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ये तस्वीर बिलासपुर से महज़ 13 किलोमीटर दूर कोपरा जलाशय से लगे एक सूखे तालाब की है, जहाँ ऊँची हरी - सूखी घास छोटे-बड़े परिंदों की पनाहगाह थी। इस तालाब को गहरा करने के लिए घास कटवाकर आग के हवाले कर दिया गया, सैकड़ों परिंदे दूसरे आशियाने की तलाश में कहीं और उड़ गए। तस्वीर लेते वक्त आस-पास कुछ परिन्दें नज़र आये, यक़ीनन घर (रहवास) में लगी आग को निहार रहे थे।
पक्षियों और जैव विविधता के संरक्षण का शोर मचाने वालों को ये तस्वीर भले ही आहत न करे लेकिन ऐसे हालात पक्षियों के भविष्य पर गहराते संकट की भयावह तस्वीर सामने ला सकते हैं। हाल ही में 'गिधवा-परसदा' में पक्षी महोत्सव के लिए जो हुआ, जैसा हुआ किसी से छिपा नहीं है। कोपरा में पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियां साल भर दिखाई देती हैं, यहां समय-समय पर विदेशी परिन्दें अपना आशियाँ बनाते रहें हैं लेकिन कोपरा को लेकर वन विभाग की उदासीनता किसी से छिपी नहीं है। पक्षियों के संरक्षण की बात सिर्फ बंद कमरों, तस्वीरों और सरकारी किताबों तक ही सीमित रह गई है। वैसे तो पक्षी संरक्षण के लिए राज्य में कइयों बाहरी गैर सरकारी संस्थाएं भी काम कर रहीं हैं मगर उनकी मंशा और पक्षियों के प्रति जिज्ञासा केवल प्रोजेक्ट पूरा होने तक है।
कोपरा में प्रवास पर हर साल पक्षियों की कई प्रजाति दूर देशों से आती रही है, मगर वन महकमा उनके लिए हमेशा गूंगा, बहरा और अंधा बना रहा। हाल ही में सकरी-पेंड्रीडीह निर्माणाधीन बाईपास पर वन महकमें ने एक सरकारी बोर्ड लगाकर चेतावनी लिख दी 'प्रवासी पक्षियों को परेशान करना अपराध है' . विभाग ने बोर्ड लगाकर उन चिड़ीमारों को आगाह किया जो कोपरा के भीतरी इलाके में पक्षियों का शिकार करते हैं। खैर निर्माणाधीन सड़क पर पक्षियों के लिए की गई सरकारी खानापूर्ति का सरकारी बोर्ड अब भगवान भरोसे किनारे पड़ा है। यहां किसी पर आरोप-प्रत्यारोप की बात नहीं, बात मूल विषय (पक्षियों) को लेकर गंभीर होने की है। पक्षियों की वकालत के लिए जरुरी है कि हम सच और निष्पक्ष बोलना शुरू करें।
(तस्वीर और टिप्पणी बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से सत्यप्रकाश पांडेय द्वारा)


