संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अमरीका-ईरान युद्धविराम के बीच भारत-पाकिस्तान
सुनील कुमार ने लिखा है
08-Apr-2026 8:06 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : अमरीका-ईरान युद्धविराम के बीच भारत-पाकिस्तान

बीती बहुत देर रात तक हिन्दुस्तानी अखबारों ने राह देखी होगी कि आखिरी संस्करण छपने जाने के पहले अगर ईरान पर हमला शुरू हो जाए, तो उस खबर को ले लिया जाए। वह तो हो नहीं पाया, क्योंकि दुनिया के इतिहास की सबसे खतरनाक धमकी के बाद डॉनल्ड ट्रम्प ईरान के साथ एक पखवाड़े के युद्धविराम की घोषणा करते दिखे। हमले का वक्त भारत के समय के मुताबिक सुबह साढ़े 5 बजे बताया गया था, और इसके ठीक 10 मिनट पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ऐलान किया कि युद्धविराम हो गया है, और तुरंत लागू हो गया है। एक लाईन में कहा जाए तो दो बुनियादी शर्तों पर यह सहमति बनी है कि ईरान पर हमले रोक दिए जाएं, और ईरान जलडमरूमध्य को जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दे। दोनों देशों ने इस पर सहमति जाहिर की है, और दो दिन बाद 10 अप्रैल से पाकिस्तान में दोनों पक्षों के बीच शांति और समझौता वार्ता शुरू होगी। ट्रम्प ने जिस जुबान में ईरान से सभ्यता को हमेशा के लिए खत्म कर देने का ऐलान किया था, वह दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी फौजी धमकी थी, और अमरीकी मूल के पोप लियो ने इस धमकी पर कहा था कि ईरान के सभी लोगों के खिलाफ ऐसी धमकी और ऐसा खतरा मंजूर नहीं किया जा सकता। वे अमरीका में जनमे हुए पहले पोप हैं, और जंग के बीच उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति के इस बयान की आलोचना के पहले भी अमरीकी युद्ध-मंत्री के फतवों की आलोचना की थी जिसमें उसने इस जंग को ईश्वर की मर्जी करार दिया था।

खैर, आज सुबह का हिन्दुस्तानी सूरज का वक्त पूरी दुनिया के लिए एक नई तस्वीर लेकर आया है। महीने भर से अधिक से ईरान पर इजराइल, और उसके पिट्ठू बने हुए अमरीका के फौजी हमले चल रहे थे। इस एक महीने ने यह भी साबित किया कि अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प किस तरह एक मानसिक रोगी है, अस्थिर दिमाग का है, फैसले लेने में सक्षम नहीं है, तुरंत ही दफ्तर से बाहर कर देने के लायक है, यह एक अलग बात है कि अमरीकी संविधान में बिना दिमाग के तानाशाह राष्ट्रपति को भी हटाने का कोई आसान तरीका नहीं है। इसलिए खुद अमरीकियों ने इस युद्धविराम से राहत की सांस ली है क्योंकि बेदिमाग ट्रम्प ने पूरी दुनिया को जिस तरह के ऊर्जा संकट में डाला है, अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है, उसकी वजह से खुद अमरीकी अपने-आपको कोस रहे हैं कि उन्होंने यह कैसा पिशाच चुन लिया था। खैर, अगर ट्रम्प आज जिस तरह पूरी दुनिया को तबाह कर रहा है, उस तरह अगर वह सिर्फ अमरीका को तबाह करता, तो हमें कोई शिकायत नहीं रहती। दिक्कत यह है कि वह चुना तो गया है अमरीका के लिए, लेकिन तबाह उसने पूरी दुनिया को कर दिया है। लेकिन इस एक महीने ने अमरीका को यह आईना भी दिखा दिया है कि उसकी निहायत नाजायज जंग से किस तरह योरप के एक-एक देश ने अपने-आपको अलग कर लिया, और नाटो को खत्म कर देने की धमकी देने के बावजूद कोई देश ट्रम्प के साथ नहीं आया। ऐसी अंतरराष्ट्रीय तबाही के दबावतले भी ट्रम्प तानाशाही दिखा रहा था, और यह उसकी असामान्य और बीमार मानसिक हालत का एक सुबूत था।

बाकी दुनिया के साथ-साथ यह भारत के लिए भी एक राहत की बात हो सकती है कि देश में इस वक्त चल रही गैस की किल्लत शायद कुछ दिनों में खत्म या कम हो जाए, इसके साथ-साथ खाड़ी के देशों में भारत से होने वाले निर्यात का रास्ता भी कुछ खुल सकता है, हो सकता है इससे छत्तीसगढ़ के तरबूज एक बार फिर खाड़ी के देशों में जा सकें, और नदी की जलती रेत पर तरबूज की फसल लेने वाले लोगों की बर्बादी टल सके, भारत के दसियों हजार कारखाने फिर शुरू हो सकें, और करोड़ों मजदूर तात्कालिक बेरोजगारी से बच सकें। लेकिन भारत को अपने बारे में कुछ सोचना होगा। जब ईरान की जंग को लेकर भारतीय विदेश मंत्री ने विपक्षी पार्टियों से बात की, और विपक्ष ने पूछा कि भारत इस जंग में चुप क्यों है, जबकि पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है, तो इस पर विदेश मंत्री जयशंकर का जवाब था- भारत कोई दलाल देश नहीं है, भारत की अपनी अलग गरिमा और नीति है। यह बयान सैकड़ों अखबारों में गूंजा, जगह-जगह इसके बारे में लिखा गया, लेकिन भारत सरकार ने इस शब्द का खंडन नहीं किया, बल्कि यह कहा कि भारत वैश्विक मंच पर बिचौलिए की भूमिका निभाने के बजाय सीधे संवाद और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। कई विपक्षी दलों ने जयशंकर की भाषा को अमर्यादित बताया, लेकिन जयशंकर इस पर अड़े रहे। अभी चार-पांच अप्रैल को ईरान के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से एक्स पर लिखकर पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों की सराहना की, कहा कि वे इसके लिए दिल से अहसानमंद हैं, और उन्होंने संदेश के अंत में पाकिस्तान जिंदाबाद लिखा। ईरान को लग रहा था कि तमाम मुस्लिम देशों के बीच अकेला पाकिस्तान ही ऐसा है जो उसके बारे में अमरीका से बात कर रहा है। इधर भारत में जयशंकर के कहे हुए दलाल और दलाली जैसे शब्दों को लेकर पाकिस्तान की बात तो छोड़ें, खुद भारत में लोग हक्का-बक्का थे, और हैं। जब दुनिया को बुरी तरह प्रभावित कर रही दो देशों के बीच की जंग इस हद तक बेकाबू हो चली हो, तो उसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाना दलाली नहीं होती, वह एक लीडरशिप होती है। यह भारत की जाने कौन सी विदेश नीति है जो मध्यस्थता के बारे में सोच भी नहीं रही, शायद सोच भी नहीं सकती, और एक मध्यस्थ को गाली दे रही है!

ईरान पर इजराइल और अमरीका के हमलों के दो-चार दिन पहले ही भारतीय प्रधानमंत्री इजराइल जाकर वहां का सबसे बड़ा सम्मान लेकर आए थे। उसके तुरंत बाद जिस तरह इजराइल ने ईरान पर हमला किया था, उसे भारत के साथ एक धोखा भी करार दिया गया था कि उसने भारतीय प्रधानमंत्री के प्रवास को एक आड़ बनाकर ईरान को धोखे में रखा, और फिर इसी आड़ के पीछे से उस पर हमला कर दिया। अब ऐसे वक्त पर इजराइल का सर्वोच्च सम्मान लेकर लौटने वाले मोदी के पास शायद ईरान और अमरीका के बीच मध्यस्थ बनने जैसी विश्वसनीयता भी हाल-फिलहाल तो नहीं रह गई थी। हमारा तो यह मानना है कि खाड़ी का एक छोटा सा देश कतर जिस तरह आज दुनिया की बड़ी-बड़ी जंग में, बड़े-बड़े संघर्षों में मध्यस्थ की जो भूमिका निभा रहा है, वह देखने लायक है। पिछले दो दशकों में कतर अफगानिस्तान में अमरीका और तालिबान के बीच, इजराइल और हमास के बीच, रूस और यूक्रेन के बीच, लेबनान, सूडान, वेनेजुएला और अमरीका जैसे देशों के बीच या कुछ देशों के घरेलू मामलों में भी मध्यस्थ रहा है, वह उसे एक बड़े लीडर की तरह बना चुका है। इसलिए मध्यस्थ को दलाल कहना पूरी तरह नाजायज था, और आज पाकिस्तान ने जिस तरह अमरीका और ईरान के बीच जंग रोकने में भूमिका निभाई है, उसने पाकिस्तान का वजन बढ़ाया ही है। एक बार दलाल कह देने के बाद उस बात को आगे बढ़ाने से बेहतर यह होगा कि भारत अपनी भाषा और विदेश नीति को एक बार दुबारा समझे।

उधर अमरीका की बात करें, तो ट्रम्प को शायद यह समझ पड़ रहा है कि वह बाकी दुनिया में भी, और अपने देश के भीतर भी, अपनी पार्टी के भीतर भी किस तरह, और किस हद तक अकेला पड़ रहा है। हो सकता है कि इससे  उसके जैसे तानाशाह को भी अपनी औकात समझ में आए। हम सुबह के भूले हुए के शाम को घर लौटने पर उसे ताना देने, और उस पर तंज कसने पर भरोसा नहीं रखते। ईरान के मोर्चे पर तकरीबन शिकस्त पा चुके ट्रम्प को अगर हकीकत समझ में आ रही है, और वह इजराइल के पैरों पर एक पालतू की तरह लोट-पोट होना बंद करके दुनिया में नाजायज जंग छेडऩा रोक सकता है, तो हो सकता है कि इससे ट्रम्प अपनी कुर्सी से हटाए जाने से भी बच सके। फिलहाल दुनिया इस युद्धविराम में अमरीका को हारा हुआ, और ईरान को जीता हुआ देख रही है, देखते हैं कि इस एक पखवाड़े में पाकिस्तान को और कैसी भूमिका मिलती है, और उसे दलाल कहना हिन्दुस्तान को कितना नुकसानदेह साबित होता है। भारत को इतनी मेहनत करके अपने आपको हाशिए पर नहीं धकेलना चाहिए था। आज वह न ईरान के काम का रह गया, न अमरीका के, और न ही इजराइल के। दुनिया के इतिहास में एक बड़ी वैश्विक दखल रखने वाले हिन्दुस्तान  का इस तरह अप्रासंगिक हो जाना, और सिर्फ अपने लिए सस्ते तेल के जुगाड़ में लगे रहना उसके अंतरराष्ट्रीय वजन को खत्म करने वाला है। भारत को अपनी रणनीति, प्राथमिकताएं, और अपनी साख के बारे में आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन करना चाहिए। 

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