कोण्डागांव

खनिज संपदा के दोहन को लेकर सीपीआई ने सौंपा ज्ञापन, सहकारी समितियों के माध्यम से उत्खनन की मांग
17-Sep-2025 9:45 AM
खनिज संपदा के दोहन को लेकर सीपीआई ने सौंपा ज्ञापन, सहकारी समितियों के माध्यम से उत्खनन की मांग

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

कोण्डागांव, 16 सितंबर। बस्तर संभाग की खनिज संपदा को स्थानीय लोगों के हित में सुरक्षित करने और उसके दोहन पर नियंत्रण की मांग को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिला परिषद कोण्डागांव ने सोमवार को कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और मुख्यमंत्री के नाम संबोधित था।

ज्ञापन में कहा गया कि बस्तर अंचल आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहां की जल, जंगल और जमीन जीवन और संस्कृति का आधार है। ऐसे में खनिज उत्खनन से संबंधित सभी गतिविधियों पर निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभाओं को दिया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय समुदाय अपनी सहमति या असहमति स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकें।

पार्टी ने मांग की है कि खदानों का संचालन केवल सार्वजनिक उपक्रमों के माध्यम से हो और किसी भी प्रकार की लीज से पहले ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य बनाई जाए। निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खदानें लीज पर देने की व्यवस्था पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के साथ ही पहले से हुए एमओयू को तत्काल निरस्त करने की भी मांग रखी गई है।

सीपीआई ने आगे कहा कि खनिज कार्य केवल स्थानीय सहकारी समितियों के माध्यम से कराया जाए और इसकी निगरानी राज्य खनिज निगम करे। साथ ही खनिज सर्वेक्षण के नाम पर ग्रामीणों को प्रताडि़त करने की घटनाओं को तत्काल रोका जाए। पार्टी ने एनएमडीसी नगरनार स्टील प्लांट और अन्य खदानों व उद्योगों के निजीकरण पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं में ठेकेदारी प्रथा को तत्काल समाप्त किया जाए। राज्य परिषद सदस्य तिलक पांडे के निर्देश पर शैलेष, जयप्रकाश, दिनेश, सोमारु, रामचंद सहित कई कार्यकर्ताओं ने यह ज्ञापन कलेक्टर कार्यालय में सौंपा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इन न्यायसंगत मांगों पर शासन-प्रशासन ने सकारात्मक कार्रवाई नहीं की, तो पार्टी को उग्र आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी सरकार की होगी।

ज्ञात हो कि बस्तर संभाग अपनी खनिज संपदा के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। वर्ष 1994 में केंद्र सरकार ने सांसद दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में भूरिया समिति गठित की थी, जिसने आदिवासी समुदायों के जल, जंगल और जमीन पर अधिकार सुनिश्चित करने की सिफारिशें की थीं। लेकिन इन सिफारिशों को अब तक लागू नहीं किया गया। सीपीआई का कहना है कि आज बस्तर की खनिज संपदा पर पूंजीपति घरानों की नजर है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।


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