संपादकीय
कल सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों ने अदालत के बेजा इस्तेमाल को लेकर केन्द्र सरकार को झिडक़ा है, और जनता को भी। एक मामला तो ऐसा रहा जिसमें अदालत ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने पर केन्द्र सरकार पर 25 हजार रूपए का जुर्माना लगाया है। यह मामला सीआईएसएफ के एक सिपाही को गलत तरीके से बर्खास्त करने का था, हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी रद्द कर दी थी, और कुछ पुराना बकाया भी देने को कहा था। इसके खिलाफ केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी, और वहां पर जस्टिस बी.वी.नागरत्ना, और जस्टिस उज्जल भुयां ने नाराजगी के साथ कहा कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि भारत सरकार ने इस मामले में अदालत में अपील क्यों की है? उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार देश में आज सबसे बड़ी मुकदमेबाज बन गई है, इस तरह की गैरजरूरी की मुकदमेबाजी अदालतों पर बोझ बढ़ाती है, और इंसाफ में देरी की वजह बनती है। इन जजों ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़े खुलासे से आदेश दिया था, फिर भी केन्द्र सरकार बिना किसी ठोस आधार के सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। यह एक असाधारण मामला था जिसमें कड़ी आलोचना के साथ केन्द्र सरकार पर जुर्माना भी लगाया गया। अदालत ने इसे तुच्छ याचिका कहा, और कहा कि सरकार को आदर्शवादी होना चाहिए, न कि हर छोटे फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचना चाहिए। जजों ने कहा कि आज हजारों लोग जेलों में बंद हैं, और जमानत या फांसी जैसे गंभीर मामलों में अदालती आदेश या फैसले के इंतजार में हैं, ऐसे में सरकार का ओछे कानूनी दांव-पेंच लेकर आना, उन लोगों के हक का समय छीनना है। कोर्ट ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा बिना सोचे-समझे अपील दायर करने की संस्कृति को बंद करना होगा। यह जुर्माना इसीलिए प्रतीकात्मक रूप से लगाया गया ताकि भविष्य में अफसरों को यह याद रहे कि वे अदालत के समय के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि अगर सरकार खुद इस तरह की याचिकाएं दायर करती रहेगी, तो अदालतों पर से मामलों का बोझ कभी कम नहीं होगा।
एक दूसरे मामले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने एक वकील द्वारा दायर कई जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने वकील को झिडक़ा, और कहा कि ये जनहित याचिकाएं पूरी तरह से अस्पष्ट और बेबुनियाद हैं। उन्होंने वकील से पूछा कि क्या आप इन्हें आधी रात में तैयार करते हैं? जजों ने कहा कि पीआईएल दायर करने का मतलब यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति अपनी मनमानी शिकायतें लेकर अदालत आ जाए, ऐसी जनहित याचिका दुकानें चलाने वालों पर नजर रखनी होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसी पीआईएल दायर करने वालों पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। इस वकील, सचिन गुप्ता ने अपनी पीआईएल में प्याज-लहसून को तामसिक बताने, शराब पर रोक लगाने, किसी भाषा को क्लासिकल (शास्त्रीय) घोषित करने जैसे बेतुके मुद्दे उठाए थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बहुत से लोग अपने निजी हितों के लिए, किसी रंजिश में, या किसी को परेशान करने के लिए गलत इरादे से केस दर्ज करते हैं। कई मामलों में लोग केवल विपक्षी पार्टी को डराने, उनका पैसा खर्च कराने, या उन्हें सामाजिक रूप से अपमानित करने के लिए फर्जी या कमजोर आधार वाले केस करते हैं। जजों ने कहा कि अदालतें व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकाने की जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि अदालतों में मुकदमों की बाढ़ इसलिए नहीं है कि जुल्म बढ़ गया है, बल्कि इसलिए भी है कि कानूनी पैंतरेबाजी बढ़ गई है, लोग तथ्यों को तोड़-मरोडक़र पेश करते हैं, ताकि मामला लंबा खिंचे। कोर्ट ने कहा कि जो लोग साफ-सुथरी नीयत से अदालत नहीं आते हैं, उन्हें भारी दंड मिलना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों की वजह से असली पीडि़तों को तारीख मिलने में सालों लग जाते हैं, क्योंकि जज उन केसों में उलझे रहते हैं जो शुरू ही नहीं होने चाहिए थे।
अब सुप्रीम कोर्ट के दो-दो जजों वाली दो अलग-अलग बेंचों ने एक ही दिन में राजा, और प्रजा नाम के इन दो तबकों के लिए जो कड़ा संदेश दिया है, उसे हमने इतने खुलासे से इसलिए लिखा है कि हम उसे इस कॉलम में लिखने के विचार जैसा मान रहे हैं। इस मुद्दे पर हम खुद भी अगर लिखते, तो हमारी बातें इन जजों की बातों जैसी ही रहतीं। यह बहुत अच्छा हुआ कि अदालत ने देश की सबसे बड़ी मुकदमेबाज, भारत सरकार को झिडक़ा, और प्रतीकात्मक जुर्माना लगाया, दूसरी तरफ देश के ताकतवर तबकों को भी झिडक़ा कि वे वकील की फीस देने की ताकत का बेजा इस्तेमाल करते हैं, और बेबुनियाद, फर्जी मामलों को अदालत में ले जाकर दूसरों को परेशान करते हैं। भारतीय न्यायपालिका में देश की जनता को जो अधिकार मिले हुए हैं, उनका बेजा इस्तेमाल करने की ताकत जिनमें हैं, वे कमजोर तबकों के इंसाफ के हक को छीनने के अलावा कुछ नहीं करते। और फिर जब ऐसे बदनीयत और गैरजिम्मेदार लोगों की बराबरी केन्द्र सरकार भी करने लगे, एक सिपाही को हाईकोर्ट से मिली कुछ मामूली राहत के खिलाफ केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट चली जाए, तो एक बर्खास्त या रिटायर्ड सिपाही किस ताकत से वहां केन्द्र सरकार के बड़े-बड़े दिग्गज वकीलों का सामना कर सकता है? इंसाफ की सिर्फ भावना नहीं रहनी चाहिए, इस लोकतंत्र की कड़ी और खुरदुरी जमीन पर उस इंसाफ की गुंजाइश भी रहने देनी चाहिए। आज देश में पहले तो जांच की व्यवस्था भ्रष्टाचार और लापरवाही, अक्षमता, और लेटलतीफी की शिकार है। इसके अलावा मामला जब न्यायपालिका में जाता है, तो वह धान के बोरों या तेन्दूपत्ता के बोरों से लदी हुई ट्रक के मुकाबले भी अधिक ओवरलोड रहती है, और वहां पर महंगे वकील रखने की ताकत वाले लोग कई दूसरे किस्म की नाजायज तिकड़में जुटाकर गरीबमारी करते हैं। ऐसे में न्याय व्यवस्था जुबानी जमाखर्च रह जाती है। सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग अदालतों से कल ही उठी हुई एक सरीखी फिक्र देश के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि बदनीयत जनता जिस तरह अदालत का बेजा इस्तेमाल करती है, केन्द्र सरकार भी वैसा ही काम करती है।
अब इन चार जजों ने दो मामलों में अपनी सोच और फिक्र तो सामने रख दी है, लेकिन न्यायिक जवाबदेही का कोई ऐसा तरीका भी होना चाहिए जो अदालतों के बोझ को घटाने का काम कर सके। जिन मामलों को तुच्छ कहा गया है, उन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाने का सिलसिला खत्म करना चाहिए। एक सिपाही के बहुत मामूली से मामले को हाईकोर्ट में ही खत्म मान लिया जाना चाहिए था। अब हमें न्यायपालिका की संवैधानिक सीमाओं, और जटिलताओं की अधिक समझ नहीं है, लेकिन यह लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों को दाखिला भी नहीं देना चाहिए, और उन्हें खारिज करते हुए अदालत का समय बर्बाद करने के लिए लागत वसूल करनी चाहिए, और जरूरत हो तो जुर्माना भी लगाना चाहिए। अदालतें किसी-किसी मामले में कोर्ट का समय खराब करने के लिए वक्त की लागत वसूलते आई हैं, जिन मामलों को अदालत पहली नजर में ही तुच्छ, और बेबुनियाद या फर्जी पा रही हैं, उन पर सुनवाई शुरू ही क्यों की गई? और जब तक सचमुच का ही कोई व्यापक जनहित न हो, लोगों की धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, छद्म राष्ट्रीयता से उपजे बेबुनियाद मामलों पर तो पहली नजर में ही जुर्माना लगाया जा सकता है। हमारा ख्याल है कि सुनवाई करने के बाद इस तरह की बात कहने की नौबत नहीं आनी चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फर्जी दिखते मामलों को दरवाजा दिखा देना चाहिए, चाहे उन्हें सरकारें लेकर आएं, या जनता। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


