संपादकीय
भारत बहुत सारी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच जीने वाला देश है। यहां एक तरफ आम जनता को हासिल सरकारी अस्पताल बदहाल हैं, कई प्रदेशों में तो इलाज का ढांचा इतना कमजोर है कि लोगों को पास के किसी महानगर जाकर वहां संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी तरफ ऐसा कोई दिन नहीं होता जब देश के किसी न किसी शहर में कोई बहुत महंगा अस्पताल शुरू न होता हो, या कोई बड़ा सा डायग्नोस्टिक सेंटर न बनता हो। अमीर और गरीब के बीच बंटी हुई दो किस्म की चिकित्सा-सुविधाओं के अलावा एक तीसरे किस्म की चिकित्सा सुविधा देश में और विकसित होती चल रही है, और वह है दूसरे देशों से इलाज के लिए भारत पहुंचने वाले संपन्न विदेशियों की। दुनिया के संपन्न और विकसित देशों में इलाज इतना महंगा है कि वहां चिकित्सा बीमे के लिए लोगों को बड़ी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। ऐसे में न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के कुछ दूसरे कम महंगे देशों की तरफ भी मरीजों का जाना चलते रहता है। और तो और एक महंगे देश ब्रिटेन से दूसरे देशों में, हंगरी, टर्की, पोलैंड, रोमानिया, स्पेन, पुर्तगाल, थाइलैंड, मैक्सिको, और भारत दांतों का इलाज कराने के लिए हर दिन हजारों लोग चले जाते हैं, और यह इलाज इन दूसरे देशों में ब्रिटेन के मुकाबले खासा सस्ता पड़ता है।
भारत के बारे में यह समझने की जरूरत है कि इतने विशाल देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम अलग-अलग रहता है, और दूसरे देशों से आने वाले लोगों को अपनी पसंद और प्राथमिकता के भारतीय इलाके मिल जाते हैं। फिर यहां के महंगे अस्पताल विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले हैं, हिन्दुस्तानी डॉक्टर पूरी दुनिया में कामयाबी से काम करते हैं, हर विकसित देश में भारतीय नर्सें दिख जाती हैं, और अब कोई ऐसी अंतरराष्ट्रीय आधुनिक चिकित्सा-मशीनें नहीं हैं जो कि भारत में न हों। ऐसे में महंगे देशों के मुकाबले भारत में इलाज का खर्च काफी कम पड़ता है, यहां मरीजों के साथ रहने वाले परिवार को भी बाहर सस्ते में मकान या होटल मिल जाते हैं। इसके साथ-साथ जब वे हिन्दुस्तान आ ही जाते हैं, तो वे ऑपरेशन या लंबे इलाज के साथ-साथ देश के अपने पसंदीदा हिस्से में घूमने भी जा सकते हैं। मरीजों और उनके परिवारों का इलाज का ऐसा भारत भ्रमण उन्हें कुल मिलाकर सस्ता और सहूलियत का पड़ता है। कई किस्म के महंगे इलाज पर अमरीका के मुकाबले भारत में एक चौथाई से भी कम खर्च आता है। भारत से जाकर दूसरे देशों में बसे हुए, और भारतीय पैमानों पर संपन्न हो चुके मरीज तो बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते ही हैं, खाड़ी के देशों के संपन्न लोगों के लिए भी हिन्दुस्तान एक बड़ी पसंद है।
भारत और अंतरराष्ट्रीय जुबान में इसे भारत का मेडिकल टूरिज्म कहा जाता है। अब इस देश में बड़े अस्पतालों के ढांचे जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, हर तरह का पर्यटन भारत में जिस तरह बढ़ रहा है, वह देखने लायक है। इस क्षेत्र के एक जानकार विशेषज्ञ से अभी बीच में रूककर ही हमने बात की, तो पता लगा कि देश के कुछ सबसे बड़े निजी अस्पतालों का 30-40 फीसदी बिल तो विदेशी मरीजों का ही बन रहा है, और उनकी वजह से भारत के मरीजों का इलाज कुछ कम दाम पर हो जाता है। उन्होंने बताया कि आंध्रप्रदेश में तो पर्यटन विकास निगम मेडिकल टूरिज्म और वेलनेस टूरिज्म को अभियान के रूप में जोड़ चुका है, और इसकी वेबसाइट पर इसे अलग से बढ़ावा दिया जा रहा है। आंध्र की राजधानी में दो सौ एकड़ में एक मेगा ग्लोबल मेडिसिटी बनाई जा रही है, जो कि अंतरराष्ट्रीय मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देगी। इसी से जुड़ी हुई जानकारी खंगालते हुए यह दिखा कि केन्द्र सरकार ने अपने ताजा बजट में ऐसे पांच क्षेत्रीय मेडिकल केन्द्र बनाने की घोषणा की है, और टीडीपी के चन्द्राबाबू नायडू तो ऐसा फायदा उठाने वाले सबसे पहले राज्य रहेंगे ही।
भारत में एक-दो निजी कंपनियां ऐसी हैं जो कि दुनिया भर में भारतीय चिकित्सा सुविधाओं की मार्केटिंग करती हैं, और चिकित्सा सुविधाओं के साथ-साथ वे पर्यटन संभावनाओं की जानकारी देकर भी दुनिया भर से मरीजों और उनके परिवारों को भारत भ्रमण के लिए लाती हैं, साथ-साथ इलाज भी। देश में पर्यटन की संभावनाएं, और इलाज की संभावनाएं किस तरह मिलकर एक गाड़ी के दो पहिए बन सकती हैं, यह कोई रहस्य की बात नहीं है, कुछ प्रदेश इसमें दूसरे प्रदेशों के मुकाबले आगे हैं, और कुछ दूसरे प्रदेश आज घरेलू देसी मरीजों का भी मामूली इलाज करने लायक नहीं है, इसलिए वे सिर्फ ताजमहल और बनारस के पर्यटन के मोहताज हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों को इस मिलीजुली संभावना के बारे में अपने मौजूदा ढांचे को तौलना होगा। अगर कोई राज्य इन दो में से किसी एक पैमाने पर पिछड़ा रहेगा, तो वह दूसरे मोर्चे की संभावनाओं को भी खो बैठेगा। आज भारत एक संघीय ढांचे के तहत अलग-अलग राज्यों के बीच आपसी मुकाबले भी देखता है, केन्द्र सरकार अकेले ही किसी एक राज्य को अंधाधुंध बढ़ावा नहीं दे सकती, और खासी कोशिश कर रहे किसी राज्य को रोक भी नहीं सकती। देश के अलग-अलग राज्यों में प्राकृतिक और मानव निर्मित पर्यटन संभावनाएं अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों को हिमालय नसीब है, कुछ को समंदर, कुछ को वन्यप्राणी मिले हुए हैं, तो कुछ को ताजमहल जैसी ऐतिहासिक इमारतें। अच्छे निजी अस्पताल जिनमें विश्वस्तरीय सुविधाएं हों, उन्हें कोई भी राज्य सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर बढ़ावा दे सकती है। यह मुकाबले का एक खुला बाजार है, और कल्पनाशील राज्यों की संभावनाएं अपार हैं। हमारा यह भी नहीं मानना है कि विदेशी मरीजों के आने से भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं व्यस्त हो जाएंगी, और उनकी वजह से देसी मरीजों को अस्पताल नहीं मिलेंगे। पूरी दुनिया का तजुर्बा यह है कि अधिक फीस देने में सक्षम छात्र हों, या मरीज, उनकी वजह से स्थानीय और घरेलू लोगों को रियायत मिल पाती है। ब्रिटेन जैसे बहुत से ऐसे देश हैं, जहां पर विदेशी छात्र-छात्राओं को खासी अधिक फीस देनी पड़ती है, और उसी वजह से वहां के घरेलू बच्चों को कम फीस में ऊंची और अच्छी पढ़ाई मिल पाती है। भारत में तो अगर विदेशी सैलानियों से कमाई न रहे, तो ताजमहल तक का रखरखाव ठीक से न हो पाए, और घरेलू सैलानी वहां की गंदगी देखकर जाना बंद कर दें। इसलिए हर विदेशी सैलानी हमलावर नहीं होते, वे यहां धर्मप्रचार के लिए, या देश पर कब्जा करने के लिए नहीं आते, वे यहां की अर्थव्यवस्था में कुछ न कुछ जोडक़र ही जाते हैं।
पर्यटन, और चिकित्सा-पर्यटन की मिलीजुली संभावनाएं इन दोनों क्षेत्रों की अलग-अलग संभावनाओं के मुकाबले खासी अधिक हो सकती हैं। राज्यों को कल्पनाशील होकर बाजार व्यवस्था के साथ तालमेल बनाकर इस तरफ बढऩा चाहिए, इससे राज्य को जो कमाई होगी, उससे भी गरीब मरीजों के लिए कुछ किया जा सकेगा, और विश्वस्तरीय निजी चिकित्सा का खर्च उठाने लायक भी कई भारतीय मरीज भी रहते हैं, उनको भी इस देश के पर्यटन केन्द्रों के आसपास बेहतर इलाज मिल सकेगा। हर महंगी चीज जनविरोधी नहीं होती, बहुत सी महंगी चीजों से मिलने वाले टैक्स से ही तो गरीबों का भला हो पाता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


