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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष की ओर से जांच समिति गठित किए जाने के फ़ैसले को चुनौती दी थी.
यह समिति उनके ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव के सिलसिले में न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत बनाई गई थी. यह मामला जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास पर भारी मात्रा में कैश मिलने से जुड़ा है.
लाइव लॉ के मुताबिक़, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह फ़ैसला सुनाया. इस मामले में 8 जनवरी को सुनवाई के बाद फ़ैसला सुरक्षित रखा गया था.
सुनवाई के दौरान जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और लोकसभा सचिवालय की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश की थीं.
याचिका में मुख्य तर्क यह दिया गया था कि एक ही दिन, 21 जुलाई को, लोकसभा और राज्यसभा दोनों में महाभियोग नोटिस दिए जाने के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा के सभापति के फ़ैसले का इंतज़ार किए बिना ही जांच समिति का गठन कर दिया.
याचिका में यह भी कहा गया कि क़ानून के तहत अनिवार्य संयुक्त परामर्श की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई.
दलील दी गई कि यह प्रक्रिया न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के ख़िलाफ़ है. (dw.com/hi)


