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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का दूरगामी असर डालने वाला फैसला
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 16 जनवरी। छत्तीसगढ़ में प्रचलित चूड़ी विवाह के मामले में हाईकोर्ट ने एक दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 का उल्लंघन कर किया गया विवाह, धारा 11 के तहत शुरू से ही शून्य (अमान्य) माना जाएगा। ऐसे विवाह को किसी भी स्थिति में परंपरा, रिवाज या सामाजिक मान्यता के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता।
दुर्ग जिले की रहने वाली सूरज बाई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। उनके पिता सगनुराम के नाम ग्राम धमेली में 2.47 हेक्टेयर जमीन थी। सगनुराम की पहली पत्नी निकमी बाई का निधन हो चुका था, उस समय सूरज बाई की उम्र करीब पांच साल थी। इसके बाद करीब 37 साल पहले सगनुराम ने ग्वालिन बाई से चूड़ी विवाह किया।
ग्वालिन बाई पहले से विवाहित थीं और उनके दो बच्चे हिरन बाई और सुखिया बाई पहले पति से थे। सगनुराम उन्हें अपने घर लाए, पाला-पोसा और उनकी शादी भी कराई। सगनुराम की मृत्यु 29 दिसंबर 1987 को हुई और इसके कुछ समय बाद 3 फरवरी 1988 को ग्वालिन बाई का भी निधन हो गया।
माता-पिता के निधन के बाद सगनुराम की जमीन का नाम राजस्व रिकॉर्ड में सूरज बाई के नाम दर्ज किया गया। इस पर ग्वालिन बाई के पहले पति से जन्मे बच्चों ने आपत्ति जताई और जमीन में आधा हिस्सा मांगा। उनका तर्क था कि ग्वालिन बाई सगनुराम की पत्नी थीं, इसलिए उन्हें भी हक मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने तथ्यों के अवलोकन के बाद पाया कि ग्वालिन बाई ने जब सगनुराम से चूड़ी विवाह किया तो उसका पहला पति जीवित था। ऐसे में सगनुराम का उसके साथ किया गया चूड़ी विवाह कानूनन अमान्य है। कोर्ट ने माना कि पहले अपीलीय न्यायालय द्वारा ग्वालिन बाई को वैध पत्नी मानना तथ्यों और कानून दोनों के विपरीत था।
कोर्ट ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, बालोद द्वारा 29 जनवरी 2005 को दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया और सिविल जज (क्लास-एक), बालोद के 13 सितंबर 2002 के फैसले को सही ठहराया। इस फैसले के साथ ग्वालिन बाई के पहले पति से जन्मे बच्चों का सगनुराम की संपत्ति पर दावा खत्म हो गया है।


