16 बरस की लडक़ी 3 बरस से प्रेमसंबंध में थी, उसी गांव-कस्बे में प्रेमी के साथ अलग रहती थी, और अब खुदकुशी के बाद परिवार उस लडक़े के खिलाफ यह शिकायत कर रहा है। तीन बरस पहले जब लडक़ी 13 बरस की रही होगी, उस वक्त भी यह शिकायत हो सकती थी, या बाद में जब वह अलग रहने लगी, तब भी एक नाबालिग लडक़ी को परिवार से दूर करने की शिकायत हो सकती थी। लेकिन अब यह मौत हो जाने के बाद बुर्के की बात आ रही है, जो कि परिवार की जिम्मेदारियों के पैमाने पर कुछ हैरान करने वाली बात है।

अलग-अलग इन दोनों घटनाओं का एक-दूसरे से अधिक लेना-देना नहीं है, सिवाय इसके कि दोनों ही मामलों में नाबालिग लड़कियों का जिक्र आता है। एक में परिवार ने मर्जी से बाल विवाह कर दिया था, और दूसरे मामले में परिवार अपनी नाबालिग बेटी को दूसरे धर्म के प्रेमी के साथ अलग रहते देखते आ रहा था। नाबालिग बच्चों के प्रति मां-बाप और समाज की जो जिम्मेदारी बनती है, उसे कुछ अधिक दूर तक समझने की जरूरत है।

दुनिया के कई देशों में किशोरावस्था में पहुंचे हुए लडक़े-लड़कियों के आजादी से साथ घूमने का सामाजिक माहौल रहता है। पश्चिम के अधिकतर देशों में भारतीय बालिग उम्र से कमउम्र के भी लडक़े-लड़कियां परिवार से अलग भी रहने लगते हैं, या एक-दूसरे के घरों में भी जाकर ठहरने लगते हैं। परिवार यह मानकर चलते हैं कि किशोरावस्था के कुछ साल गुजर जाने के बाद इस पीढ़ी के लोग अब अपनी मर्जी से जिएंगे, और बालिग हो जाने के बाद भी जो लोग घर छोडक़र नहीं निकलते हैं, उन्हें कुछ अटपटा समझा जाता है, और ऐसे लोगों पर कुछ-कुछ लतीफे और कार्टून भी बनते हैं।

भारत में हाल यह है कि शादी के लिए लडक़ा-लडक़ी छांटना मां-बाप अपना विशेषाधिकार समझते हैं, बल्कि काफी हद तक इसे बुनियादी हक समझते हैं। इसके बाद बेटा-बहू कितने समय में बच्चे पैदा करें, कितने बच्चे पैदा करें, यह सब तय करना भी मां-बाप अपना हक मानते हैं। बेटे की मां जिंदगी का सबसे बड़ा त्याग तब करती है, जब वह बेटे-बहू के साथ हनीमून पर जाने के बजाय घर पर ही रूकने का फैसला दिल बड़ा कड़ा करके लेती है। इस देश में आल-औलाद का बचपन अधेड़ हो जाने पर भी पूरा नहीं गुजरता, और इसलिए बाल विवाह से लेकर बाकी सारे फैसले मां-बाप अपने मरने तक करना पसंद करते हैं। ऐसे में लडक़े-लड़कियों में किसी भी तरह हुए प्रेमप्रसंग से लेकर लिव-इन रिश्ते तक, या शादी तक वह परिपक्वता नहीं आ पाती, जो कि एक उन्मुक्त समाज में आसानी और सहजता से आ जाती है। नतीजा यह हो रहा है कि भारत में लडक़े-लड़कियां वक्त आने के पहले ही सेक्स और शादी के रिश्तों में पड़ जाते हैं, क्योंकि आगे के बारे में उन्हें अंदाज रहता है कि शादी की इजाजत मांगने पर मां-बाप शहंशाह अकबर बनकर दीवार में चुनवा देने को खड़े हो जाएंगे।

कहीं मां-बाप बाल विवाह कर देते हैं, कहीं नाबालिग लडक़ी किसी प्रेम और देहसंबंध में बिना जिम्मेदारी समझे उलझ जाती है, और उसे सुलझे तरीके से लेने की समझ यहां नहीं रहती। यह सिलसिला नई पीढ़ी के बच्चों, और उनके मां-बाप, दोनों के लिए ही खतरनाक है। कहीं हसरतों को मां-बाप कुचल देते हैं, तो कहीं जिंदगी की हिफाजत को बच्चे खुद कुचल देते हैं। आज नई पीढ़ी की हसरतों को सुरक्षित तरीके से पूरा होने देने का सामाजिक माहौल भारत में नहीं है, और उसकी वजह से बहुत तरह की हिंसा हो रही है, कई तरह के रिवेंज-पोर्न, और ब्लैकमेलिंग की नौबत आ रही है। यह पूरे समाज को सोचना होगा कि नौजवान पीढ़ी को किस तरह कुछ अधिक हद तक मिलने-जुलने की छूट दी जाए, और उसके पहले पेशेवर परामर्शदाताओं की नसीहतें भी उनको दिलवा दी जाएं।

बाल विवाह वैसे भी कानूनी अपराध है, और लोगों को उससे दूर रहना चाहिए। किसी नाबालिग लडक़ी या लडक़े से बालिग के सेक्स-संबंध एक अलग किस्म का गंभीर जुर्म है, और उससे भी लोगों को बचना चाहिए। आज तो हालत यह है कि कई शादीशुदा लोग भी नाबालिग को लेकर भाग जाते हैं, पता नहीं उन्हें कानून का कोई डर कैसे नहीं रहता। ऐसी बहुत सी बिखरी-बिखरी दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए लोगों को प्रेम, सेक्स, और विवाह संबंधों के बारे में कानून और तन-मन की जरूरतों के बारे में सोचना चाहिए। इस निजी, पारिवारिक, और सामाजिक चुनौती को अनदेखा करने से कुछ भी सुधरने वाला नहीं है, इसे एक हकीकत मानते हुए ही इसका इलाज ढूंढना चाहिए। किसी पुराने समझदार ने यह कहा था कि किसी समस्या के समाधान की दिशा में पहला कदम यही होता है कि उस समस्या के अस्तित्व को माना जाए। आज युवा पीढ़ी की हसरतों और जरूरतों को अनदेखा करने के बजाय उनके अस्तित्व को मानने की जरूरत है।

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