संपादकीय
अमरीका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने अपने जंग मिनिस्टर पेट हेगसेथ से कहलवाकर थलसेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज को खड़े-खड़े बर्खास्त कर दिया। दुनिया के किसी भी बड़े और जिम्मेदार लोकतंत्र में ऐसी घटना याद नहीं पड़ती कि देश की एक मुश्किल जंग के बीच थलसेना प्रमुख को हकालकर निकाल दिया जाए। आज ईरान के मोर्चे पर अमरीका को बहुत से लोग बहुत मुश्किल नौबत में देख रहे हैं, और ऐसे में एक सबसे बड़े फौजी अफसर को सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करके निकाल देना अमरीकी सरकार के बाकी लोगों को एक बड़ा साफ संदेश देता है। संदेश यह कि अब अमरीका में किसी भी संवैधानिक या सरकारी संस्था में ट्रम्प के प्रति निजी निष्ठा सबसे ऊपर है, और लोगों से किसी पेशेवर काबिलीयत की जरूरत नहीं है। जो लोग ट्रम्प की हमलावर नीतियों से जरा भी असहमति जताएंगे, उनके लिए ट्रम्प की सरकार में जरा भी जगह नहीं है। पिछले कुल सवा साल के इस कार्यकाल में ट्रम्प ने कुछ सबसे बड़े फौजी अफसरों को इसी तरह बर्खास्त किया, और इनमें से एक को तो ट्रम्प ने देशद्रोही तक कहा। रक्षा मंत्रालय के कई गैरफौजी अफसरों को भी ट्रम्प ने हटा दिया जिन्हें वह अमरीका के भीतर एक सरकारविरोधी भूमिगत सरकार (डीप स्टेट) कहता है। हमारी अपनी समझ यह कहती है कि अब अमरीका ईरान के मोर्चे पर अपने सैनिकों को वहां की जमीन पर उतारने के लिए उन्हें खाड़ी के पड़ोसी देशों में भेज चुका है, और इस बात को अमरीका में बहुत ही खराब फैसला माना जा रहा है। जो ईरान अमरीका के लिए किसी भी तरह का खतरा नहीं था, उस ईरान पर पहले तो इजराइल के कहे हुए इस तरह का निहायत गैरजरूरी, और नाजायज फौजी हमला करना, पूरी दुनिया को तेल, और दूसरे कारोबारी संकट में डालना, और अब अमरीकी सैनिकों के उस इजराइल की इस जंग में विदेशी जमीन पर उतार देना, जहां पर खुद इजराइल शायद अपने सैनिकों को भेजने के लिए तैयार नहीं है। हमारा सिर्फ एक अंदाज है कि कोई भी जिम्मेदार थलसेना अध्यक्ष राष्ट्रपति के ऐसे फैसले का विरोध करेगा जो कि हजारों अमरीकी सैनिकों को एक अवांछित युद्ध में भेजने का है, जहां से सैकड़ों का ताबूत में लौटना तय सरीखा होगा।
ट्रम्प की शक्ल में अमरीका को 21वीं सदी की इस दूसरी चौथाई में एक ऐसा तानाशाह मिला है जो कि अमरीकी विश्लेषकों को हक्का-बक्का कर रहा है। हमारे पास इसे देने के लिए अब छापने लायक कोई गाली बची नहीं है, लेकिन हम लगातार यह देखते हैं कि लिखने के कुछ हफ्तों के भीतर खुद अमरीका से कोई न कोई जिम्मेदार तबका उस बात को दोहराता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक विख्यात संविधान-विशेषज्ञ ने इसे फौज पर राजनीतिक नियंत्रण का सीधा हमला करार दिया है। अमरीकी राष्ट्रपतियों के एक इतिहासकार ने कहा है कि ट्रम्प फौजी जनरलों से राजा के दरबारियों जैसी निष्ठा मांग रहे हैं, और ऐसी ही नौबत अमरीका के संस्थापक नेताओं को सबसे ज्यादा डराती थी। न्यूयॉर्क टाईम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि यह तानाशाहों जैसा व्यवहार है, न कि लोकतांत्रिक राष्ट्रपति सरीखा। कुछ संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि राष्ट्रपति को तकनीकी रूप से किसी फौजी कमांडर को हटाने का हक है, लेकिन चल रही जंग के बीच सिर्फ निष्ठा के आधार पर टॉप जनरलों को हटाना बुरी तरह खतरनाक और असमान्य है। अमरीका के सबसे बड़े संस्थापक नेताओं का डर राजा जैसे शक्तिशाली राष्ट्रपति का था। वे ब्रिटिश राजा से आजादी के बाद किसी भी तरह की तानाशाही नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने मजबूत, लेकिन जवाबदेह राष्ट्रपति का प्रावधान किया था। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध, उसके बाद के शीतयुद्ध, और 11 सितंबर के ओसामा के हमले के बाद राष्ट्रपति पद की ताकत बहुत बढ़ जाने दी गई, और इसे सम्राट जैसा राष्ट्रपति मान लिया गया। अब ट्रम्प अमरीका पर किसी हमले के बिना, बेगानी शादी में नाचते अब्दुल्ला दीवाने की तरह इजराइल की जंग में शामिल हो गए हैं, और दुनिया के बाकी तमाम देशों को धमकाना, डराना जारी रखा है। एक अकेले इजराइल के साथ नाजायज दोस्ती निभाने के लिए ट्रम्प ने बाकी पूरी दुनिया से अपने रिश्तों को आग में झोंक दिया है। सच तो यह है कि जिस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति को सलाह-मशविरे की सबसे अधिक जरूरत दिख रही है, उसने अपने आपको मुसाहिबों और चापलूसों के घेरे में कैद कर लिया है, और सरकार के सारे बड़े ओहदों पर उन लोगों को बिठा दिया है, जो उसकी बदबू को शीशी में भरकर इत्र की तरह इस्तेमाल करने में गर्व पाते हैं।
यह बात हमने शुरू तो ट्रम्प से की है, लेकिन यह लागू पूरी दुनिया पर होती है, हर सरकार, हर कारोबार, और जिंदगी के बाकी तमाम दायरों पर भी लागू होती है। जहां-जहां लोग अपने पसंदीदा, मुंहलगे चापलूसों से घिर जाते हैं, उन्हें कोई न्याय, तर्क, तथ्य बताने वाले नहीं रह जाते। जब किसी कारोबार के मुखिया ऐसे हो जाते हैं, तो वह कारोबार डूब जाता है। किसी राजनीतिक दल की मुखिया के ऐसे हो जाने पर वह दल बसपा बन जाता है। और सत्ता पर बैठे नेता हों, या अफसर, अगर उन्हें असहमति को सुनने, समझने, और उस पर गौर करने से परहेज होने लगता है, तो वे आज के अमरीका की तरह बर्बाद भी हो जाते हैं। अमरीका की यह नौबत बाकी पूरी दुनिया के मैनेजमेंंट, या राजनीति पढ़ाने, या सिखाने वाले संस्थाओं के भी गौर करने की है। उन्हें भी अपनी नौजवान पीढ़ी को यह पढ़ाना और सिखाना चाहिए कि लीडर बनने पर उन्हें किस तरह ट्रम्पियापे से बचना चाहिए। फिलहाल तो दुनिया अमरीका के रहमोकरम की इस हद तक मोहताज चल रही है कि एक बेदिमाग ट्रम्प अरबों लोगों की जिंदगी पर बुरा असर डाल रहा है, दसियों करोड़ लोगों को मौत की तरफ धकेल रहा है, और हर महीने लाखों लोग जिसके सरोकार-विहीन फैसलों की वजह से मर रहे हैं। ये मौतें फौजी फैसलों और हमलों से परे भी दवा और इलाज की कमी से, बिगड़ते पर्यावरण की वजह से, ठप्प हो चुके कारोबार की वजह से, चारों तरफ उपजी बेरोजगारी की वजह से भी हो रही हैं। दुनिया के इतिहास में पूरी दुनिया में फैले हुए इतने नुकसानदेह असर वाला और कोई नेता दर्ज हुआ नहीं है। हम पहले भी इस बात को लिख चुके हैं कि अमरीका ने बीते दशकों में पूरी दुनिया में जितने बेकसूर लोगों को मारा है, उन सबकी आह से अमरीका को ऐसा राष्ट्रपति नसीब हुआ है, जिसके नाम की चर्चा करने से भी वह देश परहेज करेगा, जिस तरह कि जर्मनी में कोई हिटलर के नामलेवा भी नहीं हैं। अब शायद ही वहां पर कोई समझदार परिवार अपने बच्चे का नाम डॉनल्ड रखेगा।


