बैंकॉक, 12 जनवरी | मौजूदा विश्व विजेता भारत की अग्रणी महिला बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु को मंगलवार को यहां शुरू हुए थाईलैंड ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के पहले ही दौर में हार का सामना करना पड़ा। पुरुष एकल में बी. साईं प्रणीत को भी हार मिली लेकिन भारत के मिश्रित युगल जोड़ीदार सात्विकसाईराज रैंकीरेड्डी और अश्विनी पोनप्पा दूसरे दौर में पहुंच गए हैं। बीते साल अगस्त में विश्व चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीतने वाली सिंधु को पहले दौर में डेनमार्क की मिला ब्लीचेल्ट ने हराया। ब्लीचेल्ट ने एक घंटे 14 मिनट चले मुकाबले में सिंधु को 16-21, 26-24, 21-13 से हराया।
इन दोनों खिलाड़ियों के बीच यह चौथा मुकाबला था। इससे पहले तीन मौकों पर सिंधु की जीत हुई है। बीते साल मार्च में ऑल इंग्लैंड ओपन खेलने के बाद सिंधु का यह पहला मैच था।
इसी के साथ महिला एकल में भारत की चुनौती समाप्त हो गई क्योंकि एक अन्य भारतीय सायना नेहवाल कोरोना होने के कारण टूर्नामेंट से हट गई हैं।
बीते साल विश्व चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाले प्रणीत को पहले ही दौर में थाईलैंड के कांटाफोन वांगचारोन के हाथों हार मिली। वांगचारोन ने 36 मिनट तक चले मुकाबले में प्रणीत को 21-16, 21-10 से हराया।
दुनिया के 15वें रैंक्ड वांगचारोन और 13वें रैंक्ड प्रणीत के बीच यह अब तक का छठा मुकाबला था। चार बार प्रणीत की जीत हुई है।
सात्विक और पोनप्पा ने पहले दौर के मुकाबले में इंडोनेशिया के हाफिज फैजल और ग्लोरिया इमैनुएल विदजाजा की जोड़ी को 21-11, 27-29, 21-16 से हराया।
यह मुकाबाल एक घंटे 12 मिनट चला। अगले दौर में भारतीय जोड़ीदारों का सामना चीन के चांग ताक चेंग और नग विंग युंग से होगा। जीत की स्थिति में भारतीय जोड़ी क्वार्टर फाइनल में पहुंच जाएगी।
इस बीच, भारत के दो प्रमुख खिलाड़ी सायना और एचएस प्रणॉय कोरोना के कारण थाईलैंड ओपन से हट गए हैं। भारतीय बैडमिंटन संघ ने भी इसकी पुष्टि कर दी है।
बीएआई ने अपने ट्वीट में कहा है कि सायना के अलावा प्रणॉय भी कोरोना पॉजिटिवि पाए गए हैं। बीएआई के मुताबिक दोनों खिलाड़ी अगले 10 दिनों तक अस्पताल में आइसोलेट रहेंगे।
यह दूसरा मौका है जब सायना और प्रणॉय कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। बीते महीने सायना अपने पति और बैडमिंटन खिलाड़ी पारुपल्ली कश्यप के साथ कोरोना पॉजिटिव पाई गईं थीं। सायना और प्रणॉय ने क्वारंटीन में रहने के बाद बैंकॉक का रुख किया था।
बीएआई के मुताबिक सायना के नजदीकी के कारण कश्यप को होटल रूम में क्वारंटीन रखा गया है और उन्होंने भी टूर्नामेंट से नाम वापस ले लिया है।
सायना और प्रणॉय को मंगलवार को अपना पहले दौर का मुकाबला खेलना था।
नई दिल्ली, 12 जनवरी | सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के एक वकील की उन दलीलों को खारिज कर दिया, जिसमें कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विवादास्पद कृषि कानूनों पर चर्चा करने के लिए अब तक आंदोलनकारी किसानों से नहीं मिले हैं। न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना और वी. रामासुब्रमण्यन के साथ ही प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) एस. ए. बोबड़े और ने कहा, "हम प्रधानमंत्री को जाने के लिए नहीं कह सकते। वह यहां पर पार्टी नहीं हैं।"
अधिवक्ता एम. एल. शर्मा ने कहा कि किसानों ने मंगलवार को उनसे संपर्क किया और कहा कि वे कानूनों के खिलाफ किसानों की शिकायतों को सुनने के लिए अदालत द्वारा नियुक्त समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे। वकील ने कहा कि इसके बजाय वे कानूनों को निरस्त कराना चाहते हैं। शर्मा ने कहा, "किसान कह रहे हैं कि कई लोग चर्चा के लिए आए हैं, लेकिन मुख्य व्यक्ति, प्रधानमंत्री ही नहीं आए।"
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि कृषि मंत्री पहले ही किसानों से मिल चुके हैं। शर्मा ने पलटवार करते हुए कहा, "कृषि मंत्री के पास निर्णय लेने की कोई शक्ति नहीं है। जो निर्णय लेंगे, वह प्रधानमंत्री हैं।"
शीर्ष अदालत ने इस दलील को मानने से इनकार कर दिया और जोर देकर कहा कि अदालत यह सुनने की इच्छुक नहीं है कि किसान समिति में नहीं जाएंगे।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "हम समस्या को हल करना चाह रहे हैं। यदि आप अनिश्चित काल तक आंदोलन करना चाहते हैं, तो आप कर सकते हैं।" जब शर्मा ने कहा कि कॉर्पोरेट किसानों के हितों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, तो शीर्ष अदालत ने कहा कि वह सुनिश्चित करेगा कि नए कृषि कानूनों के तहत कोई खेत नहीं बेचा जाए।
मुंबई, 12 जनवरी | अभिनेत्री मृणाल ठाकुर को गुरु रंधावा के अगले म्यूजिक वीडियो में देखा जाएगा, जिसमें वह एक अल्ट्रा-ग्लैमरस लुक में नजर आने वाली हैं। इस पर अधिक जानकारियों का अभी खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों ने कहा है, "फाइनल ट्रैक अभी मिक्सिंग के प्रॉसेस पर है। मृणाल को वीडियो में शामिल होने के लिए संपर्क किया गया था, जिसकी शूटिंग एक बहुत ही खूबसूरत लोकेशन पर दो दिन तक हुई। वीडियो में वह एक अल्ट्रा-ग्लैमरस लुक में नजर आएंगी, जिस रूप में उन्हें अभी तक बड़े पर्दे पर नहीं देखा गया है।
मृणाल ने हाल ही में कुछ नामचीन फैशन डिजाइनरों के लिए रैम्प पर वॉक किया है। वीडियो में बोल्ड अंदाज में नजर आने वाली मृणाल इसे और भी दिलकश बना देंगी।"
इस गाने का शीर्षक 'अभी ना छोड़ो मुझे' है, जिसे गुरु रंधावा ने गाया है और वह वीडियो में भी शामिल रहे हैं। वीडियो को कश्मीर में दो दिन तक फिल्माया गया है। इसे अगले महीने रिलीज किया जाएगा।
तिरुवनंतपुरम, 12 जनवरी | केरल उच्च न्यायालय ने मंगलवार को लाइफ मिशन घोटाले में राज्य सरकार द्वारा दायर की गई दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि उच्च सरकारी अधिकारियों और ठेकेदारों से जुड़े मामले की सीबीआई जांच जारी रहनी चाहिए। मामला दरअसल केरल सरकार के फ्लैगशिप 'लाइफ मिशन' प्रोजेक्ट में विदेशी योगदान नियमों के कथित उल्लंघन से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य 2018 में विनाशकारी बाढ़ के दौरान घरों को खोने वाले गरीबों के लिए घर उपलब्ध कराना है।
केरल सरकार के वकील और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केके विश्वनाथन ने न्यायमूर्ति पी. सोमराजन की अदालत में दलील दी कि मामले में सीबीआई जांच नहीं की जा सकती क्योंकि वैधानिक निकायों को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के प्रावधानों से छूट दी गई है।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि सीबीआई जांच के आगे बढ़ने से 'पॉलिसी पारालाइसिस' की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी और उच्च न्यायालय को इसे रोकना चाहिए।
दूसरी ओर, सीबीआई के अधिवक्ता शष्ठमंगलम अजितकुमार ने तर्क दिया कि निजी कंपनी यूनिटेक केरल सरकार की निकाय लाइफ मिशन के लिए निर्माण का कार्य कर रही है, जिसने निविदा के माध्यम से अनुबंध प्राप्त नहीं किया है।
अजितकुमार ने कहा कि परियोजना के तहत 97 अपार्टमेंट और एक स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण किया जाना था, जिसमें दावा किया गया कि सोना तस्करी के मामले में आरोपी स्वप्न सुरेश और अन्य सह-आरोपियों ने अप्रूवल और फाइल संबंधी अन्य मूवमेंट के लिए यूनिटेक के साथ बातचीत की और परियोजना लागत का 30 प्रतिशत कमीशन तय किया। इस 30 प्रतिशत कमीशन में 20 प्रतिशत यूएई के एक अधिकारी और 10 प्रतिशत स्वप्ना सुरेश और अन्य सह-अभियुक्तों को दिया जाना था।
सीबीआई के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि वरिष्ठ सरकारी अधिकारी घोटाले में शामिल हैं, इसलिए केंद्रीय एजेंसी द्वारा एक पूर्ण जांच आवश्यक है, जिसे अदालत ने अनुमति दे दी।
मुंबई, 12 जनवरी | सुशांत सिंह राजपूत मामले में ड्रग एंगल की एंट्री होने के बाद से एक के बाद एक खुलासा होता जा रहा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने इस मामले की चल रही जांच के सिलसिले में हाल ही में मुंबई के मशहूर मुच्छड़ पानवाले को समन भेजा और अब मंगलवार की सुबह एनसीबी ने पान के दुकान के मालिकों में से एक को गिरफ्तार किया है। एक शीर्ष अधिकारी ने यह सूचना दी है। एनसीबी के क्षेत्रीय निदेशक समीर वानखेड़े ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि दुकान के वर्तमान मालिक रामकुमार जे. तिवारी पर एनडीपीएस एक्श सेक्शन 8 के तहत आरोप लगाए गए हैं। एनसीबी ने बताया है कि तिवारी की दुकान से आधा किलो प्रतिबंधित पदार्थ बरामद हुए हैं। तिवारी को एनसीबी ने पूछताछ करने के लिए बुलाया था और बयान दर्ज किए जाने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
दरअसल, अभी कुछ ही दिनों पहले ड्रग केस में एक ब्रिटिश नागरिक करण सजनानी से पूछताछ करने के दौरान कथित ग्राहक के रूप में मुच्छड़ पानवाले का नाम सामने आया था।
सजनानी देश में लगभग एक साल से अधिक समय से हैं। उन्हें बॉलीवुड अभिनेत्री दीया मिर्जा की पूर्व मैनेजर राहिला फर्नीचरवाला संग गिरफ्तार किया गया था।
मुंबई में मशहूर पान विक्रेताओं में से एक मुच्छड़ पानवाले की दुकान के असली मालिक पंडित श्री श्यामाचरण तिवारी हैं, जो उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के तिवारीपुर से ताल्लुक रखते थे। अब इनके चार बेटे इस दुकान को चलाते हैं, जिनमें जयशंकर तिवारी भी शामिल हैं।
यह दुकान मालाबार हिल के पास कैम्प्स कॉर्नर पर स्थित है। श्यामाचरण तिवारी सहित उनके बेटे और पोते भी अपनी लंबी और घनी मूंछों के चलते इलाके में जाने जाते हैं। यह दुकान करीब 45 साल पुरानी है, जहां बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज, राजनेता और बिजनेसमैन पान खाने आते हैं।
बैंकॉक, 12 जनवरी| भारतीय पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी किदांबी श्रीकांत ने थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में अपनी नाक से बहते खून के साथ ट्विटर पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं। उन्होंने कहा कि उनका चार बार कोविड-19 टेस्ट हो चुका है। 27 साल के श्रीकांत भारतीय बैडमिंटन टीम के साथ थाईलैंड ओपन में हिस्सा लेने आए हैं। इस महीने उन्हें दो और टूर्नामेंट में भाग लेना है।
श्रीकांत ने टिवटर पर लिखा, "हम यहां मैच के लिए खुद का ख्याल रखने आए हैं, न कि खून बहाने के लिए। यहां पहुंचने के बाद मेरा चार बार कोविड-19 टेस्ट लिया जा चुका है और मैं यह कह नहीं सकता कि उनमें से कोई भी सुखद रहा है। यह स्वीकार्य नहीं है।"
पूर्व वल्र्ड नंबर-1 श्रीकांत को थाईलैंड ओपन में अपना पहला मुकाबला बुधवार को हमवतन सौरभ वर्मा के साथ खेलना था।
इस बीच, भारत के दो प्रमुख खिलाड़ी सायना और एचएस प्रणॉय कोरोना के कारण थाईलैंड ओपन से हट गए हैं। भारतीय बैडमिंटन संघ ने भी इसकी पुष्टि कर दी है।
बीएआई ने अपने ट्वीट में कहा है कि सायना के अलावा प्रणॉय भी कोरोना पॉजिटिवि पाए गए हैं। बीएआई के मुताबिक, दोनों खिलाड़ी अगले 10 दिनों तक अस्पताल में आइसोलेट रहेंगे।
सायना ने कहा, "मुझे अभी भी कल हुए कोविड-19 टेस्ट की रिपोर्ट नहीं मिली है और यह बहुत भ्रामक है। आज मैच के लिए अभ्यास से पहले उन्होंने मुझे बैंकॉक में अस्पताल ले जाने के लिए कहा और मुझसे कहा कि नियमों के अनुसार चार घंटे के भीतर मेरी रिपोर्ट पॉजिटिव आनी चाहिए।"
यह दूसरा मौका है, जब सायना और प्रणॉय कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। बीते महीने सायना अपने पति और बैडमिंटन खिलाड़ी पारुपल्ली कश्यप के साथ कोरोना पॉजिटिव पाई गई थीं। सायना और प्रणॉय ने क्वारंटीन में रहने के बाद बैंकॉक का रुख किया था।
बीएआई के मुताबिक, सायना से नजदीकी के कारण कश्यप को होटल रूम में क्वारंटीन रखा गया है और उन्होंने भी टूर्नामेंट से नाम वापस ले लिया है।
सायना और प्रणॉय को मंगलवार को अपना पहले दौर का मुकाबला खेलना था। (आईएएनएस)
चंडीगढ़, 12 जनवरी | पंजाब के अधिकारियों ने कहा कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा निर्मित कोविड-19 वैक्सीन 'कोविशिल्ड' की 2.04 लाख खुराक की पहली खेप मंगलवार को हवाईमार्ग से पंजाब पहुंच गई है। वैक्सीन को चंडीगढ़ हवाईअड्डे पर उतरा गया। इसे बुधवार विशेष वाहनों द्वारा विभिन्न जिलों में भेजा जाएगा।
पंजाब के प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, हुसन लाल ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा और फ्रंटलाइन कार्यकर्ता को सबसे पहले वैक्सीन दी जाएगी।
दक्षिण अफ्रीका का एक सीधा-सादा सा पढ़ाकू लड़का कैसे अमेरिका का इतना बड़ा कारोबारी बन गया. यह कहानी है उस व्यक्ति की जिसने इंसानों को दूसरे ग्रहों पर बसाने का संकल्प लिया है.
1971 में दक्षिण अफ्रीका में जन्मे ईलॉन रीव मस्क तीन देशों के नागरिक हैं: दक्षिण अफ्रीका, कनाडा और अमेरिका. उनकी मां माये मस्क मॉडल और डाइटीशियन थीं और पिता ईरॉल मस्क इलेक्ट्रोमेकेनिकल इंजीनियर. ईलॉन मस्क अपने पिता को एक "बेहद बुरा इंसान" बताते हैं. अपने माता पिता की तीन संतानों में वे सबसे बड़े हैं. ईलॉन का बचपन किताबों और कंप्यूटर के बीच बीता. पढ़ाकू ईलॉन के बहुत दोस्त नहीं थे. हर वक्त चुप रहने की वजह से स्कूल के बच्चे काफी परेशान भी करते थे. टीनेज में ईलॉन के व्यक्तित्व में बदलाव आया.
जब चला पेपॉल का जादू
1995 में वे पीएचडी करने अमेरिका की सिलिकॉन वैली पहुंचे. उन्होंने यहां की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अप्लाइड फिजिक्स विभाग में दाखिला लिया था लेकिन दो ही दिन बाद उसे छोड़ कर आ गए. उस वक्त छोटे भाई किम्बल मस्क ने क्वीन्स यूनिवर्सिटी से स्नातक पूरी की ही थी. किम्बल ईलॉन से 15 महीने छोटे हैं. वे भाई के पास कैलिफोर्निया आ गए. उस दौरान इंटरनेट का जमाना शुरू ही हुआ था. दोनों भाइयों ने मिल कर एक स्टार्टअप शुरू करने का फैसला लिया जिसका नाम रखा गया जिप2. यह एक ऑनलाइन बिजनेस डायरेक्ट्री थी जो नक्शों से लैस थी. उन्हें निवेशक मिलते गए और कंपनी फलती फूलती गई. 1999 में उन्होंने 30 लाख अमेरिकी डॉलर में उस कंपनी को कंप्यूटर निर्माता कॉम्पैक को बेच दिया.
इसके बाद उन्होंने अकेले X.com नाम की ऑनलाइन फाइनैंस कंपनी खोली. दिलचस्प बात यह थी कि जिस इमारत में इस कंपनी का दफ्तर था, उसी में कुछ महीने बाद ऐसी ही एक और कंपनी खुली. कॉनफिनिटी नाम की यह कंपनी X.com की प्रतिद्वंद्वी बन गई थी. मार्च 2000 में ये दोनों कंपनियां मर्ज हो गईं और आज दुनिया इसे पेपॉल के नाम से जानती है. अक्टूबर 2002 में ईबे ने डेढ़ अरब अमेरिकी डॉलर के शेयर के बदले पेपॉल को खरीद लिया.
इंसानी अस्तित्व को बचाने की मुहिम
पेपॉल छोड़ने के बाद से ईलॉन मस्क ने कई कंपनियां बनाईं. इनमें से दो - स्पेस एक्स और टेस्ला मोटर्स - पर तो उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी. मस्क की मौजूदा सभी कंपनियों का मकसद है इंसानी अस्तित्व पर मंडरा रहे तीन खतरों का उपाय खोजना: जलवायु परिवर्तन, एक ही ग्रह पर इंसानी निर्भरता और इंसानों की नस्ल का किसी काम का ना रह जाने का खतरा. मशीनें जितनी सक्षम हो रही हैं, ये खतरा उतना ही बढ़ता जा रहा है. टेस्ला मोटर्स, सोलर सिटी और द बोरिंग कंपनी ऊर्जा के साफ विकल्पों के इस्तेमाल से जलवायु परिवर्तन का सामना करने की कोशिश में लगी हैं.
मस्क का मानना है कि इंसान अगर एक ही ग्रह पर सीमित रहेंगे तो अपना अस्तित्व बचा नहीं सकेंगे. कभी ना कभी कोई आपदा आएगी अब वो चाहे प्राकृतिक हो या इंसान की पैदा की हुई. किसी विशाल क्षुद्रग्रह का धरती पर गिरने, विशाल ज्वालामुखी के फटने या फिर परमाणु युद्ध से वजह चाहे जो कभी ना कभी इंसान का अस्तित्व मिट सकता है. इसलिए मई 2002 में उन्होंने धरती से बाहर जीवन खोजने के मकसद से स्पेस एक्स की शुरुआत की. उन्होंने रॉकेट डिजाइन करना सीखा और आज वे ना केवल स्पेस एक्स के सीईओ हैं, बल्कि वहां के चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर भी हैं.
रूखे स्वभाव के हैं मस्क
मस्क और उनके जैसी सोच रखने वाले मानते हैं कि आर्टिफिशियल जनरल सुपरिंटेलीजेंस (एजीएसआई), आसान भाषा में कहें तो मशीनों की कृत्रिम बुद्धि इंसानों के लिए खतरा बन जाएगी. इसी सोच के साथ दिसंबर 2015 में उन्होंने गैर लाभकारी कंपनी ओपन एआई की शुरुआत की. इसके पीछे विचार है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इंसानों के लिए फायदेमंद बनाने का और उससे उठने वाले जोखिम को खत्म करने का.
ईलॉन मस्क जीनियस हैं, उनके पास गजब के आइडिया हैं लेकिन उनके साथ काम कर चुके लोग बताते हैं कि उनके साथ काम करना कितना मुश्किल है. कहा जाता है कि वे हफ्ते में 80 घंटे काम करते हैं और दूसरों से भी यही उम्मीद करते हैं. जब वे काम को ले कर तनाव में होते हैं तो अपनी टीम पर खूब चीखते चिल्लाते भी हैं. बताया जाता है कि छोटी सी गलती पर भी खूब खरी खोटी सुननी पड़ जाती है. ट्विटर पर भी उनका यह मिजाज देखने को मिलता है. कई बार वे ऐसे ट्वीट कर चुके हैं, जिनके लिए बाद में उन्हें माफी मांगनी पड़ी है.
कोरोना संकट के बीच जब अमेरिका में उनकी टेस्ला की फैक्ट्री बंद हुई तो दो महीने बाद उन्होंने खुद ही उसे खोलने का फैसला कर लिया. ऐसा तब जब प्रशासन की ओर से कहा गया था कि टेस्ला का कारखाना जरूरी उद्योगों की सूची में नहीं आता. इस संकट के बीच स्पेस एक्स की ओर से अंतरिक्ष में अपना मिशन भेज कर मस्क यह साबित करना चाह रहे हैं कि दुनिया में कुछ भी हो जाए, उनका काम नहीं रुकता है. वैसे भी, इंसानों की दुनिया कहीं रुक ना जाए, इसी मकसद के लिए तो वे काम कर रहे हैं.
डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा पर फिर से "सरकार समर्थित आतंकवाद" का दोष लगा कर देश पर नए प्रतिबंध लगा दिए हैं. नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ने साम्यवादी सरकार के साथ रिश्तों में दोबारा जान डालने का वादा किया था.
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने इस कदम का एलान करते हुए खासतौर से अमेरिकी भगोड़ों को क्यूबा में पनाह मिलने का आरोप लगाया. इसके साथ ही क्यूबा पर कोलंबियाई गुरिल्ला कमांडरों का प्रत्यर्पण करने से इनकार करने और वेनेजुएला में निकोलस मादुरो का समर्थन करने के आरोप भी लगाए. क्यूबा में "सरकार समर्थित आतंकवाद" को लेकर कई सालों से चर्चा होती रही है लेकिन ट्रंप प्रशासन ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में इस पर फैसला लिया है.
क्यूबा को "सरकार समर्थित आतंकवाद" की वजह से काली सूची में पहले भी डाला गया था और इस सूची से बाहर निकालना पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की विदेश नीति की उपलब्धियों में गिना जाता है. तब उपराष्ट्रपति रहे जो बाइडेन ने भी इन कोशिशों का समर्थन किया था. 1959 में फिदेल कास्त्रो के देश का शासन अपने हाथ में लेने के बाद से अमेरिका के साथ क्यूबा के रिश्तों में ठहराव आ गया.
ट्रंप ने ईरान की तरह ही क्यूबा से भी अमेरिका के रिश्तों को ओबामा के दौर में आए बदलाव को वापस करने की बात कही थी. ट्रंप ने क्यूबा के प्रति कड़ा रुख बनाए रखा और कई प्रतिबंध दोबारा लगा दिए. इन प्रतिबंधों को या तो ओबामा प्रशासन ने हटाया या फिर 2015 में क्यूबा से सामान्य कूटनीतिक संबंध बहाल होने के बाद हटाया गया. मादुरो का समर्थन करने के लिए क्यूबा की आलोचना करने के साथ ही ट्रंप प्रशासन का यह भी मानना है कि अमेरिकी राजनयिकों पर कथित सोनिक हमले के पीछे क्यूबा का हाथ हो सकता है. 2016 के आखिर में हवाना में हुए इन हमलों के बाद दर्जनों अमेरिकी राजनयिकों को दिमागी बीमारी हुई थी.
हालांकि अमेरिका के कम ही सहयोगी देश क्यूबा को अब भी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का समर्थन करने वाला देश मानते हैं. क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिग्ज ने अमेरिकी कार्रवाई की निंदा की है. उन्होंने ट्वीटर पर लिखा है, "अमेरिकी राजनीतिक मौकापरस्ती को वो लोग जानते हैं जो ईमानदारी से आतंकवाद के अभिशाप और उसके पीड़ितों के बारे में चिंता करते हैं."
बाइडेन की मुश्किलें बढ़ाने वाला फैसला
अमेरिकी संसद के अंतरराष्ट्रीय मामलों की कमेटी के प्रमुख ग्रेगरी मीक्स का कहना है कि ट्रंप के इस कदम से क्यूबा के लोगों की कोई मदद नहीं होगी और यह सिर्फ बाइडेन प्रशासन के हाथ बांधने के लिए उठाया गया है. मीक्स ने कहा है, "राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के एक हफ्ते पहले क्यूबा को सरकार समर्थित आतंकवाद का यह दर्जा और खुद अमेरिका की संसद पर घरेलू आतंकी हमले कि लिए लोगों को उकसाना... यही पाखंड है."
हालांकि इस कदम पर क्यूबाई अमेरिकी और वेनेजुएला के निर्वासित खुशी मना रहे हैं. ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा से विमानों की आवाजाही, कारोबार और आर्थिक लेनदेन पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. गरीब देश के लोगों के अमेरिका में रहने वाले रिश्तेदार जो उन्हें पैसा भेजते हैं, उस पर अब रोक लग जाएगी. इस पैसे से ही उनका खर्च चलता है. हालांकि नए कदमों का सबसे ज्यादा असर दोनों देशों के राजनयिक रिश्तों पर होगा. ताजा प्रतिबंधों के बाद क्यूबा उत्तर कोरिया, सीरिया और ईरान की कतार में आ गया है जिन्हें अमेरिकी सरकार समर्थित आतंकवाद का दोषी मानती है.
"कोई कानूनी या नैतिक आधार" नहीं
क्यूबा उन अमेरिकी भगोड़ों को अमेरिका के हाथ में सौंपने से लगातार इनकार करता रहा है जिन्हें उसने अपने यहां शरण दे रखी है. इनमें 1970 के दशक का वह काला चरमपंथी भी शामिल है जिसे न्यूजर्सी के सैनिक को मारने का दोषी माना गया. क्यूबा ने राजनीतिक शरण देने के अलावा मुफ्त में घर और स्वास्थ्य सेवाओं के साथ कुछ दूसरी सुविधाएं भी दे रखी हैं. साथ ही वह यह भी दावा करता है कि अमेरिका के पास उन्हें लौटाने की मांग करने का "कोई कानूनी या नैतिक आधार" नहीं है.
हालांकि 2015 में अमेरिका के साथ संबंध बेहतर होने के बाद क्यूबा का मादुरो को मजबूत समर्थन ज्यादा परेशानी पैदा कर रहा है. मादुरो को तानाशाह माना जाता है जिनके कुप्रबंधन ने 50 लाख वेनेजुएलावासियों को सड़कों पर ला खड़ा किया है.
क्यूबा का मादुरे के साथ लंबे समय से सहयोग चला आ रहा है. हालांकि वह वेनेजुएला में 20,000 सैनिकों और खुफिया एजेंटों की मौजूदगी से इनकार करता है. उसका यह भी कहना है कि उसने वहां कोई सुरक्षा अभियान नहीं चलाया है. क्यूबा के अधिकारी यह जरूर कहते हैं कि वो जिसे वैध सरकार मानते हैं, उसके साथ रक्षा और खुफिया सहयोग करने का पूरा अधिकार है. बीते दो दशकों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है. वेनेजुएला अरबों डॉलर का तेल भेज रहा है और उसके बदले में हजारों कामगार हासिल कर रहा है जिनमें स्वास्थ्य कर्मचारी भी शामिल हैं.
मई 2020 में अमेरिकी विदेश विभाग ने क्यूबा को उन देशों की सूची में डाला जो अमेरिका के आतंकवाद रोधी कार्यक्रमों में सहयोग नहीं कर रहे हैं. इसके पीछे विदेश विभाग का कहना था कि कोलंबिया के विद्रोही गुट नेशनल लिबरेशन आर्मी के कई सदस्य क्यूबा में हैं जबकि कोलंबिया की सरकार उनके प्रत्यर्पण की मांग लगातार कर रही है. नेशनल लिबरेशन आर्मी को अमेरिका और कोलंबिया ने आतंकवादी संगठन माना है. क्यूबा इस अनुरोध को खारिज करता है. उसका कहना है कि यह कोलंबिया सरकार के साथ शांति की कोशिशों के लिए जो प्रोटोकॉल तय किए गए हैं उनका उल्लंघन होगा.
पिछले दिनों एक थिंक टैंक ने शोध में दावा किया था कि फौज में आधे से ज्यादा जवान तनाव की चपेट में हैं. सेना का कहना है कि शोध के लिए सैंपल साइज बहुत छोटा है और असली तस्वीर के लिए इस साइज को बढ़ाने की जरूरत है.
रक्षा मंत्रालय के थिंक टैंक द युनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (यूएसआई) ने पिछले दिनों एक शोध में कई अहम जानकारी दी थी. उसके शोध में दावा किया गया था कि 13 लाख जवानों वाली भारतीय फौज में आधे से अधिक गंभीर तनाव के शिकार हैं. अध्ययन में कहा गया था कि भारतीय सेना हर साल दुश्मन या आतंकवादी हमलों की तुलना में आत्महत्या, भयावह घटनाओं और अप्रिय घटनाओं के कारण अधिक जवानों को खो रही है. शोध में दावा किया गया था कि दो दशक में भारतीय सेना में तनाव का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ा है. रिपोर्टों के मुताबिक साल 2010 से अब तक सेना के अलग-अलग पदों पर तैनात 1100 कर्मियों ने खुदकुशी की है. हालांकि शोध के सामने आने के बाद ही मीडिया में सूत्रों के हवाले से आई खबरों में कहा गया था कि केवल 400 जवानों के छोटे नमूने के कारण सेना ने अध्ययन को नहीं माना है, हालांकि उसने माना कि तनाव एक मुद्दा है.
बताया जाता है कि अध्ययन एक सेवारत कर्नल द्वारा किया गया था और पिछले महीने यूएसआई की वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया था, हालांकि इसे बीते दिनों वेबसाइट से हटा दिया गया था. यूएसआई ने एक साल के शोध के बाद यह रिपोर्ट जारी की थी.
मंगलवार 12 जनवरी को सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने अपने वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पिछले साल के बारे में बात की साथ ही जवानों में तनाव के मुद्दे पर भी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि पिछला साल चुनौतियों से भरा था. एक तरफ कोरोना महामारी से निपटना बड़ी चुनौती था तो दूसरी तरफ देश के उत्तरी सीमाओं पर उत्पन्न हुई स्थिति.
इस शोध पर सेना प्रमुख ने कहा है कि जवानों में तनाव को लेकर यूएसआई की रिपोर्ट में सैंपल साइज काफी कम था. उन्होंने कहा, "99 प्रतिशत सटीकता के लिए कम से कम 19,000 सैंपल साइज होना चाहिए. हम जवानों में तनाव कम करने के लिए लगातार उपाय अपना रहे हैं. पिछले साल की तुलना में जवानों की आत्महत्या करने के मामलों में कमी आई है."
यूएसआई की रिपोर्ट में कहा गया था कि बिना काम का तनाव भी बहुत ज्यादा है. रिपोर्ट में कहा गया था कि तनाव का असर सैनिकों के स्वास्थ्य के अलावा युद्ध क्षमता पर भी पड़ रहा है.
चीन के साथ तनाव कायम
इस बीच चीन के साथ तनाव के मुद्दे पर भी सेना प्रमुख ने बताया, "हम चीन के साथ सीमा पर शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद कर रहे हैं, पर हम हर तरह की स्थिति से निपटने को तैयार हैं."
भारतीय और चीनी सेना के बीच पूर्वी लद्दाख के मुद्दे पर अब तक आठ दौर की बातचीत हो चुकी है. साथ ही उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और चीन मिलकर भारत के लिए एक शक्तिशाली खतरा पैदा करते हैं और टकराव की आशंका को दूर नहीं किया जा सकता है.
कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा था कि पूर्वी लद्दाख में चीन ने अपने 10 हजार जवानों को पीछे हटा लिया है, हालांकि इस पर सेना प्रमुख ने कहा कि हर साल चीन के सैनिक ट्रेनिंग के लिए आगे आते हैं और फिर बाद में वो चले जाते हैं. उन्होंने बताया कि विवाद वाली जगह से कोई भी पीछे नहीं हटा है और पूर्वी लद्दाख के हालात में कोई बदलाव नही आया है.
सुप्रीम कोर्ट ने नए कृषि कानूनों पर रोक लगा दी है. सरकार और किसानों के बीच गतिरोध को खत्म करने के लिए अदालत एक समिति गठित करेगी, लेकिन किसानों की तरफ से इस समिति की चर्चा में शामिल होने की उम्मीद कम लग रही है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तीनों नए कृषि कानून फिलहाल देश में कहीं भी लागू नहीं हो पाएंगे, लेकिन इन्हें निरस्त नहीं किया जाएगा. आदेश देते हुए चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा, "हम तीनों कृषि कानूनों पर अगले आदेश तक रोक लगा रहे हैं." अदालत ने इसके साथ तीनों कानूनों और उन्हें लेकर किसानों की मांगों की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक समिति बनाने का भी आदेश दिया.
समिति के सदस्य नियुक्त करने से पहले अदालत ने सरकार से विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा है. चीफ जस्टिस ने अपनी तरफ से जाने माने कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, भारतीय किसान यूनियन के एक धड़े के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, साउथ एशिया इंटरनेशनल फूड पॉलिसी संस्था के निदेशक प्रमोद कुमार जोशी और शेतकारी संगठन के अनिल घनवत को समिति के सदस्यों के रूप में मनोनीत किया.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप गतिरोध को अंत करने में कितना सहायक सिद्ध होगा यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि बड़ी संख्या में धरने पर बैठे किसानों ने कानूनों पर रोक लगाने और समिति गठित करने के आदेश को ठुकरा दिया है. उनका कहना है कि उनकी मांग तीनों कानूनों को निरस्त करने की है और सिर्फ रोक लगाए जाने से वे संतुष्ट नहीं हैं. सुनवाई में किसानों की तरफ से शामिल होने वाले दुष्यंत दवे, कॉलिन गोंसाल्विस, एचएस फूल्का जैसे कई वकील मंगलवार की सुनवाई में शामिल भी नहीं हुए.
कुछ किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता एमएल शर्मा ने जब अदालत को बताया कि किसान किसी भी समिति के आगे आने के लिए तैयार नहीं हैं तो चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालत को यह स्वीकार्य नहीं है और हर वो व्यक्ति जो दिल से इस समस्या के समाधान में रूचि रखता है वो समिति के आगे जाएगा. जानकारों के बीच सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लेकर राय बंटी हुई है.
The recent positions of the members of committee by SC on farm bills: Ashok Gulatihttps://t.co/AwrpliqEEB
कुछ जानकार इसे गतिरोध का समाधान ढूंढने की दिशा में अच्छा कदम मान रहे हैं तो कुछ इसे सरकार के लिए मददगार और किसानों के लिए निराशाजनक मान रहे हैं. ग्रामीण विकास और कृषि संबंधित मुद्दों पर रिपोर्ट करने वाली समाचार वेबसाइट रूरलवॉइस के मुख्य संपादक हरवीर सिंह ने डीडब्ल्यू को बताया कि कोर्ट के इस आदेश ने बातचीत की गुंजाइश तो उत्पन्न की है लेकिन गतिरोध का समाधान किसानों और सरकार के बीच बातचीत से ही होगा.
हरवीर सिंह ने बताया कि समिति के जिन सदस्यों के नामों की घोषणा कोर्ट ने की है वो सब इन तीनों कृषि कानूनों के पक्ष में हैं और इसीलिए किसान उनसे बात नहीं करेंगे. यह बात और भी कई लोग कह चुके हैं.
हरवीर सिंह ने यह भी बताया कि किसान तो यहां तक कह चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट का काम किसी भी कानून की संवैधानिकता पर फैसला देना होता है जबकि यहां तो कानूनों के बनाए जाने का ही विरोध हो रहा है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों के प्रदर्शन पर असर पड़ने की गुंजाइश कम ही लगती है.dw.com
दुनिया भर के कीटों के साम्राज्य में से 1000 कीट लुप्त होने जा रही हैं. वैज्ञानिक इसे लेकर चिंता जता रहे हैं. जैव विविधता से लेकर फसलों के उगने और तमाम दूसरी प्राकृतिक गतिविधियों में इन कीटों की अहम भूमिका होती है.
जलवायु परिवर्तन, कीटनाशक, प्रकाश प्रदूषण और खर पतवार नाशकों की वजह से धरती हर साल 1 से 2 फीसदी कीटों को खो रही है. कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी के कीटविज्ञानी डेविड वागनर प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमीज ऑफ साइंसेज की 12 रिसर्चों के पैकेज के प्रमुख लेखक हैं. इन रिसर्चों में दुनिया भर के 56 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया है. वागनर के मुताबिक वैज्ञानिकों को यह पता लगाना होगा कि क्या कीटों के लुप्त होने की दर दूसरे जीवों की तुलना में ज्यादा बड़ी है. वागनर का कहना है, "कुछ कारण हैं जो चिंता बढ़ा" रहे हैं क्योंकि वे कीटनाशकों, खरपतावार नाशकों और प्रकाश प्रदूषण के "हमलों का निशाना" बन रहे हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पहेली के सारे टुकड़े उनके सामने नहीं आए हैं, इसलिए उन्हें इसका परिमाण और जटिलता समझने में दिक्कत हो रही है. इसी वजह से वे दुनिया का ध्यान भी इस ओर ठीक से नहीं दिला पा रहे हैं. रिसर्च रिपोर्ट के सह लेखक और इलिनोय यूनिवर्सिटी की कीटविज्ञानी मेय बेरेनबाउम का कहना है, "कीटों का कम होने की मात्रा का आकलन करना और घटने की दर का पता लगाना बहुत मुश्किल है."
मामला और ज्यादा इसलिए बिगड़ गया है क्योंकि लोग कीटों को पसंद नहीं करते. कीट दुनिया भर में खाने पीने की चीजों के लिए जरूरी परागण में मदद करते हैं, खाद्य श्रृंखला में अहम भूमिका निभाते हैं और कूड़े के निपटारे में मदद करते हैं. बावजूद इसके इंसान को इनकी परवाह नहीं है. वागनर कीटों को ऐसा धागा मानते हैं जिनसे धरती और जीवन का आधार बना है.
कीटों में सबसे ऊंचा दर्जा है मधुमक्खियों और तितलियों का. इन्हें देख कर कीटों की समस्याों और उनकी घटती तादाद का आकलन किया जा सकता है. खासतौर से मधुमक्खी. बीमारियों, परजीवियों, कीटनाशकों, खर पतवार नाशकों और भोजन की कमी के कारण उनकी संख्या में नाटकीय कमी आई है. जलवायु परिवर्तन के कारण जिन इलाकों का वातावरण सूख रहा है, वहां तितलियों को भोजन की दिक्कत हो रही है. इसके अलावा खेती से खर पतावार और फूल हटाए जाने के कारण उन्हें मकरंद नहीं मिल पा रहा. वागनर कहते हैं कि अमेरिका में तो एक विशाल जैविक रेगिस्तान बन रहा है जिसमें बस सोयाबीन और मक्का ही बाकी बचेगा.
सोमवार को जारी हुए रिसर्च पेपर में कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है लेकिन समस्या की एक विशाल और अधूरी तस्वीर दिखाई गई है ताकि लोगों का ध्यान खींचा जा सके. वैज्ञानिकों ने अब तक करीब 10 लाख कीटों की प्रजातियों का पता लगाया और माना जाता है कि अभी करीब 40 लाख प्रजातयों की खोज होनी बाकी है.
डेलावेयर यूनिवर्सिटी के डग टेलेमी इस रिसर्च में शामिल नहीं थे लेकिन उनका कहना है कि दुनिया ने, "बीते 30 सालों में कीटों को मारने के नए तरीके ढूंढने पर अरबों डॉलर खर्च किए हैं और उसकी तुलना में उन्हें संरक्षित करने पर महज चवन्नी अठन्नी ही खर्च किया है."
दुनिया भर में बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान शुरू होने के बावजूद इस साल हर्ड इम्यूनिटी हासिल नहीं हो सकेगी. ऐसा कहना है विश्व स्वास्थ्य संगठन के वरिष्ठ वैज्ञानिकों का.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की चीफ साइंटिस्ट सौम्या स्वामीनाथन का कहना है कि टीकाकरण शुरू हो जाने के बाद भी 2021 में दुनिया हर्ड इम्यूनिटी हासिल नहीं कर सकेगी. उन्होंने इसके तीन कारण बताए: पहला, विकासशील देशों में पूरी जनता तक टीके का ना पहुंचना; दूसरा, बड़ी संख्या में लोगों का टीके पर विश्वास ना करना और तीसरा, वायरस की किस्म का बदलना.
दुनिया के अधिकतर विकसित देशों में पहले दौर का टीका लगना शुरू हो गया है. इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और यूरोप के देश शामिल हैं. हर्ड इम्यूनिटी तभी बनती है जब जनता में इतनी बड़ी संख्या में लोगों में इम्यूनिटी पैदा हो जाए कि यह बीमारी के संक्रमण को रोक सके. जर्मनी में वैज्ञानिकों का मानना है कि 60 फीसदी आबादी को टीका लगने के बाद ही हर्ड इम्यूनिटी विकसित की जा सकती है.
सौम्या स्वामीनाथन ने सोमवार को एक बैठक के दौरान कहा, "2021 में हम किसी भी तरह की हर्ड इम्यूनिटी हासिल नहीं कर सकेंगे." उन्होंने कहा कि इस साल भी सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क लगाना और लगातार हाथ धोते रहना जरूरी होगा. उन्होंने इतने कम समय में टीका तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों की खूब तारीफ भी की. इस वक्त बायोनटेक फाइजर, एस्ट्रा जेनेका और मॉडेर्ना की वैक्सीन सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जा रही है.
स्वामीनाथन ने लोगों से धैर्य रखने की अपील की है और कहा है कि सब तक टीका पहुंचाने में वक्त लगेगा ही क्योंकि यहां अरबों डोज की बात हो रही है और कंपनियों को इन्हें तैयार करने के लिए वक्त की जरूरत है, "वैक्सीन आएंगी.. सब देशों तक पहुंचेंगी.. लेकिन इस दौरान हमें साफ सफाई के मानकों को नहीं भूलना चाहिए."
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की प्रेस कॉन्फ्रेंस में डब्ल्यूएचओ के आउटब्रेक अलर्ट एंड रिस्पॉन्स नेटवर्क के अध्यक्ष डेल फिशर ने कहा कि निकट भविष्य में "सामान्य जीवन" में लौटना संभव नहीं होगा, "हम जानते हैं कि हमें हर्ड इम्यूनिटी तक पहुंचना है और हम यह भी जानते हैं कि हमें ज्यादा से ज्यादा देशों में यह लक्ष्य हासिल करना है. इसलिए 2021 में तो हम ऐसा देख सकेंगे." उन्होंने कहा कि हो सकता है कि कुछ देश हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने में सफल हो सकें लेकिन बावजूद इसके जीवन "नॉर्मल" नहीं हो सकेगा क्योंकि बॉर्डर कंट्रोल के लिहाज से यह पेचीदा विषय है. इस बीच अमेरिका में नब्बे लाख लोगों को टीका लग चुका है, तो जर्मनी में छह लाख लोगों को.
केंद्र सरकार के तीन कृषि क़ानूनों पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोक लगा दी और इसके बाद एक समिति का गठन किया है. कृषि और आर्थिक मामलों के जानकारों की यह समिति विभिन्न पक्षों को सुनेगी और ज़मीनी स्थिति का जायज़ा लेगी.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह भी तर्क दिया गया कि किसान संगठन किसी समिति के गठन के पक्ष में नहीं हैं तो सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि जो भी 'सही मायने में' समाधान खोजने में रुचि रखता होगा वो ऐसा करेगा.
सुप्रीम कोर्ट ने चार सदस्यों की एक समिति का गठन किया है जिसमें भारतीय किसान यूनियन के भूपिंदर सिंह मान, शेतकारी संगठन के अनिल घनवत, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और डॉक्टर प्रमोद कुमार जोशी शामिल होंगे.
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने दिन में सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि वह क़ानूनों को रद्द करना चाहती है लेकिन दोनों पक्षों के बीच बिना किसी गतिविधि के इसे अनिश्चितकालीन के लिए नहीं किया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा था कि केंद्र सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच जिस तरह से बातचीत हो रही है वह 'बहुत निराशाजनक' है. मध्यस्थता के लिए जिस समिति का गठन किया गया है उसमें चार सदस्यों को जगह दी है. आइए जानते हैं कि यह चार लोग कौन हैं.
भूपिंदर सिंह मान
भारतीय किसान यूनियन से जुड़े भूपिंदर सिंह मान कृषि विशेषज्ञ होने के साथ-साथ अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति के चेयरमैन हैं और पूर्व राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं.
मान का जन्म 1939 में गुजरांवाला (वर्तमान में पाकिस्तान) में हुआ था. किसानों के संघर्ष में उनकी भागीदारी के लिए 1990 में उन्हें राष्ट्रपति ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था.
1966 में फ़ार्मर फ़्रेंड्स एसोसिएशन का गठन किया गया जिसके वो संस्थापक सदस्य थे इसके बाद यह संगठन राज्य स्तर पर 'पंजाब खेती-बाड़ी यूनियन' के नाम से जाना गया. राष्ट्रीय स्तर पर यह संगठन भारतीय किसान यूनियन बन गया और इसी संगठन ने बाक़ी कृषि संगठनों के साथ मिलकर किसान समन्वय समिति का गठन किया.
भूपिंदर सिंह मान ने पंजाब में फ़ूड कॉर्पोरेशन इंडिया में भ्रष्टाचार से लेकर चीनी मिलों में गन्ना सप्लाई और बिजली के टैरिफ़ बढ़ाने जैसे मुद्दों को उठाया.
14 दिसंबर को अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति के तहत आने वाले कृषि संगठनों ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाक़ात की थी. मान ने कृषि क़ानूनों का समर्थन किया था.
उस समय 'द हिंदू' अख़बार से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि कृषि क्षेत्र में प्रतियोगिता के लिए सुधार ज़रूरी हैं लेकिन किसानों की सुरक्षा के उपाय किए जाने चाहिए और ख़ामियों को दुरुस्त किया जाना चाहिए.
अनिल घनवत
अनिल घनवत महाराष्ट्र के प्रमुख किसान संगठन शेतकारी संगठन के अध्यक्ष हैं.
शेतकारी संगठन कृषि क़ानूनों पर केंद्र सरकार का समर्थन कर रहा है. यह किसान संगठन केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मिलकर कृषि क़ानूनों पर अपना समर्थन दे चुका है.
महाराष्ट्र स्थित इस संगठन का गठन मशहूर किसान नेता शरद जोशी ने किया था. जिन्होंने अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति का गठन किया था.
अशोक गुलाटी
कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी को 2015 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. भारत सरकार की खाद्य आपूर्ति और मूल्य निर्धारण नीतियों के लिए सलाह देने वाली सलाहकार समिति कमिशन फ़ॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस के वो चैयरमेन रह चुके हैं.
गुलाटी ने कृषि से जुड़े विभिन्न विषयों पर शोध किया है. यह विषय खाद्य सुरक्षा, कृषि-व्यापार, चेन सिस्टम, फसल बीमा, सब्सिडी, स्थिरता और ग़रीबी उन्मूलन से जुड़े हुए हैं.
डॉक्टर प्रमोद कुमार जोशी
जोशी भी कृषि शोध के क्षेत्र में एक प्रमुख नाम हैं. वो हैदराबाद के नैशनल एकेडमी ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च मैनेजमेंट और नैशनल सेंटर फ़ॉर एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली के अध्यक्ष रह चुके हैं.
इससे पहले जोशी इंटरनैशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट में दक्षिण एशिया के कॉर्डिनेटर रहे हैं.(bbc.com/hindi)
किसान नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि 26 जनवरी को हमारा आंदोलन ऐतिहासिक होने जा रहा है. हम क़ानून रद्द करवाने को लेकर आंदोलन कर रहे हैं.
"सरकार की नीति और नियत जैसी रही है, वहीं इस कमिटी के भी मामले में देखने को मिल रही है. कमिटी के जो सदस्य हैं उनकी दलील सरकारों के पक्ष में रही है."
"हम सभी आंखें सुप्रीम कोर्ट की ओर लगी हुई थी. हमारी लड़ाई सरकार से है ना कि किसी कमिटी से है."
"हम लोहड़ी में अब भी तीन कृषि क़ानूनों को जलाने जा रहे हैं. 26 जनवरी के प्रदर्शन के बारे में कहा गया कि वो पूरी तरह से शांतिपूर्ण प्रदर्शन होगा. लेकिन जिस तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं कि हम कोई हमला करने जा रहे हैं तो यह एक गैर-जिम्मेवार हरकत है. हमने कभी भी हिंसा का रास्ता अख्तियार नहीं किया और ना करेंगे."(bbc.com/hindi)
पत्थलगांव, 12 जनवरी। थाना बगीचा क्षेत्रान्तर्गत नकली सोने के बिस्किट दिखाकर तीस लाख की ठगी करने वाले एक आरोपी को पुलिस ने साल भर बाद गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस फरार 2 आरोपियों की तलाश कर रही है। आरोपी ने रुपये को चुनाव में खर्च करना बताया।
पुलिस के अनुसार 3 मई 2020 को थाना बगीचा क्षेत्रान्तर्गत प्रार्थिया ने थाना में रिपोर्ट दर्ज कराई कि वह 26 दिसंबर 2019 को अनूप सोनी, दीपक गुप्ता, भिखारी ढोलू सोनावाला के द्वारा सोना खरीद कर अधिक फायदा पहुंचाने का लालच देकर 30 लाख रुपए की ठगी कर ले गए। रिपोर्ट पर थाना बगीचा में अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया।
मुखबिर से सूचना मिली कि पटना जिला कोरिया निवासी विजय सूर्यवंशीउर्फ दीपक (24 वर्ष) के द्वारा अपने साथियों के साथ मिलकर प्रार्थिया मेरी तिग्गा को टॉवर लगवाने के नाम से लगातार 3 से 4 माह तक संपर्क किए एवं विश्वास जीत लेने के बाद मेरी तिग्गा को सोने के स्कीम के बारे बताया गया और मेरी तिग्गा को सोने के बिस्किट दिखाया गया और विश्वास में लेकर सोना खरीदने से अधिक लाभ मिलेगा बताकर मेरी तिग्गा से 30 लाख रुपए जो मेरी तिग्गा और उसके पति को पेंशन के रूप में मिली थी, की ठगी कर ली। उक्त 30 लाख रुपए को डीडीसी चुनाव में विजय सूर्यवंशी के द्वारा खर्च कर दिया गया एवं जितने के बाद अपने साथियों को बहुत सारा पैसा दिलाने का वादा किया, परन्तु विजय सूर्यवंशी उक्त डीडीसी चुनाव में हार गया ।
विजय सूर्यवंशी उर्फ दीपक (अपना नकली नाम दीपक रखा था) को प्रार्थिया से पहचान कराया गया जो प्रार्थिया के द्वारा पहचान किया गया एवं विजय सूर्यवंशी को आज गिरफ्तार कर न्यायालय पेश किया गया। आरोपी का पूर्व भी आपराधिक रिकार्ड है जो थाना बैकुंठपुर में 7 लाख रुपए का नकली सोना का ठगी की थी।
किसानों के रोष के चलते हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की करनाल की रैली रद्द होने पर और करीब 900 लोगों पर मामला दर्ज़ होने पर राज्य में बड़ी हलचल होनी शुरू हो गई है.
एक तरफ इंडियन नेशनल लोक दल के नेता अभय चौटाला ने अपना कंडीशनल (सशर्त) त्याग पत्र विधान सभा अध्यक्ष को भेज दिया है वहीं दूसरी तरफ जननायक जनता पार्टी (जजपा) के सभी विधायक और सीनियर नेता दिल्ली केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलने के रास्ते में हैं.
बीबीसी से बात करते हुए जजपा के हरियाणा प्रधान निशान सिंह ने कहा कि उनकी मीटिंग का एजेंडा एक ही रहेगा कि किसान आंदोलन के चलते मामला सेंसिटिव होता जा रहा हैं और केंद्र सरकार उसको इस तरीके से आगे से डील करे ताकि किसानों में और ज्यादा रोष उत्पन्न ना हो.
उन्होंने कहा, "हम सरकार को वस्तुस्थिति बताने जा रहे हैं और आशा है कि किसानों का हल जल्दी ही निकलेगा."
ये पूछे जाने पर कि क्या दुष्यंत चौटाला इस्तीफ़ा देंगे जैसे कि किसानों कि माँग हैं, तो निशान सिंह ने कहा कि दुष्यंत अपना काम कर रहे हैं और दुष्यंत का सम्बन्ध एक राज्य से हैं और किसानों की बिल की माँग केंद्र सरकार से हैं. निशान सिंह ने बीजेपी से हरियाणा में समर्थन वापिस लेने से मना कर दिया.
दुष्यंत पर परिवार की राजनीति का आरोप
डॉक्टर सिक्किम नैन जो कि जजपा पार्टी की उचाना हल्का से अध्यक्ष पद से प्रधान पद से त्याग पत्र दे चुकी हैं, का कहना है कि उन्होंने दुष्यंत चौटाला के अंदर चौधरी देवी लाल वाली बात देखी थी इसीलिए उचाना विधान सभा क्षेत्र से दुष्यंत चौटाला के लिए जी जान लगा दी थी.
सिक्किम नैन ने कहा, "हम सबने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया था दुष्यंत चौटाला को मनाने के लिए कि वो भाजपा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लें और किसानों के समर्थन में उतर जाएं. लेकिन दुष्यंत ने हमें नीचे देखने पर मजबूर कर दिया और गाँव वालों ने भी उनकी पार्टी को छोड़ दिया."
सिक्किम ने बताया कि अब वो पूरे ज़ोर से किसान आंदोलन के समर्थन में हैं और कुछ दिन पहले दुष्यंत चौटाला के उचाना हलके में होने वाले प्रोग्राम को भी विफल बनाने में साथ दिया था.
सिक्किम ने सवाल उठाया, "जब मुझे और गाँव वालों को ये लगा कि दुष्यंत ने सिर्फ अपने परिवार तक ही राजनीति को सिमटा लिया हैं ताकि अजय चौटाला जेल से बाहर रहें और पावर का वो अकेले फायदा उठाते रहें तब हम सबने जजपा को छोड़ दिया."
यहाँ यह बताना भी ज़रूरी हैं कि जब जजपा ने भाजपा को समर्थन देकर हरियाणा में सरकार बनाई थी तब अजय चौटाला जो जेल में सज़ा काट रहे थे उन्होंने भी दुष्यंत की शपथ समारोह में भाग लिया था. सज़ायाफ्ता अजय चौटाला को रातों रात जेल से बाहर देखकर लोगों ने सवाल उठाए थे कैसे जजपा के भाजपा को समर्थन के तुरंत बाद रातों रात अजय जेल से बाहर आ गए.
बीजेपी से समर्थन वापस लेने का दबाव
जजपा ने भाजपा के समर्थन और अजय चौटाला के बाहर आने को लेकर सवालों पर कहा था दोनों में कोई संबंध नहीं हैं.
टोहाना हलके से जजपा के विधायक देविंदर बबली जो कुछ समय पहले तक सरकार के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाते रहे हैं, ने किसान आंदोलन के संदर्भ में कहा कि उनको बहुत पीड़ा है कि किसान आंदोलन के चलते इतने सारे किसान ठंड में बाहर बैठे है.
उन्होंने कहा, "किसानों के बगैर कोई चुनाव नहीं जीत सकता. मैं भी नहीं. हमारी पार्टी की मीटिंग में हमने किसानों की समस्या के हल के लिए पूरी ताकत के साथ आवाज़ उठाई थी और अब तीसरी बार केंद्रीय नेतृत्व से आज मंगलवार को मिलने का समय भी लिया हुआ है. आज भी हम अपनी आवाज़ केंद्र तक पहुंचेंगे का काम करेंगे."
ये पूछे जाने पर कि किसान चाहते है कि दुष्यंत चौटाला को भाजपा से समर्थन वापस ले लेना चाहिए तो बबली ने कहा कि दुष्यंत अपना काम कर रहे हैं, ये मामला केंद्र सरकार का है.
उन्होंने कहा, "कुछ सियासी लोग किसानों के अंदर घुस कर इस तरह की माँग को उठवा रहे है. जजपा किसानों की पार्टी है और उनके हक़ के लिए सदा खड़ी मिलेगी."
जजपा पार्टी के एक सीनियर नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि उनकी पार्टी ने किसानों के मुद्दे पर अपना स्टैंड बार-बार बदला है और इस बात को पार्टी मुखिया के सामने कई बार लाया गया है कि गाँव, हलका स्तर पर उसका काफी विरोध भी हो रहा है अब तो कई गांव में ऐसे बोर्ड भी लगा दिए गए है जिसमे भाजपा और जजपा के नेताओ की एंट्री पर बैन भी लगा दिया गया है.
'सिर्फ़ राजनीति के लिए देवीलाल के नाम का इस्तेमाल'
चरखी दादरी से निर्दलीय विधायक सोमबीर सांगवान ने अपना समर्थन भाजपा-जजपा सरकार से वापस लेकर किसान आंदोलन को समर्थन दिया था.
उनका मानना है कि शायद जजपा और उसके नेता दुष्यंत चौटाला को ये लग रहा होगा कि समय के साथ लोग इस बात को भूल जाएंगे और वो अपने हाथ आए राज को तब तक क्यों हाथ से जाने दे.
सांगवान कहते हैं, "पंजाब के किसानों ने इस आंदोलन की अगुवाई की और हरियाणा के किसानों ने उसका समर्थन दिया. आज हरियाणा का बच्चा बच्चा किसान आंदोलन के समर्थन में है और जो लोग सरकार में बैठकर कभी इनके लिए सड़को पर गड्ढे खुदवाते है, कभी पुलिस के द्वारा आँसू गैस और पानी की बौछार करवाते है उनका इस बात का पता होना चाहिए कि ये इतिहास लिखा जा रहा है और लोग इसको कभी नहीं भूलेंगे."
देवीलाल के पौत्र और इंडियन नेशनल लोक दल के विधायक अभय चौटाला ने दुष्यंत चौटाला पर इलज़ाम लगाया कि सत्ता में बैठकर कुर्सी के सुख भोगने तक अपने आपको सीमित करने वाले अपने आपको देवीलाल के वारिस कहकर लोगों का पहले वोट लेते है और फिर जब किसानों को उनकी ज़रूरत है तो मुँह फेर लेते है.
उन्होंने कहा,"आज मैंने विधान सभा अध्यक्ष को एक चिट्ठी लिखी है कि अगर किसानों की समस्या का हल अगर 26 जनवरी तक नहीं हो जाता तो अगले दिन उनका त्याग पत्र स्वीकार कर लिया जाए."
अभय ने कहा कि दुष्यंत ने ऐसा पहली बार नहीं किया जब जनभावनाओं को ठेस पहुँचाई है, एक साल पहले भाजपा के ख़िलाफ़ वोट लेकर भाजपा के हाथों की कठपुतली बनकर कुर्सी पर बैठ गया और आज फिर जन भावना के विपरीत कुर्सी के लालच के लिए भाजपा का साथ देना यही दर्शाता है.
"अगर वो अपने आप को देवी लाल का असली वारिस कहता है तो लोगों के पक्ष में आकर खड़ा हो क्योंकि चौधरी देवी लाल ने लोगों की भावनाओं के लिए बड़े बड़े पदों को भी लात मार दी थी."
संघ का साथ देने का इतिहास रहा है
पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भूपिंदर सिंह हुडा जो कि सदन में विपक्ष के नेता भी हैं, ने कहा कि उन्होंने तो जजपा की असलियत शुरू से ही लोगों के सामने ला दी थी. "जिस दिन इन्होंने भाजपा की सरकार हरियाणा में बनवायी उसी दिन मैंने कहा था वोट किसी की और सपोर्ट किसी को."
हूडा ने कहा कि कुर्सी के लालच के लिए दुष्यंत चौटाला का किसानों को समर्थन ना देना ही एक कारण है कि ये सरकार अभी तक बची हुई है.
हूडा ने दावा किया, "लेकिन जिस दिन भी सदन लगेगा मैं अविश्वास प्रस्ताव लेकर आऊंगा उस दिन पता लग जाएगा कौन किसान के समर्थन में है और कौन किसान के खिलाफ खड़ा है."
पूरी स्थिति का आंकलन करते हुए, हरियाणा की राजनीति पर 'पॉलिटिक्स ऑफ़ चौधर' के लेखक डॉक्टर सतीश त्यागी कहते हैं कि किसानों के भारी विरोध के बावजूद भी हरियाणा में गठबंधन सरकार धड़ल्ले से चल रही है क्योंकि दुष्यंत चौटाला को कल की राजनीति के बजाय आज को देखकर फैसले ले रहे है.
एक तो अभी सरकार को चार साल बचे हुए है और दूसरा दुष्यंत वही कर रहे हैं जो हरियाणा में पहले होता आया है.
चौधरी देवी लाल ने भी जन संघ का साथ दिया था. वो भी जन संघ को जानते थे पर साथ दिया था. बंसी लाल ने भी जब अपनी पार्टी बनाई तो भाजपा को साथ दिया था और भजन लाल ने भी अपनी पार्टी बनाई तो भी भाजपा के साथ गुरेज नहीं किया. जिसके चलते भाजपा हरियाणा में एक छोटी-मोटी पार्टी से एक महाशक्ति बन कर उभर गई.
डॉक्टर त्यागी ने कहा, "शायद दुष्यंत भी वही कर रहा है कि चार साल में जब चुनाव आएँगे तो जैसे पहले लोग माफ़ करते आए है आगे भी माफ़ कर देंगे और कोई और नया मुद्दा लोगों के दिमाग पर हावी होगा."(bbc.com/hindi)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 12 जनवरी। राज्य में आज शाम 5.30 तक 648 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सर्वाधिक 117 अकेले रायपुर जिले के हैं। केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों के मुताबिक आज शाम तक एक जिले में सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों में रात तक राज्य शासन के जारी किए जाने वाले आंकड़ों से कुछ फेरबदल हो सकता है क्योंकि ये आंकड़े कोरोना पॉजिटिव जांच के हैं, और राज्य शासन इनमें से कोई पुराने मरीज का रिपीट टेस्ट हो, तो उसे हटा देता है। लेकिन हर दिन यह देखने में आ रहा है कि राज्य शासन के आंकड़े रात तक खासे बढ़ते हैं, और इन आंकड़ों के आसपास पहुंच जाते हैं, कभी-कभी इनसे पीछे भी रह जाते हैं।
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने तीन नए कृषि कानूनों के लागू करने पर फिलहाल रोक लगा दी है. मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर लंबी बहस चली. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे ने सरकार से ये भी पूछा कि क्या कोई प्रतिबंधित संगठन भी किसानों के प्रदर्शन और ट्रैक्टर रैली में भाग लेने वाले हैं. इस सवाल के जवाब में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि वो इस बारे में बुधवार को जवाब देंगे. बता दें कि किसान संगठन 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकालना चाहते हैं. लेकिन सरकार ने इस पर रोक लगाने की मांग की है.
अटॉर्नी जनरल ने CJI के सवाल के जवाब में कहा कि कुछ खालिस्तानी संगठन के होने की बात कही जा रही है. लेकिन सरकार इस बारे में आईबी रिपोर्ट बुधवार को कोर्ट में जमा करेगी. उन्होंने ये भी कहा कि प्रोटेस्ट को दिल्ली में लाने की बात कही जा रही है. वे लोग कहां आएंगे, कहां जाएंगे और कहा रहेंगे, हम नहीं बता सकते. बाद में सीजीआई ने कहा कि ये पुलिस का अधिकार होगा कि वो प्रोटेस्ट की इजाज़त किस तरह से देते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रैक्टर रैली को लेकर किसान संगठनों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. सरकार ने रैली पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. किसान 26 जनवरी को रैली दिल्ली में लाना चाहते हैं. सरकार का कहना है कि इससे गणत्रंत दिवस समारोह में दिक्कतें आएंगी. केंद्र सरकार ने सोमवार देर रात इस मामले को लेकर हलफनामा दाखिल किया है. किसानों ने कृषि कानूनों को लेकर अपनी मांगें न मानी जाने की सूरत में 26 जनवरी को दिल्ली में विशाल ट्रैक्टर रैली निकालने का ऐलान किया है. किसानों का दावा है कि इस रैली में कम से कम 20 हजार ट्रैक्टर शामिल होंगे.
नए कानून पर फिलहाल रोक
सुप्रीम कोर्ट ने किसान और सरकार के बीच समाधान निकालने के लिए 4 सदस्यों की एक कमेटी बनाई है. इसमें भारतीय किसान यूनियन के जितेंद्र सिंह मान, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी, अशोक गुलाटी (कृषि विशेषज्ञ) और शेतकारी संगठन के अनिल घनवंत शामिल हैं. सुनवाई के बाद किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब चर्चा करेंगे, उसके बाद ही कुछ फैसला लेंगे. हालांकि उन्होंने कहा कि 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली निकाली जाएगी.
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नई दिल्ली. बॉलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा और उनके पति व इंडियन क्रिकेट टीम के कैप्टन विराट कोहली ने अपनी बेटी का नाम रख लिया है. ऐसी ही खबरें इस वक्त सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अनुष्का शर्मा और विराट कोहली ने अपनी बेटी का नाम अनवी (Anvi) रखा है.
रिपोर्ट्स के अनुसार अनुष्का और विराट ने अपने नामों को जोड़कर बेटी का नाम अनवी (Anvi) रखा है.
हालांकि अभी तक अनुष्का और विराट की तरफ से इस मामले में कोई जानकारी नहीं दी गई.
बता दें, कल यानी 11 जनवरी को अनुष्का ने एक बेटी को जन्म दिया. इस बात की जानकारी खुद विराट कोहली ने अपने इंस्टा पोस्ट के जरिए दी थी.
विराट का इंस्टा पोस्ट वायरल होते ही लोगों ने अनुष्का और विराट दोनों को बधाई देनी शुरू कर दी थी और अभी तक बधाई का सिलसिला सोशल मीडिया पर जारी है.
विराट के इंस्टा पोस्ट के बाद ही उनके भाई विकास कोहली ने एक तस्वीर अपने इंस्टा अकाउंट पर शेयर की थी, जिसमें विराट की बेटी के सिर्फ दोनों पैर नजर आ रहे थे.
सोशल मीडिया पर अब विकास कोहली द्वारा शेयर की गई तस्वीर वायरल हो रही हैं.
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 12 जनवरी। उच्च शिक्षा मंत्री उमेश पटेल का उमेश नंदकुमार पटेल के नाम से संचालित ऑफिसियल फेसबुक एकाउंट हैक हो गया है। उच्च शिक्षा मंत्री कार्यालय द्वारा एकाउंट हैक होने की सूचना प्रभारी साईबर सेल सिविल लाइन में दी गई है। सूचना के अनुसार उमेश नंदकुमार पटेल के नाम से संचालित ऑफिसियल फेसबुक एकाउंट 12 जनवरी को प्रात: से किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा हैक कर लिया गया है।
नई दिल्ली, 12 जनवरी (आईएएनएस)| सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय कृषि कानूनों को लागू करने पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को किसानों के आंदोलन को लेकर लगाई गई याचिका पर सुनवाई हुई जिसके बाद शीर्ष अदालत ने इन कानूनों के लागू होने पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने चार सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया है जिनमें कृषि विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञ होंगे। ये कमेटी किसानों की आपत्तियों पर विचार करेगी। केंद्र सरकार द्वारा लागू कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून 2020, कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 को वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद की कानूनी गारंटी देने की मांग कर रहे हैं।
इसके बाद से किसानों ने 26 नवंबर से इन कानूनों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और दिल्ली आने वाली सीमाओं को अवरुद्ध कर दिया। इसी के खिलाफ लगाई गई याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कानूनों के लागू होने पर रोक लगा दी।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 12 जनवरी। छत्तीसगढ़ को छोडक़र कोविशील्ड वैक्सीन की 56 लाख से अधिक डोज देश के 13 शहरों में पहुंचाई जा रही है। छत्तीसगढ़ में वैक्सीन आने को लेकर फिलहाल कोई जानकारी नहीं है। स्वास्थ्य अफसरों का कहना है कि शाम तक कुछ और शहरों को वैक्सीन भेजी जा सकती है, जिसमें छत्तीसगढ़ का नाम शामिल हो सकता है। फिलहाल उन्हें वैक्सीन आने का इंतजार है।
केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि आज एयर इंडिया, स्पाइस जेट और इंडिगो एयरलाइंस की 9 उड़ानें पुणे से कोविशील्ड वैक्सीन की 56.5 लाख डोज लेकर दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, गुवाहाटी, शिलांग, अहमदाबाद, हैदराबाद, विजयवाड़ा, भुवनेश्वर, पटना, बेंगलुरु, लखनऊ और चंडीगढ़ पहुंचेगी। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कोविड-19 वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ पुणे एयरपोर्ट से देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाई जा रही है। इसके बाद 16 जनवरी से देश में टीकाकरण शुरू होने जा रहा है।
राज्य टीकाकरण अधिकारी डॉ. अमर सिंह ठाकुर का कहना है कि छत्तीसगढ़ में भी 16 जनवरी को हेल्थ वर्करों को कोरोना टीकाकरण की तैयारी है। इसके लिए राजधानी रायपुर समेत सभी जिलों में 99 सेंटर बनाए गए हैं। ये सेंटर संभाग मुख्यालयों में पांच-पांच और जिला मुख्यालयों में तीन-तीन बनाए गए हैं। इसके अलावा मेडिकल कॉलेजों में भी टीकाकरण सेंटर रखे गए हैं।
उनका कहना है कि केंद्र से कोरोना वैक्सीन भेजने वालों शहरों की सूची में छत्तीसगढ़ का नाम नहीं है। उनका मानना है कि शाम तक जारी होने वाली दूसरी सूची में छत्तीसगढ़ का नाम आ सकता है। वैसे, केन्द्र सरकार के दिशा निर्देश के मुताबिक देश के अन्य सभी राज्यों के साथ यहां भी 16 जनवरी को कोरोना टीकाकरण की तैयारी पूरी कर ली गई है। उनका मानना है कि शाम-रात तक इस संबंध में कोई ना कोई जानकारी अवश्य मिल जाएगी।
फेसबुक और ट्विटर ने डॉनल्ड ट्रंप के अकाउंट बंद कर दिए हैं. डॉयचे वेले की मुख्य संपादक मानुएला कास्पर क्लैरिज का कहना है कि सिर्फ इतना कर देने से ये कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकतीं.
सोशल मीडिया के विशाल स्तंभ - अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप - को गिरा दिया गया है. ऐसा किसी छोटी मोटी ताकत ने नहीं बल्कि बड़े दिग्गजों ने किया है - ट्विटर, फेसबुक, गूगल, एप्पल और एमेजॉन ने. अपने सबसे लोकप्रिय यूजर को हटा कर उन्होंने साफ कर दिया है कि उनके प्लेटफॉर्म पर कौन अपने विचार व्यक्त करेगा और कैसे.
ट्विटर के 8.8 करोड़ फॉलोअर और फेसबुक उन्हें लाइक करने वाले 3.5 करोड़ लोगों को अब उनकी नस्लवादी और खतरनाक टिप्पणियां पढ़ने को नहीं मिलेंगी. सोशल मीडिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है.
डॉनल्ड ट्रंप अपने अकाउंट का इस्तेमाल अपने विरोधियों के खिलाफ हथियार के तौर पर कर रहे थे. "हेट स्पीच" और "फेक न्यूज" उनके ट्रेडमार्क थे. उनके ट्वीट का क्या असर हो सकता था यह वॉशिंगटन में संसद पर हमले से साफ हो गया.
खैर, लोग कह रहे हैं कि अब वहां शांति है और इसे देख मैंने भी राहत की सांस ली. लेकिन कुछ ही देर के लिए. क्योंकि अगर हमें अभिव्यक्ति की आजादी चाहिए तो हमें दूसरों को भी अभिव्यक्ति की आजादी देनी होगी. मैं यह जान कर थोड़ी बेचैन हो रही हूं कि मुट्ठी भर लोग मिल कर किसी के लिए दुनिया के सबसे प्रभावशाली प्लेटफॉर्मों के दरवाजे बंद कर सकते हैं.
हमें एक बात समझनी होगी - हम यहां हेट स्पीच या फेक न्यूज का साथ नहीं दे रहे हैं. इनकी पहचान करना, इन्हें सामने लाना और फिर डिलीट करना ही होगा. यह काम इन प्लेटफॉर्म को चलाने वालों का है. पिछले कुछ महीनों में उन्होंने यह काम करना शुरू भी किया है लेकिन हिचकिचाहट के साथ.
मई की बात है जब ट्विटर ने पहली बार राष्ट्रपति ट्रंप के दो ट्वीट पर चेतावनी जारी कर दी थी. उसके बाद से ट्वीट पर वॉर्निंग देने का और उन्हें डिलीट करने का सिलसिला लगातार जारी रहा. हर कोई देख सकता था कि ट्रंप के कुछ बयान कितने बेबुनियाद और खतरनाक थे. यह एक अच्छा कदम था.
हालांकि अकाउंट को ही बंद कर देना - यह तो बहुत आसान था. प्लेटफॉर्म चलाने वाले अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं. डॉनल्ड ट्रंप के बिना भी इन प्लेटफॉर्म पर लाखों करोड़ों चीजें ऐसी हैं जिनसे हेट स्पीच, फेक न्यूज और प्रोपगैंडा फैलाया जा रहा है. इसे देखते हुए ट्विटर, फेसबुक और दूसरी कंपनियों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी होगी. उन्हें लगातार पोस्ट डिलीट करनी होंगी और जहां जरूरी हो, वहां उन पर फेक न्यूज का ठप्पा लगाना होगा.
ट्रंप समर्थकों का बवाल
हाल के कई सालों में अमेरिका से इस तरह की तस्वीरें सामने नहीं आई हैं. सत्ता हस्तांतरण से पहले हिंसा और बवाल ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को हिला कर रख दिया. आरोप ट्रंप समर्थकों पर लगा कि उन्होंने कैपिटल हिल में घुसकर तोड़फोड़ की और उस पर कब्जे की कोशिश की.
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये सोशल नेटवर्क विचार व्यक्त करने के लिए अहम माध्यम हैं, खास कर उन देशों में जहां मीडिया पूरी तरह आजाद नहीं है. लेकिन जब कुछ कंपनियों के बॉस बाजार पर हावी हो जाते हैं और अपनी ताकत का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आजादी के नियमों को तय करने के लिए करते हैं, तो यह किसी भी तरह से लोकतांत्रिक नहीं कहे जा सकता.
वक्त आ गया है कि हम फेसबुक, ट्विटर और गूगल जैसी कंपनियों की ताकत को संजीदगी से समझें और लोकतांत्रिक तथा सही रूप से इन्हें नियंत्रित करें.
जर्मनी इस दिशा में पहला कदम उठा चुका है. 1 जनवरी 2018 को देश में नेटवर्क एन्फोर्स्मेंट एक्ट (नेट्स डीजी) प्रभाव में आया. इसके तहत सोशल नेटवर्क कंपनियां फेक न्यूज और हेट स्पीच को रोकने के लिए बाध्य हैं.
यूरोपीय आयोग ने इस कानून का स्वागत किया था. तब से अन्य सोशल मीडिया कंपनियों को जर्मनी में सैकड़ों "कॉन्टेंट मॉडरेटरों" को नियुक्त करना पड़ा है जो पोस्ट की निगरानी करते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें डिलीट करते हैं.
सोशल मीडिया पर मौजूद आपत्तिजनक पोस्टों की विशाल संख्या को देखते हुए इसे महज एक शुरुआत ही कहा जा सकता है. लेकिन कम से कम शुरुआत हुई तो सही.
सीधे अकाउंट की बंद कर देना - जैसा कि डॉनल्ड ट्रंप के मामले में किया गया - यह यकीनन सही तरीका नहीं है. यह सिर्फ बड़ी टेक कंपनियों का अपनी जिम्मेदारी से भागने का एक आसान रास्ता है.
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
रायपुर, 12 जनवरी। राजधानी रायपुर के रामकुंड में बीती रात सेंट्रिंग प्लेट मारकर किराएदार की हत्या कर दी गई। कारण-किराया बढ़ाने को लेकर विवाद बताया जा रहा है। पुलिस, आरोपी मकान मालिक को हिरासत में लेकर घटना की जांच में लगी है।
पुलिस के मुताबिक आजाद चौक थाना क्षेत्र के रामकुंड स्थित परमानंद मरकाम के घर महासमुंद का शिव धु्रव किराए पर रहकर हलवाई का काम करता था। उसके साथ यहां उसकी एक बेटी भी रहती थी। उसका यहां किराया बढ़ाने को लेकर मकान मालिक से अक्सर विवाद होता था। बीती रात में भी दोनों के बीच इसी बात को लेकर विवाद शुरू हो गया। इस दौरान मकान मालिक ने सेंट्रिंग प्लेट से उसके सिर पर जोरदार वार कर दिया, जिससे किराएदार की मौत हो गई।
आजाद चौक पुलिस का कहना है कि मकान मालिक और किराएदार के बीच एक हजार रुपये किराया बढ़ाने को लेकर लगातार विवाद चल रहा था। बीती रात भी दोनों में इसी बात पर बहस शुरू हो गई और सेंट्रिंग प्लेट मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी मकान मालिक को हिरासत में ले लिया है, जांच जारी है।