संपादकीय
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने अभी दो नए विधेयक पास किए हैं, और राज्यपाल से इन पर मंजूरी मिल जाने पर वे कानून बन जाएंगे। भारत में जैसी राजनीतिक परंपरा है, उसके मुताबिक यह बात साफ है कि जिस पार्टी की राज्य सरकार रहती है, केन्द्र से अगर उसी पार्टी की सरकार ने राज्यपाल नियुक्त किए हैं, तो वे उस सरकार के भेजे विधेयकों पर अड़ंगा नहीं लगाते। छत्तीसगढ़ में एक कानून धार्मिक स्वतंत्रता का है जिसमें धर्मांतरण करवाने वाले लोगों पर पहले के मुकाबले कई गुना अधिक कड़ी कार्रवाई का इंतजाम है। पहले भी लालच देकर, दबाव डालकर, या प्रताडि़त करके, धोखा देकर धर्मांतरण करवाने पर सजा का इंतजाम था, अब उस सजा को इस नए विधेयक में बहुत बढ़ा दिया गया है। यह एक अलग बात है कि देश के अलग-अलग कई राज्यों के इसी तरह के धार्मिक स्वतंत्रता, या धर्मांतरण विधेयकों, या कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, और उन पर एक साथ सुनवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने जो दूसरा विधेयक पास किया है, वह किसी भी तरह के इम्तिहान में पर्चे आउट करने वाले लोगों को बड़ी लंबी और कड़ी सजा देने का है। इसमें नकल करने वाले लोगों को भी कई बरस के लिए अपात्र कर दिया जाएगा, और साजिश के तहत पेपर लीक करने वालों को उम्रकैद तक की सजा, एक करोड़ तक का जुर्माना नए कानून में रहेगा, और उनकी सम्पत्ति जब्त करके उससे भी जुर्माना वसूल किया जाएगा। दोनों ही कानून बहुत कड़े हैं, और दोनों में ही उम्रकैद जैसे प्रावधान रखे गए हैं, जो कि आमतौर पर सामूहिक बलात्कार, या कत्ल जैसे हिंसक अपराधों में ही रहते आए हैं।
देश की सरकार को, या हर प्रदेश को अपनी विचारधारा के मुताबिक कानून बनाने का हक है, और उसके लिए संसद या विधानसभाओं में जितने बहुमत की जरूरत रहती है, वह अगर सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी को हासिल है, तो फिर सदन में असहमति कोई मायने नहीं रखती। संसदीय व्यवस्था, और परंपरा यही है कि बिना किसी बहस के ध्वनिमत से भी विधेयक पास हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति को दर्ज कराने के लिए मतदान में हारने के बजाय कई बार सदन छोडक़र भी चले जाता है। लेकिन जहां कहीं भी कोई नया कानून बनता है, वहां एक लोकतांत्रिक परंपरा शुरू करने की जरूरत है। चूंकि सदनों में चर्चा का माहौल घटते चल रहा है, बहुत से मुद्दों पर विपक्ष को सदनों में बोलने की इजाजत ही नहीं मिलती, इसलिए इसे सरकार की जिम्मेदारी बनाना चाहिए कि वह सदन के अलावा सडक़ के लोगों को भी अपनी बात समझाने के लिए सरल शब्दों में यह बताए कि इस नए कानून की जरूरत क्या है। लोगों की राजनीतिक चेतना के लिए यह जरूरी है कि जटिल कानूनों की सरल व्याख्या उनके सामने रखी जाए। वैसे तो सरकारें यह कह सकती हैं कि वे विधेयकों को पेश करने के पहले उन पर जनता की राय जानने के लिए वेबसाइट पर लोगों से रायशुमारी करती हैं, लेकिन आम जनता वेबसाइट पर भी जटिल बातों को न पढ़ पाती है, न उन पर प्रतिक्रिया दे पाती है। इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे अपने विधेयकों को एक सामाजिक ऑडिट के लिए जनता के सामने भी पेश करें। अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में जनता के सामने कुछ पेश करने का एक माध्यम मीडिया होता है, लेकिन अगर उसके लोग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए तल्ख सवाल न करें, और महज डिक्टेशन लेकर, बयान रिकॉर्ड करके लौट जाएं, तो जनता के लिए जरूरी उसका लोकतांत्रिक हक किनारे धरा रह जाता है।
सामाजिक ऑडिट से हमारा एक मतलब यह भी है कि सरकारों को यह साफ करना चाहिए कि मौजूदा कानूनों में कौन सी कमी थी जिसकी वजह से नए कानून की जरूरत आन पड़ी है। क्या जांच की कमी, सुबूत दर्ज करने की कमजोरी, बेअसर हद तक धीमी हो चुकी अदालतें कानूनों के बेअसर होने के लिए जिम्मेदार हैं, या कि इन सब पहलुओं के मजबूत कर देने के बाद भी मुजरिम छूट जा रहे हैं, उन्हें सजा का खौफ नहीं रह गया है? आमतौर पर हमारा तजुर्बा यह है कि सरकारें मौजूदा कानूनों का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, जांच में कमी रहती है, सुबूत ठीक से दर्ज नहीं होते हैं, गवाही समय पर और सही तरीके से नहीं हो पाती, अदालत में सरकारी वकील कमजोर पड़ जाते हैं, और हर स्तर पर कुछ बाहरी वजहें भी असर डालने लगती हैं, जिनसे मुजरिमों को सजा नहीं हो पाती। अब अगर मौजूदा कानून, और उनकी जगह आने जा रहे अधिक कड़े कानून दोनों पर अमल की तुलना करें, तो अगर अमल ही कमजोर है, तो नया अधिक कड़ा कानून भला किस काम आएगा? अभी एक-दो दिन पहले ही दो नौजवानों को देश के एक सबसे कड़े और खतरनाक कानून यूएपीए से अदालत ने शायद सात बरस बाद रिहा कर दिया कि उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त सुबूत नहीं थे। अब जिस एक सबसे बड़े कानून के तहत पांच-पांच बरस तक तो जमानत नहीं होती, उस कानून की जगह अगर और कड़ा कानून भी लागू कर दिया जाए, और उसके तहत दस-दस बरस तक जमानत न हो, और सुबूतों के अभाव में अदालत से लोग छूट जाएं, तो ऐसे अधिक कड़े कानून किस काम के रहेंगे? सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि क्या सरकारें मौजूदा कानूनों का पूरी हद तक इस्तेमाल करने के बाद भी, पूरी बारीकी बरतने के बाद भी असफल हो रही हैं? अगर ऐसा है तब तो नए अधिक कड़े कानून की जरूरत है, वरना ऐसे कानून जनता को संतुष्ट करने के लिए अधिक बनते हैं कि सरकार किसी मामले में कितनी गंभीर है।
आज हेलमेट न लगाने पर दुपहिया चालकों पर अगर पांच सौ रूपए का जुर्माना है, और किसी का भी चालान नहीं हो रहा है, तो क्या हजार रूपए जुर्माना करने से लोग हेलमेट लगाने लगेंगे? जब चालान ही नहीं होते हैं, तो महज जुर्माना बढ़ाते चलने से कानून पर अमल नहीं बढ़ जाता। सरकारों को जनता के सामने यह खुलासा करना चाहिए कि नए अधिक कड़े कानूनों की जरूरत क्यों आ पड़ी हैं? संसदीय व्यवस्था में बहुमत से कानून बनाने का हक सरकार को है, और हम किसी एक कानून के गुण-दोष पर यहां बात नहीं कर रहे, हमारा सिर्फ यही कहना है कि एक कानून का सही और जायज इस्तेमाल किए बिना दूसरा नया कानून बना लेने से कुछ नहीं होता। और यह बात हम सिर्फ छत्तीसगढ़ के संदर्भ में नहीं कह रहे हैं, हम लंबे समय से देश-प्रदेश के ऐसे कानूनों को लेकर यही सैद्धांतिक बात करते आए हैं कि सरकारों को कानूनों पर अमल की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी की कमी को छुपाने के लिए नए कानूनों का सहारा नहीं लेना चाहिए, इससे कुछ समय के लिए तो लोगों को लग सकता है कि सरकार कुछ कर रही है, लेकिन ये कानून जिन मकसद को बताते हुए बनाए जाते हैं, वे मकसद पूरे नहीं होते।


