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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 18 जनवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी को मौका दिए बिना उसकी गोपनीय चरित्रावली (एसीआर) में की गई नकारात्मक टिप्पणी का कोई कानूनी आधार नहीं होता। अदालत ने कहा कि यदि संबंधित कर्मचारी को शो-कॉज नोटिस नहीं दिया गया, तो ऐसी टिप्पणी प्रभावहीन मानी जाएगी। यह फैसला पदोन्नति और सेवा लाभ से जुड़े मामलों में दूरगामी असर डालने वाला माना जा रहा है।
यह प्रकरण आबकारी विभाग के जांजगीर-चांपा जिले में पदस्थ हेड कांस्टेबल मुकेश शर्मा का है। वर्ष 2023 में रायपुर में आबकारी आयुक्त द्वारा हेड कांस्टेबल से सब-इंस्पेक्टर पदोन्नति के लिए विभागीय परीक्षा आयोजित की गई।
परीक्षा में अच्छे अंक लाने के बावजूद, वर्ष 2017, 2018 और 2019 की एसीआर में दर्ज नकारात्मक टिप्पणियों के आधार पर उनके अंक घटा दिए गए, जिससे उन्हें पदोन्नति नहीं मिल सकी।
इस निर्णय से आहत होकर मुकेश शर्मा ने अधिवक्ता अभिषेक पांडेय और वर्षा शर्मा के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला दिया गया, जिनमें स्पष्ट है कि बिना सूचना दी गई प्रतिकूल प्रविष्टियां स्वतः अमान्य होती हैं।
अधिवक्ता ने यह भी बताया कि वर्ष 2018-19 में याचिकाकर्ता की पदस्थापना अनुसूचित जिले गोंदिया-पेंड्रा-मरवाही (जीपीएम) में थी। राज्य सरकार के 2005 के परिपत्र के अनुसार, ‘कैटेगरी बी’ को ‘कैटेगरी ए’ माना जाना था।
याचिकाकर्ता ने परीक्षा में 200 में से 172 अंक प्राप्त किए थे। यदि नियमानुसार 3 अतिरिक्त अंक मिलते, तो वे चयन के पात्र हो जाते।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने परिपत्र और तथ्यों को सही मानते हुए याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि मुकेश शर्मा को आबकारी सब-इंस्पेक्टर के पद पर पदोन्नत किया जाए।


