संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बड़े निजी अस्पताल में गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने वाले टैंक में सफाई कर्मचारी उतरे, तो उनमें से तीन की मौत वहां बनी हुई गैस से हो गई। सफाई कर्मचारियों के साथ देश भर में जगह-जगह ऐसे हादसे होते रहते हैं, और जब बाकी पूरी दुनिया ऐसी सफाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल करती है, सफाई कर्मचारी गैस मास्क लगाकर ही ऐसी टंकियों में या गटर-नालों में उतरते हैं, तब भारत इन मशीनों से दूर है। मशीनें हैं जरूर, लेकिन वे जरूरत जितनी नहीं हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि दमकल गाडिय़ां हैं जरूर, लेकिन जरूरत जितनी नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि इधर गटर में उतरे हुए सफाई कर्मचारी दम घुटने से मरते हैं, तो उधर फायर ब्रिगेड का इंतजार करते हुए लोग दम घुटने से जिंदगी खो बैठते हैं। पूरे देश में ये दोनों ही सहूलियतें शहरी विकास के साथ जुड़ी हुई हैं, और शहरों का बाकी विकास तो हो जाता है, लेकिन सफाई की मशीनी क्षमता, और आग बुझाने की पर्याप्त क्षमता अधिकतर राज्यों में स्थानीय शासन की प्राथमिकता नहीं रहती।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में फायर ब्रिगेड को म्युनिसिपल से लेकर पुलिस को इसलिए दिया गया था कि पुलिस अधिक कड़ाई और अनुशासन से इस इमरजेंसी सेवा को बेहतर चला सकेगी। लेकिन जिम्मा तो पुलिस को दे दिया गया, सहूलियतें नहीं दी गईं, नतीजा यह हुआ कि बिना पर्याप्त गाडिय़ों, और बिना पर्याप्त कर्मचारियों के अब फायर ब्रिगेड मानो किसी की जिम्मेदारी नहीं रह गई। अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पूरे प्रदेश के बारे में सरकार से जवाब-तलब कर रहा था कि आग से जूझने की क्षमता विकसित करने में इतनी लापरवाही क्यों है? ठीक इसी तरह अब जब म्युनिसिपल के इलाके में, राज्य की राजधानी में सफाई कर्मचारी मर गए हैं, तो यह बात सामने आ रही है कि अस्पताल में नगर निगम से एसटीपी की सफाई का अनुरोध किया था, और म्युनिसिपल ने इसे खुद करवाने कह दिया था। अब खबरें बताती हैं कि खुद म्युनिसिपल के पास इस विशाल और विकराल हो चुके शहर में शौचालयों और गटरों की सफाई के लायक मशीनें गिनी-चुनी हैं। जाहिर है कि नेताओं, और अफसरों के बंगलों से वक्त मिलने पर ही बाकी जगह गाडिय़ां जा पाती होंगी, और इस अस्पताल की तरह बहुत से लोग ठेकेदारों के मोहताज रहते होंगे सफाई के लिए।
साथ-साथ चल रही इन दोनों खबरों से यह लगता है कि क्या ऐसी शहर सरकार को सचमुच ही गौरवपथ नाम की कोई चीज बनानी चाहिए? क्या शहर का गौरव किसी चौराहे से, बगीचे या सडक़ से होता है, या फिर वह आंखों से दूर एक ऐसी छुपी हुई सुविधा से होता है जिसकी चर्चा तो नहीं होती, लेकिन जिससे शहर का, और नागरिकों का जीवन सुरक्षित होता है, और सहूलियत का रहता है। आज शहरों में जगह-जगह कहीं गौरवपथ, कहीं गौरव गार्डन, कहीं सडक़ के डिवाइडरों का सौंदर्यीकरण, तो कहीं किसी नई प्रतिमा का स्थापना, अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा, और उनके अहंकार को पूरा करना भी प्राथमिकता में रहता है। नतीजा यह होता है कि बुनियादी जरूरतें किनारे धरी रह जाती हैं। जब से स्थानीय शासन, या म्युनिसिपल की धारणा शुरू हुई, तब से ही साफ पानी, साफ शहर, रौशनी और सडक़, ये ही म्युनिसिपल की प्राथमिकताएं मानी जाती हैं। अब इन बुनियादी जरूरतों के पूरे न होने पर भी म्युनिसिपल साज-सज्जा, और राजनीतिक स्मारकों में जुट जाती हैं, जनता की साफ और सुरक्षित जिंदगी की जरूरतें हाशिए पर चली जाती हैं।
दशकों से स्थानीय संस्थाओं को देखते हुए अभी भी हमारे लिए यह तय करना दुविधा का मामला है कि इन्हें चलाने के लिए अफसर बेहतर होते हैं, या निर्वाचित जनप्रतिनिधि? कानून के हिसाब से पंचायत हो या म्युनिसिपल, इनके निर्धारित चुनाव करवाना एक संवैधानिक जिम्मेदारी है, ठीक उसी तरह, जिस तरह संसद और विधानसभाओं के चुनाव तय समय पर होते हैं। लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का जो हाल स्थानीय संस्थाओं में दिखता है, उससे मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या सचमुच ही भारत के इस हिस्से के शहर ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए तैयार हैं, या फिर यहां अफसरों से ही म्युनिसिपलों को चलवाना चाहिए? यह सवाल कुछ अलोकतांत्रिक लग सकता है, लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी अपनी जिम्मेदारियों, और अधिकारों के बीच तालमेल बैठाते बहुत कम दिखते हैं। फिर इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ये जनप्रतिनिधि वही तो बन सकते हैं जिन्हें राजनीतिक दल उम्मीदवार मनोनीत करते हैं। ये उम्मीदवारी किसी भी तरह से स्थानीय संस्थाओं को चलाने को ध्यान में रखने की क्षमता के हिसाब से तय नहीं की जाती, धर्म, जाति, उपजाति, और जीत की संभावना को देखते हुए जब स्थानीय संस्थाओं की लीडरशिप के लिए उम्मीदवार तय होते हैं तो इन्हें चलाने की क्षमता किसी प्राथमिकता सूची में नहीं रहती। ऐसे में लगता है कि इनके राजनीतिक दबाव और नियंत्रण से परे शायद अफसर अकेले ही कुछ बातों को बेहतर तरीके से तय कर पाते, लेकिन पंचायती राज कानून के बाद अब हमारी यह चर्चा केवल एक काल्पनिक चर्चा है जिसकी कोई संभावना नहीं है।
ऐसे में स्थानीय संस्थाओं पर काबिज लोगों को ही अपनी जिम्मेदारी बेहतर तरीके से समझना होगा, और जिस म्युनिसिपल को सैकड़ों-हजारों करोड़ रूपए साल का टैक्स मिलता है, उसे शहर के बुनियादी ढांचे पर खर्च करना चाहिए। यह ढांचा ओवरब्रिज और फ्लाईओवर का नहीं रहता, महंगे, और गैरजरूरी निर्माणों का भी नहीं रहता, यह ढांचा सफाई, और सुरक्षा का ढांचा रहना चाहिए। जिस प्रदेश के शहरों की आग बुझाने की क्षमता को लेकर हाईकोर्ट को अफसरों की क्लास लगानी पड़े, उस प्रदेश को, और उसके शहरों को अपने बारे में भी सोचना चाहिए कि क्या वे इस सबसे बुनियादी जरूरत के बारे में भी अदालती फटकार और लताड़ के बाद ही हाथ-पैर हिलाएंगे?
इंसानों को गटर और सेप्टिक टैंक में उतरवाकर सफाई करवाना अमानवीय है, कहने के लिए इसके खिलाफ कानून भी है, लेकिन उस पर अमल की परवाह किसी को नहीं रहती। अगर म्युनिसिपल ही पर्याप्त संख्या में सफाई मशीनें मुहैया कराती, तो लोगों को, सफाई कर्मचारियों को अमानवीय और जानलेवा स्थितियों में जाकर ऐसे काम नहीं करने पड़ते। यह सिलसिला बहुत ही शर्मिंदगी का है, जब तक शहर की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, किसी शहर को किसी योजना के नाम के साथ गौरव नहीं लिखना चाहिए।


