धमतरी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
धमतरी, 9 फरवरी। ग्राम पंचायत गंगरेल और ग्राम मरादेव में शासकीय भूमि को लेकर दो विभागों के बीच मचे खींचतान से अब आम लोग परेशान होने लगे हैं। निर्माण कार्यों को लेकर कभी सिंचाई विभाग आपत्ति कर रहा है तो कभी वन विभाग उसे अपनी भूमि बता कर सीधे कार्रवाई कर रहा है।
दोनों विभाग के इस खींचतान के चलते गंगरेल और मरादेव के लोग अब दहशत में आ गए हैं। दरअसल पूरा मामला वन विभाग और सिंचाई विभाग के बीच शासकीय जमीन पर हक को लेकर लड़ाई का है। हालांकि हक की लड़ाई अभी से नहीं बल्कि पिछले कई सालों से छिड़ी हुई है, लेकिन पहले कभी यह मामला इतने चर्चा में नहीं रहा है।
जब से गंगरेल में वाहन पार्किंग संचालन को लेकर विवाद शुरू हुआ तभी से इस बात पर बहस शुरू हो गई है कि आखिर यह जमीन किसकी है और जमीन पर निर्माण कार्यों की सहमति या कार्रवाई करने का अधिकार किसे है। बताया जा रहा है कि जल संसाधन विभाग प्रबंध संभाग क्रमांक-1 कोड नंबर 38 रुद्री के द्वारा गंगरेल बांध के पास वाहन पार्किंग संचालन के लिए निविदा आमंत्रित किया गया था, जिसके बाद निर्धारित तिथि में निविदा कर्ताओं को अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय गंगरेल में बोली के लिए आमंत्रित किया गया। इसमें आठ निविदाकर्ता शामिल हुए। सबसे अधिक बोली लगाकर मरादेव निवासी महेश सविता ने पार्किंग का संचालन प्राप्त किया था।
पार्किंग शुरू हुए कुछ दिन ही बीते थे कि वन विभाग ने इसे अपनी जमीन बताकर जिले की तत्कालीन प्रभारी कलेक्टर के कार्यकाल में वाहन पार्किंग का टेंडर निरस्त करा दिया। टेंडर निरस्त होने के बाद वन विभाग ने वन प्रबंधन समिति के माध्यम से स्वयं ही पार्किंग शुल्क वसूली शुरू कर दिया।
इस पर ठेकेदार का कहना है कि जब जल संसाधन विभाग द्वारा बनाए गए वाहन पार्किंग का संचालन लगभग 4 वर्षों से अलग-अलग ठेकेदार कर रहे थे तब वन विभाग की ओर से इस पर आपत्ति दर्ज कर क्यों कोई कार्यवाही नहीं की गई। वहीं जब जल संसाधन विभाग की ओर से निविदा जारी किया गया तब भी विभाग के अधिकारी क्यों शांत बैठे रहे। अब ऐसा कौन सा दबाव आया कि वन विभाग इसे अपनी जमीन बताकर टेंडर निरस्त कराने और खुद ही पार्किंग का संचालन करने में जुट गया। ठेकेदार का कहना है कि वह इस मामले को लेकर न्यायालय की शरण में जाएंगे।
मरादेव में रोड उखाड़े जाने से बवाल
सोमवार को वन विभाग का अमला मरादेव पहुंचा था। इस दौरान जेसीबी से रिसॉर्ट की ओर जाने वाले रास्तों को यह बताकर उखाड़ दिया कि इस रास्ते का निर्माण वन भूमि और वन अधिकार पत्र प्राप्त किसानों की भूमि पर हुआ है। सडक़ उखाड़े जाने के बाद रिसॉर्ट संचालक को भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि तहसील कार्यालय से किसानों को आने-जाने के लिए रास्ता स्वीकृत किया गया है।


