बेमेतरा
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बेमेतरा, 4 जनवरी। अन्नदान और लोक परंपरा का प्रतीक छत्तीसगढ़ का प्रमुख पर्व छेरछेरा शनिवार को शहर सहित ग्रामीण अंचलों में पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। पौष पूर्णिमा के अवसर पर सुबह से ही बेमेतरा की गलियां बच्चों के शोर, लोकगीतों और पारंपरिक नारों से गूंज उठी। बीटीआई कॉलोनी, कोबिया, बिचपारा, सिंघोरी, कुर्मीपारा , कृष्णा विहार, अशोक विहार सहित शहर के विभिन्न मोहल्ले में नन्हे-नन्हे बच्चों की टोलिया घर-घर पहुंचकर अन्न और दान मांगती नजर आई।
लोक गीतों से जागा छत्तीसगढ़ी संस्कृति का रंग -
सुबह करीब 6 से ही रंग-बिरंगे प्रधानों में सजे बच्चों झोलियां लेकर निकल पड़े। जैसे ही किसी घर के सामने टोली पहुंचती पारंपरिक छत्तीसगढ़ी गीत गूंज उठते।
‘छेरी का छेरा, माई कोठी के धान ल हेरी का हेरा’, ‘ अरन-बरन कोदो दरन, जबे देबे तभे टरन’
गीतों की मधुर आवाज सुनते ही गृहणियां मुस्कुराते हुए अपने कोठार से नया धान, चावल और अनाज निकालकर बच्चों की खोलियो में डालते नजर आई। कई स्थानो पर बच्चों को अन्य के साथ-साथ नगद राशि और मिठाइयां भी भेंटकी गई।
अन्नदान से कभी नहीं
होती अन्न की कमी
स्थानीय नागरिक राजेन्द्र ने बताया कि छेरछेरा छत्तीसगढ़ का ऐसा अनूठा लोक पर्व है जो देने वाले और लेने वाले दोनों के मन में संतोष और अपनत्व का भाव पैदा करता है। मान्यता है कि इस दिन अन्य दान करने से घर में कभी अन्य की कमी नहीं होती। यह पर्व किसान, नई फसल, मिट्टी और दानशीलता की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। किसान अपनी मेहनत से अपनी नई फसल का कुछ अंश समाज के हित में समर्पित करता है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ी संस्कृति में संग्रह से अधिक महत्व दान को दिया गया है।
फसल उत्सव के रुपाने मनाया जाता है छेरछेरा
पौष मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला छेरछेरा मूलत: फसल उत्सव है। इस अवसर पर घर-घर में पारंपरिक व्यंजन जैसे चिला और फरा बनाए गए। केवल बच्चे ही नहीं बल्कि युवाओं और लोक कलाकारों की टोलियां भी डंडा नित्य और लोकगीतों के साथ सडक़ों का नजर आए, जिससे पूरे शहर का वातावरण उत्सवमय हो गया।
अन्न बेचकर बच्चों ने खरीदी अपनी जरूरत की चीजें
छेरछेरा पर्व को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला। शहर में करीब 70 से अधिक टोलिया अन्नदान मांगने निकली। टोली में शामिल मंजू, अर्चना, कुमारी, रेवती, मधु, धनंजय, गोलू, पप्पू और राजू ने बताया कि दिनभर मिले अन्य और नगद राशि को बेचकर वे पढ़ाई और अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीदते हैं। शाम को पप्पू घड़ी खरीदता नजर आया तो ममता नई ड्रेस लेने बाजार पहुंची।


