संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अपार संभावनाओं वाला नर्सिंग कोर्स, और सरकारी अनदेखी से संभावनाएं खत्म
सुनील कुमार ने लिखा है
10-Apr-2026 5:53 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अपार संभावनाओं वाला नर्सिंग कोर्स, और सरकारी अनदेखी से संभावनाएं खत्म

हर कुछ हफ्तों में छत्तीसगढ़ के निजी नर्सिंग कॉलेजों के बारे में खबरें छपती हैं कि किस तरह वहां न साधन है, न सुविधा, और इसके बाद भी उनकी मान्यता जारी रहती है। फीस सरकार तय करती है, और यहां आने वाले छात्र-छात्राओं में 90 फीसदी के करीब छात्राएं रहती हैं, और तमाम लोगों में 90 फीसदी गरीब परिवारों से आते हैं। फीस और रहने-खाने का साल भर का करीब लाख रूपए का खर्च होता है, कई साल का कोर्स है, और कॉलेजों का ढांचा इतना कमजोर है कि मरीजों की देखरेख का पर्याप्त मौका पाए बिना यहां से नर्सें निकलती हैं, और अस्पताल उन्हें मामूली से भी कम तनख्वाह पर रखते हैं। गरीब परिवारों का खर्च भरपूर हो जाता है, लेकिन यहां से शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों का भविष्य बिल्कुल सीमित रहता है। अखबारों में बार-बार छपने वाली रिपोर्ट बताती हैं कि किस तरह नियमों को अनदेखा करके नर्सिंग कॉलेज चलते हैं, और दर्जनों कॉलेजों की किसी अस्पताल से संबद्धता नहीं है, फिर भी उन्हें मान्यता मिली रहती है।

सरकार की यह उदासीनता हमें कुछ अधिक हद तक हैरान इसलिए करती है कि इस कोर्स में आने वाली तमाम छात्राएं गैरसवर्ण तबकों की रहती हैं, आदिवासी, अनुसूचित जाति, और अधिक से अधिक ओबीसी समुदाय की लड़कियां नर्स बनने आती हैं, आदिवासी इलाकों में नर्सिंग कॉलेज भी इसीलिए अधिक रहते हैं, लेकिन नर्सिंग-शिक्षा का स्तर चौपट है। अब नर्स बनकर निकलने तक अगर किसी अस्पताल में मरीजों के इलाज का असल काम कुछ बरस तक करने नहीं मिला, तो यह कोर्स क्लासरूम की पढ़ाई का तो है नहीं। और हालत यह है कि भारतीय नर्सों की दुनिया के बहुत से पश्चिमी, विकसित, और संपन्न देशों में अच्छी-खासी मांग है। भारत के भीतर भी बड़े-बड़े महंगे अस्पताल लगातार बढ़ रहे हैं, और वहां भी अच्छे नर्सिंग कॉलेजों से पढक़र निकली हुई नर्सों को तो जगह मिल जाती है, लेकिन वहां का मैनेजमेंट भी यह देख लेता है कि किस प्रदेश, या किन कॉलेजों में नर्सिंग-शिक्षा का स्तर खराब है, और वहां के लोगों को अच्छी जगहों पर जगह नहीं मिलती।

एक ऐसी पढ़ाई जिसमें सौ फीसदी रोजगार की गारंटी होनी चाहिए, जिसके लिए देश के बाहर भी अंधाधुंध संभावनाएं हैं, उसे स्तरहीन शैक्षणिक ढांचे, स्तरहीन पढ़ाई, और इलाज के साथ के पर्याप्त अनुभव की कमी से बहुत ही औसत दर्जे का बनाकर रख दिया गया है। यह सिलसिला देश में एक नौजवान पीढ़ी को उसकी बेहतर संभावनाओं से दूर रखता है। आज हालत यह है कि अस्पतालों से परे भी संपन्न या मजबूर-मध्यमवर्गीय परिवारों में घर पर मरीजों या बुजुर्गों की देखभाल का रोजगार बढ़ते चल रहा है। डॉक्टर की निगरानी में इलाज चलता है, और नर्सों की मदद से घर पर बुजुर्ग या बीमार की जिंदगी चलती है। रोजगार का यह दायरा लगातार बढ़ते चल रहा है क्योंकि न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में लोगों की औसत उम्र बढ़ रही है, तरह-तरह के इलाज बढऩे से लोगों की देखभाल की संभावना भी बढ़ रही है। ऐसे में दुनिया के जिन देशों में बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ते जा रहा है, वहां के बारे में हमने पहले भी यह बात लिखी थी कि होम केयर के लिए शिक्षित-प्रशिक्षित नर्सों को दुनिया के कई देशों में काम मिल सकता है, और जिन देशों में भारतीय होम केयर कामगारों की मांग है, वहां की भाषा, और संस्कृति को भी सिखाने-पढ़ाने का काम भारत में करना चाहिए। देश के भीतर सरकारी नौकरियां कम होती चल रही हैं, लेकिन बाकी दुनिया में भारत के कामगारों के लिए नौकरी-रोजगार की संभावनाएं इसके मुकाबले कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। अगर भारत इन संभावनाओं को अनदेखा करेगा, तो दुनिया के बहुत से और देश हैं जहां से होम केयर के शिक्षित-प्रशिक्षित कामगार आज भी हर संपन्न देश जाकर काम कर रहे हैं।

 

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में नाम के लिए नर्सिंग कॉलेज चलाना, नौजवान पीढ़ी के साथ बड़ी धोखाधड़ी है। इसमें सिर्फ कॉलेज चलाने वालों को कोसना ठीक नहीं है, इन पर निगरानी रखने, इन्हें मान्यता देने, इनका इम्तिहान लेने वाली सरकार भी जिम्मेदार है, शायद उस पर कानूनी जिम्मेदारी कुछ अधिक आती है। इस बात को ठीक से समझ लेना चाहिए कि दुनिया में रोजगार देने वाले जितने देश हैं, जितने अस्पताल इस देश में या बाहर हैं, वे यह भी देखेंगे कि अंग्रेजी की बेहतर समझ रखने वाले स्वास्थ्य कामगारों को प्राथमिकता दी जाए। नर्सों के अलावा जितने पैरामेडिकल कर्मचारी रहते हैं, उन सबके लिए भी दक्षिण भारत, या महाराष्ट्र में न सिर्फ बेहतर शिक्षण-प्रशिक्षण है, बल्कि उनका अंग्रेजी का प्रारंभिक ज्ञान भी हिन्दीभाषी इलाकों के मुकाबले बेहतर रहता है। हम बहुत से और मामलों में भी अंग्रेजी की जानकारी पर जोर इसीलिए देते हैं कि भाषा की भावनात्मक राजनीति रोजगार में काम नहीं आती। जो भाषा आज प्रचलन में है, चल रही है, जो देश-प्रदेश में, या बाकी दुनिया में संपर्क की भाषा है, वही काम की है। किसी इलाके की क्षेत्रीय भाषा या बोली को लेकर उसे एक भावनात्मक या राजनीतिक मुद्दा बनाकर वहां के लोग अपनी नौजवान पीढ़ी को बेरोजगारी की तरफ बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं करते। छत्तीसगढ़ जैसे हिन्दीभाषी राज्य में चिकित्सा से जुड़े हुए तमाम किस्म के कोर्स में भी अंग्रेजी की जरूरत को कम आंका जाता है। नतीजा यह होता है कि दक्षिण भारत और महाराष्ट्र से निकले हुए स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी तो पूरे देश में कहीं भी जाकर काम करने के लायक रहते हैं, लेकिन हिन्दीभाषी लोगों की सीमा हिन्दी प्रदेशों तक रह जाती है, और वहां भी उन्हें गैरहिन्दी प्रदेशों से बेहतर शिक्षण-प्रशिक्षण पाकर आए हुए अंग्रेजीभाषी लोगों से मुकाबला करना पड़ता है। सरकारी नौकरियों के अलावा ऐसे हिन्दी प्रदेशों में हिन्दीभाषियों को प्राथमिकता देने की कोई मजबूरी निजी अस्पतालों की नहीं रहती। अब धीरे-धीरे चिकित्सा-विज्ञान, और इलाज-इंतजाम की सारी मशीनों और कम्प्यूटरों का पूरा ही काम अंग्रेजी पर जाने लगा है। ऐसी नौबत को समझकर हिन्दी प्रदेशों को भी भाषा के अपने प्रेम को रोजी-रोटी के साथ तौलकर देखना चाहिए।

फिलहाल मां-बाप मोटी रकम खर्च करके अपने बच्चों को नर्स बनाते हैं, और कई बरस का समय, और कई लाख रूपए खर्च करने के बाद उन्हें महज 10-15 हजार रूपए महीने की नौकरी मिलती है जिससे कि उनका खुद का अकेले का गुजारा भी मुश्किल से चल पाता है। किसी भी पढ़ाई की लागत, और उससे वापिसी के अनुपात को तौलना हर जिम्मेदार सरकार का काम होना चाहिए। नर्सिंग की पढ़ाई का ऐसा हिसाब निकालकर देखा जाए, तो मां-बाप बच्चों को इसमें भेजने के पहले चार बार सोचेंगे, सोचना भी चाहिए। हर छात्रा सिर्फ मरीजों की सेवा करने के लिए नर्स नहीं बनती हैं, उसे अपना घर-परिवार चलाने की क्षमता भी विकसित करने की जरूरत रहती है। इस पर समाज में खुली चर्चा भी होनी चाहिए, और कुल मिलाकर तो सरकार ही इस नौबत के लिए अकेली जिम्मेदार है। उसकी मान्यता के बिना कोई निजी कॉलेज किसी को कितनी भी फीस लेकर नर्स थोड़े ही बना सकते हैं।

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