संपादकीय
Hijra-India-photo by jonathan Ottensooser
भारतीय संसद के दोनों सदनों में अभी ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक मंजूर किया गया है, और इसका खुलासा सामने आने के बाद ट्रांसजेंडर समुदायों के बीच इसका जमकर विरोध हो रहा है। हमारे यूट्यूब चैनल से एक इंटरव्यू में ट्रांसजेंडरों ने रोते हुए कहा कि इससे तो अच्छा है कि उन्हें जहर दे दिया जाए। अब सरकार के नजरिए से देखें, तो 2019 के कानून में ट्रांसजेंडर की परिभाषा काफी व्यापक थी, और अब सात साल के भीतर ही किए जा रहे इस संशोधन विधेयक में इस वर्ग में जैविक और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों को ही प्राथमिकता दी गई है। संशोधन विधेयक में यह साफ कहा गया है कि जो लोग खुद अपनी शारीरिक-मानसिक भावनाओं के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान स्थापित करना चाहते हैं, या अपना यौन रूझान बताना चाहते हैं, उन्हें इस विधेयक के दायरे में नहीं रखा जाएगा। यानी बिना एक मेडिकल बोर्ड के किसी ट्रांसजेंडर की पहचान सिर्फ उसकी मर्जी से तय नहीं होगी। अभी तक जो लोग अपने आपको किसी दूसरे जेंडर के शरीर में कैद महसूस करते थे, वे कोई ऑपरेशन कराकर भी जेंडर बदलवा सकते थे, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो सरकार ऐसे सेक्स-चेंज ऑपरेशन का खर्च भी उठाती थी। अब इस नए विधेयक में यह खतरा खड़ा हो गया है कि किसी मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होकर अपनी खुद की पहचान साबित करने के लिए बोर्ड के डॉक्टरी पैमानों पर खुद को साबित करना, पूरी तरह अपमानजनक भी है, और यह मेडिकली संभव नहीं है कि किसी की मन की अपनी भावनाएं डॉक्टर पहचान सकें, और मान सकें। आज ट्रांस लोगों की व्यापक परिभाषा में कई तरह की यौन-पहचान, या यौन-पसंद वाले लोग आते हैं, और इस नए विधेयक में उनमें से बहुत सारे लोगों को ट्रांस नहीं माना जाएगा, और वे कानूनी सुरक्षा खो बैठेंगे। इस विधेयक में यह भी है कि किसी पर ट्रांसजेंडर पहचान थोपी गई, तो वह जुर्म कहलाएगा, और उस पर बड़ी कड़ी सजा होगी। ट्रांस-कार्यकर्ताओं को डर है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल उन डॉक्टरों, एनजीओ, या सहायता समूहों के खिलाफ हो सकता है जो लोगों को अपनी मर्जी की सेक्स पहचान पाने में डॉक्टरी मदद करते हैं। इसमें ट्रांस लोगों की शादी, गोद लेने, उत्तराधिकार, और आरक्षण जैसे नागरिक अधिकारों का कोई जिक्र नहीं है। सरकार का कहना है कि ट्रांस लोगों की पुरानी परिभाषा में बहुत सारे फर्जी लोग भी फायदे पा रहे थे, इसलिए इसकी एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा जरूरी हो गई थी। दूसरी तरफ कई प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, वगैरह इस विधेयक को एक ऐतिहासिक गलती बतला रहे हैं, और उन्होंने राष्ट्रपति से अपील की है कि इसे मंजूरी न दें।
ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 में लोगों को अपनी ट्रांस पहचान तय करने के लिए जिस तरह एक मेडिकल बोर्ड की मजबूरी डाली गई है, उससे सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों के साथ इस विधेयक का टकराव हो रहा है। भारत में ट्रांस अधिकारों को लेकर न्यायिक इतिहास का सबसे बड़ा फैसला नाल्सा-जजमेंट माना जाता है। 2014 में दो जजों की बेंच ने यह तय किया था कि किसी व्यक्ति की जेंडर-पहचान उसके आत्मसम्मान और उसके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि किसी व्यक्ति को अपनी जेंडर-पहचान तय करने के लिए किसी डॉक्टरी जांच या सर्जरी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, व्यक्ति जैसा महसूस करते हैं, उन्हें वैसी ही मान्यता पाने का हक है। सुप्रीम कोर्ट ने यह लिखा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत गरिमा के साथ जीने में अपनी पहचान खुद तय करना शामिल है। इस फैसले के बाद एक दूसरे फैसले में एक और जज ने यह लिखा था कि राज्य को किसी व्यक्ति की निजी पहचान की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोई बहुत बड़ा सार्वजनिक हित न हो।
अभी ट्रांस-कार्यकर्ताओं की आशंका यह है कि यह नया विधेयक उनके लोगों को मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए मजबूर करके अपमानित भी करता है, और यह किसी व्यक्ति की गरिमा को एक डॉक्टरी मामला बना देता है। उनकी यह भी आशंका है कि मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता से यह प्रक्रिया लंबी और कठिन हो जाएगी, और पहचान प्रमाणपत्र पाने में भ्रष्टाचार बढ़ेगा। कानून के कुछ जानकारों का कहना है कि 2026 का यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के नाल्सा-फैसले की मूल भावना के खिलाफ है, और इसे अदालत में अगर चुनौती दी जाएगी, तो इसके टिकने की संभावना पर शक है। यहां दो-तीन बातों को समझ लेना जरूरी होगा कि 2014 और 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद 2019 में बने हुए ट्रांसजेंडर कानून को सात बरस के भीतर इस तरह आमूलचूल बदलने की क्या जरूरत आ गई है? ट्रांसजेंडरों के अधिकारों का ऐसा कौन सा बेजा इस्तेमाल होने लगा था कि जिसकी वजह से सरकार ने उनकी पहचान को डॉक्टर जांच और सर्टिफिकेट से स्थापित करना अनिवार्य समझा है?
मोदी सरकार के बारे में चारों तरफ यह चर्चा रहती है कि वे गैरजरूरी कानूनों को खत्म करने के हिमायती हैं। इसके साथ-साथ मौजूदा कानूनों में भी कटौती करने के हिमायती हैं, और सरकार की मौजूदगी को कम करना चाहते हैं। उनके बारे में उनके साथ काम किए हुए लोग बताते हैं कि वे कोई भी नया कानून लाने के खिलाफ रहते हैं, और उसकी इजाजत नहीं देते। ऐसे एक करीबी व्यक्ति ने हमें बतलाया है कि वे अधिक से अधिक मौजूदा कानून में संशोधन की छूट देते हैं। अब ट्रांसजेंडरों के लिए सुप्रीम कोर्ट के दो-दो फैसलों के बाद केन्द्र सरकार का लाया हुआ ट्रांसजेंडर कानून संशोधन पारित तो हो गया है, हो सकता है कि एनडीए की ही बनाई हुई राष्ट्रपति बिना देर किए इसे तुरंत ही मंजूरी भी दे दें, लेकिन क्या सचमुच ही 2014 से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग फैसलों के बाद हालात इतने बदल गए हैं कि कानून बदलने की जरूरत आन पड़ी है? अभी हम सिर्फ इस अटपटेपन पर टिप्पणी कर रहे हैं, सरकार के इस विधेयक के गुण-दोष का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, क्योंकि ट्रांस समुदायों के कल्याण के लिए आज सरकारों में नौकरियों में आरक्षण भी है, छत्तीसगढ़ में ही पुलिस विभाग में बहुत से ट्रांस लोगों को नौकरियां मिली हैं। ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए अगर कोई गैरट्रांस लोग अपने को ट्रांस महसूस करने वाला बता दें, तो किसी के महसूस करने की क्या शिनाख्त हो सकती है, उसका क्या सुबूत हो सकता है? ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ, आरक्षण का लाभ पाने के लिए एक तबके के लोगों की शिनाख्त तो जरूरी होती है। अभी हम इस पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं कि आज एलबीक्यूटीआई नाम के एक व्यापक तबके में आने वाले कई तरह के लोगों में से कौन-कौन से लोग, किस-किस तरह की यौन-पसंद के लोग इस विधेयक से ट्रांस-दायरे से बाहर हो जाएंगे? अभी हम इस कॉलम में उतनी बारीकी में नहीं जा पा रहे हैं, लेकिन जब भी किसी संशोधन से अभी के प्रचलित एक व्यापक तबके में से बहुत से लोगों को दायरे से बाहर किया जा रहा है, तो वहां पर संवेदनशीलता के साथ बाहर होते तबकों के जायज हक के बारे में सोचना चाहिए। ट्रांस समुदाय कभी भी बहुत सीधी-सीधी पहचान वाला नहीं रहा है। अब तो जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ रही है, अधिकतर सभ्य देशों में (इनमें अमरीका शामिल नहीं है) लोगों के निजी हक और उनकी पहचान को लेकर कानून अधिक संवेदनशील हो रहे हैं, अभी मोदी सरकार का ट्रांस कानून पहली नजर इसके कुछ उल्टे जाते दिख रहा है। फिर भी इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक बहस होनी चाहिए।


