धमतरी

गृह मंत्री के वनवासी वाले बयान से आदिवासी समाज खफा, निंदा की
02-Jun-2026 3:55 PM
गृह मंत्री के वनवासी वाले बयान से आदिवासी समाज खफा, निंदा की

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

कुरूद, 2 जून। वनवासी शब्द हमारी व्यापक पहचान को सीमित कर देता है, जबकि आदिवासी शब्द उनके मूल निवासी होने की ऐतिहासिक सच्चाई को दर्शाता है। यही कारण है कि आदिवासी समाज लंबे समय से अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करता रहा है। लेकिन देश के गृह मंत्री द्वारा खूले मंच से आदिवासी समाज को वनवासी कहने पर आदिवासी समाज ने आपत्ति जताते हुए कड़े शब्दों में निंदा की है।

 गत दिनों हुई बैठक में सर्व आदिवासी समाज की  नेताओं ने संयुक्त रूप से कहा कि आदिवासी शब्द हमारी अस्मिता, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। हमें वनवासी कहकर हमारी पहचान को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। देश के नीति-निर्माताओं और जनप्रतिनिधियों को आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए हमारी मान्य पहचान का ही प्रयोग करना चाहिए।

समाजिक नेताओं ने कहा कि संविधान में अनुसूचित जनजातियों को जो अधिकार और संरक्षण प्राप्त हैं, वे उनके ऐतिहासिक एवं सामाजिक अस्तित्व की मान्यता का प्रमाण हैं। आदिवासी समुदाय का संबंध केवल जंगलों से नहीं, बल्कि इस देश की सभ्यता, संस्कृति और विकास यात्रा से भी रहा है। इसलिए किसी भी सार्वजनिक मंच से ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से पहले संवेदनशीलता बरतना आवश्यक है। वनवासी शब्द आदिवासियों की व्यापक पहचान को सीमित कर देता है, जबकि आदिवासी शब्द उनके मूल निवासी होने की ऐतिहासिक सच्चाई को दर्शाता है। यही कारण है कि देशभर में आदिवासी समाज लंबे समय से अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करता रहा है।

बैठक में शामिल ललित ठाकुर अध्यक्ष ध्रुव गोंड समाज तहसील कुरूद, कुलंजन सिंह मंडावी संरक्षक, महासचिव फलेंद्र ध्रुव, लाकेश्वर नेताम अध्यक्ष परिक्षेत्र कुरूद, पोखराज नेताम सचिव, कमलेश ध्रुव अध्यक्ष पाली कुरूद, बसंत ध्रुव, तेजराम छेदैया, राधेश्याम मंडावी, बोधन छेदैया, हरिश्चंद्र मंडावी, बालमुकुंद नेताम, सहित समाज के पदाधिकारी ने गृह मंत्री से अपने वक्तव्य पर पुनर्विचार करने तथा भविष्य में आदिवासी समाज की ऐतिहासिक और संवैधानिक पहचान का सम्मान करने की मांग की है। साथ ही कहा कि आदिवासी समाज अपनी संस्कृति, परंपरा और अधिकारों के संरक्षण के लिए सदैव सजग रहा है और आगे भी अपनी पहचान के सम्मान के लिए आवाज उठाता रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी राजनीतिक मतभेद का नहीं, बल्कि समुदाय के सम्मान और अस्तित्व का है।


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