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गाजीपुर बॉर्डर (दिल्ली), 29 जनवरी | गाजीपुर बॉर्डर स्थित किसानों के धरनास्थल पर सुबह से ही हाईवोल्टेज ड्रामा जारी है, जहां एक तरफ दोपहर बाद से ही तनाव की स्थिति बनी हुई थी, वहीं देर रात बॉर्डर से अचानक सुरक्षाकर्मियों को हटा लिया गया है। फिलहाल बॉर्डर पर सभी पीएसी जवानों को क्यों हटाया गया है, इसकी जानकारी अभी तक सामने नहीं आ पाई है। हालांकि सुरक्षाकर्मियों द्वारा कहा गया कि सुबह से ड्यूटी पर तैनात थे, अब जाने के लिए बोला गया है।
गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा के बाद से गजीपुर बॉर्डर पर मौजूद किसानों में तनाव की स्थिती बनी हुई थी। बॉर्डर होने के कारण दिल्ली पुलिस और गाजियाबाद पुलिस प्रशासन ने स्थिति को संभालने के लिए भारी सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया था।
हालांकि रात डेढ़ बजे तक बॉर्डर से सभी वरिष्ठ अधिकारी जा चुके हैं, वहीं अब सुरक्षाकर्मियों को भी हटा लिया गया है। दोपहर बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि बॉर्डर पर कुछ बड़ा होने वाला है, लेकिन फिलहाल स्थिति सामान्य नजर आ रही है।
फिलहाल बॉर्डर पर किसान फिर से लौटने लगे हैं, वहीं किसान नेता राकेश टिकैत के समर्थन में आसपास के इलाकों से भी लोग आने लगे हैं। (आईएएनएस)
मंगलुरु, 29 जनवरी | आरएसएस के वयोवृद्ध नेता कल्लादक प्रभाकर भट ने गुरुवार को एक बार फिर कर्नाटक के मंगलुरु के उल्लाल शहर की तुलना पाकिस्तान से कर चर्चा में आए। उन्होंने कहा, उल्लाल विधानसभा क्षेत्र मंगलुरु में एक मिनी पाकिस्तान बन गया है। जब तक इस क्षेत्र में हिंदू लोग मुसलमानों से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक वे बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी रहेंगे।
आरएसएस नेता ने उल्लाल विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं से आग्रह किया कि वे हमेशा मुस्लिम विधायक चुनने के बजाय हिंदू विधायक को चुना करें।
परिसीमन की कवायद के बाद उल्लाल विधानसभा क्षेत्र का नाम मंगलौर निर्वाचन क्षेत्र रखा गया, जिसका प्रतिनिधित्व कर्नाटक के पूर्व मंत्री यू.टी. खादर कर रहे हैं, जो लगातार चार बार कांग्रेस के टिकट पर जीत चुके हैं। इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व उनके दिवंगत पिता यू.टी. फरीद भी करते रहे हैं। वह 1972 के बाद से चार बार कांग्रेस के टिकट पर जीते।
मंगलुरु और उडुपी जिले की 20 सीटों में से मंगलुरु (उल्लाल) एकमात्र ऐसी सीट है, जिसे बरकरार रखने में कांग्रेस सफल रही है।
मीडिया से बात करते हुए भट ने कहा कि सिर्फ पाकिस्तान में मुसलमान अपने समुदाय के लोगों को ही चुनते हैं और यहां तक कि हिंदू बहुल सीटों पर भी वे ही जीत जाते हैं।
उन्होंने कहा, दुर्भाग्य से भारत में ऐसा नहीं होता है। यहां तक कि जहां हिंदू ज्यादा हैं, वहां भी अन्य समुदायों के नेता जीत जाते हैं।
पिछले साल नवंबर में भट ने उल्लाल की तुलना पाकिस्तान से कर विवाद खड़ा कर दिया था। तब उन्होंने राज्य के हिंदुओं से आग्रह किया था कि वे हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए और अधिक बच्चे पैदा करें और राज्य में कहीं भी छोटा पाकिस्तान न बनाने दें। (आईएएनएस)
29 साल की यांग ली को चीन की 'पंचलाइन क्वीन' कहा जाता है. वो चीन की सबसे लोकप्रिय कॉमेडियन हैं और विवादों से उनका नाता नया नहीं है.
चीनी टीवी पर हाल के महीनों में आ रहे उनके शो 'रॉक एंड रोस्ट' को लेकर उनकी लोकप्रियता कई गुणा बढ़ गई है.
हर हफ्ते वो लाखों दर्शकों के सामने इस शो में विवादास्पद जेंडर मुद्दे को लेकर स्टैंड-अप कॉमेडियन के तौर पर मुखातिब होती हैं. कई चीनी दर्शक स्टैंड-अप कॉमेडियन की अवधारणा से वाकिफ नहीं हैं.
बड़े पैमाने पर दर्शक उनके इस शो को देख तो रहे हैं लेकिन हर कोई उनकी पंचलाइन्स से प्रभावित हो ऐसा नहीं है.
इसकी वजह से अब यांग को बड़े पैमाने पर आलोचनाएं भी झेलनी पड़ रही हैं.
दिसंबर में दिखाए गए एक एपीसोड में वो एक पुरुष कॉमेडियन की बात करती हैं. जिसमें वो उस कॉमेडियन से नए जोक सुनाने को कहती हैं. इस पर वह पुरुष कॉमेडियन उनसे कहता है कि, "क्या तुम मर्दों की सीमा की परीक्षा ले रही हो."
इस पर यांग व्यंगात्मक लहजे में जवाब देती हैं, "क्या मर्दों की कोई सीमा भी होती है?" यांग का इस तरह से व्यंग्य करना कुछ लोगों को नागवार गुज़रा और उन्हें आलोचना झेलनी पड़ी.
हाल के कुछ हफ़्तों में सोशल मीडिया पर कुछ पुरुषों ने उन पर 'लैंगिक भेदभाव' और 'पुरुषों से नफरत' करने का आरोप लगाया है.
इस बीच पुरुषों के अधिकार की रक्षा करने का दावा करने वाला एक समूह सामने आया है. उसने सोशल मीडिया पर लोगों से चीन के मीडिया नियामक के सामने यांग की शिकायत करने को कहा है. उसने यांग पर 'बार-बार मर्दों के अपमान' करने और 'लैंगिक विरोध' पैदा करने का आरोप लगाया है.
लेकिन समर्थकों ने यांग का बचाव किया है और कहा है कि आलोचना करने वाले इन मर्दों में संवेदनशीलता और हास्यबोध का अभाव है. यांग के जोक्स ने चीन में एक नए विवाद को जन्म दिया है. चीन में नारीवादी आंदोलन और स्टैंड-अप कॉमेडी अपेक्षाकृत एक नई सांस्कृतिक पहल है.
ऐसा नहीं है कि चीन की संस्कृति में मज़ाक के लिए कोई जगह नहीं रही है. चीन की मज़ाकिया परंपरा में शियांगशेंग एक सदी से भी अधिक वक्त से पूरे देश में प्रचलन में है और काफी लोकप्रिय भी है.
इस फॉर्मेट में दो कॉमेडियन आपस में एक-दूसरे की खिंचाई करते हैं और दर्शक इसका आनंद लेते हैं.
लेकिन जब दर्शकों को खुद किसी मज़ाक का हिस्सा बनाया जाता है तब वैसे मामले में चीनी दर्शक इसे सहजता से नहीं लेते हैं. जबकि पश्चिम में स्टैंड-अप कॉमेडी के दौरान यह एक आम बात है.
बीजिंग कॉमेडियन क्लब ह्युमर सेक्शन के मालिक और कॉमेडियन टोनी चोउ बीबीसी से कहते हैं, "पश्चिम में स्टैंड-अप कॉमेडी के दौरान आम दर्शकों, अधिकारियों और सामाजिक प्रचलनों का मज़ाक उड़ाया जाता है और उन्हें चुनौती दी जाती है."
लेकिन चीन में इसे एक बड़ा तबका अपमानजनक मानता है.
उदाहरण के तौर पर टोनी बताते हैं कि एक बार एक कॉमेडियन पर एक दर्शक ने इसलिए हमला कर दिया क्योंकि उस कॉमेडियन ने हेनान प्रांत के लोगों पर मज़ाक किया था. टोनी कहते हैं कि "जबकि वो कॉमेडियन खुद हेनान प्रांत से ही था."
वह कहते हैं कि नतीजतन कुछ कॉमेडियन अपनी व्यक्तिगत भावनाएँ छिपाने की कोशिश करते हैं. ऐसा वो सिर्फ़ सांस्कृतिक वजहों से नहीं करते हैं बल्कि वो राजनीतिक और आर्थिक तौर पर होने वाले नुकसान से डरते हैं.
चीनी कॉमेडियन यांग को लेकर हुए विवाद पर लोग दो खेमों में बंटे हुए हैं. वीबो पर एक लोकप्रिय कॉमेडियन शी जी ने अपनी पोस्ट में कहा है कि यांग एक सच्ची स्टैंड-अप कॉमेडियन नहीं हैं. उनके इस पोस्ट को दस करोड़ बार देखा गया है और यह इसी लाइन के साथ हैशटैग के रूप में ट्रेंड कर रहा है.
लेकिन चीनी-अमेरिकी कॉमेडियन जो वॉन्ग ने यह कहते हुए यांग का समर्थन किया है कि कॉमेडी "समाज में अपेक्षाकृत दबे लोगों को विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के मज़ाक" उड़ाने की सुविधा देता है.
हालांकि यांग ने कभी भी सार्वजनिक तौर पर इस बात का ऐलान नहीं किया है कि वो नारीवादी हैं लेकिन सोशल मीडिया पर उनके आलोचकों ने उनके और उनके समर्थकों के लिए एक नई शब्दावली इस्तेमाल करनी शुरू की है. वो है "चरमपंथी नारीवादी".
"नू कुआन" का चीनी भाषा में मतलब होता है नारीवाद या इसका शाब्दिक अर्थ होता है महिलाओं का हक. नेटिज़ेंस ने "कुआन" जिसका मतलब अधिकार होता है, उसकी जगह इसी तरह सुनाई देने वाला एक अन्य शब्द इस्तेमाल करना शुरू किया है. जिसका मतलब मुट्ठी होता है. इसका नारीवादियों के लिए अपमानजनक लहजे में इस्तेमाल किया जा रहा है.
यांग ली के एक 23 साल के आलोचक जिनका सरनेम भी यांग है (हालांकि कॉमेडियन यांग ली से उनका कोई संबंध नहीं है) बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "चरमपंथी नारीवादी बिल्कुल बेतुके हैं. वो हर कहीं मुक्के मारते रहते हैं और अधिकारों की बात करते हैं. "
बीजिंग में क़ानून के प्रोफेसर चु यीन वीबो पर कहते हैं कि, "पश्चिम में शुरू हुई लैंगिंक भेदभाव की राजनीति कामगारों की एकता के लिए खतरा है. इससे स्ट्रेट मर्दों के ख़िलाफ़ नफरत फैलेगी."
इस बीच यांग ली के समर्थकों का यह कहना है कि इन सब बातों ने यांग के मज़ाक को सही साबित किया है. अक्सर औरतों की आवाज़ को ऐसे ही उन लोगों की ओर से दबाया जाता है जो मर्दों को औरतों से श्रेष्ठ मानते हैं.
चीन के समाज में पारंपरिक तौर पर लैंगिक आधार पर काम का बंटवारा होता है. मर्द और औरत दोनों ही समाज के दबाव में अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाने के लिए मजबूर होते हैं.
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चीनी औरतों के अधिकार के लिए लड़ने वाली शियोंग जिंग कहती हैं कि इस तरह के लैंगिक रूढ़िवाद का खामियाज़ा मर्दों को भी भुगतना पड़ता है.
मसलन मर्दों को शादी के लिए अपना घर और गाड़ी होना ज़रूरी है तभी उन्हें शादी के योग्य माना जाएगा. या फिर उससे परिवार के अकेले कमाने वाले शख्स के तौर पर उम्मीदें की जाएंगी.
वो कहती हैं, "कई मर्द भारी उम्मीदों के बोझ तले दबे होते हैं जिससे उन्हें हताशा और रोष होता है. उन्हें इस बारे में सोचना होगा कि बुनियादी तौर पर क्या बदले जाने की ज़रूरत है."
चीन की एक मशहूर नारीवादी कार्यकर्ता लू पीन बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि दूसरे देशों की तुलना में चीन में नारीवादियों को एक अलग ही किस्म का राजनीतिक और सामाजिक दबाव झेलना पड़ता है.
"चीनी पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था में नारीवादियों के आलोचकों को सत्ता में बैठे लोगों से अपेक्षाकृत अधिक समर्थन प्राप्त होता है."
चीनी में नारीवादी चूंकि गहराई से धंसे लैंगिक रूढ़िवाद को चुनौती देती हैं, इसलिए उन्हें सत्ता प्रतिष्ठानों की तरफ से "सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने के लिए उकसाने" वाला बताया जाता है.
इससे वो चीनी सरकार की नज़र में आ जाती हैं क्योंकि सरकार चीनी समाज में अपनी पकड़ को सबसे अधिक तरजीह देती है.
2015 में पांच चीनी नारीवादी कार्यकर्ताओं को सात हफ्तों तक हिरासत में रखा गया था. उन कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक परिवहनों में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले यौन उत्पीड़न को लेकर अभियान चलाने की योजना बनाई थी.
2018 में चीन की अग्रणी नारीवादी संगठन फेमिनिस्ट वॉयस के सोशल मीडिया एकाउंट्स को कई बार संस्पेंड करने के बाद आखिरकार सेंसर किया गया है.
पिछले दिसंबर में जब चीनी कोर्ट में मी टू से जुड़े एक हाई प्रोफाइल मामले की सुनवाई हो रही थी तब सरकारी मीडिया ने उसे कवर करने से परहेज़ किया था.
इस बीच वीबो पर कुछ प्रभावशाली लोगों के एकाउंट्स से नारीवादी आंदोलन में 'विदेशी ताकतों' की भूमिका के इल्ज़ाम भी लगाए गए.
लू पीन कहती हैं, "कई लोग अब चीनी नारीवादियों पर विदेशी ताकतों के साथ जुड़े होने का आरोप लगा रहे हैं. इन आरोपों का लोगों पर इतना असर क्यों हो रहा है? क्योंकि वे सरकार के नक्शे कदम पर चलते हुए उसकी ही बात को दोहरा रहे हैं."
तो यांग ली की टिप्पणी से उत्पन्न हुए विवाद की पृष्ठभूमि में यह पूरा किस्सा है.
इस मामले में सरकार ने औपचारिक रूप से कोई जांच शुरू की है कि नहीं, यह अभी साफ नहीं है. जिस समूह ने वीबो पर यांग ली की शिकायत दर्ज करने की मांग की है उसने बाद में इस पोस्ट को हटा लिया है.
बीबीसी ने यांग ली से उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए जब इंटरव्यू का अनुरोध किया तब उन्होंने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
उन्होंने इस पूरे मामले पर अब तक कोई बयान भी नहीं जारी नहीं किया है.
लेकिन उन्होंने हाल ही में सोशल मीडिया पर यह ज़रूर लिखा है, "यह कभी खत्म नहीं होने वाला है…अब इस इंडस्ट्री में रहना थोड़ा मुश्किल है." (bbc.com)
5 मौतें भी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 28 जनवरी। राज्य में आज रात 08.00 बजे तक 412 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सबसे अधिक 115 रायपुर जिले से हैं। राज्य के स्वास्थ्य विभाग के इन आंकड़ों के मुताबिक आज रात तक एक जिले में सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
आज कुल 5 कोरोना मौतें हुई हैं।
राज्य शासन के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक दुर्ग 63, राजनांदगांव 26, बालोद 6, बेमेतरा 4, कबीरधाम 3, रायपुर 115 धमतरी 17, बलौदाबाजार 7, महासमुंद 26, गरियाबंद 5, बिलासपुर 48, रायगढ़ 23, कोरबा 6, जांजगीर-चांपा 6, मुंगेली 1, जीपीएम 2, सरगुजा 22, कोरिया 2, सूरजपुर 8, बलरामपुर 9, जशपुर 9, बस्तर 1, कोंडागांव 0, दंतेवाड़ा 1, सुकमा 0, कांकेर 2, नारायणपुर 0, बीजापुर 0 अन्य राज्य 0 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
रायपुर 28 जनवरी। सांसद सुनील सोनी की गुरूवार को एपेंडिक्स का दर्द उठा, और उन्हें रामकृष्ण केयर अस्पताल में भर्ती कराया गया।उनका शुक्रवार को आपरेशन होगा।
बताया गया कि श्री सोनी आज दिल्ली जाने वाले थे।इसी बीच पेट दर्द हुआ। फिर उन्हें रामकृष्ण केयर अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनका कल एपेंडिक्स का आपरेशन होगा। पार्टी नेता ने चिकित्सकों से उनका हाल चाल जाना है।
रायपुर 28 जनवरी। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय रायपुर के कलाकार डॉ. आर. एस. बारले ने पद्म पुरस्कार के लिए चयनित होने को विभाग का सम्मान बताया है। पंथी नृत्य के ख्याति प्राप्त कलाकार डॉ आर. एस. बारले ने कहा कि मैं 20 साल से लोक संपर्क ब्यूरो, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के लिए कार्य कर रहा हूँ। विभाग द्वारा दिये गए प्लेटफॉर्म के माध्यम से मुझे छत्तीसगढ़ के लोगों तक अपनी कला पहुंचाने और हुनर दिखाने का अवसर मिला।
विश्व के सबसे तेज नृत्य और शारीरिक दमखम को इंगित करने वाले पंथी नृत्य के ख्यात नर्तक डॉ. आर.एस. बारले का चयन इस वर्ष पद्म पुरस्कार के लिए किया गया है। डॉ राधेश्याम बारले लगभग साढ़े चार सौ साल पुरानी इस पारम्पारिक लोकनृत्य की साधना में विगत 40 वर्षो से साधना रत हैं एवं इसे आगे बढ़ाने हेतु कार्य कर रहें हैं। भारत सरकार ने लोक नृत्य के प्रति उनके समर्पण एवं योगदान को देखते हुए उन्हे पद्म श्री के लिए चयनित किया है।
भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रचार अभियानों के तहत डॉ. बारले नें विभिन्न जनकल्याणकारी कार्यकमों की प्रस्तुति पंथी नृत्य के माध्यम से दिया है जिसमें नशाबंदी, दहेज प्रथा, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ाओ, परिवार नियोजन, साक्षरता, कुष्ट उन्मूलन, पर्यावरण, पल्स पोलियो, मिशन इंद्रधनुश अभियान, कैंसर एवं एड्स आदि विषयों पर सैकड़ो मंचीय प्रस्तुतियाँ कि हैं।
9 अक्टूबर 1966 को ग्राम खोला, पोस्ट - धमना, तह. पाटन, जिला - दुर्ग में जन्में डॉ. आर.एस. बारले का पूरा नाम डॉ. राधेश्याम बारले है। इन्होंनें एम.बी.बी.एस. के साथ ही इंदिरा कला संगीत विश्व विद्यालय से लोक संगीत में डिप्लोमा भी किया है। वे आकाशवाणी केंद्र, एवं दूरदर्शन के भी नियमित कलाकार हैं। इन्हें राज्य अलंकरण गुरु घासीदास सामाजिक चेतना एवं दलित उत्थान सम्मान, राज्य अलंकरण देवदास बंजारे सम्मान, राज्य अलंकरण डॉ. भवर सिंह पोर्ते आदिवासी सेवा सम्मान प्राप्त हो चुका है। डॉ. आर.एस. बारले पंथी के साथ ही नाट्य विधा के भी सिद्धस्थ कलाकार हैं और छत्तीसगढ़ के कई रंगमंचों में अभिनय भी किया है। (PIB)
-विवेक मिश्रा
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय फोरम में अपना पक्ष मजबूत करने के लिए एक लंबे इंतजार के बाद बासमती चावल का जीआई पंजीकरण किया है लेकिन जानकारों का कहना है कि भारत पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
पानीपत की अनाज मंडी में बासमाती धान बेचने आया किसान, अपनी फसल के बिकने का इंतजार कर रहा है। फोटो: विकास चौधरी पानीपत की अनाज मंडी में बासमाती धान बेचने आया किसान, अपनी फसल के बिकने का इंतजार कर रहा है। फोटो: विकास चौधरी
पाकिस्तान ने एक दशक से भी ज्यादा इंतजार के बाद बासमती चावल को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग दिया है। पाकिस्तान का यह कदम भारत के उस आवेदन के बाद उठाया गया है, जिसमें भारत ने यूरोपियन यूनियन में पाकिस्तान से अलग अपने बासमती के लिए विशेष जीआई टैग की मांग की गई थी।
भारत ने मई, 2010 में अपने यहां सात राज्यों में हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ भागों में बासमती को जीआई टैग दिया था।
किसी उत्पाद को उसके उत्पत्ति की विशेष भौगोलिक पहचान से जोड़ने के लिए जीआई टैग दिया जाता है ताकि वह उत्पाद अलग और खास बन सके। पाकिस्तान के बासमती चावल उत्पादक इसकी मांग लंबे समय से कर रहे थे। दरअसल पाकिस्तान में जीआई पंजीकरण के लिए कानून की जद्दोजहद करीब दो दशक से चल रही थी, जिसे हाल ही में अमलीजामा पहनाया गया है।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के वाणिज्य एवं निवेश मामलों के सलाहकार अब्दुल रज्जाक दाउद ने 26 जनवरी, 2021 को अपने ट्वीट में लिखा है कि मुझे खुशी है कि पाकिस्तान ने ज्योग्राफिकल इंडिकेशन एक्ट, 2020 के तहत बासमती चावल को जीआई में पंजीकृत कर लिया है।
आधिकारिक ईयू जर्नल में बताया गया है कि 11 सितंबर, 2020 को भारत ने अपने यहां पैदा होने वाली बासमती के लिए विशेष भौगोलिक पहचान (एक्सकलूसिव ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) के लिए आवेदन किया था। भारत ने अपने बासमती की अहमियत बनाए रखने के लिए यूरोपियन यूनियन में पाकिस्तान से अलग होकर ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग की मांग की थी।
वहीं, बासमती का जीआई पंजीकरण न होने के कारण भारत के इस आवेदन के बाद पाकिस्तान को यह चिंता सताने लगी थी कि जीआई टैग के बिना उसका बासमती कहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में पूरी तरह से बाहर न हो जाए, क्योंकि 2006 में ईयू की अनुमति के बाद भी पाकिस्तान ने अब तक अपने बासमती को जीआई टैग में पंजीकृत नहीं किया था। उनका जीआई कानून बीते दो दशक से लंबित था।
अब पाकिस्तान में जीआई एक्ट, 2020 के तहत जीआई रजिस्ट्री बनाई गई है जो कि जीआई पंजीकरण का काम करती है। रज्जाक दाऊद ने ट्वीट में आगे लिखा है कि इस कदम से हमारे उत्पाद का बेजा इस्तेमाल नहीं हो सकेगा। साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनके बामसती को संरक्षण भी मिलेगा। उन्होंने अपने लोगों से इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए उत्पादों के सुझाव भी मांगे हैं।
जीआई टैग किसी उत्पाद को बाजार में उसके विशेष होने का कानूनी संरक्षण भी देता है।
भारत-पाकिस्तान दायरे में हिमायल के कुछ खास भौगोलिक निचले क्षेत्रों में ही बासमती पैदा होती है। इस भौगोलिक क्षेत्र की जलवायु ही इसे एक अनूठा स्वाद -सुगंध और आकार देती है, जिसकी अच्छी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में है। कई ऐसे चावल अब दुनिया भर में पैदा होते हैं जो लंबे दाने वाले होते हैं लेकिन उनमें कोई विशेष सुगंध नहीं होती है। इसलिए बासमती का महत्व अब भी बना हुआ है।
पाकिस्तान के इस कदम का भारत पर क्या कोई असर होगा?
बासमती चावल के निर्यातक और चमन लाल सेतिया एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के चेयरमैन विजय कुमार सेतिया ने डाउन टू अर्थ से बातचीत में कहा कि 2006 में जीई टैग को लेकर भारत-पाकिस्तान का मामला यूरोपियन यूनियन में पहुंचा था। वहां, पर जीआई टैग मान्यता के लिए भारत ने अपने बहुत ही खास और वैज्ञानिक मानकों पर बासमती उत्पादकों में सात राज्यों की सूची दी थी जबकि पाकिस्तान ने अपने बहुत ही छोटे भौगोलिक हिस्से में पैदा होने वाली बासमती के लिए सिर्फ 14 जिलों के नाम ही गिनवाए थे।
अब पाकिस्तान ने इन्हीं 14 जिलों में, जहां बासमती पैदा की जाती है उसको अपने देश में जीआई मान्यता दे दी है। सेतिया ने कहा कि यह भारत के लिए काफी अच्छा है क्योंकि उन्होंने अपनी सीमा परिभाषित कर दी है और भारत का बहुत बड़ा भू-भाग है जो बासमती जीआई के दायरे में है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की बासमती का दबदबा बना रहेगा। अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में भी पाकिस्तान शायद भारत से अब कमजोर भी पड़ जाए।
क्या जीआई टैग के पंजीकरण से भीतरी कलह सुलझेगी?
वर्ष 2006 में ईयू के सामने भारत ने बासमती की गुणवत्ता को सर्वोपरि रखते हुए जीआई सूची से उस वक्त राजस्थान को भी बाहर कर दिया था, जबकि मध्य प्रदेश बासमती के जीआई टैग को लेकर कुछ वर्षों से अपना दावा कर रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि बासमती का दायरा विशेष और जलवायु मानकों पर सीमित नहीं होगा और एक के बाद एक राज्य दावा करेंगे तो बासमती की गुणवत्ता प्रभावित हो जाएगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक बड़ा झटका लगेगा। इसी तरह से पाकिस्तान यदि अब अपने जीआई टैग के भौगोलिक दायरे को बढ़ाने की कोशिश करेगा तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसे भी एक बड़ा झटका मिल सकता है। हालांकि, पाकिस्तान के भीतर यदि कोई जिला अब नए सिरे से जीआई क्लेम करेगा तो कलह वहां भी बढ़ सकती है। (downtoearth.org.in)
-सुनीता नारायण
नए साल 2021 की शुरुआत हमने इस उम्मीद के साथ की थी कि यह हमें 2020 की विध्वंसकारी महामारी से राहत देगा। लेकिन इसके विपरीत हमारे किसान हजारों की संख्या में दिल्ली की सीमा पर धरने पर बैठे हैं। उनके इस आंदोलन की एक ही मांग है, सरकार हाल में पास किए गए कृषि बिलों को निरस्त कर दे। कौन सही है और कौन गलत, इस बारे में काफी बहस हो चुकी है। इससे जो एक बात सामने निकलकर आई है, वह यह है कि अब हमें किसानों द्वारा उगाए गए भोजन को उपभोक्ता के रूप में सोचने की जरूरत है, न कि किसी शोधकर्ता, शिक्षाविद या नीतिनिर्माता के तौर पर।
हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि हम जिस भोजन का उपभोग करते हैं, उसे सब्सिडी देने की आवश्यकता आखिर क्यों है। आखिर किसान समर्थन मूल्य की मांग क्यों कर रहे हैं? यह मांग केवल उन किसानों की नहीं है जो इस भीषण सर्दी में राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं, उन्हें भारत की एक बड़ी अबादी का समर्थन भी प्राप्त है। तो क्या ये सारे लोग अनुत्पादक और आलसी हैं? यह एक तथ्य है कि दुनियाभर में (खासकर समृद्ध देशों में) कृषि क्षेत्र को सरकारों से भारी मदद मिलती है। पेरिस स्थित अंतरसरकारी थिंक-टैंक ओईसीडी इस क्षेत्र को सकल कृषि प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में प्रोड्यूसर सपोर्ट के जरिए समर्थन का अनुमान लगाता है। इसके आंकड़ों के अनुसार जापान, दक्षिण कोरिया, नॉर्वे और आइसलैंड जैसे अमीर देशों में, उत्पादक समर्थन 2019 में सकल कृषि प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में 40 से 60 प्रतिशत के बीच था। अमेरिका में यह लगभग 12 प्रतिशत है और यूरोपीय संघ में 20 प्रतिशत।
लेकिन भारत में उत्पादक समर्थन (वह भुगतान जो उत्पादन के प्रतिशत के रूप में सरकार द्वारा किया जाता है) वास्तव में नकारात्मक (-5 प्रतिशत) है। दूसरे शब्दों में, दुनिया के कुछ सबसे गरीब लोगों के स्वामित्व एवं प्रबंधन में चल रहा यह कृषि क्षेत्र हमारे भोजन को सब्सिडाइज कर रहा है। लेकिन पूरी कहानी कुछ और है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिम के समय में समृद्ध राष्ट्र अपने कृषि क्षेत्र का समर्थन करने के लिए तेजी से नए तरीके विकसित कर रहे हैं। उत्पादन के लिए भुगतान सीधे नहीं किया जाता है। यह भुगतान इसी शर्त पर होता है कि किसान नई, सस्टेनेबल तकनीकों को अपनाएंगे। यूरोपीय संघ की आम कृषि नीति अब किसानों को पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के भुगतान के लिए निर्देशित की जाएगी। इसका मतलब हुआ और ज्यादा सब्सिडी लेकिन नए नाम से। इस तरह, लगभग सभी बड़े खाद्य उत्पादक देशों में सब्सिडी उनके सामाजिक और पर्यावरण कल्याण उपायों के हिस्से के रूप में शामिल है। सब्सिडी किसानों को सीधे भुगतान के माध्यम से या कुछ फसलों के समर्थन मूल्य के माध्यम से या पानी, उर्वरक और बीज जैसे प्रमुख कृषि इनपुट में निवेश के माध्यम से दी जा सकती है।
दुनिया के कम समृद्ध देशों के किसान, जिनमें भारत के अमीर राज्य पंजाब और हरियाणा के लोग भी शामिल हैं, को इस वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धा करनी होती है। सबसे पहले वे वंचित हैं क्योंकि उन्हें खेती को आकर्षक बनाने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता नहीं मिलती है। दूसरी बात, जब खराब मौसम या अन्य कारणों से उनकी फसलें महंगी हो जाती हैं, तो सरकार सस्ता भोजन आयात कर लेती है। इस तरह हमारे किसान कहीं के नहीं रह जाते। यही कारण है कि किसान मूल्यों में उतार-चढ़ाव से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान समय में यह प्रणाली पूरी तरह से कमजोर हो चुकी है। हालांकि एमएसपी 23 फसलों के लिए तय की गई है लेकिन वास्तव में, यह केवल गेहूं एवं धान जैसी कुछ फसलों के लिए उपयोग में लाई जाती है, जिनकी सरकारी खरीद की व्यवस्था है। यही कारण है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को डर है कि यह व्यवस्था खत्म कर दी जाएगी। वे मुख्यतः गेहूं और चावल उगाते हैं जो ज्यादातर सरकार द्वारा खरीदा जाता है।
लेकिन बाकी फसलों का एमएसपी एक खोखला वादा मात्र है। जैसा कि मेरे सहयोगी ने कृषि समर्थन पर अपने हालिया लेख में विश्लेषण किया है, बाजार किसानों को आवश्यक कीमत का भुगतान नहीं करता। सरकार के स्वयं के आंकड़ों के अनुसार, 600 थोक बाजारों में 10 चुनिंदा फसलों के लिए लगभग 70 प्रतिशत लेनदेन एमएसपी से कम कीमत पर हुआ था।
प्रमुख मुद्दा यह है कि भोजन की कीमत क्या होनी चाहिए? यह तथ्य है कि कृषि क्षेत्र में लागत बढ़ रही है, बीज और पानी से श्रम तक। फिर यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खराब मौसम से होने वाले नुकसान का खतरा बढ़ रहा है। इस तरह, किसानों को उत्पादन की बढ़ती लागत और फसलों के नुकसान के बढ़ते जोखिम, दोनों के एवज में भुगतान किया जाना चाहिए।
भारतीय किसान किसी भी निजी कंपनी या उद्योग के विपरीत, अपने परिचालन के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण में भारी मात्रा में निजी पूंजी का निवेश करते हैं। वे अपने खेतों की सिंचाई के लिए भी पैसे खर्च करते हैं। कुल सिंचित भूमि का आधे से अधिक हिस्सा भूजल पर निर्भर है। हमारे देश में कुछ 1.9 लाख कुओं और नलकूपों का निर्माण निजी पूंजी से किया गया है। सरकार इस मामले में कोई मदद नहीं करती। वास्तव में एमएसपी की गणना में किसान के साथ धांधली होती है क्योंकि सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि खाद्यान्नों की कीमत कम रहे ताकि सरकारी खरीद का बोझ भी कम रहे।
किसी भी सरकार को सबसे अधिक डर खाद्य मुद्रास्फीति से लगता है, क्योंकि उपभोक्ता तब सही मायनों में अपना आपा खो बैठते हैं। यह तब है जब सरकार कीमतों को कम करने के लिए खाद्यान्नों का आयात अमीर देशों से करती है, जहां उन्हें उगाने पर सब्सिडी दी जाती है और जिसके खिलाफ हमारे किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। समय आ गया है कि हम अपने खाने की वास्तविक कीमत के बारे में बात करें, जो हमारे लिए अनाज पैदा करने वाले किसानें के लिए लाभकारी बने, इस विषय पर मंथन करें। यह एक ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसे हम बंद कर सकते हैं। हमारे दरवाजे पर बैठे किसान इसी मुद्दे पर बात करना चाहते हैं। हम उन्हें निराश नहीं कर सकते। (downtoearth.org.in)
-मालिनी चक्रवर्ती
नोवल कोरोनावायरस बीमारी (कोविड-19) महामारी और इस वजह से हुए लॉकडाउन के मद्देनजर अर्थव्यवस्था में अपेक्षित कमजोरी आई, जिससे केंद्र सरकार के कर राजस्व संग्रह में भारी गिरावट आई है।
समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, 24.23 लाख करोड़ रुपये के केंद्रीय बजट 2020-21 के मुकाबले कर संग्रह में 5 लाख करोड़ रुपये की कमी हो सकती है। धीमी अर्थव्यवस्था ने पिछले वर्षों के कर संग्रह को प्रभावित किया, इस वर्ष अर्थव्यवस्था का अभूतपूर्व संकुचन इस स्थिति को और बदतर बनाने वाला है।
राजस्व में इतनी बड़ी कमी न केवल केंद्र के लिए बल्कि राज्यों के लिए भी चिंता का कारण है। कुछ अर्थों में, केंद्रीय कर संग्रह में कमी राज्यों के लिए और भी अधिक महत्व रखती है, क्योंकि उनके पास कर राजस्व बढ़ाने का दायरा बहुत कम होता है।
जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) के कारण समस्या और भी गंभीर हो गई है क्योंकि राज्यों को कई राज्य स्तरीय करों को छोड़ना पड़ा है। इस प्रकार, केंद्र द्वारा एकत्र किए गए कर राजस्व की मात्रा की अहमियत राज्यों के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह काफी हद तक निर्धारित करता है कि कितना पैसा राज्यों के साथ साझा किया जाएगा।
लेकिन मामला सिर्फ इतना भर नहीं है कि केन्द्र के कर में से राज्यों को कितना मिलता है। महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि केंद्र कर राजस्व कैसे उत्पन्न करता है।
यहां कर राजस्व में कमी जिस वजह से हो रही है, वह काफी चिंताजनक है। कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट (सीजीए) के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 में समान अवधि की तुलना में पिछले साल अप्रैल से नवंबर के बीच सकल कर संग्रह में 12.6 प्रतिशत की गिरावट आई थी। हालांकि, करों के सभी घटक समान रूप से प्रभावित नहीं हुए हैं।
जहां कॉर्पोरेट टैक्स, आयकर और सीमा शुल्क कर संग्रह में क्रमश: 35 प्रतिशत, 12 प्रतिशत और 17 प्रतिशत की गिरावट आई है, वहीं अप्रैल-नवंबर, 2019 की तुलना में उत्पाद शुल्क संग्रह लगभग 48 प्रतिशत बढ़ गया है। पिछले वर्ष मार्च और मई के महीनों में पेट्रोल और डीजल पर लगाए गए केंद्रीय उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के कारण ये वृद्धि हुई है।
उत्पाद शुल्क संग्रह के इस वृद्धि का दिलचस्प पहलू यह है कि जहां इससे केंद्र को अधिक राजस्व उत्पन्न करने में मदद मिली, वहीं यह राज्यों को ज्यादा मदद नहीं करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईंधन पर उत्पाद शुल्क में तीन घटक शामिल हैं, जिनमें से केवल एक बेसिक ड्यूटी राज्यों के साथ साझा की जाती है।
बजट और गरीब
शेष दो घटक - अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (सड़क और बुनियादी ढांचा उपकर) और विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क - सेस और अधिभार हैं और इसलिए राज्यों के साथ साझा करने योग्य नहीं हैं।
चूंकि केंद्र सरकार ने बेसिक ड्यूटी को स्थिर रखते हुए केवल विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में वृद्धि की है, इससे केंद्र के उस हिस्से को बढ़ावा दिया है, जिसे राज्य के साथ शेयर नहीं किया जाना है।
पोस्ट-हाइक एक्साइज ड्यूटी की संरचना पर करीब से नजर डालने से पता चलता है कि पेट्रोल के मामले में इसका लगभग 91 प्रतिशत राज्यों के साथ साझा करने योग्य नहीं है, जबकि डीजल के मामले में यह 85 प्रतिशत है। इसका मतलब यह है कि राज्यों के कर राजस्व का हिस्सा समग्र केंद्रीय संग्रह में कमी के कारण प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो जाता है, वे तब भी लाभ नहीं पाते हैं जब कुछ घटक अच्छी तरह से रिकवरी करते हैं।
यह कोई इकलौता उदाहरण नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, केंद्र अपने कर राजस्व को बढ़ाने के लिए उपकर और अधिभार पर निर्भर रहा है। परिणामस्वरूप, केंद्रीय कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी घट रही है।
यह समस्या इस तथ्य से समझी जा सकती है कि 2000-01 में केंद्रीय सकल कर राजस्व में सेस और सरचार्ज का हिस्सा 3% था, जो 2019-20 में बढ़कर 15.6 प्रतिशत हो गया। 2020-21 में इसके और बढ़ने की संभावना है।
विश्लेषकों का यह सुझाव है कि सरकार को आगामी बजट में कोविड-19 उपकर (सेस) लगाना चाहिए। लेकिन ये उपकर केवल केंद्र को अधिक राजस्व जुटाने में मदद करेगा, जबकि राज्यों को कुछ भी हासिल नहीं होगा।
यह देखते हुए कि राज्य ही हैं, जो महामारी संकट के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं, यह वक्त है कि केंद्र उनके साथ अधिक संसाधन साझा करे। इसलिए, यह जरूरी है कि केंद्र उपकर और अधिभार पर अपनी निर्भरता कम करे।
इसके बजाय, राजस्व में संभावित गिरावट की भरपाई करने के लिए, नई कर दरों को पेश किया जा सकता है, विशेष रूप से उन सुपर-रिच पर, जिनकी आय महामारी से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुई है। यह न केवल अधिक कर राजस्व उत्पन्न करने में मदद करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि राज्यों को कर का उचित हिस्सा मिले।
(यह लेख सेंटर फॉर बजट एंड गर्वनेंस अकाउंटबिलिटी के सहयोग से प्रकाशित किया गया है) (downtoearth.org.in)
माकपा पार्षदों ने बजाया नगाड़ा, 9 फरवरी को चक्का जाम की चेतावनी
बांकीमोंगरा, , 28 जनवरी। बांकीमोंगरा क्षेत्र की उपेक्षा के खिलाफ नगाड़ा बजाकर माकपा पार्षदों राजकुमारी कंवर और सुरती कुलदीप ने आज यहां सड़क जीर्णोद्धार की मांग को अपना समर्थन दिया और छेरछेरा में धूल डस्ट रोकने और सड़क निर्माण की मांग निगम सरकार और एसईसीएल प्रशासन से की। इस क्षेत्र की जनता ने कांग्रेस विधायक, सांसद और राजस्व मंत्री से भी अपनी खुशहाली के लिए छेरछेरा में यही मांगा है।
उल्लेखनीय है कि जर्जर सड़क और धूल डस्ट से परेशानी इस क्षेत्र की मुख्य समस्याओं में से एक है और यह समस्या इस क्षेत्र के विकास और जनता के स्वास्थ्य दोनों से जुड़ती है। इस मांग को उठाने के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को इस क्षेत्र की जनता का जबरदस्त समर्थन मिल रहा है और आम जनता का आक्रोश जन आंदोलन में बदल रहा है।
माकपा ने बांकीमोंगरा क्षेत्र की दुर्दशा के लिए निगम सरकार, राज्य सरकार और एसईसीएल प्रबंधन तीनों को जिम्मेदार ठहराया है। माकपा जिला सचिव प्रशांत झा ने आरोप लगाया है कि बांकीमोंगरा क्षेत्र की जनता से प्राप्त राजस्व का उपयोग निगम सरकार कोरबा की सड़कों को बनाने के लिए कर रही है और एसईसीएल कोल खदानों से केवल मुनाफा कमा रही है। दोनों को इस क्षेत्र की आम जनता की तकलीफों से कोई मतलब नहीं है। यहां के सांसद और विधायक भी इस मामले में मौन है। उन्होंने कहा कि छेरछेरा में पवित्र मन से दान दिया जाता है। यदि इस समस्या के लिए जिम्मेदार कांग्रेस-भाजपा के नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों में छत्तीसगढ़ की संस्कृति के प्रति थोड़ा भी लगाव होगा, तो छेरछेरा में आम जनता को सड़क निर्माण का तोहफा देंगे। माकपा नेताओं ने कहा कि अगर 15 दिनों में इस समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो बांकी मोंगरा में 9 फरवरी को चक्काजाम होगा।

माकपा द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार सड़क निर्माण और धूल डस्ट की रोकथाम की मांग को लेकर आज छेरछेरा पर्व के दिन बांकी मोंगरा चौक में माकपा के नेतृत्व में आम जनता ने इस क्षेत्र के व्यापारियों के साथ मिलकर सांसद, विधायक, मंत्री, महापौर, कलेक्टर, सीएमडी के नाम की तख्तियां लेकर छेरछेरा में बांकी मोंगरा की सड़क बनाने का उपहार मांगा है।
कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रमुख रूप से नंदलाल कंवर, जवाहर सिंह कंवर, दिलहरण बिंझवार, संजय यादव, पुरुषोत्तम कंवर, शत्रुहन दास, छोटू बिंझवार, अजय अग्रवाल, धर्मेंद्र मिश्रा, अशोक अग्रवाल, योगेश अग्रवाल, दशरथ टेलर, प्रकाश साहू, जनक दास, उमेश अग्रवाल, अमित सिन्हा, सुधीर शर्मा, राकेश अग्रवाल, पवन शर्मा, राहुल आदि ने सराहनीय भूमिका निभाई। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर 15 दिनों में इस समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो बांकी मोंगरा में 9 फरवरी को चक्काजाम होगा।
राज्य महिला आयोग की दो दिवसीय जन-सुनवाई का पहला दिन
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 28 जनवरी। राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष किरणमयी नायक ने आज उज्जवला होम की पीड़ित दो युवतियों का बयान दर्ज किया। अध्यक्ष ने कहा कि इनकी शिकायतें मनगढ़ंत नहीं है पर कार्रवाई के लिये वे मुख्य शिकायतकर्ता सहित अन्य युवतियों से बातचीत करना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस और सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों के खिलाफ भी यदि शिकायत पाई जाती है तो उन पर आयोग संज्ञान लेगा।
राज्य महिला आयोग ने आज व कल बिलासपुर में जन-सुनवाई रखी है। सरकंडा स्थित उज्ज्वला होम की घटनाओं को आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया था। अन्य मामलों के साथ आज वह इस मामले में पीड़ित युवतियों की शिकायत भी सुनने के लिये आई थीं लेकिन सिर्फ दो ने आयोग के समक्ष आकर बयान दिया। इनमें से एक युवती ने दुष्कर्म के आरोप को दोहराया। दूसरी असम की है जिसने टूटी-फूटी हिन्दी में प्रताड़ित किये जाने की बात कही। मुख्य शिकायतकर्ता नीता और उसके पति कुलदीप को भी आयोग ने बुलाया था, जिन्होंने उज्ज्वला होम में जबरदस्ती रोके जाने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी, वे बयान देने के लिये नहीं पहुंची। उज्जवला होम में 10-12 लड़कियां थीं, जिनमें से अधिकांश को उनके अभिभावकों के पास भेज दिया गया है। नायक ने कहा कि वे बाकी लड़कियों से भी बात करके कड़ियों को जोड़ना चाहती हैं। उन्होंने एक एनजीओ की ओर से उज्ज्वला के संचालक के खिलाफ पुलिस को की गई लिखित शिकायत पर पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं करने को गंभीर मामला बताया। सरकंडा सीएसपी व महिला बाल विकास विभाग के अधिकारी के उज्ज्वला होम संचालक का बचाव करने के आरोप पर उन्होंने कहा कि इस बारे में लिखित शिकायत मिलने पर वे कार्रवाई करेंगीं। पुलिस से कल वे इस मामले में अब तक की गई जांच की जानकारी लेंगीं।
एनएमडीसी में 71 लड़कियों को मिलेगी नौकरी
आयोग अध्यक्ष ने कहा कि एनएमडीसी में 10 साल पहले हुए अधिग्रहण में प्रभावित परिवारों की लड़कियों को जमीन का मुआवजा तो दिया गया लेकिन उन्हें नौकरी देने से मना कर दिया गया था। इस पर आई शिकायत की सुनवाई आयोग ने की है और कलेक्टर ने स्वीकार किया कि प्रावधानों को समझने में चूक हुई है। अब एक माह के भीतर सर्वेक्षण किया जायेगा, जिसमें प्रभावित 71 लड़कियों को नौकरी देने का रास्ता खुलेगा। सर्वे में प्रभावित परिवार के दो लोग, जनप्रतिनिधि अधिवक्ता और जिला प्रशासन के दो अधिकारी शामिल होंगे।
एक लाख रुपये तक दिला रहे भरण-पोषण
आयोग की अध्यक्ष ने बताया कि उनके पास आई शिकायत के बाद कई मामलों में एक लाख रुपये तक का मासिक भरण पोषण दिया जा रहा है। कुछ मामलों में 25-50 हजार रुपये भी मासिक राशि तय हुई है। कोर्ट में ऐसे मामले लम्बे खिंचते हैं। सुकमा, नारायणपुर और बेमेतरा जिले से आयोग के पास कोई शिकायत नहीं है, इसलिये वहां जन सुनवाई अब तक रखने की जरूरत नहीं पड़ी। शेष सभी जिलों में अब तक कुल 52 शिविर लगाये जा चुके हैं। अब तक 400 मामले निपटाये जा चुके हैं जबकि 1198 का निराकरण किया जाना है।
आज रखी गई जन सुनवाई के नतीजे संतोषजनक नहीं रहे। आयोग ने सुनवाई के लिये 22 मामले आज रखे थे लेकिन केवल तीन-चार में ही पक्षकार उपस्थित हुए। अधिकांश मामले कल के लिये टाल दिये गये। कल 29 जनवरी को भी जन-सुनवाई रखी गई है।
-निखिल इनामदार
लॉकडान के दौरान जब 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी 23.9 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 7.5 प्रतिशत गिरी तो कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत देने वाला क्षेत्र था. लेकिन इससे भारत के अधिकतर किसानों की आमदनी पर कोई फर्क नहीं पड़ा.
महाराष्ट्र के नासिक के नयागांव में अपनी दो एकड़ ज़मीन पर लाल प्याज़ उगाने वाले भरत दिघोले के लिए बीता साल मुश्किलों भरा था. भारी पैदावार की वजह से दाम गिर गए थे और फिर सितंबर में सरकार ने प्याज़ के निर्यात पर रोक लगा दी थी.
दिघोले महाराष्ट्र प्याज़ उत्पादक एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं. अपने खेत के पास बने छोटे से घर के आंगन में चाय पीते हुए दिघोले कहते हैं, "अप्रैल 2020 में मैंने प्याज़ उसी भाव में बेची जिस भाव पर मेरे पिता ने साल 1995 और 1997 में बेची थी. मैं पैसा कैसे कमाऊंगा? हमारी लागत बढ़ गई है और सरकार की नीतियों ने व्यापार बहुत मुश्किल कर दिया है."
सरकार ने नए साल के पहले दिन प्याज़ का निर्यात फिर से शुरू किया जिसके बाद एक क्विंटल प्याज़ के दाम 500 रुपये तक चढ़कर 1,800-2,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए. ये किसानों के लिए अच्छी ख़बर है लेकिन अब दिघोले के सामने एक और चुनौती है- बोमौसम बरसात से फसल बचाने की.

दिघोले के खेत से करीब बीस किलोमीटर दूर दीपक पाटिल के खेतों में बारिश से हुई बर्बादी साफ़ नज़र आती है.
उन्हें आशंका है कि 15 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो गई है. उन्हें 25 लाख का क़र्ज़ चुकाना है और बीते चार-पांच सालों से उनकी किस्मत भी बहुत अच्छी नहीं रही है. ये ऐसी परिस्थिति है जिसके लिए पाटिल तैयार नहीं हैं.
"2016 के बाद से हमें एक के बाद एक झटका लग रहा है. पहले नोटबंदी हुई जिसमें सरकार ने 80 प्रतिशत तक मुद्रा बाज़ार से वापस ले ली. उस साल कोई ख़रीदार ही नहीं था क्योंकि एजेंटों का पैसा घिर गया था. उसके अगले साल फसल अच्छी नहीं हुई, फिर इस साल लॉकडाउन लग गया जिसने सप्लाई चेन को तोड़ दिया और अब ये बेमौसम बरसात. हमारी आय ख़त्म हो गई है."
क्या होगा प्रधानमंत्री के वादे का?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साल 2016 में किसानों की आय दोगुनी करने का वादा और ज़मीनी सच्चाई एक दूसरे के ठीक उलट हैं. अब लगता है कि ये वादा पूरा होना आसान नहीं होगा.
साल 2012-13 के बाद से किसानों की आय से जुड़ा एनएसएसओ का डाटा उपलब्ध नहीं है. लेकिन बीबीसी रियलिटी चैक के मुताबिक साल 2014 और 2019 के बीच कृषि से जुड़ी मज़दूरी की दर में गिरावट आई है.
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के स्कूल ऑफ़ डेवलपमेंट स्टडीज़ में नाबार्ड के चेयर प्रोफ़ेसर आर रामकुमार मानते हैं कि साल 2016 और 2020 के बीच वास्तव में खेती से जुड़ी आय में बढ़ोत्तरी के बजाए गिरावट आई होगी. वो इसके लिए कृषि के ख़िलाफ़ व्यापारिक शर्तों में बदलाव और सरकार की तर्कहीन नीतियों को ज़िम्मेदार मानते हैं.
कोविड महामारी ने हालात और ख़राब ही किए हैं. बीते साल अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की तरफ से किए गए एक सर्वें में पता चला था कि बड़ी तादाद में किसान या तो अपनी फसल बेच ही नहीं पाए थे या उन्हें कम दाम में बेचने को मजबूर होना पड़ा था.
किसानों के साथ हमारी बातचीत में भी सर्वे के इन नतीजों की पुष्टि हुई. किसानों का कहना था कि वो दोहरी मार झेल रहे हैं क्योंकि महामारी की वजह से सप्लाई चेन टूटने से मज़दूरी और लागत पर होने वाला ख़र्च बढ़ गया है.
प्रोफ़ेसर रामकुमार कहते हैं कि मौजूदा हालात को देखते हुए किसानों की आय का साल 2024 तक दोगुना होना संभव नहीं दिखता. सरकार ने अपने वादे को पूरा करने के लिए 2024 तक की नई समयसीमा तय की है.

नए कृषि क़ानूनों से क्या होगा?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फ़रवरी को बजट पेश करेंगी. कृषि की आय बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार को कृषि से जुड़ी नीतियों में सुधार करना होगा.
प्रोफ़ेसर रामकुमार कहते हैं, "सरकार को कृषि से जुड़ी सब्सिडी के लिए सकारात्मक रवैया अपनाना होगा और ये सुनिश्चित करना होगा कि छोटे और मझोले किसानों के लिए उत्पादन लागत ना बढ़े. इसके साथ ही सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य भी बढ़ाना होगा."
किसान तीन नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ दो महीनों से दिल्ली में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी हासिल करना उनकी प्रमुख मांगों में से एक है. इस मुद्दे पर सरकार और किसानों के बीच विश्वास बिलकुल टूट गया है.
रामकुमार कहते हैं, "सरकार को बजट में कम से कम अगले पांच साल के लिए तीन हज़ार से पांच हज़ार मंडियों में निवेश करने का वादा करना चाहिए ताकि किसानों का विश्वास फिर से हासिल किया जा सके."
ये वो मुद्दा है जिस पर नीति निर्माता भी विभाजित हैं. मुक्त बाज़ार का समर्थन करने वाले अर्थशास्त्री तीन कृषि क़ानूनों को पुरानी व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी मानते हैं. वे कृषि क्षेत्र में निजी सेक्टर के दख़ल की वकालत करते हैं.
फिलहाल इस पर बिचौलियों का प्रभुत्व है. लेकिन रामकुमार और देवेंद्र शर्मा जैसे कृषि नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था को कमज़ोर करने और किसानों को बाज़ार के हवाले करने से पहले से कमज़ोर कृषक समुदाय संकट के समय और भी कमज़ोर होगा.
वित्त मंत्री के हाथ में मुश्किल काम है. फ़रवरी 2019 में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि शुरू की थी जिसके तहत किसानों को सालाना छह हज़ार रुपये की मदद दी जाती है. केयर रेटिंग एजेंसी के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं किसानों के प्रदर्शन को देखते हुए 'किसानों को दी जाने वाली सालाना आर्थिक मदद में इज़ाफ़े' की उम्मीद है.
भारत की 1.3 अरब आबादी में से आधे लोग जीवनयापन के लिए खेती पर निर्भर हैं. इन्हें अस्थायी आर्थिक सहयोग देना अपने उत्पाद के व्यापार के बेहतर मौके देने का विकल्प नहीं हो सकता. भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के लिए भी ये ज़रूरी है. (bbc.com)
-रविंदर सिंह रॉबिन
जुगराज के गाँव और परिवार में पहले तो जीत की ख़ुशी और लाल क़िले पर खालसा झंडे को लहराने का एक उत्साह दिख रहा था, लेकिन बाद में वो पुलिस कार्रवाई के डर में बदल गया.
अब जुगराज का अता-पता नहीं है और जुगराज के माता-पिता भी गाँव छोड़ कर कहीं चले गए हैं, पुलिस और मीडिया के सवालों का जवाब देने के लिए रह गए हैं जुगराज के दादा-दादी.
पंजाब के तरनतारन ज़िले के गाँव का 23 साल का नौजवान जुगराज सिंह वही नौजवान है, जिसने 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान लाल क़िले की प्राचीर पर खालसा झंडा लगा दिया था.
जब जुगराज के दादा से पूछा गया कि वो अपने पोते की हरकत के बारे में क्या सोचते हैं, तो उन्होंने कहा, "बहुत अच्छा लग रहा है ये बाबे दी मेहर है" यानी गुरुओं की मेहरबानी है.
जुगराज के दादा महल सिंह ने कहा कि जुगराज बहुत ही अच्छा लड़का है और उन्हें नहीं मालूम की जो घटना हुई वो किस तरह हुई, उन्होंने कहा कि जुगराज ने उन्हें कभी भी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया.
26 जनवरी के दिन दिल्ली में हुई किसानों की रैली के दौरान कुछ प्रदर्शनकारी दिल्ली के लाल क़िले में घुस गए थे. उन्होंने वहाँ की प्राचीर पर चढ़ कर वहाँ सिखों का पारंपरिक झंडा 'निशान साहिब' फहरा दिया था.
इसके बाद पुलिस जुगराज समेत कई लोगों की तलाश कर रही है. लाल क़िले पर हुई हिंसा के बाद किसान नेताओं ने इसकी आलोचना की और कहा कि रैली में 'कुछ असामाजिक तत्व शामिल हो गए थे.'
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सत्तारूढ़ बीजेपी ने कहा कि गणतंत्र दिवस के दिन तिरंगे का अपमान हुआ है.
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस घटना के बाद कहा, "दिल्ली में जिस तरह से हिंसा हुई उसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है. लाल क़िले पर तिरंगे का अपमान हुआ वो अपमान हिंदुस्तान सहन नहीं करेगा."
पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने लाल क़िले पर हुई घटना की निंदा की है और कहा है कि भारत सरकार को इस मामले की जांच कर दोषी को सज़ा देनी चाहिए.
हालांकि उन्होंने ये भी कहा है शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान नेताओं को परेशान नहीं किया जाना चाहिए.
सोशल मीडिया पर भी कुछ लोग इस घटना को तिरंगे का अपमान बता रहे हैं.
इधर संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रेस नोट जारी कर सरकार पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है और कहा कि उनका लाल क़िले और दिल्ली के किसी भी दूसरे हिस्से में हुई हिंसा से कोई ताल्लुक़ नहीं है.
प्रेस नोट में कहा गया है कि "अभी तक यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीक़े से चल रहा था लेकिन इस आंदोलन को बदनाम करने की साज़िश अब जनता के सामने आ चुकी है. कुछ व्यक्तियों और संगठनों के सहारे सरकार ने इस आंदोलन को हिंसक बनाया. प्रेस नोट में दीप सिद्धु और सतनाम सिंह पन्नु की अगुवाई वाले किसान मज़दूर कमेटी का नाम मुख्य रूप से लिया गया है."
जुगराज के गांव का क्या है हाल

RAVINDER SINGH ROBIN/BBC
गाँव वालों का कहना है कि पुलिस कई बार जुगराज के घर छापा मार चुकी है और ख़ाली हाथ लौट चुकी है, क्योंकि जुगराज और उसके माता-पिता पुलिस वालों को वहाँ नहीं मिले.
जुगराज के घर के बाहर ही मौजूद गाँव के एक बुज़ुर्ग प्रेम सिंह ने बताया कि उन्होंने टीवी पर देखा कि किस तरह एक नौजवान ने लाल क़िले पर खालसा झंडा लहरा दिया.
प्रेम सिंह कहते हैं, "जो लाल क़िले पर घटना हुई है वह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन वो एक अच्छा लड़का है और उसको इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 26 जनवरी के दिन लाल क़िले पर इस तरह से झंडा फहराने का क्या नतीजा होगा. बहुत सारे लोगों ने खालसा झंडा अपने साथ रखा हुआ था, जैसा मैंने टीवी पर देखा. उनमें से किसी ने जुगराज को एक झंडा दे दिया था जो उसने लाल क़िले पर लगा दिया."
पारिवारिक पृष्ठभूमि

RAVINDER SINGH ROBIN/BBC
गाँव के ज़्यादातर लोग यही कहते रहे कि जुगराज एक मेहनती और नेक दिल लड़का है.
गाँव में ही रहने वाले जगजीत सिंह ने बताया कि जुगराज 23 या 24 जनवरी को एक संगत के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुआ था.
गाँव के लोगों का कहना है कि परिवार के पास बमुश्किल दो-तीन एकड़ ज़मीन है और परिवार कर्ज़ के बोझ से दबा हुआ है. यह भी बताया गया कि गाँव के कुछ दूसरे लड़कों के साथ साल के कुछ महीने वह चेन्नई में एक फ़ैक्टरी में काम किया करता था.
जुगराज की तीन बहनें हैं, जिनमें से दो की शादी हो चुकी है और तीसरी बहन परिवार के साथ ही रहती है.
जगजीत सिंह कहते हैं, "वो एक साफ़ दिल का और जिस्म से मज़बूत बच्चा था. उसे किसी ने ऐसा करने के लिए कहा और उसने इसके नतीजे के बारे में नहीं सोचा."

RAVINDER SINGH ROBIN/BBC
गाँव के लोगों का मानना है कि इसके पीछे विदेशी फंडिंग की बात बेबुनियाद है. उनका कहना है कि इस बात की आसानी से जाँच की जा सकती है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ.
जब इस बारे में तरनतारन के पुलिस अधीक्षक से बात की गई, तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि एफ़आईआर तरनतारन में दर्ज नहीं हुई है इसलिए वो बारे में कुछ नहीं कहेंगे.
किसान आंदोलन
तीन कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने की मांग को लेकर किसान दिल्ली की सीमा पर दो महीने से ज़्यादा समय से आंदोलन कर रहे हैं. 26 जनवरी को किसान संगठनों ने पुलिस से दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च की अनुमति मांगी थी.
बाद में दिल्ली पुलिस ने एक ख़ास रूट पर ट्रैक्टर परेड की अनुमति दे दी थी. लेकिन 26 जनवरी के दिन प्रदर्शनकारी दिल्ली के कई इलाक़ों में घुस गए और कई जगह दिल्ली पुलिस के साथ उनकी झड़प हुई.
इसी क्रम में प्रदर्शनकारी लाल क़िले में भी घुस गए और वहाँ झंडा फहरा दिया. पुलिस को इस मामले में एक्टर दीप सिद्धू की भी तलाश है, जिन पर लोगों को भड़काने का आरोप है.
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कई किसान नेताओं पर भी मामला दर्ज किया है. दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के हमले में क़रीब 400 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. जबकि एक प्रदर्शकारी की मौत हो गई. (bbc.com)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 28 जनवरी। राज्य में आज शाम 5.27 तक 391 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सर्वाधिक 109 अकेले रायपुर जिले के हैं।
आईसीएमआर के मुताबिक आज बालोद 5, बलौदाबाजार 5, बलरामपुर 9, बस्तर 3, बेमेतरा 5, बीजापुर 0, बिलासपुर 48, दंतेवाड़ा 1, धमतरी 22, दुर्ग 62, गरियाबंद 1, जीपीएम 1, जांजगीर-चांपा 5, जशपुर 8, कबीरधाम 3, कांकेर 3, कोंडागांव 0, कोरबा 5, कोरिया 2, महासमुंद 23, मुंगेली 1, नारायणपुर 0, रायगढ़ 18, रायपुर 109, राजनांदगांव 22, सुकमा 0, सूरजपुर 8, और सरगुजा 22 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों में रात तक राज्य शासन के जारी किए जाने वाले आंकड़ों से कुछ फेरबदल हो सकता है क्योंकि ये आंकड़े कोरोना पॉजिटिव जांच के हैं, और राज्य शासन इनमें से कोई पुराने मरीज का रिपीट टेस्ट हो, तो उसे हटा देता है। लेकिन हर दिन यह देखने में आ रहा है कि राज्य शासन के आंकड़े रात तक खासे बढ़ते हैं, और इन आंकड़ों के आसपास पहुंच जाते हैं, कभी-कभी इनसे पीछे भी रह जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने मोदी सरकार के विवादित कृषि क़ानूनों की तारीफ़ की है.
गीता गोपीनाथ के मुताबिक़, केंद्र सरकार की ओर से लाए गए क़ानूनों में किसानों की आय बढ़ाने की क्षमता है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि कमज़ोर किसानों को सामाजिक सुरक्षा देने की ज़रूरत है.
वॉशिंगटन स्थित इस वैश्विक वित्तीय संस्थान से जुड़ीं गीता गोपीनाथ ने मंगलवार को कहा कि 'भारत में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ सुधार की ज़रूरत है और कृषि क्षेत्र उनमें से एक है.'
भारत सरकार ने पिछले साल सितंबर में कृषि क्षेत्र से संबंधित तीन नए क़ानूनों को लागू किया था और इन्हें 'कृषि क्षेत्र में बड़े सुधारों' के रूप में पेश किया गया.
लेकिन किसान इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हैं. कई राज्यों के किसान इनके ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में शामिल हुए हैं. वो चाहते हैं कि तीनों क़ानून वापस लिए जाएं. किसानों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत का भी अब तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया और अब गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा के बाद स्थिति ने एक नया मोड़ ले लिया है.
ऐसे में गीता गोपीनाथ के इस ताज़ा बयान पर भी मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. बहुत से लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि 'क्या गीता गोपीनाथ ने मोदी सरकार से हाथ मिला लिया है?'
गुरुवार सुबह गीता गोपीनाथ अपने ताज़ा बयानों की वजह से सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी रहीं.
मोदी सरकार के आगामी बजट को लेकर पूछे गए एक सवाल पर गीता गोपीनाथ ने यह भी कहा कि 'भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए, 2025 से पहले, कोविड-19 से पहले की स्थिति में पहुँच पाना मुश्किल होगा और भारत की आर्थिक वृद्धि विभिन्न क्षेत्रों में किए जाने वाले सुधारों पर निर्भर करेगी.'

GITA GOPINATH/TWITTER
कौन हैं गीता गोपीनाथ?
अक्टूबर 2018 में गीता को आईएमएफ़ का प्रमुख अर्थशास्त्री नियुक्त किया गया था.
भारतीय मूल की गीता गोपीनाथ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टडीज़ ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्रोफ़ेसर रही हैं. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के अनुसार, आईएमएफ़ के साथ काम करने के लिए उन्होंने अध्यापन-कार्य से फ़िलहाल छुट्टी ली हुई है.
गीता ने इंटरनेशनल फ़ाइनेंस और मैक्रो-इकोनॉमिक्स में रिसर्च की है.
आईएमएफ़ में इस पद पर पहुँचने वाली गीता दूसरी भारतीय हैं. उनसे पहले भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी आईएमएफ़ में प्रमुख अर्थशास्त्री रह चुके हैं.
साल 2017 में केरल सरकार ने गीता को राज्य का वित्तीय सलाहकार नियुक्त किया था. गीता का जन्म केरल में ही हुआ था.

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लेकिन जब केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने गीता की नियुक्ति की थी तो उस समय उन्हीं की पार्टी के कुछ लोग नाराज़ भी हुए थे.
गीता अमेरिकन इकोनॉमिक्स रिव्यू की सह-संपादक और नेशनल ब्यूरो ऑफ़ इकोनॉमिक रिसर्च (एनबीइआर) में इंटरनेशनल फ़ाइनेंस एंड मैक्रो-इकोनॉमिक्स की सह-निदेशक भी रही हैं.
गीता ने व्यापार और निवेश, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट, मुद्रा नीतियों, कर्ज़ और उभरते बाज़ार की समस्याओं पर लगभग 40 रिसर्च लेख लिखे हैं.
गीता ने ग्रेजुएशन तक की शिक्षा भारत में पूरी की. गीता ने साल 1992 में दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की.
इसके बाद उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में ही मास्टर डिग्री पूरी की.
साल 1994 में गीता वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी चली गईं. साल 1996 से 2001 तक उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी पूरी की थी.
साल 2001 से 2005 तक गीता शिकागो यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर थीं.
इसके बाद साल 2005 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई.
साल 2010 में गीता इसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बनीं और फिर 2015 में वे इंटरनेशनल स्टडीज़ एंड इकोनॉमिक्स की प्रोफ़ेसर बन गईं.
जब अमिताभ बच्चन ने की गीता पर टिप्पणी
"इतना ख़ूबसूरत चेहरा इनका, इकॉनमी के साथ कोई जोड़ ही नहीं सकता..."
अभिनेता अमिताभ बच्चन ने कुछ दिन पहले ही गीता गोपीनाथ के बारे में यह टिप्पणी की थी.
उन्होंने एक महिला प्रतिभागी से गीता गोपीनाथ के बारे में सवाल पूछते समय यह टिप्पणी की थी.
लेकिन सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चन की टिप्पणी कितनी 'सेक्सिस्ट' (महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से भरी) है.
सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन का एक वीडियो क्लिप वायरल हो गया.
हालांकि, गीता गोपीनाथ केबीसी में ख़ुद से जुड़ा सवाल पूछे जाने और अमिताभ की टिप्पणी को सुनकर बेहद ख़ुश नज़र आईं.
मगर बहुत सी महिलाओं ने लिखा कि अमिताभ की टिप्पणी बेहद सेक्सिट और मूर्खतापूर्ण थी.
जेंडर स्टडीज़ के क्षेत्र में इस बारे में लंबे वक़्त तक चर्चा होती रही कि महिलाओं को उनकी प्रतिभा और कामयाबी की जगह कैसे उनके चेहरे और शरीर से आँका जाता है. (bbc.com)
-मुरलीधरन काशीविश्वनाथन
शशिकला ने अपनी ज़िंदगी में अब तक कई मोड़ देखे हैं. उनकी ज़िंदगी उतार-चढ़ाव से भरपूर रही है. उन्होंने एक औसत गृहिणी से शुरुआत की थी और फिर वक्त के साथ तमिलनाडु की सबसे ताकतवर महिलाओं में से एक की सहायिका बन गईं.
1984 में शशिकला विनोद वीडियो विजन नाम से एक वीडियो पार्लर चलाया करती थीं. यह दुकान चेन्नई के अलवरपेट में थी. उनके पति नटराजन सरकार में जनसंपर्क अधिकारी थे और उस वक्त कड्डलुर ज़िले में उनकी तैनाती थी. उस समय आईएएस अफसर चंद्रलेखा कड्डलुर ज़िले की कलक्टर हुआ करती थीं.
चंद्रलेखा के कहने पर ही विनोद वीडियो को उस मीटिंग को फिल्माने का मौका मिला था, जिसमें जयललिता बोल रही थीं. इसी असाइनमेंट के दौरान वीके शशिकला जयललिता से पहली बार मिली थीं. यह एक सामान्य मुलाकात लग सकती है लेकिन इसके बाद की घटनाएं सामान्य नहीं रहने वाली थीं.
शशिकला का जन्म 1956 में हुआ था. जगह थी संयुक्त तंजौर ज़िले की तिरुतुरईपुंडी. पिता का नाम था विवेकानंदन और मां का नाम कृष्णावेणी. पांच साल की उम्र तक शशिकला वहीं रहीं. बाद में उनका परिवार मन्नरकुडी शिफ़्ट हो गया. उन्होंने सिर्फ़ दसवीं तक पढ़ाई की.
16 अक्टूबर 1973 को शशिकला की शादी एम नटराजन से हुई. यह शादी मन्नई नारायणस्वामी की मौजूदगी में हुई, जो तंजौर ज़िले के बेहद प्रभावशाली नेता थे. इस शादी में दोनों को आशीर्वाद देने तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि भी आए थे.

shashikala photo from AIADMK twitter page
जयललिता से मुलाकात के बाद शशिकला ने उनका विश्वास हासिल कर लिया और दिल्ली के दौरे में उनके साथ जाने लगीं. जयललिता उन दिनों राज्यसभा की सांसद थीं. मुख्यमंत्री एम जी रामचंद्रन के निधन के बाद दोनों बेहद करीब आ गईं.
राजाजी हॉल में एम जी रामचंद्रन का शव रखा गया था और जयललिता अलग-थलग खड़ी थीं. नटराजन ने बाद में मीडिया को बताया कि जयललिता को एमजी का अंतिम दर्शन नहीं करने दिया गया. एमजी रामचंद्रन के परिवार के लोगों ने जयललिता को घेर रखा था ताकि उन्हें अन्नाद्रमुक नाराज़ गुट के लोगों से बचाया जा सके.
1988 से शशिकला जयललिता के आवास पोएस गार्ड में स्थायी रूप से रहने लगीं. पोएस गार्डन में रहने के दौरान जयललिता की निर्भरता लगातार शशिकला पर बढ़ती चली गई.
एमजीआर के निधन के बाद अन्नाद्रमुक दो हिस्सों में बंट चुकी थी. फरवरी, 1988 में जयललिता के गुट ने जनरल बॉडी मीटिंग बुलाई.
इस मीटिंग के दौरान सिर्फ़ वही लोग पदाधिकारी बनाए गए, जिन्हें शशिकला और उनके पति का वरदस्त प्राप्त था. यहां तक कि जिन लोगों ने जयललिता का शुरू से साथ दिया था उन्हें भी दरकिनार कर दिया गया. तो यह था शशिकला का जयललिता पर प्रभाव.
1991 में जब जयललिता पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तो हर काम के लिए वह शशिकला से सलाह लिया करती थीं. इसी समय से जयललिता को लोग अम्मा और शशिकला को चिन्नमा कहने लगे थे. शशिकला जयललिता के साथ साये की तरह लगी रहती थीं. इसके साथ ही एआईएडीएमके में शशिकला के भाइयों और पति नटराजन का दबदबा बढ़ना शुरू हो गया था.
शशिकला पर जयललिता का विश्वास इतना बढ़ गया था कि उन्होंने उनके रिश्तेदार वीएन सुधाकरन को अपना दत्तक पुत्र बना लिया. जयललिता ने बेहद धूमधाम से सुधाकरन की शादी करवाई. यह दुनिया की सबसे खर्चीली शादियों में से एक मानी गई और इस वजह से गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में इसकी एंट्री हुई.
इस दौरान शशिकला के रिश्तेदारों के रंग बदलने शुरू हुए और उनके दुर्व्यवहार की खबरें मीडिया में आने लगीं. लोगों की उनसे नाराज़गी बढ़ी. कई सीनियर मंत्रियों ने पार्टी से दूरी बनानी शुरू कर दी. कहा जाता है कि इन सबके पीछे शशिकला का हाथ था.
1996 में जयलिलता चुनाव हार गईं. उन्हें अपनी सहेली शशिकला के साथ जेल जाना पड़ा. इस दौरान कुछ समय तक जयललिता शशिकला को नज़रअंदाज़ करने लगीं. लेकिन यह दूरी ज़्यादा देर नहीं टिकी.

एक बार फिर शशिकला का पोएस गार्डन हाउस में आना-जाना शुरू हो गया. इसके बाद का शशिकला का जादू जयललिता के सिर ऐसा चढ़ा कि पोएस गार्डन हाउस और पार्ट दोनों जगह उनके इशारे के बगैर पत्ता भी नहीं खड़कता था. जयललिता पर शशिकला का यह असर 2011 तक रहा.
2011 में जयललिता एक बार फिर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं. इस दौरान उन्हें लगा कि शशिकला उनके ख़िलाफ़ साज़िश रच रही हैं. लिहाज़ा उन्होंने 19 दिसंबर 2011 को शशिकला और उनके परिवार के सभी सदस्यों को पार्टी से निकाल दिया.
शशिकला पोएस गार्डन से भी बाहर निकाल दी गईं. पति नटराजन समेत शशिकला के सभी रिश्तेदार- दिवाकरन, दिनाकरण, भास्करण, सुधाकरन, डॉ. वेंकटेशन, रामचंद्रन, रावनन और मोहन को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा गया.
लेकिन यह सब भी लंबा नहीं चला. तीन महीने बाद 28 मार्च, 2012 को शशिकला ने एक प्रेस रिलीज़ जारी किया. इसमें कहा गया कि उन्हें पार्टी में बनने रहने या सांसद, विधाक बनने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं. वह सिर्फ जयललिता की सच्ची बहन बनी रहना चाहती हैं.
इस प्रेस रिलीज़ के जारी होने के बाद 31 मार्च को जयललिता ने सिर्फ़ शशिकला को पार्टी में एंट्री दी. और इसके बाद उनकी दोस्ती जयललिता की आख़िरी सांस तक चली.
पार्टी को परदे के पीछे से चलाती थीं शशिकला
शशिकला और जयललिता दोनों को 2014 में आय से अधिक संपत्ति जमा करने के मामले में जेल हुई थी. शशिकला जयललिता की सहायिका और सबसे करीबी थीं. लेकिन वह जयललिता के रहते कभी भी पार्टी में आगे नहीं आईं. हालांकि पार्टी में कई बार अहम वक्त में फैसले लेती रहीं.
एआईएडीएमके में हर कोई यह जानता था कि उनका कद क्या है. चुनावों में जब पार्टी के उम्मीदवार उतारे जाते थे तब नेताओं को पार्टी में उनके कद का पता चलता था.
जब 2002 में जयललिता मुख्यमंत्री नहीं बन सकीं तब ओ. पन्नीरसेल्वम का नाम शशिकला की सलाह पर ही आगे लाया गया. इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद जितने भी चुनाव हुए उनमें उम्मीदवार चयन के मामले में शशिकला की ही चली. पार्टी में हर स्तर पर उनका दबदबा था.
2016 में जब जयललिता अस्पताल में भर्ती हुईं तब यह आरोप लगाया गया कि सिर्फ शशिकला और उनके परिवार वाले ही उनसे मिल सकते थे. इसके अलावा किसी को जयललिता से मिलने की इजाज़त नहीं थी. दिसंबर में जयललिता के निधन के बाद आधी रात को पन्रीरसेल्वम के नेतृत्व में सरकार को शपथ दिलाई गई. पन्रीरसेल्वम को शशिकला के कहने पर ही सीएम बनाया गया था.
जब तक जयललिता जीवित थीं तब तक शशिकला के रिश्तेदारों को तवज्जो नहीं मिली. लेकिन उनके निधन के बाद वे सभी राजाजी हॉल में आकर उनके शव के पास खड़े रहे. इस वजह से उनकी भारी निंदा हुई.
जल्दी ही शशिकला का असली मकसद ज़ाहिर हो गया. जब ओ. पन्नीरसेल्वम सीएम थे तो भी एआईएडीएमके के मंत्रियों का पोएस गार्डन में शशिकला के यहां आना-जाना लगा रहता था. वे मंत्री शशिकला को पार्टी की बागडोर थामने के लिए उकसाते रहते थे. इस बारे में कई वीडियो और तस्वीरें मीडिया में छाई रही थीं.
जयललिता के निधन के कुछ दिनों बाद 10 दिसंबर को एक तमिल अखबार में एक पूरे पेज का विज्ञापन छपा.
इसमें लिखा था कि "अगर पुरुचि थलाइवी अम्मा को मालूम होता कि ज़िंदगी और मौत की लड़ाई में मौत जीत जाएगी तो वह इस दुनिया से विदा होने से पहले चिनम्मा को गद्दी पर बिठा जातीं."
इस विज्ञापन में किसी का नाम नहीं लिखा था. इसमें लिखा था- एक वफादार पार्टी कार्यकर्ता के अंत:करण की आवाज़.
लेकिन उसी दिन ओ. पन्नीरसेल्वम ने प्रेस रिलीज़ जारी कर कहा कि शशिकला पार्टी की जनरल सेक्रेट्री होंगी. पार्टी में सेना की तरह अनुशासन लाने के लिए यह ज़रूरी है. 29 जनवरी को पार्टी की जनरल बॉडी मीटिंग हुई और शशिकला अन्नाद्रमुक की सेक्रेट्री जनरल चुन ली गईं.
5 फ़रवरी, 2017 को ओ. पन्नीरसेल्वम ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. शशिकला ने तत्कालीन गवर्नर विद्यासागर राव से मुलाकात कर कहा कि पार्टी में बहुमत उनके पास है और उन्हें सरकार बनाने का लिए बुलाया जाए. लेकिन गवर्नर ने कोई फैसला नहीं लिया. और इस बीच, कोर्ट ने फरवरी में आय से अधिक संपत्ति इकट्ठा करने के मामले में उनके खिलाफ फैसला सुना दिया.
इस फैसले के मुताबिक शशिकला, इलावरासी और सुधाकरन जेल भेज दिए गए. इस तरह मुख्यमंत्री बनने की अपनी तैयारी से पहले ही शशिकला के राजनीतिक जीवन का अध्याय बंद हो गया.
अब शशिकला क्या करेंगी?
शशिकला ने ऐलान किया कि ई.के पलानीस्वामी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री होंगे. उन्होंने जयललिता के स्मारक का दौरा किया, वहां कसम खाई और जेल चली गईं. उन्हें बेंगलुरू के प्रपन्न अग्रहार जेल में रखा गया.
शशिकला के जेल में रहने के दौरान उनके सभी रिश्तेदारों से पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इस दौरान टीटीवी दिनाकरन ने एएमएमके नाम की पार्टी शुरू की. जबकि ई के पलानीस्वामी ने ऐलान किया कि जेल से बाहर आने के बाद शशिकला का पार्टी में स्वागत नहीं किया जाएगा. सरकार ने पोएस गार्डन को भी अपने कब्ज़े में ले लिया और इसे स्मारक स्थल में तब्दील कर दिया गया.
शशिकला बुधवार ( 27 जनवरी, 2021) को जेल से रिहा हो गईं. कोरोना संक्रमण की वजह से उन्हें बेंगलुरू के अस्पताल में भर्ती कराया गया है. वहां वह कुछ दिनों तक रहेंगी. रिहा होने के दिन ही जयललिता के स्मारक का उद्घाटन हुआ. अब देखना यह है कि चेन्नई आने के बाद वह अन्नाद्रमुक पर फिर से अपना प्रभाव कायम कर पाती हैं या नहीं.
यह मुद्दा बहस का विषय बना हुआ है. राज्य में विधानसभा चुनावों में कुछ ही महीने बाकी हैं. वो जो भी फैसला लेंगी इस पर न सिर्फ़ उनका बल्कि उनसे जुड़े तमाम लोगों का भविष्य टिका होगा. (bbc.com)
-शहज़ाद मलिक
पाकिस्तान की सैन्य नियंत्रण सेवा 'इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस' (आईएसआई) के पूर्व प्रमुख रिटायर्ड जनरल असद दुर्रानी ने अपना नाम एग्ज़िट कंट्रोल लिस्ट (ईसीएल) से निकालने के बारे में अर्ज़ी दायर की थी. अब पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने उनकी इस अर्ज़ी का इस्लामाबाद हाई कोर्ट में जवाब जमा करा दिया है.
इस जवाब में कहा गया है कि "पूर्व आईएसआई प्रमुख 2008 से 'भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी' रॉ के संपर्क में हैं."
इस जवाब में, इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि "असद दुर्रानी देश विरोधी गतिविधियों में भी शामिल हैं."
रक्षा मंत्रालय का कहना है कि इस आधार पर उनका नाम ईसीएल से नहीं हटाया जा सकता और इसी वजह से वो देश छोड़ कर बाहर नहीं जा सकते हैं.
हालांकि, असद दुर्रानी पहले भी कई बार इन आरोपों से इनकार कर चुके हैं.
ध्यान रहे कि उन्होंने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत के साथ एक पुस्तक लिखी थी. पाकिस्तानी अधिकारियों के अनुसार, उस पुस्तक में पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कंटेंट भी शामिल था.
पाकिस्तान सरकार ने 29 मई 2018 को पूर्व आईएसआई प्रमुख का नाम ईसीएल में शामिल कर दिया था.
सरकार के इस क़दम के ख़िलाफ़, रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी ने इस्लामाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी.
इस याचिका में उन्होंने कहा था कि उनका नाम ईसीएल से हटाया जाये.
इस्लामाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अतहर मिनल्लाह ने इस याचिका पर सरकार से जवाब माँगा था.

असद दुर्रानी के बारे में रक्षा मंत्रालय ने और क्या कहा?
बुधवार को इस्लामाबाद उच्च न्यायालय में रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से एक जवाब जमा किया गया था.
इस जवाब में कहा गया कि आईएसआई के पूर्व प्रमुख ने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के पूर्व प्रमुख के साथ किताबें लिखकर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 का भी उल्लंघन किया है और इस अपराध पर क़ानूनी कार्रवाई सेना अधिनियम के तहत की जाती है.
इस जवाब में सेना अधिनियम, 1952 का भी उल्लेख है और कहा गया है कि याचिकाकर्ता तो सेना में रहे हैं, लेकिन यदि कोई नागरिक भी ऐसी गतिविधियों में शामिल हो, जिससे राष्ट्रीय हित को ख़तरा हो, तो इस अधिनियम के अनुच्छेद-2डी के तहत उसका कोर्ट-मार्शल भी हो सकता है.
इस जवाब में ईसीएल क़ानून का हवाला देते हुए, रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है या उससे राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा है, तो ऐसी स्थिति में केंद्रीय सरकार के पास ये अधिकार है कि वो बिना नोटिस दिये उस व्यक्ति का नाम ईसीएल में शामिल कर दे और उसके देश छोड़ने पर पाबंदी लगा दे.
इस जवाब में यह भी उल्लेख किया गया है कि रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी के ख़िलाफ़ जाँच अंतिम चरण में है और इस स्तर पर उनका नाम ईसीएल से नहीं हटाया जा सकता है.
रक्षा मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा है कि इस स्तर पर याचिकाकर्ता के देश से बाहर जाने का उद्देश्य 'अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, मंचों और टॉक-शो में भाग लेना है. ऐसा होने से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जटिलताएं भी पैदा हो सकती हैं.'
जवाब में यह भी कहा गया है कि 'पिछले साल 12 और 13 अक्तूबर को सोशल मीडिया पर पूर्व आईएसआई प्रमुख ने जिस तरह से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था, उसे किसी भी देश भक्त नागरिक ने अच्छा नहीं समझा.'
हालांकि इस जवाब में पूर्व आईएसआई प्रमुख की इन 'भावनाओं' को विस्तार से नहीं बताया गया है.
रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी की इस याचिका पर अगली सुनवाई 12 फ़रवरी को होगी.
अदालत ने केंद्रीय सरकार को यह भी निर्देश दिया है कि वो याचिकाकर्ता द्वारा लिखित पुस्तक में प्रकाशित उन हिस्सों को भी अदालत के सामने प्रस्तुत करें जो सरकार के अनुसार 'राष्ट्रीय सुरक्षा के ख़िलाफ़' हैं.
असद दुर्रानी का क्या पक्ष है?
पिछले साल बीबीसी को दिये एक इंटरव्यू में असद दुर्रानी ने कहा था कि "जब तक किसी किताब में विवाद ना हो तो फ़ायदा क्या है? वो तो फिर एक सरकारी किस्म का लेखन होगा, जो आप आईएसपीआर से ले लें या सरकार से ले लें. विवाद तो आपको पैदा करना होगा ताकि बहस हो सके."
देश की गोपनीयता को ज़ाहिर करने के आरोप के जवाब में उन्होंने कहा था कि "बहुत शोर मचा था, लेकिन किसी ने आज तक यह नहीं बताया कि इस पुस्तक में देश से जुड़ी कौन-सी गोपनीय बात थी. आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत लोगों पर मुक़दमा चलाना सबसे आसान काम है. जितनी भी गोपनीयता की बात थी, वो भी धीरे-धीरे किसी ने इधर से बता दी, किसी ने उधर से, इसलिए गोपनीयता का कोई सवाल ही नहीं है."
"मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपना विश्लेषण देकर किसी कमज़ोरी को ज़ाहिर कर दिया है, या दुम पर पैर रख दिया है. मैंने इस आधार पर एक विश्लेषण किया था कि अगर मैं उस समय होता तो क्या करता."
उन्होंने कहा था कि "सेना के अंदर कई लोगों ने अपनी किताबें लिखीं और किसी ने उनसे नहीं पूछा कि उन्होंने क्या लिखा है."
"मुझे रिटायरमेंट के समय तत्कालीन आर्मी चीफ़ जनरल वहीद काकड़ ने कहा था कि आपको ख़ुद देखना है कि आपको अपनी बात कहाँ तक लिखनी हैं और कहाँ तक नहीं. अपना सेंसर ख़ुद ही करो और उसूल भी यही है."
कौन हैं असद दुर्रानी?
80 वर्षीय असद दुर्रानी पाकिस्तानी सेना के एक रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल हैं. उन्हें 1988 में सैन्य ख़ुफ़िया महानिदेशक नियुक्त किया गया था.
1990 में उन्हें महानिदेशक, आईएसआई के रूप में नियुक्त किया गया था.
1993 में रिटायर्ड होने के बाद, उन्होंने जर्मनी और सऊदी अरब में पाकिस्तान के राजदूत के रूप में भी काम किया.
असद दुर्रानी अक्सर विवादों में रहे, चाहे वह उनकी दोनों प्रकाशित पुस्तकों में शामिल जानकारी को लेकर हो या ओसामा बिन लादेन के बारे में उनके बयान, जिन्हें वे अपना 'विश्लेषण' कहते हैं.
स्पाई क्रॉनिकल के लेखक रिटायर्ड जनरल असद दुर्रानी को 1990 के दशक में ही सेना से बेदख़ल कर दिया गया था. असग़र ख़ान केस में उनका नाम सामने आने के बाद, उन्हें आईएसआई से जीएचक्यू बुला लिया गया. फिर जब यह सामने आया कि वह राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं, तो उन्हें समय से पहले ही रिटायर्ड कर दिया गया.
वो अपनी किताब 'ओनर अमंगस्ट स्पाइज़' के प्रकाशन के बाद भी ख़बरों में रहे. ये पुस्तक उनकी पहली प्रकाशित पुस्तक 'स्पाई क्रॉनिकल्स' सिरीज़ की दूसरी किताब है.
वो 1990 के दशक में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार के ख़िलाफ़ इस्लामिक जम्हूरी इत्तेहाद (आईजेआई) के गठन के मुक़दमे में भी शामिल थे जिसमें उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मियां नवाज़ शरीफ़ सहित अन्य राजनेताओं को बड़ी रक़म देने की बात क़बूल की थी. (bbc.com)
नई दिल्ली, 28 जनवरी| कोचिंग संस्थानों को डिजिटल होने में मदद करने वाले ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफॉर्म-विनयूऑल ने कोचिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के साथ अपनी साझेदारी की घोषणा की। इसके तहत जेईई प्रत्याशी आगामी ज्वाईंट इंजीनियरिंग एंट्रेंस मेन 2021 के लिए निशुल्क मॉक टेस्ट ले सकेंगे। यह परीक्षा 7 फरवरी को दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक चलेगी। इसके लिए भारत के सभी कोचिंग संस्थान अपने विद्यार्थियों का निशुल्क रजिस्ट्रेशन करा सकेंगे। मॉक जेईई प्लेटफॉर्म जेईई के नए प्रारूप पर आधारित है और यह विद्यार्थियों को वास्तविक परीक्षाओं की तैयारी करने का अवसर देगा।
मॉक टेस्ट के लिए साईन अप करने के लिए भारत के कोचिंग संस्थान प्रेपइंडिया डॉट विनयूऑल डॉट कॉम पर लॉग इन कर सकते हैं और विद्यार्थियों की ओर से रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। मॉक टेस्ट रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि 2 फरवरी है।
इस मॉक टेस्ट परीक्षा की सामग्री फैकल्टी सदस्यों के विशेषज्ञ समूह द्वारा तैयार की गई है। जेईई मेन परीक्षा के नए प्रारूप के अनुसार, अब 5 की बजाय 10 पूर्णांक आधारित प्रश्न होंगे। विद्यार्थी को इन 10 प्रश्नों में से 5 प्रश्नों का जवाब देना होगा।
यह मॉक टेस्ट मौजूदा संरचना पर आधारित होगा, जो विद्यार्थियों को वास्तविक परीक्षा के नए प्रारूप का अनुभव लेने का मौका देगा। जेईई के अलावा विटईईइट, बिटसैट एवं अन्य इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी भी विनयूऑल पर उपलब्ध संसाधनों का लाभ ले सकते हैं।
परीक्षा के अंतिम परिणाम 8 फरवरी को जारी होंगे। विनयूऑल मॉक टेस्ट में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के परिणाम ईमेल के माध्यम से भेजेगा और संस्थान वेबसाइट पर विजिट करके अपने विद्यार्थियों के परिणाम डाउनलोड कर सकते हैं।
अश्विनी पुरोहित एवं सौरभ व्यास द्वारा स्थापित, विनयूऑल ट्यूटर्स एवं कोचिंग संस्थानों को सब्सक्रिप्शन मॉडल पर एसएएएस (सास) प्लग एंड प्ले प्लेटफॉर्म प्रस्तुत करता है। विनयूऑल ट्यूटर्स एवं कोचिंग संस्थानों को पूरी तरह से डिजिटाईज होने में मदद करता है। यह क्लास शेड्यूलिंग, बैच मैनेजमेंट, उपस्थिति, लाईव क्लास, ऑनलाइन क्विज, एआई आधारित प्रशस्ति, ऑनलाईन कोर्स, ऑनलाईन प्लेटफॉर्म का निर्माण आदि टूल्स प्रदान करता है। दैनिक गतिविधियों के प्रबंधन के अलावा, ट्यूटर्स को इस प्लेटफॉर्म पर अपने कोर्स पूरी दुनिया में बेचने और अन्य ट्यूटर्स के साथ गठबंधन करने का अवसर भी मिलता है।
विनयूऑल से देश में अनेक कोचिंग संस्थान जुड़ चुके हैं। 15,000 से ज्यादा ट्यूटर ऑनलाइन पढ़ाने, क्विज संचालित करने, शंका निवारण करने और अपने कोर्स बेचने के लिए इस प्लेटफॉर्म का विस्तृत उपयोग कर रहे हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान कंपनी के लाइव क्लास घंटों में भारी वृद्धि हुई और विनयूऑल प्लेटफॉर्म पर 11.3 करोड़ मिनट का अध्ययन ऑनलाइन कराया गया।
अश्विनी पुरोहित, सीईओ एवं सहसंस्थापक, विनयूऑल ने कहा, "यह मॉक टेस्ट जेईई मुख्य परीक्षा का प्रतिबिंब होगा और अनेक महत्वाकांक्षी विद्यार्थियों को परीक्षा के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करेगा। विद्यार्थियों को शॉर्टकट्स, टिप्स, एवं ट्रिक्स का लाभ भी मिलेगा और उन्हें कॉन्सेप्ट मजबूत करने तथा मुख्य प्रवेश परीक्षा में प्रभावशाली तरीके से सवालों को हल करने के लिए आवश्यक टूल्स भी मिलेंगे।
मृत्युंजय नारायणन, प्रेसिडेंट, कोचिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया ने कहा, "आईआईटी-जेईई भारत में सबसे कठिन व मुख्य इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में से एक है। आने वाले महीनों में बोर्ड की परीक्षाएं भी आयोजित हो रही हैं। इसलिए हर विद्यार्थी के लिए जरूरी है कि वह प्रभावशाली कार्ययोजना के साथ तैयारी करे, ताकि ज्वाईंट एंट्रैंस एक्जामिनेशन मेन (जेईई मेन) में उसके प्रवेश की संभावनाएं बढ़ सकें।" (आईएएनएस)
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
मैनपुर, 28 जनवरी। आदिवासी विकासखंड मैनपुर के दूरस्थ वनांचल ग्राम पंचायत कुचेंगा के आश्रित ग्राम नगबेल, भाठापानी, कुचेंगा, मौहानाला, गाजीमुड़ा, भदरीपारा, भूतबेड़ा, मोंगराडीह के सैकड़ों आदिवासी किसान गुरूवार को सुबह 11 बजे मैनपुर शहीद वीर नारायण चौक में एकत्र हुए और पूजा-अर्चना कर मैनपुर से गरियाबंद तक लगभग 47 किमी पदयात्रा शुरु की। समाचार लिखे जाने तक दोपहर 2 बजे सैकड़ों आदिवासी एवं किसान अपने क्षेत्र के मूलभूत समस्याओं को लेकर पदयात्रा करते हुए जिला मुख्यालय गरियाबंद के तरफ पैदल जा रहे हैं और गरियाबंद के कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर को अपने समस्याओं से अवगत कराकर समस्या समाधान करने की मांग करेंगे।
पदयात्रा का नेतृत्व कर रहे पूर्व जनपद सदस्य सुकचंद ध्रुव ने बताया कि पटवारी हल्का नंबर 8 के द्वारा लापरवाही बरतने के कारण कई किसान पंजीयन से वंचित हो गए हैं और समर्थन मूल्य पर मक्का नहीं बेच पा रहे हैं, जिससे क्षेत्र के किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई बार इस समस्या से स्थानीय अधिकारियों को अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई और न ही लापरवाह पटवारी के खिलाफ कार्रवाई किया गया, जिससे क्षेत्र के किसान परेशान हंै। किसानों के पंजीयन कराने की मांग के साथ लापरवाही बरतने वाले पटवारी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग को लेकर यह पदयात्रा किया जा रहा है।
श्री ध्रुव ने आगे बताया कि ग्राम नगबेल, भाठापानी, गरीबा, भूतबेडा, कुचेंगा, गाजीमुड़ा, भदरीपारा में अबतक बिजली नहीं लगी है। बिजली, सडक़ की मांग, अधूरे स्कूल भवन को पूरा करने के साथ मूलभूत समस्याओं को लेकर यह पदयात्रा किया जा रहा है।
पदयात्रा के दौरान नारेबाजी
मैनपुर से गरियाबंद तक क्षेत्र के सैकड़ों आदिवासी ग्रामीण किसानों ने पदयात्रा शुरु की है और जमकर नारेबाजी कर रहे हैं। सुरक्षा के लिहाज से मैनपुर पुलिस पूरी तरह मुस्तैद है। इस दौरान प्रमुख रूप से पूर्व जनपद सदस्य सुकचंद ध्रुव, जोहन लाल, बिसाहू राम, नोहर सिंह, मानसिंह, गिरधारी, बुध्दूराम, समूलाल, सुकचंद मरकाम, दसरथ, जानकी बाई, पदमा बाई, नरसिह, हीरालाल, धनसिंह, उदेसिंह, फगनू नेताम, सुकडू राम, सुरेन्द्र सहित सैकड़ो की संख्या में महिला पुरूष इस पदयात्रा में शामिल रहे।
नरेश शर्मा
रायगढ़, 28 जनवरी (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। दक्षिण पूर्व रेलवे के ब्रजराजनगर रेलवे स्टेशन पर आज सैकड़ों लोगों ने रेल रोका आंदोलन का आगाज करते हुए रेल यातायात को प्रभावित कर दिया और नाराज लोग पटरियों पर बैठकर रेल प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते नजर आए। ब्रजराजनगर के लोगों की नाराजगी का कारण यह था कि रेलवे ने यहां पुरी से हरिद्वार जाने वाली कलिंग उत्कल एक्सप्रेस एवं पुरी से जोधपुर जाने वाली एक्सप्रेस का ठहराव बंद कर दिया है। इन दोनों ट्रेनों के ठहराव बंद करने से रेल यात्रियों में आक्रोश है और उन्होंने सुबह से रेल रोको आंदोलन शुरू करते हुए दोनों ट्रेनों का ठहराव फिर से शुरू करने की मांग की है।
रेल विभाग से मिली जानकारी के अनुसार हाल ही में रेल्वे प्रशासन द्वारा गाड़ी संख्या 0877और 0878 पूरी हरिद्वार उत्कल एक्सप्रेस तथा गाड़ी संख्या 02093 और 02094 पुरी जोधपुर सुपरफास्ट ट्रेन के पुन: प्रारम्भ होने के बाद इनका ठहराव ब्रजराजनगर स्टेशन से समाप्त कर देने की जानकारी ब्रजराजनगर के स्थानीय लोगों को मिलने पर आज 28 जनवरी को ब्रजराजनगर के लोग और अन्य राजनीतिक दलों द्वारा अनिश्चितकालीन हड़ताल और रेल रोको आंदोलन की जानकारी मिलते ही रेल प्रशासन हरकत में आया, लेकिन तब तक सैकड़ों लोग रेलवे प्लेटफार्म में घुसकर नारेबाजी करते हुए पटरी पर बैठ गए, जिसके चलते कई यात्री टे्रनों को झारसुगड़ा, राउरकेला, संबलपुर के अलावा बिलासपुर जोन के बिलासपुर, रायगढ़, चांपा स्टेशन पर खड़ी कर रेल आंदोलन के समाप्त होने की प्रतीक्षा की जा रही है।
ब्रजराजनगर के मुख्य स्टेशन प्रबंधक श्री मांडली से ‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता ने चर्चा की तो उन्होंने बताया कि बुधवार को जिला प्रशासन झारसुगड़ा ने जिला मुख्यालय में एक बैठक बुलाई थी, जिसमें उन्हें बैठक में शामिल होने के लिए झारसुगड़ा जाना पड़ा था। बैठक शाम को साढ़े चार बजे शुरू हो गई लेकिन ये बैठक बेनतीजा रही। रेल रोको आंदोलन की जानकारी रेलवे के बड़े अधिकारियों को दी जा चुकी है और मौके पर जीआरपी, आरपीएफ की टीम पहुंच चुकी है और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने को कहा गया है।
चूंकि ब्रजराजनगर में दोनों ट्रेनों के ठहराव रद्द किए जाने से यात्रियों में बड़ी नाराजगी देखी जा रही है और इस रेलवे स्टेशन पर इन दोनों ट्रेनों के ठहराव के बाद एक्का-दुक्का एक्सप्रेस के अलावा पैसेंजर गाडिय़ां ही रूकती है। दोपहर एक बजे समाचार लिखे जाने तक रेल रोको आंदोलन जारी है और वरिष्ठ अधिकारियों के पहुंचने के बाद आंदोलनकारियों से चर्चा की संभावना भी जताई जा रही है।
'छत्तीसगढ़' संवाददाता
बालोद, 28 जनवरी। बालोद के करहीभदर के सरपंच की हत्या की गुत्थी पुलिस ने 6 घंटों में सुलझा ली है। जमीन विवाद हत्या की वजह थी। हत्या में शामिल 2 महिला समेत 7 आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
पुलिस के अनुसार 25 जनवरी को ग्राम चिरईगोड़ी खार में करहीभदर सरपंच ओंकार साहू की हत्या की सूचना मिली। जिस पर पुलिस अनुविभागीय अधिकारी बालोद दिनेश कुमार सिन्हा थाना बालोद पुलिस स्टाफ के साथ रवाना होकर घटना स्थल ग्राम चिरईगोड़ी खार में केनाल से लगभग 150 मीटर की दूरी, मृतक के हाल ही में खरीदे गये खेत पहुंचे। जहां देखा गया कि आरोपी अशोक कुमार साहू के टै्रक्टर तथा पीछे लगे हुए दतारी के बीच ट्रैक्टर के पीछे पहिया के पास सरपंच का शव खेत में धसा हुआ था, उसके शरीर का मात्र कुछ हिस्सा दिखाई दे रहा था, जबकि बाकि हिस्सा पूरी तरह गिली मिट्टी में नीचे धसा हुआ था।
शव को ग्रामीणों की सहायता से खेत की गीली मिट्टी से बाहर निकाला गया। शव को देखने पर ज्ञात हुआ कि मृतक ग्राम करहीभदर सरपंच ओंकार साहू की हत्या कर उसे खेत की गीली मिट्टी में दबा दिया गया है तथा टै्रक्टर को रिवर्स कर उसके पिछले हिस्से को चढ़ा कर दुर्घटना का रूप देने का प्रयास किया गया है। प्रार्थी पुरानिक राम साहू (56 वर्ष) ग्राम करहीभदर की रिपोर्ट पर अज्ञात आरोपियों के विरूद्ध जुर्म दर्ज किया गया।
जांच के दौरान पता चला कि हरिशचंद की भाभी नूतन साहू से 4-5 माह पूर्व खेत को ओंकार साहू के द्वारा खरीदे जाने के कारण हरिशचंद साहू के परिवार एवं ओंकार साहू का अक्सर वाद-विवाद होते रहता था। गत 25 जनवरी को ओंकार साहू अपने गांव के एक अन्य लडक़े के साथ चिरईगोड़ी अपने खेत को देखने आया था, उसी समय वहां अशोक साहू भी उसी खेत में बुआई करने आ गया, जिस पर दोनों के मध्य वाद विवाद एवं लड़ाई झगड़ा शुरू हो गया। इसी दौरान वहां पर अशोक साहू के अन्य परिजन हरिशचंद साहू, नेमीचंद साहू उर्फ नवीन साहू , हेमन्त साहू, कामता साहू, ईश्वरी साहू, सरस्वती साहू भी वहां आ गये, और ओंकार साहू ने हमारे जमीन पर कब्जा कर लिया है, हमेशा लड़ाई झगड़ा करता है कहते हुए सभी मिलकर डण्डा, एक लोहे के पाना और एक रापा (फावड़ा) से मार कर ओंकार साहू की हत्या कर दिये।
बालोद पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई करते हुए घटना के मात्र 6 घंटे के भीतर अपराध में शामिल सभी 7 संदेहियों अशोक कुमार साहू, हरिशचंद साहू, नेमीचंद साहू उर्फ नवीन साहू, हेमन्त कुमार साहू, कामता साहू, ईश्वरी साहू, सरस्वती साहू सभी निवासी चिरईगोड़ी थाना व जिला बालोद को पकडक़र थाना लाया गया। सभी आरोपियों ने पूछताछ करने पर अपराध करना स्वीकार किया। आरोपियों से हत्या में प्रयोग किए गए बांस के डण्डा, लकड़ी के डण्डा, एक लोहे के पाना और एक रापा (फावड़ा) तथा घटनास्थल में आने एवं घटना के बाद जाने के लिए प्रयोग किए गए 3 मोटर सायकल जब्त किया गया है। घटना स्थल से आरोपी के टै्रक्टर तथा मृतक के मोटर सायकल को भी जब्त किया गया। प्रकरण में 7 आरोपियों के विरूद्ध पर्याप्त साक्ष्य पाये जाने पर 26 जनवरी को गिरफ्तार कर न्यायालय के समक्ष पेश कर न्यायिक रिमाण्ड पर भेजा गया है।
कांकेर में धान से तौला गया
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 28 जनवरी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी पर्व परम्परा के अनुरूप गुरूवार को जिला मुख्यालय कांकेर के पुराने बस स्टेण्ड में मुख्य मार्ग की दुकानों और घरों में जाकर छेरछेरा पुन्नी का दान मांगा। महिलाओं ने तिलक लगाकर मुख्यमंत्री का स्वागत किया और उन्हें चावल, लड्डू, फल भेंट किए। छेरछेरा पर्व पर मुख्यमंत्री को धान से तौला गया। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर सभी लोगों को छेरछेरा पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि नई फसल के घर आने की खुशी में महादान का यह उत्सव पौष मास की पूर्णिमा को छेरछेरा पुन्नी तिहार के रूप में मनाया जाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छेरछेरा पुन्नी पर बच्चों, युवाओं, किसानों, मजदूरों और महिलाओं की टोली घर-घर जाकर छेरछेरा पुन्नी का दान मांगते हैं। इस पर्व में समानता का भाव प्रमुखता से उभर कर सामने आता है। धनी और गरीब व्यक्ति एक दूसरे के घर दान मांगने जाते हैं और दान में एकत्र धान, राशि और सामग्री गांवों में रचनात्मक कार्यों में लगाई जाती है। उन्होंने कहा कि छेरछेरा के महादान की परम्परा की यह भावना है कि किसानों द्वारा उत्पादित फसल केवल उसके लिए नहीं अपितु समाज के अभावग्रस्त और जरूरतमंद लोगों, कामगारों और पशु-पक्षियों के लिए भी काम आती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष अनेक चुनौतियों के बावजूद राज्य सरकार द्वारा अब तक 89 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई है। इस वर्ष धान खरीदी का एक नया रिकार्ड बनेगा। मुख्यमंत्री और अतिथियों ने लोगों को शुभकामनाएं देते हुए ‘छेरछेरा, कोठी के धान ल हेरहेरा‘ का घोष किया। इस अवसर पर ग्रामोद्योग और कांकेर जिले के प्रभारी मंत्री गुरू रूद्र कुमार, उद्योग मंत्री कवासी लखमा, विधानसभा उपाध्यक्ष मनोज मण्डावी, संसदीय सचिव शिशुपाल सोरी, विधायक मोहन मरकाम और संतराम नेताम तथा मुख्यमंत्री के सलाहकार राजेश तिवारी भी उपस्थित थे।
-ज़ुबैर अहमद
सोमवार को इस साल का केंद्रीय बजट ऐसे समय में पेश किया जाएगा जब आधिकारिक तौर पर भारत पहली बार आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रहा है.
आकलन है कि वित्त वर्ष 2020-21 का अंत अर्थव्यवस्था के 7.7 प्रतिशत तक सिकुड़ने के साथ पूरा होगा.
हालांकि दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार साल 2021-22 में विकास दर 11 प्रतिशत से अधिक होने की आशा है लेकिन पर्यवेक्षकों ने चेतावनी दी है कि अगर इस बजट में सरकार ने भारी मात्रा में स्पेंडिंग नहीं की तो अर्थव्यवस्था को विकास के पथ पर वापस लाने में दिक़्क़त होगी.
लंबे समय से साल दर साल बजट का विश्लेषण करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रंजन दास, ज़ोर देकर कहते हैं कि ये "समय बड़े फ़ैसलों का है."
बजट की तैयारियाँ जारी हैं. नए आइडिया पर बात हो रही है. सरकारी सूत्रों ने पुष्टि की है कि कोरोना कर पर गंभीरता से विचार हो रहा है और ये "अधिकतम तीन साल" के लिए लगाया जा सकता है. सूत्र कहते हैं, "कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिए यह कर टैक्स देने वाले आम लोगों से अधिक हो सकता है."
सरकार के सामने समस्याएँ अनेक
आज़ाद भारत में शायद ही किसी भी वित्त मंत्री को इतनी अधिक और इतनी जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा जितना निर्मला सीतारमण को सामना करना पड़ रहा है.
उनकी दिक़्क़तों पर ज़रा ग़ौर करें - ताज़ा बजट कोरोना महामारी के कारण पैदा हुई परिस्थिति के बीच तैयार किया जा रहा है. देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति डांवाडोल है. कोरोना के कारण 1.5 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और एक करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं. सरकार के सामने कमज़ोर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का पुनर्निर्माण करना है. देश की राजधानी की सीमा पर दो महीनों से किसान कृषि बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं. चीन के साथ सीमा पर तनाव महीनों से जारी है. और सबसे अहम बात यह है कि सरकारी ख़ज़ाने में पैसे नहीं हैं.
निर्मला सीतारमण ने वादा किया है कि इस बार का बजट का सबसे अलग होगा, इस सदी का सबसे बेहतर. लेकिन ये तो 1 फ़रवरी को समझ में आएगा कि उनके दावों में कितना दम है.
लेकिन अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात पर आम सहमति है कि बजट कोई जादू की छड़ी नहीं होती है.
मुंबई स्थित चूड़ीवाला सिक्योरिटीज़ के अध्यक्ष आलोक चूड़ीवाला का कहना है कि महामारी के प्रभाव से जूझने के लिए एक बजट पर्याप्त नहीं है.
वो कहते हैं, "किसी भी टूटी हुई अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में एक लंबा समय लगता है, लेकिन अगर हमारा इरादा सही है और हम सही फ़ैसले ले रहे हैं इसका पता एक बजट में चल जाता है."
प्रिया रंजन दास को इस बार के बजट से बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है क्योंकि उनका मानना है कि बजट के बारे में उम्मीदें अधिक है.
वो कहते हैं, "मुझे बहुत उम्मीद नहीं है. मुझे हेडलाइन मैनेजमेंट ज़्यादा दिखाई दे रहा है. सदी के सबसे अच्छे बजट को पेश करने जैसे वित्त मंत्री के बयान हल्के शब्द हैं. मुझे इस सरकार से अर्थव्यवस्था के कुशल प्रबंधन और वर्तमान चुनौतियों में खरा उतरने की उम्मीद नहीं है."
वो कहते हैं कि आम तौर पर बजट जितना ही आर्थिक विकास के बारे में होता है उतना ही केंद्र सरकार की तरफ़ से दिया गया एक सियासी बयान भी होता है. ये भी आम बात है कि हर साल बजट के सारे वादे पूरे नहीं होते.
वो कहते हैं कि "बजट से पहले वित्त मंत्री ने सभी उचित बातें ही कही हैं. उन्होंने कहा है कि उनकी प्राथमिकताएं विकास को पुनर्जीवित करना, महामारी प्रभावित क्षेत्रों में सहायता प्रदान करना और रोज़गार के अवसर पैदा करना हैं."
लेकिन इन इरादों को अमल में लाना कितना मुश्किल होगा? दूसरे शब्दों में, उन्हें बजट के लिए किन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना है?
कुछ आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रोज़गार के नए अवसर पैदा करना है. रिकॉर्ड के लिए, साल 2012 में देश में बेरोज़गारी दर दो प्रतिशत थी. आज यह 9.1 प्रतिशत है. बेशक यह समस्या दुनिया भर में है लेकिन कई देशों ने बेरोज़गारी से निपटने के लिए उचित कदम उठाए हैं.
प्रिया रंजन दास कहते हैं कि रिकॉर्ड बेरोज़गारी की समस्या का हल निकालना वित्त मंत्री का सबसे बड़ा सिरदर्द है. वह कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती ये तथ्य है कि नीति निर्माता बेरोज़गारी को एक बड़ी चुनौती के रूप में मान्यता नहीं देते हैं. ये वर्तमान में रिकॉर्ड स्तर पर है. ये Covid-19 के पहले ही 45 साल के रिकॉर्ड स्तर पर था. और महामारी के बाद और भी बिगड़ गया है."
केंद्र सरकार का तर्क है कि बेरोज़गारी की समस्या वर्षों से जारी है और यह कोई नई बात नहीं है. प्रिया रंजन दास कहते हैं, "इसलिए सरकार इस समस्या का मुक़ाबला करने वाली नहीं है क्योंकि ये इसे गंभीरता से नहीं ले रही है. असली चुनौती तेज़ी से बढ़ती बेरोज़गारी है. हाँ, यह वर्षों से एक समस्या है लेकिन कोविड-19 के कारण ये हमारी सबसे बड़ी समस्या बन गई है."
आलोक चूड़ीवाला भी बेरोज़गारी को एक बहुत ही गंभीर चुनौती मानते हैं. उनके अनुसार लॉकडाउन के दौरान कई लाख मज़दूर अपने घरों को वापिस लौट गए जिनमें से अधिकांश अब भी काम पर वापस नहीं लौटे हैं.
उनका कहना है कि इन मज़दूरों को उनके गाँवों में रोज़गार देना या उनकी शहरों में नौकरियों में वापसी सरकार की एक बड़ी चुनौती होगी.
मंदी से अच्छी गति से कैसे उबरें और आगे बढ़ें
प्रिया रंजन दास कहते हैं कि महामारी से हुए नुक़सान से उबरना और विकास दर को गति देना वित्त मंत्री की दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का अनुमान है कि लॉकडाउन और महामारी के कारण भारत ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का चार प्रतिशत खो दिया है.
कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि महामारी से पहले अर्थव्यवस्था जहाँ थी, इसे वहां तक पहुँचने के लिए तीन साल तक निरंतर 8.5 प्रतिशत वृद्धि की ज़रूरत होगी.
आलोक चूड़ीवाला कहते हैं कि वित्त मंत्री के सामने मुख्य चुनौती ये है कि अर्थव्यवस्था को विकास के रास्ते पर फिर से कैसे लाया जाए.
वह कहते हैं, "ऐसा करने के लिए, सरकार को बजट में एक बड़े आर्थिक पैकेज के साथ आने की ज़रूरत है जिससे बड़े पैमाने पर मांग को बढ़ावा मिल सकेगा."
अब तक कोरोना महामारी के असर से लड़ने में सरकार आर्थिक रूप से अनुदार रही है और उसने बेहद सावधान से कदम बढ़ाए हैं. अधिकतर आर्थिक विशेषज्ञों का तर्क है कि मोदी सरकार के लिए राजकोषीय अनुशासन के बारे में बहुत अधिक परवाह किए बिना बड़े पैमाने पर ख़र्च करने की ज़रुरत है.
वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ और पत्रकार आशीष चक्रवर्ती कहते हैं, "ये असाधारण समय हैं और केवल भारत में नहीं बल्कि दुनिया में हर जगह है. सरकार अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों की चिंता न करे. बस ख़र्च करें. ग़रीबों और छोटे व्यवसाय वालों के पॉकेट में पैसे आने चाहिए. रेटिंग एजेंसियाँ हमारे वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठाएंगी. लेकिन अगले तीन-चार साल तक हमें उन्हें अनदेखा करना चाहिए."
वह कहते हैं, "निर्मला सीतारमण को इस बजट को पहले के सालों से अलग कर के देखना चाहिए. हम 2020 में बहुत हाथ रोक कर ख़र्च कर रहे थे. लेकिन जैसा कि लोगों को डर था इससे मांग को बढ़ाने में मदद नहीं मिली और खपत (consumption) लगातार सुस्त रही है."
जैसा कि वो कहते हैं, "मैं बिना सोचे समझे खर्च की वकालत कतई नहीं कर रहा हूं. मैं स्मार्ट तरीके लेकिन तुरंत ख़र्च करने का बात पर ज़ोर दे रहा हूं ताकि हम मार्केट में मांग उत्पन्न कर सकें, सकारात्मकता फैला सकें और खपत पैदा कर सकें. फिलहाल के लिए ख़र्च करना आर्थिक विकास का प्रमुख चालक होगा."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल मई में 20 लाख करोड़ रुपये ख़र्च करने की घोषणा की थी और इसे स्टिमुलस पैकेज कहा था. जनधन और दूसरी योजनाओं के तहत सरकार ने हाशिये पर रह रहे ग़रीबों के खातों में कुछ पैसे डाले लेकिन इससे मांग बढ़ने वाली नहीं थी क्योंकि मदद की राशि बहुत कम थी और ये समाज के सभी ग़रीबों को नहीं मिली.
छोटे व्यापारियों को कोई मदद नहीं मिली. बाद में बैंकों में नकदी तो आई लेकिन छोटे व्यापारियों को इतना नुक़सान हुआ था कि वो बैंकों से क़र्ज़ लेने की स्थिति में भी नहीं थे.
इसके अलावा, छोटे और मध्यम व्यवसायों को जो मिला, वह कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तरह, एक बार की नकद सहायता भी नहीं थी, लेकिन सरकारी प्रयासों ने उनके लिए बाज़ार में पर्याप्त तरलता पैदा की.
चक्रवर्ती कहते हैं, "सरकार के पैकेज का फोकस सप्लाई साइड को मज़बूत करना था जो इसने किया भी. लेकिन डिमांड साइड पर ध्यान नहीं दिया गया. और जैसा कि आप देख सकते हैं कि इस तरह के धूमधाम के साथ लॉन्च किए गए आर्थिक पैकेज ने मांग को आगे नहीं बढ़ाया. वित्त मंत्री को मांग को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की ज़रुरत है."
दास का तर्क है कि किसी भी नकद पैकेज को रोज़गार से जोड़ा जाना चाहिए. वो कहते हैं, "जैसे कि ग्रामीण इलाकों के ग़रीब मज़दूरों के लिए मनरेगा योजना है जिसके तहत तीन महीने की रोज़गार की गारंटी है."
मूल न्यूनतम सार्वभौमिक आय
प्रिया रंजन दास का कहना है कि सरकार को हिम्मत दिखानी चाहिए और ये मान कर बजट बनाना चाहिए कि विभिन्न-कुशल वाले श्रमिकों के लिए बुनियादी न्यूनतम सार्वभौमिक आय योजना को शुरू करने का ये सबसे अच्छा समय है.
वो कहते हैं, "ये एक साहसिक क़दम ज़रूर होगा लेकिन सही क़दम होगा. बैंक खातों में नकद मदद भेजने की ज़रुरत नहीं है. ये मनरेगा की तरह एक रोज़गार गारंटी योजना से जुड़ा होना चाहिए."
मनरेगा के तहत मज़दूरी के बदले मज़दूरों के खातों में सीधे पैसे जा रहे हैं. वो कहते हैं, "प्रस्तावित योजना कौशल के विभिन्न स्तरों के श्रमिकों और ग्रामीण और शहरी श्रमिकों के लिए होनी चाहिए. और वर्ष में 100 दिनों के लिए रोज़गार की गारंटी हो".
उनका मानना है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति है तो वित्त मंत्री ऐसा कर सकती हैं.
वो कहते हैं, "देखिये भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े गारंटी देने वाले रोज़गार कार्यक्रम मनरेगा को लागू करने और इसे सालों से चलाने का अनुभव है और ये ऐसी योजना है जिसने ग़रीबी रेखा के नीचे से 17 करोड़ लोगों के जीवनस्तर को बेहतर करने योगदान दिया है. हमारे पास तजुर्बा है, हम इस तरह की दूसरी योजना भी शुरू कर सकते हैं."
प्रिया रंजन दास ऐसा नहीं मानते. वो कहते हैं, "सरकार संसाधन जुटा सकती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कम कीमतों के दौरान भारत सरकार ने चुपचाप अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के माध्यम से 20 लाख करोड़ रुपये जुटाए हैं. हमें दिमाग़ लगा कर सोचने की ज़रुरत है. संसाधन जुटाना कई साल पहले एक बड़ी समस्या हुआ करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है."
वो अपने तर्क के पक्ष में कहते हैं, "यदि आप 20 लाख करोड़ रुपये के आत्मनिर्भारता पैकेज (12 मई 2020 को इसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने की थी) को देखें तो आप समझ जाएंगे कि संसाधन समस्या नहीं हैं. यदि आपके पास इच्छाशक्ति है तो आप संसाधन जुटा सकते हैं."
भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार केवी सुब्रमण्यम ने पिछले साल जुलाई में कहा था कि जब कोरोना के टीके उपलब्ध होंगे तो एक भारी स्टिमुलस पैकेज के लिए सही समय होगा. फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) द्वारा आयोजित एक वेबिनार में, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि ये 'अगर' का प्रश्न नहीं था, ये 'कब' का सवाल है.
अब भारत में कोरोना का टीका लोगों को दिया जा रहा है और चक्रवर्ती को उम्मीद है कि वित्त मंत्री "एक बड़े पैकेज का एलान कर सकती हैं."
हालांकि आलोक चुड़ीवाला मानते हैं कि नकदी के लिए सरकार के पास सीमित विकल्प हैं.
वो कहते हैं "सरकार के पास नकदी की समस्या है. सरकार को हर क़दम फूंक-फूंक कर आगे बढ़ाना पड़ेगा. आय कर नहीं बढ़ाना चाहिए. शायद कोरोना टैक्स सही होगा क्योंकि हमें अगले कुछ सालों में ढेर सारे पैसे चाहिए."
आम तौर से केंद्र सरकार के पास पैसे कमाने के पांच मुख्य ज़रिए होते हैं - (1) जीएसटी से 18.5 प्रतिशत, (2) कॉर्पोरेट टैक्स से 18.1 प्रतिशत, (3) व्यक्तिगत आयकर से 17 प्रतिशत, (4) एक्साइज़ ड्यूटी से 11 प्रतिशत और (5) सीमा शुल्क से 5.7 प्रतिशत.
पिछले कुछ महीनों में जीएसटी संग्रह में तेज़ी आई है. सरकार को व्यक्तिगत आयकर को बढ़ाने के बजाय और अधिक लोगों से टैक्स वसूली करने की ज़रुरत है.
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) द्वारा जारी किए गए 2018-19 की टैक्स ब्रेकअप पर एक रिपोर्ट के अनुसार 5.78 करोड़ लोगों ने अपना आयकर रिटर्न दाख़िल किये थे जिनमें से लगभग 1.46 करोड़ लोगों ने टैक्स दिए.
लगभग 1 करोड़ लोगों ने 5-10 लाख रुपये के बीच टैक्स दिए और बाक़ी 46 लाख व्यक्तिगत करदाताओं ने 10 लाख रुपये से ऊपर की आय पर टैक्स दिया. लगभग 135 करोड़ लोगों के देश में वास्तव में करों का भुगतान करने वालों की संख्या इतनी नगण्य है.
यदि सरकार कोरोना-टैक्स लगाने का फ़ैसला करती है तो इसका बोझ करदाताओं के इस छोटे समूह पर पड़ेगा.
विनिवेश और निजीकरण लक्ष्य
सरकार के लिए पैसे कमाने के और भी तरीके हैं. अगर निर्मला सीतारमण चाहें तो पब्लिक सर्विस अंडरटेकिंग्स में स्टेक्स बेचकर, एयर इंडिया जैसी कुछ कंपनियों का निजीकरण करके और सरकारी प्राइम प्रॉपर्टीज को नीलाम करके अरबों रुपये हासिल कर सकती हैं. वित्तीय मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि इस बार के बजट में विनिवेश और निजीकरण पर काफ़ी ज़ोर होगा.
लेकिन सरकार इस क्षेत्र में अब तक बहुत कामयाब नहीं रही है. पिछले साल के बजट में सरकार ने विनिवेश और निजीकरण से कमाने का लक्ष्य 215 लाख करोड़ रुपये रखा था लेकिन केवल 30,000 करोड़ रुपये का ही विनिवेश हो सका. महामारी इसका बड़ा कारण था लेकिन इसके पहले वाले सालों में भी सरकार ने अपना लक्ष्य हासिल नहीं किया था. इस साल के बजट में विनिवेश, निजीकरण और सरकारी संपत्तियों की नीलामी के प्रावधान से सरकारी हलकों में उम्मीद पैदा हुई है कि इससे सरकारी ख़ज़ाने में पैसे आएंगे.
वित्त मंत्रालय के एक सूत्र ने हाल ही में बीबीसी को बताया, "विनिवेश पर अधिक ध्यान दिया जाएगा, जिसका पैमाना शायद पहले कभी नहीं देखा गया है".
आलोक चुड़ीवाला इस तथ्य पर अफ़सोस जताते हैं कि मोदी सरकार विनिवेश लक्ष्यों को हासिल करने में अक्सर नाकाम रही है लेकिन इस बार उन्हें यक़ीन है कि ये लक्ष्य पूरा होगा क्योंकि इसे नकदी की ज़रूरत है और इसलिए भी कि ये अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखा रही है
प्रिया रंजन दास को सरकार में विनिवेश के लिए उच्च लक्ष्य से कोई शिकायत नहीं.
वह कहते हैं, "किसी भी सरकार के तहत विनिवेश लक्ष्य पूरा नहीं किया जाता है. लेकिन उच्च लक्ष्य करने में कोई बुराई नहीं है. यह संसाधन जुटाने का एक तरीका है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण नहीं है."
सरकारी की थिंक टैंक नीति आयोग ने विनिवेश के लिए 50 से अधिक सरकारी कंपनियों के निजीकरण और विनिवेश की सिफ़ारिश की है.
क्या कोरोना टैक्स लगाना एक चुनौती होगी?
आलोक चुड़ीवाला मानते हैं कि पैसे जुटाने के लिए अगर सरकार कोरोना-टैक्स लगाने के बारे में फ़ैसला करती है तो इससे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.
प्रिया रंजन दास भी कहते हैं कि वो कोरोना-टैक्स देने से पीछे नहीं हटेंगे. वो कहते हैं, "शिक्षा टैक्स कामयाब रहा है. कोरोना-टैक्स हमारे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को बेहतर बनाने और टीकाकरण अभियान को आगे बढ़ाने में मदद करेगा. जब आप स्वास्थ्य संकट के बीच होते हैं तो इसके लिए ख़र्च में वृद्धि को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए. मैं कोरोना-टैक्स के पक्ष में हूं."
लेकिन वित्त मंत्रालय ने इस पर अभी निर्णय नहीं लिया है. फ़िलहाल इस पर विचार विमर्श जारी है.
चीनी ऐप टिकटॉक की पेरेंट कंपनी बाइट डांस ने सात महीनों के बैन के बाद आख़िरकार अपने भारतीय कर्मचारियों की छुट्टी करना शुरू कर दिया है.
भारत सरकार ने पिछले साल जून महीने में 59 चीनी ऐप्स को बैन कर दिया था.
अंग्रेजी अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक़, भारत सरकार ने टिकटॉक समेत दूसरे ऐप्स पर स्थायी प्रतिबंध लगा दिया है.
कंपनी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है, "हमने लगातार अपनी ऐप्स को स्थानीय क़ानूनों और नियमों के अनुसार ढालने की कोशिश की. और (सरकार की) उन सभी चिंताओं को दूर करने की कोशिश की. ऐसे में ये निराश करने वाला है कि बीते सात महीनों में हमारे प्रयासों के बावजूद हमें अब तक स्पष्ट रूप से ये नहीं बताया गया है कि हमारी ऐप्स को कब और कैसे दोबारा अनुमति मिल सकती है."
कंपनी ने कहा है कि उन्हें काफ़ी दुख के साथ ये कहना पड़ रहा है कि आधे साल से ज़्यादा समय तक भारत में दो हज़ार से ज़्यादा कर्मचारियों की मदद करने के बाद आख़िरकार उन्हें अपने कर्मचारियों की संख्या कम करनी पड़ रही है. (bbc.com)


