संपादकीय
भारत में रसोई गैस की कमी से खलबली तो मची हुई है, लेकिन नौबत भगदड़ तक नहीं पहुंची है। घरेलू गैस सिलेंडर कुछ देर से सही, मिल तो जा रहे हैं, और बाजार के लिए कारोबारी गैस सिलेंडर की सप्लाई तकरीबन बंद है, लेकिन इस देश में कालाबाजारी इतनी संगठित और व्यवस्थित है कि कुछ शहरों में गिने-चुने रेस्त्रां छोडक़र बाकी सबका हाल खींचतान कर चल ही रहा है। पोहे के ठेलेवालों ने 30 रूपए का पोहा 50 रूपया कर दिया है, जाहिर है कि यह कालाबाजारी में महंगे मिलने वाले सिलेंडर का अतिरिक्त दाम है। एक प्लेट पोहे पर ब्लैक में मिले सिलेंडर से शायद एक-दो रूपए का ही फर्क पड़ा होगा, लेकिन दाम 20 रूपए बढ़ाने का एक मौका मिल गया। अभी भारत में ईरान के तंग रास्ते से गुजरते हुए दो एलपीजी जहाज पहुंचे हैं, लेकिन उनसे कितने दिन की सप्लाई होगी, कितने दिन की एलपीजी की कमी कायम रहेगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर आज भी अमरीकी इजाजत से भारत में रूसी तेल आ रहा है, और अगले कुछ हफ्तों में अमरीका इस इजाजत को खत्म भी कर देगा, तो क्या उसके बाद पेट्रोल-डीजल की कोई कमी होगी, यह भी अभी साफ नहीं है। साफ तो अभी जंग के बादल ही नहीं हैं कि खाड़ी के देशों में चल रही बमबारी से वहां से तेल और गैस का बाहर निकलना कब तक कितना प्रभावित रहेगा। ऐसे में भारत के लोगों को अपनी पेट्रोल-डीजल, और गैस की खपत के बारे में खुद होकर भी सोचना चाहिए। सरकार शायद अधिक कड़े फैसले तेजी से न ले पाती है, न उसकी घोषणा सरकार के लिए सहूलियत की बात रहती, लेकिन बाजार, घरेलू खपत, और संस्थागत ईंधन की खपत को काबू में करने की बात सभी लोगों को सोचनी चाहिए, न सिर्फ आज के इस परेशानी के दौर में, बल्कि बाद में भी।
आज दुनिया में अलग-अलग देशों ने इस नौबत से जूझने के लिए कई तरह के कड़े फैसले लिए हैं। पाकिस्तान में बिजली की कमी हो गई है, जिसकी वजह से स्कूलें बंद कर दी गई हैं, और दफ्तरों को चार दिन का कर दिया गया है। पाकिस्तान में एलएनजी से बिजली बनाने के प्लांट बंद कर दिए थे क्योंकि रूस-यूक्रेन संकट से वही सबक निकला था। अब पाकिस्तान तेजी से सौर ऊर्जा को बढ़ा रहा है, और कोयले से बिजली भी बढ़ाई जा रही है ताकि आयातित तेल या गैस पर मोहताज रहना घट सके। भारत के ही बगल के बांग्लादेश में यूनिवर्सिटी और बहुत से स्कूल बंद कर दिए गए हैं, बिजली कटौती आम हैं, एलएनजी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कोयले से बिजली उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। लेकिन उसने कोयले से बिजली बनाना बढ़ा दिया है, और कोयले के निर्यात को फिलहाल रोक दिया है ताकि घरेलू बिजली उत्पादन में कमी न रहे। चीन को रूस और ईरान से तेल मिलना जारी है, लेकिन उसने अपने बिजली घरों को अधिकतम क्षमता पर ले जाना जारी रखा है। दक्षिण कोरिया में कोयले से बिजली पर लगी गई एक सीमा को हटा दिया गया है, उसे अधिक से अधिक बनाया जा रहा है, परमाणु बिजली उत्पादन भी बढ़ाया जा रहा है, और बाहर से आने वाली एलएनजी की खपत को कम करने के लिए सभी उद्योगों को कह दिया गया है। थाईलैंड ने ऊर्जा बचत के कई तरीके लागू किए हैं, और लोगों से गैरजरूरी जमाखोरी न करने को कहा है। योरप में गैस की कीमतें 50 फीसदी तक बढ़ गई हैं, बहुत से देश कोयला और परमाणउ बिजलीघरों पर वापिस लौट रहे हैं, और बड़े-बड़े विकसित देशों जर्मनी, फ्रांस, और ब्रिटेन ने ऊर्जा बचत के अभियान चलाए हैं। जापान ने कोयले से बिजली बनाने को सबसे तेज किया है, ताकि एलएनजी पर निर्भरता कम रहे।
एलएनजी हो, या पीएनजी हो, किसी भी तरह की गैस की कमी से अब लोग परंपरागत कोयले के बिजलीघरों की तरफ लौट रहे हैं क्योंकि अभी खाड़ी के युद्ध के धीमे पडऩे का भी कोई आसार नहीं दिख रहा है। यह युद्ध बंद हो जाने के बाद भी समंदर के धीमे रास्ते पेट्रोलियम और गैस की आवाजाही पता नहीं कब सामान्य हो सकेगी। इसलिए समझदारी इसी में है कि दुनिया भर के देश इसे एक लंबा खतरा मानकर अपने तौर-तरीके ठीक करें। ईंधन की खपत घटाने की आदत इस मुसीबत के टल जाने पर भी काम की ही रहेगी, किफायत कभी बुरा सबक नहीं होती। भारत जैसे देश को यह सोचना चाहिए कि किस तरह वह सौर ऊर्जा से खाना पकाने के कुछ दशक पहले के एक कार्यक्रम को बढ़ा सकता है। 20-25 बरस पहले सोलर कुकर बड़ी सब्सिडी पर मिलते थे, और धूप के कुछ घंटों में वे धीमी रफ्तार से खाना बहुत अच्छा पकाते थे, और उससे ईंधन की बचत भी होती थी। लेकिन हाल के दशकों में हमने सोलर कुकर की न कोई सरकारी योजना सुनी, और न ही सोलर कुकर के कोई इश्तहार दिखे। आज जब लोग नाली के पानी से गैस बनाकर खाना पकाने के लतीफे बना रहे हैं, तब लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि भारत के अधिकतर हिस्से में साल में 8 महीने या उससे भी अधिक वक्त तक मुफ्त मिलने वाली सूरज की किरणों का इस्तेमाल करके सेहतमंद खाना क्यों नहीं पकाया जाता? अब तो सोलर पैनल भी सस्ते हो रहे हैं, और सोलर कुकर में तो शायद सोलर पैनल भी नहीं लगते थे। जिस तरह की सौर-तकनीक से भी पानी गर्म हो सके, या खाना पक सके, बिजली बन सके, उस तरफ तेजी से बढऩा चाहिए। आज दो हफ्तों की खाड़ी की जंग ने यह बता दिया है कि दुनिया एक मजबूत जमीन पर नहीं खड़ी है। और भारत जैसे देश बहुत बड़ा बाजार हैं, डेढ़ अरब की तरफ बढ़ती हुई आबादी की हर तरह की जरूरतें बहुत हैं, लेकिन भारत आज भी इतने अधिक मामलों में अमरीका की इजाजत, चीन के कच्चे माल और पुर्जों, और रूस के तेल का मोहताज है कि जिसकी हद नहीं। ऐसी नौबत में भारत को किफायत, सौर ऊर्जा, और सार्वजनिक परिवहन जैसी कम ईंधन की तकनीक पर बड़े पैमाने पर जाना चाहिए, ताकि अगली ऐसी किसी अंतरराष्ट्रीय मुसीबत में भारत किसी कमी के संकट में न फंसे। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


