ताजा खबर
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के पहले सचिव ने कहा है कि आतंकवाद दुनिया के सामने एक बड़ा संकट है. उन्होंने दुनिया को साथ मिलकर इससे लड़ने और हराने का आग्रह किया है.
डायचेवेले पर आमिर अंसारी का लिखा
भारत ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद का मुद्दा उठाते हुए कहा है कि अधिक शांतिपूर्ण और सुरक्षित दुनिया सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रों को अपने आप को फिर से संगठित करने की जरूरत है. द्वितीय विश्व युद्ध की 75वीं वर्षगांठ की स्मृति के मौके पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के पहले सचिव आशीष शर्मा ने कहा कि आतंकवाद समकालीन दुनिया में युद्ध छेड़ने के माध्यम के रूप में सामने आया है और इससे पृथ्वी पर उसी तरह का नरसंहार होने का खतरा है जो दोनों विश्व युद्धों के दौरान देखा गया था. शर्मा ने कहा, "आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और इसे सिर्फ वैश्विक कार्रवाई से हराया जा सकता है."
भारत ने यूएन में देशों से अपील की कि वे युद्ध छेड़ने के समकालीन प्रारूपों से लड़ने और दुनिया में अधिक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खुद को समर्पित करें. हालांकि भारत ने इस मौके पर किसी देश का नाम नहीं लिया है, लेकिन पूरी दुनिया जानती है कि भारत पाकिस्तान पर देश में आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाता आया है. इससे पहले भी भारत यूएन के मंच का इस्तेमाल आतंकवाद के मुद्दे को जोर शोर से उठाने के लिए कर चुका है.
शर्मा ने विशेष बैठक में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारत के योगदान का जिक्र किया और बताया कि कैसे औपनिवेशिक शासन के अधीन होने के बाजवूद भारत के 25 लाख जवान द्वितीय विश्व युद्ध में लड़े. उन्होंने बताया कि दूसरे विश्व युद्ध में सेवा देते हुए भारत के 87,000 जवान मारे गए या फिर लापता हो गए और लाखों जवान गंभीर रूप से घायल हो गए.
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
जगदलपुर, 2 दिसंबर। बुधवार को जगदलपुर शहर के विभिन्न एटीएम मशीनों से बीते तीन माह के भीतर फर्जी तरीके से एक करोड़ साढ़े 8 लाख रुपये गायब करने वाले उत्तरप्रदेश के दो आरोपियों को बस्तर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपियों के पास से 47 बैंक के खातों का रिकॉर्ड मिला है।
बस्तर पुलिस अधीक्षक दीपक झा ने बताया कि बीते 3 माह से शहर के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित एसबीआई बैंक एटीएम मशीनों से करीब करोड़ रुपये गायब होने की शिकायत बैंक अधिकारियों के द्वारा बीते 24 नवंबर को कोतवाली थाने में दर्ज कराई गई थी। जिसके बाद बस्तर पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच करना शुरू किया। पुलिस ने संदिग्धों से पूछताछ करते हुए मामले के सभी बिंदुओं पर जांच करना शुरू किया। पूरी जांच होने के बाद आखिरकार पुलिस ने एक हफ्ते के भीतर ही दो आरोपियों अनुराग यादव और जनार्धन यादव दोनों जिला जौनपुर (उप्र) को धर दबोचा है।
बस्तर एसपी ने बताया कि आरोपी उत्तर प्रदेश के जौनपुर के निवासी हैं, जो कि अपने ही खाते से पैसे निकाल कर कुछ पैसे एटीएम में ही छोड़ देते थे। उसके बाद बैंक में शिकायत करते थे कि उन्होंने एटीएम से पैसे निकाले थे जो कि एटीएम में ही फंस गए हैं। शिकायत के आधार पर बैंक द्वारा उनके खातों में पैसे ट्रांसफर कर दिया जाता था। ऐसे ही करते हुए बीते 3 महीनों में करोड़ों रूपये का घोटाला यह दोनों आरोपी द्वारा किया जा चुका है।
आरोपियों के पास से 2 लाख रुपये भी बरामद कर लिए गए हैं। कड़ी पूछताछ में आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। बस्तर पुलिस द्वारा की गई इस कार्रवाई से बड़ी कामयाबी हाथ लगी है।
बस्तर एसपी ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों के साथियों को भी दूसरे राज्य से गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि आरोपियों ने बस्तर समेत राज्य के अन्य शहरों में फर्जी तरीके से रुपये निकालने का अपराध किया है। इनके खिलाफ जगदलपुर के साथ ही धमतरी में भी मामला दर्ज है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से दो लाख रुपये नगद, 5 महंगे मोबाइल, 3 चेक बुक, बैंक पासबुक, 3 एटीएम कार्ड, पेन कार्ड, आधार कार्ड बरामद किया है।
-रोहन नामजोशी
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे ने पिछले हफ़्ते एक साल पूरे कर लिए हैं.
ठाकरे परिवार की ओर से उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने वाले पहले शख़्स थे. हालांकि शिवसेना की ओर से राज्य की कमान संभालने वाले वे तीसरे मुख्यमंत्री हैं. लेकिन उद्धव ठाकरे पहले किसी प्रशासनिक पद पर नहीं रहे. लिहाजा उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे बड़ी आशंका यही थी कि अनुभवहीनता के साथ वे सरकार किस तरह चलाएंगे.
उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री के तौर पर कामकाज के तौर तरीकों के बारे में पूछे जाने पर उनके मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ने बताया, "जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपनी शुरुआती बैठकों में अधिकारियों से कहा कि वे इस पद पर नए ज़रूर हैं लेकिन उन्होंने बाहर से काफ़ी कुछ देखा है. लोगों की समस्याओं के बारे में जानता हूं इसलिए मेरे सामने गड़बड़ फ़ाइलें नहीं लाएं. उनकी कड़ी चेतावनी के बाद उनके टेबल तक विसंगतियों वाली फ़ाइल लाने के बारे में सोच भी नहीं सकता है."
उद्धव ठाकरे का राज्यपाल कोश्यारी को जवाब, मेरे हिंदुत्व को आपके सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं
कंगना किसके दम पर उद्धव ठाकरे पर हमला कर रही हैं?
वैसे भी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार अप्रत्याशित और ऐतिहासिक ढंग से सत्ता में पहुंची थी. इस गठबंधन सरकार में दो पूर्व मुख्यमंत्री और कई वरिष्ठ मंत्री शामिल हैं. ऐसे में प्रशासन को अपने ढंग से चलाना और मंजे हुए राजनेताओं के सामने अपना प्रभाव छोड़ना उद्धव ठाकरे के लिए चुनौतीपूर्ण तो था ही और आगे भी रहेगा.
लेकिन उनके इस एक साल में उनके कामकाज के आधार पर बतौर मुख्यमंत्री उनका आकलन किया जा सकता है.

पुराने फ़ैसलों में बदलाव
बीजेपी- शिवसेना 2019 तक एक साथ महाराष्ट्र की सरकार में रहे. उद्धव ठाकरे सरकार ने अपने पहले ही साल में पिछली सरकार के कई फ़ैसलों को बदला है. इस सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में आरे कॉलोनी में पेड़ों के काटे जाने पर रोक लगा दी थी, हालांकि उससे पहले ही आरे जंगल के 1800 पेड़ काटे जा चुके थे.
जब देवेंद्र फडणवीस की सरकार सत्ता में थी तब मुंबई-नागपुर प्रस्तावित राजमार्ग का नाम समृद्धि राजमार्ग रखा जाना तय हुआ था लेकिन अब इसे बदलकर बालासाहेब ठाकरे राजमार्ग किया गया है.
नई सरकार ने मेट्रो कार-शेड को आरे जंगल से हटाकर कंजुरमार्ग पर ले जाने का फ़ैसला लिया है. मुंबई के लोगों के लिए मेट्रो रेलवे ज़रूरी है लेकिन फडणवीस सरकार के आरे में कार शेड निर्माण के फ़ैसले पर काफी विरोध देखने को मिला था. समाज के सभी वर्ग के लोगों ने इस निर्माण का विरोध किया था. विकास बनाम पर्यावरण के मुद्दे पर बहस शुरू हो गई थी. महाराष्ट्र के मौजूदा पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे ने भी तब आरे में कार-शेड निर्माण और इसके लिए पेड़ों की कटाई के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी.
जब वे सत्ता में आए तो उन्होंने पिछली सरकार के फ़ैसले को बदल दिया. इस मामले में कई तरह आरोप भी लगे. पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस ने ट्वीट के ज़रिए नए फ़ैसले की आलोचना भी की. हालांकि नयी जगह पर काम का शुरु होना बाक़ी है और मुंबई के लोगों के लिए मेट्रो का इंतज़ार बना हुआ है.
'जलयुक्त शिवार' में जांच के आदेश
फडणवीस सरकार के समय 'जलयुक्त शिवार' को ड्रीम प्रोजेक्ट कहा जाता था. लेकिन सीएजी ने इस प्रोजेक्ट को लेकर सरकार को फटकार लगाई थी. ठाकरे सरकार ने इस योजना में लगे आरोपों की जांच के लिए एसआईटी बना दी है. ऐसे में इस योजना का भविष्य अनिश्चित दिख रहा है.
2014 से 2019 तक फडणवीस लगातार अपनी सार्वजनिक बैठकों में लोगों को इस सिंचाई योजना के लाभ बताते रहे. ऐसे इस योजना की जांच के लिए एसआईटी का गठन बेहद अहम है.
इन दो फ़ैसलों से यह भी ज़ाहिर हुआ है कि बीजेपी और शिवसेना के रास्ते अब अलग अलग हो चुके हैं.
प्रशासन पर ठाकरे की कितनी पकड़
उद्धव ठाकरे बिना किसी पूर्व अनुभव के कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ वाली गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री हैं. ऐसे में रोज़मर्रा का प्रशासन चलाने को लेकर उनकी योग्यता को लेकर सवाल पूछे जाते रहे हैं.
पिछले एक साल के दौरान ठाकरे सरकार के लिए गए कई फ़ैसलों की राज्य के प्रशासनिक हलकों में काफ़ी चर्चा भी हुई है. राज्य के पूर्व मुख्य सचिव अजोय मेहता का मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार के तौर पर नियुक्ति पर सबसे ज़्यादा विवाद देखने को मिला. अजोय मेहता फडणवीस सरकार में मुख्य सचिव थे और उन्हें दो-दो बार सेवा विस्तार मिला था.
लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें तीसरी बार सेवा विस्तार देने से इनकार कर दिया था. जब अजोय मेहता सेवानिवृत होने वाले थे तभी कोविड संक्रमण का दौर शुरू हुआ था. अजोय मेहता के सेवानिवृत होने के बाद उद्धव ठाकरे ने उन्हें मुख्य सलाहकार और संजय कुमार को मुख्य सचिव बनाया.
कोविड संक्रमण के दौर में कई मुख्य सचिव सेवानिवृत हुए लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने मेहता को बनाए रखा है और इसको लेकर प्रशासनिक सर्किल में काफी नाराज़गी है.
इसी तरह मुंबई नगर निगम के पूर्व कमिश्नर प्रवीण सिंह परदेशी के ट्रांसफर पर विवाद देखने को मिला था. परदेशी को मुंबई नगर निगम का आयुक्त फडणवीस सरकार ने बनाया था.
कोरोना संक्रमण के दौरान जब मुंबई में संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी उस वक्त आयुक्त का ट्रांसफर किया गया. अभी वे प्रतिनियुक्ति पर संयुक्त राष्ट्र में तैनात में है. उनकी जगह मुंबई नगर निगम के आयुक्त की ज़िम्मेदारी इक़बाल सिंह चाहल ने संभाली.
यह एक तरह से परंपरा में है कि जब भी कोई सरकार सत्ता संभालती है तो वह अहम पदों पर अपने विश्वासपात्र अधिकारियों को बिठाती है और पूर्व के सरकार के नियुक्त किए अधिकारियों का तबादला करती है. उद्धव ठाकरे भी इसके अपवाद नहीं रहे. उन्होंने फडणवीस सरकार के समय में मुंबई मेट्रो रेलवे कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक बनीं अश्विनी भिड़े का भी तबादला कर दिया.

अश्विनी भिड़े फ़िलहाल मुंबई नगर निगम में एडिशनल कमिश्नर के तौर पर तैनात हैं. वहीं आईपीएस अधिकारी विश्वास नांगरे पाटिल को मुंबई में तैनात किया गया. जबकि कोरोना लॉकडाउन में वाधवन परिवार को विशेष पास देकर चर्चा में आए अमिताभ गुप्ता को पुणे पुलिस के कमिश्नर पद पर तैनात किया गया है.
ठाकरे सरकार के सत्ता में आने के बाद ही परमबीर सिंह मुंबई पुलिस के कमिश्नर बने हैं. मुंबई पुलिस को सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले, कंगना रनौत और अर्णब गोस्वामी से संबंधित मामले, टीआरपी स्कैम और कोरोना संकट को संभालने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.
कोरोना संकट के दौरान प्रशासन
नौ मार्च को महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण का पहला मामला सामने आया था. इसके बाद राज्य में कोरोना संक्रमितों की संख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ी. ख़ासकर मुंबई और पुणे में. मुंबई में घनी आबादी चलते भी काफ़ी ज़्यादा मामले सामने आए.
जब उद्धव ठाकरे की सरकार सत्ता में आयी तबसे काफ़ी ज़्यादा आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे थे. इसमें स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां सबसे बड़ी थीं. इस चुनौती से सरकार अब तक उबर नहीं पायी है. हालांकि सरकार ने कोरोना संक्रमण पर अंकुश पाने के लिए कई प्रावधान किए. मुंबई और पुणे में जंबो अस्पताल का निर्माण भी कराया गया.
देश भर में कोविड टास्क फोर्स का गठन करने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य था. इसके अलावा एक दूसरे टास्क फोर्स का गठन भी किया गया है जो यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य के हर नागरिक तक कोविड संक्रमण का टीका पहुंचे. इस दौरान मुख्यमंत्री खुद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए इन कामों की समीक्षा करते रहे हैं.
कोरोना संकट के दौरान उद्धव ठाकरे लगातार लोगों को वीडियो संदेश देते रहे. वे इस बहाने ना केवल लोगों से जुड़े रहे बल्कि कोविड संबंधी मामलों को लेकर उन्होंने लोगों को अपडेट भी किया.
कईयों ने घर से नहीं निकलने के चलते उनकी आलोचना भी की. यह भी कहा गया कि वे घर से राज्य को चला रहे हैं. लेकिन उद्धव ठाकरे ने इन आलोचकों को जवाब देते हुए कहा कि वे मुंबई में रहते हुए पूरे राज्य तक पहुंच रहे हैं.
वैसे शुरुआती दौर में अस्पतालों में बेड और पीपीई किट की कमी ज़रूर देखने को मिली थी. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के महाराष्ट्र अध्यक्ष डॉ. अविनाश भोंडवे ने बीबीसी मराठी से कहा, "यह स्पष्ट था कि कोरोना वायरस तेजी से फैलेगा और लोगों को संक्रमित करेगा. लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई तैयारी नहीं थी. ख़तरे को नज़दीक देखकर भी ठाकरे सरकार नहीं जगी."
कोरोना संक्रमित मरीज़ों की देखभाल, अस्पतालों में बेड की कमी, अनलॉक होने की प्रक्रिया के दौरान कब क्या शुरू करें, इन सब मुद्दों पर सरकार पर आरोपों का सिलसिला अभी तक बना हुआ है. मंदिरों के फिर से खोले जाने पर काफ़ी राजनीतिक विवाद भी देखने को मिला.
कोरोना संक्रमण के समय में राज्य के प्रशासनिक कामकाज के बारे में महाराष्ट्र टाइम्स के सीनियर डिप्टी एडिटर विजय चोरमारे ने कहा, "उद्धव ठाकरे अब तक प्रशासक की भूमिका या राजनेता की भूमिका निभाते नहीं दिखे हैं. वे परिवार के कामकाजी मुखिया फिर परिवार के संरक्षक की तरह काम कर रहे हैं लेकिन नीति निर्माता के तौर पर उनका बहुत असर नहीं दिखा है."
कंगना ने मुंबई पहुंचते ही कहा-आज मेरा घर टूटा है, कल उद्धव ठाकरे का घमंड टूटेगा
अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी, क्या है मामला
"हालांकि उनके मंत्रालय में अनुभवी मंत्रियों की कमी नहीं है लेकिन वे अजोय मेहता पर निर्भर रहते हैं. इसलिए सारी ताक़त एक प्रशासनिक अधिकारी के हाथों में केंद्रित है जिसके चलते कई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं. ज़िला स्तर पर कोरोना संक्रमण की स्थिति ज़िला प्रशासन पर छोड़ दी गई जिसके चलते भी अफ़रातफ़री देखने को मिली."
आर्थिक मोर्चे पर कैसा है प्रदर्शन
जब महा विकास अघाड़ी की सरकार ने सौ दिन पूरे हुए थे, उस दिन राज्य के बजट की घोषणा हुई थी. इससे ठीक पहले हुए आर्थिक सर्वे में महाराष्ट्र की आर्थिक विकास दर 5.7 फ़ीसद आंकी गई थी और तब देश की आर्थिक विकास दर के पांच प्रतिशत से बढ़ने का अनुमान जाहिर किया गया था.
2018-19 के आर्थिक सर्वे के मुताबिक महाराष्ट्र में प्रति व्यक्ति आय एक लाख 91 हज़ार 737 रूपये थी जो 2019-2020 में बढ़कर 2,07,727 रूपये हो गई है. राज्य की 70 फ़ीसद आबादी कृषि पर आश्रित थी, लेकिन अब इसमें बदलाव देखने को मिल रहा है. वर्तमान आंकड़ों के हिसाब से राज्य की 60 फ़ीसद से ज़्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है.
राज्य के बजट की घोषणा छह मार्च, 2020 को हुई थी, जब कोरोना ने देश भर में अपने पांव फैलाने शुरू किया था. बजट में किसानों को राहत देने की घोषणा की गई और कहा गया कि एक अप्रैल, 2015 से 31 मार्च, 2019 के बीच लिए गए फसल लोन पर दो लाख रुपये की अधिकतम राहत मिल सकती थी.
सरकार ने राजमार्गों पर 20 जगहों पर कृषि केंद्रों की स्थापना की है, इसके अलावा समुद्रतटीय राजमार्गों के लिए 3,595 करोड़ रुपये का आवंटन किया. राज्य सरकार यह भी चाहती है कि रेवसरेड्डी समुद्रतटीय राजमार्ग का काम तीन साल में पूरा हो जाए.
राज्य परिवहन निगम ने सभी बसों में वाई-फाई की सुविधा देने का एलान किया है, इसके अलावा बेहतर मिनी बसों को ख़रीदने को मंजूरी मिल चुकी है. पुरानी बसों की जगह 1600 नई बसों की लाने की योजना के अलावा बस स्टैंडों का आधुनिकीकरण करने की घोषणा हो चुकी है. लेकिन वास्तविकता यह है कि पिछले कुछ महीनों में वेतन भुगतान नहीं होने के चलते एक बस कंडक्टर ने आत्महत्या कर ली और इसके बाद परिवहन मंत्री ने परिवहन निगम के कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए ज़रूरी कदम उठाने का भरोसा दिया.
राज्य में शिव भोजन थाली मील स्कीम भी शुरू हुई है, जिसमें दस रूपये में दाल चावल की प्लेट मिलती है. सरकार की योजना प्रत्येक केंद्र पर 500 लोगों को और पूरे राज्य में एक लाख लोगों को प्रतिदिन भोजन मुहैया कराने की है. इसके लिए 150 करोड़ रुपये भी आवंटित किए गए हैं. अब शिव भोजन थाली पांच रुपये प्रति प्लेट मिल रही है.
फडणवीस सरकार के समय में राज्य में अद्यौगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए 'मैग्नेटिक महाराष्ट्र' की योजना शुरू हुई थी. 'मैग्नेटिक महाराष्ट्र 2.0' के तहत दो नवंबर, 2020 को 34,850 करोड़ रूपये के अनुबंध करने की घोषणा राज्य सरकार ने की है. उद्धव ठाकरे ने कहा है कि इससे राज्य में 23 हज़ार नौकरियां उपलब्ध होंगी.
हालांकि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के सर्वे के मुताबिक मई से अगस्त, 2020 के दौरान राज्य के शहरी इलाके में बेरोज़गारी की दर 11.4 प्रतिशत थी. पूरे भारत में बेरोज़गारी की दर 11.55 प्रतिशत है. जिस तरह से कोरोना लॉकडाउन में लोगों की नौकरियां जा रही हैं ऐसे में ठाकरे सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अनुमान आधारित काग़ज़ी घोषणाएं करने की जगह लोगों को रोज़गार मुहैया कराने की है.
रोज़गार का सवाल
इस साल कोविड के चलते महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षाएं नहीं हुई हैं. ऐसे में सरकारी नौकरियों के लिए युवाओं का इंतज़ार बढ़ गया है. 27 नवंबर को जारी जीडीपी के आंकड़ों के मुताबिक देश तकनीकी तौर से मंदी की स्थिति में पहुंच गया है.
आर्थिक मोर्चे पर ठाकरे सरकार के कामकाज के प्रदर्शन के बारे में अर्थशास्त्री चंद्रशेखर तिलक ने बताया, "कोरोना के चलते पिछले एक साल में सरकार ज़्यादा कुछ नहीं कर पायी है. जहां अवसर मौजूद थे, उसे भी सामंजस्य की कमी के चलते सरकार ने गंवा दिया है. पूरी दुनिया कोरोना संक्रमण के चलते आर्थिक तंगी में है. ऐसे में सबके सामने विदेशी निवेश में कमी का संकट भी होगा. महाराष्ट्र सरकार कोई अपवाद नहीं है. इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच समन्वय की कमी भी ज़िम्मेदार है."
चंद्रशेखर तिलक के मुताबिक, "रेलवे यात्राएं कब से शुरू होंगी और परीक्षाएं कब होंगी - ये केवल सोशल सेक्टर की बात नहीं है, बल्कि आर्थिक सेक्टर से भी जुड़ा मसला है. इस वक्त शैक्षणिक क्षेत्र निवेश का सबसे बड़ा माध्यम है लेकिन निवेशकों के इसमें आने में संदेह बना हुआ है."
हालांकि उद्धव ठाकरे सरकार ने 'मैग्नेटिक महाराष्ट्र' की घोषणाएं तो कर दी हैं लेकिन वे घोषणाएं कब अमल में आएंगी, यह स्पष्ट नहीं है. तिलक के मुताबिक मेट्रो कार-शेड की जगह में बदलाव करने का असर भी आर्थिक निवेश पर दिखेगा.
अनिरुद्ध अस्थापुत्रे के मुताबिक उद्धव ठाकरे राज्य के मुख्यमंत्री हैं लेकिन अभी भी वे पारिवारिक शख़्स की तरह दिखते हैं. जीवनशैली में सादगी है, वे सरलता से रहते हैं, इसके चलते लोगों से उनका जुड़ाव बना हुआ है. वे अख़बार में छपने वाली ख़बरों पर नज़र रखते हैं. लोग उनके बारे में क्या कहते हैं, इसे जानने को लेकर उत्सुक रहते हैं. वे अपने कैबिनेट सहयोगियों से विनम्रता से पेश आते हैं.
उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री के तौर पर एक साल पूरे कर लिए हैं. लेकिन आने वाले दिनों में उनके सामने चुनौतियां बढ़ेंगी और यह देखना दिलचस्प होगा कि उद्धव ठाकरे उन चुनौतियों का सामना किस तरह से करते हैं. (bbc.com)
कॉलेज प्रबंधन का दावा, मौत की वजह सिलेंडर फटना नहीं
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 2 दिसंबर। राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज के सह-जिला अस्पताल में बीती रात सघन कक्ष आईसीयू में एक आक्सीजन सिलेंडर के फटने से हुए धमाके में एक उपचारार्थ मरीज की दर्दनाक मौत हो गई। हालांकि अस्पताल प्रबंधन ने दावा किया है कि मरीज की मृत्यु सिलेंडर फटने से नहीं हुई है। अतडिय़ों में संक्रमण और गंदा पानी पीने के कारण मरीज की मृत्यु हुई है।
बताया जा रहा है कि रात करीब 1.30 बजे के आसपास एक मरीज को आक्सीजन देने के दौरान प्लास्टिक निर्मित फ्लो मीटर अचानक से फट गया। जिसके चलते कक्ष में अफरा-तफरी मच गई। इस दौरान कक्ष में काफी समय तक दहशत की स्थिति बनी रही। बताया जाता है कि आईसीयू में कुल 7 मरीज दाखिल थे, जो कि अलग-अलग बीमारियों के चलते इलाज करवा रहे हैं। बताया जा रहा है कि हादसे के बाद अस्पताल में कार्यरत निजी गार्डों और पुलिस जवानों ने मरीजों को बाहर निकलने के लिए काफी दमखम लगाया। कुछ मरीजों को दूसरे वार्डों में शिफ्ट किया गया। वहीं एक मरीज ने दम तोड़ दिया।
बताया जा रहा है कि इस खबर के बाद सुबह प्रशासनिक अधिकारियों की एक टीम अस्पताल पहुंची। जिसमें सीएमओ भी शामिल थे। कलेक्टर टीके वर्मा ने पूरे घटनाक्रम को लेकर अफसरों को मौके का मुआयना करने का निर्देश दिया। टीम ने जांच के बाद कलेक्टर को रिपोर्ट सौंप दी है।
‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा करते कलेक्टर टीके वर्मा ने बताया कि घटना की जांच प्रशासनिक टीम करेगी। दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पिछले कुछ दिनों से सिलेंडर की सप्लाई को लेकर मेडिकल कॉलेज प्रबंधन विवादों के घेरे में है। कुछ दिन पहले पेंड्री स्थित एक कोरोना मरीज की तय समय पर आक्सीजन उपलब्ध नहीं होने से मौत हो गई थी। अभी यह मामला थमा नहीं था कि आज हुई घटना से अस्पताल प्रबंधन की अंदरूनी खामियां फिर से उजागर हुई है।
ब्रिटेन दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने फ़ाइज़र कंपनी के बनाए टीके के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे दी है.
ब्रिटिश नियामक संस्था एमएचआरए ने कहा है कि फ़ाइज़र/बायोएन्टेक की ये वैक्सीन कोविड-19 से 95% सुरक्षा देती है और इसके व्यापक इस्तेमाल की अनुमति देना सुरक्षित है.
बताया जा रहा है कि कुछ ही दिनों के भीतर ऐसे लोगों को टीका लगना शुरू हो जाएगा जिन्हें सबसे ज़्यादा ख़तरा है.
ब्रिटेन ने पहले से ही इस टीके की चार करोड़ डोज़ के लिए ऑर्डर दिया हुआ है,
हर व्यक्ति को टीके के दो डोज़ दिए जाएँगे. यानी अभी दो करोड़ लोगों को टीका मिल सकता है.
ये दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित वैक्सीन है जिसे बनाने में 10 महीने लगे. आम तौर पर ऐसी वैक्सीन के तैयार होने में एक दशक तक का वक़्त लग जाता है.
हालाँकि जानकारों का कहना है कि टीके के बावजूद लोगों को संक्रमण रोकने के नियमों का पालन करते रहना चाहिए.
कैसे काम करती है ये वैक्सीन?
ये एक नई तरह की एमआरएनए कोरोना वैक्सीन है जिसमें महामारी के दौरान इकट्ठा किए कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड के छोटे टुकड़ों को इस्तेमाल किया गया है. कंपनी के अनुसार जेनेटिक कोड के छोटे टुकड़े शरीर के भीतर रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाती है और कोविड-19 के ख़िलाफ शरीर को लड़ने के लिए तैयार करती है.
इससे पहले कभी इंसानों में इस्तेमाल के लिए एमआरएनए वैक्सीन को मंज़ूरी नहीं दी गई है. हालांकि क्लिनिकल ट्रायल के दौरान लोगों को इस तरह की वैक्सीन के डोज़ दिए गए हैं.
एमआरएनए वैक्सीन को इंसान के शरीर में इंजेक्ट किया जाता है. ये इम्यून सिस्टम को कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने और टी-सेल को एक्टिवेट कर संक्रमित कोशिाकओं को नष्ट करने के लिए कहती है.
इसके बाद जब ये व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित होता है तो उसके शरीर में बनी एंटीबॉडी और टी-सेल वायरस से लड़ने का काम करना शुरू कर देते हैं.
वैक्सीन की रेस में और कौन-कौन शामिल?
ऑक्सफर्ड-एस्ट्राज़ेनिका की वैक्सीन - ये वाइरल वेक्टर टाइप वैक्सीन है जिसकमें जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड वायरस का इस्तेमाल किया गया है. इसे फ्रिज में सामान्य तापमान पर स्टोर किया जा सकता है और इसकी दो डोज़ लेनी होंगी. अब तक क्लिनिकल ट्रायल में इसे 62 से 90 फीसदी तक कारगर पाया गया है.
इस वैक्सीन के प्रति डोज़ की क़ीमत 4 डॉलर तक होगी.
मॉडर्ना की वैक्सीन - ये एमआरएनए टाइप की कोरोना वैक्सीन है जिसे वायरस के जेनेटिक कोड के कुछ टुकड़े शामिल कर बनाया जा रहा है. इसे माइनस 20 डिग्री तापमान पर स्टोर करने की ज़रूरत होगी और इसे छह महीनों तक ही स्टोर किया जा सकेगा. इसकी दो डोज़ लेनी होंगी और अब तक हुए क्लिनिकल ट्रायल में इसे 95 फीसदी तक कारगर पाया गया है.
इस वैक्सीन के प्रति डोज़ की क़ीमत 33 डॉलर तक होगी.
फ़ाइज़र की वैक्सीन - मॉडर्ना की वैक्सीन की तरह ये भी एमआरएनए टाइप की कोरोना वैक्सीन है. अब तक हुए क्लिनिकल ट्रायल में इसे 95 फीसदी तक कारगर पाया गया है. इसे माइनस 70 डिग्री के तापमान पर स्टोर करना होगा.
ये वैक्सीन दो डोज़ दी जाएगी और प्रति डोज़ की क़ीमत 15 डॉलर तक होगी.
गामालेया की स्पुतनिक-वी वैक्सीन - ये ऑक्सफर्ड की वैक्सीन की तरह वाइरल वेक्टर टाइप वैक्सीन है जिसके अब तक हुए क्लिनिकल ट्रायल में 92 फीसदी तक कारगर पाया गया है. इसे फ्रिज में सामान्य तापमान पर स्टोर किया जा सकता है और इसकी दो डोज़ लेनी होंगी.
इस वैक्सीन के प्रति डोज़ की क़ीमत 7.50 डॉलर तक होगी.
इसके अलावा रूस स्पुत्निक नाम की एक और वैक्सीन का इस्तेमाल कर रहा है. वहीं चीनी सेना ने कैनसाइनो बायोलॉजिक्स की बनाई एक वैक्सीन को मंज़ूरी दे दी है. ये दोनों वैक्सीन ऑक्सफर्ड की वैक्सीन की तरह वाइरल वेक्टर टाइप वैक्सीन हैं.
(स्रोत- वैक्सीन बनाने वाली कंपनी और विश्व स्वास्थ्य संगठन के जारी किए आंकड़ों के अनुसार) (bbc.com)
नई दिल्ली, 2 दिसंबर । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कुछ महीनों पहले छेड़छाड़ के आरोपी को पीडि़ता से राखी बंधवाने का आदेश दिया था, जिसके बाद इसके विरोध में कई महिला वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी। अब इस फैसले का विश्लेषण सुप्रीम कोर्ट में हो रहा है। बुधवार को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित दलीलें दाखिल कर कहा है कि न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए। इससे यौन हिंसा से जुड़े मामलों में ज्यादा संतुलित और सशक्त दृष्टिकोण अपनाया जा सकेगा।
एजी ने कहा कि कभी कोई महिला भारत की मुख्य न्यायाधीश नहीं रही है। सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों की क्षमता है लेकिन सिर्फ दो ही महिला जज हैं। एजी ने विभिन्न हाईकोर्ट व ट्रिब्यूनल की जानकारी भी दी है। पीडि़ता को राखी बांधने के लिए यौन उत्पीडऩ के आरोपी को जमानत देने के मामले में ये लिखित दलीलें दी गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने की थीं सख्त टिप्पणियां
पिछली सुनवाई में अटॉर्नी जनरल ने आरोपियों को पीडि़ता से राखी बंधवाने के लिए कहने के मप्र हाईकोर्ट के आदेश पर टिप्पणी की थी कि इस नाटक की निंदा की जानी चाहिए और ऐसा लगता है कि अदालत अपने दायरे से बाहर चली गई है। जजों को शिक्षित करने की जरूरत है। जज भर्ती परीक्षा में लिंग संवेदीकरण का एक हिस्सा होना चाहिए। जजों, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी और राज्य न्यायिक अकादमी के लिए परीक्षा में लैंगिक संवेदनशीलता पर कार्यक्रम होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा था कि जब तक संवेदनशीलता का संबंध है, लिंग संवेदीकरण और शिकायत निवारण समिति सुप्रीम कोर्ट में है। जिला और अधीनस्थों अदालतों के अलावा हाईकोर्ट में भी लिंग संवेदीकरण के बारे में लेक्चर दिए जाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने एजी, याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेपकर्ताओं से इस मुद्दे पर नोट प्रसारित करने को कहा था। पहले सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर अटॉर्नी जनरल के के के वेणुगोपाल की मदद मांगी थी। बता दें कि 9 महिला वकीलों ने जमानत की शर्त को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। दलीलों में कहा गया है कि इस तरह के आदेश महिलाओं को एक वस्तु की तरह दिखाते हैं।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल 30 जुलाई को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने छेड़छाड़ के आरोपी को सशर्त जमानत दी थी। शर्त यह थी कि आरोपी रक्षाबंधन पर पीडि़त के घर जाकर उससे राखी बंधवाएगा और रक्षा का वचन देगा। अप्रैल में पड़ोस में रहने वाली महिला के घर में घुसकर छेड़छाड़ के आरोप में जेल में बंद विक्रम बागरी ने इंदौर में जमानत याचिका दायर की थी।
सभी पक्षों के तर्क सुनने के बाद जस्टिस रोहित आर्या की सिंगल बेंच ने आरोपी को 50 हजार के मुचलके के साथ जमानत दी। उसमें शर्त यह भी थी कि वह 3 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन 11 बजे अपनी पत्नी को साथ लेकर पीडि़त के घर राखी और मिठाई लेकर जाएगा और पीडि़ता से आग्रह करेगा कि वह उसे भाई की तरह राखी बांधे। इसी के साथ विक्रम पीडि़त की रक्षा का वचन देकर भाई के रूप में परंपरा अनुसार उसे 11 हजार रुपए देगा और पीडि़ता के बेटे को भी 5 हजार रुपये कपड़े और मिठाई के लिए देगा। इतना ही नहीं, इस सबकी तस्वीरें रजिस्ट्री में जमा कराने के निर्देश भी कोर्ट ने दिए थे। (एनडीटीवी)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 2 दिसंबर। डोंगरगढ़ की एक विवाहित महिला की कथित तस्करी के मामले में पुलिस ने राजस्थान से एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। इस कार्रवाई में अब तक दो महिला समेत 4 पुरूषों को मिलाकर 6 को गिरफ्तार किया गया है। बताया जा रहा है कि इस मामले में कुछ और गिरफ्तारियां करने के लिए राजनांदगांव पुलिस हरियाणा और राजस्थान के कुछ शहरी इलाकों में छापामार कार्रवाई कर रही है।
मानव तस्करी से जुड़े इस मामले को प्रदेश सरकार ने गंभीरता से लिया है। वहीं महिला आयोग भी इस मामले से जुड़े तथ्यों के आधार पर लगातार अपने स्तर पर कार्रवाई करने के लिए साक्ष्य पुलिस को पेश कर चुकी है। बताया जा रहा है कि 27 नवंबर को राजस्थान के झुंझुनू के सूरतगढ़ इलाके के सुरेश नामक व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उक्त व्यक्ति ने पीडि़ता के साथ जबरिया विवाह किया था। इस आधार पर पुलिस ने कार्रवाई की है।
बताया जा रहा है कि ट्रांजिट रिमांड के बाद राजनांदगांव पुलिस आरोपी को डोंगरगढ़ लेकर पहुंची है। उससे पुलिस सवाल-जवाब कर रही है। इस संबंध में डोंगरगढ़ थाना प्रभारी एलेक्जेंडर किरो ने ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि आरोपी द्वारा महिला से जबर्दस्ती शादी की गई थी। इस मामले में और भी संदेहियों की तलाश की जा रही है।
उल्लेखनीय है कि यह मामला काफी हाईप्रोफाइल हो गया है। सियासी स्तर पर भी कार्रवाई करने के लिए पुलिस पर दबाव बढ़ाया गया है। महिला आयोग अध्यक्ष किरणमयी नायक ने बकायदा राजधानी रायपुर के एक पूर्व मंत्री की भी संलिप्तता को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। वहीं गृहमंत्री से लेकर आईजी द्वारा गठित पुलिस की टीम आरोपियों की खोजबीन कर रही है। बताया जा रहा है कि यह एक बड़ा मानव तस्करी से जुड़ा मामला है। पुलिस को आशंका है कि एक बड़े रैकेट के जरिये महिला को बेचा गया था। इसी के चलते रायपुर की एक भाजपा नेत्री को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 2 दिसंबर। प्रदेश के सुदुर अंचल जहां नेटवर्क और अन्य तकनीकी कारणों से नीट क्वालिफाई विद्यार्थी, जो काउंसलिंग के लिए निर्धारित समय पर अपना पंजीयन नहीं करा सके थे उन्हें अब प्रदेश के निजी मेडिकल कॉलेजों में पेमेंट सीट पर प्रवेश दिलाया जाएगा। मुख्यमंत्री ने इस आशय के निर्देश दिए हैं। बताया गया कि दंतेवाड़ा जिले के 27 विद्यार्थियों ने नीट क्वालिफाई किया है किन्तु नेटवर्क समस्या के चलते उनका प्रथम काउंसलिंग में रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाया था।
बताया गया कि आदिवासी इलाकों के इन विद्यार्थियों का भविष्य अब सरकार संवारेगी। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद यह पहली बार है कि एमबीबीएस के लिए निजी कॉलेजों के पेमेंट सीट में बच्चों को राज्य सरकार के खर्च पर दाखिला दिलाया जाएगा। मुख्यमंत्री श्री बघेल ने कहा है कि किसी भी बच्चे के भविष्य के साथ कोई समझौता नही होना चाहिए।
मुख्यमंत्री श्री बघेल ने प्रदेश के दूरस्थ आदिवासी अंचलों के ऐसे सभी होनहार बच्चों के एमबीबीएस मेें दाखिला के लिए जिला प्रशासन को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के संज्ञान में जैसे ही यह बात आई कि दंतेवाड़ा जिले के 27 होनहार छात्र-छात्राएं जिन्होंने नीट क्वालिफाई किया है परन्तु नेटवर्क प्राब्लम के चलते प्रथम काउंसलिंग में उनका रजिस्ट्रेशन नहीं हो सका था।
इस सिलसिले में जानकारी मिलते ही जिला प्रशासन द्वारा अपने स्तर पर पंजीयन कराने का प्रयास किया गया और राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय काउंसलिंग पूर्व इनका रजिस्ट्रेशन कराया गया परंतु ये छात्र चयन से वंचित रह गए। राज्य में पंजीयन हेतु द्वितीय अवसर नहीं होने से उनका पंजीयन नहीं कराया जा सका। प्रथम काउंसलिंग के पश्चात इसमें दो छात्रा कुमारी पदमा मडे और पीयूषा बेक एमबीबीएस में प्रवेश की पात्रता रखती हैं।
मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद कलेक्टर दंतेवाड़ा द्वारा इन विद्यार्थियों का प्रदेश के निजी कॉलेजों में दाखिला की कार्यवाही की जा रही है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आगे भी यदि इनमें से कोई छात्र कटअप के बाद प्रवेश के लिए पात्र पाया जाता है तो उन्हें भी निजी कॉलेजों की पेमेंट सीट पर दाखिला दिलाया जाएगा और इसका खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 2 दिसम्बर। कांकेर की एक नर्सिंग काउंसलर से बलात्कार के आरोप में फरार चल रहे पूर्व चिकित्सा संचालक डॉ. साहेब लाल आदिले की जमानत अर्जी हाईकोर्ट ने मंजूर कर ली है।
बीते अगस्त में डॉक्टर के खिलाफ महिला पुलिस थाने में डॉ. आदिले के खिलाफ रेप का केस दर्ज किया गया था। आरोप है कि पीडि़ता जब रायपुर आई थी तो उसे अपने स्कूटी में बिठाकर डॉ. आदिले पंडरी स्थित अशोका सोसाइटी के एक मकान ले गये थे और वहां उसके साथ दुष्कर्म किया। सितंबर में आरोपी ने अपर सत्र न्यायाधीश रायपुर कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद अक्टूबर में उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। एफआईआर दर्ज होने के बाद से डॉ. आदिले अपने शंकर नगर निवास से फरार थे। हाईकोर्ट में आज डॉ. आदिले की अर्जी पर सुनवाई हुई। जस्टिस अरविन्द चंदेल की सिंगल बेंच ने उनकी जमानत अर्जी मंजूर की है।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
भाटापारा, 2 दिसंबर। बीती रात मटर लोड मेटाडोर व सीमेंट से लदे ट्रक की अर्जुनी के पास आमने-सामने भिड़ंत हो गई। हादसे में मेटाडोर में बैठे एक की मौत हो गई, वहीं ड्रायवर जख्मी हो गया।
पुलिस के अनुसार बीती रात 12 से एक बजे के बीच भाटापारा के समीपस्थ अर्जुनी चूना भ_ा के पास बलौदाबाजार की ओर जा रही मटर से भरी मेटाडोर व भाटापारा की ओर आ रही सीमेंट से भरी ट्रक में जोरदार टक्कर हो गई, जिसमें माजदा के कंडक्टर सीट पर बैठे व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि वाहन चालक को गंभीर हालत में अस्पताल भेजा गय। घटना के बाद से ट्रक चालक मौके से फरार है ।
भाटापारा ग्रामीण पुलिस मामले दर्ज कर घटना की जांच में जुटी हुई है। मृतक वाहन का मालिक था। वह जबलपुर मध्यप्रदेश का रहने वाला था। मटर लेकर रायगढ़ जा रहा था।
पीडब्ल्यूडी और नगर निगम की एक-दूसरे पर तोहमत
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजनांदगांव, 2 दिसंबर। करोड़ों रुपए की लागत से ऐतिहासिक बूढ़ासागर के सौंदर्यीकरण के लिए बनाया गया बाउंड्रीवाल बुधवार को धंसकर सरोवर में गिर गया। हादसे से कोई भी हताहत नहीं हुआ है, लेकिन बाउंड्रीवाल निर्माण के लिए फूंके गए करोड़ों की राशि पानी में बह गई। वहीं घटिया निर्माण से बने दीवार की गुणवत्ता की भी हादसे से पोल खुल गई।
मिली जानकारी के मुताबिक शीतला मंदिर से सटे दिग्विजय कॉलेज मार्ग में बनाए गए बाउंड्रीवाल का एक हिस्सा आज सुबह एकाएक धंसकर पानी में गिर गया। बताया जा रहा है कि बूढ़ासागर की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए बाउंड्रीवाल का निर्माण किया गया था। तकनीकी रूप से निर्माण कार्य को पुख्ता तरीके से नहीं किया गया। लिहाजा दीवार की नींव पानी में बह गई। बताया जा रहा है कि सालभर पूर्व निगम द्वारा बूढ़ासागर की तलहटी में पटे कीचड़ को हटाया गया था। इस दौरान दीवार निर्माण का काम भी चलता रहा।
बताया जा रहा है कि दीवार की नींव कीचड़ में ही रखी गई। पानी में मिट्टी के घुलने के कारण नींव गिर गई। इधर नगर निगम और पीडब्ल्यूडी दोनों इस मामले में एक-दूसरे पर ठिकरा फोड़ रहे हैं।
निगम के ईई दीपक जोशी ने ‘छत्तीसगढ़’ से कहा कि पीडब्ल्यूडी की देखरेख में दीवार का निर्माण किया गया था। इस संबंध में अधिकृत जानकारी पीडब्ल्यूडी के अफसर देंगे।
इधर पीडब्ल्यूडी के ईई डीके नेताम ने ‘छत्तीसगढ़’ से कहा कि विभाग द्वारा उक्त निर्माण नहीं किया गया है। नगर निगम के कार्य क्षेत्र में पीडब्ल्यूडी छोटे निर्माण नहीं करता है।
इस बीच सौंदर्यीकरण के दीवार ढ़हने से यह साफ हो गया है कि निर्माण के दौरान गुणवत्ता और तकनीकी बातों का ध्यान नहीं रखा गया। जिसके चलते आज सुबह दीवार गिर गई। पिछले कई सालों से अलग-अलग निर्माण के जरिये ऐतिहासिक बूढ़ासागर के सुंदरता को बढ़ाने की कोशिश में करोड़ों रुपए फूंके गए हैं। हर दो से तीन साल के अंतराल में बूढ़ासागर का गहरीकरण भी किया जाता रहा है। इसके बावजूद बूढ़ासागर की खूबसूरती में निखार नहीं आया है। आज हुए हादसे के बाद निगम और पीडब्ल्यूडी के अफसर एक-दूसरे पर दोषारोपण कर अपना पलड़ा झाड़ रहे हैं।
सीएसई की सबसे बड़ी पड़ताल: शहद के लगभग सभी ब्रांड में बड़े पैमाने पर मिलाई जा रही है चीनी
-अमित खुराना, अर्नब प्रतीम दत्ता, सोनल ढींगरा
यह कहानी उत्तर भारत में सरसों के खेतों से शुरू होती है जहां मधुमक्खी पालक शहद के अगले मौसम की तैयारी कर रहे हैं। सरसों के खेतों में जब फूल आते हैं, तब मधुमक्खी मकरंद चूसकर उसे शहद के रूप में हमें देती है। इस शहद का उपयोग करके हमें बहुत से फायदे मिलते हैं। हमें खबर मिली थी इस क्षेत्र और अन्य इलाकों के मधुमक्खी पालक गहरे संकट में हैं। पिछले कुछ सालों में शहद के भाव लगातार गिरने से हालात इतने बुरे हो गए हैं कि वे अपना कारोबार छोड़ने की स्थिति में पहुंच गए हैं। शहद का कारोबार अब उनके लिए फायदे का सौदा नहीं रह गया है। कच्ची शहद के भाव में ऐसी गिरावट पहले कभी नहीं देखी गई। भाव आखिर क्यों गिर रहे हैं? वह भी ऐसे समय में जब शहद की बिक्री लगातार बढ़ रही है और कोविड-19 के संक्रमण के खतरे के बीच अधिक से अधिक लोग एंटी माइक्रोबियल और एंटी इन्फ्लेमेटरी गुणों के कारण इसका अधिक सेवन कर रहे हैं। ऐसे समय में जब एक गिलास पानी में शहद मिलाकर नीबू के साथ पीना लाखों परिवारों के बीच सामान्य हो गया है, तब शहद का भाव गिरना चौंकाता है।
इसके अलावा हम यह भी जानते हैं कि केंद्र सरकार मधुमक्खी पालकों के लिए बड़े स्तर पर कार्यक्रम चला रही है। उनके जीवनयापन और मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार 500 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। ऐसे समय में इस पेशे से मोहभंग की आखिर क्या वजह हो सकती है?
डाउन टू अर्थ ने जब इन राज्यों की यात्रा की, तब हमें बार-बार मधुमक्खी पालकों की दुखभरी कहानियां सुनने को मिलीं। एक के बाद एक मधुमक्खी पालक ने यही कहा, “2014-15 तक हमें शहद का अच्छा मूल्य मिल रहा था। इसके बाद गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया। शहद का भाव पहले 150 रुपए प्रति किलो था। अब यह 60-70 रुपए के करीब पहुंच गया है।” राजस्थान के भरतपुर जिले में कच्ची शहद का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। यहां के मधुमक्खी पालक राम गोपाल बताते हैं, “मैंने मधुमक्खी के बॉक्स दोगुने कर दिए हैं, लेकिन वर्तमान में आमदनी पांच साल पहले से भी कम है। अब मैं यह काम छोड़ने की सोच रहा हूं।” उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के गंगो गांव के अमरनाथ भंवर सिंह कहते हैं, “फायदा कम होने पर मैंने मधुमक्खी पालन का काम छोड़ दिया है।” उत्तर प्रदेश के रामपुर में मधुमक्खी पालक और व्यापारी संजय नेगी बताते हैं कि मधुमक्खी पालक का जीवन तभी तब चल सकता है जब शहद का मूल्य कम से कम 120 रुपए प्रति किलो हो, लेकिन इस वक्त मूल्य लाभकारी नहीं है।

कुछ सुराग
हम समझ नहीं पा रहे थे कि हमसे क्या छूट रहा है? फिर हम शहद के बाजार को समझने के लिए छोटे-बड़े व्यापारियों के पास पहुंचे। उन्होंने मूल्य में गिरावट की बात तो मानी लेकिन इसके कारणों को खुलकर नहीं बताया। सबका यही कहना था, “सुनने में आया है कि शहद में शुगर सिरप (चीनी) मिलाया जा रहा है। चावल व अन्य फसलों से बना यह सिरप प्रयोगशाला की किसी भी जांच को पास कर सकता है। कंपनियां थोड़े से शहद में शुगर सिरप मिलाकर मोटा मुनाफा कमा रही हैं।” यह काम कौन कर रहा है, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया, सुनने में आया है कि चीन की कंपनियों ने सिरप बनाने की इस तकनीक की फैक्टरियां भारत में स्थापित की हैं। सहारनपुर के एक प्रमुख व्यापारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर खुलासा किया कि उसने सुना है कि चीन की कंपनियों ने उत्तराखंड के जसपुर, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) के धामपुर और पंजाब के बटाला में इस तकनीक की फैक्टरियां लगाई हैं। रामपुर के एक व्यापारी ने इसकी पुष्टि की लेकिन इससे अधिक कुछ नहीं बताया।
हम सोच रहे थे कि कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है। लेकिन क्या? इस व्यापार की अगर तह में भी जाया जाए तो इससे जुड़े व्यवसायी कह सकते हैं कि शुगर सिरप का उत्पादन कन्फेक्शनरी और अन्य उद्योगों के लिए किया जा रहा है। यह वैध भी है। इसी के साथ कहानी पर लगभग विराम लग जाता।
मिलावट का कारोबार
मिलावट पकड़ने के लिए जैसे-जैसे परीक्षण विकसित हो रहे हैं, वैस-वैसे उद्योग भी मिलावट के नए रास्ते खोज रहे हैं
- शहद दुनिया का ऐसा खाद्य उत्पाद है जिसमें सबसे अधिक मिलावट की जाती है
- प्रयोगशाला के परीक्षणों को मात देने के लिए मिलावट का कारोबार समय के साथ लगातार विकसित हुआ है
- शहद की धोखाधड़ी दुनियाभर मंे चिंता का विषय है
- भारत में सरकार को पता है कि शहद के कारोबार में कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है लेकिन वह इस बारे मंे किसी को नहीं बता रही
- शहद की शुद्धता के लिए मानकों में बार-बार बदलाव हुए हैं
- सरकार ने निर्यात की जाने वाली शहद की अतिरिक्त और उन्नत जांच को अनिवार्य बनाया है
- खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमिशन ने वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य शहद की परिभाषा दी है। इसके अनुसार, “शहद मधुमक्खियों द्वारा तैयार प्राकृतिक मिठास वाला तत्व है जो पौधों के परागण से अथवा पौधों के जीवित अंगों को अलग करके अथवा जीवित पौधों को चूसने वाले कीटों से हासिल होता है। मधुमक्खी इसे जमा, ट्रांसफॉर्म, डिहाइड्रेट और भंडारण कर छत्ते में इसे पकाती और परिपक्व करती है।” इसलिए अगर शहद में शुगर यानी चीनी की मिलावट कर दी जाए तो वह शहद नहीं मानी जाएगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जो शहद हम खा रहे हैं, क्या उसमें शुगर मिली हुई है?

ऐसा लगता है कि हमारे खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को भी कुछ गड़बड़ी का अंदेशा जरूर है। वही वजह है कि पिछले कुछ सालों में उसने शहद के गुणवत्ता मानकों को एक नहीं बल्कि दो बार संशोधित किया है और गुणवत्ता के संबंध में उद्योगों को एक के बाद एक दिशानिर्देश भेजे हैं। हर बार बदलाव एक न एक शुगर की मिलावट को पकड़ने के लिए किया गया। एफएसएसएआई ने शुगर सिरप के आयात के नियमन का आदेश भी जारी किया है क्योंकि उसे अंदेशा था कि इसका इस्तेमाल मिलावट में किया जाता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि या तो एफएसएसआई को इस गोरखधंधे के बारे में पता है और उसने हमें यानी उपभोक्ताओं को अंधेरे में रखा है या उसे लगता है कि वह शहद की धोखाधड़ी का पता लगाकर उसे रोक देगा।
शहद एक ऐसा तत्व है जिसमें दुनियाभर में मिलावट होती है। खाद्य उत्पादन से जुड़े लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। यह बात भी सब जानते हैं कि जब भी नियामक मिलावट के कारणों का पता लगाने के करीब पहुंचते हैं, तो मिलावट के नए रास्ते खोज लिए जाते हैं। शहद की धोखाधड़ी एक उम्दा उद्यम बन चुका है। हनीगेट की कहानी विश्वव्यापी है (देखें “अंतरराष्ट्रीय गोरखधंधा”,)।

कई कदम आगे और एक बड़ा कदम पीछे
शहद के गुणवत्ता मानक 60 साल तक स्थिर रहे हैं। एफएसएसएआई ने दिसंबर 2014 में शहद के मानकों में एंटीबायोटिक की सीमा निर्धारित की, तब जाकर इसमें बदलाव हुआ। यह कदम 2010 में दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट के बाद उठाया गया। यह रिपोर्ट शहद में एंटीबायोटिक की मौजूदगी पर थी। इसमें सीएसई ने शहद के लोकप्रिय ब्रांड का अपनी प्रयोगशाला में परीक्षण किया था। सीएसई ने तब यह भी बताया था कि घरेलू उपभोग के लिए बेचे जा रहे डिब्बाबंद शहद में एंटीबायोटिक की सीमा का कोई मानक निर्धारित नहीं है, जबकि निर्यात किए जाने वाले शहद में यह सीमा तय थी।
2010 में एफएसएसएआई ने एडवाइजरी जारी कर स्पष्ट किया कि शहद में कीटनाशक (पेस्टीसाइड) और एंटीबायोटिक की अनुमति नहीं है। 2014 में शहद के मानक संशोधित किए गए और एंटीबायोटिक की स्वीकार्य सीमा तय की गई। यह तय कर दिया गया कि शहद को गुणवत्ता मानक पूरा करने के लिए कितना एंटीबायोटिक आवश्यक है। अब मधुमक्खी पालकों या शहद उत्पादकों को यह सुनिश्चित करना था कि वे बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नहीं करेंगे। अथवा वे इसका इस्तेमाल करते भी हैं तो सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना होगा। यह सीमा इसलिए निर्धारित की गई क्योंकि भारत और दुनियाभर में चिंता जाहिर की जा रही है कि हमारे शरीर को संक्रमित करने वाले बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक रजिस्टेंस (प्रतिरोधक क्षमता) बढ़ रहा है।
ऐसा लगता है कि शहद की गुणवत्ता में सुधार के लिए दिसंबर 2014 के मानकों से शहद प्रोसेसिंग उद्योग को झटका लगा। उद्योग को अब निर्धारित सीमा के आसपास रहकर काम जारी करने के रास्ते खोजने थे। उनके लिए इससे आसान रास्ता क्या हो सकता था कि शहद में थोड़ा शुगर सिरप मिलाकर इसे “हल्का” कर दिया जाए। यह आसान भी था और प्रभावी भी।
हम पुख्ता तौर पर नहीं कह सकते थे कि ऐसा हो रहा है लेकिन हम यह जानते हैं कि 2017 में एफएसएसएआई ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया था। इनमें शहद के मानकों में मामूली परिवर्तन को लेकर आम जनता से रायशुमारी की गई थी। इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में खाद्य नियामक ने पहली बार शहद में गन्ना, चावल या चुकंदर जैसी फसलों से बनी शुगर का पता लगाने के लिए जांच को शामिल किया था। शहद में “विदेशी” शुगर की मिलावट का पता लगाने के लिए ये परीक्षण शामिल किए गए थे। भारत में ड्राफ्ट इसलिए भी जारी किया गया था ताकि दुनियाभर में फैल चुके मिलावट के कारोबार पर शिकंजा कसा जा सके।

दुनिया में शहद के परीक्षण की शुरुआत सी4 शुगर सिरप का पता लगाने से हुई थी। यह सिरप मक्का, गन्ना जैसे पौधों से प्राप्त होता है जो फोटोसिंथेटिक (प्रकाश संश्लेषण) पाथवे का प्रयोग करते हैं। इसे सी4 के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिकों ने इस विश्लेषणात्मक विधि को सी4 पौधों से प्राप्त होने वाले शुगर को शहद से अलग करने के लिए विकसित किया था। 2017 के ड्राफ्ट में इस टेस्ट को शामिल किया गया था।
लेकिन दुनियाभर में मिलावट का कारोबार प्रयोगशाला के परीक्षणों को मात देने के एकमात्र उद्देश्य से विकसित हुआ है। यानी इस काम में लगा उद्योग मिलावट में इस्तेमाल होने वाले शुगर को बदलता रहता है। इसके लिए दूसरी श्रेणी के पौधों का इस्तेमाल किया जाता है। ये वे पौधे होते हैं जो सी3 नामक फोटोसिंथेटिक पाथवे का इस्तेमाल करते हैं। धान और चुकंदर के पौधे इस श्रेणी में आते हैं। इसके बाद प्रयोगशालाओं ने इस मिलावट को पकड़ने के लिए आइसोटोप परीक्षण शुरू किए।
ऐसी ही परीक्षण हैं स्पेशल मार्कर फॉर राइस सिरप (एसएमआर) और ट्रेस मार्कर फॉर राइस सिरप (टीएमआर)। अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटर है विदेशी ओलिगोसेकेराइड्स जो राइस सिरप जैसे स्टार्च आधारित शुगर की मिलावट को पकड़ने में मदद करता है। 2017 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में एसएमआर, टीएमआर और ओलिगोसेकेराइड्स के लिए टेस्ट शामिल थे ताकि “विदेशी” नॉन-हनी सी3 शुगर का पता लगाया जा सके।
2018 के अंतिम मानकों में इन पैरामीटरों को अधिसूचित किया गया। यह कहा जा सकता है कि भारत ने जटिल टेस्टिंग प्रोटोकॉल को अपना लिया ताकि जिस शहद का हम सेवन पसंद करते हैं, वह शुद्ध व स्वास्थ्यवर्धक रहे।
इसके बाद अक्टूबर 2019 में बिना किसी कारण एफएसएसएआई ने पोलन काउंट्स (पराग की गणना) के पैरामीटर को बदलने और एसएमआर, टीएमआर व ओलिगोसेकेराइड्स को हटाने के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए। ये पैरामीटर सी3 पौधों से शहद में होने वाली राइस सिरप जैसी मिलावट को पकड़ने के लिए थे। यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर एफएसएसएआई किन कारणों से अपने मानकों को कमजोर करने के लिए बाध्य हुआ। 1 जुलाई 2020 तक मानकों को फिर से संशोधित कर दिया गया और कुछ पैरामीटरों को पुन: स्थापित कर दिया गया (देखें “तेजी से बदलते मानक”)।
हालांकि 2018 के मानकों में दो बड़े बदलाव कर दिए गए पहला, टीएमआर परीक्षण को हटा दिया गया। यह परीक्षण जब एसएमआर के साथ किया जाता है, तब मिलावट को बेहतर तरीके से पकड़ा जा सकता है। इससे राइस सिरप से होने वाली मिलावट को पकड़ने में बड़ी मदद मिलती है। यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इस जांच को क्यों हटा दिया गया है। दूसरा, पोलन काउंट्स कम कर दिया गया है। 2017 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में यह 50,000 था। 2018 में इसे घटाकर 25,000 और 2020 में 5,000 कर दिया गया। हालांकि शहद में पोलन काउंट्स की गणना और इससे शहद की गुणवत्ता व मिलावट निर्धारित करना विवाद का मुद्दा है। (देखें “पोलन की गणना”)
वर्ष 2017 से 2020 तक मानकों पर चली खींचतान बताती है कि एफएसएसएआई मिलावट रोकने के लिए बने अपने गुणवत्ता मानकों पर ही सहमति नहीं बना पा रहा है। यह भी साफ है कि कुछ मापदंडों को बिना वजह कमजोर कर दिया गया है। जनता को इसकी कोई तर्कसंगत वजह नहीं बताई गई है।
गोल्डन सिरप से एनएमआर

यह साफ है कि मिलावट की कहानी का अभी अंत नहीं हुआ है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भारत का खाद्य नियामक संकेत दे रहा है कि एक नए किस्म की मिलावट हो रही है।
दिसंबर 2019 और फिर जून 2020 में एफएसएसएआई ने राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को निगरानी, सैंपलिंग और निरीक्षण करने को कहा जिससे गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर या राइस सिरप का शहद की मिलावट में दुरुपयोग न हो पाए।
20 मई 2020 को एफएसएसएआई ने गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर (ग्लूकोज और फ्रुक्टोज का मिश्रण जो सुक्रोज यानी चीनी को पानी में उबालकर बनाया जाता है) और राइस सिरप के आयात के संबंध में आदेश जारी किया। यह आदेश बताता है कि एफएसएसएआई को मालूम है कि “कभी-कभी इन सिरप का इस्तेमाल शहद बनाने में किया जाता है क्योंकि इनकी लागत कम आती है, इनमें समान गुण होते हैं और ये आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।” आदेश में कहा गया कि गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर और राइस सिरप का भारत में आयात करने वाले सभी आयातकों और खाद्य बिजनेस ऑपरेटरों को जरूरी दस्तावेज जमा करने होंगे। इसके उत्पादकों की जानकारी देने के साथ बताना होगा कि इन सिरप का अंतिम इस्तेमाल क्या होगा और किसे आपूर्ति की जाएगी।
डाउन टू अर्थ ने 1 सितंबर को एफएसएसएआई के इंपोर्ट डिवीजन में सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन दाखिल कर आदेश के संबंध में उद्योगों से प्राप्त सूचना, साथ ही आयातित शुगर सिरप में मिलावट रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी। जवाब में एफएसएसएआई ने कहा कि उसने आवेदन दूसरे डिवीजन में भेज दिया है लेकिन यह नहीं बताया कि कौन-सा डिवीजन इससे संबंधित है। स्पष्ट तौर पर यह मुद्दे से भटकाने की रणनीति थी।
बात यहीं खत्म नहीं होती। 28 फरवरी 2020 को एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (ईआईसी) ने सभी शहद निर्यातकों को कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) में निर्यात होने वाली सभी शहद की न्यूक्लियर रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कॉपी (एनएमआर) टेस्टिंग अनिवार्य रूप से करानी होगी। यह कदम शहद में मिलावट को पकड़ने और उसकी मौलिकता/प्रामाणिकता की जांच के लिए उठाया गया था। यह टेस्टिंग 1 अगस्त 2020 से प्रभावी होनी थी। काउंसिल ने सभी एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसियों (ईआईए) के अधिकारियों को निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत जांच के लिए नमूने एकत्र करने का निर्देश दिया। इन नमूनों की जांच मुंबई स्थित उसकी प्रयोगशाला में की जानी थी, जहां यह जांच संभव है।
आखिर ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी और ये एनएमआर क्या है? दरअसल, शहद में मिलावट को पकड़ने के लिए एनएमआर जांच को स्वर्णिम मानक के रूप में देखा जाता है। यह जांच खासतौर पर नमूनों में शुगर सिरप की मिलावट पता लगाने के लिए की जाती है। एनएमआर को एक्सरे और खून की जांच और मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिन (एमआरआई) में अंतर के रूप में भी देखा जा सकता है, जिनका प्रयोग शरीर में गंभीर बीमारियों का पता लगाने के लिए किया जाता है। यह तकनीक एमआरआई से मिलती है जो इमेजिंग के जरिए शहद और इसके अवयवों की सच्ची तस्वीर पेश करती है। इसके बाद शहद के स्रोत और प्रामाणिकता दोनों की जानकारी मिल जाती है। भारत में डाबर हनी और सफोला जैसे ब्रांड अपने विज्ञापनों में दावा करते हैं कि वे शहद की शुद्धता को सुनिश्चित करने के लिए एनएमआर तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।
एनएमआर तकनीक को एक जर्मन कंपनी ने विकसित किया है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकारें शहद में मिलावट और इसके उद्गम का पता लगाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं। यह भी साफ है कि बहुत जल्द यह तकनीक भी बेकार हो जाएगी क्योंकि मिलावट के कारोबार में शामिल उद्योग इसका तोड़ भी निकाल लेगा।
भारत सरकार द्वारा एनएमआर टेस्ट कराने के लिए निर्यातकों को दिया निर्देश बताता है कि सरकार को भी संदेह है या वह जानती है कि शहद में मिलावट हो रही है। और यह मिलावट सी3 और सी4 जांच में पकड़ी नहीं जा रही है। इसके बाद भी अतिरिक्त जांच की जरूरत पड़ती है। एनएमआर जांच में यह सुनिश्चित किया जाता है कि शहद मिलावटी न हो।
यह कैसी मिलावट है जो शुगर सिरप के टेस्ट पास कर जाती है? हमारे मन में अगला सवाल यही था।
तेजी से बदलते मानक
शहद के मानकों में जल्दी-जल्दी हुए ये बदलाव बताते हैं कि कुछ न कुछ तो छुपाने की कोशिश की जा रही है
2010
सीएसई की प्रयोगशाला ने शहद में एंटीबायोटिक का पता लगाया
2014
एंटीबायोटिक अवशेषों की सीमा का निर्धारण व शहद मानकों के लिए एफएसएसएआई का संशोधन
2017
एफएसएसएआई का मसौदा मानक, जिसमें गन्ने व राइस सिरप का पता लगाने के लिए परीक्षण शामिल हैं (सी3 व सी4 शुगर)
2018
एफएसएसएआई ने कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ मानकों को अधिसूचित किया
2019
एफएसएसएआई ने शहद में राइस सिरप और अन्य मिलावट का पता लगाने वाले मुख्य मानदंडों जैसे एसएमआर, टीएमआर और विदेशी ओलिगोसेकेराइड्स जैसे प्रमुख मापदंडों को पलट दिया
दिसंबर 2019 और जून 2020
एफएसएसआई ने राज्य के खाद्य आयुक्तों को सूचित किया कि शुगर सिरप का शहद की मिलावट में इस्तेमाल हो रहा है और इसकी नियमित जांच की जाए
फरवरी 2020
वाणिज्य मंत्रालय एनएमआर का उपयोग करके निर्यात होने वाली शहद की जांच अनिवार्य बनाता है। ईआईसी इस जांच के लिए प्रयोगशाला स्थापित करती है
मई 2020
एफएसएसएआई कहता है कि उसे गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर सिरप और राइस सिरप का उपयोग करके शहद में की जा रही मिलावट के बारे में बताया गया है। उसने आयातकों को पंजीकरण कराने और आयातित उत्पादों के उपयोग के बारे में सूचित करने को कहा
जुलाई 2020
एफएसएसएआई ने मुख्य मापदंडों को बहाल किया लेकिन राइस सिरप का पता लगाने के लिए टीएमआर को नहीं। 2020 के मानक जारी किए।
पोलन की गणना
राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड के पूर्व कार्यकारी निदेशक योगेश्वर सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि उन्होंने पिछले साल नवंबर में आर्थिक सलाहकार परिषद एवं मधुमक्खी पालन विकास समिति को पत्र लिखकर आगाह किया था कि “एफएसएसएआई ने पोलन संख्या को कम करके मिलावट और राइस व कॉर्न सिरप की शहद के रूप में बिक्री को वैध कर दिया है। इस कारण शहद के प्रसंस्करण से जुड़े लोग उपभोक्ताओं के साथ खुलेआम धोखाधड़ी कर रहे हैं।”
सरकार ने इस पर सहमति नहीं जताई। इस साल फरवरी के लोकसभा में पूछे एक प्रश्न के उत्तर में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा, “एफएसएसएआई ने सूचित किया है कि पोलन संख्या में बदलाव भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) और केंद्रीय मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (सीबीआरटीआई) के वैज्ञानिकों के सुझावों के आधार किया गया है। इससे भारतीय शहद में पोलन संख्या की सही तस्वीर पता चलती है।”
सीबीआरटीआई के डॉ़ लक्ष्मी राव ने डाउन टू अर्थ से हुई बातचीत में बताया कि संस्थान ने 5,000 प्रति ग्राम पोलन की सिफारिश की थी। यह सिफारिश भारत और विदेश में किए गए अध्ययन पर आधारित थी जिसमें कहा गया है कि पोलन संख्या कुल शहद में कम से कम 0.01 प्रतिशत यानी 5,000 प्रति ग्राम होनी चाहिए। हालांकि वैश्विक स्तर पर पोलन को शहद की गुणवत्ता का पैमाना नहीं माना गया है। इसके बावजूद पोलन से देशों को यह जानकारी मिल जाती है कि शहद का स्रोत क्या है। पश्चिमी देशों में शहद में मिलावट के गोरखधंधे में शामिल एक वर्ग शहद की गलत लेबलिंग कर रहा है। उसका कहना है कि यह संयुक्त राज्य से आ रहा है लेकिन वास्तव में यह दूसरे देशों से आ रहा है। पोलन से शहद की उत्पत्ति पता चलती है। यह एक प्रकार से फिंगरप्रिंट जैसा है।
कोडेक्स एलिमेंटेरियस स्टैंडर्ड के अनुसार, “पोलन या शहद के अन्य घटक तब तक नहीं हटाए जा सकते जब तक विदेशी जैविक और अजैविक घटक हटाना अनिवार्य न हो। इस तरीके से फिल्टर होने वाली शहद पोलन हटाने का नतीजा है। इस शहद को फिल्टर्ड शहद कहा जाना चाहिए।”
पोलन की संख्या शहद के अलग-अलग प्रकारों में भिन्न होती है। उदाहरण के लिए सरसों, लीची या एक फूल अथवा विविध फूलों से प्राप्त शहद में यह भिन्न हो सकती है। इसके अलावा कुछ मामलों में मिलावट पोलन मिलाकर भी जाती है ताकि शहद की उत्पत्ति के स्रोत में छेड़छाड़ की जा सके। इसलिए पोलन कम करके मिलावट तो हो सकती है लेकिन पोलन में वृद्धि करके शहद के मानकों या स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता।
इससे स्पष्ट होता है कि शहद को खाना भले ही आसान हो लेकिन इसका व्यवसाय कतई आसान नहीं है।

चीन की मिलीभगत का सुराग
आयातित शुगर की पड़ताल जिसका इस्तेमाल शहद में मिलावट के लिए होता है
- एफएसएसएआई का मिलावट में इस्तेमाल होने वाले गोल्डन सिरप, इनवर्ट सिरप और राइस सिरप के संबंध मंे दिया गया निर्देश किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा
- चीन की अलीबाबा जैसी व्यापारिक वेबसाइटें विज्ञापन में दावा करती हैं कि फ्रुक्टोज सिरप प्रयोगशाला के परीक्षणों को बाईपास कर सकता है
- कुछ कंपनियां दावा करती हैं कि फ्रुक्टोज सिरप सी3 और सी4 परीक्षणों पर भी पास हो सकता है, भारत में इनका निर्यात भी होता है
शहद में मिलावट की जांच के दौरान हमें दो अहम सुराग मिले। पहला, मधुमक्खी पालकों को उनके शहद की उचित कीमत नहीं मिल रही है। इससे शहद में शुगर सिरप की मिलावट की आशंका को बल मिलता है और इसीलिए कच्चे शहद की मांग गिर रही है। दूसरा, सरकार को इस मिलावट का कुछ अंदाजा तो है क्योंकि उसने न केवल चावल अथवा मकई सिरप का पता लगाने वाले कुछ टेस्ट शुरू किए हैं, बल्कि शुगर सिरप का पता लगाने के लिए भी टेस्ट करने को कहा है। शहद के निर्यात से संबंधित मानकों से इसका पता नहीं चल पाता है।
अब हमारी जांच के दौरान अगला सवाल यह उठा कि इस सिरप में क्या है? इसे कौन बनाता है? और ये कहां से आता है? हमें एफएसएसएआई द्वारा मई 2020 में जारी निर्देशों से सुराग मिला जिसमें कहा गया था कि भारत में आ रहे “गोल्डन सिरप, इनवर्ट शुगर सिरप, राइस सिरप” की जांच जरूरी है क्योंकि इनका इस्तेमाल मिलावट में हो सकता है। अत: हमने इन सिरप की खोज शुरू की। हमें लगा था कि यह खोज आसान होगी। लेकिन जब हमने केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के निर्यात-आयात डेटाबेस की जांच की तो इनमें से दो नाम- राइस सिरप और गोल्डन सिरप नहीं मिले। देश में आयात किए गए प्रत्येक उत्पाद में हारमोनाइज्ड सिस्टम (एचएस) कोड होता है जिसमें उस उत्पाद का वर्णन होता है। इन सिरपों का कोई कोड नहीं था। ऐसा लगा मानों हमारी जांच का एक और सिरा यहां आकर खत्म हो गया हो।
हमने यह भी पाया कि “इनवर्ट शुगर सिरप” नामक उत्पाद का एचएस कोड था, लेकिन जब हमने इसकी जांच को तो पता चला कि आयात की मात्रा काफी कम थी। 2017-18 में यह केवल 1,300 मीट्रिक टन और 2018-19 में 2,500 मीट्रिक टन आयात किया गया था। शहद में बड़े पैमाने पर मिलावट करने के लिए यह मात्रा पर्याप्त नहीं थी। इसी के साथ एफएसएसएआई से मिला यह सुराग हमें किसी अंजाम तक पहुंचाने में विफल रहा।

इसके बाद भी हमने अपनी खोज जारी रखी और चीन के विक्रेताओं की वेबसाइटों को बारीकी से देखने का निर्णय लिया। हमने पाया कि अलीबाबा, ओकेकेम, ट्रेडव्हील जैसे कुछ चीन के पोर्टल सिरप बेच रहे थे और उनका दावा था कि ये सिरप शहद में मिलावट की जांच करने वाले परीक्षण जैसे सी3, सी4, टीएमआर, एसएमआर, ओलिगोसेकेराइड्स और कुछ मामलों में एनएमआर भी पास कर सकते थे। ये सिरप आमतौर पर “फ्रुक्टोज सिरप (एफ55/ एफ42)”, “हनी ब्लेंड सिरप”, “फ्रुक्टोज राइस सिरप फॉर हनी”, “टैपिओका फ्रुक्टोज सिरप”, “गोल्डन सिरप फ्रुक्टोज सिरप”, “गोल्डन फ्रुक्टोज ग्लूकोज सिरप” जैसे नामों के साथ बेचे जा रहे हैं।
इन वेबसाइटों पर उत्पादों के नामों में फ्रुक्टोज और ग्लूकोज शब्द के बार-बार उपयोग को देखते हुए हमने चीन से इन वस्तुओं के आयात की जांच का फैसला लिया। भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के निर्यात-आयात डेटाबेस से पता चला कि 2014-15 के बाद से लगभग नौ अन्य देशों ने नियमित रूप से भारत में फ्रुक्टोज सिरप का निर्यात किया, लेकिन चीन एकमात्र ऐसा देश है, जहां से यह थोक में आयात किया जाता है। वर्तमान में भारत में चीन से आयातित फ्रुक्टोज सिरप की मात्रा सबसे अधिक है (देखें “अनोखा संबंध”,)। 2014-15 के बाद से हर साल आयात की औसत मात्रा 10,000 मीट्रिक टन से अधिक रही है। इसी तरह, भारत में आयात होने वाला सारा ग्लूकोज सिरप 2016-17 से ही चीन से आ रहा है और 2017-18 में आयातित मात्रा अचानक बढ़कर 4,300 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी (देखें “चीनी आयात”,) ।

ये आंकड़े और रुझान असामान्य लग रहे थे लेकिन ये विक्रेता कौन थे, इस बारे में हमें और अधिक जानकारी की आवश्यकता थी। इन मिलावटी सामानों को वेबसाइटों पर बेचने वाली कंपनियों और भारत में उनके निर्यातकों के बीच का संबंध ढूंढना हमारी प्राथमिकता बन गया।
इसलिए हमने गोपनीयता की शर्त पर एक ट्रेड डेटाबेस खरीदा। यह हमने एक ऐसी कंपनी से लिया जो प्रत्येक आयातित शिपमेंट के आंकड़े संकलित करती है। इस कंपनी से चीनी विक्रेताओं, कीमतों और प्रमुख बंदरगाहों के विवरण के अलावा हमें उन नामों को समझने में भी मदद मिली जिनके अंतर्गत ये सिरप भारत में आयात किए जाते हैं। हमने गोल्डन सिरप, राइस शुगर सिरप और इनवर्ट शुगर सिरप से संबंधित जानकारी भी प्राप्त की। एचएस कोड उपलब्ध न होने के कारण इन उत्पादों से संबंधित जानकारी कुछ खास विवरणात्मक कीवर्ड डालने के बाद ही प्राप्त हुई।
जांच के दौरान हमें अहम सुराग मिले। फ्रुक्टोज सिरप बेचने वाली ये वही चीन की कंपनियां हैं जो अलीबाबा और इसी तरह के अन्य पोर्टलों पर खुलेआम ऐसे सिरप बेचती हैं जो शहद में मिलावट का पता करने वाले परीक्षणों से बच निकलने की क्षमता रखते हैं। पिछले चार वर्षों में भारत में 11,000 मीट्रिक टन फ्रुक्टोज सिरप इन विक्रेताओं के माध्यम से आया है जो चीन से आयातित कुल मात्रा का लगभग 70 प्रतिशत है। इसे “औद्योगिक कच्चा माल” के नाम पर मंगाया जाता है।
ऊपरी तौर पर ये कंपनियां सिरप या शहद की वैध विक्रेता मालूम पड़ती हैं क्योंकि ये अपनी वेबसाइट पर यह नहीं बतातीं कि उनके द्वारा बेचे जा रहे सिरप में मिलावट का पता लगाने वाले परीक्षणों को पास करने की अद्भुत क्षमता है। इसके विपरीत, ये अपनी वेबसाइटों पर खाद्य सुरक्षा और मानकों से संबंधित प्रमाण पत्र प्रदर्शित करती हैं। लेकिन इनके बीच के संबंध का पता तब चलता है जब आप पाते हैं कि भारत को माल निर्यात कर रही ये कंपनियां अपनी वेबसाइटों पर तो सम्मानित खाद्य विक्रेता होने का स्वांग करती हैं लेकिन अलीबाबा जैसे ऑनलाइन पोर्टलों पर ऐसे शुगर सिरप उत्पाद बेचती हैं जो सी3/सी4 परीक्षणों से बच निकलते हैं।
समस्या हमारी यानी आयातकों की ओर से है। यहां हमारी पड़ताल में वास्तविक विराम लग जाता है। चीन से इस उत्पाद के आयातकों के डेटाबेस में सूचीबद्ध अधिकांश कंपनियां व्यापारिक हैं जो उत्पाद को आगे शहद पैकिंग व्यवसाय या अन्य खाद्य व्यवसायों को बेचेंगी। चीन से आए 166 फ्रुक्टोज सिरप शिपमेंट में से 100 पंजाब (फरीदकोट, पटियाला और राजपुरा) में, लगभग 30 दिल्ली-एनसीआर और बाकी 15 जसपुर और काशीपुर (उत्तराखंड) में दो व्यवसायों द्वारा खरीदे गए।

भारत में ग्लूकोज सिरप का निर्यात करने वाली चीनी कंपनियां या शहद सप्लायर हैं या दावा करती हैं कि वे ग्लूकोज सिरप को शहद के विकल्प के रूप मंे बेच रही हैं (देखें “शुगर का संक्षिप्त इतिहास”)। यदि ये भारी टैक्स से बचने के लिए ग्लूकोज सिरप के एचएस कोड के अंदर शुद्ध शहद की आपूर्ति कर रही हैं, तो यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन शहद में मिलाने के लिए ग्लूकोज सिरप की आपूर्ति मिलावट के मुद्दे की गंभीरता को बढ़ाती ही है। इसके प्रमुख आयातक नासिक, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के व्यवसायी हैं।
इससे यह साफ हो जाता है कि मिलावट की जाने वाली वस्तुओं को राइस सिरप, गोल्डन सिरप अथवा इनवर्ट शुगर सिरप के रूप में आयात नहीं किया जाता। वर्ष 2019-20 में अमेरिका से राइस सिरप के केवल 10 शिपमेंट आए थे जिनकी मात्रा काफी कम (22 मीट्रिक टन) थी। चीन में केवल एक विक्रेता इसे फ्रुक्टोज के एचएस कोड के अंदर गोल्डन सिरप के रूप में बेच रहा था। इस विक्रेता ने वर्ष 2017-18 और 2018-19 में यह 2,700 मीट्रिक टन से अधिक निर्यात किया। अन्य देशों से आयातित गोल्डन सिरप या तो चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए आता है, जैसा कि एचएस कोड (स्विट्जरलैंड के मामले में) द्वारा परिलक्षित होता है या थोक (यूके के मामले में) में आयात नहीं किया जाता।
ऐसे में सवाल उठता है कि एफएसएसएआई ने गलत आदेश क्यों दिया? इस आदेश में आयात नहीं किए जा रहे उत्पादों का उल्लेख तो है लेकिन आयात किए जा रहे उन उत्पादों का नाम गायब है जो उन्हीं चीनी कंपनियों द्वारा बेचे जा रहे हैं। कंपनियां इन उत्पादों को सी3 एवं सी4 टेस्ट में पास होने का दावा करती हैं। अब सवाल उठता है कि यह आदेश जानकारी की कमी नतीजा था या जानबूझकर ऐसा किया गया?
शुगर का संक्षिप्त इतिहास
हम जानते हैं कि सुक्रोज, ग्लूकोज और फ्रुक्टोज सभी शुगर के रूप हैं और इनमें प्रति ग्राम कैलोरी का स्तर कम या अधिक होता है। इन तीनों को जो चीज अलग करती है, वह है इनकी आंतरिक संरचना और यह कि हमारा शरीर इन्हें कैसे पचाता और मेटाबोलाइज करता है। ग्लूकोज सरल चीनी या एक मोनोसेकेराइड है और यह हमारे शरीर में सबसे तेजी से पचता है। इसे मकई से निकालकर डेक्सट्रोज के रूप में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में मिलाया जा सकता है। फ्रुक्टोज भी सरल चीनी है, लेकिन यह फ्रूट शुगर के नाम से जाना जाता है और फल, शहद, गन्ना और चुकंदर में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है। यह पचाने में भी आसान है। शहद में ग्लूकोज की तुलना में फ्रुक्टोज अधिक होता है, लेकिन जो इसे अन्य “शुगर” से अलग करता है, वह है कि इसमें विभिन्न प्रकार के अच्छे एंजाइम, जो शर्करा को विघटित करते हैं। ये एंजाइम पौधे से या मधुमक्खियों से आते हैं। फ्रुक्टोज और ग्लूकोज के बीच का अनुपात शहद की उत्पत्ति के आधार पर बदलता है। शहद मल्टी-फ्लोरल (कई फूल) है या मोनो फ्लोरल (एक फूल/पौधा) ये भी महत्वपूर्ण कारक है। इसलिए अनुपात अपने आप में मिलावट का निर्धारक नहीं है।
कैसे हुआ हनीगेट का खुलासा
इस कारोबार से पर्दा उठाने के लिए हमने चीन के शुगर विक्रेताओं से संपर्क कर एक गुप्त ऑपरेशन चलाया
- हमने चीन की कंपनियों से ईमेल के जरिए संपर्क कर ऐसे सिरप की मांग की जो भारत में परीक्षणों को पास कर सकें
- ये वही चीनी कंपनियां थीं जो भारत में फ्रुक्टोज सिरप का निर्यात कर रही थीं
- कंपनियों से जवाब मिला कि ये सिरप उनके पास उपलब्ध हैं और भारत भेजे जा सकते हैं
- चीन की कंपनियों ने हमें बताया कि अगर हम शहद में 50-80 प्रतिशत तक सिरप की मिलावट कर दें तब भी ये सभी निर्धारित परीक्षणों को पास कर लेंगे
- चीन की एक कंपनी ने पेंट पिगमेंट के रूप में सिरप हमें भेज भी िदया
- इसने अपना शिपमेंट हांगकांग के जरिए भेजा ताकि कस्टम क्लियरेंस को बाईपास किया जा सके

अक्टूबर 22, 2020 को हमारे पास फेडएक्स का एक कूरियर आया। यह पैकेज हांगकांग से था और उस पर लिखी जानकारी के अनुसार, इसमें प्लास्टिक पिगमेंट इमल्शन था। आप पूछ सकते हैं कि हम भला प्लास्टिक पिगमेंट इमल्शन क्यों मंगाएंगे और वह भी हांगकांग से? दरअसल हम अंधेरे में रखकर चल रहे इस कारोबार की परत दर परत खोलना चाहते थे। इसलिए हमने चीन से सिरप के सैंपल मंगवाने का ऑर्डर दिया था। कंपनी ने हमें भरोसा दिया था कि ये सैंपल शहद में मिलाए जा सकते हैं और ये सभी निर्धारित परीक्षणों पर खरे उतरेंगे।
इसके लिए हमने शहद उत्पादक का दावा करने वाली चीन की दो कंपनियों से ईमेल के जरिए संपर्क साधा (देखें “चीन का खेल”,)।
हमने शहद का व्यापार करने वाली एक ऐसी भारतीय कंपनी के रूप में खुद को पेश किया जो परीक्षण पास करने वाले चीन के सिरप खरीदने की इच्छुक थी।
हमने दो चीनी कंपनियों से इस बाबत पूछताछ की। इनमें से पहली वुहू स्थित वुहू डेली फूड्स थी जो चीन के चावल उत्पादक क्षेत्र अन हुयी की एक बड़ी एफएमसीजी कंपनी थी। इसकी वेबसाइट के अनुसार यह कंपनी चार प्रमुख उत्पाद बेचती है जैसे, प्राकृतिक शहद, सिरप, ड्राई सिरप और वीगन प्रोटीन (वह प्रोटीन जो पशु या उसके उत्पादों से प्राप्त नहीं होगा)। वुहू डेली भारत में फ्रुक्टोज के निर्यातकों में से एक थी।
दूसरी कंपनी का नाम सीएनएनफूड्स था और यह अन हुयी में ही स्थित थी लेकिन पहली कंपनी से छोटी थी। कंपनी का दावा था कि वह केवल शहद, कोम्ब शहद, बी वैक्स और प्रोपोलिस जैसे प्राकृतिक मधुमक्खी उत्पाद ही बेचती है।
हमने इन कंपनियों को अपने झांसे में लेने के लिए एक तरकीब लगाई। हमने कहा कि हम 10 कंटेनर या लगभग 200 टन सिरप खरीदना चाहते हैं जो सभी भारतीय परीक्षण प्रोटोकाॅल को पास करने में सक्षम हो।
हमारी जरूरतें साधारण थीं। हम जानना चाहते थे कि क्या उनका सिरप एफएसएसएआई द्वारा तय परीक्षण पास कर सकता है? इन परीक्षणों में सी3 और सी4 शामिल हैं। हम जानना चाहते थे कि क्या चीन के ये सिरप इन परीक्षणों के अलावा कुछ अतिरिक्त परीक्षणों (एसएमआर, टीएमआर एवं विदेशी ओलिगोसेकेराइड्स) पर भी सफल हो पाएंगे। हम यह भी चाहते थे कि एचएमएफ (5-हाइड्रॉक्सी मिथाइल फरफुरल) का स्तर कम हो, ताकि यह पता न चले कि शहद को गर्म किया गया है। दोनों कंपनियों ने हमें कहा कि हमारी निर्दिष्ट आवश्यकताओं पर खरे उतरने वाले सिरप उनके पास उपलब्ध हैं।

वुहू डेली ने हमें दो तरह के सिरप दिखाए। इनमें एक में फ्रुक्टोज का स्तर 48 प्रतिशत था। इस सिरप को एफ48 कहा गया। दूसरे में यह 55 प्रतिशत था और इसे एफ55 कहा गया था। वुहू डेली ने लिखित में बताया कि ये दोनों सिरप हमारी परीक्षण आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। कंपनी ने कहा कि वह इसे भारत के किसी भी शुष्क बंदरगाह पर भेज सकती है और हमें अंतरदेशीय कंटेनर डिपोर्ट (आईसीडी) लुधियाना के लिए सीआईएफ (लागत बीमा और माल भाड़ा) के आधार पर दरें भी बताईं। लुधियाना के लिए सीआईएफ दरें एफ48 सिरप के लिए $805.00/ मीट्रिक टन और एफ55 सिरप के लिए $950.00/ मीट्रिक टन निर्धारित की गई। एफ48 सिरप की भारतीय मुद्रा में कीमत लगभग 60 रुपए प्रति किलोग्राम थी जबकि एफ55 किस्म की दर लगभग 71 रुपए प्रति किलोग्राम थी ($1 = 75 रुपए)। सीएनएनफूड्स नामक दूसरी चीनी कंपनी, जो आधिकारिक रूप से केवल शहद बेचती है, ने दावा किया कि उनके पास एफ48 एवं एफ55 सिरप मौजूद हैं और वे भारत के सभी परीक्षण प्रोटोकाल को पास करने की क्षमता रखते हैं। वुहू डेली के विपरीत सीएनएनफूड्स सस्ती दरों पर दिल्ली के तुगलकाबाद में इनलैंड कंटेनर डिपो के माध्यम से सिरप भेजने के लिए तैयार हो गई। तुगलकाबाद के लिए उनकी सीआईएफ दरें एफ48 के लिए 710 डॉलर/ मीट्रिक टन थी जबकि एफ55 के लिए यह 790 डॉलर/मीट्रिक टन थी। ये सभी दरें 200 मीट्रिक टन सिरप के हिसाब से थीं। इस तरह एफ48 सिरप के लिए लगभग 53 रुपए प्रति किलोग्राम और एफ55 किस्म के लिए 59 रुपए प्रति किलोग्राम की आश्चर्यजनक रूप से कम कीमत हमें बताई गई।
दिलचस्प बात यह है कि सीएनएनफूड्स ने हमें बताया कि उनके अधिकांश ग्राहक शहद में 50-80 प्रतिशत सिरप मिलाते हैं। हम यह जानना चाहते थे कि क्या हम ऑर्डर देने से पहले इन दो सिरप के नमूने भारत में मंगा सकते हैं? दोनों ही कंपनियां हमें अपने नमूने भेजने के लिए राजी हो गईं।
30 सितंबर 2020 को वुहू डेली ने पुष्टि की कि हमें 500 एमएल के दो नमूने फेडएक्स एयरवे बिल नंबर 7716663xxxxx के माध्यम से भेजे गए हैं।
माल की खेप के साथ भेजी गई रसीद बहुत गुप्त थी और उसमें सिरप के प्रकार की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। रसीद पर केवल “सिरप” लिखा हुआ था और यह सिरप किस चीज का था (चावल अथवा अन्य कोई स्टार्च युक्त) इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। हमें कंपनी द्वारा एफ48 सैंपल के विश्लेषण के प्रमाणपत्र मेल किए गए थे जिनके अनुसार सिरप हल्का, गंधहीन और स्वाद में मीठा है। इसमें डेक्सट्रोज प्लस फ्रुक्टोज की मात्रा 97.50 प्रतिशत है जबकि फ्रुक्टोज की मात्रा केवल 48 प्रतिशत है।
यह सैंपल दिल्ली पहुंच चुका था लेकिन इसके बावजूद हम इसकी डिलीवरी नहीं ले पा रहे थे क्योंकि यह कार्गो के रूप में आया था और इसे सीमा शुल्क विभाग से क्लियर कराने की एक लंबी प्रक्रिया थी। फेडएक्स ने हमें सूचित किया कि भारत-चीन संघर्ष के बाद से भारत सरकार कूरियर कंपनी को पैकेज खोलने की अनुमति नहीं देती और ऐसा करने के लिए कस्टम एजेंट की आवश्यकता होती है। चूंकि हम एक खाद्य प्रसंस्करण कंपनी नहीं हैं और हमारे पास आवश्यक एफएसएसएआई लाइसेंस और आयात प्रमाणपत्र नहीं हैं इसलिए हमने अपने स्तर पर नमूनों को अधिग्रहीत करने का प्रयास नहीं किया। हमारी जानकारी के अनुसार ये नमूने अब भी फेडएक्स के पास सुरक्षित हैं।
अब बात दूसरी कंपनी सीएनएनफूड्स की जिनके पोर्टफोलियो में केवल प्राकृतिक मधुमक्खी उत्पाद थे। यह कंपनी हमें अपने उत्पाद बेचने के लिए बेताब थी और इसके लिए उसने एक अलग रास्ता अपनाया। उसने सुझाव दिया कि वह अपने उत्पाद हांगकांग के माध्यम से भेजेगी, क्योंकि चीन से आने वाले उत्पादों पर भारतीय कस्टम विभाग विशेष ध्यान देता है। 13 अक्टूबर 2020 को सीएनएनफूड्स ने हांगकांग से सैंपल भेजे और 10 दिन बाद “पेंट पिगमेंट इमल्शन” वाला पैकेट हमारे दरवाजे पर पहुंचा।
यह अलग बात है कि पैकेट के अंदर लेबल पर लिखी वस्तु नहीं थी। इसके विपरीत इसमें एफ48 और एफ55 की तीन प्लास्टिक शीशियां थीं। एफ48 नमूने का फ्रुक्टोज-ग्लूकोज अनुपात 0.95 था जबकि एफ55 के मामले में यह अनुपात 1.20 होने का दावा किया गया था। इस तरह हनीगेट का खुलासा हो गया। अब हम जानते हैं कि शहद में मिलावट का यह खेल किस तरह चल रहा है। अब हम कह सकते हैं कि चीन की ये बड़ी-बड़ी कंपनियां जो ऊपरी तौर पर बिल्कुल साफ सुथरी प्रतीत होती हैं, दरअसल शुगर सिरप बेच रही हैं और उनका दावा है कि ये सिरप सारे परीक्षणों को पास कर सकते हैं। यही नहीं, ये कंपनियां यह भी बताती हैं कि उनके ग्राहक 80 प्रतिशत तक सिरप मिलाकर उसे शहद के नाम से बेचते हैं।
चीनी सुगबुगाहट
यह चीन की कौन-सी तकनीकी है जो शुगर में ऐसे बदलाव कर सकती है जिसे पहचाना नहीं जा सकता? चीन की फर्मों का यह दावा है कि उनके सिरप ऐसे हैं जो शहद के घोल को उन्नत मिलावट परीक्षणों से भी बचा सकते हैं। उद्योग जगत इस बारे में बताता है कि इस काम के लिए रेजिन टेक्नोलॉजी यानी राल तकनीकी का इस्तेमाल किया जाता है। आखिर यह क्या बला है?
फल के रसों में रेजिन टेक्नोलॉजी का प्रयोग काफी जाना-माना है। दरअसल यह तकनीकी आयनों की अदला-बदली और एब्जॉर्बेंट्स को जुदा करने वाली पद्धति पर आधारित है। हालांकि, इस तकनीकी का प्रयोग शहद के लिए बिल्कुल ही नई अवधारणा है। चीन के रेजिन मैन्युफैक्चरर्स इसकी अगुवाई करते हैं।
आयन एक्सचेंज रेजिन के विभिन्न प्रकार होते हैं जो आयनिक समूहों को ले जाने वाली ठोस बहुलक श्रृंखलाओं (जैसे एसओ3 -, सीओओ-, एनएच3+, एनएच2+) से जुड़े होते हैं। यह आमतौर पर हानिकारक पदार्थों को हटाने में मदद करने के लिए बेचा जाता है।
यह रेजिन अलीबाबाडॉटकॉम जैसी वेबसाइटों पर भी उपलब्ध हैं। चीन की अग्रणी सनरेजिन है जो सेपलाइट बेचती है। यह एक ऐसा रेजिन है जो शहद की शुद्धिकरण के लिए है। दावा है कि संबंधित रेजिन के जरिए एंटीबायोटिक, कीटनाशक, कवकनाशक और एमएमएफ (हाइड्रोक्सी मिथाइल फुरफुरल) जैसे हानिकारक पदार्थों को हटाया जा सकता है। कंपनी की वेबसाइट इस तकनीक के जरिए शहद के रंग को बेहतर करने और उसकी उम्र बढ़ाने का भी दावा करती है।
लेकिन रेजिन से फिल्टर होने वाली शहद को सरकारें, विशेषज्ञ और मधुमक्खी पालक शहद नहीं मानते। मिसाल के तौर पर 2018 में ईयू कमीशन ने शहद मिलावट पर तकनीकी सत्र में एक रिपोर्ट में यह इंगित किया कि रेजिन उपचार या अल्ट्राफिल्ट्रेशन (ब्लेंडिंग के बाद) दरअसल शहद क्षेत्र में एक बहुत ही बड़ा धोखा है। यह भी गौर किया गया कि शहद से एंटीबायोटिक, कीटनाशक आदि जैसे तत्वों को हटाने के लिए सिंथेटिक रेजिन का इस्तेमाल गैरकानूनी है।
मार्च 2018 में यूरोपीय संसद प्रस्ताव ने ईयू के एपीकल्चर सेक्टर को चुनौती दी, साथ ही आयोग को रेजिन से फिल्टर होने वाले शहद के वितरण पर जल्द से जल्द प्रतिबंध के लिए पुकार लगाई। ऐसी शहद में जैविक मूल्य कुछ भी नहीं होता।
यह बताता है कि 2002 में शहद में क्लोरमफेनिकॉल समस्या का समाधान चीन से शहद का निर्यात करने वाली कंपनियों ने नियमों का पालन करके नहीं बल्कि रेजिन फिल्टर का उपयोग करके किया था। अंतरराष्ट्रीय मधुमक्खी पालकों के संघों के संघ एपिमोंडिया ने शहद की धोखाधड़ी पर अपने जनवरी 2020 के बयान में कहा है कि आयन-एक्सचेंज रेजिन का उपयोग 1981 के कोडेक्स मानक और यूरोपीय शहद परिषद के निर्देश 2001/110 / ईसी (2001) का उल्लंघन करता है।
इसके अलावा, ऐसे अध्ययन भी हैं जो प्राकृतिक शहद में मैनोज (न्यूट्रिशियन सप्लीमेंट) की उपस्थिति के बारे में बताते हैं। इन्हें या तो उच्चस्तरीय सिरप के मिलावट से या फिर रेजिन पद्धति के जरिए आयनों के विनिमय माध्यम से जोड़ा जाता है।
यह स्पष्ट है कि ऐसे अल्ट्रा-फिल्ट्रेशन के तहत अंत में तैयार होने वाले उत्पाद शहद कहलाने के काबिल नहीं होते। यह शहद की भौगोलिक और वनस्पति मूल की पहचान को ढंक देता है जो न केवल वांछित शहद और सिरप के साथ सम्मिश्रण करने में मदद करता है, बल्कि समस्या को पहचानना भी मुश्किल बनाता है।
लेकिन क्या अल्ट्रा-फिल्ट्रेशन भी शुगर सिरप को प्रयोगशालाओं की जांच से पास करवा देता है। यदि हां, तो कैसे?
अंत में हमारे पास इस सवाल का जवाब अब भी नहीं है कि तकनीक कैसे चावल और गन्ने जैसे पौधों से शुगर बनाती है जिसमें शुगर के चारित्रिक गुणों को छुपा लिया जाता है ताकि वे प्रयोगशालाओं की जांच में पहचाने न जा सकें। कोई नहीं जानता और न ही कोई बताने की इच्छा रखता है।
मिलावट का भारतीय तरीका
भारत में भी शहद में मिलाए जाने वाले सिरप को बनाने का काम शुरू हो चुका है
- हमने उत्तराखंड के जसपुर में एक फैक्टरी पता लगाई जो शहद में मिलाने वाले सिरप को बनाती है
- हमें यह भी पता चला कि इसका कोडवर्ड है “ऑल पास सिरप”
- हमने फैक्टरी से संपर्क साधा और इस “ऑल पास सिरप” का एक नमूना प्राप्त किया
- फैक्टरी के मालिक ने बताया कि यह नमूना शहद की शुद्धता के सभी परीक्षणों को पास कर लेगा

जसपुर उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले में हिमालय की तलहटी में एक छोटी सी नगरपालिका है। भले ही इस क्षेत्र का मुख्य व्यवसाय कृषि है, लेकिन कुछ मुट्ठी भर कृषि-प्रसंस्करण इकाइयां हाल के वर्षों में यहां विकसित हुई हैं। हालांकि यह असामान्य नहीं है। मधुमक्खी पालन करने वालों ने हमसे कई बार कहा है कि उनकी समस्या की जड़ कम कीमत पर बिकने वाला मिलावटी शहद है। उनसे हुई बातचीत में जसपुर का नाम कई बार निकलकर आया।
आयात डेटाबेस से मिले सुराग भी जसपुर की ओर इशारा कर रहे थे। उसमें कुछ कंपनियों और उनके मालिकों के नाम थे, जिन्होंने चीन से फ्रुक्टोज सिरप का आयात किया था। ये सभी वैध खाद्य प्रसंस्करण व्यवसाय थे। लेकिन क्या अब ये कंपनियां भारत में संशोधित सिरप बना रही हैं? इसकी पड़ताल के लिए हमने डेटाबेस से मिले सुराग का पीछा करने का फैसला किया और कुछ नंबर डायल किए।
मधुमक्खी पालकों ने हमें पहले ही बता दिया था कि शहद को मिलावटी बनाने के लिए जिस सिरप का इस्तेमाल किया जाता है, उसे “ऑल पास सिरप” कहा जाता है। यह किसी की कल्पना में नहीं है कि ये सिरप वही हैं जो सभी भारतीय परीक्षण से पास हैं। हमने इनमें से एक कंपनी के मालिक से बात की (डाउन टू अर्थ के पास कंपनी और मालिक का विवरण है और प्राधिकरणों के पूछे जाने पर इसे उपलब्ध कराया जाएगा)। कुछ बातचीत के बाद उसने हमें बताया कि उन्होंने वास्तव में ऐसे “ऑल पास सिरप” बनाए हैं और हम इसे उनसे खरीद सकते हैं। इसके बाद 23 अक्टूबर, 2020 का दिन मुलाकात के लिए तय किया गया।

हमने तय तारीख पर ही मुलाकात के लिए जसपुर की यात्रा की। हमने उनसे कहा कि हमें कम लागत वाली जादुई सिरप की जरूरत है जो सी3 और सी4 परीक्षणों को पास कर सके। हमें पता चला कि फैक्टरी ने सिरप, चावल और अन्य बहुत से उत्पादों से बनाया है और ये प्रभावशाली हैं। इन उत्पादों में सोर्बिटोल, तरल ग्लूकोज, इनवर्ट शुगर, राइस प्रोटीन और अंत में (लेकिन सार्वजनिक रूप से नहीं कहा गया) उच्च फ्रुक्टोज सिरप शामिल थे जो शहद के रूप में पास हो सकते हैं। हमने 50 टन एफ48 या एफ55 सिरप की मांग की, लेकिन हम पहले इनका नमूना चाहते थे। हम इन नमूनों को प्रयोगशाला में भेजकर यह देखना चाहते थे कि ये सी3 और सी4 परीक्षण में पास होते हैं या नहीं।
हमें “ऑल पास सिरप” के नमूने मुफ्त में दिए गए। फैक्टरी के मालिक ने हमें कहा कि जब आगे ये सिरप खरीदे जाएंगे तो इसकी बिलिंग “शहद” के रूप मंे होगी। यह कंपनी की चालाकी थी। अगर कंपनी पकड़ी जाती है तो केवल यह कहकर आरोपों को खारिज कर देगी कि हमें शहद बेचा गया था और यह “ऑल पास सिरप” नहीं थे। आधिकारिक घोषणा में भी ऐसा कुछ नहीं था। कीमत और हमारी बातचीत ही तथ्य है।
हम फिर सिरप के नमूने के साथ दिल्ली लौट आए। हमें बताया गया था कि यह एनएमआर को छोड़कर सभी भारतीय परीक्षण पास कर लेगा।
बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में कम से कम आधा दर्जन ऐसी फैक्टरियां हैं जो “ऑल पास सिरप” बना रही हैं। यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इन संशोधित सिरप को बनाने के लिए किस तकनीक का उपयोग किया जाता है। दबी जुबान में यह तकनीक चाइनीज बताई जा रही है।
लेकिन यह स्पष्ट है कि भारतीय मधुमक्खी पालक इस सिरप के कारोबार से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। उत्पादन की उनकी न्यूनतम लागत 100 रुपए प्रति किलोग्राम से अधिक है। जिस शहद को हम खाते हैं यदि उसमें 50 प्रतिशत भी सिरप मिला जाए यह शहद के कारोबार की रीढ़ तोड़ देगा। स्वास्थ्य की तो बात ही मत कीजिए।
जब हमने चाइनीज और भारतीय सिरप की मिलावट की
अगर ये नमूने शुद्धता के परीक्षणों को पास कर लेते हैं तो पता चलेगा कि ये सिरप वाकई कारगर हैं
- हमने शुद्ध शहद के नमूनों में मिलावट की
- चीनी और भारतीय “ऑल पास सिरप” की 25 प्रतिशत, 50 प्रतिशत और 75 प्रतिशत मिलावट की
- ये नमूने जांच के लिए प्रयोगशाला में भेजे गए
- 25 प्रतिशत और 50 प्रतिशत शुगर की मिलावट वाले नमूने शुद्धता के परीक्षण मंे पास हो गए
- हम कह सकते हैं कि एफएसएसएआई के 2020 के शहद मानकों को भी ये शुगर सिरप बाईपास कर सकते हैं

अब हम तक चीन और भारत के “ऑल पास सिरप” के नमूने पहुंच चुके थे। अब सवाल यह था कि क्या ये सिरप कंपनियों के दावे के अनुसार, प्रयोगशाला के परीक्षण पास कर पाएंगे? हमने कच्ची और भारतीय प्रयोगशाला में पास हो चुकी शहद में इन बोतलों का सिरप मिलाया, फिर जांच के लिए प्रयोगशाला में भेज दिया।
अगर एडेड शुगर वाले सिरप के नमूने परीक्षण पास कर लेते हैं तो इसकी बात की पुष्टि हो जाएगी कि मिलावटी शहद भी सी3 और सी4 परीक्षण पास कर सकती है।
सबसे मुश्किल काम था कच्ची शहद लाना जिसमें कोई मिलावट न हो। हम यह शहद सीधे स्रोत से लाना चाहते थे, इसलिए हमने राजस्थान के भरतपुर की यात्रा की। वहां हमारी मुलाकात 42 साल के मधुमक्खी पालक ओम प्रकाश से हुई। उनके पास मधुमक्खी के 1,400 बॉक्स और कच्ची शहद को रखने के लिए भंडारण की व्यवस्था थी। ओम प्रकाश ने हमें बताया कि वह जानते हैं कि शहर में चीनी से बने सिरप मिलाए जा रहे हैं और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इससे शहद के दाम गिर गए हैं और उनके लिए व्यापार को जारी रखना मुश्किल हो रहा है। इसके बाद उन्होंने हमें एक बोतल कच्ची और गैर प्रसंस्कृत शहद दी। उनका कहना था कि उनकी मधुमक्खियों ने जैसलमेर में बेर (जिजिफस मॉरिटानिया) के फूलों का रस चूसकर यह शहद बनाया है।

इसके बाद हम नमूना लेकर दिल्ली आ गए और सीएसई की पर्यावरण निगरानी लैब के वैज्ञानिकों ने कच्चे शहद और ब्रांडेड शहद में सिरप मिलाया। इस प्रकार कच्ची और गैर मिलावटी शहद को वैज्ञानिक उपकरणों व प्रक्रिया के तहत व्यवस्थित तरीके से अलग-अलग अनुपात में भारतीय और चाइनीज सिरप में मिलाया गया। हमने दो प्रकार की शहद और तीन प्रकार के सिरप का इस्तेमाल करके छह अनुपात तैयार किए।
हमने एक कच्ची शहद में भारतीय और चाइनीज सिरप 25 और 50 प्रतिशत के अनुपात में मिलाया। हम देखना चाहते थे कि कितनी मिलावट परीक्षण पास कर सकती है, इसलिए हमने 75 प्रतिशत चाइनीज सिरप में एक नमूना मिलाया। ब्रांडेड शहद में हमने 25 और 50 प्रतिशत चाइनीज नमूनों की मिलावट की। हमने कच्ची शहद को कंट्रोल सैंपल के रूप में भेज दिया।
इसके बाद हमने भारतीय नियमानुसार, इन मिलावटी शहद के नमूनों को जांच के लिए गुजरात स्थित नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड के सेंटर फॉर एनेलिसिस एंड लर्निंग इन लाइवस्टोक एंड फूड (सीएएलएफ) की प्रयोगशाला में भेज दिया। जांच के नतीजों में हमारा डर सच साबित हुआ।
सभी नमूने (एक को छोड़कर, जिसे हमने 75 प्रतिशत मिलावट की थी) जांच में पास हो गए। ये नमूने सी3 और C4 टेस्ट में पास हो गए। यहां तक कि विदेशी ओलिगोसेकेराइड टेस्ट पर भी ये खरे उतरे।
इससे साबित होता है कि भारतीय और चाइनीज सिरप विदेशी शुगर को छिपाने में प्रभावी थे और 50 फीसदी तक की मिलावट पकड़ में नहीं आती। दूसरे शब्दों में कहें तो अब इसमें कोई रहस्य नहीं है। चाइनीज और अब भारतीय कंपनियों के पास शुगर सिरप को संशोधित करने की तकनीक है ताकि इसे परीक्षणों में छिपाया जा सके। हम यह भी जानते हैं कि 50 प्रतिशत तक मिलावट वाले नमूने आसानी से परीक्षण पास कर सकते हैं। या शायद इससे भी ज्यादा।
यह भी तथ्य है कि 75 प्रतिशत वाला नमूना विफल रहा। इससे हमें पता चलता है कि प्रयोगशाला ने पूरी देखभाल और पेशेवर तरीके से परीक्षण किया था। वह प्रयोगशाला नहीं थी जिसने नमूनों को पास नहीं किया बल्कि शहद पास हुई थी क्योंकि मिलावट पकड़ में नहीं आई।
मिलावट के इस परिष्कृत तरीके का हमारे स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। प्रकृति के आश्चर्य यानी शहद के बजाय हम शुगर का उपभोग कर रहे हैं। शहद में शुगर की यह मात्रा 50 प्रतिशत या अधिक हो सकती है। यह हमारे स्वास्थ्य के लिए बुरा है, इसमें कोई संदेह ही नहीं है।

शहद के छोटे-बड़े ब्रांड का जब प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया...
भारतीय मानकों पर पास हुई शहद जब संशोधित शुगर का पता लगाने वाले उपकरणों पर परखी गई तो फेल हो गई
- 13 बड़े और छोटे शहद के ब्रांड का चयन किया गया
- अधिकांश बड़े शहद ब्रांड ने भारतीय मानकों पर प्रयोगशाला के परीक्षणों को पास कर लिया
- भारत की प्रयोगशाला इन बड़े ब्रांड में सी3 और सी4 शुगर की मिलावट का पता नहीं लगा पाई
- हालांकि अधिकांश छोटे ब्रांड भारतीय मानकों पर प्रयोगशाला के परीक्षणों को पास नहीं कर पाए
- शहद में सी4 शुगर की मिलावट सबसे सामान्य थी
- लेकिन जब इन सभी नमूनों को उन्नत परीक्षण के लिए जर्मनी भेजा गया, तब तस्वीर बदल गई
- भारत में पास हो चुके बहुत से नमूने ट्रेस मार्कर फॉर राइस (टीएमआर) परीक्षण में फेल हो गए
- लगभग सभी नमूने न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कॉपी (एनएमआर) परीक्षण में फेल हो गए। प्रयोगशाला के अनुसार, इससे मिलावट/शुगर सिरप का संकेत मिलता है
- 13 ब्रांड में केवल 3 ब्रांड ही पास हो पाए
- 22 नमूनों में से केवल 5 नमूने ही परीक्षण में पास हो सके। अन्य सभी मिलावटी पाए गए
अब हमारे लिए यह जानना जरूरी था कि जिस शहद को हम खा रहे हैं उसमें किस चीज की और कितनी मात्रा में मिलावट की जा रही है। अगस्त 2020 में हमने शहद के आठ ब्रांड के सैंपल एकत्र किए जो दिल्ली के आसपास की दुकानों में उपलब्ध थे और जिनके विज्ञापन भी देखने को मिलते हैं। इन नमूनों को गुजरात स्थित नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के सेंटर फॉर एनालिसिस एंड लर्निंग इन लाइवस्टॉक एंड फूड (सीएएलएफ) में परीक्षण के लिए भेजा गया। इस प्रयोगशाला में एफएसएसएआई द्वारा निर्धारित सभी मापदंडों के तहत शहद के परीक्षण की सुविधा है। हमने नमूनों का 2020 शहद गुणवत्ता मानकों के अनुसार सी4 और सी3 शुगर, फॉरेन ओलिगोसेकेराइड्स और स्पेसिफिक राइस मार्कर (एसएसआर) के लिए परीक्षण करवाया।
शहद की शुद्धता का परीक्षण सीधा-सीधा नहीं है। जांच के लिए प्रयोगशाला विभिन्न तरीकों का उपयोग करती है। लेकिन यह स्पष्ट है कि अगर नमूना किसी भी पैरामीटर पर विफल होता है तो शहद को मिलावटी माना जाता है (देखें “शहद में शुगर के लिए परीक्षण पद्धति”, पेज 44)।
परीक्षण के नतीजे
जब परिणाम आए तो सभी नमूने सी4 और सी3 परीक्षण पर खरे उतरे। केवल एक ब्रांड “एपिस हिमालय हनी” फॉरेन ऑलिगोसेकेराइड्स और एसएमआर परीक्षण में विफल रहा जो बताता है कि शायद इस शहद में राइस सिरप की मिलावट हो।
ये परीक्षण बताते हैं कि जो शहद हम खाते हैं, अगर वह एफएसएसएआई द्वारा निर्धारित मानकों पर खरा उतरेंगे तो माना जाएगा कि उनमें विशेष मिलावट नहीं है।
हमने कुछ और ब्रांड को परीक्षण की कसौटी पर परखा। इस बार हमने पांच अन्य छोटे बड़े ब्रांड का परीक्षण करवाया। इन्हें भी गुजरात की प्रयोगशाला में भेजा गया और पहले वाले पैरामीटर पर जांचा गया।
इस बार परिणामों में विविधता थी। पांच में से तीन शहद के नमूनों में मिलावट के सबूत थे।
इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि हमने शहद के जिन नमूनों का परीक्षण किया, उसमें बहुत भिन्नता है।
एपिस हिमालय को छोड़कर, बाकी बड़ी ब्रांड वैल्यू और मार्केट शेयर वाली सभी कंपनियों ने सी3 और सी4 शुगर टेस्ट पास कर लिए।
छोटे शहद ब्रांडों में से तीन-ददेव, हाय हनी और सोयाइटे नैचुरेले- सी4 परीक्षण में और आइसोटोप परीक्षण पर विफल रहे।
हालांकि, ये विदेशी ओलिगोसेकेराइड और चावल के लिए विशिष्ट मार्कर (एसएमआर) टेस्ट में पास हुए। इससे यह पता चलता है कि नमूने मिलावटी थे पर मिलावट के लिए राइस सिरप या सी3 प्लांट सिरप का प्रयोग नहीं किया गया है। इनमें साधारण गन्ने की चीनी इस्तेमाल की गई थी। ददेव और हाय हनी में 20 और 27 प्रतिशत सी4 शुगर था, जबकि सीमा 7 प्रतिशत है।
ददेव, इंडीजीनियस, हाय हनी और सोसाइटे नैचुरेले के नमूनों को अनप्रोसेस्ड शहद के रूप में बेचा जाता है और चिंताजनक है कि इन चार में से तीन के नमूने मिलावटी पाए गए।
बात यहीं खत्म नहीं होती हम इस बात से संतुष्ट नहीं थे कि जो शहद हमें बेचा जाता है और जिसे हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए खाते हैं, वह मिलावटी नहीं है।
अब तक की हमारी जांच में निम्न बातों की जानकारी मिली:
- चीन की कंपनियां अपने ऑनलाइन ट्रेडिंग वेबसाइट पर विज्ञापन में दावा करती हैं कि उनके पास ऐसे शुगर सिरप हैं जो सी3/सी4 परीक्षण पास करेंगे। हमने इन कंपनियों से संपर्क भी किया और इस शुगर सिरप के नमूने भी खरीदे।
- हमें एक भारतीय कंपनी भी मिली जो “ऑल पास सिरप” बेच रही थी और दावा करती है कि यह एफएसएसएआई के अनिवार्य परीक्षणों को पास करेगी।
- हमने ऑल पास चाइनीज और भारतीय सिरप के नमूने खरीदे और इनसे शहद के नमूनों को स्पाइक किया पर प्रयोगशाला इनका पता नहीं लगा पाई। अब हमें विश्वास हो गया कि इस तरह के सिरप मौजूद थे जो प्राकृतिक शहद में की गई मिलावट को छुपा सकते हैं।
यह पक्की तरह से नहीं कहा जा सकता है कि जो शहद परीक्षणों में पास हुआ था वह मिलावटी नहीं है। हमें इसकी पुष्टि की आवश्यकता थी।
इसके लिए हमने फिर उसी बैच के नमूनों को लिया और उन्हें एनएमआर स्पेक्ट्रोस्कोपी के द्वारा टेस्ट करने का फैसला किया। यह टेस्ट मिलावट का पता लगाने के लिए स्वर्णिम मानक माना जाता है। भारत सरकार ने शहद के निर्यात के लिए इस परीक्षण को पहले ही अनिवार्य कर दिया था। साथ ही, डाबर और सफोला जैसी बड़ी कंपनियां उपभोक्ताओं को बता रही थीं कि वे अपने उत्पादों को एनएमआर प्रमाणित कर रही हैं।
हमारी रिसर्च बताती है कि दुनियाभर में सरकारों द्वारा शहद में सी3/ सी4 मिलावट का पता लगाने के लिए यह तकनीक उपयोग की जा रही थी। हमने भारत में ऐसी प्रयोगशाला खोजना शुरू किया जो हमारे लिए यह परीक्षण कर सके। लेकिन यहां केवल एक ही प्रयोगशाला के पास यह तकनीक है। मुंबई के पास स्थित एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल (ईआईसी) की यह प्रयोगशाला हमारे लिए उपलब्ध नहीं थी।
बहुत खोज के बाद हमें जर्मनी में एक प्रयोगशाला मिली जो इस तकनीक के उपयोग से शहद की मिलावट का परीक्षण करती है। हमने वहां नमूने भेजने का फैसला किया। हमने इस जर्मन खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला के भारतीय यूनिट से संपर्क किया और उन्होंने नमूने लेना स्वीकार किया। इसके बाद परीक्षण के लिए नमूनों को जर्मनी भेजा गया। हमने उन्हीं 13 ब्रांडों का एक बैच तैयार कर भेजा जिसे हमने भारत में टेस्ट किया था।
साथ में हमने डाबर और सफोला के अलग-अलग बैचों के दो और नमूनों को जोड़ा जिससे हम कंपनी के इस दावे को परख सकें कि वह अपने उत्पाद के प्रत्येक बैच को एनएमआर से टेस्ट करती हैं। इस तरह हमने 17 नमूनों को जर्मनी भेजा।
जब परिणाम आए तो हमने एक और बैच तैयार किया जिसमें हमने प्रमुख कंपनियों के अतिरिक्त नमूने भेजने का फैसला किया। ये नमूने पहले दौर के एनएमआर में विफल रहे थे पर हम उन्हें एक और मौका देना चाहते थे और एक बार और पुष्टि करना चाहते थे। ये कंपनियां थीं पतंजलि, बैद्यनाथ, झंडू, नेचर्स नेक्टर और इंडीजीनस।
इस तरह से हमने कुल 22 नमूने जर्मनी भेजे।
जर्मनी की प्रयोगशाला को बताया गया था कि नमूनों का स्रोत भारत है और नॉन ईयू कॉम्पलांयस के लिए नमूनों की जांच की जानी है। दूसरे शब्दों में कहें तो शहद के नमूनों की जांच यूरोपीय यूनियन के बाहर निर्धारित हल्के मापदंडों पर की जानी थी।
सभी शहद के नमूनों का परीक्षण निम्नलिखित पैरामीटर्स के लिए किया गया था:
- ट्रेस मार्कर फॉर राइस (टीएमआर)- इस पैरामीटर को एफएसएसएआई द्वारा 2020 में बनाए गए मानक में हटा दिया गया था, लेकिन राइस सिरप की उपस्थिति को एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
- न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी (एनएमआर)– इसका उपयोग सी3/ सी4 टेस्ट पास करने के लिए डिजाइन की गई शुगर सिरप द्वारा मिलावट का निर्धारण करने के लिए किया जाएगा।
परिणाम हमने जो पाया वह चौंकाने वाला था।
- डाबर शहद ने सी3 और सी4 शुगर का परीक्षण पास किया लेकिन तीनों नमूने एनएमआर टेस्ट में विफल हुए। एक नमूना टीएमआर पर भी विफल रहा।
- पतंजलि शहद सी3 और सी4 शुगर परीक्षण में पास हुई लेकिन दोनों नमूने टीएमआर और एनएमआर परीक्षण में विफल हुए।
- एपिस हिमालय हनी फॉरेन ओलिगोसेकेराइड और एनएमआर (भारत में किया गया) में विफल रहा और टीएमआर व एनएमआर परीक्षण में भी विफल रहा।
- बैद्यनाथ शहद ने सी3 और सी4 शुगर के परीक्षण पास किए लेकिन एनएमआर पर विफल रहे। एक नमूना टीएमआर पर भी विफल रहा।
- झंडु शहद ने सी3 और सी4 शुगर और टीएमआर के परीक्षण पास किए लेकिन एनएमआर पर विफल रहा।
- नेचर्स नेक्टर ने सी3 और सी4 शुगर के लिए परीक्षण पास किए पर एक नमूना एनएमआर में विफल रहा और एक नमूना एनएमआर पास हुआ।
- हितकारी ने सी3 और सी4 शुगर के टेस्ट पास किए लेकिन टीएमआर और एनएमआर पर विफल रहे।
- सफोला शहद ने सी3 और सी4 शुगर परीक्षण पास किया और टीएमआर व एनएमआर टेस्ट भी पास किए।
- मार्कफेड सोहना ने सी3 और सी4 शुगर परीक्षण पास किए और टीएमआर व एनएमआर परीक्षण भी पास किए।
- ददेव फॉरेस्ट शहद सी4 शुगर और एनएमआर परीक्षण में विफल रहा। यह टीएमआर परीक्षण पर पास हुआ।
- इंडीजीनस शहद ने सी3 और सी4 शुगर और टीएमआर परीक्षण पास किया लेकिन एनएमआर पर विफल रहा।
- हाय हनी सी4 और एनएमआर परीक्षण पर विफल रहा। यह टीएमआर परीक्षण पर पास हुआ।
- सोसाइटे नेचुरेले शहद सी4 परीक्षण में विफल रहा जबकि टीएमआर और एनएमआर परीक्षण में पास हुआ।
क्या पता चला
- 13 ब्रांडों में से तीन ब्रांड- सफोला, मार्कफेड सोहना और नेचर्स नेक्टर (1 नमूना)- ने एनएमआर सहित सभी परीक्षणों को पास किया।
- 22 नमूनों में से केवल 5 बोतलें ही एनएमआर पास करती हैं, 76 प्रतिशत नमूने एनएमआर परीक्षण में विफल रहे।
- दो ब्रांड- ददेव और हाय हनी- सी4 शुगर सिरप टेस्ट में फेल हुए जिससे यह पता चलता है कि उनकी मिलावट “बेसिक” थी, इसमें संशोधित शुगर सिरप का उपयोग नहीं किया गया।


शहद में शुगर के लिए परीक्षण पद्धति

आइसोटोप परीक्षण (सभी तीन डेल्टा परीक्षण-अधिकतम, p-h, fru-glu) सी4 और सी3 शर्करा की गणना करने के लिए किया जाता है। इसमें उपयोग की जाने वाली विधि शुगर को निर्धारित करने के लिए आइसोटोप रेशियो मास स्पेक्ट्रोमेट्री (आईआरएमएस) है लेकिन छोटे रूपांतर के बाद। सी4 शुगर विश्लेषण के लिए प्रयोगशालाएं एलिमेंटल एनेलिसिस (ईएस) करती हैं और सी3 शुगर के लिए वे लिक्विड क्रोमेटोग्राफी (एलसी) का उपयोग करती हैं। लेकिन यह शुगर की मौजूदगी का टेस्ट है और केवल सी4 शुगर को मात्रा पता की जा सकती है। यह इसलिए है क्योंकि मकई के कार्बन 12,13 रेशियो के शुद्ध मानक उपलब्ध हैं। शहद की शुद्धता की जांच के लिए एफएसएसएआई 2020 मानक आइसोटोप परीक्षण पर आधारित है।
विदेशी ओलिगोसेकेराइड की जांच के लिए स्टार्च-आधारित शर्करा (यानी चावल, गेहूं, मकई के पॉलिसेकराइड) की जांच की जाती है। यह मकई या चावल से निकली स्टार्च-आधारित शुगर से संबंधित है। इसलिए, यदि कोई नमूना विदेशी ओलिगोसेकेराइड के टेस्ट पर विफल रहता है, तो इसका मतलब होगा कि सी3 या सी4 (स्टार्च-आधारित) शुगर द्वारा मिलावट की गई है। इसलिए, गन्ने या चुकंदर से बनी स्टार्च-आधारित नहीं है और इसका इस परीक्षण में पता नहीं लगाया जाएगा।
चावल सिरप से मिलावट की पहचान के लिए दो मार्कर हैं। ये हैं स्पेसिफिक मार्कर फॉर राइस (एसएमआर) यानी 2-एएफजीपी और ट्रेस मार्कर फॉर राइस (टीएमआर)। मार्कर की उपस्थिति से पता चलता है कि नमूने में चावल के सिरप (सी3 शुगर) की मिलावट है।
शुगर की प्रकृति जटिल है और विभिन्न प्रकार की शुगर परस्पर प्रभाव डालती है, इसलिए एक साथ जांच की आवश्यकता पड़ती है। यदि कोई नमूना उपरोक्त परीक्षणों में विफल रहता है तो यह दिखाता है कि यह सी3 या सी4 शुगर द्वारा मिलावटी है। यदि नमूना एमएमआर और टीएमआर पर विफल रहता है, तो हम जानते हैं कि शुगर का स्रोत चावल का सिरप है।
परिणाम के निष्कर्ष
इन परिणामों के साथ हमारी जांच पूरी हुई। हमने जब पहली बार सुना था कि शुगर सिरप के साथ शहद की मिलावट की वजह से मधुमक्खी पालकों की आजीविका को खतरा है, तब से अब तक के हर बिंदु को जोड़कर हमें एक कहानी मिली।
अब हम निश्चितता के साथ यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हम जो शहद खाते हैं वह ज्यादातर मिलावटी है। शीर्ष 13 ब्रांडों में से केवल 3 ऐसे हैं जिन्हें मिलावटी नहीं कहा जा सकता।
शहद में मिलावट सोची समझी है। इसमें “संशोधित” शुगर सिरप का इस प्रकार उपयोग होता है जिससे ये अनिवार्य प्रयोगशाला परीक्षणों में पकड़ में नहीं आते।
यह सिरप चीन से आयात किए जाते हैं और अब भारत में भी निर्मित होते हैं। कंपनियों का दावा है कि 80 प्रतिशत तक शहद में मिलावट नहीं पकड़ी जा सकती। हमारे परीक्षणों से पुष्टि होती है कि 50 प्रतिशत तक की मिलावट तो निश्चित रूप से संभव है और यह प्रयोगशाला जांच में नहीं पकड़ी जाएगी। इसलिए, शहद की बोतल में शुगर सिरप के साथ मिलावट की मात्रा 50 फीसदी या उससे भी अधिक हो सकती है।
हम यह भी जानते हैं कि इस तरह की मिलावट कंपनियों के लिए फायदेमंद है। असली शहद की लागत की तुलना में इसका उपयोग सस्ता है। यह सिर्फ 60 रुपए प्रति किलोग्राम में मिलती है वहीं मधुमक्खी पालकों को बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए 120 रुपए प्रति किलोग्राम की लागत लगती है। मिलावट मिलावट आसान भी है। सिरप को थोक में खरीदा जा सकता है और धड़ाधड़ बिकने वाले शहद में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें उस आपूर्ति श्रृंखला की भी जरूरत नहीं होती। हमें पता है कि शहद प्रकृति की देन है और मधुमक्खी पालन करने वाले फूलों की तलाश में जगह-जगह जाते हैं। मधुमक्खियां जब चूसती हैं, तब हमें शहद की अच्छाई प्राप्त होती है।
शुगर सिरप का प्रयोग करके कंपनी को मधुमक्खी पालकों के साथ काम करने की आवश्यकता नहीं होती और न ही मधुमक्खी पालक को मधुमक्खियों और मौसमी फूलों की तलाश में भटकना पड़ता है।
हम जानते हैं कि मिलावट का कारोबार भी समय के साथ विकसित हुआ है। मिलावट में पहले सिर्फ गन्ने के रस से बनी साधारण शुगर का प्रयोग किया जाता था, फिर चावल की सी3 शुगर प्रयोग की गई और अब संशोधित शुगर प्रयोग में लाई जा रही है जो लैब परीक्षणों को भी पास कर सकती है। हम जिन बड़े ब्रांड का शहद खा रहे हैं, वे पहले ही संशोधित शुगर मंे महारथ हासिल कर चुके हैं। ये बड़े ब्रांड एफएसएसएआई के 2018 व 2020 के मानकों को पास कर रहे हैं। एनएमआर तकनीक इस संशोधित शुगर की जांच का एकमात्र तरीका है।
परीक्षणों से पता चलता है कि 77 प्रतिशत शहद मिलावटी है। जर्मन प्रयोगशाला ने एनएमआर में फेल होने वाले नमूनों की विश्लेषण रिपोर्ट में कहा है, “यह शुगर सिरप की मिलावट” दर्शाता है।
यह भी स्पष्ट है कि यह शहद की मिलावट की कहानी का अंत नहीं है। बहुत जल्द बाजार में एक और मिलावट होगी। इस बार यह एनएमआर टेस्ट भी पास कर लेगी। इसलिए, हमें इस शुगर युक्त शहद के हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव को समझने की आवश्यकता है। यह हमारे शरीर, हमारे स्वास्थ्य से जुड़ी है और कोविड-19 के समय में इसका दोहरा-तिहरा खतरा है।
इम्यूनिटी बढ़ेगी या बदतर होगी?
शहद को कौन-सी खूबियां विशेष बनाती हैं और शहद मंे शुगर से की गई मिलावट क्यों बुरी है?
- शहद भी शुगर है लेकिन यह विशेष है, इसमें प्रकृति की बहुत-सी खूबिया हैं
- कोविड-19 के समय में हम इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक शहद का सेवन कर रहे हैं
- ओवरवेट लोगों को कोविड-19 का खतरा अधिक है
- इसलिए शुगर से मिलावट वाली शहद खाकर हम पर बीमारी का खतरा और बढ़ जाएगा
उपभोक्ता के रूप में हमारे मन में एक सहज सवाल यह उठता है कि जो शहद हम खा रहे हैं, अगर उसमें शुगर है तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें कुछ बिंदुओं पर गौर करने की जरूरत है।
सबसे पहले, शहद का विशेष गुण क्या है जो इसे शुगर से अलग करता है? दूसरा अगर शहद में शुगर मिल जाए तो इससे हमारा स्वास्थ्य कैसे प्रभावित होगा? कोविड-19 के समय में इसके क्या निहितार्थ हैं?
आज हम यह भी जानते हैं कि शहद ब्रांड अपने उत्पादों को इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में बेच रहे हैं। कहा जा रहा है कि कोविड-19 से लड़ने में यह मददगार है। हम यह भी जानते हैं कि हम अधिक शहद खा रहे हैं। महामारी की शुरुआत में ही मार्च में बाजार विश्लेषक नीलसन ने बताया था कि इस अच्छाई से भरे हुए उत्पाद की बिक्री में काफी उछाल आया है। शहद की बिक्री में 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। तब से यह माना जा रहा था कि हममें से अधिकांश लोग शहद के गुणों के कारण इसका सेवन कर रहे हैं। जब हमें पता चला कि वायरस से सुरक्षा में यह मददगार है तो हम आवश्यक रूप से इसका सेवन कर रहे हैं (देखें “मधुमक्खियों की...”)।
कैसे अलग है शहद
शहद भी शुगर लेकिन यह खास है। एक चम्मच शहद (21 ग्राम) में शुगर की तुलना में थोड़ी अधिक कैलोरी होती है। इसमें मुख्य रूप से शुगर कार्बोहाइड्रेट होता है जो असल में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज है। लेकिन शहद की “शुगर” गुणकारी हो जाती है। यह मधुमक्खियों द्वारा पौधों के मकरंद को इकट्ठा करने और छत्ते में उसे बनाने के अद्भुत तरीके के कारण है। मधुमक्खियां पराग का सेवन करती हैं, उसे पचाती हैं और उगलती हैं। इस तरह शहद गुणकारी बन जाता है। इसके बाद शहद शुगर नहीं बल्कि एंजाइम, अमीनो एसिड, फेनोलिक यौगिक जैसे फ्लेवोनोइड, खनिज और अन्य फाइटोकेमिकल्स बन जाता है। ये शहद को एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी, सूजन-जलन में राहत पहुंचाने वाले गुणों से युक्त कर देते हैं। वैज्ञानिक इस बात की पुष्टि कर चुके हैं शहद हमारे इम्यून सिस्टम के लिए अच्छा है और इससे हमारा भला होता है।

यही कारण है कि गर्म पानी में शहद के साथ अपना दिन शुरू करने की सलाह दी जाती है। यह हमें ऑक्सीडेटिव तनाव को प्रबंधित करने की क्षमता प्रदान करता है जो जीवन शैली, आहार और पर्यावरणीय तनाव से उत्पन्न होता है। ऑक्सीडेटिव तनाव कोशिकीय पतन का कारण है जो उम्र बढ़ने के साथ-साथ चयापचय और हृदय रोगों जैसे कई पुरानी बीमारियों का कारण बनता है। इसके अलावा, शहद आंत के स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा माना जाता है।
शुगर का स्वास्थ्य पर असर
अब अपने दिन की शुरुआत शुगर सिरप के सेवन से करने की कल्पना करें। अगर आप जिस शहद का सेवन कर रहे हैं, उसमें 50 प्रतिशत भी शुगर सिरप मिला हुआ है, तो इसका मतलब है कि आपको बिना किसी लाभ के खाली कैलोरी मिल रही है। इससे फायदा नहीं केवल नुकसान पहुंचेगा।
अब कोविड-19 के दौरान इस पर विचार करें। यह जहर जैसा है। शुगर से हमें वह नहीं मिल रहा है जो हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा में सुधार करके वायरस से हमारी रक्षा करेगा। इससे भी बुरा यह है कि हम शहद का शुगर सिरप के साथ सेवन कर रहे हैं। यह हमारा वजन बढ़ाकर हमें खतरे में डाल देगा और हमें वायरस के प्रति और संवेदनशील बना देगा।
अमेरिका में सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने कहा है कि मध्यम से अधिक वजन वाले लोगों में गंभीर कोविड-19 संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। इस जोखिम के दायरे में बड़ी संख्या में वे लोग आ सकते हैं जिन्हें भले ही “मोटा” घोषित न किया गया हो लेकिन ओवरवेट हैं।
कोविड-19 महामारी के शुरुआती महीनों में यह स्पष्ट नहीं था कि वजन को बीमारी के जोखिम से क्यों जोड़ा गया है। लेकिन जैसे-जैसे महीने बीते यह रिश्ता स्पष्ट हो गया है। एक संबंध हमारे शरीर के वसा ऊतक के साथ भी है जिसे जैविक रूप से सक्रिय माना जाता है।
यह शरीर को बिना संक्रमित किए क्रोनिक सूजन व जलन की तीव्रता को बढ़ाने में मददगार है। इससे हमारे शरीर की इम्यूनिटी क्षीण और कोरोनावायरस के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है। इसके बाद पेट के मोटापे की समस्या होती है, जो फेफड़ों में दबाव को बढ़ाती है। अध्ययनों में मोटापे और कोविड-19 को दो समानांतर महामारियों के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि ये एक-दूसरे के साथ नकारात्मक व्यवहार करते हैं, जिससे बीमारी और गंभीर हो जाती है। दोनों महामारियां संयुक्त रूप से स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी बोझ डाल देती हैं।
इस तरह शुगर के साथ शहद का सेवन हम सभी को मोटापे के जाल में फंसा सकता है। वह भी ऐसे समय में जब मोटे लोगों में भारतीयों की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। हम यह भी जानते हैं कि मोटापा उच्च रक्तचाप, टाइप -2 मधुमेह और कई पुरानी बीमारियों को बढ़ाने में मददगार है। भारत दुनिया का “ओबिसिटी कैपिटल” बनने की राह पर है। पिछले एक दशक में ओवरवेट और मोटे लोगों की आबादी (15-49 आयुवर्ग) दोगुना हो गई है। शहरी क्षेत्रों की आबादी में लगभग एक तिहाई से अधिक ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त है।
ये सब स्थितियां समस्या को बेहद घातक बनाती हैं। इन दिनों हम शहद का सबसे अधिक सेवन कर रहे हैं ताकि कोविड-19 संक्रमण से लड़ सकें। लेकिन शुगर के साथ मिलावटी शहद हमें मजबूत नहीं बनाएगा। यह हमें कोविड-19 के प्रति और संवेदनशील बना देगा। यह पूरी तरह से गलत और अस्वीकार्य है।
मधुमक्खियों की जरूरत सिर्फ शहद के लिए नहीं
... बल्कि हमारे दैनिक आहार को तैयार करने के लिए मधुमक्खियों के बिना यह दुनिया बिना भोजन वाली दुनिया बनकर रह जाएगी। तथ्य यह है कि मधुमक्खियां केवल शहद ही नहीं बल्कि परागण की “सेवाएं” देने के लिए भी जरूरी हैं। मधुमक्खियां जैसे-जैसे एक से दूसरे पौधे की ओर बढ़ती हैं और फूलों का रस चूसती हैं, वे पराग भी फैलाती हैं।
पारिस्थितिकी तंत्र में उर्वरापन मधुमक्खियों पर निर्भर है। इसके अलावा मधुमक्खियां क्रॉस परागण के माध्यम से फसल की पैदावार बढ़ाती हैं। साथ ही साथ परागण और उसे स्थायी रखकर जंगली व फसली पौधों के जरिए जैव विविधता में भी वृद्धि करती हैं।
एफएओ का अनुमान है कि परागण करने वाले दुनिया के 35 प्रतिशत फसल उत्पादन को प्रभावित करते हैं, वहीं दुनियाभर में 87 प्रमुख खाद्य फसलों के आउटपुट को बढ़ाते हैं, साथ ही कई औषधीय पौधों को भी समृद्ध करते हैं।
इस तरह, मधुमक्खी पालक की आजीविका हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन से जुड़ी होती है। यदि मधुमक्खी पालक मिलावटी शहर के कारण अपने व्यवसाय से अलग हो जाता है तो हमारे भोजन पर ही खतरा मंडराने लगेगा। मधुमक्खी के बिना, हम शहद के गुणों के अलावा अपने पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता भी खो देंगे।
हमें शुद्ध शहद चाहिए
हमने मिलावट के कारोबार से पर्दा उठा दिया है। अब सरकार को चाहिए कि निर्णायक कार्रवाई करे। उद्योग को चाहिए कि जिम्मेदारी निभाए और उपभोक्ताओं को चाहिए कि शहद को समझें और परिवर्तन की आवाज बुलंद करें

शहद में मिलावट के कारोबार को जल्द से जल्द बंद करना बहुत जरूरी है। यह न केवल उपभोक्ता को बल्कि मधुमक्खी पालकों को भी फायदा पहुंचाएगा। अभी कृषि उत्पादकता और जैव विविधता को फिर से बहाल करने के लिए लंबा सफर तय करना है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि मधुमक्खी पालन केवल हमारे शहद से ही नहीं जुड़ा है, यह परागण करने वाली मधुमक्खियों की रक्षा से भी संबंधित है। इसके लिए सरकार, उद्योग और उपभोक्ताओं को ठोस कदम व आक्रामक कदम उठाने होंगे। इससे कम में काम नहीं चलेगा।
पहला कदम : चीन से सिरप और शहद का आयात बंद करें और इसे दूसरे देशों (सिरप लॉन्डरिंग) के माध्यम से भी आने से रोकें
पहला जरूरी कदम है कि चीन से आने वाले मिलावट के स्रोत और तमाम रूटों पर तत्काल रोक लगाई जाए। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को सभी प्रकार के सिरप और शहद के आयात को विनियमित करना चाहिए या इसे पूरी तरह रोकना चाहिए। विनियमन में व्यापारियों द्वारा इसके अंतिम उपयोग और शहद सेक्टर से इसके संबंध की घोषणा करनी होगी। मंत्रालय को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी सिरप और शहद उचित एचएस कोड के तहत आयात हों व ताजा डेटाबेस सार्वजनिक रहे। जरूरत पड़ने पर नए एचएस कोड बनाए जा सकते हैं।
हमारा अनुभव बताता है कि सरकारी एजेंसियां इस काले कारोबार पर अंकुश लगाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। हम देख चुके हैं कि एफएसएसएआई आयात की जांच में कैसे लड़खड़ाता है। उसे सिरप से होने वाली गड़बड़ियों की जानकारी मिली, फिर भी वह इनके अंतिम उपयोगकर्ता का पता नहीं लगा पाया। हम यह भी जानते हैं कि इस व्यवसाय का एक वैध चेहरा चीनी कंपनियों की वेबसाइटें हैं जो संशोधित सिरप का साइड बिजनेस घोषित नहीं करतीं। इस सिरप के आयातक यह कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि वे इसे लैब टेस्ट को बाईपास करने के लिए खरीद रहे हैं। वे बस यही कहेंगे कि फ्रुक्टोज या ग्लूकोज सिरप का आयात कर रहे हैं, जिनके शहद के अलावा भी कई औद्योगिक उपयोग हैं।
शहद के इस कारोबार की जड़ तक पहुंचना मुश्किल है। इसलिए, हमारी दलील है कि आयात ही बंद कर दिया जाए। इससे सफाई का काम शुरू हो जाएगा।
हालांकि, हम यह भी मानते हैं कि यह पर्याप्त नहीं होगा। चीनी तकनीक ने भारत में जड़ें जमा ली हैं। हमने एक ऐसी फैक्टरी भी खोज निकाली है जो “ऑल पास सिरप” बना सकती है। अन्य भी बहुत से लोग इस जुगत में होंगे। इसलिए, हमें और कदम उठाने की जरूरत है।
दूसरा कदम : सख्त मानकों, टेस्टिंग की मदद से निगरानी को मजबूत किया जाए। शहद बेचने वाली हर कंपनी के लिए शहद के स्रोत का पता लगाना अनिवार्य किया जाए, चाहे वह मधुमक्खी पालक हों या छत्ते।
नि:संदेह शहद उद्योग तर्क देगा कि वह कानून के दायरे में काम कर रहा है। बड़े ब्रांडों के अधिकांश शहद के नमूनों ने भारत में निर्धारित परीक्षणों को पास किया है। लेकिन उन्नत प्रयोगशाला की जांच बताती है कि इनमें मिलावट की गई है।
इसे जांचने के तीन तरीके हैं :
पहला, शहद के मानकों और परीक्षण की आवश्यकताओं को और सख्त किया जाए। इसके लिए एफएसएसएआई को ट्रेस मार्कर फॉर राइस सिरप (टीएमआर) परीक्षण को शामिल करना होगा। दुर्भाग्य से 2018 से 2020 के बीच के संशोधन मानक में इस मापदंड को हटा दिया गया है। न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस (एनएमआर) को अनिवार्य करना भी जरूरी है। निर्यात होने वाले शहद में इसका इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है।
वर्तमान में इन उपायों की सख्त करने की जरूरत है, बाद में इन्हें लागू करके सीमित नतीजे ही हासिल हो पाएंगे। हमने देखा है कि कैसे उद्योग मिलावट के नए-नए रास्ते ईजाद कर रहे हैं। यह खबर भी सुनने में आ रही है कि चीन की कंपनियों ने एनएमआर परीक्षण को मात देने वाले सिरप भी “डिजाइन” कर लिए हैं। जब तक एनएमआर अनिवार्य नहीं हो जाता, तब तक एनएमआर पास सिरप ही इस्तेमाल किए जाएं।
दूसरा तरीका है जांच और उसके आंकड़े सार्वजनिक करना। हमें लगता है कि इस तरीके को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। एफएसएसएआई को बाजार से नमूने खरीदने और जांच के नतीजे सार्वजनिक पटल पर रखने होंगे। साथ ही मिलावटी शहद बेचने व भ्रामक दावा करने वाली कंपनियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करनी होगी। अगर टीएमआर और एनएमआर को अनिवार्य नहीं किया जाता, तब आधिकारिक टेस्टिंग सिस्टम में इन्हें शामिल करना चाहिए। यह सार्वजनिक है और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए की जाती है।
तीसरा और बहुत जरूरी उपाय है खाद्य प्रणाली दृष्टिकोण। ऐसा करने के लिए शहद की आपूर्ति श्रृंखला में एक पारदर्शिता और सबकी पहुंच वाली प्रणाली की आवश्यकता है। सभी उत्पादकों को शहद के वानस्पतिक स्रोत के साथ उसके भौगोलिक स्थान को जानना होगा।
उपभोक्ताओं सहित सभी स्टेकहोल्डरों को इसकी जानकारी होनी चाहिए। आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े संग्रहकर्ता, व्यापारी, पैकर और विक्रेताओं आदि का रिकॉर्ड रखना चाहिए और यह निरीक्षण के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए। अगर प्रत्येक मधुमक्खी पालक पंजीकृत हो, प्रत्येक मधुमक्खी के बॉक्स में नंबर या कोड हो तो इसे संभव किया जा सकता है। तकनीक के माध्यम से इनकी लोकेशन पता लगाई जा सकती है। इसके अलावा सभी कंपनियों को शहद की ट्रेसेबिलिटी के लिए बाध्य किया जाए। साथ ही सरकार के पास एक ऐसा तंत्र होना चाहिए जो देश में मधुमक्खी पालकों द्वारा उत्पादित शहद को ट्रेस कर सके। इस मामले में हम सबसे कमजोर हैं। हमारे पास तो शहद उत्पादन का सटीक आंकड़ा भी नहीं है। ऐसा तब है जब कई सरकारी एजेंसियां इस व्यवसाय से जुड़ी हैं (देखें “शहद के उत्पादन से अनजान सरकार”)।
तीसरा कदम : हम उपभोक्ताओं को शहद को समझना होगा। हमें इस लायक बनना होगा कि स्वाद, रंग और गंध से मिलावट पता लगा सकें। हमें शुद्ध शहद की मांग करनी होगी, रिफाइंड शहद की नहीं जो कोई सिरप हो सकता है
उपभोक्ताओं की प्राथमिकताएं शहद के कारोबार को आकार दे रही हैं। हम साफ दिखने वाला तरल शहद पसंद करते हैं जो क्रिस्टलाइज न हो। हमारी लापरवाही से ही शहद में मिलावट का धंधा फलता-फूलता है। हमें जानना होगा कि जो शहद क्रिस्टलाइज नहीं होती, वह शुद्धता की गारंटी नहीं है। क्रिस्टलाइजेशन शहद में प्राकृतिक रूप से होता है, इसे फैक्टरी में प्रोसेसिंग के जरिए न्यूनतम कर दिया जाता है। हमारी गलत पसंद बड़ी कंपनियों को मदद पहुंचाती है। वे शहद में अल्ट्रा फिल्टर्ड रंगहीन सिरप बेधड़क मिलाती हैं। ऐसा करके ही बड़ी कंपनियां शहद बना रही हैं। अपनी नासमझी से हम खुद का ही नुकसान कर रहे हैं।
अब हमें बदलाव की मांग करनी होगी। हमें सरकार और उद्योग को जवाबदेह बनाना होगाा। हमें याद रखना होगा कि बहुत कुछ दाव पर लगा है। यह हमारे स्वास्थ्य के साथ हमारी खाद्य प्रणाली के स्वास्थ्य का भी मामला है। हमें समझना होगा कि मधुमक्खियों के बिना उत्पादकता नहीं रहेगी।
शहद के उत्पादन से अनजान सरकार
शहद के उत्पादों के आंकड़े कमजोर हैं, इसलिए नियमन भी कमजोर है
भारत में शहद का उत्पादन बढ़ाने और मधुमक्खी पालकों को आजीविका देने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड (एनबीबी) की है। बोर्ड कहता है कि 2018-19 में भारत में कुल शहद का उत्पादन 1,15,000 मीट्रिक टन था। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के डेटाबेस से पता चलता है कि भारत ने इस साल लगभग 67,500 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन किया। एनबीबी का अनुमान एफएओ के अनुमान से 1.7 गुना अधिक है। इतना अधिक अंतर आंकड़ों को जुटाने और उत्पादन गणना की मूलभूत समस्या की ओर इशारा करता है।
एनबीबी के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालने पर पता चलता है कि 2013-14 की तुलना में उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए 2007-08 में उत्पादन 62,000 मीट्रिक टन था जो 2012-13 में 72,300 मीट्रिक टन हो गया। इस दौरान वार्षिक वृद्धि दर 0-4.8 प्रतिशत थी। वहीं 2013-14 में 76,200 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। 2018-19 के लिए नवीनतम आंकड़े वार्षिक वृद्धि दर 5.3-11.1 प्रतिशत बताते हैं।
प्रधानमंत्री की आर्थिक परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में बी कीपिंग डेवलपमेंट कमिटी की जून 2019 की रिपोर्ट में पाया गया था कि एनबीबी उत्पादन डेटा विभिन्न राज्यों में अग्रणी मधुमक्खी पालकों से प्राप्त अनुमानों पर आधारित है, जो एकत्रित और व्यक्त किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहद उत्पादन का आंकड़ा वैज्ञानिक तरीके से नहीं जुटाया गया है। इसे एक व्यवस्थित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। एनबीबी व एफएओ के आंकड़े में विसंगति को वैज्ञानिक रूप से सत्यापित करने की जरूरत है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि शहद उत्पादन का अनुमान लगाने का एक बेहतर तरीका मधुमक्खी पालन करने वालों की संख्या, मधुमक्खी के छत्ते और कॉलोनी, जंगली शहद के छत्ते, घरेलू छत्ते पता लगाकर किया जा सकता है। इससे शहद उत्पादन का वास्तविक आंकड़ा पता करने में मदद मिलेगी।
अभी वास्तविक आंकड़े न होने पर यह पता लगाना लगभग असंभव है कि बाजार में कितनी मिलावटी शहद है। शहद की धोखाधड़ी को दूर करने के लिए यह जानना अक्सर जरूरी होता है। ट्रेसेबिलिटी का सिस्टम बनाना भी असंभव है। मधुमक्खी को जानना उतना ही जरूरी है जितना शहद खाना। (downtoearth.org.in)
कश्मीर में लंबे समय से चल रहे जानलेवा संघर्ष के बीच एक और मुसीबत चुपचाप इलाके के निवासियों के जीवन पर गहरा असर डाल रही है. कश्मीर के बदलते स्वरूप के बीच बीते सालों में वहां इंसानों और वन्य पशुओं के बीच संघर्ष बढ़ गया है.
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच सालों में वादी में जंगली जानवरों के हमले में 67 लोग मारे गए हैं और 940 लोग घायल हो गए हैं. इस मुसीबत के केंद्र में है हिमालय का काला भालू. विशेषज्ञों का कहना है कि मृतकों और घायलों में से 80 प्रतिशत लोगों की हालत के लिए जिम्मेदार काले भालू ही हैं.
अगस्त में, मंजूर अहमद दर जब अपने सब्जियों के खेत में काम कर रहे थे तब वहां एक काला भालू उन पर टूट पड़ा. हमले में उनके सर पर गहरी चोट आई और वो अभी तक पूरी तरह से ठीक नहीं हुई है. पिछले साल 50-वर्षीय खानाबदोश शौकत अहमद खताना ने श्रीनगर के बाहर ही हरवान इलाके में एक काले भालू के हमले से अपने छोटे भाई को बचाते बचाते अपनी जान गंवा दी थी. उनका भाई भी उस हमले में घायल हो गया था.
पहाड़ों और मैदानों के बीच बसे कश्मीर में जमीन के इस्तेमाल को लेकर काफी तेज बदलाव आए हैं. बड़े बड़े धान के खेतों को मुख्य रूप से सेब के बगीचों में बदल दिया गया है. दलदली जमीन और जंगलों के आस पास नए मोहल्ले बस गए हैं. वन-कटाई और जलवायु परिवर्तन ने परेशानियों को बढ़ा दिया है.

यह संघर्ष इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि जानवरों की तस्करी के लगभग रुक जाने से वन्य जीवों की आबादी भी बढ़ी है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस वजह से वन्य पशु भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानी इलाकों की तरफ आ रहे हैं, जिससे हमलों की संख्या काफी बढ़ गई है. कश्मीर के प्रमुख वाइल्ड लाइफ वार्डेन राशीद नक्श कहते हैं, "जानवरों ने भी इस बदलाव के साथ मेल बिठा लिया है. और दिलचस्प बात यह है कि उन्हें अब बगीचों में और जंगलों की तलहटी में उन स्थानों पर आसानी से भोजन और आश्रय मिल जाता है जहां लोगों ने बस्तियां बसा ली हैं."
नकश ने बताया कि पहले काले भालू सर्दियों में अमूमन सीतनिद्रा में चले जाते थे, लेकिन अब वो "गहरी, कड़ी सर्दियों में भी सक्रिय रहते हैं और पूरे साल शिकार की तलाश में घूमते रहते हैं." यह संघर्ष इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि जानवरों की तस्करी के लगभग रुक जाने से वन्य जीवों की आबादी भी बढ़ी है. तस्करी के रुकने का कारण वादी के तनाव ग्रस्त हालात और जंगल में भारतीय सेना के जवानों की मौजूदगी है.
सेना के शिविरों के किचन से फेंका गया खाना भी भालुओं के लिए भोजन का आसान स्त्रोत है. पहाड़ी इलाके में इन पशुओं ने अपने रहने के प्राकृतिक स्थान भी खो दिए हैं क्योंकि अब वहां हजारों किलोमीटर तक कंटीली तारें बिछी हुई हैं जिनके इर्द गिर्द हजारों सैनिक गश्त लगाते हैं.
सीके/एए (एपी)
यूएन के मुताबिक कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर में मानवीय सहायता और सुरक्षा की जरूरत इस साल के मुकाबले 2021 में करीब 40 फीसदी ज्यादा होगी.यूएन मानवीय सहायता ने अगले साल के दौरान 35 अरब डॉलर चंदा इकट्ठा करने की अपील की.
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता राहत कार्यों के प्रमुख मार्क लोकॉक ने कहा है कि साल 2021 में, दुनिया भर में लगभग साढ़े 23 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता और सुरक्षा की जरूरत होगी, जो कि एक रिकॉर्ड संख्या होगी. उनके मुताबिक यह साल 2020 की तुलना में करीब 40 प्रतिशत ज्यादा है. उनका कहना है कि इसका मुख्य कारण कोरोना वायरस से फैली महामारी है. मार्क लोकॉक के मुताबिक, "अगर मानवीय सहायता पाने वाला हर कोई अगले साल एक देश में रहता है तो यह दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा देश होगा." उन्होंने कहा, "महामारी ने नाजुक और कमजोर हालात का सामना कर रहे देशों में भारी तबाही मचाई है."
करोड़ों लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत
यूएन ने साल 2021 के लिए वैश्विक मानवीय सहायता परिदृश्य में 56 देशों में बेहद नाजुक हालात का सामना कर रहे लगभग 16 करोड़ लोगों तक मदद पहुंचने की योजनाएं बनाई है. अगर ये सभी योजनाएं पूरी की गईं तो इन पर 35 अरब डॉलर का खर्च आएगा. यूएन का अनुमान है कि दुनिया भर में साढ़े 23 करोड़ लोग कोरोना वायरस महामारी, भूख, संघर्ष और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर रहे हैं.
लोकॉक के मुताबिक इस साल दान दाताओं ने रिकॉर्ड 17 अरब डॉलर मानवीय सहायता के लिए दिए और डाटा से पता चलता है कि यह सहायता लक्षय के मुताबिक 70 फीसदी लोगों तक पहुंच पाई. लोकॉक के मुताबिक उनकी एजेंसी की मुख्य चिंताओं में से एक यमन, अफगानिस्तान, उत्तरपूर्व नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, डीआरसी कांगों और बुरकीना फासो में अकाल टालने की है.
लोकॉक का कहना है कि कोरोना महामारी ने लाखों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है और मानवीय सहायता जरूरतें आसमान पर पहुंचा दी हैं. इसलिए अकाल को टालने, गरीबी का मुकाबला करने और बच्चों का टीकाकरण और उन्हें स्कूलों में रखने के लिये मानवीय सहायता राशि की जरूरत है.
एए/सीके (रॉयटर्स)
किसानों के प्रतिनिधियों और केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों के बीच हुई बैठक बेनतीजा रही. विवादास्पद कृषि कानूनों पर एक समिति गठित करने के सरकार के प्रस्ताव को किसानों ने ठुकरा दिया.
डायचेवेले पर चारु कार्तिकेय का लिखा
35 किसान संगठनों के प्रतिनिधि मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर और केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके सहयोगी पीयूष गोयल और सोम प्रकाश से मिले थे. बैठक में मंत्रियों ने किसानों के सामने तीनों नए कृषि कानूनों पर उनकी आपत्तियों पर चर्चा करने के लिए एक समिति गठित करने का प्रस्ताव दिया.
मीडिया में आई खबरों के अनुसार किसानों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि जब तक सरकार कानूनों को रद्द नहीं करती तब तक उनके प्रदर्शन जारी रहेंगे. कुछ किसानों का यह भी मानना था कि सरकार यह समिति आंदोलन में शामिल सैकड़ों किसान संगठनों के बीच फूट डलवाने के लिए बनाना चाहती थी लेकिन विरोध कर रहे सभी किसान एकजुट हैं और अपनी मांग पर कायम हैं.
बुधवार को किसान संगठनों की आपस में बैठक होगी जिसमें वो सरकार से हुई बातचीत की समीक्षा करेंगे और आंदोलन के लिए आगे की रणनीति तय करेंगे. गुरूवार को किसानों की केंद्रीय मंत्रियों के साथ एक और बैठक निर्धारित है. इस बीच किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं और उन्हें समर्थन देने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है.
किसान इससे पहले नए कानूनों के विरोध में भारत बंद भी आयोजित कर चुके हैं. ये तीन कानून हैं आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून.
बताया जा रहा है कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों से और भी किसान दिल्ली के तरफ निकल चुके हैं. महाराष्ट्र से भी किसानों के दिल्ली आने की संभावना व्यक्त की जा रही है. धरने पर बैठे किसानों को समर्थन देने दिल्ली की सीमाओं पर कई विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी और एक्टिविस्ट भी पहुंच रहे हैं.
कई खिलाड़ियों ने भी उनकी मांगों को अपना समर्थन दिया है और अर्जुन पुरस्कार प्राप्त कर चुके हॉकी खिलाड़ी सज्जन सिंह चीमा जैसे खिलाड़ियों ने घोषणा की वो किसानों के साथ किए जा रहे बर्ताव के विरोध में अपने पुरस्कारों को सरकार को वापस लौटा देंगे.
किसान इससे पहले नए कानूनों के विरोध में भारत बंद भी आयोजित कर चुके हैं. ये तीन कानून हैं आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून और कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून.
कानूनों के आलोचकों का मानना है कि इनसे सिर्फ बिचौलियों और बड़े उद्योगपतियों का फायदा होगा और छोटे और मझौले किसानों को अपने उत्पाद के सही दाम नहीं मिल पाएंगे.
इनका उद्देश्य ठेके पर खेती यानी 'कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग' को बढ़ाना, खाद्यान के भंडारण की सीमा तय करने की सरकार की शक्ति को खत्म करना और अनाज, दालों, तिलहन, आलू और प्याज जैसी सब्जियों के दामों को तय करने की प्रक्रिया को बाजार के हवाले करना है.
कानूनों के आलोचकों का मानना है कि इनसे सिर्फ बिचौलियों और बड़े उद्योगपतियों का फायदा होगा और छोटे और मझौले किसानों को अपने उत्पाद के सही दाम नहीं मिल पाएंगे. सरकार ने कानूनों को किसानों के लिए कल्याणकारी बताया है, लेकिन कई किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का कहना है कि इन कानूनों की वजह से कृषि उत्पादों की खरीद की व्यवस्था में ऐसे बदलाव आएंगे जिनसे छोटे और मझौले किसानों का शोषण बढ़ेगा.
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 2 दिसंबर। राजधानी रायपुर में बीती रात फिर चाकूबाजी हो गई। पुरानी बस्ती के भीमनगर में पुरानी रंजिश के चलते एक युवक के पेट, पीठ व अन्य जगहों पर चाकू मार दिया गया। उसे तुरंत अंबेडकर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसका इलाज जारी है। दूसरी तरफ, पुलिस आरोपी युवक को हिरासत में लेकर घटना की जांच में लगी है।
पुलिस के मुताबिक शिव चौक भीम नगर निवासी राजेश बांद्रे (40) का छोटा भाई आकाश बांद्रे बीती रात में कहीं से घूमकर घर आ रहा था, तभी बस्ती में एक युवक सिद्धार्थ उइके (20) ने उसे रोककर उसके साथ गाली-गलौज शुरू कर दी। विवाद बढऩे पर उसने आकाश के पेट, पीठ, चेहरा व अन्य जगहों पर चाकू मारकर फरार हो गया। घटना की रिपोर्ट घायल युवक के भाई राजेश ने पुरानी बस्ती पुलिस में दर्ज कराई।
दूसरी तरफ, पुलिस ने हत्या का प्रयास मामला दर्ज कर आरोपी युवक की तलाश शुरू की। इस दौरान आरोपी सिद्धार्थ इसी बस्ती में ही पकड़ा गया। पुलिस पूछताछ में उसने पुरानी रंजिश के चलते चाकू मारना बताया। पुलिस फिलहाल रोजी-मजदूरी करने वालों के बीच चाकूबाजी घटना की जांच में लगी है। पुलिस का कहना है कि आरोपी, घायल युवक और आसपास के लोगों से पूछताछ की जा रही है।
उल्लेखनीय है कि दो-तीन दिन पहले टिकरापारा थाना क्षेत्र के बोरियाखुर्द में पुरानी रंजिश के चलते चाकू से गोदकर एक युवक की हत्या कर दी गई। इसके अलावा शहर में चाकूबाजी की और कई घटनाएं सामने आ चुकी है।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
कोंडागांव, 2 दिसंबर। देर रात सिटी कोतवाली कोंडागांव अंतर्गत नेशनल हाईवे 30 के ग्राम जोबा के पास एक कार खड़ी ट्रक से टकरा गई। इस टक्कर में एक ही परिवार के 4 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई है। मृतक सभी बीजापुर के हैं, वहीं एक गंभीर व्यक्ति जगदलपुर का है।
मृतकों के बारे में बताया जा रहा है कि, मृतक बीजापुर जिला से कोंडागांव के लंजोड़ा गांव में शादी समारोह में शामिल होने पहुंचे थे। यहां से लौटने के दौरान उनकी कार सडक़ हादसे का शिकार हो गई। हादसे की सूचना मिलते ही मौके पर यातायात और सिटी कोतवाली कोंडागांव पुलिस की दल पहुंची, और घंटों के मशक्कत के बाद शव को वाहन से बाहर निकाल पाई।

जानकारी अनुसार, बीजापुर का एक शिक्षक परिवार कोंडागांव के लंजोड़ा गांव में वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने 1 दिसंबर को पहुंचा था। शादी समारोह से लौटने के दौरान कोंडागांव से लगभग 23 किमी दूर नेशनल हाईवे 30 पर जोबा और सुकुरपाल के बीच इनकी कार खड़ी ट्रक से टकरा गई।
इस टक्कर में कार में सवार लगभग 55 वर्षीय पेंटा कावरे, उनकी पत्नी प्रभा कावरे, बड़ा बेटा व कार चालक लोकेश कावरे व छोटा बेटा राहुल कावरे की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं कार में सवार मृतकों के रिश्तेदार में प्रदीप सूर्यवंशी जगदलपुर को गंभीर हालत में कोंडागांव के जिला अस्पताल आरएनटी में उपचार के लिए दाखिल किया गया है।
वाहन काटकर फंसे शव निकाले
घटना की जानकारी मिलते ही मौके पर तत्काल सिटी कोतवाली और कोंडागांव की यातायात पुलिस शाखा मौके पर पहुंच गई। लेकिन वाहन में फंसे शवों को निकालने के लिए 3 घंटे की बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। लगातार कोशिश के बाद 3 शव को किसी तरह कार से निकाल लिया गया, लेकिन पेंटा कावरे के शव को निकालने के लिए पुलिस को 3 घंटे की मशक्कत करनी पड़ी। आखिरकार कार के पुर्जे को काटने और जेसीबी के मदद से अंतिम शव को रात लगभग 2 बजे निकाला जा सका।
Shagun Kapil-
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बताया कि कृषि सुधार विधेयक, 2020 के विरोध में देशभर के किसान आगामी 25 सितम्बर को सभी जिला मुख्यालयों में धरना-प्रदर्शन और चक्का जाम करेंगे। उन्होंने कहा है कि देश की संसद के इतिहास में पहली दुभार्ग्यपूर्ण घटना है कि अन्नदाता से जुड़े तीन कृषि विधेयकों को पारित करते समय न तो कोई चर्चा की और न ही इस पर किसी सांसद को सवाल करने का अधिकार दिया गया। उनका तर्क है कि मंडी के बाहर खरीद पर कोई शुल्क न होने से देश की मण्डी व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। सरकार धीरे-धीरे फसल खरीदी से हाथ खींच लेगी। वह कहते हैं कि किसानों को बाजार के हवाले छोड़कर देश की खेती को मजबूत नहीं किया जा सकता। डाउन टू अर्थ ने इन सभी मुद्दों पर उनसे बातचीत की।
प्रश्न- राज्य सभा में तीन कृषि सुधार बिल गत 20, 2020 को किए गए। केंद्र सरकार का कहना है कि इन कानूनों से मंडियों और अढ़तियों के एकाधिकार से किसानों को मुक्ति मिलेगी। वास्तव में सरकार को कितनी चिंता है किसानों की?
टिकैत- देखिए हमारी सबसे बड़ी चिंता यह है कि मंडियों और बाहर के लेनदेन अलग-अलग होंगे। जबकि मंडी शुल्क लगाएगी और बाहर कोई कर या बाजार शुल्क नहीं लगेगा। इससे मंडी व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। यहां देखा जाए तो सरकार सीधे कृषि उपज मंडी समितियों को समाप्त नहीं कर रही है। हालांकि यह ध्यान देने वाली बात है कि मंडी प्रणाली न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करती है, जो धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा।
प्रश्न- केंद्र सरकार का कहना है कि समर्थन मूल्य जारी रहेगा, यही नहीं यह बात प्रधानमंत्री ने भी कही है, ऐसे में किसान क्यों नहीं उन पर विश्वास कर पा रहे हैं?
टिकैत- हम बार-बार सरकार से यह बात कह रहे हैं कि एमएसपी को अनिवार्य बनाते हुए बिल में इतना संशोधन किया जाए कि कीमत नीचे होने पर खरीदना गैर कानूनी हो। यदि प्रधानमंत्री कहते हैं कि एमएसपी रहेगा तो इसे कानून के अंतर्गत लाने में क्या मुश्किल है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक बार बड़े कारपोरेट और निजी कंपनियां बाजार में प्रवेश करते हैं तो वे कीमतों पर बोली लगाएंगे। हमारा सरकार से सबसे बड़ा सवाल है कि संसद में बिल पारित करने से पहले सरकार ने बिल से जुड़े देश में किसी भी हितधाकों से परामर्श करना मुनासिफ क्यों नहीं समझा? मेरा कहना है कि जब भूमि अध्यादेश अधिनियम लाया गया था तो इसी भाजपा सरकार की ही नेत्री सुमित्रा महाजन तब स्टैंडिंग कमेटी की चेयरमैन थी तो उन्होंने एक बार नही कम से कम सात से आठ बार किसानों से सलाहमशविरा किया था। ऐसे में अब ऐसी क्या मजबूरी आ गई है सरकार के सामने कि उसने किसानों से जुड़े इस महत्वपूर्ण बिल के संबंध में उनसे बात करना भी गवारा नहीं समझा।
प्रश्न- संसद में पारित किसान बिलों का मुख्य लक्ष्य है कि भारत में कांट्रैक्ट फार्मिंग को कानूनी जामा पहनाना, इससे किसानों के हित पूरी तरह से सुरक्षित होंगे, इस पर आपका क्या दृष्टिकोण है?
टिकैत- कानून के अनुसार कंपनी वाला हो या कोई भी खरीदार, किसान को तीन दिनों के भीतर भुगतान किया जाना चाहिए। और यदि इस भुगतान में देरी होती है तो किसान कैसे इस भुगतान को वसूलेगा और कहां भटकेगा? उदाहरण के लिए गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 के अंतर्गत नियम है कि गन्ने की आपूर्ति के 14 दिन के अंदर बकाया भुगतान किया जाना चाहिए। लेकिन क्या यह नियम जमीनी स्तर पर अब तक लागू हो पाया है? इसका अंदाजा इस एक बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में किसानों का गन्ना बकाए की राशि 14 हजार करोड़ तक जा पहुंची है। अनुबंध खेती का हमारा पिछला अनुभव बहुत कड़वा रहा है। इसके तहत बताया गया था कि खरीददार उपज की गुणवत्ता को आधार बनाकर अंतिम समय में खरीदने से इंकार कर सकता है। और सबसे बड़ा सवाल है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे की निगरानी करने वाला कौन है? हालांकि सरकार का तर्क है कि इस संबंध में किसान कानूनी रास्ता अपना सकते हैं। लेकिन क्या आपको लगता है कि इस बात के लिए देश के लाखों किसानों के पास समय और संसाधन है?
प्रश्न- किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का कहना है कि मंडियों के बाहर किसानों को बेहतर मोलभाव करने का अवसर मिलेगा और इससे छोटे किसानों का शोषण से बचाव संभव होगा। लेकिन हमारे एफपीओ अभी भी नवजात अवस्था में हैं। नए ढांचे में वे कितने कुशल हैं?
टिकैत- एफपीओ को अभी भी पूरी तरह से प्रभावी नहीं माना जा सकता है। वर्तमान समय में वे कई मामलों में उन्हें किसान समूहों की तरह नहीं चलाया जाता है। हां एफपीओ को केवल एक छोटे व्यापारी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। जिसके तहत एक व्यक्ति एफपीओ बनाता है और कुछ और लोगों को समूह में शामिल करता है। एक तरह से यह एक व्यक्ति का एक लाभदायक व्यवसाय मात्र बन कर रह गया है। यही नहीं मैं यहां यह भी बताना चाहूंगा कि हमारे उत्तर भारतीय राज्यों में तो बहुत अधिक एफपीओ हैं भी नहीं। लेकिन हां इसे सरकार का एक अच्छा कदम कहा जा सकता है, लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि इस प्रणाली के लाभ हमें कुछ सीलों में ही ज्ञात होंगे। (downtoearth)
न्यूयॉर्क, 2 दिसंबर | अमेरिका के एक उच्च स्तरीय सरकारी पैनल ने मंगलवार को घोषणा की है कि सबसे पहले कोविड-19 वैक्सीन हेल्थ केयर वर्कर्स और नसिर्ंग होम में रह रहे मरीजों को दिए जाएंगे।
सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) पैनल ने 13-1 से वोट करके यह सिफारिश की है शुरूआती हफ्तों में जब वैक्सीन के कम डोज उपलब्ध रहेंगे, तब इन दोनों समूहों का प्राथमिकता पर वैक्सीनेशन किया जाना चाहिए।
सीडीसी विशेषज्ञों ने कहा कि अमेरिका में 40 प्रतिशत मौतें लंबे समय तक देखभाल करने वाली फैसिलिटी जैसे नसिर्ंग होम में हुईं हैं, इसीलिए उन्हें पहले वैक्सीन देने की सिफारिश की गई है।
हालांकि फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने अब तक फाइजर या मॉर्डना वैक्सीन के आपातकालीन उपयोग को अधिकृत नहीं किया है। यह निर्णय 10-17 दिसंबर के बीच लिए जाने की संभावना है। अध्ययन में इन दोनों वैक्सीन ने बड़े पैमाने पर 90 प्रतिशत से अधिक प्रभावशीलता दिखाई है। सीएनएन ने ऑपरेशन वार स्पीड के दस्तावेजों के हवाले से कहा है कि फाइजर के वैक्सीन के पहले शिपमेंट को 2 सप्ताह के भीतर राज्यों में पहुंचाने की तैयारी है।
हेल्थ केयर वर्कर्स और नसिर्ंग होम में रहने वाले लोगों की अमेरिका में आबादी करीब ढाई करोड़ से कुछ कम है, जबकि अमेरिका की कुल आबीदी 33 करोड़ है। वहीं फाइजर और मॉर्डना से वैक्सीन के कुल 4 करोड़ डोज 2020 के अंत तक उपलब्ध होने की उम्मीद है।
बता दें कि कोरोनावायरस के कारण अब तक 2.7 लाख अमेरिकियों की मौत हो चुकी है और 1.3 करोड़ संक्रमित हो चुके हैं।
--आईएएनएस
मेडिकल कॉलेज ICU में सिलिंडर में धमाका, एक मौत
"छत्तीसगढ़' संवाददाता
राजनांदगांव, 2 दिसंबर. शासकीय मेडिकल कॉलेज सह जिला अस्पताल में बीती रात आईसीयू में ऑक्सीजन सिलेंडर के फटने के दम घुटने से एक मरीज की दर्दनाक मौत हो गई।
गुजरी रात करीब दो बजे आईसीयू में सिलेंडर फटने से वार्ड में जोरदार धमाका हुआ। इसके बाद वार्ड में भर्ती मरीजों व परिजनों में अफरातफरी मच गयी । बताया गया है कि इस धमाके से दहशत में एक मरीज की मौत हो गई। कलेक्टर टीके वर्मा ने " छत्तीसगढ़ " से घटना की पुष्टि करते कहा कि घटना के विषय पर कालेज प्रबंधन से जानकारी ली गई है। जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 2 दिसम्बर। हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर स्वास्थ्य संचालक को आदेश दिया है कि निजी अस्पतालों में कोरोना के इलाज के लिये समुचित निर्देश जारी करें।
रायपुर के डॉक्टर विकास अग्रवाल ने अधिवक्ता मधुनिशा सिंह के जरिये दायर एक जनहित याचिका में कहा कि प्रदेश के केवल गिने-चुने निजी अस्पतालों में कोरोना के इलाज की अनुमति स्वास्थ्य विभाग द्वारा दी गई है, जबकि इस दौरान कोरोना पीड़ितों की संख्या कम नहीं हुई है और इलाज के अभाव में उनकी मौतें भी हो रही है। अधिक संख्या में निजी अस्पतालों में इलाज की अनुमति देकर इन मौतों को रोका जा सकता है। चीफ जस्टिस पी.आर. रामचंद्र मेनन और जस्टिस पीपी साहू की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्वास्थ्य संचालक को समुचित आदेश जारी करने का निर्देश दिया है।
86 नये मरीज, दो मौतें
बीते 24 घंटे में कोरोना के 86 नये मरीज मिले और इस बीच इलाज के दौरान दो मरीजों की मौत हो गई।
पिछले एक सप्ताह से प्रतिदिन कोरोना संक्रमितों की संख्या 100 से 150 के बीच आती रही है। सिर्फ 30 नवंबर को 99 मरीज मिले। नये मरीजों में 54 शहर के विभिन्न इलाकों से हैं। बीते 24 घंटे में स्वस्थ होने के बाद 190 मरीजों को डिस्चार्ज भी किया गया है। जांजगीर जिले की एक 63 वर्षीय महिला तथा कोरबा के 73 वर्ष के वृद्ध की निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मौत भी इस बीच हो गई।
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बिलासपुर, 2 दिसम्बर। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिये सात वर्ष से कम सजायाफ्ता और विचाराधीन कैदियों को हाईकोर्ट ने 15 दिन के लिये राहत दी है। यह तीसरी बार है जब पैरोल और जमानत में छूट दी गई।
कोरोना संक्रमण के चलते प्रदेशभर के जेलों में कैदियों की संख्या को सीमित रखने के उद्देश्य से हाईकोर्ट ने मई-जून माह में सजायाफ्ता कैदियों को पैरोल पर छोड़ने तथा विचाराधीन कैदियों को जमानत पर छोड़ने का आदेश दिया था। इसके लिये जस्टिस प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई गई थी। इसका लाभ लगभग 2200 बंदियों को मिला है। हाईकोर्ट ने 30 नवंबर तक इन्हें छूट दी थी। कैदियों के परिजनों की ओर से एक याचिका दायर कर अपील की गई थी कि चूंकि कोरोना का संक्रमण जारी है और जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं इसलिये छूट की अवधि बढ़ाई जाये। इस पर 30 नवंबर तक फैसला नहीं आने पर 1 दिसम्बर को बड़ी संख्या में कैदी सेन्ट्रल जेल पहुंचकर अपनी हाजिरी दे रहे थे। इसी दौरान चीफ जस्टिस पी आर रामचंद्र मेनन और जस्टिस पी पी साहू की डबल बेंच से इस बारे में आदेश जारी कर दिया गया।
वाशिंगटन, 2 दिसंबर | अमेरिका में कोविड -19 से होने वाली मौतों की संख्या 270,000 से अधिक हो गई हैं। यह जानकारी जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) के आंकड़ों से मिली।
समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में संक्रमण के कुल मामले 1.36 करोड़ तक पहुंच गए हैं, वहीं मौत का आंकड़ा बढ़कर 270,003 हो गया है।
आंकड़ों के अनुसार, न्यूयॉर्क राज्य में 34,618 मौतें दर्ज की गई हैं, जो अमेरिकी राज्य-स्तर पर मृत्यु की सूची में शीर्ष पर है। इसके बाद टेक्सास का स्थान है, जहां 21,946 मौतें दर्ज की गई हैं। वहीं कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा और न्यू जर्सी के राज्यों में 17,000 से अधिक मौतों की पुष्टि की गई है।
वहीं 10,000 से अधिक मौतें दर्ज करने वाले राज्यों में इलिनोइस, मैसाचुसेट्स और पेंसिल्वेनिया भी शामिल हैं।
अमेरिका दुनिया में सबसे अधिक संक्रमण के मामलों और मौत दर्ज करने वाला देश है। यह महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है।
--आईएएनएस
ईरान में वैज्ञानिकों ने नैनो टक्नॉलोजी की मदद से ऐसी कम्पोज़िट मेम्ब्रेन अर्थात छलनी बनायी है जो मिक्स हुयी गैसों को अच्छी तरह अलग कर सकती है। अलबत्ता यह कामयाबी लैब स्तर पर हासिल हुयी है। यह कारनामा ईरान की अराक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने किया है। इस छलनी से कम वक़्त और ऊर्जा में गैसों को अलग किया जा सकता है। यह छलनी इसी तरह गैस को मीठा बनाने की प्रक्रिया में भी इस्तेमाल होती है। पाइप लाइन को ज़ंग से बचाने के लिए प्राकृतिक गैस में मौजूद अशुद्ध तत्वों को निकालना, गैस के भंडारण और सप्लाई के ख़र्च में कमी, गैस के जलने की क्वालिटी में बेहतरी लाना और प्रदूषण कम करके पर्यावरण को नुक़सान से बचाना पेट्रोलियम उद्योग के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियाँ हैं।
प्राकृतिक गैस के निकलते वक़्त उसमें लगभग 80 फ़ीसद मिथेन गैस होती है। इसी तरह प्राकृतिक गैस को निकालते वक़्त उसमें कार्बनडाइ ऑक्साइड, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन सल्फ़ाइड और गंधक युक्त दूसरे कंपाउंड भी होते हैं। अराक यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर्ज़ ने नैनो कंपोज़िट मेम्ब्रेन को सिन्थेसिस किया है। इस समय प्राकृतिक गैस में गंदगी को निकालने के लिए कन्डन्सेशन, एब्ज़ॉर्प्शन और ऑर्गेनिक सॉल्वेन्ट के साथ ऐड्ज़ॉर्प्शन शैली इस्तेमाल होती है, लेकिन इन शैलियों के इस्तेमाल में ख़र्च ज़्यादा है और ऊर्जा बहुत इस्तेमाल होती है, इसी तरह इन शैलियों के लिए ख़ास उपकरण की ज़रूरत होती है।
ईरानी शोधकर्ताओं ने जो नैनो कंपोज़िट मेम्ब्रेन बनायी है उसका रिटर्न अच्छा है, गैस तेज़ी से अलग होती है, इसका प्रॉसेस आसान है, इसमें महंगे सॉल्वेन्ट इस्तेमान नहीं होते और दूसरी शैलियों की तुलना में ये अधिक इक्नॉमिकल हैं। इसके अलावा नई शैली से पर्यावरण को नुक़सान नहीं पहुंचता। (Parsnews)
नई दिल्ली, 2 दिसम्बर | किसानों के जिस प्रतिनिधिमंडल को केंद्र सरकार से वार्ता के लिए मंगलवार को बुलाया गया था उसमें स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव शामिल नहीं थे. कहा जा रहा है कि सरकार नहीं चाहती थी कि किसी राजनीतिक व्यक्ति को इसमें शामिल किया जाए.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने इस ख़बर को प्रमुखता से जगह दी है. अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि कुछ किसान नेताओं के मुताबिक़ योगेंद्र यादव को प्रतिनिधिमंडल से बाहर वास्तव में पंजाब के कुछ यूनियनों के कारण रखा गया.

सोमवार की रात कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एक पत्र जारी कर मंगलवार को नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में शाम तीन बजे किसान यूनियनों को वार्ता के लिए आमंत्रित किया था. नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि 13 नवंबर को जो वार्ता में शामिल हुए थे उन्हें ही दोबारा वार्ता के लिए बुलाया गया है. पिछले महीने केवल पंजाब के किसान यूनियनों को वार्ता के लिए बुलाया गया था.
द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार केवल पंजाब के नेताओं को सीनियर ब्यूरोक्रेट्स से फ़ोन गए थे और बीजेपी नेता पिछले कुछ दिनों से अनाधिकारिक रूप से फ़ोन पर वार्ता कर रहे हैं.
हालाँकि मंगलवार को पंजाब के किसान यूनियनों ने फ़ैसला किया कि संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले अखिल भारत प्रदर्शन हो रहा है और वार्ता में सभी को शामिल किया जाए.
इस मोर्चे की समन्वय समिति सात सदस्यीय है जिसमें पंजाब के तीन नेता और योगेंद्र यादव के अलावा भारतीय किसान यूनियन के गुरनाम सिंह चौधरी, राष्ट्रीय किसान महासंघ के शिव कुमार काकाजी के साथ ऑल इंडिया किसान सभा के हन्नान मोल्लाह हैं.
योगेंद्र यादव ने द हिन्दू से कहा, ''अमित शाह ने ख़ुद पंजाब के नेताओं से बात की और कहा कि योगेंद्र यादव को शामिल नहीं किया जा सकता क्योंकि वो एक राजनीतिक पार्टी के प्रमुख हैं. पंजाब के नेता मुझे बाहर किए जाने के आधार पर वार्ता का बहिष्कार करने के लिए तैयार थे लेकिन मैंने उनसे कहा कि मैं वार्ता से अलग रहना चाहता हूं.''
अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार कुछ किसान समूह और नेताओं ने योगेंद्र यादव का हवाला देते हुए कहा कि शुरुआत में उन्होंने प्रदर्शनकारियों से बॉर्डर से बुराड़ी मैदान में शिफ़्ट होने का आग्रह किया था.
इससे लोग योगेंद्र यादव से नाराज़ हो गए. इसके अलावा इस बात से भी नाराज़गी थी कि योगेंद्र यादव और कुछ अन्य राष्ट्रीय नेताओं के आसपास मीडिया की मौजूदगी ज़्यादा थी जबकि उन्होंने मुट्ठी भर प्रदर्शनकारियों को ही लामबंद किया था.
दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार ने केवल पंजाब के यूनियनों से वार्ता करने की बात कही ताकि दिखाया जा सके कि केवल एक राज्य से राजनीति से प्रेरित होकर विरोध-प्रदर्शन किया जा रहा है. मंगलवार को जो वार्ता हुई है उसमें दूसरे राज्य के लोग भी शामिल थे. (bbc)


