संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गुजरात में बैठा सरगना, छत्तीसगढ़ में कॉलसेंटर, अमरीका तक होती ठगी!
सुनील कुमार ने लिखा है
27-Mar-2026 6:01 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : गुजरात में बैठा सरगना, छत्तीसगढ़ में कॉलसेंटर, अमरीका तक होती ठगी!

दुनिया भर में टेलीफोन पर लोगों को ठगने, धमकाने, ब्लैकमेल करने के संगठित जुर्म लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं। भारत के पड़ोस में राजनीतिक अस्थिरता, और फौजी तानाशाही से गुजरते हुए म्यांमार में हजारों लोगों को कैद करके उनसे ऐसे कॉलसेंटर चलवाए जा रहे हैं जो भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोगों से साइबर ठगी-जालसाजी करते हैं, उन्हें धमकाते हैं, डिजिटल अरेस्ट का झांसा देते हैं, और उनकी जिंदगी भर की कमाई को खाली कर देते हैं। ऐसे साइबर क्राइम की खबरें हर दिन आती हैं, लेकिन अभी दो दिन पहले आई एक खबर कुछ अनोखी निकली। जिस छत्तीसगढ़ में हर दिन दर्जनों लोग साइबर-ठगी के शिकार होते हैं, उस छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ऐसा एक अपराधी कॉलसेंटर चल रहा था, जो दुनिया के दूसरे देशों, खासकर अमरीका और यूएई के लोगों को लोन दिलाने के नाम पर ठग रहा था। छत्तीसगढ़ पुलिस ने रायपुर के एक संपन्न इलाके में फायनेंस कंपनी की आड़ में चल रहे ऐसे कॉलसेंटर को पकड़ा, और यहां से 42 लोगों को गिरफ्तार किया। इनके पास से कई दर्जन मोबाइल फोन, डेढ़ दर्जन लैपटॉप, दो दर्जन से अधिक कम्प्यूटर, और बाकी चीजें गिरफ्तार की गईं। पुलिस की जानकारी के अनुसार अहमदाबाद में बैठा हुआ एक व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क को कंट्रोल कर रहा था, वही यह कॉलसेंटर चला रहा था, कर्मचारियों का इंतजाम कर रहा था, और वसूली-उगाही कर रहा था। अभी तक छत्तीसगढ़ का नाम ठगने वाले मुजरिम प्रदेशों की लिस्ट में नहीं था, लेकिन अब अहमदाबाद में बैठे एक मुजरिम की वजह से यह प्रदेश भी ठग-जालसाज प्रदेश की तरह पहली बार सामने आया है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का कोई बहुत अंतरराष्ट्रीय लेन-देन कभी नहीं रहा। कुल मिलाकर थोड़ा-बहुत आयरन ओर, और कुछ चावल ही यहां से निर्यात होता है, लेकिन धोखाधड़ी-जालसाजी निर्यात होने का यह पहला मौका सामने आया है। अमरीका और योरप के वक्त के मुताबिक रायपुर में यह कॉलसेंटर शाम में काम शुरू करता था, और दूसरे देशों में लोन का फर्जी प्रस्ताव देकर ठगी करता था। जो लोग यहां से गिरफ्तार हुए हैं, वे सारे के सारे इस प्रदेश के बाहर के हैं, शायद इसलिए कि स्थानीय लोगों से बात बाहर जाने का खतरा अधिक हो सकता था। गिरफ्तार नौजवान कई प्रदेशों से यहां जुटाए गए थे, और यहां ठगी से जुटाया गया पैसा हवाला या क्रिप्टोकरेंसी के जरिए विदेश भेज देने की जानकारी भी सामने आई है। दिलचस्प बात यह भी है कि अधिकतर आरोपी दसवीं या बारहवीं पास हैं, मतलब यह कि जितनी पढ़ाई पर हिन्दुस्तान में ढंग का कोई काम नहीं मिल सकता, वे यहां बैठे हुए अमरीका और योरप के लोगों को ठग रहे थे। रोजगार की इन नई संभावनाओं से यह भी पता लगता है कि अगर मौका मिले, तो हिन्दुस्तानी अर्धशिक्षित बेरोजगार भी कहीं तक भी पहुंच सकते हैं।

जब संपन्न और विकसित देशों के लोग ठगी का शिकार हो सकते हैं, तो यह बात भी उठती है कि क्या साइबर-ठगी, और दूसरे किस्म के साइबर-जुर्म से बचाव के लिए बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए सरकार को शिक्षण-प्रशिक्षण का कोई इंतजाम तुरंत नहीं करना चाहिए? हाल के बरसों में जो मामले सामने आए हैं, उनमें फौज के बड़े-बड़े तीन स्टार जनरल रह चुके रिटायर्ड अफसर भी साइबर-ठगी में करोड़ों रूपए गंवा चुके हैं, देश के बहुत से प्रदेशों में बहुत से लोग अपने आपको डिजिटल अरेस्ट में गिरफ्तार मानकर अपनी सारी जमापूंजी ठगों के बैंक खातों में डाल चुके हैं। कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें तीन-चार हफ्तों तक कोई बुजुर्ग, या परिवार के सारे लोग अपने के डिजिटल अरेस्ट में मानकर कैद रहे, ठगों के हुक्म मानते रहे, बैंक अफसरों के समझाने पर भी समझने को तैयार नहीं हुए, और अपनी पूरी रकम ठगों के खातों में डालते रहे। इनमें ऐसे-ऐसे बुजुर्ग और बीमार लोग शामिल थे, जो कि ऐसे तनाव में मर सकते थे। अब अगर ऐसी मौतें हुई भी होंगी, तो भी वे हमें अभी तुरंत याद नहीं पड़ रही हैं। फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि अभी इसी वक्त अमरीका के एक राज्य में एक अदालत ने फेसबुक की कंपनी, मेटा पर सैकड़ों करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया है क्योंकि उसने अपने प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को जुर्म का शिकार होने से बचाने के लिए जरूरत के मुताबिक सावधानी नहीं बरती थी। ऐसे में दुनिया भर के साइबर और ऑनलाइन मुजरिम अमरीका, ब्रिटेन जैसे बहुत से देशों में छोटे स्कूली बच्चों को फंसा लेते हैं, उनकी नग्न तस्वीरें ले लेते हैं, और फिर उन्हें ब्लैकमेलिंग के एक रैकेट में फंसाकर उनसे वसूली करते हैं। खुद अमरीका में ऐसी ब्लैकमेलिंग से थके हुए दहशत के शिकार कई बच्चों ने खुदकुशी तक कर ली है। अभी भारत जैसा देश इस तरह की साइबर-सावधानी बरतने से कोसों दूर है। इस देश के एक-दो राज्य, तेलंगाना, और कर्नाटक यह पहल जरूर कर रहे हैं कि कमउम्र बच्चों को किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर दाखिला न दिया जाए, लेकिन ऐसे कानून भी जब तक देश के स्तर पर नहीं बनेंगे, बाकी प्रदेशों के बच्चे तो खतरे में रहेंगे ही। फिर मेटा जैसी दानवाकार कंपनी से लडऩे-भिडऩे की ताकत किसी एक प्रदेश की नहीं हो सकती, और इसके लिए भारत सरकार जैसी एक बड़ी ताकत की जरूरत होगी।

हम भारत के जामताड़ा जैसे छोटे इलाके से बरसों पहले से देश भर में की जा रही साइबर-ठगी को अब बढ़ते-बढ़ते यहां पहुंचा हुआ देख रहे हैं कि गुजरात में बैठा सरगना छत्तीसगढ़ में कॉलसेंटर चला रहा है, दूसरे प्रदेशों से नौजवानों को लाकर दुनिया के बड़े-बड़े देशों के लोगों को ठग रहा है। यह नौबत भारत सरकार, और तमाम प्रदेशों की सरकारों की तरफ से अधिक सावधानी, अधिक तैयारी और पहल सुझाती है। अगर सरकार ने इस देश के भीतर डिजिटल अरेस्ट नाम के फ्रॉड के खिलाफ जागरूकता पैदा नहीं की, ऑनलाइन धोखाधड़ी के प्रति लोगों को सावधान नहीं किया, तो बहुत देर हो जाएगी। छोटे-छोटे मुजरिम पकड़ाएंगे, और बड़े सरगना तब तक पूरा पैसा देश के बाहर ले जाएंगे। केन्द्र सरकार के पास ऐसे साइबर-फ्रॉड पर नजर रखने के लिए भी कई तरह के अधिकार हैं, और उसकी तकनीकी क्षमता भी राज्यों के मुकाबले बहुत अधिक है। अब सबको मिलकर जनजागरण का एक ऐसा अभियान चलाना चाहिए, जिसकी शिक्षा स्कूल के कोर्स से ही शुरू हो जाए, और हर बच्चे को यह होमवर्क दिया जाए कि वे घर जाकर परिवार के दूसरे बड़े सदस्यों को भी ऐसा पाठ पढ़ाएं, और उससे पूरे-पूरे परिवार जागरूक हो सकें, लुटने से बच सकें। दूसरी तरफ इस बात को अनदेखा नहीं करना चाहिए कि मुजरिम सरकारी एजेंसियों के मुकाबले बहुत अधिक रफ्तार से आगे बढ़ते हैं, उन्हें नई तकनीक जानने-समझने के लिए कोई टेंडर नहीं बुलाना पड़ता, वहीं सरकार को कोई भी काम करने के लिए बजट मंजूरी से लेकर टेंडर तक कई तरह की देर होती जाती है। समाज भी सोच सकता है कि वह किस तरह जागरूकता पैदा कर सकता है।

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