धमतरी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
कुरूद, 12 फरवरी। भाषा समाज की माँ होती है और धर्म उसका पिता, जिस समाज ने इन दोनों को खो दिया, उसे दर-दर की ठोकरें खाने से कोई नहीं बचा सकता उक्त बातें सुप्रसिद्ध गोंडी गाथा वाचक शंकर शाह इरपाची ने कही। उन्होंने कुरूद में आयोजित प्रेस वार्ता में संविधान और मनुस्मृति का फर्क बताते हुए कहा कि एससी, एसटी और ओबीसी की पहचान संविधान से है। यदि देश हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ा, तो संविधान के स्थान पर मनुस्मृति हावी हो जाएगी, जिससे वंचित वर्गों से शिक्षा और समानता के अधिकार पुन: छीन लिए जाएंगे।
कुरुद के खेल मैदान में 6 से 11 फरवरी तक आयोजित कोया पूनेम गोंडी गाथा कार्यक्रम के समापन दिवस पर शंकरशाह इरपाची ने कथा स्थल पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि आज आदिवासी समाज उस दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक तरफ आधुनिकता का आकर्षण है और दूसरी तरफ अपनी जड़ों के खत्म होने का भय। यदि हमें अस्तित्व बचाना है, तो उस प्राकृतिक दर्शन की ओर लौटना होगा जहाँ महुआ का फूल पवित्र अर्पण था, नशा नहीं। हम समाज को नशा मुक्त तब तक नहीं कर सकते, जब तक हम अपने देव स्थलों से शराब को बाहर नहीं करेंगे।
पूर्वजों ने महुआ का फूल चढ़ाने की परंपरा शुरू की थी, लेकिन हमने उसे शराब बना दिया। यदि हम महुआ के फूल को उसकी प्राकृतिक पवित्रता में चढ़ाएं, तो समाज नशा मुक्त हो जाएगा। आदिवासी समाज में बढ़ते धर्मांतरण को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की आर्थिक विपन्नता और अंधविश्वास का फायदा उठाकर कुछ शक्तियां उन्हें गुमराह कर रही हैं। लोग लालच में अपना धर्म बदल रहे हैं क्योंकि वे अपने ही इतिहास से अनभिज्ञ हैं। जब तक समाज अपने देवताओं की शक्ति और मूल पहचान को नहीं समझेगा, तब तक वह दूसरों का शिकार होता रहेगा। किसी भी समाज के पतन में लालच और विवेक की कमी ही मुख्य कारण होता है।
प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने संविधान और मनुस्मृति का फर्क बताते हुए कहा कि एससी, एसटी और ओबीसी की पहचान संविधान से है। यदि देश हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ा, तो संविधान के स्थान पर मनुस्मृति हावी हो जाएगी। जबकि आदिवासियों की जन्म, मृत्यु और वैवाहिक रीतियां हिंदू धर्म के ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों से पूरी तरह अलग हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने माना कि जल-जंगल-जमीन की बातें राजनीतिक रोटियां सेंकने का साधन मात्र है, सरकारों ने आदिवासियों को केवल वोट बैंक समझा है। राजनीतिक दल समाज की गरीबी का फायदा उठाते हैं। जब तक समाज धार्मिक रूप से संगठित और वैचारिक रूप से मजबूत नहीं होगा, तब तक जल-जंगल-जमीन की ये लड़ाई हम जीत नहीं पाएंगे।
शिक्षा व्यवस्था के प्रश्न पर उन्होंने बस्तर और ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के बंद होने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सरकारें शिक्षा का स्तर गिरा रही हैं ताकि समाज सवाल न कर सके। ऐसी स्थिति में समाज को अपनी प्राचीन गोठुल जैसी पारंपरिक पाठशाला व्यवस्था को फिर से जीवित करना होगा। हमें केवल सरकारी नौकरी के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए शिक्षित होना होगा। रुढि़वादी एवं अंधविश्वास को लेकर पुछे जाने पर गोंडी समाज के पथ प्रदर्शक ने कहा कि अग्निदेन को प्रसन्न करने के लिए मंत्र का उच्चारण नहीं करनी पड़ती, माचिस से अग्नि उत्पन्न होती है। जल देव को प्रकट करने के लिए बोर या कुंआ खुदवाना पड़ता है, वायुदेव को प्रकट करने के लिए पंखा चलाना पड़ता है अंध विश्वास में लगे रहोगे तो कोई प्रकट होने वाला नहीं ,सांइस ने स्पष्ट कर दिया है। आम के पेड़ में पानी डालोगे तो समय पर फल देगा। उन्होंने दिखावे की शादियों पर तंज कसते हुए कहा कि दूसरी संस्कृतियों की नकल ने समाज को कर्जदार बना दिया है। गोंडी रीति-रिवाजों में सादगी ही सबसे बड़ा आभूषण है, जिससे गरीब से गरीब व्यक्ति भी सम्मान के साथ सामाजिक कार्य संपन्न कर सकता है।
इस अवसर पर सर्व आदिवासी समाज के जीवरखन लाल मरई, ललित ठाकुर, संतोष सोरी, भूपेन्द्र, देवनाथ नेताम, पुखराज, तेजराम, बसंत, राजकुमारी ध्रुव, कुमकुम, गायत्री सोरी, माधव सिंह ठाकुर सहित समाज प्रमुख उपस्थित थे।


