संपादकीय
छत्तीसगढ़ के अखबारों में पिछले कुछ दिनों से गर्मी बढऩे के साथ-साथ जमीन के भीतर पानी नीचे जाने की खबरें आ रही हैं। ऐसा हर गर्मी में होता है, और कुछ दिनों में राज्य के अलग-अलग जिलों में कलेक्टरों के आदेश निकल जाएंगे कि जिला प्रशासन की इजाजत के बिना गर्मी में नए ट्यूबवेल नहीं खोदे जा सकेंगे। लेकिन गर्मी निकलते ही ट्यूबवेल खोदना फिर शुरू हो जाएगा, और उनसे पानी निकालना तो बाकी की पूरी जिंदगी चलता ही रहेगा। केन्द्र सरकार के भूजल के सर्वे के आंकड़ों को देखें, तो छत्तीसगढ़ के कई जिलों, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, मुंगेली, बालोद, जैसे जिलों के सभी विकासखंडों में लगातार भूजल नीचे जा रहा है। बस्तर संभाग को छोडक़र बाकी चार संभागों में हालत तेजी से बिगड़ रही है। और यह तब है जब 2023-24 में छत्तीसगढ़ में औसत से बेहतर बारिश हुई थी। अखबारी खबरों से किसी की नींद खुलते दिख नहीं रही है, और जब छत्तीसगढ़ की हालत चेन्नई शहर, या महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों जैसी हो जाएगी, तब नौबत संभालने का वक्त निकल चुका रहेगा। आज समय रहते अगर राज्य सरकार जागकर कड़ी कार्रवाई करे, कमर कसकर यह तय करे कि जब तक भूजल स्तर बढऩे नहीं लगे, तब तक जो-जो जरूरी रहेगा, वह किया जाएगा, तो ही बात बन सकती है।
हम जमीन के नीचे पानी तेजी से नीचे चले जाने की वजहों को देखते हैं, तो समझ आता है कि प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में जमीन से जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना पानी बारिश के वक्त जमीन के भीतर जा नहीं पाता है। इसकी कई बहुत जाहिर वजहें हैं। एक तो यह कि धान की फसल राजस्थानी ऊंट सरीखी प्यासी रहती है, और मुफ्त की बिजली, या रियायती बिजली की मेहरबानी से, और फसल का तकरीबन एक-एक दाना महंगे दामों पर सरकार द्वारा खरीद लेने से लोग धान के अपने खेत को तालाब की तरह लबालब भर लेते हैं। जितना पानी जरूरी नहीं रहता, उतना भी जमीन के नीचे से उलीचकर खेतों में डाल दिया जाता है, जिसका बहुत सा हिस्सा भाप बनकर उड़ भी जाता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य में पानी की खपत का 84 फीसदी हिस्सा खेतों में जाता है, 12 फीसदी हिस्सा शहरी घरों में, और 4 फीसदी हिस्सा कारखानों में। ऐसे में सरकार को इनमें से हर मोर्चे पर कड़े फैसले लेने पड़ेंगे, वरना किसी भी मौजूदा सरकार के पांच साल तो निकल जाएंगे, लेकिन जमीन के पेट से निकाला गया पानी वापिस नहीं जा पाएगा।
हम आंकड़ों के जाल में इस बुनियादी बात को उलझाना नहीं चाहते। इसलिए साफ-साफ आसान शब्दों में खतरे, और उससे जूझने की संभावनाओं पर लिख रहे हैं। खेतों में बेहिसाब पानी को रोकना आसान नहीं है, और सरकार चाहे गर्मी की फसल के लिए नहरों से पानी न दे, लोगों के पंप तो चलते ही हैं। सरकार को यह इंतजाम करना होगा कि गर्मी के महीनों में जब धान की फसल और अधिक पानी मांगती है, तब तो बाकी आबादी को भी पानी की अधिक जरूरत रहती है, और गर्मी की धान की फसल को हर हाल में रोकना चाहिए, सरकार को न उसकी खरीदी करनी चाहिए, न उसकी इजाजत देनी चाहिए। अब इस बारे में किसानों का कहना कुछ और हो सकता है, लेकिन हमारी सामान्य समझ हमें पानी बचाने के लिए यह रास्ता बता रही है। दूसरी बात यह कि फसल के बाकी मौसम में भी धान की फसल के विकल्प की तरफ सरकार को बढऩा होगा, किसानों को बढ़ाना होगा, वरना एक दिन धान के लायक पानी नहीं बचेगा, धान की फसल नहीं बचेगी, और किसानों के पास मंडी में बेचने को कुछ रहेगा नहीं। ऐसा हाल हो सकता है कि दस-बीस बरस न हो, लेकिन जब हम पूरे राज्य की बात कर रहे हैं, तो हमें अगले सौ-पचास बरस की तैयारी करनी चाहिए। पांच-पांच बरस में बंटी हुई सरकारें अपने कार्यकाल से आगे का देखना नहीं चाहतीं, लेकिन उतने से काम चलेगा नहीं।
आज की ही एक खबर बताती है कि पांच साल में रायपुर का भूजल स्तर 45 फीसदी गिर गया है। और यह 60 से 120 फीट तक नीचे चले गया है। कई इलाकों में तो भूजल स्तर सैकड़ों फीट नीचे जा चुका है। लोगों को अधिक गहराई से पानी खींचने वाले पंपों पर अधिक भरोसा है, इसलिए पानी की खपत की तरफ से, और धरती का पेट खाली हो जाने की तरफ से वे बेफिक्र हैं। सीधे शब्दों में कहें तो लोगों के तमाम निजी ट्यूबवेल पर मीटर लगाने की जरूरत है क्योंकि अपने जमीन पर खुदवाए हुए ट्यूबवेल भी पानी तो जमीन के नीचे से सामूहिक जल भंडारों से ही खींचते हैं। किसी का भी नलकूप सिर्फ उन्हीं की जमीन के नीचे से तो पानी नहीं खींचता। आज हालत यह है कि पैसे वाले लोग अपनी गाडिय़ों को ड्राइवरों से इतनी देर तक धारदार पानी से धुलवाते हैं कि मानो वह धान का खेत हो, और वहां पानी लबालब भरना हो। राजधानी के भीतर ही सडक़ किनारे प्रेशर पंप से गाडिय़ों को धोने के कारोबार चल रहे हैं, और उन पर कोई रोक नहीं है। दरअसल पानी को सार्वजनिक और सामूहिक संपत्ति मानने की सोच जब तक विकसित नहीं होगी, और उसके लिए कानून नहीं बनेगा, पैसेवालों की नजर में सार्वजनिक सम्पत्ति अपने घर के सामने सडक़ धोने लायक बनी रहेगी। जिसके पास बोर है, पंप है, और बिजली बिल देने के लिए इफरात पैसा है, वे धरती को खाली कर दें, यह बहुत ही गैरजिम्मेदारी का इंतजाम है। दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देशों में भी गाडिय़ों के धोने पर तरह-तरह की रोक रहती है। ट्यूबवेल पर मीटरिंग से बर्बादी में कमी आएगी, और लोगों में जागरूकता भी आएगी। वरना कुछ बरस बाद जाकर जब छत्तीसगढ़, या कोई दूसरा प्रदेश, जब प्यास से मरने लगेगा, उस दिन एकाएक जागरूकता नहीं आएगी। आज ट्यूबवेल से निकला हुआ एकदम साफ पानी जिस तरह बर्बाद किया जा रहा है, उसमें बड़े-बड़े बंगलों में घास के मैदान, लॉन सींचना भी शामिल है। इससे पर्यावरण को कुछ हासिल नहीं होता, और संपन्न या सत्तारूढ़ तबके की आंखों को हरा-हरा सुख देने के लिए घास लगाई जाती है।
एक बड़ा मुद्दा भूजल को भरने का भी है। जब बारिश का पानी इन दिनों कुछ घंटों के भीतर अंधाधुंध रफ्तार से आता है, और नदियों में बाढ़ लाता है, तब उस पानी को नदी के रास्ते समंदर तक जाने से रोकने के लिए नदियों के रास्ते में ही बहकर पहुंचने वाले पानी को रोकने का इंतजाम करना चाहिए, और हम हर कुछ हफ्तों में इस बारे में लिख देते हैं कि जगह-जगह ऐसे री-चार्ज तालाब बनाए जाने चाहिए, जिनके आसपास कोई आबादी हो या न हो, लेकिन जहां पर नदियों तक बहकर जाने वाले पानी को रोका जा सके। और इस काम के लिए मनरेगा जैसी रोजगार योजना से परे धरती के भीतर के पानी को वापिस बढ़ाने के लिए अलग से योजना बनानी चाहिए, जो कि आबादी से दूर भी हो सकती है, मशीनों से खोदे जाने वाले तालाबों से भी बन सकती है, उसे मजदूरी और निस्तारी से अलग भी बनाया जाना चाहिए।
हर राज्य सरकार को अपने सरकारी अमले से बाहर के जानकार लोगों का एक थिंक टैंक सिर्फ पानी के मुद्दे पर बनाना चाहिए, इससे जनता के पहले कम से कम खुद सरकार तो जागरूक हो जाए। जो राज्य ऐसा नहीं करेंगे, वे भविष्य की अपनी संभावनाओं को भी खोएंगे। कामगार ऐसे सूखे राज्यों को छोडक़र सुखी राज्यों की तरफ जाने लगेंगे, और सूखे राज्यों में नया पूंजीनिवेश भी शायद नहीं आ सकेगा। बिना पानी सब सून, इस बात को याद रखकर राज्य सरकारों को कल्पनाशील होना चाहिए, दिल कड़ा करके लोगों को किफायत सिखानी चाहिए, और मिसाल के लिए सरकार को खुद अपने घर-दफ्तर पर कटौती करके दिखाना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


