संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : चुनावों पर किनका असर? एक नजर देख लें इनको..
सुनील कुमार ने लिखा है
29-Mar-2026 6:20 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : चुनावों पर किनका असर? एक नजर देख लें इनको..

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पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर अब ये अटकलें लगने लगी हैं कि किन राज्यों में राजनीतिक दल कौन से फॉर्मूले इस्तेमाल करेंगे। अभी सुप्रीम कोर्ट में फ्रीबीज नाम का एक मामला चल ही रहा है जिसमें न केवल चुनाव के वक्त, बल्कि सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक दल जनता को कौन-कौन सी चीजें ‘मुफ्त’ देते हैं। इनमें इन दिनों सबसे अधिक चर्चा महिलाओं के बैंक खातों में सीधे भेजी जाने वाली रकम है जो कि कमजोर महिलाओं के सशक्तिकरण के तर्क के साथ शुरू हुई हैं। राजनीतिक आंकलन यह है कि महिलाओं को सीधे नगद मदद भेजने से कई राज्यों में ऐसी पार्टी की जीत हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हमने पिछले विधानसभा चुनाव में यह देखा है कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में तकरीबन हर महिला को हजार रूपए महीने देने की महतारी वंदन योजना घोषित की, और चुनावी नतीजे उसके पक्ष में चले गए। हालांकि इसके साथ-साथ भाजपा ने धान किसानों से 31 सौ रूपए क्विंटल, प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक खरीदने का वायदा भी किया था, लेकिन किसानों के लिए तो वायदा कांग्रेस का भी था। जो भी हो, भारतीय चुनाव किन वजहों से प्रभावित हुए, इसका अंदाज लगाना बड़ा ही मुश्किल रहता है।

फिलहाल इस बरस असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में दस दिन बाद वोट डलना शुरू हो जाएंगे, और आज से पांच हफ्ते के भीतर सारे नतीजे आ जाएंगे। भारत के चुनावों की लिस्ट देखें, तो हर बरस चार-छह राज्यों के चुनाव होते हैं। और हर पांच बरस में लोकसभा के चुनाव होते हैं जो कि अब 2029 में इसी वक्त होंगे। इसके अलावा देश में पंचायत और म्युनिसिपल चुनाव भी एक संवैधानिक बाध्यता हैं, और हर राज्य में इनका समय अलग-अलग है। कई राज्यों में ये तीनों किस्म के चुनाव साल-साल भर के फासले से भी होते हैं, नतीजा यह होता है कि ये राज्य पूरे पांच बरस चुनावी मोड में रहते हैं। सरकारें कोई कड़े फैसले कर नहीं पातीं, हर थोड़े-थोड़े अरसे में कुछ लुभावने फैसले लेने पड़ते हैं, और हर चुनाव की आचार संहिता के दौर में कई तरह के काम थम जाते हैं। फिर सत्तारूढ़ पार्टी हो, या विपक्षी दल, सबके नेता प्रचार में लग जाते हैं, और गैरचुनावी लोकतांत्रिक-सरकारी काम प्रभावित होते हैं। अभी जैसे जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहां पर उन राज्यों के नेता भी जाकर प्रचार कर रहे हैं, जहां पर चुनाव नहीं हैं। मतलब यह कि सत्ता के नेता हों, या विपक्ष के, वे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी के इलाकों से दूर जाकर चुनाव प्रचार में लगे हैं। देश में वन नेशन-वन इलेक्शन की सोच इन वजहों से भी बनती है, और हम इसका समर्थन भी करते आए हैं। हालांकि देश के बहुत से समझदार दलों ने इस सोच का विरोध किया है, और यह कहा है कि राष्ट्रीय चुनाव अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं, प्रदेश के चुनाव अलग मुद्दों पर, और स्थानीय चुनावों के मुद्दे इन दोनों से अलग रहते हैं। ऐसे में अगर ये सभी चुनाव एक साथ करवाए जाएंगे, तो कोई राष्ट्रीय मुद्दा राष्ट्र में भी किसी पार्टी की सरकार बनवा देगा, और राष्ट्रीय मुद्दा ही पंचायत-म्युनिसिपल चुनाव पर भी हावी हो जाएगा। हम इस तर्क से असहमत नहीं हैं, फिर भी हमारा यह मानना है कि जब लोकसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों के चुनाव भी हुए हैं, तो भी उनमें जनता कुछ जगहों पर इतनी समझदार रही है कि उसने देश में एक पार्टी की सरकार चुनी, और प्रदेश में उसी पोलिंग बूथ से, उसी दिन वोट डालते हुए दूसरी पार्टी की सरकार चुनी। भारत के आज के विपक्षी दलों की आशंका के खिलाफ हमें तो यह भी लगता है कि पंचायत और म्युनिसिपल के स्तर पर किसी पार्टी के उम्मीदवार देखकर, उसके पिछले कार्यकाल का कामकाज देखकर, हो सकता है कि वोटर उसी दिन के वोट में संसदीय चुनाव में भी उस पार्टी के खिलाफ वोट डाल दे। और ऐसा ही राज्य स्तर पर किसी पार्टी की बदनामी की वजह से उसके संसदीय चुनाव पर असर पड़ जाए। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को लेकर अधिक आशंका से नहीं घिरना चाहिए, मतदाता की सोच लोकल से नेशनल, या नेशनल से लोकल, दोनों तरह से प्रभावित हो सकती है।

खैर, आज का हमारा मुद्दा वन नेशन-वन इलेक्शन नहीं है। हम तो यह सोच रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदान के नतीजों को, या उसके बाद बनने वाली सरकार को ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कामयाबी मान लिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि ये सारे चुनाव, और चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया तरह-तरह के अलोकतांत्रिक प्रभावों से भरे रहते हैं। सुनने में अच्छा लगे या नहीं, राजनीतिक दल ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाते हैं, जो चाहे परले दर्जे के मुजरिम ही क्यों न हों, उनकी जीत की क्षमता रहनी चाहिए, आमतौर पर उम्मीदवार के पास गैरकानूनी खर्च के लायक अंधाधुंध पैसा होना चाहिए। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि धर्म और जाति का ध्रुवीकरण कैसे करवाया जा सकता है, कैसे साम्प्रदायिकता खड़ी करके उससे उपजने वाली नफरत को वोटों की शक्ल में भुनाया जा सकता है। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि किस तरह वोटरों को शराब या नोट बांटकर आखिरी के दो-तीन दिनों में उनका रूख अपनी तरफ किया जा सकता है। वे यह भी देखते हैं कि किस तरह दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को खरीदकर बिठाया जा सकता है, कार्यकर्ताओं को खरीदकर विपक्षी उम्मीदवार को कमजोर किया जा सकता है। हमने कई तरह के नाजायज काम देखे हैं। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने लोकसभा चुनाव लड़ते हुए अपने सामने के भाजपा उम्मीदवार चन्दूलाल साहू के नाम वाले आधा दर्जन और चन्दूलाल साहू ढूंढकर उनसे नामांकन भरवा दिया था, और फिर उन सबको मतदान तक गायब कर दिया था। इसी छत्तीसगढ़ में अंतागढ़ के कांग्रेस उम्मीद्वार की खरीदी-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग आज भी चारों तरफ घूमती है। हमने अपने ही आसपास के शहरों में देखा है कि किस तरह मुस्लिम वोटरों को शक से देखने वालों ने ऐन मतदान के दिन उनकी अजमेर की टिकटें करवा दी थीं, और एक दूसरे उम्मीदवार ने मतदान के एक दिन पहले मुस्लिम वोटरों को बुला-बुलाकर उनकी उंगलियों पर काली चुनावी स्याही लगाकर नगद भुगतान कर दिया था, ताकि वे अगले दिन वोट न डाल सकें। इस तरह की सैकड़ों तिकड़में भारत के चुनावों में होती हैं जिनकी कोई आशंका भी देश के संविधान और चुनाव आयोग के नियमों में नहीं है। फिर अब तो चुनाव आयोग का हाल यह है कि उसके बारे में लतीफे बनते हैं कि वह फलां गठबंधन में शामिल नहीं हो रहा, वह बाहर से समर्थन करेगा। शेषन की साख वाले चुनाव आयोग की शेष न रह गई साख के बारे में अब क्या ही कहा जाए! अभी तो बहुत से लोगों का यह मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण से ही अगले चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं।

अब इस बात पर भी आ जाएं कि चुनावों में जो लोग या पार्टियां जीत जाते हैं, उनका क्या होता है? दलबदल कानून की वजह से अब इक्का-दुक्का दलबदल मुमकिन नहीं है, और अब थोक में खरीद-बिक्री को कानूनी दर्जा हासिल है, और वह शायद सस्ता भी पड़ता है। इसलिए अब देश में यह लतीफा भी चलता है कि वोटर वोट किसी को भी दे, उसका निर्वाचित सांसद या विधायक किसे वोट देगा, यह तो वोटर तय नहीं करते। इतने सारे अलग-अलग प्रभावों को देखें, तो लगता है कि भारत के चुनावों के लोकतांत्रिक होने, और वोटर के राजा-रानी होने, देश का भाग्यविधाता होने, जैसी बातें अपने आपको धोखा देने वाली हैं। जरा यही देख लें कि जितने वोटों से कोई उम्मीदवार जीतते हैं, उससे कितने अधिक वोट नाजायज तरीके से प्रभावित किए जाते हैं। फिर किसी पार्टी के जितने उम्मीदवार जीतते हैं, वह पार्टी किस तरह टूटकर किसी और पार्टी या गठबंधन में चली जाती है। यह सब देखकर लगता है कि पार्टी छोडऩे वाले उम्मीदवार चाहे अकेले हों, चाहे दो-तिहाई मिलकर छोड़ें, उनकी सदस्यता तुरंत खत्म होनी चाहिए, अगला चुनाव लडऩे पर 6 बरस की रोक लगनी चाहिए ताकि अगला चुनाव न लड़ सकें। एक यही फैसला हो जाए, तो भारतीय लोकतंत्र की ढेर सारी बदबूदार गंदगी छंट जाएगी। नहीं लगता है आपको? हाल के बरसों के दलबदल देखकर इस एक शर्त को लागू करके देखिए कि 6 साल के अंधेरे भविष्य का खतरा कितने लोगों को पटरी पर बनाए रखेगा!  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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