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-रेहान फ़ज़ल
16 अप्रैल, 1999 को जब डेढ़ बजे ठंडा तरबूज़ का जूस पीते हुए ओमप्रकाश चौटाला ने घोषणा की कि वो राष्ट्र हित में वाजपेयी सरकार को दोबारा समर्थन दे रहे हैं तो सरकार के खेमें में खुशी की एक लहर सी दौड़ गई.
धोखा देने के खेल में सरकार के चेहरे पर वक्त से पहले ही मुस्कान आ गई थी. लेकिन कुछ लोगों ने नोट किया कि किसी ने लोकसभा के सेक्रेट्री जनरल एस गोपालन की तरफ़ एक चिट बढ़ाई है. गोपालन ने उस पर कुछ लिखा और उसे टाइप कराने के लिए भेज दिया.
उस टाइप हुए कागज़ में लोकसभाध्यक्ष जीएमसी बालयोगी द्वारा दी गई रूलिंग थी जिसमें काँग्रेस साँसद गिरधर गोमाँग को अपने विवेक के आधार पर वोट देने की अनुमति प्रदान की गई थी.
दरअसल गोमाँग फ़रवरी में ही ओडिशा के मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन उन्होंने अपनी लोकसभा की सदस्यता से तब तक इस्तीफ़ा नहीं दिया था.
'लाल बटन दबाओ'
वरिष्ठ पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता ने इंडिया टुडे के 10 मई, 1999 के अंक में लिखा था, "उस रात कोई भी नहीं सोया. सरकार की तरफ़ से बीजेपी साँसद रंगराजन कुमारमंगलम ने मायावती को यहाँ तक आश्वासन दे दिया कि अगर उन्होंने पहले से तय स्क्रिप्ट पर काम किया तो वो शाम तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन सकती हैं. उनके खेमें में गतिविधि देख तब विपक्ष के नेता शरद पवार उनके पास पहुँचे. मायावती उनसे जानना चाहती थीं कि अगर उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ वोट दिया तो क्या सरकार गिर जाएगी? पवार का जवाब था 'हाँ.' जब वोट देने का समय आया तो मायावती अपने साँसदों की तरफ़ देख कर ज़ोर से चिल्लाईं 'लाल बटन दबाओ.''
इलेक्ट्रॉनिक स्कोरबोर्ड पर जब सबकी नज़र गई तो पूरा सदन अचंभित रह गया. वाजपेई सरकार के पक्ष में 269 और विपक्ष में 270 मत पड़े थे.
शक्ति सिन्हा की किताब

वाजपेयी को नहीं मिला हनीमून पीरियड
प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी सरकार की सबसे बड़ी ट्रेजेडी रही कि उनकी सरकार को कभी हनीमून पीरियड नहीं मिला.
वाजपेयी पर हाल ही में एक किताब 'वाजपेयी द ईयर्स दैट चेंज्ड इंडिया' लिखने वाले शक्ति सिन्हा बताते हैं, "एक तो सरकार बनने में बहुत तकलीफ़ हुई. बन भी गई तो पहले दिन से ही मंत्रालयों को ले कर पार्टियों के बीच झंझट शुरू हो गया. हफ़्ते भर के अंदर दो मंत्रियों को इस्तीफ़ा देना पड़ा. इससे काफ़ी हार्टबर्निंग हुई."
"जयललिता ने पहले दिन से ही उनकी नाक में दम कर दिया. उन्होंने कहा कि दूसरे जिन मंत्रियों के ख़िलाफ़ भष्टाचार के आरोप हैं उनको भी हटाइए. फिर स्पीकर के चुनाव को ले कर झंझट हुआ. बहस में जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया, वो असंसदीय था."
"अमेरिका में भी जब नए राष्ट्रपति सत्ता सँभालते हैं तो उन्हें 100 दिन का ग्रेस पीरियड दिया जाता है. महीना दो महीने उस सरकार के बारे में जोश रहता है और लोग उसकी आलोचना कम करते हैं. अटल बिहारी वाजपेयी इससे वंचित रहे. उनको ये नहीं नसीब हुआ."
जयललिता की माँगें मानने को तैयार नहीं हुए वाजपेयी
जयललिता और वाजपेई
जयललिता चाहती थीं कि उनके ख़िलाफ़ सभी मुकदमे वापस लिए जाएं और तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को बर्ख़ास्त किया जाए. इसके अलावा वो सुब्रमण्यम स्वामी को वित्त मंत्री बनवाने पर भी ज़ोर दे रही थीं. वाजपेयी इसके लिए तैयार नहीं हुए.
शक्ति सिन्हा कहते हैं, जयललिता चाहती थीं कि उनके ख़िलाफ़ चल रहे इन्कम टैक्स केसों में उन्हें मदद मिले. सराकार ने भी क़ानूनन जितना संभव था उनकी मदद की. उनके ख़िलाफ़ आरोपों को विशेष कोर्ट से हटा कर सामान्य अदालत में ले जाया गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया. वो ये भी चाहती थीं कि वाजपेयी अगर स्वामी को वित्त मंत्रालय न दें तो कम से कम राजस्व राज्य मंत्री वित्त मंत्रालय के अंतर्गत काम न करें.'
उन्हीं दिनों आउटलुक के संपादक विनोद मेहता उनसे मिलने उनके निवास स्थान पर गए. मेहता अपनी आत्मकथा 'एडीटर अनप्लग्ड मीडिया, मेग्नेट्स, नेताज़ एंड मी' में लिखते हैं, "जब मैंने उनको देखा तो वो मुझे गहरी सोच में दिखाई दिए. वो बहुत चुप चुप से थे. जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने पूछ ही डाला, आपको क्या चिंता सता रही है ? हाज़िरजवाब वाजपेयी ने हँसी दबाते हुए जवाब दिया आपके बाद जयललिता से मिलने का नंबर है."
6 अप्रैल को जयललिता के सभी मंत्रियों ने वाजपेयी को अपने इस्तीफ़े भेज दिए. दो दिनों के बाद उन्होंने वो इस्तीफ़ा राष्ट्रपति को बढ़ा भी दिया. एक दिन बाद अन्नाडीएमके ने समन्वय समिति से अपने सदस्यों को बाहर बुला लिया.
कुछ दिनों बाद जयललिता दिल्ली आईं और दिल्ली के एक पाँच-सितारा होटल में ठहरीं. उनके साथ उनके 48 सूटकेसों का सामान भी आया. अगले कुछ दिनों तक दिल्ली में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज़ हो गईं. 11 अप्रैल को 11 बजे राष्ट्रपति से मिलकर उन्होंने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापसी का पत्र दे दिया.
हाँलाकि अगले संसद के बजट सत्र की बैठक होनी थी लेकिन राष्ट्रपति नारायणन ने वाजपेयी से विश्वास मत लेने के लिए कहा. शक्ति सिन्हा कहते हैं कि मेरी नज़र में तब भी और अब भी ये ग़ैर-ज़रूरी फ़ैसला था.
'चूँकि संसद का सत्र चल रहा था, सही तरीक़ा ये होता कि वाजपेयी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता या फिर ये देखते हुए कि ये बजट सत्र है उसमें धन विधेयक को गिरा कर सरकार को हराया जा सकता था. वाजपेयी के विरोधियों ने 1990 और 1997 के उदाहरण ज़रूर पेश किए लेकिन दोनों समय संसद की अगली बैठक अगले दिन के लिए तय नहीं थी. ऐसा इसलिए नहीं किया गया क्योंकि विपक्ष के पास वाजपेयी के किसी विकल्प के बारे में आम सहमति नहीं थी और इसके पीछे ये सोच भी थी कि अगर किन्हीं कारणों से अविश्वास प्रस्ताव गिर जाता है तो वो नियमानुसार अगले छह महीनों तक अविश्वास प्रस्ताव दोबारा नहीं ला सकते थे. '
स्पीकर ने गिरधर गोमाँग के वोट करने का फ़ैसला उनके विवेक पर छोड़ा
जहाँ तक गिरधर गोमाँग के मतदान करने की बात है लोकसभा के सेक्रेट्री जनरल एस गोपालन की सलाह पर लोकसभाध्यक्ष बालयोगी ने पूरा मामला गोमाँग के विवेक पर छोड़ दिया. उनके विवेक ने उन्हें बताया कि वो अपनी पार्टी के आदेश का पालन करें और विश्वास मत के ख़िलाफ़ वोट दें.
बाद में बहुत से साँसदों ने लोकसभाध्यक्ष के फ़ैसले की आलोचना की और कुछ ने तो गोपालन की सलाह को राजनीतिक तराज़ू के मापदंड पर यह कहते हुए तोला कि गोपालन की नियुक्ति पूर्व लोकसभाध्यक्ष पूर्नो संगमा ने की थी.
दिलचस्प बात ये है कि वाजपेयी सरकार गिराने वाले गिरधर गोमाँग ने बाद में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली. सरकार की तरफ़ से फ़्लोर मैनेजमेंट में भी बड़ी चूक हुई. अरुणाचल प्रदेश के साँसद राज कुमार जनवरी में पार्टी में विभाजन के बाद पूर्व मुख्यमंत्री गेगोंग अपाँग के खिलाफ़ हो गए थे. उनकी पार्टी में विभाजन हो गया.
लेकिन सरकार की तरफ से किसी ने उनसे अपने पक्ष में वोट करने की अपील नहीं की. नतीजा ये हुआ कि उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ वोट किया. शक्ति सिन्हा का मानना है कि उन्हें बहुत संदेह है कि राज कुमार के अस्तित्व के बारे में भी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को पता रहा होगा
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फ़ारुख़ अब्दुल्लाह ने अपने बेटे ओमर अब्दुल्लाह को बढ़ावा देते हुए बारामूला से वरिष्ठ साँसद सैफ़ुद्दीन सोज़ की घोर अवहेलना की. हर वर्ष भारत सरकार सऊदी अरब के लिए एक हज प्रतिनिधिमंडल भेजती है. सोज़ ने इसके लिए कुछ लोगों की सिफ़ारिश की लेकिन जब फ़ारुख अब्दुल्लाह को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने उन लोगों के नाम कटवा दिए.
सोज़ ने इस सबका बदला वाजपेयी सरकार के ख़िलाफ़ वोट दे कर निकाला. पूर्व प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल अकालियों के समर्थन से लोकसभा में पहुंचे थे लेकिन उन्होंने उसी सरकार के ख़िलाफ़ मतदान किया जिसका कि अकाली एक हिस्सा थे.
बहस के दूसरे दिन वाजपेयी ने खुद काँशी राम से फ़ोन पर बात की थी. उन्होंने उन्हें बताया था कि वो दिल्ली से बाहर जा रहे हैं. उनकी पार्टी उनका समर्थन तो नहीं कर सकती लेकिन उनके ख़िलाफ़ वोट नहीं करेगी.
इस प्रकरण का पूरा विवरण देते हुए स्वप्नदास गुप्ता और सुमित मित्रा ने इंडिया टुडे के 10 मई, 1999 में छपे अपने लेख 'द इनसाइड स्टोरी इज़ इंडिया हेडिंग फॉर अ टू पार्टी सिस्टम' में लिखा था, 'मतदान से एक दिन पहले काँशीराम पटना में थे. आधी रात से पहले अर्जुनसिंह ने काँशीराम को फ़ोन किया. उन्होंने काँशीराम को दिल्ली आने के लिए मना लिया.उनको लाने के लिए कमलनाथ का स्पैन रिसॉर्ट विमान तैयार रखा गया. लेकिन काँशीराम ने कहा कि वो अलायेंस एयरलाइंस की नियमित उड़ान से दिल्ली आएंगे जो दिल्ली 9 बज कर 40 मिनट पर पहुंचेगी. अर्जुन सिंह की चिंता ये थी कि अगर सरकार को इसकी भनक लग गई तो वो उड़ान में देरी करवा देगी. इसलिए स्टैंडबाई के तौर पर राबड़ी देवी सरकार का विमान भी तैयार रखा गया. देर रात बीएसपी के साँसद आरिफ़ मोहम्मद ख़ाँ और अकबर डंपी ने मायावती को फ़ोन कर कहा कि अगर उन्हें बीजेपी की सरकार को बचाते हुए देखा गया तो उनके मुस्लिम मतदाता इसे पसंद नहीं करेंगे. मायावती ने रात दो बजे डंपी और आरिफ़ को फ़ोन कर बताया कि वोट करते समय उनकी चिंता को ध्यान में रखा जाएगा. वो दोनों 9 बजे उनके घर पहुंच जाएं. इस बीच सोनिया गाँधी ने भी मायावती को खुद फ़ोन किया और वाजपेयी सरकार को गिराने का ख़ाका तैयार हो गया.'
शक्ति सिन्हा बताते हैं कि भावी प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी की बात बहुत दिनों से हो रही थी. इतनी मुश्किल से वो प्रधानमंत्री बने लेकिन तेरह महीने में गाड़ी कभी संभल कर नहीं चली. हमेशा डाँवाडोल ही रही. और उस पर उनका एक वोट से हारना. झटका ज़रूर लगा था वाजपेयी को. वोटिंग के बाद जब वाजपेयी अपने कमरे में लौटे हैं तो मैंने उन्हें बेहद निराश देखा. उनकी आँखों में आँसू थे. जो सदमा उन्हें लगा था वो उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था. लेकिन पाँच सात मिनटों के अंदर ही उन्होंने अपनेआप को नियंत्रित कर लिया था और वो अपना इस्तीफ़ा देने राष्ट्रपति भवन रवाना हो गए थे.
21 अप्रैल को सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति नारायणन से मिलकर दावा किया कि उन्हें 272 साँसदों का समर्थन प्राप्त है. लगभग उसी समय मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव आगे किया.
1996 के विपरीत इस बार सीपीएम इसके लिए तैयार भी दिखी लेकिन काँग्रेस इस बार किसी दूसरी पार्टी को नेतृत्व देने के लिए राज़ी नहीं हुई. बाद में मुलायम सिंह ने काँग्रेस का साथ देने से साफ़ इंकार कर दिया.
इस फैसले में बहुत बड़ी भूमिका रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस की रही.
लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब 'माई कंट्री, माई लाइफ़' में इसका ब्योरा देते हुए लिखा है, '21 या 22 अप्रैल को देर रात मेरे पास जॉर्ज फ़र्नांडिस का फ़ोन आया. उन्होंने कहा लालजी मेरे पास आपके लिए अच्छी ख़बर है. सोनिया गाँधी अगली सरकार नहीं बना सकतीं. विपक्ष के एक बड़े नेता आपसे मिलना चाहते हैं. लेकिन ये बैठक न तो आपके घर पर हो सकती है और न ही मेरे घर पर."
आडवाणी ने लिखा, "तय हुआ कि ये मुलाकात जया जेटली के सुजान सिंह पार्क वाले घर में होगी. जब मैं जया जेटली के घर पहुंचा तो वहाँ मैंने मुलायम सिंह यादव और जॉर्ज फ़र्नांडिस को बैठे हुए पाया. फ़र्नांडिस ने मुझसे कहा कि मेरे दोस्त ने मुझे आश्वस्त किया है कि उनके 20 साँसद किसी भी हालत में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के प्रयास को समर्थन नहीं देंगे. मुलायम सिंह यादव ने भी ये बात मेरे सामने दोहराई. लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि आडवाणी जी इसके लिए मेरी एक शर्त है. मेरी इस घोषणा के बाद कि हमारी पार्टी सोनिया गांधी को सरकार बनाने में मदद नहीं करेगी, आपको ये वादा करना होगा कि आप दोबारा सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करेंगे. मैं चाहता हूँ कि अब नए चुनाव करवाएं जाएं."
लोकसभा भंग
तब तक एनडीए के घटक दलों का भी मन बन चुका था कि फिर से सरकार बनाने के बजाए मध्यावधि चुनाव का सामना किया जाए. राष्ट्रपति नारायणन ने वाजपेयी को राष्ट्रपति भवन तलब किया और उनको सलाह दी कि वो लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश करें.
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश की लेकिन इस सिफ़ारिश में साफ़ लिखा गया कि वो ऐसा राष्ट्रपति नारायणन की सलाह पर कर रहे हैं. राष्ट्रपति भवन इससे खुश नहीं नज़र आया लेकिन तब तक वाजपेयी को इस बात की फ़िक्र नहीं रह गई थी कि राष्ट्रपति इस बारे में क्या सोच रहे हैं. (bbc.com)
-रिचर्ड महापात्रा
नोवेल कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी को एक साल हो चुका है और लोगों के बाजारों की ओर लौटने से हमें अपने जीवन में सामान्य स्थिति बहाल होने का अहसास हो रहा है। लेकिन एक हमारे मन में एक असहज भाव बना हुआ है, जो हमें डराता रहता है।
पड़ोस की किराने की दुकान से लेकर शॉपिंग मॉल्स तक में लगे कर्मचारियों की संख्या में कमी स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है। ये हालात चौथी औद्योगिक क्रांति के बाद की स्थितियों से मेल खाते हैं।
हमने पूर्व में ऐसी तीन प्रमुख क्रांतियों को अनुभव किया है : पहली, औद्योगिक क्रांति जिसमें हमारी उत्पादन प्रक्रिया के मशीनीकरण के लिए पानी और भाप का उपयोग किया गया था; दूसरी, जिसमें भारी उत्पादन को संभव बनाने के लिए बिजली का उपयोग किया गया था; और तीसरी, हमारे जीवन और समय के डिजिटलीकरण के साथ काम करने से जुड़ी है।
चौथी क्रांति तीसरी पर ही आधारित है और हमारे संवाद, उपयोग या उत्पाद से जुड़ी हर वस्तु के स्वाचलन (आटोमेशन) की ओर बढ़ रही है। महामारी का प्रकोप तेजी से फैला है।
वहीं महामारी की तरह ही, चौथी क्रांति भी अप्रत्याशित है। शुरुआती तीन की तुलना में, यह क्रांति हर तबके, क्षेत्र और देश को प्रभावित करेगी।
इस क्रांति की एक दशक पहले से चर्चा हो रही थी- अक्सर इसे काल्पनिक बताकर खारिज कर दिया जाता था। लेकिन वर्तमान में इसकी पैठ जमाने की तेज रफ्तार के कारण खासी चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि हम सुनिश्चित नहीं हैं कि यह कैसे हमें प्रभावित करेगी।
महामारी ने इसके लिए सही प्रोत्साहन देने वाला माहौल उपलब्ध कराया है। एक विश्व जो कम से कम सामाजिक संपर्क के साथ आगे बढ़ रहा है, वहां पर स्वचालन से अनुकूलन का रास्ता तैयार हो रहा है।
महामारी के बाद के दौर में, दुनिया का असंगठित और अकुशल कार्यबल सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। इससे भारत जैसे देश के लिए, जहां 90 प्रतिशत से ज्यादा कार्यबल असंगठित क्षेत्र में हैं, असमानता की स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी। कई लोग चौथी क्रांति को कामगारों के लिए ‘दोहरी विनाशकारी’ करार देते हैं।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, अप्रैल में रोजगार गंवाने वाले 12.2 करोड़ भारतीयों में से 75 प्रतिशत छोटे कारोबारी और दिहाड़ी मजदूर थे। कारोबार के सामान्य स्तर पर आने के साथ, विश्व ने अपने कामकाज का तरीका बदल लिया है।
नए विश्व में ज्यादा अकुशल असंगठित कामगारों की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि मशीनों और स्वचालित प्रणालियों ने ज्यादा दक्षता के साथ उनकी जगह ले ली है। वहीं वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा पेश फ्यूचर ऑफ जॉब्स, 2020 रिपोर्ट में कहा गया : “43 प्रतिशत व्यवसायों के सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि वे तकनीक एकीकरण के चलते अपने कार्यबल में कमी करने की तैयारी में हैं, 41 प्रतिशत की विशिष्ट कार्यों के लिए अपने यहां ठेकेदारों का उपयोग बढ़ाने की योजना है और सिर्फ 34 प्रतिशत की तकनीक एकीकरण के चलते अपने कार्यबलों की संख्या में विस्तार की योजना है।”
2025 तक, चौथी क्रांति हमें कुछ इस तरह प्रभावित करेगी : “मानव और मशीनों द्वारा किए गए वर्तमान कार्यों पर लगने वाला समय समान होगा।” इस क्रांति की “तेज गति” कुछ ऐसी है, जिससे स्पष्ट रूप से भविष्य में अकुशल और कम कौशल वाले लोगों के लिए नौकरियां पैदा होना बंद हो जाएंगी।
इसका मतलब है कि भारी भरकम असंगठित कार्यबल को रखना महज निरर्थक होगा।
जैसा कि उक्त रिपोर्ट का अनुमान है, कार्यों के इंसान से मशीनों की ओर हस्तांतरित होने के परिणाम स्वरूप 2025 तक 8.5 करोड़ लोग अपनी नौकरियां गंवा देंगे। दूसरी तरफ, 9.7 करोड़ नई नौकरियां सिर्फ सही कौशल वाले लोगों और मशीनों के लिए ही उपयुक्त होंगी। इस प्रकार, नई व्यवस्था में आर्थिक संकट की तुलना में नौकरियों से ज्यादा लोगों का विस्थापन देखने को मिलेगा, जैसा हमने अभी अनुभव किया है।
लाखों लोगों के कार्यबल में जुड़ने, लेकिन उनके लिए अवसर नहीं होने की स्थिति में क्या होता है? भारत में वर्तमान हालात के बारे में कहा जा सकता है कि यहां का आर्थिक विकास रोजगार विहीन है। कल्पना कीजिए, स्वचालन अभियान से अवसर और भी घटने जा रहे हैं।
भारत विकास के वितरण में सबसे ज्यादा असमानता की स्थिति वाले दुनिया के प्रमुख देशों में से एक है। इससे पहले से ही परेशान लोग और भी प्रभावित होंगे। कुल मिलाकर यह विभाजन और भी गहरा हो गया है। (downtoearth.org.in/hindistory)
-मुकेश सिंह सेंग
नई दिल्ली: केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन एक बार फिर रफ्तार पकड़ते हुए दिखाई दे रहा है, जिसके गणतंत्र दिवस ट्रैक्टर परेड के दौरान हुए बवाल के बाद ठंडा पड़ने की आशंका जताई जा रही थी. किसान शनिवार को एक दिन का उपवास रखकर सद्भावना दिवस मना रहे हैं. किसानों के प्रदर्शन के मद्देनजर, दिल्ली बॉर्डरों पर इंटरनेट सेवाएं दो दिन के लिए रोक दी गई हैं. वहीं,राष्ट्रीय राजमार्ग-24 और गाज़ीपुर बॉर्डर आने जाने वाले रास्तों को भी बंद कर दिया गया है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि जन सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सिंघु, गाज़ीपुर और टिकरी बॉर्डर एवं उससे आसपास के इलाकों में इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया है. यह बैन 29 जनवरी रात 11 बजे से 31 जनवरी रात 11 तक प्रभावी रहेगा.
बता दें कि सिंघु बॉर्डर पर शुक्रवार को खुद को स्थानीय लोग बताने वालों और आंदोलन पर बैठे प्रदर्शकारी किसानों के बीच झड़प हो गई थी. इसके बाद, किसी अनहोनी से बचने के लिए सिंघु बॉर्डर पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. कल हुई झड़प में 44 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. सभी किसान नेता सुबह 9 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक व्रत रखकर सद्भावना दिवस मना रहे हैं.
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-आशीष सिंह
दिल्ली में इजरायली दूतावास के बाहर धमाके की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नए-नए सुराग सामने आने लगे हैं. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, क्राइम ब्रांच और NIA की टीम जांच कर रही है. इस बीच जैश उल हिंद नाम के संगठन का नाम सामने आया है. 'जैश उल हिंद' ने दिल्ली में इजरायली दूतावास के पास धमाके जिम्मेदारी ली है. हालांकि ये किस तरह का संगठन है, इसके तार किसके साथ जुड़े हुए हैं, क्या ये कोई स्लीपर सेल है, इसकी जानकारी जांच एजेंसियों के पास नहीं है.
धमाके का ईरानी कनेक्शन
वहीं जांच एजेंसियों की जांच में दिल्ली में इजरायली दूतावास के बाहर धमाके का ईरानी कनेक्शन सामने आ रहा है. मौके से जांच एजेंसियों को एक लेटर मिला है, जिस पर लिखा है कि ये तो सिर्फ एक ट्रेलर था. इसी लेटर में ईरान के दो ईरानियों की हत्या का भी जिक्र है. लेटर में लिखा है कि वो सैन्य कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेंगे. लेटर में परमाणु वैज्ञानिक आर्देशिर की हत्या का भी जिक्र है.
ईरान के बड़े परमाणु वैज्ञानिक आर्देशिर की ड्रोन-गन से हत्या की गई थी. ईरान इसके लिए इजरायल को जिम्मेदार ठहराता है. 30 नबम्बर 2020 को ईरान के परमाणु वैज्ञानिक की ड्रोन अटैक में हत्या हुई थी. उसके लिए ईरान के राष्ट्रपति ने सीधे तौर से इजरायल को जिम्मेदार ठहराया था.
दिल्ली में 8 साल बाद धमाका
दिल्ली में आठ साल बाद कोई बड़ा बम धमाका हुआ है. आखिरी धमाका 13 फरवरी 2012 को हुआ था. इजरायली राजनयिक को निशाना बनाया गया था. दूतावास के कर्मचारी समेत 4 लोग जख्मी हुए थे. इससे पहले 7 सितंबर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर ब्लास्ट हुआ था. हाईकोर्ट के बाहर धमाके में 11 लोगों की मौत हुई थी और 80 जख्मी हुए थे.
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 30 जनवरी। सरगुजा संभाग की कोरिया रियासत की ओर से जेल व पुलिस विभाग को आबंटित जमीन को एक निजी फर्म को आबंटित करने के खिलाफ दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने राज्य शासन व अन्य प्रतिवादियों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
बैंकुंठपुर के राकेश शर्मा ने एक जनहित याचिका दायर कर हाईकोर्ट में बताया कि आजादी से पूर्व कोरिया रियासत ने जेल व पुलिस विभाग के लिये जमीन आबंटित की थी। कुछ साल पहले संजय अग्रवाल, सीमा अग्रवाल ने फर्म मां वैष्णव एसोसियेट्स के जरिये उक्त जमीन को आबंटित करा ली। याचिका के अनुसार नगर निगम व राजस्व के अधिकारियों से साठगांठ कर जमीन की यह अदला बदली की गई है। इस आबंटन को अवैध बताते हुए याचिका में मांग की गई है कि सरकारी जमीन पर अनाधिकृत कब्जे व आबंटन के विरुद्ध शासन को स्पष्ट गाइडलाइन बनाने का निर्देश भी दिया जाये।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 30 जनवरी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि परिवार न्यायालय के फैसले के अनुसार यदि कोई व्यक्ति भरण-पोषण की राशि प्रदान नहीं करता है तो उसके खिलाफ सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी नहीं किया जा सकता। उससे राशि वसूली के लिये चल-अचल सम्पत्ति की कुर्की का वारंट जारी किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता कवर्धा के जगदम्बा त्रिवेदी का विवाह के बाद पत्नी से विवाद हुआ और वह अलग रहने लगी। परिवार न्यायालय ने 22 नवंबर 2018 को 7 हजार रुपये महीने भरण पोषण का आदेश जारी किया। बाद में याचिकाकर्ता से 38 हजार रुपये की वसूली के लिये गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया। हाईकोर्ट में जस्टिस संजय के अग्रवाल की सिंगल बेंच ने गिरफ्तारी वारंट को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि आईपीसी की धारा 125 (3) के अंतर्गत भरण पोषण की राशि की वसूली के लिये पहले चल अचल सम्पत्ति की कुर्की की नोटिस दी जाये। कुर्की से वसूली के बाद यदि कोई राशि शेष रह जाती है तब गिरफ्तारी की नोटिस दी जाये।
-पुष्य मित्र
मैं आज के दिन हुई गांधी की हत्या को उनकी शहादत के तौर पर देखता हूं। वे आजादी और बंटवारे के बाद पूरे देश में फैले सांप्रदायिक उन्माद को खत्म करने के लिए शहीद हुए थे। कई इतिहासकारों ने लिखा है कि गांधी की हत्या का समाचार जब पूरे देश में फैलने लगा तो दंगे अपने-आप बंद होने लग गये। उस शहादत ने भले ही वक्ती तौर पर मगर भारत के लोगों के मन में भरे सांप्रदायिक उन्माद को तो खत्म कर ही दिया। उसके बाद लंबे समय तक शांति छायी रही।
दिलचस्प है कि गांधी यह सब जानते थे। उन्हें भरोसा था कि अगर मेरी शहादत इस काम में हो गयी तो शायद लोगों के मन में जड़ जमा चुके नफरत को खत्म किया जा सकता है। 1946 के आखिर में जब वे नोआखली गये तभी से उन्होंने इस बात को कहना शुरू कर दिया था। वे कहते थे कि अगर मुझे मार देने से आपके मन का नफरत खत्म हो सकता है तो मुझे मार दीजिये। फिर आने वाले दिनों में उन्होंने खुद भी इस बात को कई दफा दुहराया। बिहार में भी जहां नोआखली का बदला लेने के लिए भीषण दंगे हुए थे और आखिरी दिनों में दिल्ली प्रवास के दौरान भी, वे बार-बार इस बात को दुहराते रहे।
वे सिर्फ अपने लिए यह बात नहीं कहते थे, बल्कि उनके साथ जो भी लोग थे। सभी से यही कहते। मेरे साथ हो तो तुम्हें बलिदान देने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। जब मनुबेन नोआखली आयी तो उनसे भी यही कहा। यह मैं उनके आखिरी संघर्ष के बारे में कह रहा हूं। जो उन्होंने नोआखली से शुरू किया था, फिर बिहार गये, फिर कोलकाता गये और दिल्ली के बिरला हाउस में खत्म किया। उन्होंने शहादत दी और इस जंग को जीत लिया।
यह उस जंग की कहानी है, जो उन्होंने अपने ही देश के लोगों के खिलाफ लड़ी। अगर गांधी के शब्दों में कहें तो उस बुराई के खिलाफ लड़ी जो उनके अपने देश के लोगों को शैतान बना रही थी। वे लोगों के खिलाफ तो लड़ते नहीं थे, वे तो हमेशा बुराईयों के खिलाफ लड़ते थे। पापी से नहीं, पाप से नफरत करो। वे हमेशा कहते थे। इसलिए जहां उन्होंने चंपारण सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चार-पांच बड़े आंदोलन किये, वहीं उन्होंने अपने देश के लोगों की बुराईयों के खिलाफ भी दो बड़े आंदोलन किये। पहला अस्पृश्यता निवारण अभियान और दूसरा सांप्रदायिकता के खिलाफ नोआखली से दिल्ली तक चला अभियान।
दोनों अभियानों में उनके देश के लोग ही उनके खिलाफ खड़े थे। उनका बार-बार अपमान करते, हमले करते और अंत में हत्या भी कर दी। मगर उन्होंने दोनों आंदोलनों को पूरी इमानदारी से निभाया। अपमान सहते, मार खाते हुए लोगों का हृदय परिवर्तन करने की कोशिश करते रहे।
ये दोनों आंदोलन खास तौर पर हम सब को इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि दुश्मन हमेशा बाहरी नहीं होता, दुश्मन हमारे अंदर भी बैठा होता है, उसके खिलाफ भी लडऩा पड़ता है। और बहुमत हमेशा सही नहीं होता, कई दफा बहुमत भी अराजक, हिंसक और पर-पीडक़ होता है। ऐसे में बहुमत के खिलाफ अकेले भी खड़ा होना पड़ता है। कई दफा गांधी रवींद्रनाथ टैगोर की उन पंक्तियों को गाते ‘एकला चलो रे’ खास तौर पर सांप्रदायिकता के खिलाफ अभियान में जब वे जुटे थे। कट्टर हिंदू भी उनके खिलाफ थे और कट्टर मुसलमान भी। देश सांप्रदायिकता की भीषण आग में जल रहा था, राजनेता आने वाली सत्ता के लिए राजनीति करने में व्यस्त थे और वह बूढ़ा व्यक्ति अकेले इस आग को बुझाने की कोशिश कर रहा था।
उसके इस अभियान का असर पड़ा। नोआखली में बलवा थमा। बिहार के इलाकों में लोगों ने वादा किया कि अब वे ऐसा नहीं करेंगे। और फिर जब आजादी के दिन वे कोलकाता गये तो वहां चमत्कार हुआ। उसे सभी लोग कलकत्ते का चमत्कार ही कहते हैं। गांधी ने मुस्लिम लीग के बड़े नेता सुहारावर्दी को साथ लिया और एक ही घर में रहने लगे। फिर वे लोगों को समझाते, उनसे बातें करते। अचानक दंगे बंद हो गये।
उस वक्त के वायसराय माउंटबेटेन ने लिखा है, बंटवारे की आग में भारत की दोनों सीमाएं जल रही थीं। पंजाब और बंगाल दोनों तरफ से हिंसक खबरें आ रही थीं। जहां पंजाब की तरफ हमने फौजें लगा दी थीं, वहीं बंगाल की तरफ अकेले गांधी थे। पंजाब के इलाके में फैले रक्तपात और हिंसा को हम रोक नहीं पाये। मगर जो काम लाखों लोगों की फौज नहीं कर पायी, उसे एक अकेले गांधी ने कर दिया। बंगाल में नफरत की आंधी थम गयी थी।
फिर गांधी को दिल्ली आना पड़ा। दिल्ली में उन दिनों जब गांधी आते थे तो दलितों की बस्ती में ठहरते थे। मगर सुरक्षा की वजहों से उन्हें बिरला हाउस में ठहराया गया। वहां भी उनपर हमले होते रहे, लोग बहस करते रहे। मगर गांधी ने शहादत का मन बना लिया था, इसलिए वे सुरक्षा बढ़ाने का विरोध करते थे। फिर गांधी की हत्या हो गयी।
दुखद तो यह है कि गांधी की हत्या न बंगाल के लोगों ने की, न बिहार के लोगों ने, न दिल्ली वालों ने। न पाकिस्तान से आय़े किसी शरणार्थी ने। एक शरणार्थी उस साजिश में शामिल जरूर था, मदन लाल पाहवा। मगर हत्यारा वह नहीं था।
गांधी की हत्या एक मराठी व्यक्ति ने की, जिस महाराष्ट्र में उस वक्त कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हो रहा था। नथुराम गोडसे, जो बापू का हत्यारा था, वह मराठा प्राइड का नुमाइंदा था। वह नफरत की उस स्कूल का छात्र था, जो पुणे में लंबे समय से चल रहा था, जिसके मुखिया सावरकर थे।
नफरत के उस स्कूल ने जरूर सोचा होगा कि वे गांधी को खत्म कर देंगे। मगर गांधी की शहादत के बाद सावरकर की वैचारिक मौत हो गयी। अगले 70 सालों तक उसके अनुयायियों को छुपकर छद्म तरीके से अपना अभियान चलाना पड़ा। मगर गांधी और उनके विचार अमर हो गये। आज सावरकर के अनुयायियों को भी गांधी के आगे शीश नबाना पड़ता है। आज हमारा देश एक धार्मिक देश नहीं है, सांप्रदायिकता यहां का विचार नहीं है। धर्मनिरपेक्षता ही यहां का असल सिद्धांत है। यही गांधी की शहादत का हासिल है। इसलिए इसे मैं अनोखी शहादत कहता हूं। और बार-बार सोचता हूं कि गांधी की इस आखिरी जंग से हम सबको सीखने की जरूरत है।
प्रवीण शर्मा
अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को लेकर दशकों तक चले विवाद का अंत 2019 के आखिर में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के साथ हो गया था.
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का काम शुरू भी हो गया है. दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन पर एक मस्जिद बनाने की बात भी कही गई थी.
इस मस्जिद को नाम क्या दिया जाएगा इसे लेकर अभी तक कश्मकश जारी है. हालाँकि, ऐसी खबरें भी आई हैं कि मस्जिद का नाम मौलवी अहमदुल्ला शाह के नाम पर रखा जा सकता है.
ख़बरों के मुताबिक, अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के तैयार किए गए इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (आईआईसीएफ) में इस मस्जिद का नाम मौलवी अहमदुल्ला शाह के नाम पर रखने की बाबत विचार-विमर्श चल रहा है.
हुसैन ने कहा, "दरअसल मस्जिद का नाम मौलवी अहमदुल्ला शाह के नाम पर नहीं रखा जा रहा है. बल्कि इस परिसर में बनने वाले इंडो-इस्लामिक कल्चरल रिसर्च सेंटर का नाम मौलवी अहमदुल्ला शाह के नाम पर रखने की चर्चा चल रही है. अभी इस पर विचार हो रहा है."
आईआईसीएफ के सेक्रेटरी अतहर हुसैन के मुताबिक, "मस्जिद परिसर में बनने वाले इंडो-इस्लामिक कल्चरल रिसर्च सेंटर में एक लाइब्रेरी, म्यूजियम और एक पब्लिशिंग हाउस भी शामिल होंगे."
इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (आईआईसीएफ) ट्रस्ट इस मस्जिद का डिजाइन जारी पिछले दिनों जारी कर चुका है.
आधुनिक डिजाइन वाली मस्जिद के साथ ही इस परिसर में एक 200 बिस्तरों वाला सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, एक म्यूजियम और आर्काइवल सेंटर भी होगा. इसके अलावा, इसमें एक लाइब्रेरी और एक कम्युनिटी किचेन भी बनाई जाएगी.
अयोध्या के धन्नीपुर गांव में मस्जिद के निर्माण का काम 26 जनवरी से शुरू हो जाएगा.
मौलवी अहमदुल्ला शाह के नाम पर विचार करने की वजह
कल्चरल रिसर्च सेंटर का फोकस मूल रूप से 1857 की क्रांति और उसके बाद 1947 में आजादी मिलने तक के इतिहास के रिसर्च होगा.
हुसैन कहते हैं, "1919 में जब महात्मा गाँधी पहली बार लखनऊ आए थे, तो वे मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली के यहाँ ही छह महीने रहे हैं. उस वक्त अवध में किसान आंदोलन चल रहा था."
हुसैन कहते हैं कि आज़ादी का आंदोलन हिंदू-मुसलमानों का एक साझा संघर्ष है और हम चाहते हैं कि ये चीजें लोगों के सामने आएं.
1857 के पूरे संघर्ष में मौलवी अहमदुल्ला फैजाबाद इलाके के सबसे बड़े किरदार थे. इसी क्रांति के लिए उन्होंने अपनी शहादत दी. गंगा-जमुनी तहजीब की वे एक सही मिसाल हैं.
हुसैन कहते हैं, "ऐसे में जब हम फैजाबाद-अयोध्या में एक कल्चरल रिसर्च सेंटर विकसित कर रहे हैं तो उनके नाम से बेहतर क्या हो सकता था."
अहमदुल्ला शाह ने नाना साहब, तांत्या टोपे के साथ कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ी है. खासतौर पर लखनऊ और अवध की जितनी भी लड़ाइयाँ हैं उनमें अहमदुल्ला शाह ने ही नेतृत्व किया था.
यूपी सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के सीईओ सैयद मोहम्मद शोएब ने बताया है कि अभी इस पर कोई अंतिम फ़ैसला नहीं हुआ है.
हालाँकि, भले ही अयोध्या में बनने वाली मस्जिद मौलवी अहमदुल्ला शाह के नाम पर होगी या नहीं, यह अभी तय नहीं हो पाया है, लेकिन उनका नाम सुर्खियों में ज़रूर छा गया है.
अयोध्या में मस्जिद के लिए मिली ज़मीन पर मुसलमानों को क्यों है ऐतराज़?
अयोध्या में बनने वाली मस्जिद की सामने आई तस्वीर - प्रेस रिव्यू
कौन थे मौलवी अहमदुल्ला शाह?
मौलवी अहमदुल्ला शाह 1857 के विद्रोह के एक अहम किरदार रहे हैं. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इसी जंग में उन्होंने अपना बलिदान दिया था.
इतिहासकार राम शंकर त्रिपाठी उनके बारे में एक दिलचस्प तथ्य बताते हैं.
वे कहते हैं, "अहमदुल्ला शाह एक सेनापति थे. वे हाथी पर हौदे में बैठकर चलते थे. उनके आगे एक हाथी चलता था जिस पर एक डंका (नगाड़ा) बजता हुआ चलता था. इस वजह से उनका नाम डंका शाह पड़ गया था और ज़्यादातर लोग उन्हें इसी नाम से जानते थे."
वे फ़ैज़ाबाद के मौलवी नाम से जाना जाता है. मौलवी अहमदुल्ला शाह ने लखनऊ, शाहजहांपुर, बरेली और अवध के दूसरे हिस्सों में क्रांति का नेतृत्व किया और उनकी वजह से कई जगहों पर विद्रोहियों को अंग्रेज़ी फौजों को हराने में कामयाबी भी मिली.
त्रिपाठी मौलवी अहमदुल्ला शाह को लेकर एक और अहम बात बताते हैं.
वे कहते हैं कि 1857 की क्रांति में अहमदुल्ला शाह ने कभी भी इस्लाम के नाम पर लोगों को इकट्ठा नहीं किया. बल्कि उन्होंने मातृभूमि के नाम पर लोगों को संघर्ष के लिए एकजुट किया. इसी वजह से उन्हें गंगा-जमुनी तहजीब के एक प्रतीक के तौर पर देखा जाता है.
त्रिपाठी कहते हैं कि उनकी सेना में हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के सरदार थे.
उन्होंने फ़ैज़ाबाद की मस्जिद सराय को अपना हेडक्वॉर्टर बनाया था. एक वक्त पर उन्होंने फ़ैज़ाबाद और अवध के एक बड़े हिस्से को अंग्रेज़ों से आज़ाद करा लिया था.
ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ जंग में उन्हें एक बेहतरीन सेनापति के तौर पर माना जाता है. हालाँकि, उन्होंने सैन्य शिक्षा नहीं ली थी, लेकिन कानपुर से लेकर लखनऊ और दिल्ली से बरेली और शाहजहांपुर तक अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हुई जंग में बहादुरी से लड़े.
कहा जाता है कि उनके नाम से अंग्रेज़ी सेनाओं में डर पैदा हो जाता था. लखनऊ और इसके आसपास के इलाकों में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं को हराने में अहमदुल्ला शाह के नेतृत्व और बहादुरी के चर्चे आम हैं.
बताया जाता है कि उनका जन्म 1787 में चेन्नई में हुआ था और बचपन में उनका नाम सिकंदर शाह था.
कैसे हुई थी शहादत?
शाहजहांपुर की पुवायां रियासत के राजा ने मदद के लिए मौलवी अहमदुल्ला शाह मदद को बुलवाया था. राजा अंग्रेज़ों से मिल गए थे और उन्होंने अहमदुल्ला शाह का कत्ल कर दिया. कहा जाता है कि उनका सिर और शरीर दोनों को शाहजहांपुर में अलग-अलग जगहों पर दफ़नाया गया था.
त्रिपाठी बताते हैं, "शाहजहांपुर के जगन्नाथ सिंह ने धोखे से उनकी हत्या कर दी थी."
हुसैन कहते हैं कि पुवायां के राजा का उनकी इस हरकत के लिए वहां के लोगों ने, जिनमें न सिर्फ़ मुसलमान बल्कि हिंदू भी शामिल थे, कड़ा विरोध किया था. यहाँ तक कि आज भी उन्हें हिक़ारत से देखा जाता है.
बताया जाता है कि 5 जून 1858 को उनकी हत्या की गई थी.
पौधा लगाकर शुरू हुआ निर्माण काम
आईआईसीएफ के सेक्रेटरी अतरह हुसैन ने बताया कि गणतंत्र दिवस के दिन सांकेतिक तौर पर मस्जिद के निर्माण का काम शुरू हो गया है.
उन्होंने कहा, "हमने फल देने वाले पौधे को लगाकर काम की शुरुआत की. हम इसे विश्व में चल रहे जलवायु परिवर्तन से भी जोड़ना चाहते हैं."
हालांकि, मुस्लिमों का बड़ा संगठन- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) बाबरी मस्जिद की जगह बनने वाली इस मस्जिद के प्रस्ताव को खारिज कर चुका है.
बोर्ड के सदस्य ज़फरयाब जिलानी इस मस्जिद को वक़्फ़ एक्ट के ख़िलाफ़ और शरियत के हिसाब से "अवैध" बता चुके हैं. (bbc.com)
सिंघु बॉर्डर पर हुई हिंसा में 44 लोगों की गिरफ़्तारी
दिल्ली पुलिस ने बताया है कि सिंघु बॉर्डर पर हुई हिंसा के मामले में 44 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. इनमें से एक अलीपुर थाने के एसएचओ पर तलवार से हमले के मामले का अभियुक्त भी है.
बीबीसी संवाददाता अरविंद छाबड़ा ने पुष्टि की है कि जिन लोगों पर मामला दर्ज किया गया है, उन पर दंगे भड़काने और हत्या की कोशिश का आरोप लगाया गया है.
दिल्ली की सीमा से लगे अलग-अलग प्रदर्शन स्थल पर कैसा है माहौल
गणतंत्र दिवस पर किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा के बाद से किसान आंदोलन पर सवाल उठने लगे थे.
हालांकि, किसान नेता लगातार दावा करते रहे हैं कि ये उनके आंदोलन को कमज़ोर करने की साज़िश थी.
इस बीच किसान आंदोलन पर रणनीति के लिए शुक्रवार को मुज़फ़्फरनगर में महापंचायत भी हुई और सिंघु बॉर्डर पर हिंसा की तस्वीरें भी सामने आईं.
प्रशासन की ओर से सभी प्रदर्शन स्थलों पर सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है. साथ ही किसान नेताओं से बात करके प्रदर्शन स्थल खाली कराने की भी कोशिश की जा रही है.
दिल्ली के अलग-अलग आंदोलन स्थलों पर क्या है मौजूदा हाल...
सिंघु बॉर्डर
सिंघु बॉर्डर पर भारी संख्या में सुरक्षाबल तैनात है। कृषि कानूनों के खिलाफ सिंघु बॉर्डर पर किसानों का विरोध-प्रदर्शन जारी है।
टिकरी बॉर्डर
टिकरी बॉर्डर पर बड़ी संख्या में सुरक्षाबल तैनात है। कृषि कानूनों के खिलाफ यहां किसानों का विरोध-प्रदर्शन जारी है।
गाज़ीपुर बॉर्डर पर वापस जुट रहे हैं किसान, युवा प्रदर्शनकारी भी बड़ी संख्या में मौजूद
किसान नेता राकेश टिकैत के आह्वान के बाद गाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों का लौटना जारी है.
गुरुवार रात को गाज़ीपुर बॉर्डर के उनके एक भावुक वीडियो से ना सिर्फ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बल्कि हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के किसानों में भी आंदोलन के लिए एक नई ऊर्जा देखने को मिली है.
कृषि क़ानून के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसान आज मनाएंगे सद्भावना दिवस
केंद्र सरकार के लाए कृषि क़ानूनों के विरोध में दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर किसान बीते दो महीने से अधिक समय से डटे हुए हैं.
किसानों का आंदोलन मुख्य रूप से दिल्ली से लगे सिंघु बॉर्डर, गाज़ीपुर बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर पर जारी है.
प्रदर्शन में शामिल नेता आज 30 जनवरी को सद्भावना दिवस मनाएंगे.
न्यूज़ एजेंसी एएनआई ने किसान नेता अमरजीत सिंह के हवाले से ख़बर दी है कि आज सभी किसान नेता भूख हड़ताल करेंगे. यह भूख हड़ताल सुबह नौ बजे से शुरू होकर शाम पांच बजे तक जारी रहेगी.
किसान नेता अमरजीत सिंह ने कहा कि यह किसान आंदोलन देश के लोगों का है. (bbc.com)
मुरादाबाद, 30 जनवरी | उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद-आगरा हाइवे पर शनिवार को एक वाहनों की टक्कर के कारण हुए हादसे में 10 लोगों की मौत हो गई। मुरादाबाद के एसएसपी प्रभाकर चौधरी ने इस घटना की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि घटना आगरा हाईवे पर कुंदरकी थाना इलाके में नानपुर की पुलिया के पास की है।
चौधरी ने बताया कि इस हादसे में 10 लोगों की मौत हो गई जबकि कई लोग घायल हो गए हैं। उन्होंने कहा कि इस दुर्घटना में तीन वाहन शामिल बताए जा रहे हैं।
जिला अधिकारी राकेश कुमार सिंह और एसएसपी प्रभाकर समेत अन्य अधिकारी मौके पर मौजूद हैं। पुलिस अधीक्षक नगर अमित आनंद जिला अस्पताल में घायलों को देखने पहुंचे और उन्होंने बताया कि मृतकों की पहचान कराने का प्रयास किया जा रहा है।
डॉक्टरों की टीम घायलों के इलाज में लगी है। हादसे के बाद हाईवे पर जाम लग गया था। पुलिस ने क्रेन के जरिए वाहनों को हाईवे से हटाकर किनारे किया और यातायात चालू करा दिया गया है।
हादसे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुख जताया और अधिकारियों को निर्देश दिया है कि घायलों को पर्याप्त चिकित्सा उपलब्ध कराई जाए। सीएम योगी ने मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये की मुआवजा राशि देने की घोषणा की।
(आईएएनएस)
मुरादाबाद-आगरा हाइवे पर ट्रक और बस की टक्कर में दस लोगों की मौत हो गई है और क़रीब 15 लोग घायल हैं.
कुछ घायलों की स्थिति बेहद गंभीर है जिन्हें मुरादाबाद के बाहर के अस्पताल रेफ़र किया गया है. यह हादसा सुबह क़रीब सवा आठ बजे थाना कुंदरकी इलाक़े के हुसैनपुर पुलिया पर हुआ है.
हादसे के बाद पुलिस प्रशासन मौके पर मौजूद है.
एसएसपी मुरादाबाद प्रभाकर चौधरी ने बीबीसी को बताया कि हादसे में दस लोगों की मौत हो गई है और 15 से अधिक लोग घायल हैं.
कैसे हुआ हादसा
शुरुआती तौर पर ऐसा माना जा रहा था कोहरे और धुंध के कारण ट्रक और बस की टक्कर हुई होगी लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि हादसा ओवर-टेकिंग के दौरान हुआ.
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार समीरात्मज मिश्र ने बताया कि ट्रक ने पहले भी तीन बार बस को ओवर टेक करने की कोशिश की थी. ओवर टेक करने के कारण ही यह हादसा हुआ.
सीएम योगी आदित्यनाथ ने जताया शोक
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे में अपनी जान गंवाने वालों के लिए गहरा शोक व्यक्त किया है.
उत्तर प्रदेश सूचना निदेशक शिशिर ने बताया कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से देख रहा है.
उन्होंने बताया कि घायलों के समुचित इलाज के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को आदेश दे दिये गए हैं.
सरकार की ओर से सभी घायलों को 50 हज़ार रुपये की आर्थिक सहायता दिये जाने की घोषणा की गई है. इसके अलावा मृतकों के परिवार के लिए दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिये जाने की घोषणा की गई है.
मुरादाबाद. उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में आगरा हाइवे पर कोहरे का कहर देखने को मिला है. यहां बस और ट्रक में भीषण टक्कर हुई है, जिसमें बस में सवार 7 यात्रियों की दर्दनाक मौत की खबर थी. लेकिन कुछ समय बाद मरने वालों की संख्या बढ़कर 10 हो गई है. वहीं, बस में सवार करीब 25 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं. घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. मौके पर पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी पहुंच रहे हैं, राहत बचाव कार्य चल रहा है. मुरादाबाद शहर से करीब 18 किलोमीटर दूर थाना कुंदरकी इलाके के हुसैनपुर पुलिया की ये घटना है.
उधर, इस दुर्घटना पर सीएम योगी ने तत्काल मौके पर अधिकारियों को जाने का निर्देश दिया है. सहायता पहुंचाने और स्वास्थ्य सुविधाओं को तत्काल उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है. मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख और घायलों को 50-50 हजार की सहायता राशि देने का निर्देश दिया है. डीएम, एसएपी और सीएमओ मौके पर पहुंच रहे हैं.
अलग-अलग हादसों में 3 की मौत
मुरादाबाद में इससे पहले अलग-अलग सड़क हादसों में 3 लोगो की मौत हो गई. थाना कटघर क्षेत्र में बाईक सवार को डंपर ने रौंद दिया, जिसमें बाइक सवार की मौत हो गई. वहीं थाना छजलैट क्षेत्र में साइकिल सवार बुज़ुर्ग को अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी. दुर्घटना में उसकी भी जान चली गई. इसके अलावा थाना सिविल लाइंस क्षेत्र में बेकाबू कार पेड़ से टकरा गई, जिसमें कार सवार युवक की मौत हो गई. (bbc.com)
नई दिल्ली, 30 जनवरी| राष्ट्रीय राजधानी में इजरायली दूतावास के पास शुक्रवार शाम को धमाका हुआ। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को एक सीसीटीवी फुटेज मिला है, जिसमें दो लोगों को कार से बाहर निकलकर दूतावास की ओर आगे बढ़ते देखा जा रहा है। इजरायल से जांचकर्ताओं की एक टीम शनिवार यथाशीघ्र दिल्ली पहुंच सकते हैं, जिनके द्वारा इस ब्लास्ट के संदर्भ में भारतीय एजेंसियों की सहायता की जाएगी। इस घटना में दिल्ली के लुटियंस हाई सिक्योरिटी जोन में कुछ कारें क्षतिग्रस्त हुई हैं।
जिस गाड़ी से इन दो लोगों को दूतावास के पास छोड़ा गया था, उसके चालक का पता लगा लिया गया है और इन दो संदिग्धों के स्कैच बनाए जा रहे हैं। ब्लास्ट में इनकी संलिप्तता को सुनिश्चित करने के लिए जांच शुरू कर दी गई है।
मौके से एक खत भी बरामद हुआ है, जिसमें लिखा हुआ है कि यह धमाका बस एक 'ट्रेलर' है।
सूत्रों ने बताया कि खत में ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी और ईरान के वरिष्ठ परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फाखरीजादे का उल्लेख 'शहीद' के रूप में किया गया है। बीते साल इन दोनों की ही हत्या कर दी गई है।
शुक्रवार को यह धमाका विजय चौक से 1.4 किलोमीटर की दूरी पर हुआ, जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित सरकार के अन्य वरिष्ठ सदस्य बीटिंग र्रिटीट समारोह के लिए इकट्ठे हुए थे।
राजधानी में एयरपोर्ट सहित और कई महत्वपूर्ण स्थानों पर चौकसी बढ़ा दी गई है। (आईएएनएस)
-अरुल लुईस
न्यूयार्क, 30 जनवरी| अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने शुक्रवार को अपने भारतीय समकक्ष एस. जयशंकर से फोन पर बात की और द्विपक्षीय सम्बंधों को और मजबूत बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत, अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साथी है।
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि ब्लिंकेन ने जयशंकर से भारत-अमेरिका के बढ़ते सम्बंधों को और मजबूत बनाने पर बात की। साथ ही उन्होंने कोविड टीकाकरण के प्रयासों, क्षेत्रीय विकास और द्विपक्षीय सम्बंधों को प्रगाढ़ बनाने के विभिन्न उपायों पर भी चर्चा की।
प्राइस ने कहा कि दोनों नेताओं ने वैश्विक विकास की दिशा में परस्पर सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई।
इस वार्ता के बाद जयशंकर ने अपने ट्वीट संदेश में कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री के साथ बातचीत बेहद अच्छी रही। अमेरिका के नए विदेश मंत्री का पदभार ग्रहण पर मैंने उन्हें बधाई दी। भविष्य में भी उनके साथ काम करने को तत्पर हूं। हमने इस बात पर सहमति जताई कि हम परस्पर सहयोग के साथ द्विपक्षीय सम्बंधों की बुनियाद और मजबूत बना सकते हैं। हमलोगों ने कोविड महामारी से लड़ने के लिए विभिन्न प्रयासों एवं उपायों पर भी बात की।
गौरतलब है कि वर्ष 2015 में जब ब्लिंकेन उप विदेश मंत्री थे और जयशंकर विदेश सचिव थे, तो उस वक्त दोनों की मुलाकात नई दिल्ली में हुई थी। प्राइस ने बताया कि दोनों नेता बहुत जल्द एक-दूसरे से मिलने को तत्पर हैं।
प्रवक्ता ने बताया कि इस बातचीत में ब्लिंकेन ने क्वॉड (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान) के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए साथ मिलकर काम करने के महत्व पर जोर दिया। क्वॉड चार देशों - भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान का एक समूह है।
उल्लेखनीय है कि इन दोनों नेताओं की वार्ता से पूर्व बुधवार को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और उनके अमेरिकी समकक्ष जेक सुलिवान के बीच बातचीत हुई थी। दोनों ने भी हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में परस्पर सहयोग जारी रखने और क्षेत्रीय सुरक्षा बढ़ाने के विषय पर बात की थी। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 30 जनवरी| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुचारू रूप से संसद के कामकाज को ध्यान में रखते हुए बजट सत्र से पहले शनिवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सर्वदलीय बैठक की अध्यक्षता करेंगे। सितंबर में पारित हुए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में होने वाली इस बैठक में भाग लेने के लिए सभी दलों के नेताओं को आमंत्रित किया गया है।
प्रदर्शनकारी किसानों की मांग यही है कि सरकार इन कानूनों को रद्द कर दें, लेकिन सरकार ने इसके समर्थन में कोई बात नहीं कही है।
शुक्रवार को लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला ने नेताओं संग एक बैठक की, जिसमें भाग लेने के बाद उन्होंने कहा कि उनके द्वारा लोकसभा में सभी दलों के नेताओं से सदन की गरिमा का सम्मान करने का अनुरोध किया गया है और कार्यवाही के सुचारू संचालन के लिए उनका सहयोग भी मांगा गया है।
नए दशक के पहले बजट सत्र का शुक्रवार को राष्ट्रपति ने संसद में ऐलान किया और कुल 18 विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति के इस अभिभाषण का बहिष्कार किया।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने फिर से कहा कि सरकार को किसानों के आंदोलन के बारे में समाधान ढूंढ़ना चाहिए।
कांग्रेस के साथ 17 विपक्षी दलों ने किसानों के साथ एकजुटता दिखाते हुए राष्ट्रपति कोविंद के संबोधन का बहिष्कार करने की घोषणा की थी। ये किसान 26 नवंबर से दिल्ली सहित सिंघू, टिकरी और गाजीपुर की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। (आईएएनएस)
श्रीनगर, 30 जनवरी| दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ के दौरान दो सशस्त्र आतंकवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा बलों के साथ ललहार इलाके में शुक्रवार देर शाम मुठभेड़ शुरू हुई। आतंकियों के पास से दो एके-47 राइफल बरामद हुए हैं।
मुठभेड़ उस समय शुरू हुई जब सुरक्षा बलों ने इलाके में आतंकवादियों के छिपे होने की सूचना मिलने के बाद तलाशी अभियान शुरू किया।
सुरक्षा बल जैसे ही आतंकियों के गुप्त ठिकाने के पास पहुंचे, उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। इसके बाद जवानों ने भी जवाबी कार्रवाई की।
पुलिस के मुताबिक, दोनों आतंकवादियों ने अपने-अपने एक-47 राइफल के साथ पुलिस व सुरक्षा बलों के समक्ष सरेंडर कर दिया। इनमें से एक आतंकवादी मुठभेड़ के दौरान घायल हो गया। उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया है। (आईएएनएस)
वॉशिंगटन, 30 जनवरी| जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक, दुनिया भर में कोरोनावायरस महामारी के मामलों की संख्या 10.2 करोड़ तक पहुंच गई है, जबकि अब तक 22 लाख से अधिक लोगों की इससे मौत हो चुकी है। शुक्रवार सुबह को अपने हालिया अपडेट में यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने खुलासा किया कि इस वक्त दुनिया भर में कोविड मामलों और इससे हुई मौतों की संख्या क्रमश: 102,007,480 और 2,204,494 है। सीएसएसई के मुताबिक, 25,909,336 मामलों और 436,541 मौतों के साथ अमेरिका वायरस से सबसे अधिक प्रभावित देशों की सूची में पहले स्थान पर है।
मामलों के संदर्भ में भारत सूची में दूसरे पायदान पर है। यहां कोरोना से संक्रमितों की संख्या 10,720,048 है।
जिन अन्य देशों में दस लाख से अधिक मामलों की पुष्टि हुई हैं, उनमें ब्राजील (9,118,513), ब्रिटेन (3,783,593), रूस (3,771,514), फ्रांस (3,212,640), स्पेन (2,743,119), इटली (2,529,070), तुर्की (2,464,030), जर्मनी (2,207,393), कोलंबिया (2,077,633), अर्जेंटीना (1,915,362), मैक्सिको (1,825,519), पोलैंड (1,502,810), दक्षिण अफ्रीका (1,443,939), ईरान (1,405,414), यूक्रेन (1,253,127), पेरू (1,119,685) और इंडोनेशिया (1,051,795) शामिल हैं।
ब्राजील में कोरोना महामारी से 221,547 लोगों की जानें गई हैं, जो अमेरिका के बाद सर्वाधिक है। इसके बाद 155,145 मौतों के साथ मैक्सिको दूसरे नंबर पर है और भारत 154,010 मौतों के साथ चौथे पायदान पर है।
जिन अन्य देशों में 20,000 से अधिक मौतें हुई हैं, उनमें ब्रिटेन (104,572), इटली (87,858), फ्रांस (75,765), रूस (71,054), स्पेन (58,319), ईरान (57,807), जर्मनी (56,286), कोलंबिया (53,284), अर्जेंटीना (47,775), दक्षिण अफ्रीका (43,633), पेरू (40,484), पोलैंड (36,780), इंडोनेशिया (29,518), तुर्की (25,736), यूक्रेन (23,610) और बेल्जियम (20,982) शामिल हैं। (आईएएनएस)
अहमदनगर, 29 जनवरी| सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने केंद्र सरकार की ओर से पारित किए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में शनिवार से शुरू होने वाला भूख हड़ताल रद्द करने का फैसला किया है। 83 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता ने शुक्रवार देर शाम महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस की मौजूदगी में इसकी घोषणा की।
हजारे ने फड़णवीस के साथ एक बैठक के बाद कहा, मैं लंबे समय से कई मुद्दों पर आंदोलन कर चुका हूं। शांतिपूर्वक प्रदर्शन करना कोई अपराध नहीं है। मैं तीन साल से किसानों के मुद्दे उठा रहा हूं।
उन्होंने कहा कि किसान इसलिए आत्महत्या करते हैं, क्योंकि उन्हें उनकी उपज की सही कीमत नहीं मिलती।
अन्ना हजारे ने 30 जनवरी से शुरू होने वाला उपवास वापस लेने की घोषणा करते हुए संवाददाताओं से कहा, सरकार ने न्यूनतन समर्थन मूल्य (एमएसपी) को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का फैसला किया है- मुझे इस संबंध में पत्र मिला है। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 30 जनवरी| कोरोना महामारी में मधुमेह रोग को नियंत्रण में लाने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने पहली बार एक ऐसा अध्ययन किया है जिसमें दो-दो चिकित्सा पैथी को मिलाकर बीजीआर-34 की नई ताकत का पता चला है। यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मधुमेह रोगियों में दिल से जुड़ी बीमारियों की आशंका को कम किया जा सकता है। एलोपैथी और बीजीआर-34 इन दो दवाओं को एकसाथ देने से जहां मधुमेह तेजी से कम होता है। वहीं इस रोग की वजह से होने वाले हार्ट अटैक के खतरे को भी कम किया जा सकता है क्योंकि रक्तकोशिकाओं में यह बुरे कोलेस्ट्रोल को जमने नहीं देता है।
इससे पहले तेहरान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक भी एंटी आक्सीडेंट की मात्रा से प्रचुर हर्बल दवाओं के जरिए मधुमेह रोगियों में कोरोना संक्रमण का खतरा कम होने को लेकर अध्ययन प्रकाशित कर चुके हैं। भारत सरकार के वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान (सीएसआईआर) द्वारा विकसित आयुर्वेदिक दवा बीजीआर-34 की एंटी डायबिटिक क्षमता का पता लगाने के लिए एम्स के डॉक्टरों ने यह अध्ययन किया है।
एम्स के फार्माकिलॉजी विभाग के डॉ. सुधीर चंद्र सारंगी की निगरानी में हो रहा यह अध्ययन तीन चरणों में किया जा रहा है जिसका पहला चरण करीब डेढ़ साल की मेहनत के बाद अब पूरा हुआ है। इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक मिले हैं।
अध्ययन के अनुसार बीजीआर-34 और एलोपैथिक दवा ग्लिबेनक्लामीड का पहले अलग अलग और फिर एक साथ परीक्षण किया गया। दोनों ही परीक्षण के परिणामों की जब तुलना की गई तो पता चला कि एकसाथ देने से दोगुना असर होता है। इससे इंसुलिन के स्तर को बहुत तेजी से बढ़ावा मिलता है और लेप्टिन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है।
विजयसार, दारुहरिद्रा, गिलोय, मजीठ, गुड़मार और मिथिका जड़ी बूटियों पर लखनऊ स्थित सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स और नेशनल बॉटनिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट ने गहन अध्ययन के बाद बीजीआर-34 की खोज की थी।
डॉक्टरों का कहना है कि इंसुलिन का स्तर बढ़ने से जहां मधुमेह नियंत्रित होना शुरू हो जाता है वहीं लेप्टिन हार्मोन कम होने से मोटापा और मेटाबॉलिज्म से जुड़े अन्य नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। इतना ही नहीं इसके इस्तेमाल से कोलेस्ट्रोल में ट्राइग्लिसराइड्स एवं वीएलडीएल का स्तर भी कम हो रहा है जिसका मतलब है कि मधुमेह रो?गी में हार्ट अटैक की आशंका कम होने लगती है। यह एचडीएल (अच्छे कोलेस्ट्राल) के स्तर को बढ़ाकर धमनियों में ब्लॉकेज नहीं होने देती है। (आईएएनएस)
-रजनीश कुमार
जयप्रकाश नारायण बार-बार सरदार पटेल पर गांधी की हत्या को लेकर उंगली उठाते थे. आख़िरी दिनों में पटेल भी गांधी से इतने दुखी क्यों थे?
10 फ़रवरी 1949 को दिल्ली के लाल क़िले के आसपास आवाजाही रोक दी दी गई थी. सुरक्षा बलों की भारी तैनाती थी. महात्मा गांधी की हत्या पर अदालत का फ़ैसला आने वाला था. लाल क़िले के भीतर ही विशेष अदालत बनाई गई थी.
ठीक 11.20 बजे नाथूराम गोडसे के साथ आठ अन्य अभियुक्त कोर्ट रूम में लाए गए. केवल सावरकर के चेहरे पर गंभीरता थी जबकि नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे मुस्कुराते हुए आए.
ब्लैक सूट में जज आत्माचरण कोर्ट रूम में 11.30 बजे पहुँचे. जज ने बैठते ही नाथूराम गोडसे का नाम पुकारा, जिस पर गोडसे खड़े हो गए. फिर बारी-बारी से सभी का नाम बोला गया. जज आत्माचरण ने गांधी की हत्या में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फाँसी की सज़ा सुनाई. विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किस्टया, गोपाल गोडसे और दत्तात्रेय परचुरे को आजीवन क़ैद की सज़ा सुनाई गई.
जज ने सावरकर को बेगुनाह क़रार दिया और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया.
फ़ैसला सुनने के बाद, कटघरे से निकलते हुए गोडसे समेत सभी ने 'हिन्दू धर्म की जय, तोड़ के रहेंगे पाकिस्तान और हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान' के नारे लगाए. यह कोई पहली बार नहीं था जब गोडसे कोर्ट रूम में नारे लगा रहे थे. लाल क़िले में सुनवाई के दौरान आठ नवंबर 1948 को गवाही पूरी होने के बाद कोर्ट ने नाथूराम गोडसे से पूछा कि वो कुछ कहना चाहते हैं? इस पर गोडसे ने कहा कि वो 93 पन्ने का अपना बयान पढ़ना चाहते हैं.
गोडसे ने 10:15 बजे से बयान पढ़ना शुरू किया. बयान पढ़ने से पहले उन्होंने बताया कि लिखित बयान छह हिस्सों में है. गोडसे ने कहा कि पहले हिस्से में साज़िश और उससे जुड़ी चीज़ें, दूसरे हिस्से में गांधी की शुरुआती राजनीति, तीसरा हिस्सा गांधी की राजनीति के आख़िरी चरण, चौथा हिस्सा गांधीजी और भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई, पाँचवा हिस्सा आज़ादी के सपनों का बिखरना और आख़िरी हिस्सा 'राष्ट्र विरोधी तुष्टीकरण' की नीति है.
गोडसे ने मीडिया से अपील की कि उनके बयान को कोई बिना संदर्भ के न छापे. 45 मिनट पढ़ने के बाद गोडसे कोर्ट रूम में ही चकराकर गिर गए. कुछ देर बाद उन्होंने फिर से लिखित बयान पढ़ना शुरू किया और पूरा पढ़ने में पाँच घंटे का वक़्त लगा. इस दौरान वो बार-बार पानी पीते रहे. गोडसे ने अपने बयान का अंत 'अखंड भारत अमर रहे' और 'वंदे मातरम' के नारे से किया.
गोडसे के इस बयान को चीफ़ प्रॉसिक्यूटर ने कोर्ट के रिकॉर्ड से हटाने का आग्रह किया और कहा कि ये पूरी तरह से महत्वहीन हैं. इस पर गोडसे ने कोर्ट में कहा कि भारत की वर्तमान सरकार पर उन्हें भरोसा नहीं है क्योंकि यह सरकार 'मुस्लिम-परस्त' है. हालाँकि जज आत्माचरण ने गोडसे के बयान को रिकॉर्ड से हटाने से इनकार कर दिया और कहा कि अदालतों में लिखित बयान स्वीकार किए जाते हैं.

उस दिन भी कोर्ट रूम खचाखच भरा हुआ था.
नौ नवंबर 1948 को जज आत्माचरण ने नाथूराम से 28 सवाल पूछे. एक सवाल के जवाब में गोडसे ने कहा था, 'हाँ, गांधीजी को गोली मैंने मारी थी. गोली मारने के बाद एक आदमी ने मुझे पीछे से सिर पर मारा और ख़ून निकलने लगा. मैंने उससे कहा कि जो मैंने प्लान किया था वही किया और मुझे कोई पछतावा नहीं है. उसने मेरे हाथ से पिस्टल छीन ली. पिस्टल ऑटोमैटिक थी और डर था कि ग़लती से किसी और पर न चल जाए. उस आदमी ने मेरे ऊपर पिस्टल भिड़ा दी और कहा कि तुम्हें गोली मार दूँगा. मैंने उससे कहा कि मुझे गोली मार दो. मैं मरने के लिए तैयार हूँ".
महात्मा गांधी के पड़पोते और गांधी हत्याकांड पर एक प्रामाणिक किताब (लेट्स किल गांधी) लिखने वाले तुषार गांधी कहते हैं, "यह गोडसे का कोर्ट रूम ड्रामा था. उसने सोचा था कि वो बापू की हत्या करके नायक बन जाएगा और उसकी करनी से हिन्दू सहमत हो जाएँगे. जब ऐसा होता हुआ नहीं दिखा तो उसने कोर्ट रूम में नाटकीयता पैदा करने की कोशिश की".
30 जनवरी 1948
एक बहुत ही मनहूस दिन. नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे दिल्ली रेलवे स्टेशन के रेस्तराँ से नाश्ता करके बिड़ला मंदिर के लिए निकल गए.
गोडसे ने बिड़ला मंदिर के पीछे के जंगल में तीन या चार राउंड फ़ायर करके पिस्टल को परखा. दिन के 11.30 बजे गोडसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन निकल गए और करकरे मद्रास होटल. दोपहर बाद दो बजे करकरे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे. वहाँ गोडसे और आप्टे से मिले.

शाम के 4.30 बजे रेलवे स्टेशन से तांगे से तीनों बिड़ला मंदिर के लिए निकल गए. गोडसे ने बिड़ला मंदिर के पीछे लगी शिवाजी की मूर्ति के दर्शन किए. आप्टे और करकरे वहां से क़रीब चार किलोमीटर दूर बिड़ला भवन चले गए, बिड़ला भवन अलबुकर्क रोड पर था, जिसे आज तीस जनवरी मार्ग के नाम से जाना जाता है.
बिड़ला भवन को अब 'गांधी स्म़ति' के नाम से भी जाना जाता है, गोडसे ने प्रार्थना स्थल की ओर बढ़े रहे महात्मा गांधी को शाम के 5.17 बजे गोली मार दी. गोडसे को गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन आप्टे और करकरे दिल्ली से भाग गए.
गांधी की हत्या के 17 साल बाद जाँच आयोग का क्यों गठन क्यों किया गया? यह एक ज़रूरी सवाल है जिसका जवाब बहुत मुश्किल नहीं है.
गांधी की हत्या कोई अचानक नहीं हुई थी. हम कह सकते हैं कि आज़ाद भारत में पुलिस की लापरवाही की कहानी गांधी की हत्या से ही शुरू होती है. कई लोग मानते हैं कि गांधी की हत्या होने दी गई. बापू की हत्या के 17 साल बाद 22 मार्च 1965 को इसकी जाँच के लिए एक आयोग का गठन किया गया. इस जाँच आयोग की कमान सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस जीवन लाल कपूर को मिली. इसे कपूर कमिशन की जाँच के नाम से जाना जाता है.
12 अक्टूबर 1964 को नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे के अलावा विष्णु करकरे और मदनलाल पाहवा आजीवन क़ैद की सज़ा काटकर रिहा हुए.
जब गोपाल गोडसे और विष्णु करकरे पुणे पहुँचे तो उनके दोस्तों ने किसी नायक की तरह उनका स्वागत करने का फ़ैसला किया. इसके लिए एक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनी, जिसमें इनके कारनामे यानी गांधी की हत्या में इनकी भूमिका की सराहना और उसका उत्सव मनाने का फ़ैसला हुआ.
12 नवंबर 1964 को सत्यविनायक पूजा आयोजित हुई. इसमें आने के लिए मराठी में लोगों को आमंत्रण पत्र भेजा गया, जिस पर लिखा गया था कि देशभक्तों की रिहाई की ख़ुशी में इस पूजा का आयोजन किया गया है और आप सभी आकर इन्हें बधाई दें. इस आयोजन में क़रीब 200 लोग शरीक हुए थे. इस कार्यक्रम में नाथूराम गोडसे को भी देशभक्त कहा गया.
सबसे हैरान करने वाला रहा लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के नाती जीवी केतकर का बयान. जीवी केतकर उन दो पत्रिकाओं- 'केसरी' और 'तरुण भारत' के संपादक रहे थे, जिन्हें तिलक ने शुरू किया था. केतकर हिंदू महासभा के विचारक के तौर पर जाने जाते थे.
केतकर ही इस आयोजन की अध्यक्षता कर रहे थे. पूजा के बाद गोपाल गोडसे और करकरे ने जेल के अनुभवों को साझा किया और इसी दौरान केतकर ने कहा कि उन्हें पहले से ही गांधी की हत्या की योजना पता थी और ख़ुद नाथूराम गोडसे ने ही बताया था.
तिलक के नाती जीवी केतकर ने कहा, "कुछ हफ़्ते पहले ही गोडसे ने अपना इरादा शिवाजी मंदिर में आयोजित एक सभा में व्यक्त कर दिया था. गोडसे ने कहा था कि गांधी कहते हैं कि वो 125 तक ज़िंदा रहेंगे लेकिन उन्हें 125 साल तक जीने कौन देगा? तब हमारे साथ बालुकाका कनेटकर भी थे और गोडसे के भाषण के इस हिस्से को सुनकर परेशान हो गए थे. हमने कनेटकर को आश्वस्त किया था कि वो नाथ्या (नाथूराम) को समझाएँगे और ऐसा करने से रोकेंगे. मैंने नाथूराम से पूछा था कि क्या वो गांधी को मारना चाहता है? उसने कहा था कि हाँ, क्योंकि वो नहीं चाहता कि गांधी देश में और समस्याओं का कारण बनें". केतकर का यह बयान प्रेस में आग की तरह फैला.
दैनिक अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने जीवी केतकर का इंटरव्यू कर विस्तार से रिपोर्ट छापी. रिपोर्ट में वो तस्वीर भी छपी जिसमें नाथूराम गोडसे की तस्वीर को माला पहनाकर श्रद्धांजलि दी गई थी और उन्हें देशभक्त बताया गया था. जीवी केतकर ने इंडियन एक्सप्रेस से 14 नवंबर 1964 को कहा था, "तीन महीने पहले ही नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या योजना मुझसे बताई थी. जब मदनलाल पाहवा ने 20 जनवरी 1948 को गांधी जी की प्रार्थना सभा में बम फेंका तो बड़गे उसके बाद मेरे पास पुणे आया था और उसने भविष्य की योजना के बारे में बताया था. मुझे पता था कि गांधी की हत्या होने वाली है. मुझे गोपाल गोडसे ने इस बारे में किसी को बताने से मना किया था".
इसके बाद केतकर को गिरफ़्तार कर लिया गया. गोपाल गोडसे को भी फिर से गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया. इसके बाद ही गांधी की हत्या की जाँच के लिए कपूर कमिशन का गठन किया गया. कहा गया कि गांधी की हत्या सुनियोजित और साज़िश से की गई है इसलिए इसकी मुकम्मल जाँच होनी चाहिए और पता करना चाहिए कि इसमें और कौन-कौन लोग शामिल थे.

गांधी की हत्या के तात्कालिक कारण
13 जनवरी, 1948 को दिन में क़रीब 12 बजे महात्मा गांधी दो माँगो को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ गए. पहली माँग थी कि पाकिस्तान को भारत 55 करोड़ रुपए दिए जाएं और दिल्ली में मुसलमानों पर होने वाले हमले रुकें. गांधी की भूख हड़ताल के तीसरे दिन यानी 15 जनवरी को भारत सरकार ने घोषणा की कि वो पाकिस्तान को तत्काल 55 करोड़ रुपए देगी.
"ज़ाहिर है, बापू पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने की माँग भी कर रहे थे लेकिन उनका लक्ष्य भी यही था कि सांप्रदायिक सौहार्द क़ायम हो "
तुषार गांधी
इस घोषणा से गांधी के ख़िलाफ़ उग्रपंथी हिंदू बहुत नाराज़ हो गए. ख़ास तौर पर हिन्दू महासभा. महात्मा गांधी ने प्रार्थना के बाद दिए भाषण में कहा, "मुसलमानों को उनके घरों से बेदख़ल नहीं किया जाना चाहिए. हिन्दू शरणार्थियों को किसी भी तरह की हिंसा में शामिल नहीं होना चाहिए जिसकी वजह से मुसलमान अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हों".
हालाँकि तुषार गांधी का कहना है कि बापू की भूख हड़ताल का मुख्य मक़सद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाना नहीं था बल्कि सांप्रदायिक हिंसा को रोकना और सांप्रदायिक सद्भावना क़ायम करना था. वो कहते हैं, "ज़ाहिर है, बापू पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने की माँग भी कर रहे थे लेकिन लक्ष्य था कि सांप्रदायिक सौहार्द क़ायम हो".
क्या नेहरू और पटेल पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए नहीं देना चाहते थे? इसके जवाब में तुषार गांधी कहते हैं, "कैबिनेट का फ़ैसला था कि जब तक दोनों देशों के बीच विभाजन का मसला सुलझ नहीं जाता है तब तक भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए नहीं देगा. हालाँकि विभाजन के बाद दोनों देशों में संधि हुई थी कि भारत पाकिस्तान को बिना शर्त के 75 करोड़ रुपए देगा. इनमें से पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपए मिल चुके थे और 55 करोड़ बकाया था. पाकिस्तान ने ये पैसे माँगना शुरू कर दिया था और भारत वादाख़िलाफ़ी नहीं कर सकता था. बापू ने कहा कि जो वादा किया है उससे मुकरा नहीं जा सकता. अगर ऐसा होता तो द्विपक्षीय संधि का उल्लंघन होता".
सरकार ने गांधी की भूख हड़ताल के दो दिन बाद ही पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने का फ़ैसला किया और इस फ़ैसले के साथ ही गांधी उग्र हिन्दुओं की नज़र में विलेन बन चुके थे. सरदार पटेल भी गांधी से सहमत नहीं थे कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिए जाए. कपूर कमिशन की जाँच में सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल गवाह नंबर 79 के तौर पर पेश हुई थीं.
पटेल पर क्यों उठे सवाल
मणिबेन ने कपूर कमिशन से कहा था, "मुझे याद है कि मेरे पिता पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने को लेकर महात्मा गांधी से सहमत नहीं थे. मेरे पिता का मानना था कि अगर पाकिस्तान को यह रक़म दी जाती है तो लोग इससे नाराज़ होंगे और पाकिस्तान के साथ भी हमारी समझ यह है कि सारे मुद्दों के समाधान के बाद ही यह रक़म दी जाए".
मणिबेन पटेल ने कहा है, "मेरे पिता का कहना था कि पाकिस्तान को यह रक़म मिलेगी तो भारत में लोग इसकी ग़लत व्याख्या करेंगे और पाकिस्तान इस पैसे का इस्तेमाल हमारे ख़िलाफ़ कर सकता है. ऐसे में हमारे देशवासियों की भावनाएँ आहत होंगी. मेरे पिता ने महात्मा गांधी से ये भी कहा था कि इस भूख हड़ताल को लोग ठीक नहीं मानेंगे और इसे पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के हथियार के तौर पर देखेंगे".
तुषार गांधी कहते हैं कि नेहरू और पटेल 55 करोड़ रुपए देने पर सहमत नहीं थे क्योंकि उनके लिए जनभावना मायने रखती थी. तुषार कहते हैं, "बापू सही क्या है और गलत क्या है इसी आधार पर फ़ैसला करते थे. उनके लिए मानवता सबसे ऊपर थी. वो वादाख़िलाफ़ी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. जनभावना के दबाव में वो ग़लत फ़ैसले का समर्थन नहीं कर सकते थे. बापू ने वही करने को कहा जिसका वादा भारत ने किया था. नेहरू और पटेल चुनावी राजनीति में आ चुके थे लेकिन बापू आज़ादी के बाद भी अपने सिद्धांतों पर ही चल रहे थे. बापू को न जनभावना से डर लगता था और न ही मौत से".
महात्मा गांधी जब भूख हड़ताल पर थे तो बिड़ला भवन में उनके ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन भी कर रहे थे. लोग नाराज़ थे कि वो सरकार को 55 करोड़ रुपए देने पर मजबूर कर रहे हैं और दिल्ली में मुसलमानों के घर हिन्दू शरणार्थियों को नहीं दे रहे हैं. दिल्ली में सांप्रदायिक तनाव के कारण मुसलमान अपना घर-बार छोड़ बाहर निकल गए थे. उन्हें पुराना क़िला और हुमायूँ के क़िले में रखा गया था.
हिन्दू शरणार्थी मुसलमानों के घरों पर कब्ज़ा चाहते थे जबकि गांधी इसके ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर बैठ गए थे. गांधी की इस भूख हड़ताल के ख़िलाफ़ हिन्दू शरणार्थी ग़ुस्से में नारे लगा रहे थे- 'गांधी मरता है, तो मरने दो'. महात्मा गांधी के आजीवन सचिव रहे प्यारेलाल ने अपनी किताब ‘महात्मा गांधी द लास्ट फ़ेज’ में लिखा है, "इस भूख हड़ताल से दिल्ली में हिन्दू और मुसलमानों के बीच दुश्मनी कम करने में बहुत मदद मिली".
18 जनवरी 1948 को एक शांति समिति बनी. महात्मा गांधी को भरोसा दिया गया कि--महरौली में सूफ़ी संत कुतुबउद्दीन बख़्तियार काकी का उर्स हर साल की तरह मनाया जाएगा. मुसलमान दिल्ली के अपने घरों में जा सकेंगे. मस्जिदों को हिन्दुओं और सिखों के क़ब्ज़े से ख़ाली कराया जाएगा. मुसलमान इलाक़ों को अवैध कब्ज़ों से छुड़ाया जाएगा. डर से जो मुसलमान अपना घर छोड़कर भागे हैं उनके वापस आने पर हिन्दू आपत्ति नहीं जताएँगे.
इन आश्वासनों के बाद महात्मा गांधी ने 18 जनवरी को दोपहर 12.45 बजे मौलाना आज़ाद के हाथ से संतरे का जूस पीकर भूख हड़ताल ख़त्म की.
तो हत्यारा गोडसे नहीं होता?
इसके बाद हिन्दू महासभा के मंच तले एक बैठक हुई. इस बैठक में भारत सरकार को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने पर मजबूर करने और हिन्दू शरणार्थियों को मुसलमानों के घरों में नहीं रहने देने की तीखी आलोचना की. इस बैठक में महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया. उन्हें तानाशाह कहा गया और उनकी तुलना हिटलर से की गई. 19 जनवरी को हिन्दू महासभा के सचिव आशुतोष लाहिड़ी ने हिन्दुओं को संबोधित करते हुए एक पर्चा निकाला.
पुलिस की रिपोर्ट बताती है कि मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा को लेकर महात्मा गांधी की भूख हड़ताल से सिख भी नाराज़ थे. सिखों को भी लग रहा था कि गांधी ने हिन्दू और सिखों के लिए कुछ नहीं किया. पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, दूसरी ओर, मुसलमानों ने 19 और 23 जनवरी को दो प्रस्ताव पास करके कहा कि गांधी ने उनकी निःस्वार्थ सेवा की है.
गांधी की हत्या की पृष्ठभूमि में ये घटनाएँ तात्कालिक कारण रहीं. 17 से 19 जनवरी के बीच गांधी की हत्या की साज़िश रचने और हत्या करने वाले दिल्ली ट्रेन और फ़्लाइट से आ चुके थे. ये दिल्ली के होटलों और हिन्दू महासभा भवन में रह रहे थे. 18 जनवरी, 1948 को कुछ षड्यंत्रकारी शाम में पाँच बजे बिड़ला भवन में महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में शामिल हुए. ये भीड़ और जगह का मुआयना करने गए थे.
19 जनवरी को हिन्दू महासभा भवन में इनकी बैठक हुई और महात्मा गांधी की हत्या का पूरा खाका तैयार किया गया. 19 जनवरी को कुल सात में से तीन षड्यंत्रकारी नाथूराम विनायक गोडसे, विष्णु करकरे और नारायण आप्टे बिड़ला हाउस गए और प्रार्थना सभा की जगह का मुआयना किया. उसी दिन शाम में चार बजे ये फिर से प्रार्थना सभा के ग्राउंड पर गए और रात में दस बजे पाँचों हिन्दू महासभा भवन में मिले.
20 जनवरी को नाथूराम गोड़े की तबीयत ख़राब हो गई लेकिन चार लोग फिर से बिड़ला भवन गए और वहाँ की गतिविधियों को समझा. बिड़ला भवन से ये चारों हिन्दू महासभा भवन दिन में 10.30 बजे लौटे. इसके बाद हिन्दू महासभा भवन के पीछे जंगल में इन्होंने अपने रिवॉल्वर की जाँच की. रिवॉल्वर की जाँच के बाद फ़ाइनल प्लान सेट करने के लिए ये सभी दिल्ली के कनॉट प्लेस के मरीना होटल में मिले. शाम में पौने पाँच बजे ये बिड़ला भवन पहुँचे. बिड़ला भवन की दीवार के पीछे से मदनलाल पाहवा ने प्रार्थना सभा में बम फेंका.
मदनलाल को मौक़े पर ही गिरफ़्तार कर लिया गया. उनके पास से हैंड ग्रेनेड भी बरामद हुआ. तीन अन्य प्रार्थना सभा में थे और ये भीड़ का फ़ायदा उठाकर भाग गए. गांधी के पड़पोते तुषार गांधी कहते हैं कि बापू को मारने की असली साज़िश की तारीख़ 20 जनवरी ही थी, लेकिन उस दिन वे नाकाम रहे और दस दिन बाद गांधीजी के जीवन का अंतिम दिन आ गया.
हत्याकांड की गहरी पड़ताल कर चुके तुषार गांधी ने बीबीसी से कहा, "इनकी योजना थी कि धमाके के बाद भगदड़ हो जाएगी और दिगंबर बड़गे गांधीजी को गोली मार देगा. लेकिन मदनलाल पाहवा ने धमाका किया तो बापू ने सबको समझा कर बैठा दिया और भगदड़ नहीं मचने दी. ऐसे में दिगंबर बड़गे को गोली मारने का मौक़ा नहीं मिला और वहाँ से भागना पड़ा. उस दिन गोली मारने की ज़िम्मेदारी बड़गे को मिली थी. अगर 20 जनवरी को वे कामयाब होते तो हत्यारा गोडसे नहीं, बल्कि दिगंबर बड़गे होता".
हत्या के दो मुख्य दोषी नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे उसी दिन दिल्ली के मुख्य रेलवे स्टेशन से ट्रेन से इलाहाबाद, कानपुर होते हुए बॉम्बे भाग गए. ये 23 जनवरी की शाम में बॉम्बे पहुँचे. तीसरे नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे उस रात दिल्ली के फ़्रंटियर हिन्दू होटल में रुके और 21 जनवरी की सुबह फ़्रंटियर मेल से बॉम्बे के लिए निकल गए. चौथे विष्णु करकरे 23 जनवरी की दोपहर तक दिल्ली में ही रहे और दोपहर बाद वो भी ट्रेन और बस बदलते हुए 26 जनवरी की सुबह कल्याण पहुँचे. दिगंबर बड़गे और शंकर किस्टया 20 जनवरी को बॉम्बे एक्सप्रेस से कल्याण के लिए निकले थे और 22 जनवरी की सुबह पहुँच गए थे. उसी दिन ये पूणे के लिए निकल गए थे. इस तरह हत्या में शामिल लोग दिल्ली से भाग गए और किसी का पता भी नहीं चला.
पुलिस की ऐतिहासिक लापरवाही
20 जनवरी को बम फेंकने की ख़बर अगले दिन अख़बारों में छपी. टाइम्स ऑफ इंडिया, द स्टेट्समैन, बॉम्बे क्रॉनिकल में यह ख़बर बैनर शीर्षक से छपी. तब टाइम्स ऑफ इंडिया से एक पुलिस इंस्पेक्टर ने कहा था, "बम शक्तिशाली था और इससे कई लोगों की जान जा सकती थी. हैंड ग्रेनेड महात्मा गांधी को मारने के लिए था".
बॉम्बे क्रॉनिकल में रिपोर्ट छपी कि मदललाल पाहवा ने बम फेंकने का गुनाह क़बूल लिया है और कहा कि वो महात्मा गांधी के शांति अभियान से ख़फ़ा हैं इसलिए हमला किया.
मदनलाल पाहवा से पहले बिड़ला भवन में ही पूछताछ हुई, उसके बाद संसद मार्ग पुलिस स्टेशन ले जाया गया. पाहवा से पुलिस के सीनियर अधिकारियों ने पूछताछ की और उसने बयान दिए. पाहवा के बयान को लेकर पर्याप्त विवाद भी हुआ. पाहवा ने करकरे का नाम लिया था और साथ में यह भी बताया कि वो और उसके बाक़ी साथी दिल्ली में कहाँ रुके थे. मरीना होटल और हिन्दू महासभा भवन पर छापे मारे गए. इस दौरान पता चला कि गोडसे और आप्टे नाम बदलकर एस. और एम. देशपांडे नाम से रुके थे.
इस छापे में हिन्दू महासभा के कुछ दस्तावेज भी बरामद हुए. 21 जनवरी को 15 दिन के रिमांड पर पाहवा को लिया गया. संसद मार्ग पुलिस थाना से पाहवा को सिविल लाइंस लाया गया और 24 जनवरी तक पूछताछ चली.
अपने बयान में पाहवा ने ‘हिन्दू राष्ट्र’ अख़बार के मालिक का नाम लिया लेकिन अग्रणी अख़बार के संपादक का नाम नहीं लिया, जिसके संपादक नाथूराम गोडसे थे, मालिक थे नारायण आप्टे. 23 जनवरी को मरीना होटल के एक कर्मचारी कालीराम ने दिल्ली पुलिस को कुछ कपड़े सौंपे लेकिन पुलिस इनका जाँच में इस्तेमाल करने में नाकाम रही. 25 जनवरी को पाहवा को बॉम्बे पुलिस बॉम्बे ले गई और 29 जनवरी तक पूछताछ होती रही लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ.
27 जनवरी को गोडसे और आप्टे बॉम्बे से दिल्ली के लिए निकल गए. दोनों ट्रेन से ग्वालियर आए और रात में डॉ दत्तात्रेय परचुरे के घर रुके. अगले दिन यहीं से इटली में बनी काले रंग की ऑटोमैटिक बैरेटा माउज़र ख़रीदी. 29 जनवरी की सुबह दिल्ली आ गए. दोनों दिल्ली के मुख्य रेलवे स्टेशन पर रेलवे के ही एक कमरे में रुके. यहीं पर इनकी मुलाक़ात करकरे से हुई.
30 जनवरी को इन्होंने बिड़ला भवन के पीछे जंगल में पिस्टल शूटिंग की प्रैक्टिस की और शाम में पाँच बजे बापू को गोली मार दी. नाथूराम को वहीं गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन आप्टे और करकरे एक बार फिर से दिल्ली से भागने में कामयाब रहे. आप्टे और करकरे 14 फ़रवरी को जाकर गिरफ़्तार हुए.
पटेल की बेटी की दलील
जज आत्माचरण ने फ़ैसले के बाद कहा था कि पुलिस ने 1948 में 20 से 30 जनवरी के बीच जमकर लापरवाही की. मदनलाल पाहवा की गिरफ़्तारी के बाद दिल्ली पुलिस के पास गांधीजी की हत्या की साज़िश को लेकर पर्याप्त जानकारी थी.
जज आत्माचरण ने कहा था, "मदनलाल पाहवा ने साज़िश को लेकर बहुत कुछ बता दिया था. रुइया कॉलेज के प्रोफ़ेसर जीसी जैन ने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के गृह मंत्री मोरारजी देसाई को साज़िश के बारे में बताया और उन्होंने भी बॉम्बे पुलिस को सारी सूचना दे दी थी. लेकिन पुलिस बुरी तरह से नाकाम रही. अगर पुलिस ठीक से काम करती तो शायद गांधीजी की हत्या न हुई होती".
इसके बावजूद किसी पुलिस वाले के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हुई. तुषार गांधी ने लिखा है कि महात्मा गांधी की हत्या के मामले में चीफ़ इन्वेस्टिगेशन ऑफ़िसर जमशेद दोराब नागरवाला ने रिटायर होने के बाद कहा था, "मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि बिना सावरकर की मदद और भागीदारी के बिना गांधी की हत्या की साज़िश कभी सफल नहीं होती". (लेट्स किल गांधी, पेज-691) इसके बावजूद सावरकर को बेगुनाह क़रार दिया गया था.
सरदार पटेल देश के गृह मंत्री थे इसलिए उन पर भी ख़ूब सवाल उठे. मौलाना आज़ाद ने लिखा, "जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि सरदार पटेल गृह मंत्री के तौर पर गांधी की हत्या में अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकते हैं". (इंडिया विन्स फ़्रीडम, पेज--223)
सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल ने गवाह के तौर पर कपूर कमिशन से अपने बयान में कहा है कि उनके पिता को मुस्लिम विरोधी के तौर पर देखा जाता था और उनकी जान को ख़तरा था क्योंकि मारने की धमकी उनके घर तक आई थी. मणिबेन पटेल ने भी स्वीकार किया है कि जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक रूप से उनके पिता को गांधी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था.
मणिबेन ने कहा है, "जिस बैठक में उनके पिता को जयप्रकाश नारायण ने गांधी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार बताया था उसमें मौलाना आज़ाद भी थे लेकिन उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई. इससे मेरे पिता को बहुत दुख पहुंचा."
मणिबेन पटेल ने कपूर कमिशन से कहा था, "मेरे पिता पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने से बहुत दुखी थे. उन्हें लगता था कि इस रक़म को देने की वजह से ही बापू की हत्या हुई. यहाँ तक कि नेहरू भी पैसे देने के पक्ष में नहीं थे. इसी दौरान सरदार पटेल ने नेहरू से कहा था कि कैबिनेट से छुट्टी दे दीजिए क्योंकि मौलाना भी मुझे नहीं चाहते हैं".
गांधी की हत्या के बाद नेहरू ने पटेल को एक चिट्ठी लिखी. उस चिट्ठी के बारे में मणिबेन ने बताया कि उसमें नेहरू ने लिखा, "अतीत को भूलकर हमें साथ मिलकर काम करना चाहिए". नेहरू की बात सरदार ने भी मान ली लेकिन जयप्रकाश नारायण ने सरदार पर हमला करना जारी रखा. पाँच मार्च 1948 को सरदार को हार्ट अटैक आया तो उन्होंने कहा कि अब मर जाना चाहिए और गांधीजी के पास जाना चाहिए. वो अकेले चले गए हैं".
गांधी की हत्या के एक हफ़्ते बाद यानी छह फ़रवरी, 1948 को संसद का विशेष सत्र बुलाया गया और सरदार पटेल से सांसदों ने कई तीखे सवाल पूछे. 'तेज़' अख़बार के संस्थापक सांसद देशबंधु गुप्ता ने सरदार पटेल से संसद में पूछा, "मदनलाल पाहवा ने गिरफ़्तारी के बाद अपना गुनाह भी क़बूल लिया था और आगे की योजना के बारे में भी बताया था. कौन-कौन इसमें शामिल हैं ये भी बताया था. ऐसे में क्या दिल्ली सीआईडी बॉम्बे से इनकी तस्वीरें नहीं जुटा सकती थीं? फ़ोटो मिलने के बाद प्रार्थना सभा में बाँट दी जाती और लोग सतर्क रहते. क्या इसमें घोर लापरवाही नहीं हुई है?"
इस सवाल के जवाब में पटेल ने कहा, "दिल्ली पुलिस ने इन्हें पकड़ने की कोशिश की लेकिन सभी अलग-अलग ठिकानों पर थे. इनकी तस्वीरें भी नहीं मिल पाई थीं". महात्मा गांधी के आजीवन सचिव रहे प्यारेलाल जाँच में गवाह नंबर 54 थे. उन्होंने कहा है कि विभाजन के बाद पटेल के गांधी से मतभेद थे लेकिन गांधी को लेकर उनके मन में इज़्ज़त कम नहीं हुई थी. प्यारेलाल ने कहा था, "पटेल कहते थे कि मुसलमान भारत में रह सकते हैं और उन्हें सुरक्षा भी मिलेगी लेकिन उनकी वफ़ादारी भारत और पाकिस्तान के बीच में बँटी नहीं रह सकती".
मणिबेन पटेल ने कहा है कि उनके पिता सरदार पटेल बापू की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे क्योंकि पहले भी हमले हो चुके थे. मणिबेन ने कहा है, "मेरे पिता ने महात्मा गांधी से जाकर कहा था कि प्रार्थना सभा में आने वाले लोगों की जाँच की जाएगी उसके बाद ही अंदर आने दिया जाए लेकिन गांधी इसके लिए तैयार नहीं हुए थे".
गांधी की हत्या और आरएसएस
आरएसएस गांधी की हत्या में किसी भी तरह की भूमिका से लगातार इनकार करता रहा है, यहाँ तक कि राहुल गांधी के ख़िलाफ़ मानहानि का एक मुकदमा दायर किया गया है. लेकिन यह मामला इतना सीधा-सादा नहीं है.
पटेल ने गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाते हुए कहा था, "गांधी की हत्या के लिए वह सांप्रदायिक ज़हर ज़िम्मेदार है जिसे देश भर में फैलाया गया."
नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद से प्रकाशित गांधी के निजी सचिव रहे प्यारेलाल ने लिखा है, ''आरएसएस के सदस्यों को कुछ स्थानों पर पहले से निर्देश था कि वो शुक्रवार को अच्छी ख़बर के लिए रेडियो खोलकर रखें. इसके साथ ही कई जगहों पर आरएसएस के सदस्यों ने मिठाई भी बांटी थी.'' (गांधी द लास्ट फ़ेज, पेज-70)
गांधी की हत्या के दो दशक बाद आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गेनाइज़र' ने 11 जनवरी 1970 के संपादकीय में लिखा था, ''नेहरू के पाकिस्तान समर्थक होने और गांधी जी के अनशन पर जाने से लोगों में भारी नाराज़गी थी. ऐसे में नाथूराम गोडसे लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, गांधी की हत्या जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति थी.''
कपूर आयोग की रिपोर्ट में समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और कमलादेवी चटोपाध्याय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उस बयान का ज़िक्र है जिसमें इन्होंने कहा था कि 'गांधी की हत्या के लिए कोई एक व्यक्ति ज़िम्मेदार नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बड़ी साज़िश और संगठन है'. इस संगठन में इन्होंने आरएसएस, हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का नाम लिया था. गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर पाबंदी भी लगी. आरएसएस पर यह पाबंदी फ़रवरी 1948 से जुलाई 1949 तक रही थी.
नाथुराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने 28 जनवरी, 1994 को 'फ्रंटलाइन' को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''हम सभी भाई आरएसएस में थे. नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं ख़ुद और गोविंद. आप कह सकते हैं कि हम अपने घर में नहीं, आरएसएस में पले-बढ़े हैं. आरएसएस हमारे लिए परिवार था. नाथूराम आरएसएस में बौद्धिक कार्यवाह बन गए थे. नाथूराम ने अपने बयान में आरएसएस छोड़ने की बात कही थी. उन्होंने यह बयान इसलिए दिया था क्योंकि गोलवलकर और आरएसएस गांधी की हत्या के बाद मुश्किल में फँस जाते, लेकिन नाथूराम ने आरएसएस नहीं छोड़ा था.''
इसी इंटरव्यू में गोपाल गोडसे से पूछा गया कि आडवाणी ने नाथूराम के आरएसएस से संबंध को ख़ारिज किया है तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''वो कायरतापूर्ण बात कर रहे हैं. आप यह कह सकते हैं कि आरएसएस ने कोई प्रस्ताव पास नहीं किया था कि 'जाओ और गांधी की हत्या कर दो', लेकिन आप नाथूराम के आरएसएस से संबंधों को ख़ारिज नहीं कर सकते. हिन्दू महासभा ने ऐसा नहीं कहा. नाथूराम राम ने बौद्धिक कार्यवाह रहते हुए 1944 में हिन्दू महासभा के लिए काम करना शुरू किया था".
नाथूराम गोडसे किसी ज़माने में आरएसएस के सदस्य रहे थे, लेकिन बाद में वो हिन्दू महासभा में आ गए थे. हालांकि 2016 में आठ सितंबर को इकनॉमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में गोडसे के परिवार वालों ने जो कहा वह काफ़ी अहम है.
नाथूराम गोडसे और विनायक दामोदर सावरकर के वंशज सत्याकी गोडसे ने 'इकनॉमिक टाइम्स' को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''नाथूराम जब सांगली में थे तब उन्होंने 1932 में आरएसएस ज्वाइन किया था. वो जब तक ज़िंदा रहे तब तक संघ के बौद्धिक कार्यवाह रहे. उन्होंने न तो कभी संगठन छोड़ा था और न ही उन्हें निकाला गया था.''
महात्मा गांधी ने कहा था कि वे 125 साल तक ज़िंदा रहना चाहते हैं. हत्या से क़रीब छह साल पहले यानी 72 की उम्र में बापू ने अपनी यह तमन्ना ज़ाहिर की थी, उनका जीवन अचानक ख़त्म कर दिया 37 साल के मराठी ब्राह्मण नाथूराम गोडसे ने. जब गांधी की हत्या हुई तो वे 78 साल के थे.
आलेख - रजनीश कुमारस्रोत - जस्टिस जेएल कपूर कमिश्न की रिपोर्ट, लेट्स किल गांधी (तुषार गांधी), लास्ट फ़ेज़ ऑफ़ महात्मा गांधी (प्यारेलाल), इंडिया विन्स फ़्रीडम ( मौलाना आज़ाद)
-पूजा छाबड़िया
तारा कौशल ने अपनी रिसर्च के सिलसिले में कई बलात्कारियों का इंटरव्यू किया और इसका उन पर गंभीर असर पड़ा है.
उन्होंने 2017 से बलात्कारियों के इंटरव्यू पर आधारित अपने रिसर्च की शुरुआत की. इसके बाद वे अवसाद की चपेट में आयीं, उनके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया और कई दिन तो वह बस रोती रहीं.
एक शाम उन्होंने नोएडा के अपने फ्लैट के बेडरूम में खुद को बंद कर लिया. तारा उस शाम को याद करती हैं, "मेरे पार्टनर साहिल दरवाज़े पर खड़े थे. वह बार बार पूछ रहे थे कि ठीक तो हो, लेकिन मैं अंदर लगातार रो रही थी. तब मुझे लगा कि मुझे थेरेपी की ज़रूरत है."
वैसे भी रिसर्च शुरू करने से पहले तारा यौन हिंसा का आघात झेल रही थीं. वे जब 16 साल की थीं तब से इस मुद्दे पर बात कर रही हैं. उन्होंने अपने माता-पिता को बताया, "जब मैं चार साल की थी, तब माली ने मेरे साथ बलात्कार किया था."
यह सुनकर तारा के माता-पिता अवाक रह गए थे. लेकिन तारा के लिए यह अपने अंदर चल रहे तूफ़ान को बाहर निकालने जैसा था. इसके बाद से अपने साथ हुई यौन हिंसा के बारे में वह लगातार बोल रही हैं, पब्लिक डिबेट में हिस्सा ले रही हैं, दोस्तों से चर्चा कर रही हैं और अब किताब भी लिख रही हैं.
तारा ने बताया, "उस घटना की कुछ कुछ यादें हैं. मैं उसका नाम जानती हूं. वह कैसा लगता था ये जानती हूं. मुझे उसके घुंघराले बाल और मेरी ब्लू ड्रेस पर ख़ून लगना याद है." जब वह बड़ी होने लगीं तो उन्होंने हर दिन होने वाले दूसरे यौन उत्पीड़नों के बारे में सोचना शुरू किया. वह यह जानना चाहती थीं कि आख़िर ऐसा क्यों होता है?
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मेरी किताब 'व्हाय मेन रेप' मेरी व्यक्तिगत और पेशेवर यात्रा का नतीजा है. इस दौरान मुझे मानसिक आघात भी सहना पड़ा है."
छिपे बलात्कारी की पहचान
दिसंबर, 2012 में दिल्ली की चलती बस में फिज़ियोथेरेपी की छात्रा के साथ हुई गैंगरेप की घटना के बाद से भारत में बलात्कार और यौन हिंसा पर काफ़ी चर्चा हुई है. इस घटना के कुछ ही दिनों के भीतर आंतरिक ज़ख़्मों के चलते पीड़िता की मौत हो गई थी. मामले के चार दोषियों को मार्च, 2020 में फांसी की सज़ा हुई. यौन अपराध पर सख़्ती के बावजूद बलात्कार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2018 में भारत में कुल 33,977 बलात्कार हुए. इसका मतलब यह है कि भारत में प्रति 15 मिनट में बलात्कार की एक घटना होती है. हालांकि इन मुद्दों पर काम करने वाले एक्टिविस्टों की मानें तो वास्तविक संख्या कहीं ज़्यादा होगी क्योंकि कई मामले दर्ज नहीं किए जाते हैं.
तारा उनके बारे में जानना चाहती थीं जिन्हें कभी बलात्कार का दोषी नहीं ठहराया गया, जिन पर कभी बलात्कार के मामले दर्ज नहीं हुए. वह इस कोशिश में देश भर में नौ लोगों से मिलीं, जिन पर बलात्कार के आरोप लगे ज़रूर लेकिन इन लोगों से कभी आधिकारिक पूछताछ नहीं हुई.
तारा ने अपनी किताब में लिखा है, "मैंने उनके घर के माहौल को समझने में समय लगाया. उनका इंटरव्यू लिया. उन्हें, उनके परिवार और दोस्तों को समझने की कोशिश की. मैं अंडरकवर अपना काम कर रही थी- इसके लिए मैंने अलग नाम, ईमेल और फेसबुक आईडी का इस्तेमाल किया."
अंडरकवर काम करने के दौरान उन्हें अपना टैटू छिपाना पड़ा और इस दौरान उन्होंने हमेशा परंपरागत कुर्ते और जीन्स ही पहने. इतना ही नहीं वह अपने साथ एक अनुवादक भी रखती थीं, जिसका परिचय वह अपने बॉडीगार्ड के तौर पर देती थीं. वह अपना परिचय ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली एक अनिवासी भारतीय के तौर पर ज़ाहिर करती थीं जो एक फ़िल्म के रिसर्च के सिलसिले में आम लोगों के जीवन को जानने की कोशिश कर रही है.
तारा कौशल ने लिखा है, "मैं 250 सवाल पूछा करती थी और सभी के लिए एक जैसी बातों पर नज़र रखती थी. लेकिन मैंने कभी उन्हें यह नहीं बताया कि मैं उन लोगों को पढ़ने की कोशिश कर रही हूं, ऐसा करने पर वे बलात्कारी के तौर पर चिन्हित होने लगते."
सहमति की समझ का अभाव
तारा इस दौरान किसी भी अप्रिय स्थिति का सामना करने लिए भी तैयार थीं. वह अपनी पॉकेट में पेपर स्प्रे (मिर्ची वाला स्प्रे) रखती हैं, इसके अलावा स्थानीय स्तर पर इमर्जेंसी कॉन्टैक्ट की व्यवस्था रखती थीं. साथ ही व्हाट्सऐप पर एक सपोर्ट ग्रुप भी बनाया हुआ था जिसमें वह अपनी लाइव लोकेशन शेयर करती थीं.
हालांकि उन्होंने यह अनुमान नहीं लगाया था कि अंतरंग सवालों के जवाब देते वक्त तीन लोग अश्लील हरकत करने लगेंगे.
उत्तर भारत के एक शख़्स ने जाड़े की धूप में छत के बरामदे पर बैठकर क्या कुछ किया था, इस बारे में तारा ने लिखा है, "छोटे क़द का वो आदमी मेरे सामने बैठा था. मैं जितने लोगों से मिली वह उनमें सबसे शातिर यौन अपराधी (ये उसने खुद स्वीकार किया) था. उसने अपने छोटे से गांव की कई महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाया था."
"उसे जेल में होना चाहिए था या फिर समाज से निष्कासित होना चाहिए था लेकिन वह अपने समुदाय का प्रभावी शख़्स बना हुआ था. छत के बरामदे पर वह मेरे सवालों से ही उत्तेजित हो गया था और अश्लील हरकतें करने लगा था."
इन अनुभवों का तारा के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर देखने को मिला.
तारा ने बीबीसी को बताया, "जब मैंने इन इंटरव्यू को पूरा किया तब मुझे महसूस हुआ कि इस आघात से निपटने के लिए मुझे थेरेपी की ज़रूरत है. मैं काफी अवसाद में आ गई थी. कई रातें तो ऐसी रही है जब मैंने नींद में ही अपने पाटर्नर को काटते हुए कहा कि मुझे छेड़ना बंद करो."
हालांकि अंत में तारा को यह मालूम चला, "इन पुरुषों को सहमति की कोई समझ नहीं थी और ना ही उन्हें ये मालूम था कि बलात्कार क्या होता है?"
जब तारा ने अपनी रिसर्च शुरू की तो उन्होंने जेंडर आधारित हिंसा को लेकर सोशल मीडिया पर महिलाओं से बात की.
तारा ने बताया, "इन महिलाओं से बात करके मुझे दो पुरुषों के बारे में पता चल गया. लेकिन अन्य सात लोगों को तलाशना काफ़ी मुश्किल भरा रहा. मुझे स्थानीय पुलिस, स्थानीय मीडिया, गैर सरकारी संगठनों और जासूसी करने वाली एजेंसियों से भी संपर्क करना पड़ा."
तारा के साथ बातचीत करने वाले लोगों में अधिकांश ने बलात्कार ही नहीं कई बलात्कारों की बात स्वीकार की. हालांकि सज़ा झेल रहे बलात्कारियों से बात नहीं करने का फ़ैसला तारा ने पहले ही कर लिया था.
तारा ने बताया, "मेरे लिए, जेल बलात्कार करने वाले पुरुषों का प्रतिनिधित्व नहीं करता. लोग प्रायद्वीप पर नहीं होते हैं, लोगों के आसपास के माहौल को समझे बिना उनके बारे जानना, आपको पूरी जानकारी नहीं दे सकता."
हालांकि तारा कौशल से उलट शैफील्ड हालाम यूनिवर्सिटी में अपराध विज्ञान की लेक्चरर डॉ. मधुमिता पांडेय ने बलात्कार मामलों में सज़ा झेलने वालों को अपनी रिसर्च का विषय बनाया.
उन्होंने अपनी रिसर्च दिल्ली में दिसंबर, 2012 में हुए गैंगरेप के बाद शुरू की. उन्होंने बताया, "बलात्कारियों को शैतान क़रार दिया गया और उनके ख़िलाफ़ सामूहिक आक्रोश था. उनके अपराध से हमलोग इतने भयभीत हुए कि उन्हें अपने से अलग, अपनी संस्कृति से अलग दूसरा मानने लगे थे."
एक रिसर्चर के तौर पर डॉ. मधुमिता ने उस धारणा पर काम करने का फ़ैसला लिया जिसमें माना जाता है कि बलात्कारी पुरुषों में महिलाओं के प्रति कहीं ज़्यादा परंपरागत और दमनकारी दृष्टिकोण मौजूद होता है.
वह जानना चाहती हैं, "क्या ये पुरुष वाक़ई में महिलाओं के प्रति अपनी सोच में इतने अलग होते हैं, जितना हम मान रहे हैं?"
कोई भी बलात्कारी हो सकता है
डॉ. मधुमिता ने दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद 100 से ज़्यादा बलात्कारियों का साक्षात्कार किया है. इन सब लोगों की अपनी अपनी कहानियां हैं.
एक सामूहिक बलात्कार की सज़ा झेल रहे शख़्स ने कहा कि वह हादसे के तुरंत बाद भाग निकला था. मंदिर के एक सफ़ाई कर्मचारी ने बताया कि पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार करने के लिए उसे उकसाया गया था. वहीं एक युवा ने दावा किया कि आपसी सहमति से उसने संबंध बनाए थे, लेकिन लड़की के परिवार वालों ने जब दोनों को एक साथ देख लिया तब उस पर बलात्कार का आरोप लगाया गया.
डॉ. मधुमिता को पांच साल की बलात्कार पीड़िता के बारे में जब मालूम हुआ तो उन्होंने पीड़िता के परिवार से मिलने का फ़ैसला लिया.
डॉ. मधुमिता ने कहा, "बेटी के साथ बलात्कार की ख़बर मिलने के बाद पिता मानसिक तौर पर विक्षिप्त हो गए और परिवार को छोड़कर कहीं चले गए. लेकिन मां पुलिस के पास पहुंची. न्याय की बहुत उम्मीद नहीं होने के बाद भी उन्होंने सभी पेपरवर्क करके मामला दर्ज कराया."
डॉ. मधुमिता महिलाओं के प्रति इन पुरुषों की सोच को समझना चाहती थीं ताकि उन्हें यौन हिंसा की सोच का पता चल सके.
उन्होंने बताया, "अपराध की प्रकृति में अंतर के बावजूद एक बात कॉमन देखने को मिली, समाज में पुरुषों को जिस तरह का विशेषाधिकार मौजूद है उसका असर दिखा."
उन्होंने भी देखा कि बलात्कार पीड़िताओं पर दोष डाल रहे हैं और उनमें सहमति की समझ का अभाव है. अपनी रिसर्च के माध्यम से मधुमिता ने तारा की तरह ही एक प्रचलित धारणा का खंडन किया कि 'बलात्कारी आमतौर पर परछाइयों में छिपे अजनबी होते हैं.'
मधुमिता ने बताया, "लेकिन इस मामले में ज़्यादातर लोग पीड़िताओं के पहचान वाले थे. इसलिए कोई कैसे बलात्कारी हो जाता है, इसे समझना आसान होता है, ये लोग कोई असाधारण लोग नहीं होते हैं."
पुराने आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि ज़्यादातर मामलों में बलात्कारी पीड़िता की पहचान वाले होते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 95 प्रतिशत मामलों में ऐसा होता है. हालांकि इस मुद्दे पर काम कर रहे लोगों के मुताबिक इस वजह से भी सभी बलात्कार के मामले दर्ज नहीं होते.
सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाली संस्था प्रोजेक्ट 39 ए के कार्यकारी निदेशक डॉ. अनूप सुरेंद्रनाथ ने बताया, "बलात्कार के सभी मामले दर्ज नहीं होते क्योंकि अधिकांश में बलात्कारी पहचान वाले होते हैं. इसके चलते पीड़िता और उनके परिवार वालों पर अपराध की शिकायत दर्ज नहीं कराने के लिए कई तरह के दबाव काम करने लगते हैं."
ज़्यादातर वही मामले दर्ज होते हैं, जिसमें अपराध जघन्य होते हैं और वे सुर्खियों में आते हैं.
मौत की सज़ा है निदान?
भारत दुनिया का कोई अकेला देश नहीं है जहां इतने बड़े स्तर पर बलात्कार की घटनाएं होती हैं लेकिन कइयों का मानना है कि पितृसत्तात्मक समाज और असमान लैंगिक अनुपात के चलते स्थिति बद से बदतर हो रही है.
बीबीसी के भारतीय संवाददाता सौतिक बिस्वास कहते हैं, "ताक़त प्रदर्शित करने के लिए बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का चलन बढ़ा है और इसके ज़रिए समाज के दबे कुचले लोगों को भयभीत किया जाता है."
"बलात्कार के मामलों को दर्ज करने के लिहाज़ से स्थिति बेहतर हुई है. लेकिन भारत में आपराधिक न्याय व्यवस्था काफ़ी हद तक राजनीतिक दबाव में काम करती है इसमें कई बार अभियुक्तों को सज़ा नहीं मिलती है, यही वजह है कि बलात्कार के कम मामलों में ही सज़ा होती है."
हालांकि 2012 में दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना के बाद क़ानूनों को कहीं ज़्यादा सख़्त किया गया है. जघन्य मामलों में दोषियों को मौत की सज़ा का प्रावधान भी किया गया है. लेकिन तारा और डॉ. मधुमिता, दोनों को लगता है कि मौत की सज़ा का प्रावधान समस्या का दीर्घकालीन हल नहीं है.
डॉ. मधुमिता का कहना है, "मेरा पूरा यक़ीन सुधार और पुनर्वास में है. हमें अपना ध्यान समाज में बदलाव की ओर लाना चाहिए जिससे देश में महिलाओं और पुरुषों के बीच एकसमान स्तर का ढांचा बन पाए."
तारा इससे सहमति जताते हुए कहती हैं, "हमें इस अपराध के एक्टिव एजेंट पर नए सिरे से ध्यान फोकस करना होगा, ये एक्टिव एजेंट पुरुष हैं. हम उन्हें कैसे रोक सकते हैं? इसके लिए हमें उन्हें बचपन से बेहतर शिक्षा देनी होगी."
तारा ने जिन पुरुषों का इंटरव्यू किया है उनमें समाज के सभी तबके के लोग शामिल थे लेकिन किसी को भी स्कूली स्तर पर सेक्स एजुकेशन नहीं मिली थी.
तारा बताती हैं, "शिक्षा तो नहीं मिली लेकिन उन्हें अपने दोस्तों के साथ, पॉर्न फ़िल्मों और सेक्स वर्करों से आधी अधूरी जानकारी मिली."
कइयों ने अपने बचपन में ऐसी हिंसा को देखा भी था. तारा ने लिखा है, "सभी मामलों में लोगों ने पिता को मां को पीटते हुए देखा था. उन्हें प्यार नहीं मिला था, पिता या घर के बड़े पुरुषों के हाथों से उन्हें कई बार मार पड़ी थी."
उन्होंने रिसर्च के अंत में लिखा है कि पुरुष जन्म से ही विशेषाधिकार के साथ बड़ा होता है.
पुरुष बलात्कार क्यों करते हैं?
डॉ. मधुमिता ने बताया, "इसका कोई एक जवाब नहीं है क्योंकि बलात्कार एक कॉम्प्लेक्स क्राइम है. हर मामला अपने आप में अलग होता है और यह काफ़ी सब्जेक्टिव भी है. कुछ लोग गैंग रेप में शामिल होते हैं तो कुछ पीड़िता की पहचान वाले होते हैं तो कुछ एकदम अनजान को बलात्कार का शिकार बनाते हैं. बलात्कारी भी कई तरह के होते हैं - गुस्से में आकर बलात्कार करने वाले, क्रूरता के साथ दूसरों को पीड़ा पहुंचाने की नीयत से बलात्कार करने वाले और कई बलात्कार करने वाले सीरियल रेपिस्ट."
डॉ. मधुमिता के मुताबिक ये बलात्कारी कोई भी हो सकता है - पति, सहकर्मी, नज़दीकी दोस्त, डेट पर मिलने वाला दोस्त, क्लासमेट, प्रोफेसर.
डॉ. मधुमिता ने बताया, "देश के आम लोगों की तरह मैं भी सोचती थी कि जेल के अंदर मैं क्या सवाल जवाब करूंगी. यह धारणा बॉलीवुड फिल्मों के जेल देखकर बनी थी. मुझे लगता था डरावने दिखने वाले पुरुष होंगे - जिनके चेहरे पर कटे का निशान हों और धारीदार कपड़े पहने होंगे. ये लोग मेरे से दुर्व्यवहार कर सकते हैं, या अभद्रता भरे कमेंट्स पास कर सकते हैं जो मुझे बुरा लगेगा, यह सब सोच मुझे डर भी लगता था."
लेकिन जल्दी ही डॉ. मधुमिता को लगा कि ये ऐसे लोगों का समूह नहीं है. उन्होंने बताया, "जितना मैं उन लोगों से बात करने लगी, उनकी कहानियां सुनने लगीं तब वे मुझे विचित्र नहीं लगने लगे. यह हम सबको समझने की ज़रूरत है."
डॉ. मधुमिता के मुताबिक जेंडर वायलेंस के मुद्दे के निदान के लिए समाज को सामूहिक तौर पर आत्म अवलोकन करने की ज़रूरत है. वह ब्रिटिश प्रोफेसर लिज़ कैली की यौन उत्पीड़न की अवधारणा का ज़िक्र करते हुए कहती हैं जिसके मुताबिक यौन उत्पीड़न एक निरंतरता है जिसमें अलग अलग तरह की यौन हिंसाएं एक दूसरे से गुंथी होती हैं.
डॉ. मधुमिता ने बताया, "हमारे आसपास मौजूद पुरुष ख़तरनाक हो सकते हैं, यह विचार डराने वाला है लेकिन नया नहीं है. हम एक पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं. कोई आपका रेप नहीं करता है लेकिन वह अपना प्रभुत्व कई दूसरी तरह से ज़ाहिर करता है. समाज के लिए यह बिलकुल सामान्य बात है."
डॉ. मधुमिता के मुताबिक रोज़मर्रा के जीवन में महिलाओं के साथ भेदभाव पर चर्चा नहीं होती. कार्यस्थल से लेकर सड़कों पर होने वाले उत्पीड़न की ओर संकेत करते हुए डॉ. मधुमिता बताती हैं कि जब तक स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं हो जाती तब तक कोई ध्यान नहीं देता.
वह पूछती हैं, "हमें गुस्सा आता है जब पता चलता है कि बलात्कारी ने पीड़िता के कपड़ों पर टिप्पणी की है और उसे बलात्कार करने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया है. लेकिन हम इससे इतने भयभीत क्यों होते हैं? हमें इस पर अचरज क्यों होता है कि हम हर दिन जिस व्यवहार को सामान्य बताते हैं वही बढ़ते बढ़ते कहीं चरम रूप में ज़ाहिर होता है."
डॉ. मधुमिता ने बताया, "जब मैं बलात्कारी से बातचीत पूरी कर लेती थी, तो उसकी सामाजिक शब्दावली पर ध्यान देती थी. अपराध करने के लिए बनाया गया उसका बहाना, उस सामाजिक कथन को बताता है जिसमें वह बड़ा हुआ होता है."
डॉ. मधुमिता अब भारत में बलात्कारियों को लेकर सोच बदलने वाली पुनर्वास कार्यक्रम से जुड़ी हैं.
उन्होंने बताया, "मैं भारत में यौन अपराधियों के लिए पुनर्वास प्रशिक्षण कार्यक्रम देखना चाहती हूं जो बलात्कार से जुड़े मिथकों और महिलाओं के प्रति प्राचीन दृष्टिकोण को बदलने के लिए अन्य गतिविधियों के साथ व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर सत्र आयोजित हों."
"सुबह जगने से लेकर रात सोने तक, हर वक्त मेरे दिमाग़ में यही चल रहा होता है. इससे मुझे काफ़ी उम्मीद मिलती है." (bbc.com)
द हिंदू की ख़बर के मुताबिक, आर्थिक सर्वेक्षण 2021 में खाद्य सब्सिडी के खर्च को बहुत अधिक बताते हुए सुझाव दिया गया है कि 80 करोड़ ग़रीब लाभार्थियों को राशन की दुकानों से दिए जाने वाले अनाज के बिक्री मूल्य में बढ़ोतरी की जानी चाहिए.
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से खाद्यान्न बेहद सस्ती दर पर दिए जाते हैं. इसके तहत राशन की दुकानों से तीन रुपये प्रति किलो चावल, दो रुपये प्रति किलो गेहूं और एक रुपये प्रति किलो की दर से मोटा अनाज दिया जाता है.
ख़बर में कहा गया है कि सस्ती दर वाले गेहूं का ये मूल्य बढ़कर लगभग 27 रुपये प्रति किलो हो गया है. इसी तरह चावल का मूल्य भी लगभग 37 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बैठता है.
आर्थिक सर्वेक्षण 2021 में कहा गया है, "खाद्य सुरक्षा के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता के मद्देनज़र खाद्य प्रबंधन की आर्थिक लागत को कम करना मुश्किल है. लेकिन बढ़ते खाद्य सब्सिडी बिल को कम करने के लिए केंद्रीय निर्गम मूल्य (सीआईपी) में संशोधन पर विचार करने की ज़रूरत है."
सीआईपी वह रियायती दर होती है, जिस पर राशन की दुकानों के ज़रिए खाद्यान्न बांटा जाता है. सरकार ने कमज़ोर वर्गों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सब्सिडी जारी रखी है. यह क़ानून साल 2013 में लागू किया गया था, उसके बाद से गेहूं और चावल की कीमतों में बदलाव नहीं किया गया है, जबकि हर साल इसकी आर्थिक लागत में बढ़ोतरी हुई है.
आईआईटी दिल्ली में एसोसिएट प्रोफ़ेसर और विकास अर्थशास्त्री रितिका खेड़ा का कहना है कि केंद्र सरकार को सर्वेक्षण की सिफ़ारिशों को नहीं मानना चाहिए.
उनका कहना है कि खाद्य सब्सिडी पर बचत के बजाए जीवन बचाना सरकार की बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए दूसरे उपाय कर सकती है.
खेती-किसानी से उम्मीद
हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के मुताबिक, आर्थिक सर्वेक्षण में इस ओर इशारा किया गया है कि विभिन्न क्षेत्रों पर नजर डालने पर पता चलता है कि कृषि क्षेत्र अब भी आशा की किरण है.
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि "कृषि क्षेत्र की बदौलत वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था को कोविड-19 महामारी से लगे तेज़ झटकों के असर काफी कम हो जाएंगे. कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर पहली तिमाही के साथ-साथ दूसरी तिमाही में भी 3.4 प्रतिशत रही है."
आर्थिक सर्वेक्षण में मोदी सरकार के विवादित तीन कृषि क़ानूनों का समर्थन करते हुए कहा गया है कि "सरकार द्वारा लागू किए गए विभिन्न प्रगतिशील सुधारों ने जीवंत कृषि क्षेत्र के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है जो वित्त वर्ष 2020-21 में भी भारत की विकास गाथा के लिए आशा की किरण है."
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि "कोरोना महामारी के दौर में खेती के विपरीत लोगों के आपसी संपर्क वाली सेवाएं, विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुए, जिनमें धीरे-धीरे सुधार देखे जा रहे हैं." (bbc.com)

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर बीते 24 घंटे में घटनाक्रम तेज़ी से बदला है जहां किसान समर्थकों की संख्या बढ़ी है.

जिन्हें फ्लाइ-ओवर के नीचे जगह मिली, उन्हें थोड़ी राहत है क्योंकि सिर के ऊपर ठंड बरसाता आसमान नहीं है.

नारे सिर्फ़ शब्द नहीं होते, जोश बढ़ाने का काम करते हैं. जैसा कि ये नारा जो सड़क पर बने कांक्रीट के डिवाइडर पर लिखा हुआ है.

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर बीते दो महीनों से तीन नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन जारी है.

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर बुज़ुर्गों के साथ नौजवान भी बड़ी संख्या में नज़र आ रहे हैं.

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर मंच की रौनक रात में भी नज़र आ रही थी.

रात सिर्फ़ सोने के लिए नहीं होती, सुबह की तैयारी भी रात में ही होती है. (bbc.com)
नई दिल्ली, 30 जनवरी| गृहमंत्री अमित शाह का शनिवार से शुरू होने जा रहा पश्चिम बंगाल का दो दिवसीय दौरा स्थगित हो गया है। आईएएनएस को यह जानकारी पार्टी के भरोसेमंद सूत्रों ने दी है।
अमित शाह को शुक्रवार की रात पश्चिम बंगाल के कोलकाता पहुंचना था और शनिवार तथा रविवार को संगठन के कार्यक्रमों में हिस्सा लेना था।
सूत्रों का कहना है कि दिल्ली हिंसा और इजरायल दूतावास के पास हुए बम विस्फोट की घटना से उपजे माहौल को देखते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल का दौरा फिलहाल टाल दिया है।
सूत्रों का कहना है कि राजधानी के हालात को देखते हुए गृहमंत्री अमित शाह का यहां होना जरूरी है।
गृहमंत्री अमित शाह के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की बात करें तो उन्हें शुक्रवार देर रात कोलकाता पहुंचना था। शनिवार सुबह इस्कॉन मंदिर के दर्शन से उनके दौरे की शुरूआत होनी थी।
मंदिर के दर्शन के बाद वह कोलकाता से हेलीकॉप्टर के माध्यम से नदिया जिले के मायापुर, उत्तर 24 परगना के ठाकुरनगर में जाना था। ठाकुरनगर में रैली का भी कार्यक्रम था।
वहीं अगले दिन रविवार को गृह मंत्री अमित शाह का दक्षिण कोलकाता के भारत सेवाश्रम संघ जाने का कार्यक्रम तय था।
दूसरे दिन वह हावड़ा में रैली भी करने वाले थे। मगर, राजधानी के हालात को देखते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल का दो दिवसीय दौरा रद्द कर दिया है। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 30 जनवरी | राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे शुक्रवार को दिल्ली में भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं से मिलीं। वसुंधरा राजे का दिल्ली दौरा इस मायने में भी खास है, क्योंकि उनकी नाराजगी की खबरें पिछले कई दिनों से सियासी गलियारे में गूंजती रहीं हैं। बीते दिनों पार्टी की कोर कमेटी की बैठक से भी उनके गायब रहने पर सवाल उठे थे।
वसुंधरा राजे ने दिल्ली में राज्य के प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह से करीब डेढ़ घंटे तक भेंट की। दोनों नेताओं के बीच राजस्थान के सियासी हालात पर चर्चा हुई। इसके बाद वसुंधरा राजे ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और धर्मेंद्र प्रधान से भेंट की।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि राज्य में तीन सीटों के उपचुनाव और निकाय चुनावों पर उनके बीच चर्चा हुई। हालांकि यह भी बताया जा रहा है कि समर्थकों की ओर से पिछले कुछ दिनों से बागी रुख अख्तियार करने और एक नया मंच बनाने की शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची शिकायतों पर आज वसुंधरा राजे ने अपना पक्ष रखा है।
सूत्रों का कहना है कि बीते 8 जनवरी को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और उपनेता राजेंद्र राठौर दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिले थे। इस दौरान बताया गया था कि वसुंधरा राजे के समर्थक उनके नाम से अलग मोर्चा बना रहे हैं। जिससे पार्टी संगठन के खिलाफ गलत संदेश जा रहा है।
सूत्रों का कहना है इन शिकायतों पर वसुंधरा राजे ने राजस्थान प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह के सामने अपना पक्ष रखा है।
राजस्थान में घनश्याम तिवाड़ी की हाल में घरवापसी हुई है। घनश्याम को वसुंधरा राजे का विरोधी माना जाता है।सूत्रों का कहना है कि घनश्याम तिवाड़ी की वापसी को वसुंधरा राजे के लिए झटका माना जा रहा है।
ऐसे में बताया जा रहा है कि वसुंधरा राजे ने दिल्ली में पार्टी नेताओं से मुलाकात करने के दौरान अपनी भावनाओं से अवगत कराया है। (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 30 जनवरी | राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान लाल किले पर तिरंगे के अपमान को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया और लोगों से नियमों और कानूनों का पालन करने का आग्रह किया। शुक्रवार को बजट सत्र की शुरूआत के साथ संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को अपने संबोधन में कोविंद ने कहा कि भारतीय संविधान जो नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया है और वही संविधान हमें सिखाता है कि कानून एवं नियमों का भी उतनी ही गंभीरता से पालन किया जाना चाहिए।
कोविंद ने केंद्र सरकार की योजनाओं के बारे में भी बताया, जिसमें बताया गया है कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत, 1.5 करोड़ गरीबों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज प्राप्त हुआ था।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले 6 वर्षों में जो कार्य किए गए हैं, उनका बहुत बड़ा लाभ हमने इस कोरोना संकट के दौरान देखा है।
राष्ट्रपति कोविंद ने कहा, हमारे लिए यह और भी गर्व की बात है कि आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चला रहा है। इस प्रोग्राम की दोनों वैक्सीन भारत में ही निर्मित हैं। संकट के इस समय में भारत ने मानवता के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए अनेक देशों को कोरोना वैक्सीन की लाखों खुराक उपलब्ध कराई हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि महामारी के दौरान दुनिया भर में व्याप्त संकट ने हमें याद दिलाया है कि आत्मनिर्भर भारत इतना महत्वपूर्ण क्यों है। अगर आपको दुनिया के मंच पर अपना महत्व बढ़ाना है, तो आपको दूसरों पर निर्भरता कम करके आत्मनिर्भर बनना होगा। (आईएएनएस)


