विचार/लेख
पाकिस्तान में आयोजित एससीओ (शंघाई कोऑपरेशन कॉर्पोरेशन) की बैठक खत्म हो गई है लेकिन इसमें शामिल होने गए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की चर्चा अब भी जारी है।
पिछले साल पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री बिलावल जरदारी भुट्टो जब एससीओ की बैठक में गोवा आए थे तो काफी तनातनी थी, लेकिन इस बार इस्लामाबाद में बिल्कुल अलग माहौल था।
एस जयशंकर ने अपनी बात कही लेकिन पाकिस्तान पर सीधी उंगली उठाने वाली कोई बात नहीं कही। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी एससीओ को संबोधित किया लेकिन उन्होंने भी भारत पर कोई निशाना नहीं साधा और न ही कश्मीर का मुद्दा उठाया।
एस जयशंकर जब बुधवार को इस्लामाबाद से दिल्ली वापस लौटे तो ट्वीट कर शहबाज शरीफ और पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक डार को खातिरदारी के लिए शुक्रिया कहा। इसहाक डार ने भी एस जयशंकर को पाकिस्तान आने के लिए शुक्रिया कहा।
एससीओ समिट में भारत से पाकिस्तान एक दर्जन पत्रकार गए थे। इन पत्रकारों का भी कहना है कि इस बार माहौल बिल्कुल अलग था। एस जयशंकर के आने को लेकर काफी हलचल थी।
पाकिस्तान में एससीओ समिट कवर करने एनडीटीवी इंडिया के पत्रकार उमाशंकर सिंह भी गए थे। उमाशंकर कहते हैं, ‘इस बार माहौल अच्छा था। गोवा से बिल्कुल अलग। दोनों देशों ने अपनी बातें कहीं लेकिन बिना किसी को निशाने पर लिए। कऱीब दस साल बाद भारत का कोई विदेश मंत्री पाकिस्तान गया था। इसे लेकर भारत में भी लोगों की काफ़ी दिलचस्पी थी और पाकिस्तान में तो थी ही। दोनों देशों के संबंधों के लिए यह अच्छा दौरा था।’
माहौल बिल्कुल अलग
उमाशंकर सिंह कहते हैं, ‘मैं भी नौ साल बाद पाकिस्तान गया था। इसके पहले मैं कई बार चा चुका हूँ। पाकिस्तान जाना हमेशा से अच्छा अनुभव रहा है।’
इंडिया टुडे ग्लोबल की हेड गीता मोहन भी एससीओ समिट कवर करने इस्लामाबाद गई थीं। गीता मोहन से पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार हामिद मीर ने जियो न्यूज के लिए बातचीत की।
हामिद मीर ने पूछा कि जयशंकर साहब ने यहाँ से जाने के बाद बहुत अच्छा ट्वीट किया। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री को शुक्रिया कहा है। आपका इस ट्वीट पर क्या कहना है?
इसके जवाब में गीता मोहन ने कहा, ‘मैंने हाल-फि़लहाल में जितने भी इवेंट देखे हैं, जिनमें एक रूम में पाकिस्तान और भारत दोनों होते हैं, वहाँ का माहौल बहुत सद्भावनापूर्ण तो होता नहीं है। ये पहली बार है, जब जयशंकर के आने से लेकर जाने तक माहौल ख़ुशनुमा था। कुछ साइडलाइन मीटिंग्स भी हुईं।’
गीता मोहन कहती हैं, ‘आप शहबाज शरीफ और एस जयशंकर के बयान को देखिए तो साफ पता चलता है कि दोनों के तेवर नरम जरूर पड़े हैं। फिर मुझे पता चला कि लंच के दौरान वेटिंग रूम में भी शहबाज शरीफ के साथ एस जयशंकर की बात हुई। लंच के दौरान का विजुअल भी है कि इसहाक़ डार और एस जयशंकर साथ बैठे हुए हैं और बात कर रहे हैं। ये केवल अनौपचारिक गपशप नहीं है बल्कि इससे ज़्यादा है। शायद बेहतर रिश्ते का आग़ाज़ है। जयशंकर ने भारत की नीति पर ही अपनी बात कही है।’
उम्मीदें बढ़ीं
गीता मोहन ने कहा, ‘जयशंकर ने सीमा पार आतंकवाद की बात की और चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर की भी बात की। ये ज़रूर है कि उन्होंने चीन और पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। लेवल ऑफ इंगेजमेंट तो बदला है। इमरान खान की सरकार के दौरान रिश्ते बहुत खराब थे।’
‘जब आपके यहाँ गठबंधन की सरकार थी और बिलावल पाकिस्तान के विदेश मंत्री के रूप में गोवा आए थे तो एक्सचेंज ऑफ वर्ड बहुत ही खराब थे। बिलावल को तो गोवा में शुक्रिया कहने का भी मौका नहीं मिला। शरीफ़ परिवार सरकार में होता है तो भारत के साथ संबंध अच्छे रहते हैं।’
गीता मोहन ने कहा, ‘जियोपॉलिटिक्स बदल रही है। इसराइल हमास युद्ध हो या यूक्रेन-रूस युद्ध हो दोनों में एससीओ की अहम भूमिका होगी। 2017 में भारत और पाकिस्तान जब एससीओ के सदस्य बन रहे थे तो दोनों देशों के सामने शर्त थी कि वे अपने द्विपक्षीय मुद्दों को नहीं उठाएंगे।’
वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त भी इस्लामाबाद एससीओ कवर करने गई थीं। बरखा दत्त ने इस्लामाबाद में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम नवाज से मुलाकात की थी। बरखा दत्त ने इस मुलाक़ात की तस्वीर भी पोस्ट की थी।
पाकिस्तान के न्यूज चैनल आज टीवी ने बरखा से इस मुलाक़ात को लेकर बात की। बरखा ने कहा, ‘नवाज शरीफ ने मुझसे ऑन द रिकॉर्ड बात की। वे ऑन कैमरा नहीं आए लेकिन उन्होंने कहा कि जो भी कह रहे हैं, वो ऑन रिकॉर्ड है। उन्होंने कहा कि आप मुझे बेशक कोट कर सकती हैं। नवाज़ शरीफ़ ने बहुत ही दिलचस्प बात कही। शरीफ ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ आए होते तो बहुत अच्छा होता। शरीफ़ ने कहा कि एक और मौका आएगा जब पीएम मोदी से बात होगी।’
यूएनजीए से बिल्कुल अलग माहौल
बरखा दत्त ने कहा, ‘नवाज शरीफ ने पाकिस्तान की गलतियां भी मानीं। मैं अटारी-बाघा से आई। एक समय था जब यहाँ से सैकड़ों ट्रक दोनों देशों के बीच चलते थे। हालात बहुत सामान्य नहीं थे तब भी जयशंकर पाकिस्तान आए। जब मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो नवाज शरीफ ने गर्मजोशी से स्वागत किया था और पीएम मोदी ने भी उदारता से स्वीकार किया था।''
‘सबसे बड़ा सवाल है कि नवाज़ शरीफ़ रिश्ते सुधारने के लिए कोई क़दम उठाएंगे तो उन्हें फौज से कितना समर्थन मिलेगा। नवाज़ शरीफ़ बहुत बार अच्छे संबंध की बात कर चुके हैं लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होती है।’
पाकिस्तान के एआरवाई न्यूज चैनल के पत्रकार काशिफ अब्बासी ने अपने शो में बरखा दत्त और नवाज शरीफ की मुलाकात पर टिप्पणी करते हुए कहा, ‘यही मुलाकात अगर 2016-17 में हुई होती तो लोग कहते कि मियां नवाज शरीफ मुल्क के दुश्मन हैं क्योंकि हिन्दुस्तानी पत्रकारों के साथ मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ साजिश कर रहे थे। देखिए अब वक्त बदल गया और इस मुलाकात को दोस्ती मुकम्मल करने के रूप में देखा जा रहा है।’
काशिफ अब्बासी ने कहा, ‘मियां साहब पाकिस्तानी पत्रकारों से मुलाकात नहीं करते हैं। मैं तो कहूंगा कि मियां साहब हमें भी इंटरव्यू का मौका दीजिए आप निराश नहीं होंगे।’
भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की डिप्लोमैटिक अफेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर भी पाकिस्तान गई थीं।
उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘सबसे दिलचस्प है कि कुछ हफ्ते पहले ही न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए शहबाज शरीफ और एस जयशंकर ने एक-दूसरे पर तीखा हमला किया था।’
‘लेकिन एससीओ में माहौल बिल्कुल अलग था। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान ने अनुच्छेद 370 हटाने के बाद जो कड़ा रुख अपनाया था, वो अब नरम पड़ेगा? क्या पाकिस्तान भारत से ट्रेड और डिप्लोमैटिक संबंध बहाल करेगा? अब तो जम्मू-कश्मीर में चुनाव भी हो गया है और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात हो रही है।’
सुहासिनी हैदर ने आज टीवी से बातचीत में कहा, ‘जयशंकर ने पहले ही कहा था कि पाकिस्तान से सकारात्मक चीज़ें आएंगी तो भारत भी सकारात्मक रहेगा। ऐसे में ट्रेड तो पाकिस्तान ने कैंसल किया था तो बहाल भी उसे ही करना है। भारत को नेताओं के लिए ये दुविधा होती है कि हम रिश्ते सुधारने की बात शुरू करें और फिर से आतंकवादी हमला हो जाए तो फिर क्या जवाब देंगे।’
न्यूज़ 18 के पत्रकार अभिषेक झा भी इस्लामाबाद पहुँचे थे। उन्होंने पाकिस्तानी न्यूज चैनल जियो न्यूज़ से बात करते हुए कहा, ‘पिछले कुछ हफ्तों से भारत और पाकिस्तान में जयशंकर के दौरे को लेकर कई तरह की बातें कही जा रही थीं लेकिन यहाँ माहौल बिल्कुल अलग था।’
‘ये तभी मुमकिन हो पाता है, जब दोनों मुल्कों के बीच आगे बढऩे को लेकर सहमति होती है। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के मीडिया में नैरेटिव बिल्कुल अलग होता है। मैं यहाँ इस्लामाबाद आया था तो तक्षशिला जाने का बहुत मन था। यह साझा इतिहास है। लेकिन मैं वहाँ नहीं जा सकता। रिश्ते लोगों के आपसी संपर्क से ही बेहतर होंगे। ’(bbc.com/hindi)
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर सुबह-सुबह पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग के कैंपस में मॉर्निंग वॉक कर रहे थे। उन्होंने इसकी तस्वीर अपने एक्स अकाउंट से पोस्ट की।
पाकिस्तान के राजनीतिक टिप्पणीकार क़मर चीमा ने इस तस्वीर पर कहा, ‘जयशंकर साहब को रात में अच्छी नींद आई तभी इतनी सुबह-सुबह जगकर मॉर्निंग वॉक कर रहे हैं। उन्होंने पूरे उच्चायोग को भी सुबह-सुबह जगा दिया।’
‘जयशंकर और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के हाथ मिलाने की तस्वीर में भी भरोसा दिख रहा है। जयशंकर ने सप्लाई चेन की बात की जो बहुत ही अहम है। उन्होंने बिल्कुल सीधी बात कही है। जयशंकर ने कहा कि ईमानदार बातचीत होनी चाहिए। जयंशकर ने पाकिस्तान को मुबारकबाद भी दी।’
एससीओ यानी शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन का 23वां सम्मेलन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज यानी 16 अक्तूबर को संपन्न हो गया।
एससीओ के सदस्य चीन, भारत, रूस, पाकिस्तान, ईरान, कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और बेलारूस हैं। इसके अलावा 16 अन्य देशों को ऑब्ज़र्वर या डायलॉग पार्टनर का दर्जा मिला हुआ है।
एससीओ समिट के लिए इन सभी देशों के प्रतिनिधि पाकिस्तान आए हैं और भारत से विदेश मंत्री एस जयशंकर गए थे। भारत से किसी भी विदेश मंत्री का यह पाकिस्तान दौरा कऱीब 10 साल बाद हुआ। जयशंकर पाकिस्तान में चर्चा के केंद्र में हैं।
पाकिस्तान के मीडिया में जयंशकर को लेकर काफ़ी कुछ कहा जा रहा है।
वहाँ के पत्रकार और पूर्व डिप्लोमैट भी जयशंकर को ख़ासा तवज्जो दे रहे हैं।
कई लोग हैरानी जता रहे हैं कि जयशंकर जिस अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं, वैसा कुछ भी उन्होंने पाकिस्तान में नहीं कहा।
जयशंकर के भाषण से राहत?
कई लोग तारीफ कर रहे हैं कि जयशंकर ने पाकिस्तान को एससीओ के अच्छे आयोजन के लिए क्रेडिट दिया और मुबारकबाद दी।
एससीओ को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड की जमकर तारीफ की।
शहबाज शरीफ ने कहा, ‘चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर अब दूसरे चरण में है। मुझे लगता है कि इस प्रोजेक्ट को संकीर्ण सियासी नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। हमें न केवल क्षेत्रीय कारोबार को बढ़ाने की जरूरत है बल्कि यूरेशिया को जोडऩे की ज़रूरत है।’
एससीओ को एस जयशंकर ने संबोधित करते हुए कहा, ‘सहयोग पारस्परिक आदर और संप्रभु समानता के आधार पर होना चाहिए। क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के सम्मान से ही सच्ची साझेदारी मजबूत हो सकती है न कि किसी के एकतरफ़ा एजेंडा से। एससीओ का विकास और विस्तार अपने फ़ायदे वाली नीतियों से नहीं हो सकता, खासकर ट्रेड और ट्रांजिट के मामले में।’
जयशंकर ने भले किसी भी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन भारत बेल्ट एंड रोड का विरोध करता रहा है। बेल्ट एंड रोड के तहत ही चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर परियोजना चल रही है और भारत इस पर आपत्ति जताता रहा है।
यह परियोजना पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुजरती है और भारत इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताता है।
जयशंकर के संबोधन पर पाकिस्तानी पत्रकार इफ़्ितख़ार फिऱदौस ने लिखा है, ‘एससीओ में दिए गए भाषण पर विचार करते हुए लगता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जिस आक्रामकता की उम्मीद थी, उसके कोई संकेत नहीं मिले। यहाँ तक कि उम्मीद के कऱीब भी नहीं। ऐसा तब है, जब भारत 13 लोगों के सबसे छोटे प्रतिनिधिमंडल के साथ आया है। लेकिन दोनों देशों के संबंधों में अतीत का इतना बोझ है कि आमूलचूल परिवर्तन की उम्मीद पालना असंभव के करीब लगता है।’
पाकिस्तान का नहीं लिया नाम
इफ्तिखार फिरदौस की इस पोस्ट के जवाब में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी प्रतिनिधि रहीं मलीहा लोधी लिखती हैं, ‘एससीओ फोरम पर द्विपक्षीय मुद्दों को नहीं उठाया जा सकता है। यह सामान्य नियम है। जब पाकिस्तान और भारत को सदस्य के तौर पर इसमें शामिल किया गया था तब भी दोनों देशों ने इस नियम पर सहमति जताई थी।’
पाकिस्तान के एक और पत्रकार ए वहीद मुराद ने जयशंकर के संबोधन की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है, ‘पाकिस्तान के सरकारी टीवी ने एससीओ में भारत के विदेश मंत्री के संबोधन को म्यूट कर दिया। ‘म्यूट करने की शिकायत कई पाकिस्तानी कर रहे हैं।’
मलीहा लोधी ने समा टीवी से बातचीत में एस जयशंकर के भाषण पर कहा, ‘भारत के विदेश मंत्री ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है, जो नया है। वो पहले भी ऐसी बातें करते रहे हैं। उन्होंने कुछ भी विवादित बात नहीं कही है। उन्होंने आतंकवाद का मुद्दा उठाया लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। पाकिस्तान का नाम वो ले भी नहीं सकते थे।’
‘ऐसे फोरम में किसी भी मुल्क के नाम लेने की इजाज़त नहीं होती है। लेकिन भारतीय मीडिया में कहा जा रहा है कि जयशंकर ने चीन और पाकिस्तान को घेरा। जयशंकर ने एससीओ के संबोधन में वैश्विक संस्थाओं में सुधार की बात कही। जाहिर है भारत यूएनएससी में सदस्यता चाहता है।’
मलीहा लोधी से पाकिस्तान के जियो न्यूज ने पूछा कि जयशंकर के भाषण को वह कैसे देखती हैं?
क्या कह रहे हैं पाकिस्तानी एक्सपर्ट?
इसके जवाब में लोधी ने कहा, ‘जयशंकर ने उन्हीं मुद्दों को उठाया, जो भारत की नीति रही है। भारत ने आतंकवाद का मुद्दा उठाया लेकिन व्यापक रूप में उठाया न कि पाकिस्तान को टारगेट करते हुए। हालांकि भारतीय मीडिया में इसे पाकिस्तान पर निशाने के रूप में देखा गया। जयशंकर ने इस फोरम को बहुपक्षीय ही रखा।’
पाकिस्तान के न्यूज़ चैनल 24 न्यूज़ से वहाँ के पूर्व राजनयिक मसूद ख़ालिद ने कहा, ‘जयशंकर का पाकिस्तान आना अच्छा है और हमने वेलकम भी किया। भारत और पाकिस्तान दोनों एससीओ के सदस्य 2017 में बने थे। भारत एससीओ का बहिष्कार नहीं कर सकता था।’
‘लेकिन जयशंकर के दौरे को पाकिस्तान में कुछ ज़्यादा ही हाइप किया गया। कहा जाने लगा कि दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलेगी। ऐसा तब है, जब जयशंकर ने स्पष्ट कर दिया था कि वह द्विपक्षीय दौरे पर नहीं जा रहे हैं।’
पाकिस्तान की सांसद और पूर्व राजनयिक शेरी रहमान ने जयशंकर के भाषण पर जियो न्यूज से कहा, ‘जयशंकर ने बहुत ही सतर्क होकर बात की। उन्होंने आतंकवाद पर बात की लेकिन पाकिस्तान पर उंगली नहीं उठाई। वो अपने दायरे सोचकर आए थे और उसी के हिसाब से भाषण दिया। जयशंकर जिस अंदाज के लिए जाने जाते हैं, वैसा कुछ नहीं था। हमें भी इसका वेलकम करना चाहिए। जयशंकर ने शांति से चल रहे समिट का माहौल खऱाब नहीं किया बल्कि पाकिस्तान को मुबारकबाद दी।’
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित को लगता है कि जयशंकर के इस्लामाबाद आने पर पाकिस्तान में कुछ ज़्यादा है शोर मचा।
अब्दुल बासित ने लिखा है, ‘पाकिस्तान में हमलोग की आदत है कि अनावश्यक का शोर मचाते हैं। ख़ास कर भारत से संबंधों के मामले में। जयशंकर ने पाकिस्तान आने से पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वह बहुपक्षीय समिट में शामिल होने जा रहे हैं न कि द्विपक्षीय।’
‘जयशंकर का पाकिस्तान आना ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे लगे कि भारत का रुख बदल रहा है। अगर भारत इस्लामाबाद में आयोजित एससीओ समिट से ख़ुद को दूर रखता तो एक संदेश जाता कि भारत एससीओ के साथ वही कर रहा है जो सार्क के साथ करता रहा है। भारत के पास इस्लामाबाद समिट में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।’
अब्दुल बासित ने लिखा है, ‘इसी तरह पाकिस्तान ने भी इस समिट में शामिल होने के लिए पीएम मोदी को आमंत्रित कर भारत पर अहसान नहीं किया था। पाकिस्तान पीएम मोदी को ही आमंत्रित करता और यह भारत पर था कि वह अपना प्रतिनिधि बनाकर किसे भेजता है। जाहिर है कि पीएम मोदी के लिए जयशंकर से अच्छा विकल्प नहीं था।’(bbc.com/hindi)
-शंभूनाथ
1) हिंदू परिवारों में लक्ष्मी एक बड़ा प्रिय शब्द है, क्योंकि धन-संपत्ति आज के जमाने में किसे प्रिय नहीं है! आज लक्ष्मी पूजा है। जहां आज नहीं है, वहां दीपावली के दिन लक्ष्मी-गणेश की पूजा होगी। लाखों लोग लक्ष्मी को याद करेंगे। पर क्या कभी सोचा है कि लक्ष्मी की सवारी उल्लू क्यों है?
उल्लू एक अनोखा जीव है जिसे दिन में दिखता नहीं है। फिर जिसने भी लक्ष्मी के साथ उल्लू की कल्पना की, उसका अभिप्राय इसके अलावा क्या होगा कि धन-संपत्ति पाकर अंधा न हो जाओ, बुद्धि के देवता गणेश को थोड़ा याद कर लो! इन दिनों जिनके पास लक्ष्मी ज्यादा है, वे कितने अंधे हो चुके हैं और सामान्य संवेदना भी खो चुके हैं, यह अब आम अनुभव है!
2) किसी परिवार में लडक़ी पैदा होने पर कभी सांत्वना पाने के लिए और कभी उसके गोरे सौंदर्य पर खुश होकर कहा जाता है कि लक्ष्मी पैदा हुई है। हिंदू कल्पना में सरस्वती, लक्ष्मी, सीता, राधा, दुर्गा, अधिकांश देवियां गोरी हैं। सभी देवता सांवले या काले हैं। यह इस देश में एक वर्ण-पूर्वग्रह है कि लडक़े भले काले हों, पर लडक़ी गोरी होनी चाहिए! अक्सर कहा जाता है, रूप में लक्ष्मी और गुण में सरस्वती! लडक़ों के बारे में कहा जाता है कि लडक़ों का रूप क्या देखना, उनका गुण देखो! लडक़ी सुंदर चाहिए, बीए पास और गृह कार्य में निपुण!!
लक्ष्मी की एक लोकप्रिय छवि विष्णु के चरणों के पास बैठकर उनकी सेवा करने की है। ऐसी धार्मिक छवियों ने भी स्त्रियों का क्या कर्तव्य है, यह निर्धारित करने में एक बड़ी भूमिका निभाई है और उनके अधिकारों को हजारों साल से प्रभावित किया है। (बाकी पेज 5 पर)
3) यदि नई बहू के आने के बाद कोई दुर्घटना हो गई तो उसे सुनना पड़ता है, ‘इसका पैर खराब है’, ‘तू अलक्ष्मी है, तेरी वजह से नुकसान हुआ।’ फिर शिकायतों से लेकर मारने-जलाने तक का कर्मकांड चलता है!
स्त्री को अपने रूप-रंग, शकुन-अपशकुन, सुनिर्धारित कर्तव्य-अकर्तव्य आदि के कारण जो दुख-कष्ट झेलने पड़ते हैं, उसके मूल में पुरानी हिंदू धार्मिक कल्पनाओं की एक बड़ी भूमिका है। वे स्त्रियों पर थोपी गई हैं। अत: रूप और कर्तव्य को लेकर उन धार्मिक कल्पनाओं की सीमा को समझना चाहिए। लोगों को अपनी आस्थाओं को समय-समय पर बुद्धि की वाशिंग मशीन में स्वच्छ करते रहना चाहिए, ताकि जीवन में न्याय और स्वतंत्रता को जगह मिले!
तस्वीर: लक्ष्मी की एक हजार साल एक पुरानी मूर्ति, वाहन है उल्लू! इसी तरह गज लक्ष्मी हैं जो गुप्त काल में लोकप्रिय थीं!
-इमरान कुरैशी
कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि मस्जिद में भगवान राम की प्रशंसा में नारे लगाने में कुछ गलत नहीं है। कुछ बड़े वकीलों ने अदालत के इस फैसले की आलोचना की है।
जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने कहा, ‘ये समझ से परे की बात है कि अगर कोई जय श्रीराम के नारे लगाता है तो यह कैसे किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।’
दक्षिण कन्नड़ जिले के कदाबा तालुक के गांव बिनेल्ली में सितम्बर 2023 में दो लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को उन्होंने रद्द कर दिया।
दोनों याचिकाकर्ता उन लोगों में शामिल थे जिनकी तस्वीर सीसीटीवी में तब क़ैद हुई थी जब वो रात में मस्जिद में दाखिल हुए थे और नारे लगा रहे थे।
कर्नाटक के पूर्व महाधिवक्ता बीवी आचार्या ने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘मेरे विचार से, ये वे मामले हैं जिनमें अहम मुद्दा मंशा की है, जिसके साथ ये नारे लगाए जा रहे थे या किसी प्रार्थना स्थल में लोग प्रवेश कर रहे थे।’
‘मान लीजिए एक मुस्लिम या ईसाई किसी पर्व के दिन मंदिर में प्रवेश करता है और कुरान या बाइबिल का पाठ करता है, क्या आप इसे निर्दोष कह सकते हैं? प्रथम दृष्टया यह फैसला ग़लत है।’
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े इस मुद्दे को थोड़ा अलग नज़रिए से देखते हैं।
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘धारा 295 के तहत किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना या अपमान की कोशिश करना दंडनीय अपराध है। एकेश्वरवादी वैष्णव मंदिर में, अगर शिव भगावन के नारे लगाए जाएँ, तो क्या यह इस धारा के उल्लंघन के दायरे में नहीं आता है?’
पूर्व सरकारी वकील बीटी वेंकटेश ने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘फैसले में उस संदर्भ और हालात का ध्यान नहीं रखा गया जिसे शिकायत में तफसील से बताया गया है।’
शिकायत में क्या है?
यह घटना 24 सितम्बर 2023 की रात 10।50 बजे की है, जब कुछ अज्ञात लोग उस रात कदाबा-मारदाला स्थित मस्जिद में घुस जाते हैं और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते हैं और कथित तौर पर उन्होंने धमकी दी कि वे संबंधित समुदाय के लोगों को नहीं बख़्शेंगे।
हैदर अली की ओर से दायर शिकायत में सीसीटीवी के फुटेज को आधार बनाया गया है जिसमें दिखता है कि कुछ नौजवान दोपहिया वाहनों पर मस्जिद के चक्कर लगाते हैं और नारे लगाते हैं।
शिकायत में ये कहा गया है कि हिंदू और मुस्लिम ‘बड़ी शांति’ के साथ रह रहे थे और ये लोग इन समुदायों के बीच दरार डालने की कोशिश कर रहे थे।
इसके बाद कीरथन कुमार और एनएम सचिन कुमार के खिलाफ आईपीसी की धारा 447 (आपराधिक प्रवेश), 295ए (किसी वर्ग की धार्मिक मान्यताओं या धर्म के अपमान की मंशा से किया गया कार्य) 505 (ऐसे बयान जो सार्वजनिक अशांति भडक़ा सकते हैं), 503 (आपराधिक धमकी), 506 (आपराधिक धमकी के लिए सज़ा) और 34 (एक जैसी मंशा) के तहत दंडनीय अपराध के लिए एफआईआर दर्ज हुई।
फैसले में क्या कहा गया है?
जस्टिस नागाप्रसन्ना ने कहा, ‘धारा 295ए किसी भी वर्ग के धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करके धार्मिक भावनाएं भडक़ाने के मकसद से जानबूझ कर और दुर्भावना पूर्ण कृत्यों से संबंधित है। यह समझ से परे है कि अगर कोई जय श्री राम के नारे लगाते है तो कैसे यह किसी वर्ग की भावनाओं को आहत करता है। जबकि शिकायतकर्ता ने खुद ही कहा है कि इलाक़े में हिंदू और मुस्लिम सद्भावना के साथ रह रहे हैं तो इस घटना को किसी भी तौर से द्वेष पैदा करने वाला नहीं कहा जा सकता।’
फैसले में महेंद्र सिंह धोनी बनाम यारागुंतले श्यामसुंदर (2017) के मुकदमे का जि़क्र किया गया है और कहा गया कि ‘सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आईपीसी की धारा 295ए के तहत कोई भी ऐसा कृत्य अपराध नहीं होगा जिसका शांति या सामाजिक व्यवस्था पर असर न पड़ता हो।’ धारा 505 के संदर्भ में हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि कथित घटना ने कोई सार्वजनिक शरारत या दरार पैदा की हो।
‘धारा 506 पर हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत में खुद लिखा है कि शिकायतकर्ता ने उन लोगों को नहीं देखा, जिन्होंने कथित तौर पर आपराधिक धमकी का अपराध किया था।’
जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा, ‘शिकायत दूर-दूर तक आईपीसी की धारा 503 या धारा 447 के मूल तत्वों को नहीं छूती। कथित अपराध का कोई तत्व मिलना और इन याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की इजाज़त देना क़ानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बन जाएगा और नतीजतन न्याय की भ्रूणहत्या होगी।’
फैसले की आलोचना क्यों?
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि कोर्ट को सिफऱ् एक तर्क मिला कि जब हिंदू और मुस्लिम सद्भावना के साथ रह रहे थे, इस तरह की घटना कैसे अशांति फैला सकती है।
हेगड़े ने कहा, ‘इसके बाद अदालत ने धोनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया जहां तथ्य पूरी तरह से अलग थे।’ लेकिन वरिष्ठ वकील बीवी आचार्या कई अन्य सवाल उठाते हैं।उनके मुताबिक, ‘यहां तक कि अनधिकृत प्रवेश में, सिर्फ इसलिए कि यह एक सार्वजनिक स्थल है, इसका ये मतलब नहीं कि कोई भी किसी भी समय उस जगह घुस जाए। इसके पीछे की मंशा को देखना होगा। इसी तरह, जो नारे वे लगा रहे थे, तो क्या वे दूसरे धर्म की भावना को आहत कर रहे थे, यह उनकी मंशा और उन हालात पर निर्भर करता है, जिसके तहत उन्होंने वे शब्द बोले।’
आचार्या ने कहा, ‘इसलिए जब आप मस्जिद जैसी धार्मिक जगह में प्रवेश करते हैं और फिर वहां आप जय श्रीराम बोलते हैं तो निश्चित तौर पर प्रथम दृष्टया परिस्थितियां दूसरे समुदाय की भावनाओं को आहत करने की मंशा को दिखाती हैं। सैद्धांतिक रूप से, अगर इस फैसले को सही माना गया तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे।’
संजय हेगड़े की तरह ही उन्होंने कहा कि हर मामले में फैसला अलग अलग होता है।
उन्होंने कहा, ‘इन सबसे अधिक, यह एक ऐसा मुकदमा है जिसमें जब अदालत के सामने पूरे तथ्य न हों तो पूरी जांच की जरूरत है। सिर्फ एफआईआर के आधार पर आप इसे खारिज नहीं कर सकते। कल ही, सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया जिसमें कहा गया है कि आगे की जांच से कई तथ्यों का पता चलेगा। प्रथम दृष्टया इस मुकदमे में दिखता ग़लत नीयत दिखती है। अदालत को इसमें आगे की जांच कराने की इजाजत देनी चाहिए थी।’
आगे जांच की मंज़ूरी क्यों नहीं मिली?
पूर्व सरकारी वकील बीटी वेंकटेश आचार्या के साथ सहमत हैं कि इस मामले में विस्तृत जांच की मांग की गई थी क्योंकि शिकायतकर्ता ने जय श्रीराम के नारे लगाने के अलावा भी विशेष तौर पर कई बिंदुओं का जिक्र किया है।
वेंकटेश ने कहा कि शिकायत, विशेष तौर पर कदाबा पुलिस स्टेशन में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच सद्भाव का उल्लेख करती है, जहां ये घटना घटी।
उन्होंने कहा, ‘शिकायत में उन परिस्थियों के बारे में विशेष तौर से जिक्र किया गया है जिसके तहत हिंदू और मुस्लम सद्भावना के साथ रहते हैं। इसमें कहा गया है कि एक डस्टर कार और दो दो-पहिया वाहनों पर सवार होकर लोग संदिग्ध रूप से मस्जिद के चक्कर लगा रहे थे। इसके बाद नारेबाजी होती है और फिर नारों के ज़रिए बेरी समुदाय के खिलाफ धमकी दी जाती है।’
वेंकटेश ने कहा, ‘बेरी समुदाय मुस्लिम समाज का एक वर्ग है जो आम तौर पर कर्नाटक के तटीय इलाकों में रहता है। उनके खिलाफ धमकी दी गई कि उन्हें बख़्शा नहीं जाएगा। जबरन घुसने और नारेबाज़ी करने के अलावा यह साफ़ तौर पर आपराधिक धमकी है और ये सभी भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के अंतर्गत दंडनीय है। यह कोई शरारत नहीं है। यह जानबूझ कर किया गया कार्य है। जज ने संदर्भ को नहीं देखा और इसलिए गंभीर ग़लती कर दी।’
सुप्रीम कोर्ट के एक य वकील ब्रिजेश कलप्पा ने सोशल मीडिया पर राय ज़ाहिर करते हुए लिखा, ‘तो किसी मस्जिद में जाना और जय श्रीराम के नारे लगाने में कुछ भी ग़लत नहीं है। क्या एक मुस्लिम मंदिर में घुस सकता है और अल्लाह हू अकबर चिल्ला सकता है? यह वही देश है जहां ब्रिटिश ने समुदायों के बीच नफऱत के बीज बोए थे? क्या अदालत ने तर्क की सारी शक्ति खो दी है?’
अभिजीत मजुमदार ने एक्स पर लिखा, ‘धार्मिक भावनाओं को आहत करने के बारे में नहीं जानता, लेकिन दुनिया में कहीं भी अल्ला-हू-अकबर चिल्लाने से जगह तुरंत खाली हो जाती है।’ ((bbc.com/hindi)
-दीपाली जगताप
पिछले पांच वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति में अप्रत्याशित उथल-पुथल हुई है। राज्य की जनता ने एक के बाद एक कई सियासी झटके देखे।
लेकिन क्या जनता इन झटकों को पचा पाई, यह आने वाले हफ़्तों में साफ हो जाएगा। मंगलवार को चुनावों की घोषणा के साथ राज्य में छह प्रमुख राजनीतिक दलों की परीक्षा 16 अक्तूबर से शुरू होगी।
महाराष्ट्र में 288 सीटों पर विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। 2019 से 2024 तक पांच साल का कार्यकाल महाराष्ट्र की राजनीति में अप्रत्याशित घटनाओं का दौर रहा है।
सवाल ये है कि आखऱि बीते पांच वर्षों में महाराष्ट्र में सियासी तस्वीर कैसे बदल गई है? आने वाले चुनाव राजनीति और मतदाताओं के लिए मुख्य रूप से क्या बदलाव लेकर आए हैं?
इस लेख में इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे।
अब किस पार्टी के कितने विधायक?
सबसे पहले तो इस बार चुनावों में दो नई पार्टियां नजर आएंगीं। दरअसल, ये दोनों नई पार्टियां पिछली बार चुनाव लड़ चुकी दो पार्टियों से अलग होकर बनी हैं। पिछले पांच वर्षों की राजनीतिक घटनाओं की वजह से इन पार्टियों का गठन हुआ है।
महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना शिंदे गुट के पास 40 विधायक हैं। बीजेपी के पास 103 विधायक और एनसीपी के अजित पवार गुट के पास 40 विधायक हैं।
दूसरी ओर, महाविकास अघाड़ी में एनसीपी के शरद पवार गुट के पास 13 विधायक, शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के साथ 15 विधायक और कांग्रेस के 43 विधायक हैं।
इसके अलावा राज्य में बहुजन विकास अघाड़ी के तीन 3, समाजवादी पार्टी के 2, ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिम के 2, प्रहार जनशक्ति 2, एमएनएस के 1, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) - 1, शेकांप 1, स्वाभिमानी पार्टी 1, राष्ट्रीय समाज पार्टी 1, महाराष्ट्र जनसुराज्य शक्ति पार्टी के 1, क्रांतिकारी शेतकारी पार्टी के 1 और निर्दलीय 13 विधायक हैं।
बदलते मुख्यमंत्री और अनोखे राजनीतिक प्रयोग
2019 का विधानसभा चुनाव शिवसेना और बीजेपी के गठबंधन ने मिलकर लड़ा था। दूसरी ओर कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन ने भी साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।
बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन को बहुमत तो मिल गया, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर गठबंधन टूट गया।
इसके बाद लगातार कुछ दिनों तक महाराष्ट्र में राजनीतिक प्रयोग शुरू हो गए। इन्हीं दिनों में से एक है 23 नवंबर 2019।
उस दिन सुबह-सुबह बीजेपी ने अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश की।
23 नवंबर 2019 की सुबह देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार राजभवन पहुंचे। उन्होंने क्रमश: मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
हालाँकि अगले कुछ घंटों में ही यह स्पष्ट हो गया कि प्रयोग विफल हो गया है क्योंकि एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और पार्टी विधायकों ने बाद में स्पष्ट किया कि वे बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे।
इसके बाद शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी साथ आए और महाविकास अघाड़ी का गठन किया।
इन दलों ने एक ‘न्यूनतम साझा कार्यक्रम’ बनाया। 28 नवंबर, 2019 को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद करीब ढाई साल तक राज्य में महाविकास अघाड़ी की सरकार रही।
इस बीच मार्च 2020 से 2022 तक पूरी दुनिया में कोरोना संकट रहा। उस समय तत्कालीन ठाकरे सरकार के प्रशासनिक कौशल की परीक्षा हुई थी।
कोविड की लहर कम हुई और एक बार फिर महाराष्ट्र में तीसरा राजनीतिक प्रयोग किया गया।
20 जून 2022 को, एकनाथ शिंदे, जो महाविकास अघाड़ी में शहरी विकास मंत्री थे, कुछ शिवसेना विधायकों के साथ ग़ायब हो गए और सीधे सूरत के लिए रवाना हो गए।
जाहिर तौर पर शिवसेना के 40 विधायकों और लगभग 10 निर्दलीय विधायकों ने एकनाथ शिंदे का समर्थन किया था।
इसी बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
30 जून 2022 को राज्य में फिर से शिवसेना और बीजेपी की गठबंधन सरकार बनी और एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
इस तारीख तक राज्य में तीन सरकारें बन चुकी थी। लेकिन सियासी 'सर्कस' यहीं नहीं रुका, बल्कि इसके बाद शिवसेना में बागी गुट ने पार्टी के चुनाव चिह्न पर दावा ठोक दिया। चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह दे दिया।
दूसरी ओर, विधायकों की अयोग्यता का मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट, विधानसभा अध्यक्ष और फिर सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
लेकिन ये सियासी खेल यहीं नहीं रुका।
2 जुलाई 2023 को एनसीपी नेता और शरद पवार के भतीजे अजित पवार पार्टी के नौ सदस्यों के साथ राजभवन पहुंचे और गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
इसके बाद अजित पवार ने भी एकनाथ शिंदे के नक्शेकदम पर चलते हुए एनसीपी पार्टी पर दावा किया और घोषणा की कि वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। चुनाव आयोग ने शिवसेना की तरह अजित पवार को भी पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दे दिया।
किन वजहों से अहम है ये चुनाव?
महाराष्ट्र में अब तक दो प्रमुख विचारधाराओं या गठबंधनों, के बीच वोटिंग होती रही है। इसमें जातीय गणित हमेशा महत्वपूर्ण रहा।
इस बारे में बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे कहते हैं, ‘2019 में चार प्रमुख पार्टियाँ थीं। अब छह पार्टियां हैं। अब तक धर्मनिरपेक्षता और दक्षिणपंथी विचारधारा के बीच चुनाव होता रहा है लेकिन अब ये लड़ाई बीजेपी के साथ या बीजेपी के विरोध में बंट गई है। इसकी वजह से विचारधारा का ध्रुवीकरण अब पहले जैसा नहीं रहा।’’
अभय देशपांडे ने कहा, ‘दो पार्टियों को सिंबल पार्टी से अलग हुए एक समूह को विरासत में मिले हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने असली पार्टी कौन है ये तो बता दिया लेकिन जनता उनके बारे में क्या सोचती है ये इस चुनाव में साफ हो जाएगा। हमें यह भी पता चल जाएगा कि विचारधारा से समझौता कर सरकार स्थापित करने और उसके लिए पार्टी तोडक़र विधायकों की ताकत हासिल करने के राजनीतिक प्रयोग पर जनता की क्या प्रतिक्रिया है।’’
उन्होंने कहा, ‘आरक्षण का मुद्दा तेज़ हो गया है। मराठा बनाम ओबीसी, आदिवासी बनाम धनगड़ विवाद उठ खड़े हुए हैं। इसके चलते सभी राजनीतिक दलों को इसमें संतुलन बनाए रखना होगा। क्योंकि डर है कि किसी एक समुदाय का पक्ष लेने से दूसरा समुदाय नाराज हो सकता है। ’
देशपांडे कहते हैं कि ये भी देखना बाकी है क्या हरियाणा की तरह अन्य छोटे दल और तीसरा गठबंधन भी कितनी ताकत से चुनाव लड़ सकते हैं।
महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों के पास अब तक अपना पारंपरिक वोट बैंक रहा। ये वोटर लगातार उनसे जुड़े रहे थे।
लेकिन राजनीतिक बदलाव के बाद पार्टी में फूट की तरह ही विचारों में भी फूट देखने को मिल रही है। इसका असर चुनाव सर्वे पर भी दिख सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार दीपक भातुसे कहते हैं, ‘राज्य में 2024 का लोकसभा चुनाव भी अलग था। अब तक चुनावों में लड़ाई प्रगतिशील धड़े और हिंदुत्व के बीच थी। विकास, भ्रष्टाचार और अन्य मुद्दों के अलावा मतदाता इस विचारधारा पर भी बंटे हुए थे। 2019 के चुनाव तक, शिवसेना-भाजपा गठबंधन बनाम कांग्रेस-राष्ट्रवादी गठबंधन ने वैचारिक आधार पर मतदाताओं का विभाजन देखा।’’
उन्होंने कहा, ‘2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में प्रगतिशील मतदाताओं ने भी इसके भ्रष्टाचार और नरेंद्र मोदी के करिश्मे जैसे मुद्दे पर वोट दिए। लेकिन महाविकास अघाड़ी के गठन और शिवसेना और एनसीपी के बीच विभाजन के बाद बने महागठबंधन के कारण अब अगले चुनावों में मतदाताओं के लिए वोटिंग इतना सुलझी हुई नहीं होगी।’’
भातुसे कहते हैं कि अब वोटों का विभाजन सीधे-सीधे नहीं होगा क्योंकि पार्टियों में विभाजन की वजह का असर वोटरों पर जरूर पड़ेगा।
उनके मुताबिक एनसीपी को वोट देेने वाले प्रगतिशील वोटर अब महाविकास अघाड़ी को वोट दे सकते हैं। वहीं एकनाथ शिंदे की वजह से शिवसेना के कुछ वोटर उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना को वोट दे सकते हैं। जाहिर है मतदाताओं को सामने भ्रम की स्थिति हो सकती है। क्योंकि उन्हें विचारधारा और नए गठबंधन दोनों को देखना है।
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर सूर्यवंशी कहते हैं कि अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां अब गठबंधन में एक साथ हैं इसकी वजह से इन पार्टियों के सामने लोगों से अपनी विचारधारा मनवाने की चुनौती है।
उन्होंने बताया, ‘उदाहरण के तौर पर अजित पवार के लिए चुनौती यह है कि बीजेपी में शामिल होने के बावजूद वह धर्मनिरपेक्ष विचारधारा पर कायम रहेंगे कि नहीं। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे और कांग्रेस के लिए लोगों को वैचारिक समझौते के लिए मनाना चुनौतीपूर्ण है। वोट कैसे ट्रांसफर होंगे ये इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन वोटरों को अपने पारंपरिक रुख में बदलाव के लिए किस हद तक मना पाता है।’
हालांकि महाविकास अघाड़ी को लोकसभा चुनावों में अच्छी सफलता मिली थी लेकिन विधानसभा में उसके लिए इस प्रदर्शन को बरकरार रखना चुनौतीपूर्ण होगा।
इसके लिए उनके पास रणनीति बनाने की जरूरत है। खासकर तब जब महायुति (शिवसेना-शिंदे गुट, बीजेपी और एनसीपी (अजित पवार) सरकार इतनी बड़ी योजनाएं लेकर आ रही हैं।
राज्य में फिलहाल गठबंधन सरकार है। लेकिन राजनीतिक गठबंधनों और पार्टियों में फूट के चलते राज्य में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं।
साफ है कि इस विधानसभा चुनाव में अब सीधा मुकाबला महा विकास अघाड़ी और महायुति के बीच होगा।
आरक्षण का कोहरा और योजनाओं की बारिश
पिछले दो सालों में जहां तमाम राजनीतिक हलचलें चल रही थीं वहीं महाराष्ट्र में आरक्षण की बहस भी तेज हो गई है।
मराठवाड़ा से शुरू हुआ मराठा आरक्षण आंदोलन एक साल के भीतर ही राज्यव्यापी हो गया और इतना ही नहीं इससे राजनीति में भी भूचाल आ गया।
मराठों के लिए ओबीसी के तहत आरक्षण देेने की मांग ओबीसी समुदायों को नाराज कर रही है। सरकार ने मराठा समुदाय के लिए दस फीसदी आरक्षण का ऐलान किया है लेकिन कुनबी प्रमाणपत्र के लिए विवाद बना हुआ है।
ओबीसी नेताओं और समाज ने इस मांग का विरोध किया है। लक्ष्मण हाके, मंत्री छगन भुजबल समेत कई ओबीसी नेताओं के आक्रामक रुख को देखते हुए मराठा समुदाय के लोगों को अलग से आरक्षण का ऐलान किया गया।
ओबीसी समुदाय को लग रहा था कि कहीं सरकार उनके आरक्षण में मराठों को हिस्सेदारी न दे दे। लेकिन सरकार ने मराठों के लिए अलग से आरक्षण का ऐलान किया।
इसका असर हाल ही में हुए लोकसभा के नतीजों में भी देखने को मिला।
मराठा और ओबीसी समुदायों के साथ-साथ धनगर समुदाय को आदिवासी दर्जा देकर आरक्षण देने की मांग एक बार फिर उठी है। दूसरी ओर आदिवासी समुदाय ने धनगर समुदाय को एसटी वर्ग से आरक्षण देने का विरोध किया। इस मुद्दे पर डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल समेत 13 विधायकों ने मंत्रालय की तीसरी मंजिल से छलांग लगा दी थी।
दूसरी ओर मराठा आरक्षण आंदोलन को नेतृत्व देेने वाले मनोज जरांगे पाटिल ने भी अपना राजनीतिक रुख़ साफ किया है। इसका असर कई विधानसभा क्षेत्रों में दिख सकता है।
लोकसभा चुनाव में महायुति को जितनी सफलता की उम्मीद थी उतनी नहीं मिली। इसके बाद विधानसभा में महायुति आक्रामक नजर आई। पिछले कुछ दिनों में सरकार की ओर से कई बड़े ऐलान किए गए।
चाहे वह लडक़ी बहिन योजना हो या युवाओं को भत्ता देने की योजना। कई माध्यमों से लोगों के बैंक खातों में पैसा आएगा। इससे महाविकास अघाड़ी के सामने चुनौती भी बढ़ गई है।
लेकिन अब देखना यह है कि लोग पांच साल के राजनीतिक भूचाल, विचारधारा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूखा और राजनीति में नैतिकता के आधार पर वोट देंगे या फिर आरक्षण, जातीय समीकरण और नये गठबंधन को स्वीकार करेंगे। (bbc.com/hindi)
-आनंद के.सहाय
बीते साल जून में कनाडाई नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद जस्टिन ट्रूडो ने भारत की ओर उंगली उठाई थी। भारत ने उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। और उसके बाद दोनों देशों ने एक दूसरे के डिप्लोमैट्स को देश छोडऩे को कहा था। इसके बाद दोनों देशों के बीच तल्ख़ भाषा में बयानबाजी हुई थी। मौजूदा वक़्त में दोनों देशों के बीच संबंध अपने सबसे खऱाब दौर से गुजऱ रहे हैं। दोनों के बीच रिश्तों के सामान्य होने की संभावना कम दिख रही है।
भारत का मानना है कि कुछ कनाडाई सिख भारत के भीतर एक अलग सिख देश बनाने के उद्देश्य से हिंसक ख़ालिस्तानी आंदोलन को बढ़ावा दे रहे हैं। यही तकरार का अहम बिंदु है।
करीब 40 साल पहले पंजाब में हिंसा के सबसे भयंकर दौर में भारतीय सेना ने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर विवादास्पद हमला किया था और फिर अक्टूबर 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दो सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी।
इस पृष्ठभूमि में भारत कनाडा से ऐसे कुछ लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करता रहा जिन पर भारत ख़ालिस्तानी समर्थक होने का आरोप लगाता रहा है। कनाडा ने भारत के ऐसे निवेदनों को अब तक अनसुना किया है।
भारत हरदीप सिंह निज्जर को ‘ख़ालिस्तानी आतंकवादी’ करार देता रहा है। लेकिन कनाडा का कहना है कि वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रतता और व्यक्तिगत आज़ादी का हिमायती है और कनाडा किसी को अपनी राय रखने से नहीं रोक सकता।
भारत ने सार्वजनिक तौर पर ये कहा है कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो वहां के ‘सिख वोट बैंक’ को रिझा रहे हैं और इसी कारण उनकी सरकार ख़ालिस्तानी समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई की भारत की मांग की नजरअंदाज करती रही है।
अपने-अपने देश की आबादी के अनुपात में, कनाडा में भारत की तुलना में अधिक सिख हैं।
किसी भी पश्चिमी देश के साथ इतने खऱाब रिश्ते नहीं
भारत-कनाडा में लगातार खराब होते जा रहे रिश्तों में खटास हैरान करने वाली है।
सोवियत यूनियन के विघटन के बाद किसी भी पश्चिमी देश के साथ भारत के संबंध इतने खऱाब नहीं रहे हैं।
भारत ने कोल्ड वॉर के बाद अमेरिका की अगुवाई वाले पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते सुधारे हैं और धीरे-धीरे एक मुकम्मल मार्केट इकोनमी बनने की दिशा में आगे बढ़ता रहा है।
भारत ने जी7 और नेटो देशों के साथ आर्थिक, व्यापार और राजनीतिक रिश्ते सुधारने की कोशिश की है।
कनाडा इन दोनों समूहों का हिस्सा है और अमेरिका के साथ उसके बेहद कऱीबी सैन्य संबंध हैं जो नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफ़ेंस कमांड यानी नोराड के ज़रिए प्रतिबिंबित होते हैं। दोनों के देशों की अर्थव्यवस्था भी एक दूसरे से करीबी रूप से जुड़ी हुई है।
ये दिलचस्प है कि अमेरिका के किसी नज़दीकी सहयोगी के साथ भारत के रिश्तों में इतनी खटास आ गई हो। भारत बीते तीन दशकों से ख़ुद अमेरिका के साथ आर्थिक और सामरिक दिशा में बेहतर संबंध बनाने में प्रयासरत रहा है।
दोनों देशों के बीच बिगड़ते रिश्तों के बीच सोमवार को भारत ने कहा कि वो कनाडा में अपने हाई कमिश्नर संजय कुमार वर्मा और कुछ अन्य राजनयिकों को वापस बुला रहा है।
लेकिन कनाडा ने कहा कि दरअसल उसने संजय कुमार वर्मा समेत छह भारतीय राजनयिकों और कंसुलर अधिकारियों को निष्कासित कर दिया है क्योंकि भारत ने इन्हें मिली डिप्लोमेटिक और कंसुलर इम्युनिटी हटाने और कनाडा के साथ जांच में सहयोग करने से मना कर दिया था।
भारतीय राजनयिकों और अधिकारियों को निकालने के बाद नई दिल्ली ने छह कनाडाई राजनयिकों को निकालने की घोषणा की। इनमें कार्यकारी उच्चायुक्त स्टुअर्ट रॉस व्हीलर भी शामिल थे।
क्या है ‘पर्सन्स ऑफ़ इंटरेस्ट’
एक-दूसरे के राजनयिकों को निकालने का फ़ैसला तब सामने आया है जब निज्जर हत्या मामले में कनाडा ने भारतीय राजनयिकों और उच्चायोग के दूसरे अधिकारियों को ‘पर्सन्स ऑफ इंटरेस्ट’ बताया है।
कनाडा में ‘पर्सन्स ऑफ इंटरेस्ट’ उसे कहा जाता है जिसको लेकर जांचकर्ता मानते हैं कि उस शख्स को किसी अपराध की महत्वपूर्ण जानकारी है।
सितंबर 2023 में निज्जर की हत्या के बाद प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने देश की संसद में बयान दिया था कि कनाडा के पास इस अपराध में भारतीय अधिकारियों के शामिल होने के ‘ठोस सबूत’ हैं।
भारत ने इस दावे को सिरे से ख़ारिज करते हुए कनाडा से सबूत की मांग की थी।
सोमवार को कनाडा के उच्चायुक्त को देश से निकालने की घोषणा के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा था कि ट्रूडो सरकार ने भारतीय अधिकारियों के खिलाफ अपने आरोपों के समर्थन में भारत को ‘सबूत का एक टुकड़ा’ तक नहीं दिखाया था।
विदेश मंत्रालय ने कनाडा को लेकर ये भी कहा था कि वो ‘राजनीतिक लाभ के लिए भारत को बदनाम कर रहा है।’
दिलचस्प रूप से कनाडा के कार्यकारी उच्चायुक्त जिन्हें अब निकाल दिया गया है, उन्होंने इसका जवाब दिया था।
उन्होंने कहा था कि कनाडा ने भारत सरकार की सभी मांगों को पूरा किया और भारत सरकार को भारतीय एजेंटों और उनके निज्जर हत्या मामले से जुड़े होने के सबूत दिए गए थे। उन्होंने आगे कहा था कि अब ये भारत के ऊपर था कि वो अगला कदम उठाता।
कैसे सबूत भारत को दिए गए?
कनाडा ने भारत को किस गुणवत्ता का सबूत देने का दावा किया है उसे आज नहीं तो कल ज़रूर तौला जाएगा लेकिन ये साफ़ नहीं है कि कनाडा ने ये सबूत कब दिए थे। इस स्तर पर किसी भी हालत में संबंधों को सुधारने की प्रक्रिया की शुरुआत होने की संभावना नहीं है। नकारात्मक दिशा में बहुत कुछ बहुत तेजी से हुआ है।
प्रधानमंत्री ट्रूडो और प्रधानमंत्री मोदी के बीच इस साल जून में इटली में जी-7 से इतर द्विपक्षीय मुलाक़ात हुई थी। वहीं आसियान सम्मेलन से बीते शुक्रवार को भी दोनों नेता मिल चुके थे लेकिन इससे ये जरा भी संकेत नहीं मिल सकता था कि संबंध इस स्तर पर पहुंच जाएंगे।
समाचार एजेंसी एएनआई ने भारतीय अधिकारियों के हवाले से बताया था कि लाओस की बैठक छोटी और अनाधिकारिक थी, इससे ‘कुछ भी ठोस बाहर नहीं आया था।’
सूत्रों के हवाले से कहा गया, ‘भारत विरोधी तत्वों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गारंटी के बगैर संबंधों में सुधार मुश्किल होगा।’ ये कोई आधिकारिक बयान नहीं था लेकिन इससे इस मामले पर भारत की सोच का पता चलता है।
ये एक टेढ़ी खीर लगता है। सीबीसी न्यूज ने ट्रूडो के हवाले से कहा था, ‘मैंने जोर देकर कहा था कि हमें काम करने की जरूरत है।।।इसमें मेरा फोकस कनाडा के लोगों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का पालन है।’
विएंटाइन में दोनों देशों के नेताओं के बीच मुलाकात से पहले हिंदुस्तान टाइम्स ने कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जोली के हवाले से कहा था कि भारत के साथ संबंध तनावपूर्ण और बहुत मुश्किल हैं। उन्होंने डर जताया था कि कनाडा की जमीन पर ‘निज्जर जैसे कत्ल’ आगे भी हो सकते हैं।
क्या सुधरेंगे दोनों देशों के रिश्ते?
ये साफ है कि कनाडा फि़लहाल इस मसले को गर्म रखना चाहता है। और जैसे कि देखा जा रहा है भारत भी इस समस्या के हल के लिए किसी किस्म की गंभीर डिप्लोमेसी का रास्ता अपनाने के प्रति इच्छुक नहीं दिख रहा है।
भारत में एक विचार ये है कि अक्तूबर 2025 में कनाडा में होने वाले आम चुनावों में ट्रूडो हार जाएंगे और जब दोनों देशों के बीच संबंधों में नई शुरूआत का अवसर मिलेगा। लेकिन कनाडा की संसद के भीतर भारत के खिलाफ लगाए गए आरोपों से पार पाना आसान नहीं होगा।
दिलचस्प ये है कि इस सारे बखेड़े में एक अमेरिकी एंगल भी है। सितंबर 2023 में कनाडा के प्रधानमंत्री ने भारत पर आरोप लगाए थे। इसके कुछ हफ्ते बाद अमेरिकी संघीय अदालत ने निखिल गुप्ता नाम के भारतीय नागरिक को अमेरिकी नागरिक गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश में नामित किया था। पन्नू खालिस्तान की हिमायत करने वाले अमेरिकी वकील हैं।
सवाल ये है कि क्या अमेरिका ने कनाडा के साथ मिलकर निखिल गुप्ता वाले केस की टाइमिंग तय की थी?
भारत के लिए आगे का क्या है रास्ता?
हाल ही में पन्नू ने कुछ भारतीय अधिकारियों के खिलाफ दीवानी मुकदमें दर्ज किए हैं। इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का नाम भी शामिल है। यही कारण था कि संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक सम्मेलन में परंपरा के खिलाफ जाते हुए भारतीय प्रधानमंत्री के साथ भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नहीं गए थे।
इससे भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में एक दिलचस्प आयाम पर भी विचार सामने आता है। अमेरिका ने निस्संदेह भारत के साथ अपने संबंधों को सावधानीपूर्वक विकसित किया है, लेकिन यह उसके अंतरराष्ट्रीय आचरण की प्रकृति में है कि जब भी मौका मिले एक अच्छे दोस्तों को भी थोड़ा दूर रखा जाए-ताकि बाद में किसी समय अच्छा सौदा किया जा सके।
इसमें एक एंगल और है। जहां तक भारत के वैश्विक मुद्दों पर आचरण का सवाल है, पीएम मोदी के नेतृत्व में कुछ बड़ा करने का हामी है।
निज्जर के मामले में भारत के आक्रामक रुख को समझने के लिए इस बात का ध्यान रखना जरूरी है। और इससे निज्जर मामले पर कनाडा से निपटने में भारत के आक्रामक रुख़ को समझने में मदद मिल सकती है। इस आक्रामकता में किसी अन्य देश की धरती पर हत्या को अंजाम देने का संदेह भी शामिल है।
जब अमेरिका ने भारतीय अधिकारियों को कानूनी कार्रवाई की धमकियां दी थीं तो भारत ने कुछ समीकरण बिठाने की कोशिश की थी लेकिन कनाडा के मुद्दे पर वो टोन ही गायब रही है। चीन इसे ‘वुल्फ़ वॉरियर डिप्लोमेसी’ की संज्ञा देता है। लेकिन भारत और चीन के दुनिया पर प्रभाव में आर्थिक और सैन्य हिसाब से बहुत बड़ा अंतर है।
लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि कनाडा के मुद्दे से बचा नहीं जा सकता। कम टकराव वाली कूटनीति में कोई प्रतिष्ठा नहीं खोती है। इसी पुराने भारतीय तरीके से एक ज़माने में उसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान हासिल करने में मदद मिली थी। (bbc.com/hindi)
एवरेस्ट पर पहली बार कौन चढ़ा? क्या हिलरी और तेनजिंग एवरेस्ट समिट करने वाले पहले नहीं थे? नैशनल जियोग्राफिक की एक टीम ने एवरेस्ट पर कुछ ऐसा खोज निकालने का दावा किया है, जो एक सदी पुराने इस रहस्य को सुलझा सकता है.
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा का लिखा
ठीक एक सदी पहले की बात है। साल 1924, जून का महीना। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी 'माउंट एवरेस्ट' पर सबसे पहले पांव धरने की ब्रिटिश महत्वाकांक्षा का बोझ उठाए एक एक्सपीडिशन टीम मिशन पर थी। इस टीम को समुद्र तल से 29,032 फीट ऊपर माउंट एवरेस्ट पर पहुंचना था।
पहले के दो नाकाम अभियानों के बाद यह पर्वतारोहियों का तीसरा दल था। नौ लोगों के इस दल में थे जॉर्ज मेलोरी (टीम लीडर), एडवर्ड नॉर्टन, नोएल ओडेल, जॉन मैकडॉनल्ड, एडवर्ड ओ। शेबेअर, जेफरी ब्रूस, टी। हॉवर्ड सॉमरवेल, बेंटले बीथम और एंड्रू 'सैंडी' इरविन।
1924 के एवरेस्ट एक्सपीडिशन टीम की एक फोटो। पीछे की कतार में (बाएं से दाएं) पहले नंबर पर इरविन और उनके बगल में मैलोरी हैं। पीछे की ही कतार में (दाहिने से बाएं) दूसरे नंबर पर ओडेल हैं। 1924 के एवरेस्ट एक्सपीडिशन टीम की एक फोटो। पीछे की कतार में (बाएं से दाएं) पहले नंबर पर इरविन और उनके बगल में मैलोरी हैं। पीछे की ही कतार में (दाहिने से बाएं) दूसरे नंबर पर ओडेल हैं।
8 जून 1924 की उस दोपहर को क्या हुआ था?
एवरेस्ट चोटी के रास्ते में एक तंग घाटी है, ग्रेट (नॉर्टन) कूलुआ। यह एवरेस्ट के नॉर्थ फेस की ओर है। 8 जून 1924 को दोपहर बाद एक्सपीडिशन टीम के दो सदस्य, मैलरी और इरविन, इसे पार कर चुके थे कि जब मौसम अचानक से खिल गया। बादल छंट गए और पहाड़ के ऊपर का हिस्सा साफ दिखने लगा।
यहां तक कि नॉर्थईस्ट रिज के 'थ्री स्टेप्स' की पहली सीढ़ी भी नजर आ रही थी। ये जगह लगभग 28,097 फीट की ऊंचाई पर है। फिर कुछ ही मिनटों में मौसम एकदम से बदला और घने बादल लौट आए।
टीम के सदस्य नोएल ओडेल इस वक्त मैलरी और इरविन से करीब 1,000 फीट नीचे थे। वो एक चक्करदार रास्ते से कैंप छह से होते हुए ऊपर चढऩे की कोशिश कर रहे थे। वहां एक खड़ी चढ़ाई वाली चट्टान थी, जिसपर चढ़े ओडेल ने मौसम को एकाएक फिर साफ होते देखा।
अब ओडेल को चोटी तक का पूरा रास्ता नजर आ रहा था। वह फर्स्ट और सेकेंड स्टेप दोनों को देख पा रहे थे।।। और फिर ओडेल ने जो देखा, वो लम्हा ना केवल उन्हें उम्रभर याद रहने वाला था, बल्कि एवरेस्ट के इतिहास में सबसे बड़ा रहस्य भी बनने वाला था। इस लम्हे पर अनगिनत किताबें, असंख्य बहसें होने वाली थीं।
क्या देखा था ओडेल ने?
96 साल की भरपूर उम्र में फरवरी 1987 को ओडेल दुनिया से विदा हुए। अपनी तमाम जिंदगी वह 8 जून 1924 को दिन के तीसरे पहर में दिमाग में खिंची वही तस्वीर दोहराते रहे कि उन्होंने 28,250 फीट की ऊंचाई पर 'सेकेंड स्टेप' के ऊपर दो गतिशील आकृतियां देखी थीं।
ओडेल को इस बात में रत्तीभर भी शंका नहीं थी कि उन्होंने दो पर्वतारोहियों को उस ऊंचाई पर आगे बढ़ते हुए देखा था! ओडेल के शब्दों में, वो दोनों फुर्ती से चलते नजर आए थे।
अगर ऐसा था, तो वो दोनों पर्वतारोही मैलरी और इरविन के सिवाय कोई और नहीं हो सकते थे। वही दोनों थे, जो टीम के बाकी लोगों से आगे थे। ओडेल की देखी इस झलक के तकरीबन पांच मिनट बाद ही बादलों ने वापसी की। फिर उस दिन तीसरा पहर खत्म होने से पहले ओडेल को एवरेस्ट नजर नहीं आया।
और, जब आया तो वहां मेलरी और इरविन का नामो-निशान नहीं था! मेलरी और इरविन फिर कभी किसी को नजर नहीं आए। वो एवरेस्ट के मुसाफिरों के उस क्लब का हिस्सा बन गए, जिनकी जिंदगी पहाड़ पर ही खत्म हो गई।
एक कैमरा, जिससे बंधी है उम्मीद
मेलरी और इरविन की मौत तो हुई, लेकिन कब और किस पड़ाव पर? क्या वो कभी एवरेस्ट पर चढ़ पाए? अगर ओडेल ने उन्हें सेकेंड स्टेप पर देखा, तो वो चोटी से बहुत दूर नहीं थे।
क्या 29 मई 1953 को एडमंड हिलरी और तेंजिंग नॉर्गे की पहली बार एवरेस्ट फतह करने की उपलब्धि से भी तीन दशक पहले मेलरी और इरविन, या केवल मेलरी, या केवल इरविन ने एवरेस्ट की चोटी पर पांव धरा था?
क्या वो दोनों, या उनमें से एक वापस उतरते हुए गिरकर मर गए? लेकिन उनके जूते तो आधुनिक पर्वतारोहियों जैसे थे नहीं, तो क्या हिमालय की उस कठिन ऊंचाई पर उन जूतों के साथ वो ऊपर चढ़ पाए होंगे?
यकीन कीजिए, ये सारे अगर-मगर बहुत कम हैं। पिछली एक सदी से यह हाइपोथिसिस माउंटेनियरिंग कम्युनिटी की सबसे गर्म बहसों में से एक बनी हुई है। तो क्या यह रहस्य सुलझाने का कोई तरीका नहीं? उम्मीद लगाने वालों ने सारी आशा एक कैमरे से बांधी हुई है: कोडेक वेस्ट पॉकेट कैमरा।
यह कैमरा एक्सपीडिशन टीम के एक सदस्य सॉमरवेल ने मिशन के दौरान मैलरी को दिया था। अगर वो चोटी पर पहुंचे होंगे, तो यकीनन उन्होंने कैमरे में तस्वीर खींची होगी और कैमरा जैकेट की पॉकेट में रखा होगा। उसकी वो फिल्म, जो कभी डिवेलप नहीं हुई, शायद अब भी बची हो। कोडेक कंपनी ने कहा था कि दशकों तक बर्फ में जमी होने के बावजूद वो कोशिश करेंगे, तस्वीर रीकवर करने की। शायद कामयाबी मिल भी जाए।
लाश मिली, कैमरा नहीं मिला
मैलरी और इरविन के शवों की तलाश, और उस कोडेक कैमरे की खोज में दशकों से लोग हलकान होते आ रहे हैं। 1933 में एवरेस्ट गई एक्सपीडिशन टीम को एक छोटी कामयाबी हाथ लगी, जब उन्हें इरविन की एक बर्फ वाली कुल्हाड़ी मिली।
फिर लंबा सन्नाटा रहा और दशकों की मेहनत के बाद 1999 में गए एक एक्सपीडिशन ने करीब 27,000 फीट की ऊंचाई पर मेलरी का शव खोज निकाला।
शव का सिर जमीन की ओर औंधा पड़ा मिला। एक पैर और शायद एक हाथ भी टूटा हुआ था, यानी गिरने से उनकी मौत हुई। बर्फ ने मेलरी का शव बहुत सहेजकर रखा था। जेब में रखी चि_ी भी सलामत थी।
बहुत कुछ मिला, बस वो कोडेक कैमरा ही नहीं मिला। फिर उम्मीद जगी कि वो कैमरा इरविन के पास रहा होगा। इरविन का शव खोजने कई लोग एवरेस्ट गए। कई विशेष अभियान चलाए गए।
एक सदी बाद भी पहेली का अहम हिस्सा गायब
आखिरकार अब ठीक एक सदी बाद इरविन का अवशेष मिल गया है। नैशनल जिओग्रैफिक ने बताया है कि उनकी एक टीम को नॉर्थ फेस के नीचे एक शव का अवशेष मिला और उन्हें यकीन है कि यह इरविन ही हैं।
बर्फ की आधी पिघली परत से बाहर झांकता एक जूता और उसमें घुसे पांव के अवशेष पर चढ़ा एक मोजा भी मिला, जिसपर एम्ब्रॉइडी से लिखा है: ए। सी। इरविन।
नैशनल जियोग्राफिक की इस टीम ने सितंबर में यह खोज की है। नैशनल जियोग्राफिक की रिपोर्ट में टीम के सदस्य जिमी चिन इस बहुप्रतीक्षित खोज का लम्हा यूं बताते हैं, ‘मैंने मोजा उठाया और वहां एक लाल चिप्पी दिखी, जिसपर सिला हुआ था: ए। सी। इरविन!"
इतिहास बदल सकता है माउंट एवरेस्ट में खोया एक कैमरा
टीम को उम्मीद है कि शायद इस ऐतिहासिक खोज से यह जानने में मदद मिले कि 1924 की जून में उस दिन एवरेस्ट पर क्या हुआ था। फिलहाल पहेली का एक अहम पीस गायब है, वो कोडेक कैमरा। हालांकि, खोजी टीम को यकीन है कि कैमरा भी आसपास ही कहीं होगा।
इतने सालों तक खोजने के लिए इतना अथाह इलाका था। कम-से-कम अब खोज का दायरा तो काफी छोटा हो गया है। चिन और उनकी टीम ने वो लोकेशन नहीं बताई है, जहां उन्हें इरविन के अवशेष मिले। इस डर में कि फिर ‘ट्रॉफी हंटरों’ की बाढ़ आ जाएगी। आखिरकार, इतने बड़े रहस्य को सुलझाने का चाव आकर्षक भी तो बहुत है! (डॉयचेवैले)
-मधु पाल
महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री और एनसीपी के दिग्गज नेता बाबा सिद्दीकी की मुंबई में गोली मारकर हत्या कर दी गई है।
मुंबई के बांद्रा इलाक़े में शनिवार शाम को उन पर हमला हुआ जिसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
लीलावती अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इस घटना के बाद से ही महाराष्ट्र की सियासत और मुंबई की फि़ल्मी नगरी बॉलीवुड में हडक़ंप मच गया है।
बाबा सिद्दीकी का बॉलीवुड फि़ल्मी कलाकारों के साथ बहुत गहरा रिश्ता था। उनके निधन पर बॉलीवुड के कई कलाकारों ने अपना दुख जताया है।
अभिनेता सलमान ख़ान बिग बॉस सीजऩ 18 की शूटिंग कर रहे थे जैसे ही उन्हें ये ख़बर मिली वो शूटिंग बीच में ही रोक कर लीलावती अस्पताल में सिद्दीकी परिवार से मुलाक़ात करने पहुंचे।
वहीं अभिनेता संजय दत्त और शिल्पा शेट्टी भी परिवार से मिलने अस्पताल में पहुंचे।
बॉलीवुड में थी गहरी पहचान
बाबा सिद्दीकी का नाम राजनीतिक गलियारों में तो था ही लेकिन बॉलीवुड में भी उनकी पहचान बहुत गहरी थी।
बाबा सिद्दीकी मुंबई के पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने बहुत बड़े जश्न के तौर पर इफ़्तार पार्टी का आयोजन शुरू किया।
वैसे इफ़्तार पार्टियां तो बहुत हुआ करती थीं लेकिन बाबा सिद्दीकी की इफ़्तार पार्टी बहुत बड़ी हुआ करती थी।
हमेशा से जिस तरह से बॉलीवुड के लिए फि़ल्मफ़ेयर अवॉर्ड महत्वपूर्ण रहा करता है वैसे ही हमेशा से बाबा सिद्दीकी की इफ़्तार पार्टी हुआ करती थी।
इस इफ़्तार पार्टी का हिस्सा बनना कलाकारों के रसूख को दर्शाता था। इस पार्टी में हर बड़े से बड़े कलाकार शामिल हुआ करते थे। सिर्फ फि़ल्मी कलाकार ही नहीं, हर बड़ा व्यापारी, मंत्री सब इस इफ़्तार पार्टी का हिस्सा हुआ करते थे।
बॉलीवुड से बाबा सिद्दीकी का रिश्ता
बाबा सिद्दीकी के बारे में पूरे साल में कोई ख़बर सुनाई दे या न दे लेकिन जब रमज़ान का महीना आता था तो वो चर्चा में ज़रूर रहते था।
बाबा सिद्दीकी का रिश्ता बॉलीवुड से कैसे जुड़ा?
इस पर बीबीसी हिंदी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर रामचंद्रन श्रीनिवासन कहते हैं, ‘शुरुआती दौर में बाबा की राजनीतिक कर्मभूमि बांद्रा थी। ये वही जगह है जहां अधिकतर फि़ल्मी हस्तियों के घर हैं। तब वो पॉलिटिकल करियर बना रहे थे। उसी समय उनकी मुलाक़ात सुनील दत्त से हुई।’
‘बाबा सिद्दीकी और सुनील दत्त साहब के बीच बहुत अपनापन था। यही अपनापन सुनील दत्त साहब के बेटे संजय दत्त के साथ भी था। संजय दत्त अक्सर बॉलीवुड की पार्टियों से ग़ायब रहते हैं लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि उन्होंने बाबा सिद्दीकी की इफ़्तार पार्टी में जाना कभी छोड़ा हो।’
वो कहते हैं, ‘जेल से जब भी संजय दत्त बाहर आये तो उन्होंने उसके बाद कोई पहली पार्टी अटेंड की तो वो बाबा सिद्दीकी की इफ़्तार पार्टी ही थी।’
सलमान ख़ान और बाबा सिद्दीकी की दोस्ती
सलमान और बाबा की दोस्ती बेहद पुरानी है। और यही वजह है कि ये दोनों कई सामाजिक सरोकार के मुद्दों के दौरान साथ आए।
साल 2020 और 2021 में हुए कोरोना लॉकडाउन के दौरान भी सलमान की टीम ने बाबा के बेटे ज़ीशान सिद्दीकी के साथ मिलकर ज़रूरतमंद लोगों की मदद का इंतज़ाम किया था।
इतना ही नहीं उस दौरान उन्होंने साथ मिलकर ऑक्सीजन से जूझते लोगों तक भी मदद पहुंचाई थी। (बाकी पेज 8 पर)
सलमान के बुरे वक़्त में भी बाबा ने उनका साथ दिया। सलमान जब हिट एंड रन केस और काला हिरण मामले को लेकर परेशानी में पड़े, बाबा सिद्दीकी उनके साथ खड़े थे।
जब भी सलमान ख़ान के केस की सुनवाई होती तो उस दौरान बाबा सिद्दीकी या तो कोर्ट रूम में उनके पास होते थे या फिर परिवार के साथ खड़े रहते थे।
अभी जब सलमान ख़ान को लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने जान से मारने की धमकी दी थी तब भी बाबा ने इस पर अपना अफ़सोस जताया था।
उन्होंने सलमान को जान से मारने की धमकी देने वालों को पकडऩे की मांग की थी।
सलमान और शाहरुख़ की करवाई थी दोस्ती
बाबा सिद्दीकी ने साल 2013 में हुई इफ़्तार पार्टी में सलमान और शाहरुख़ दोनों को बुलाया था।
आज सलमान और शाहरुख़ एक साथ दिखते हैं तो इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं रहती लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब ये दोनों एक दूसरे से मिलना भी पसंद नहीं करते थे।
तकऱीबन पांच साल से उनकी आपसी बातचीत बंद रही और ना ही कोई काम साथ में किया था।
लेकिन सलमान और शाहरुख़ की पांच साल पुरानी दुश्मनी को बाबा सिद्दीकी ने 2013 की इफ़्तार पार्टी में दोनों को गले लगवाकर खत्म करया था।
वरिष्ठ पत्रकार निशांत भूसे ने बताया, ‘बाबा सिद्दीकी ही थे जिन्होंने हिट एंड रन के मामले में सलमान ख़ान की पूरी मदद की। सलमान को जब भी कोई ख़तरा हुआ तो उनकी सिक्युरिटी का भी बंदोबस्त किया।’
‘सलमान ख़ान ने जब हॉस्पिटल जाकर बाबा की बॉडी देखी तो वो फूट फूट कर रोने लगे। बाबा की बेटी और पत्नी को संभाला।’
निशांत भूसे आगे कहते हैं, ‘बाबा के साथ जो हुआ उसके बाद सलमान ख़ान की सिक्योरिटी और बढ़ा दी जाएगी।’ (bbc.com/hindi)
-अनिल जैन
तमाम मीडिया संस्थानों और सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल एक बार फिर फर्जी साबित हुए. दोनों ही राज्यों-जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के चुनाव नतीजे एग्जिट पोल्स के ठीक उलट रहे। एग्जिट पोल्स में मुताबिक हरियाणा में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलना बताया गया था, जबकि जम्मू कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना जताई गई थी. लेकिन हरियाणा में बहुमत मिला भाजपा को और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस व कांग्रेस के गठबंधन को।
दरअसल भारत में एग्जिट पोल के अनुमान कभी-कभार ही सही निकलते हैं, ज्यादातर चुनावों में तो उनके औंधे मुंह गिरने का ही रिकॉर्ड है, जो इस बार भी कायम रहा।
दोनों राज्यों के नतीजों में एग्जिट पोल के अनुमान फेल होने के बावजूद एग्जिट पोल करने वाली किसी भी सर्वे एजेंसी, टीवी चैनल या अखबार ने इस बात पर खेद नहीं जताया है कि उसके द्वारा किया गया अथवा दिखाया गया एग्जिट पोल गलत साबित हुआ है। जाहिर है कि सारे मीडिया संस्थान शर्मनिरपेक्ष यानी निर्लज्ज हो चुके हैं।
दरअसल हर चुनाव में तमाम एग्जिट पोल की दुर्गति होने की अहम वजह यह है कि हमारे यहां एग्जिट पोल करने का कोई वैज्ञानिक तरीका विकसित ही नहीं हुआ है और भारत जैसे विविधता से भरे देश में हो भी नहीं सकता।
फिर हमारे यहां चुनाव को लेकर जिस बड़े पैमाने पर सट्टा होता है और टेलीविजन मीडिया का जिस तरह का लालची चरित्र विकसित हो चुका है, उसके चलते भी एग्जिट पोल की पूरी कवायद सट्टा बाजार के नियामकों और टीवी मीडिया इंडस्ट्री के एक संयुक्त कारोबारी उपक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। अक्सर सत्तारुढ़ दल भी इस उपक्रम में भागीदार बन जाता है।
इसलिए एग्जिट पोल्स दिखाने की कवायद को सिर्फ क्रिकेट के आईपीएल जैसे अश्लील और सस्ते मनोरंजक इवेंट के तौर पर ही लिया जा सकता, इसके अलावा कुछ नहीं।
-इमरान कुरैशी
पत्रकार और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश की हत्या के दो अभियुक्तों के ज़मानत पर रिहा होने के बाद विजयपुरा के एक मंदिर में माला पहनाकर दोनों को सम्मानित किया गया।
दोनों अभियुक्तों परशुराम वागमोरे और मनोहर यादवे को विजयपुरा जि़ले से गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने दोनों अभियुक्तों और छह अन्य अभियुक्तों को शुक्रवार को ज़मानत दी थी।
पांच सितंबर 2017 को गौरी लंकेश की हत्या उनके घर के बाहर गोली मारकर की गई थी, जिसके बाद बेंगलुरु पुलिस के विशेष जांच दल (एसआईटी) ने मामले की जांच की थी।
एसआईटी की जांच में सामने आया कि गौरी लंकेश की हत्या का संबंध तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर, सीपीआई नेता गोविंद पानसरे और स्कॉलर एमएम कलबुर्गी की हत्या से भी है।
श्रीराम सेना के जि़ला अध्यक्ष नीलकांत कंडगल ने बीबीसी हिंदी को बताया, ‘वो हिंदू कार्यकर्ता हैं। ज़मानत पर रिहा हुए थे, इसलिए हमने उनका स्वागत फूल और मालाओं से किया। हमने कालिका मंदिर में पूजा की और प्रार्थना की कि वे अदालत से बरी हो जाएं।’
मंदिर पहुंचने से पहले परशुराम वागमोरे और मनोहर यादवे ने विजयपुरा शहर के शिवाजी सर्किल पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा पर माला चढ़ाई। दोनों को मंदिर के अंदर समर्थकों की मौजूदगी में नीलकांत कंडगल और अन्य लोगों ने सम्मानित किया। इस मौके पर मीडिया को आने की अनुमति नहीं दी गई और न ही कोई जानकारी दी गई।
‘बलात्कारियों को माला पहनाई जा रही है’
गौरी लंकेश की बहन और इस मामले की शिकायतकर्ता कविता लंकेश ने बीबीसी हिंदी से कहा, "बलात्कारियों को माला पहनाई जा रही है और इन लोगों को बधाई दी जा रही है। हमारा समाज कहां पहुंच गया है?’
कविता का इशारा गोधरा कांड के बाद भडक़ी सांप्रदायिक हिंसा की शिकार बिलकिस बानो के सामूहिक बलात्कार के दोषियों को दी गई रिहाई और बधाई की ओर था।
सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की रिहाई को रद्द करते हुए उन्हें सज़ा काटने के लिए वापस जेल भेज दिया था।
हालांकि, नीलकांत कंडगल ने कहा, ‘हमारा मानना है कि वे इस मामले में शामिल नहीं हैं। वे निर्दोष हैं।’
इस मामले के 18 अभियुक्तों में से 16 को ज़मानत मिलने का मुख्य कारण ट्रायल में देरी थी। चार्जशीट में दर्ज 527 गवाहों में से अब तक लगभग 140 से पूछताछ की जा चुकी है और निकट भविष्य में मुक़दमे के पूरा होने की कोई संभावना नहीं है।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने मोहन नाइक उर्फ संपांजे को ज़मानत दे दी थी, लेकिन अभियोजन पक्ष ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।
इसके बाद केटी नवीन कुमार, अमित दिगवेकर और सुरेश एचएल को भी जुलाई 2024 में हाई कोर्ट से ज़मानत मिली। इसके बाद भरत कुमार, श्रीकांत पंगारकर, सुजीत कुमार और सुधाना गोंधकर को सितंबर, 2024 में ज़मानत मिली।
पिछले हफ़्ते सेशन कोर्ट ने वागमोरे और यादवे सहित आठ अभियुक्तों को ज़मानत दी थी। ज़मानत पाने वाले अन्य लोगों में अमित काले, राजेश डी बंगेरा, वासुदेव सूर्यवंशी, रुशिकेश देवदार, गणेश मिस्किन और अमृत रामचंद्र बद्दी शामिल हैं।
विकास पटेल उर्फ दादा उर्फ निहाल अभी भी फरार है। दो अन्य लोगों ने अभी तक अदालत का रुख नहीं किया है।
अभियुक्तों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), भारतीय शस्त्र अधिनियम और कर्नाटक संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए हैं।
अभियुक्तों के सम्मान पर ये प्रतिक्रिया आई
हरमिंदर कौर के ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सम्मान समारोह का वीडियो संलग्न करते हुए लिखा ‘गौरी लंकेश के हत्यारों को ज़मानत मिल गई। हत्यारों का खुलेआम हिंदू संगठनों ने स्वागत किया। यह बेहद घटिया है।’
अभिनेता प्रकाश राज ने एक्स पर एक अन्य पोस्ट में कहा, ‘इस देश में केवल हत्यारों और बलात्कारियों के लिए ज़मानत नियम है।।। शर्मनाक।’ लेकिन कार्यकर्ता और स्तंभकार शिव सुंदर पूरे मामले को अलग तरह से देखते हैं।
उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘सिद्धांत के तौर पर यह कहना सही है कि ट्रायल पूरा होने तक किसी भी आरोपी को जेल में नहीं रखा जाना चाहिए। समस्या यह है कि यह सिद्धांत बहुत भेदभावपूर्ण है।’
उन्होंने कहा, ‘हालांकि यह उन लोगों पर लागू नहीं होता जो सरकार का विरोध कर रहे हैं, लेकिन यह दक्षिणपंथियों पर लागू होता है। किसी आरोपी को पूरी सुनवाई अवधि के लिए जेल में रखना मानवाधिकार सिद्धांत नहीं है। इसे दक्षिणपंथियों या वामपंथियों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।’
शिव सुंदर ने कहा, ‘हम तेज़ी से सुनवाई के लिए विशेष अदालत की मांग कर रहे हैं। अभियोजन पक्ष ने भी ट्रायल को जल्द पूरा करने के प्रयास में करीब 150 गवाहों को छोडऩे पर सहमति जताई है।’
‘लेकिन बिलकिस बानो के मामले में जो हुआ, जिसमें आरोपियों का स्वागत किया गया और उन्हें माला पहनाई गई, वह भयानक है।’
वो कहते हैं, ‘गौरी के मामले में यह उनकी हत्या का जश्न मनाने जैसा है। यह 5 सितंबर 2017 को, जिस दिन उनकी हत्या हुई थी, उसे फिर से अनुभव करने जैसा है। यह भयानक है। समाज को यह संदेश देना खतरनाक है।’ (bbc.com/hindi)
- प्रवीण सिंधु
दशहरे (विजयादशमी) के मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में संघ प्रमुख मोहन भागवत का दिया भाषण इस समय राजनीतिक गलियारों में चर्चा में है।
ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता की तुलना भारत से की है। इसके साथ ही उन्होंने अन्य मुद्दों पर भी टिप्पणी की।
इस भाषण में मोहन भागवत ने ‘बांग्लादेश में हिंसा जैसी स्थिति भारत में पैदा करने की कोशिश’, ‘बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार’ और ‘आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर पर अत्याचार’ के मुद्दे पर टिप्पणी की।
मोहन भागवत के बयानों के मायने जानने के लिए बीबीसी मराठी ने राजनीतिक विश्लेषकों से बात की।
भारत में बांग्लादेश जैसे हालात पैदा करने की कोशिश
मोहन भागवत ने अपने भाषण में बांग्लादेश में डेढ़ महीने पहले पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भारत में बांग्लादेश जैसे हालात पैदा करने की कोशिश हो रही है।
मोहन भागवत ने कहा कि 'डीप स्टेट', 'वोकिज्म', 'कल्चरल मार्कि्सस्ट' शब्द इस समय चर्चा में हैं और ये सभी सांस्कृतिक परंपराओं के घोषित दुश्मन हैं।
उन्होंने कहा कि ‘सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं और जहां जहां जो कुछ भी भद्र, मंगल माना जाता है, उसका समूल उच्छेद (पूरी तरह से ख़त्म करना) इस समूह की कार्यप्रणाली का अंग है।‘
मोहन भागवत ने आगे कहा, ‘समाज में अन्याय की भावना पैदा होती है। असंतोष को हवा देकर उस तत्व को समाज के अन्य तत्वों से अलग और व्यवस्था के प्रति आक्रामक बना दिया जाता है।’
उन्होंने कहा, ‘व्यवस्था, कानून, शासन, प्रशासन आदि के प्रति अविश्वास और घृणा को बढ़ावा देकर अराजकता और भय का माहौल बनाया जाता है। इससे उस देश पर हावी होना आसान हो जाता है।’
‘तथाकथित ‘अरब स्प्रिंग’ से लेकर पड़ोसी बांग्लादेश में हाल की घटनाओं तक, एक ही पैटर्न देखा गया। हम पूरे भारत में इसी तरह के नापाक प्रयास देख रहे हैं।’
बीबीसी मराठी ने वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र साठे से पूछा कि आखऱि मोहन भागवत के बयान के क्या मायने हैं?
राजेंद्र साठे ने कहा, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की माक्र्सवादियों की आलोचना हमेशा ‘सांस्कृतिक माक्र्सवाद’ पर आधारित होती है। चूंकि भारत की संस्कृति ‘हिंदू संस्कृति’ है, इसलिए संघ ने हमेशा आरोप लगाया है कि भारत की संस्कृति ‘हिंदू संस्कृति’ है उसे ‘सांस्कृतिक माक्र्सवाद’ के माध्यम से नष्ट करने की कोशिश की जा रही है।’
वो कहते हैं, ‘भागवत के ऐसे बयान को 'डॉग व्हिसल’ कहा जाता है, जो संघ के अनुयायियों के लिए हमले का संकेत है।’
वरिष्ठ पत्रकार विवेक देशपांडे ने मोहन भागवत के ‘बाहरी ताक़तों’ वाले बयान की व्याख्या करते हुए एनजीओ के खिलाफ मोदी सरकार की कार्रवाई का जिक्र किया।
विवेक देशपांडे ने कहा, ‘विदेशी ताक़तें भारत में लोगों की भावनाओं को भडक़ा रही हैं, इस बयान का संबंध भारत में कई गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के खिलाफ मोदी सरकार द्वारा की गई हालिया कार्रवाई से है।’
वो कहते हैं, ‘सेंटर फॉर रिसर्च पॉलिसी जैसे कई एनजीओ के ख़िलाफ़ यह कार्रवाई की गई। क्योंकि संघ और मोदी सरकार का दावा है कि इन संगठनों को बाहरी लोग फंडिंग करते हैं और इनसे भारत विरोधी गतिविधियां करते हैं। मोहन भागवत यही सुझाव दे रहे हैं।’
देशपांडे कहते हैं, ‘संघ का दावा है कि दुनिया भर के कई अंतरराष्ट्रीय संगठन भारत में विभिन्न संगठनों को वित्तीय सहायता देते हैं, यह सहायता भारत में विकास में बाधा डालने के लिए है।’
उन्होंने कहा, ‘इससे पता चलता है कि भारत में कई गैर सरकारी संगठनों पर मोदी सरकार की कार्रवाई संघ के व्यापक एजेंडे का हिस्सा है। संघ के कारण ही यह कार्रवाई की गई है।’
भागवत के भाषण में अरब स्प्रिंग और बांग्लादेश के आंदोलन के जिक्र को लेकर देशपांडे कहते हैं, ‘मोहन भागवत ने अरब स्प्रिंग और बांग्लादेश की घटनाओं का जि़क्र किया। हालाँकि, इन दोनों घटनाओं का दुनिया भर में स्वागत किया गया है। अरब स्प्रिंग अधिनायकवाद और धार्मिक अतिवाद के विरोध के रूप में हुआ।’
वो कहते हैं, ‘अरब स्प्रिंग का उद्देश्य काफी हद तक लोकतांत्रिक था। इसी तरह बांग्लादेश में हुआ विद्रोह भी लोकतांत्रिक था।’
विवेक देशपांडे कहते हैं, ‘यह सच नहीं है कि यह चरमपंथियों और अमेरिका की साजि़श थी। यह केवल एक साजि़श सिद्धांत (कॉन्सपिरेसी थ्योरी) है। संघ की पूरी विचारधारा साजि़श सिद्धांत पर निर्भर करती है।’
‘इसलिए वे हर चीज़ को एक ही नज़रिए से देखते हैं कि हिंदू धर्म को मुसलमानों, ईसाइयों और मार्क्सवादियों से ख़तरा है, जो उनकी सोच का मूल है।’
देशपांडे ने कहा, ‘ये बात खुद गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में लिखी है। यह भी उस सिद्धांत का हिस्सा है।’
‘बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले’
मोहन भागवत ने अपने भाषण के दौरान बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक के मुद्दे पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा, ‘बांग्लादेश में हाल ही में हिंसक तरीके से सत्ता परिवर्तन हुआ। हिंदू समुदाय पर क्रूर अत्याचारों की परंपरा एक बार फिर देखने को मिली। इस बार उन अत्याचारों के विरोध में हिंदू समुदाय कुछ हद तक घर से बाहर निकला।’
‘लेकिन जब तक यह दमनकारी जिहादी प्रकृति है, तब तक वहां के हिंदुओं सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के सिर पर ख़तरे की तलवार लटकती रहेगी।’
भागवत ने यह भी कहा, ‘अब बांग्लादेश में पाकिस्तान को साथ लेने की चर्चा हो रही है। कौन से देश ऐसी चर्चा करके भारत पर दबाव बनाना चाहते हैं, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। इसका समाधान सरकार का विषय है।’
भागवत के इस बयान पर राजेंद्र साठे ने कहा, ‘बांग्लादेश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस और बांग्लादेश के अन्य महत्वपूर्ण नेताओं ने एक स्टैंड लिया है और स्पष्ट कर दिया है कि वे बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे। साथ ही, उन्होंने अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों का दौरा किया।’
वो कहते हैं, ‘संघ का असली दर्द यह है कि बांग्लादेश की राजनीति और समाज धर्मनिरपेक्ष है। अगर बांग्लादेश की व्यवस्था इस्लामी होती तो वे इसकी आलोचना कर सकते थे। अगर बांग्लादेश के हिंदू भारत आते तो संघ बता पाता कि वहां के हिंदू किस तरह संकट में हैं। हकीकत में ऐसा नहीं हुआ।’
साठे आगे कहते हैं, ‘एक ही समय में कई विरोधाभासी रुख़ अपनाना संघ और बीजेपी की विशेषता है। इसीलिए वे कहते हैं कि बांग्लादेश की सरकार को वहां के अल्पसंख्यकों का ख्याल रखना चाहिए, अल्पसंख्यकों के मंदिरों की रक्षा करनी चाहिए। भारत को इस बारे में बात करनी चाहिए।’
वो कहते हैं, ‘बांग्लादेश के दृष्टिकोण से भारत एक बाहरी शक्ति है। हिंदू होने के नाते हस्तक्षेप की मांग करना उनके लिए ग़लती होगी। जब भारत में गोहत्या के मुद्दे पर मदरसों पर हमले किए जाते हैं, मुसलमानों को मारा जाता है, बांग्लादेश या मुस्लिम देश चिंता व्यक्त करते हैं, तो क्या संघ काम करेगा?’
दशहरा के मौके पर दिए गए इस भाषण में मोहन भागवत ने हालांकि बांग्लादेश के राजनीतिक हालात पर ज़्यादा ज़ोर दिया है, लेकिन उन्होंने भारत के मुद्दों पर भी टिप्पणी की है। इन्हीं में से एक है पश्चिम बंगाल की घटना।
‘पश्चिम बंगाल में महिला डॉक्टरों पर अत्याचार’
मोहन भागवत ने पश्चिम बंगाल के आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर के साथ हुए रेप-मर्डर मामले पर टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि कोलकाता के आरजी कर अस्पताल की घटना उन घटनाओं में से एक है जो पूरे समाज को कलंकित करती है।
मोहन भागवत ने कहा, ‘इतने गंभीर अपराध के बाद भी कुछ लोगों ने अपराधियों को बचाने के घृणित प्रयास किए। इससे पता चलता है कि अपराध, राजनीति और बुराई का संयोजन हमें कैसे भ्रष्ट कर रहा है।’
भागवत के बयान पर विवेक देशपांडे ने प्रताडऩा की अन्य घटनाओं का जि़क्र किया। साथ ही, अन्य मामलों पर भागवत की चुप्पी का मुद्दा भी उठाया और समग्र रुख़ पर सवाल उठाया।
विवेक देशपांडे कहते हैं, ‘मोहन भागवत आरजी कर अस्पताल की घटना के बारे में बात करते हैं, लेकिन जब उत्तर प्रदेश में हाथरस में अत्याचार हुआ, तो उन्होंने इसके बारे में एक भी शब्द नहीं कहा। इसके विपरीत उन्होंने अपने भाषण में कहा कि सिर्फ इसलिए कि इतने बड़े देश में ऐसी घटनाएं होती हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि देश में बहुत खराब माहौल है।’
वो कहते हैं, ‘मोहन भागवत ने देश में महिला पहलवानों के यौन उत्पीडऩ के मामले में एक भी शब्द नहीं बोला है। पश्चिम बंगाल के आरजी कर में हुई घटना स्पष्ट रूप से आपराधिक प्रकृति की है। उस मूल घटना में कोई राजनीति नहीं है, घटना के बाद राजनीति आ गई।’
‘हालांकि, महिला पहलवानों के यौन उत्पीडऩ मामले में आरोपी एक राजनेता हैं। बृजभूषण सिंह बीजेपी के संघवादी नेता हैं। वो यह नहीं कह सकते कि उनका संघ या बीजेपी से कोई संबंध नहीं है।’
देशपांडे ने भागवत से सवाल करते हुए कहा कि, ‘मोहन भागवत आरजी कर अस्पताल की घटना का जि़क्र करते हैं और बृजभूषण का जि़क्र नहीं करते, जिन्होंने देश का गौरव महिला पहलवानों के साथ दुर्व्यवहार किया। यह किस तरह की भारतीय संस्कृति है।’ (bbc.com/hindi)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
कलियुग के बारे में कहा गया है कि ऐसे दुष्ट समय में जब भाई भाई का दुश्मन होगा, पति पत्नी में झगड़े होंगे और युवा बुजुर्गों को घर बदर करेंगे तब ईश्वर की कठोर साधना करने की किसी को फुर्सत नहीं होगी, ऐसे में केवल राम नाम के जप से ही ईश्वर प्रसन्न हो जाएंगे। ऐसा समय हमारे जीवन में आजकल हर तरफ घर घर की कहानी बनकर दिख रहा है जब महान विभूतियों का मिलना हर क्षेत्र में मुश्किल होता जा रहा है। राजनीति और उद्योग जगत में तो अच्छे लोगों की खोज और भी मुश्किल हो गई है जहां अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलने के लिए अपने गुरु समान वरिष्ठों को मार्गदर्शक का ठप्पा लगा कर अंधेरे कोनों में धकेल दिया जाता है और साम दाम दंड भेद से येन केन प्रकारेण शीर्ष पर पहुंचने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं। यही कारण है कि अमीरी और प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उन्हें वैसा सम्मान नहीं मिलता जैसा हाल ही में दिवंगत रतन टाटा को मिला है। देश के हर हिस्से और हर वर्ग से रतन टाटा के देहावसान से दुखी होने के समाचार हैं।
ऐसा नहीं कि रतन टाटा किसी झोंपड़ी में रहते थे और फकीरों जैसा जीवन जी रहे थे। उनके पास रहने के लिए अच्छा खासा घर था, पहनने के लिए बढिय़ा सूट बूट और टाई थी,सेवा के लिए नौकर चाकर थे। खेलने और मन बहलाने के लिए अच्छी नस्ल के कुत्ते थे लेकिन इतना सब होने के बावजूद उनके देहांत पर देश के काफी नागरिक दुखी हो रहे हैं, उसके सबसे बड़े निम्न तीन कारण हैं जो उन्हें अपने अन्य समकालीन उद्योगपतियों से बेहतर बनाते हैं,1.वे अपनी अमीरी का फूहड़ प्रदर्शन नहीं करते थे, 2. उनकी कंपनियों में कर्मचारियों से गुलामों की तरह बेतहाशा काम नहीं कराया जाता और उन्हें अच्छी वर्किंग कंडीशन मिलती हैं और 3.उन्होंने कैंसर अस्पताल जैसी सुविधाएं आम जनता को उपलब्ध कराकर करुणा और सेवा के काफी काम किए हैं। इन्हीं कारणों से उनका सकल व्यक्तित्व आज के अधिकांश चर्चित संतों, राजनीतिज्ञों और उद्योगपतियों को शर्मिंदा करने में सक्षम है।
ईसा मसीह ने बहुत पहले कहा था कि सीधी राह चलकर कोई बहुत अमीर नहीं बन सकता और अमीरों के लिए स्वर्ग के दरवाजे कभी नहीं खुलते।सच यह भी है कि हम सब तुलनात्मक रूप से अच्छे या बुरे हैं और कोई भी अपने आप में पूर्ण नहीं है। इसीलिए उन्हें बेहतर माना जाता है जो अपने दूसरे प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में अधिक उदार और शालीन हैं। रतन टाटा के लंबे करियर में नीरा राडिया टेप ने जरूर उनकी छवि दागदार दी। असम के उल्फा आतंकवादियों की मदद और काम के बदले करुणानिधि के परिवार की ट्रस्ट को कई करोड़ की मदद के आरोप उन पर भी लगे। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण और पश्चिम बंगाल में नैनो प्रकरण के छींटे भी उनके नेतृत्व पर पड़े थे। इन सबके बावजूद वे कोयले की खदान में छोटे हीरे की तरह तो हैं ही।
वर्तमान दौर में जब संतों में संतोष नहीं रहा और आधुनिक संत, गुरु और मठाधीश तक आलीशान पांच सितारा आश्रम बनाने लगे, आलीशान कारों और प्राइवेट जेट में घूमने लगे तब अति महत्वाकांक्षी नेताओं और उद्योगपतियों में नदारद संवेदनशीलता, सहृदयता और सेवा की भावना रतन टाटा में काफी हद तक अक्षुण्ण रही । यही कारण है कि राजनीति और उद्योग जगत की विभूतियों में हमे कोई दूसरा अब्दुल कलाम और रतन टाटा जैसा उत्कृष्ट व्यक्ति नहीं दिखता जिसकी सादगी, कर्मठता और शालीनता दुर्लभ हो गई है।लोक जीवन में रहने वाली किसी भी विभूति के लिए आम अवाम का सम्मान सबसे बड़ा पुरस्कार है।कलियुग के भ्रष्ट से भ्रष्टतर होते दौर में रतन टाटा निश्चित रूप से कुछ अलग सोच के उद्योगपति रहे।
ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और देश के अन्य उद्योगपतियों को उनकी तरह आगे बढऩे की शक्ति प्रदान करें।
-पुष्य मित्र
एक तारीख सूर्योदय से शुरू होती है और अगले सूर्योदय को खत्म हो जाती है। एक तारीख रात बारह बजे शुरू होती है और 24 घंटे बाद फिर रात बारह बजे खत्म हो जाती है।
इसके बाद आती है हमारे पंडितों की तारीख, जो कहती है आज दोपहर बारह बजकर 35 मिनट पर अष्टमी शुरू होगी जो अगले दिन सुबह ग्यारह बजे खत्म होगी, मगर अष्टमी आज नहीं कल होगी और कल ही दोपहर बाद नवमी भी होगी।
हमारे ज्योतिष शास्त्र के प्रकांड विद्वानों द्वारा तैयार इस स्पेशल कैलेंडर को जिसे हम पंचांग कहते हैं, नासा में काम करने वाला भारतीय वैज्ञानिक भी आंख मूंद कर मान लेता है।
कोई नहीं कहता, पंडित जी जरा अपना कैलेंडर सुधार लीजिए। ऐसा क्या कैलेंडर बना लिए हैं, जिसे आप ही समझ पाते हैं, आप ही उसकी व्याख्या कर पाते हैं।
महाराज आप ही कहते हैं कि दिन सूर्योदय के हिसाब से होता है, फिर आपकी तिथि क्यों गड़बड़ा रही है। सिर्फ इसलिए कि आपके साल के हिसाब किताब में ही लोचा है। इसलिए आपको बारह साल बाद एक मलमास जोडऩा पड़ता है। ये न जोड़ें तो हम हिंदू भी मुसलमानों की तरह हर मौसम में होली और दुर्गापूजा मनाएं, जैसे वे हर मौसम में ईद और बकरीद मनाया करते हैं।
जब विज्ञान उन्नत नहीं था तो हम चांद की कलाओं को देखकर तारीख तय करते थे। मगर जब हमने सूर्य की स्थितियों को समझना शुरू किया तो सौर कैलेंडर बने। भारत में भी बने। मगर ज्यादातर हिंदू और मुसलमान आज भी चंद्र कैलेंडर से चिपके हैं। क्योंकि उनका धर्म उन्हें अपनी पौराणिक मूर्खताओं को छोडऩे की इजाजत नहीं देता।
कई दफा मुझे लगता है कि अपने पूर्वजों की मूर्खताओं और पूर्वाग्रहों या संयमित शब्द में कहें तो उनके ज्ञान की सीमाओं से चिपके रहने का ही नाम धर्म है। हम भी चिपके हैं। इसलिए बीच दोपहर में 12 बजकर 40 मिनट पर हमारा नया दिन शुरू होता है और हम कोई बहस नहीं करते। चुपचाप मान लेते हैं।
ये भी नहीं पूछते कि पंडित जी घंटा मिनट तो आपके पास नहीं था, ये तो पश्चिम ने दिया है। ये आप कैसे घुसा लेते हैं अपने पंचांग में।
मगर नहीं, धर्म के मामले में जो पंडित जी कह दें वही सही। इसलिए आज अष्टमी भी है और नवमी भी। अष्टमी कल भी थी। कल सप्तमी भी थी। पंडित जी जानते हैं, यह कन्फ्यूजन है तभी उनकी पूछ है। इसलिए भारतीय कैलेंडर का कंफ्यूजन बना रहे।
-अभिनव गोयल
हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने ज्यादातर चुनावी विश्लेषकों को गलत साबित कर दिया है।
दस साल सत्ता में रहने के बाद लगातार तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी राज्य में सरकार बनाने जा रही है।
बीजेपी ने राज्य की कुल 90 विधानसभा सीटों में 48 पर जीत दर्ज की है।
हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में 10 में से 5 सीटें हाथ से खोने वाली सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए कहा जा रहा था कि ये चुनाव आसान नहीं होंगे।
यहां तक की चुनाव के बाद हुए हर एग्जिट पोल में भी पूर्ण बहुमत से कांग्रेस की सरकार बनने का दावा किया गया था।
नतीजों से पहले सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक पर किसान, जवान और पहलवान के मुद्दे को बीजेपी की हार के लिए जि़म्मेदार ठहराया जा रहा था। लेकिन जब मतदान की पेटियां खुलीं तो नतीजों को एक बड़े उलटफेर की तरह देखा गया।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बीजेपी ने हरियाणा में दस साल की कथित एंटी इंकम्बेंसी के बावजूद सत्ता कैसे हासिल की?
वो कौन से समीकरण थे, जिसने न सिर्फ कांग्रेस बल्कि राज्य की पूरी राजनीति को बदलकर रख दिया?
बीजेपी के लिए कितना मुश्किल था चुनाव
विधानसभा चुनावों से करीब छह महीने पहले बीजेपी ने हरियाणा में मनोहर लाल की जगह नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाया।
उनके जरिए पार्टी ने राज्य के ओबीसी समाज को लामबंद करने की कोशिश की। हालांकि उस वक्त अधिकतर राजनीतिक विश्लेषकों का दावा था कि यह प्रयोग सफल नहीं होगा।
भले बीजेपी ने राज्य में जीत का आंकड़ा पार कर लिया है लेकिन मुख्यमंत्री नायब सैनी कैबिनेट के कुल 12 में से 9 मंत्री अपना चुनाव हार गए हैं।
यहां तक की नायब सैनी और अनिल विज जैसे बड़े नेताओं की जीत का अंतर भी कुछ खास बड़ा नहीं है।
इतना ही नहीं राज्य में 10 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां बीजेपी की जीत का अंतर 5 हजार से भी कम है।
इन सीटों में उचाना कलां, दादरी, पूंडरी, असंध, होडल, महेंद्रगढ़, अटेली, सफीदों, घरौंडा और राई विधानसभा शामिल है।
अटेली और पूंडरी विधानसभा को छोडक़र बाकि की आठ सीटों पर हारने वाले उम्मीदवार कांग्रेस पार्टी के हैं। यही वजह है कि मतगणना के दिन देर शाम तक भी कांग्रेस अपनी जीत को लेकर उम्मीद लगाए बैठी थी।
गैर जाटों की लामबंदी
साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा में पहली बार सरकार बनाई। पार्टी ने गैर जाट यानी पंजाबी खत्री समुदाय से आने वाले मनोहर लाल को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया।
इसी के साथ पार्टी ने राज्य में गैर जाट समाज को लामबंद करना शुरू कर दिया। बीजेपी ने 2019 का विधानसभा चुनाव भी उनके ही चेहरे पर लड़ा।
2024 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने ओबीसी समाज से आने वाले नायब सैनी को चुना।
वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस की बागडोर जाट समुदाय से आने वाले भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने संभाली। हालांकि कांग्रेस ने उन्हें आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री का चेहरा चुनाव में घोषित नहीं किया था।
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, ‘चुनावों में जाटों को लेकर एक नैरेटिव बन गया था कि अगर कांग्रेस सरकार आई तो भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री होंगे। इसके खिलाफ बीजेपी ने गैर जाट समाज को एकजुट करने की कोशिश की और इस कोशिश में ओबीसी के साथ-साथ दलित वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा भी पार्टी के खाते में गया।’
कांग्रेस के 10 उम्मीदवार ऐसे हैं जिनकी हार का अंतर पांच हजार वोटों से भी कम का है।
राजनीति के जानकारों का ऐसा मानना है कि हरियाणा में जाटों की आबादी करीब 25 प्रतिशत और ओबीसी आबादी करीब 40 प्रतिशत है।
वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल भी जाट बनाम गैर जाट के नाम पर चुनाव के पोलराइज्ड होने की बात करते हैं।
वे कहते हैं, ‘हाल के लोकसभा चुनावों में संविधान के मुद्दे पर कांग्रेस को दलितों का वोट मिला, लेकिन इस बार राज्य में दलितों के एक हिस्से ने खुद को गैर जाटों के साथ शामिल कर लिया। लोगों को डर हो गया कि कांग्रेस आई तो जाट मुख्यमंत्री बन जाएगा।’
दलितों में इसी डर का जिक्र करते हुए बुधवार को इंडियन एक्सप्रेस में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने एक लेख लिखा। उन्होंने लिखा कि हरियाणा में ‘जाटशाही’ के डर ने दलितों को कांग्रेस से दूर करने का काम किया।
सिरसा से कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा की नाराजग़ी ने भी इस डर को बढ़ाने का काम किया। विजय त्रिवेदी कहते हैं, ‘समय रहते कुमारी शैलजी की नाराजगी को दूर नहीं किया गया और उनके साथ जो बर्ताव हुआ उससे राज्य में दलित वोट बैंक पर उसका सीधा प्रभाव पड़ा।’
वहीं दूसरी तरफ भिवानी के वरिष्ठ पत्रकार इन्द्रवेश दुहन कहते हैं कि कांग्रेस का मतदाता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पीछे लामबंद होने को तैयार नहीं था।
वे कहते हैं, ‘बीजेपी ने 3 अक्टूबर को अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन दिया था, जिसकी खूब चर्चा हुई। उसका शीर्षक था-भूलना मत इन्हें। इसमें काले रंग में भूपेंद्र सिंह हुड्डा का चेहरा और दलितों के साथ उत्पीडऩ की खबरों को लगाया गया था।’
इन्द्रवेश कहते हैं, ‘इस विज्ञापन का एक ही मतलब था कि पार्टी बार-बार गैर जाट और दलितों को यह याद दिलाना चाह रही थी कि अगर कांग्रेस आई तो फिर से जाट सत्ता में होंगे और उत्पीडऩ का दौर शुरू हो जाएगा।’
एंटी इंकम्बेंसी से मुकाबला
विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मनोहर लाल को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाकर बीजेपी ने एंटी इंकम्बेंसी को कम करने की कोशिश की।
साढ़े नौ साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे मनोहर लाल को चुनावी रैलियों से भी दूर रखा गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में चार रैलियां कीं, जिसमें सिर्फ एक रैली में मनोहर लाल दिखाई दिए। उनका चेहरा चुनावी पोस्टरों पर भी दिखाई नहीं दिया।
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, ‘मनोहर लाल से नाराजग़ी न सिर्फ सरकार बल्कि संगठन को भी थी। वे कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं करते थे। हरियाणा में नेता को एक ऐसे सामाजिक व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है जो बैठकी करते हैं, लोगों से मिलते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं करते थे। उनकी जगह नायब सैनी विनम्र व्यक्ति हैं, जो प्यार से बात करना जानते हैं।’
दूसरी तरफ बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र के ज़रिए जनता की नाराजग़ी को दूर करने की कोशिश की।
पार्टी ने जनता से अपने संकल्प पत्र में 20 वादे किए, जिसमें बिना ‘खर्ची पर्ची’ के 2 लाख नौकरियां और 24 फसलों को एमएसपी पर खरीदना शामिल था।
एंटी इंकम्बेंसी को कम करने की कोशिश में बीजेपी ने करीब 35 फीसदी मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए, जिसमें कई मंत्री भी शामिल थे।
यहां तक की मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और डिप्टी स्पीकर रणबीर सिंह गंगवा की सीटों को भी बदल दिया गया।
नौकरी के सवाल पर कांग्रेस को घेरा
कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में 500 रुपये में गैस सिलेंडर, बुज़ुर्गों को 6 हज़ार रुपये पेंशन के साथ-साथ 2 लाख सरकारी नौकरियों का वादा किया।
जानकारों के मुताबिक युवाओं को नौकरी देने के वादे ने कांग्रेस की मुश्किलें हल करने की बजाय और बढ़ा दी।
वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल कहते हैं, ‘चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के कई नेताओं ने बयान दिए कि वो 2 लाख नौकरियों में से अपने क्षेत्र में पांच से दस हज़ार नौकरियां लगाएंगे। इससे हरियाणा के गैर जाट समाज से आने वाले युवाओं में नाराजग़ी बढ़ी।’
वे कहते हैं, ‘गैर जाट समाज को लगा कि अब उनके बच्चों को मेरिट पर नौकरी नहीं मिलेगी, बल्कि कोटा सिस्टम लागू हो जाएगा और एक खास समुदाय के युवाओं को तवज्जो मिलेगी।’
कांग्रेस ने अग्निवीर योजना के ज़रिए भी युवाओं से जुडऩे की कोशिश की और चुनावी सभाओं में ज़ोर-शोर से इसे लेकर बीजेपी की आलोचना की।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि राज्य में बेरोजग़ारी को अग्निवीर योजना ने बढ़ाने का काम किया है। उन्होंने कहा, ‘प्रदेश से पहले हर साल पांच हजार युवा फौज में भर्ती होते थे, लेकिन अब केवल 250 ही भर्ती होते हैं।
अग्निवीर मुद्दे पर पार्टी को मुश्किल में देख अमित शाह ने भिवानी में हुई एक रैली में यहां तक एलान कर दिया कि, ‘हरियाणा के एक भी अग्निवीर को वहां (सेना) से अगर वापस आना पड़ता है तो वह नौकरी के बिना नहीं रहेगा और इसकी जि़म्मेदारी भारतीय जनता पार्टी की है।’
उनके अलावा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने भी अग्निवीर जैसे मुद्दे से निपटने के लिए कई बड़ी घोषणाएं कीं, जिसमें सिपाही, माइनिंग गार्ड, फॉरेस्ट गार्ड जैसी भर्तियों में दस प्रतिशत आरक्षण देना शामिल है।
आरएसएस की भूमिका
विधानसभा चुनाव में बीजेपी के दो और कांग्रेस के एक बागी नेता ने निर्दलीय लडक़र चुनाव जीता।
हिसार से सावित्री जिंदल और गन्नौर सीट से बीजेपी के बागी देवेंद्र कादियान ने जीत दर्ज की, वहीं कांग्रेस के बागी राजेश जून ने बहादुरगढ़ से विजय हासिल की।
कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी ने चुनाव में अपने उम्मीदवारों का एलान करने में कम समय लिया।
विजय त्रिवेदी कहते हैं, ‘बागी उम्मीदवारों के अलावा ऐसे भी बहुत लोग होते हैं जो चुनाव में खड़े तो नहीं होते लेकिन उनकी नाराजग़ी बहुत नुकसान कर सकती है। ये मुश्किल काम हरियाणा में संघ ने किया। उसने लोगों को मनाने में बड़ी भूमिका निभाई।’
वे कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खराब प्रदर्शन के बाद संघ को यह पता था कि विधानसभा चुनाव आसान नहीं होने वाला है। उनका ग्राउंड पर बड़ा नेटवर्क है, घर-घर तक पहुंच है। बीजेपी के कामों को लोगों तक पहुंचाने का काम उन्होंने बहुत अच्छे से किया है।’
त्रिवेदी कहते हैं, ‘संघ नाराज से नाराज व्यक्ति को भी मना लेता है, वहीं कांग्रेस में ऐसा दिखाई नहीं देता। राहुल गांधी ने अशोक गहलोत को हरियाणा कोऑर्डिनेटर बनाया था। उन्हें भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा के बीच की नाराजग़ी को दूर करना चाहिए था, जो इतना मुश्किल काम नहीं था, लेकिन वे नहीं कर पाए।’
एक तरफ संघ का ग्राउंड पर मज़बूत नेटवर्क दिखाई देता है तो दूसरी तरफ कांग्रेस इससे जूझती हुई नजऱ आती है।
आदेश रावल कहते हैं, ‘हरियाणा में कांग्रेस पार्टी के पास 12 साल से ब्लॉक और जि़ला अध्यक्ष नहीं हैं। आपस की राजनीति इसका एक बड़ा कारण है। संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की ये बड़ी विफलता है कि वे कुछ कर नहीं पाए।’
वे कहते हैं, ‘अगर ब्लॉक और जिला अध्यक्ष और प्रदेश कमेटी ही नहीं होगी तो बूथ पर वोटर को कौन लेकर जाएगा? कौन होगा जो लोगों को कांग्रेस की नीतियां समझाएगा? इसकी कमी एक बड़ा कारण है कि कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ रहा है।’ (bbc.com/hindi)
-रेहान फजल
सन् 1992 में इंडियन एयरलाइंस के कर्मचारियों के बीच एक अद्भुत सर्वेक्षण करवाया गया। उनसे पूछा गया कि दिल्ली से मुंबई की उड़ान के दौरान ऐसा कौन सा यात्री है जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है? सबसे अधिक वोट रतन टाटा को मिले।
जब इसका कारण ढूंढने की कोशिश की गई तो पता चला कि वो अकेले वीआईपी थे जो अकेले चलते थे। उनके साथ उनका बैग और फाइलें उठाने के लिए कोई असिस्टेंट नहीं होता था।
जहाज के उड़ान भरते ही वो चुपचाप अपना काम शुरू कर देते थे। उनकी आदत थी कि वो बहुत कम चीनी के साथ एक ब्लैक कॉफी माँगते थे।
उन्होंने कभी भी अपनी पसंद की कॉफी न मिलने पर फ्लाइट अटेंडेंट को डाँटा नहीं था। रतन टाटा की सादगी के अनेक किस्से मशहूर हैं।
गिरीश कुबेर टाटा समूह पर चर्चित किताब ‘द टाटाज़ हाउ अ फ़ैमिली बिल्ट अ बिजऩेज़ एंड अ नेशन’ में लिखते हैं, ‘जब वो टाटा संस के प्रमुख बने तो वो जेआरडी के कमरे में नहीं बैठे। उन्होंने अपने बैठने के लिए एक साधारण सा छोटा कमरा बनवाया। जब वो किसी जूनियर अफसर से बात कर रहे होते थे और उस दौरान कोई वरिष्ठ अधिकारी आ जाए तो वो उसे इंतजार करने के लिए कहते थे। उनके पास दो जर्मन शैफर्ड कुत्ते होते थे ‘टीटो’ और ‘टैंगो’ जिन्हें वो बेइंतहा प्यार करते थे।’
‘कुत्तों से उनका प्यार इस हद तक था कि जब भी वो अपने दफ़्तर बॉम्बे हाउस पहुंचते थे, सडक़ के आवारा कुत्ते उन्हें घेर लेते थे और उनके साथ लिफ़्ट तक जाते थे। इन कुत्त्तों को अक्सर बॉम्बे हाउस की लॉबी में टहलते देखा जाता था जबकि मनुष्यों को वहाँ प्रवेश की अनुमति तभी दी जाती थी, जब वो स्टाफ के सदस्य हों या उनके पास मिलने की पूर्व अनुमति हो।’
कुत्ते की बीमारी
जब रतन के पूर्व सहायक आर वैंकटरमणन से उनके बॉस से उनकी निकटता के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था, ‘मिस्टर टाटा को बहुत कम लोग करीब से जानते हैं। हाँ दो लोग हैं जो उनके बहुत करीब हैं, ‘टीटो’ और ‘टैंगो’, उनके जर्मन शैफर्ड़ कुत्ते। इनके अलावा कोई उनके आसपास भी नहीं आ सकता।’
मशहूर व्यवसायी और लेखक सुहेल सेठ भी एक किस्सा सुनाते हैं, ‘6 फरवरी, 2018 को ब्रिटेन के राजकुमार चाल्र्स को बकिंघम पैलेस में रतन टाटा को परोपकारिता के लिए ‘रौकफेलर फ़ाउंडेशन लाइफटाइम अचीवमेंट’ पुरस्कार देना था। लेकिन समारोह से कुछ घंटे पहले रतन टाटा ने आयोजकों को सूचित किया कि वो वहाँ नहीं आ सकते क्योंकि उनका कुत्ता टीटो अचानक बीमार हो गया है। जब चार्ल्स को ये कहानी बताई गई तो उन्होंने कहा ये असली मर्द की पहचान है।’
एकाकी और दिखावे से कहीं दूर थे रतन टाटा
जेआरडी की तरह रतन टाटा को भी उनकी वक्त की पाबंदी के लिए जाना जाता था। वो ठीक साढ़े छह बजे अपना दफ्तर छोड़ देते थे।
वो अक्सर चिढ़ जाते थे अगर कोई दफ़्तर से संबंधित काम के लिए उनसे घर पर संपर्क करता था। वो घर के एकाँत में फाइलें और दूसरे कागज़़ पढ़ा करते थे।
अगर वो मुंबई में होते थे तो वो अपना सप्ताहाँत अलीबाग के अपने फार्म हाउस में बिताते थे। उस दौरान उनके साथ कोई नहीं होता था सिवाए उनके कुत्तों के। उनको न तो घूमने का शौक था और न ही भाषण देने का। उनको दिखावे से चिढ़ थी।
बचपन में जब परिवार की रोल्स-रॉयस कार उन्हें स्कूल छोड़ती थी तो वो असहज हो जाते थे। रतन टाटा को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि जि़द्दी स्वभाव रतन की खानदानी विशेषता थी जो उन्हें जेआरडी और अपने पिता नवल टाटा से मिली थी।
सुहेल सेठ कहते हैं, ‘अगर आप उनके सिर पर बंदूक भी रख दें, तब भी वो कहेंगे, मुझे गोली मार दो लेकिन मैं रास्ते से नहीं हटूँगा।’
अपने पुराने दोस्त के बारे में बॉम्बे डाइंग के प्रमुख नुस्ली वाडिया ने बताया, ‘रतन एक बहुत ही जटिल चरित्र हैं। मुझे नहीं लगता कि कभी किसी ने उन्हें पूर्ण रूप से जाना है। वो बहुत गहराइयों वाले शख़्स हैं। निकटता होने के बावजूद मेरे और रतन के बीच कभी भी व्यक्तिगत संबंध नहीं रहे। वो बिल्कुल एकाकी हैं।’
कूमी कपूर अपनी किताब ‘एन इंटिमेट हिस्ट्री ऑफ पारसीज’ में लिखती हैं, ‘रतन ने मुझसे खुद स्वीकार किया था कि वो अपनी निजता को बहुत महत्व देते हैं। वो कहते थे शायद मैं बहुत मिलनसार नहीं हूँ, लेकिन असामाजिक भी नहीं हूँ।’
रतन की दादी नवाजबाई टाटा ने उन्हें पाला
टाटा की जवानी के उनके एक दोस्त याद करते हैं कि टाटा समूह के अपने शुरुआती दिनों में रतन को अपना सरनेम एक बोझ लगता था।
अमेरिका में पढ़ाई के दौरान ज़रूर वो बेफिक्र रहते थे क्योंकि उनके सहपाठियों को उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पता नहीं होता था।
रतन टाटा ने कूमी कपूर को दिए इंटरव्यू में स्वीकार किया था, ‘उन दिनों विदेश में पढऩे के लिए रिजर्व बैंक बहुत कम विदेशी मुद्रा इस्तेमाल करने की अनुमति देता था। मेरे पिता कानून तोडऩे के हक में नहीं थे इसलिए वो मेरे लिए ब्लैक में डॉलर नहीं खऱीदते थे। इसलिए अक्सर होता था कि महीना खत्म होने से पहले मेरे सारे पैसे खत्म हो जाते थे। कभी कभी मुझे अपने दोस्तों से पैसे उधार लेने पड़ते थे। कई बार तो कुछ अतिरिक्त पैसे कमाने के लिए मैंने बर्तन तक धोए।’
रतन सिर्फ 10 साल के थे जब उनके माता-पिता के बीच तलाक हो गया। जब रतन 18 वर्ष के हुए तो उनके पिता ने एक स्विस महिला सिमोन दुनोयर से शादी कर ली। उधर उनकी माता ने तलाक के बाद सर जमसेतजी जीजीभॉय से विवाह कर लिया। रतन को उनकी दादी लेडी नवाज़बाई टाटा ने पाला।
रतन अमेरिका में सात साल रहे। वहाँ कॉर्नेल विश्वविद्यालय से उन्होंने स्थापत्य कला और इंजीनियरिंग की डिग्री ली। लॉस एंजिलिस में उनके पास एक अच्छी नौकरी और शानदार घर था। लेकिन उन्हें अपनी दादी और जेआरडी के कहने पर भारत लौटना पड़ा।
इस वजह से उनकी अमेरिकी गर्लफ्रेंड के साथ उनका रिश्ता आगे नहीं बढ़ सका। रतन टाटा ताउम्र अविवाहित रहे।
साधारण मजदूर की तरह नीला ओवरऑल पहनकर करियर की शुरुआत
सन् 1962 में रतन टाटा ने जमशेदपुर में टाटा स्टील में काम करना शुरू किया।
गिरीश कुबेर लिखते हैं, ‘रतन जमशेदपुर में छह साल तक रहे जहाँ शुरू में उन्होंने एक शॉपफ्लोर मज़दूर की तरह नीला ओवरऑल पहनकर अप्रेंटिसशिप की। इसके बाद उन्हें प्रोजेक्ट मैनेजर बना दिया गया। इसके बाद वो प्रबंध निदेशक एसके नानावटी के विशेष सहायक हो गए। उनकी कड़ी मेहनत की ख्याति बंबई तक पहुंची और जेआरडी टाटा ने उन्हें बंबई बुला लिया।’
इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में एक साल तक काम किया। जेआरडी ने उन्हें बीमार कंपनियों सेंट्रल इंडिया मिल और नेल्को को सुधारने की जि़म्मेदारी सौंपी।
रतन के नेतृत्व में तीन सालों के अंदर नेल्को (नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स) की काया पलट हो गई और उसने लाभ कमाना शुरू कर दिया। सन 1981 में जेआरडी ने रतन को टाटा इंडस्ट्रीज का प्रमुख बना दिया।
हालांकि इस कंपनी का टर्नओवर मात्र 60 लाख था लेकिन इस जिम्मेदारी का महत्व इसलिए था क्योंकि इससे पहले टाटा खुद सीधे तौर पर इस कंपनी का कामकाज देखते थे।
सादगी भरी जीवनशैली
उस ज़माने के बिजनेस पत्रकार और रतन के दोस्त उन्हें एक मिलनसार, बिना नखऱे वाले सभ्य और दिलचस्प शख़्स के तौर पर याद करते हैं। कोई भी उनसे मिल सकता था और वो अपना फोन खुद उठाया करते थे।
कूमी कपूर लिखती हैं, ‘अधिकाँश भारतीय अरबपतियों की तुलना में रतन की जीवनशैली बहुत नियंत्रित और सादगी भरी थी। उनके एक बिजऩेस सलाहकार ने मुझे बताया था कि वो हैरान थे कि उनके यहाँ सचिवों की भीड़ नहीं थी।’
‘एक बार मैंने उनके घर की घंटी बजाई तो एक छोटे लडक़े ने दरवाज़ा खोला। वहाँ कोई वर्दी पहने नौकर और आडंबर नहीं था। कुंबला हिल्स पर मुकेश अंबानी की 27 मंजिला एंटिलिया की चकाचौंध के ठीक विपरीत कोलाबा में समुद्र की तरफ देखता हुआ उनका घर उनके अभिजात्यपन और रुचि को दर्शाता है।’
जेआरडी ने चुना अपना उत्तराधिकारी
जब जेआरडी 75 साल के हुए तो इस बात की बहुत अटकलें लगाई जाने लगीं कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। टाटा के जीवनीकार केएम लाला लिखते हैं कि ‘जेआरडी। नानी पालखीवाला, रूसी मोदी, शाहरुख़ साबवाला और एचएन सेठना में से किसी एक को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बारे में सोच रहे थे। खुद रतन टाटा का मानना था कि इस पद के दो प्रमुख दावेदार पालखीवाला और रूसी मोदी होंगे।’
सन् 1991 में जेआरडी ने 86 वर्ष की आयु में अध्यक्ष पद छोड़ दिया। इस बिंदु पर उन्होंने रतन का रुख किया।
जेआरडी का मानना था रतन के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ थी उनका ‘टाटा’ सरनेम होना। टाटा के दोस्त नुसली वाडिया और उनके सहायक शाहरुख़ साबवाला ने भी रतन के नाम की वकालत की थी।
25 मार्च, 1991 को जब रतन टाटा समूह के अध्यक्ष बने तो उनके सामने सबसे पहली चुनौती थी कि समूह के तीन क्षत्रपों दरबारी सेठ, रूसी मोदी और अजीत केरकर को किस तरह कमजोर किया जाए।
ये लोग अब तक टाटा की कंपनियों में प्रधान कार्यालय के हस्तक्षेप के बिना काम करते आए थे।
टेटली, कोरस और जेगुआर का अधिग्रहण
शुरू में रतन टाटा की व्यावसायिक समझ पर लोगों ने कई सवाल उठाए।
लेकिन सन 2000 में उन्होंने अपने से दोगुने बड़े ब्रिटिश ‘टेटली’ समूह का अधिग्रहण कर लोगों को चकित कर दिया।
आज टाटा की ग्लोबल बेवेरेजेस दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चाय कंपनी है। इसके बाद उन्होंने यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात निर्माता कंपनी ‘कोरस’ को खरीदा।
आलोचकों ने इस सौदे की समझदारी पर सवाल उठाए लेकिन टाटा समूह ने इस कंपनी को लेकर एक तरह से अपनी क्षमता का प्रमाण दिया।
सन् 2009 के दिल्ली ऑटो एक्सपो में उन्होंने पीपुल्स कार ‘नैनो’ का अनावरण किया जो एक लाख रुपए की कीमत पर उपलब्ध थी।
नैनो से पहले 1998 में टाटा मोटर्स ने ‘इंडिका’ कार बाजार में उतारी थी जो भारत में डिजाइन की गई पहली कार थी।
शुरू में ये कार असफल रही और रतन ने इसे फोर्ड मोटर कंपनी को बेचने का फैसला किया। जब रतन डिट्रॉएट गए तो बिल फोर्ड ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस व्यवसाय के बारे में पर्याप्त जानकारी के बिना इस क्षेत्र में क्यों प्रवेश किया?
उन्होंने टाटा पर ताना मारा कि अगर वो ‘इंडिका’ को खरीदते हैं तो वो भारतीय कंपनी पर बड़ा उपकार करेंगे। इस व्यवहार से रतन टाटा की टीम नाराज हो गई और बातचीत पूरी किए बिना वहाँ से चली आई।
एक दशक बाद हालात बदल गए और 2008 में फ़ोर्ड कंपनी गहरे वित्तीय संकट में फंस गई और उसने ब्रिटिश विलासिता की ‘जैगुआर’ और ‘लैंडरोवर’ को बेचने का फैसला किया।
कूमी कपूर लिखती हैं, ‘तब बिल फोर्ड ने स्वीकार किया कि भारतीय कंपनी फ़ोर्ड की लक्जऱी कार कंपनी खरीदकर उस पर बड़ा उपकार करेगी। रतन टाटा ने 2.3 अरब अमेरिकी डॉलर में इन दोनों नामचीन ब्रांड्स का अधिग्रहण किया।’
जेगुआर को खऱीदने पर हुई टाटा की आलोचना
लेकिन कुछ व्यापार विश्लेषकों ने रतन टाटा की इन बड़ी खरीदारियों पर सवाल भी उठाए।
उनका तर्क था कि रतन के कई महंगे विदेशी अधिग्रहण उनके लिए महंगे सौदे साबित हुए। ‘टाटा स्टील यूरोप’ एक सफेद हाथी साबित हुआ और उसने समूह को भारी कजऱ् में डुबोया।
टीएन नैनन ने लिखा, रतन के वैश्विक दाँव अक्खड़पन और खराब समय का मिश्रण थे।
एक वित्तीय विश्लेषक ने कहा, ‘पिछले दो दशकों में भारतीय व्यापार में सबसे बड़े अवसर दूरसंचार में था, लेकिन रतन ने कम से कम शुरुआत में इसे गँवा दिया।’
मशहूर पत्रकार सुचेता दलाल ने कहा, ‘रतन से गलती पर गलती हुई। उनका समूह ‘जैगुआर’ को खरीदकर वित्तीय बोझ तले दब गया।’ लेकिन ‘टाटा कंसलटेंसी सर्विस’ यानि ‘टीसीएस’ ने हमेशा टाटा समूह को अग्रणी रखा।
इस कंपनी ने वर्ष 2015 में टाटा समूह के शुद्ध लाभ में 60 फीसदी से अधिक का योगदान दिया। सन 2016 में अंबानी की ‘रिलायंस’ से भी आगे किसी भी भारतीय फ़र्म का सबसे बड़ा बाज़ार पूँजीकरण इसी कंपनी का था।
नीरा राडिया, तनिष्क और साइरस मिस्त्री से जुड़े विवाद
सन् 2010 में रतन टाटा एक बड़े विवाद में फंसे जब लॉबिस्ट नीरा राडिया के साथ उनकी टेलिफोन बातचीत लीक हो गई।
अक्तूबर, 2020 में टाटा समूह के अपने ज्वेलरी ब्राँड ‘तनिष्क’ द्वारा एक विज्ञापन को जल्दबाजी में वापस लिए जाने से भी रतन टाटा की काफी किरकिरी हुई। इस विज्ञापन में सभी धर्मों को बराबर मानने वाले एक समन्वित भारत का मार्मिक चित्रण किया गया था। इस विज्ञापन को मुखर दक्षिणपंथी ट्रोल्स का सामना करना पड़ा।
आखिर ‘तनिष्क’ को दबाव के चलते वो विज्ञापन वापस लेना पड़ा। कुछ लोगों का मानना था कि अगर जेआरडी जीवित रहते तो वो इस तरह के दबाव में नहीं आते।
रतन उस समय भी सवालों के घेरे में आए जब उन्होंने 24 अक्तूबर, 2016 को टाटा समूह के अध्यक्ष साइरस मिस्त्री को एक घंटे से भी कम समय के नोटिस पर बर्ख़ास्त कर दिया।
टाटा को बनाया भरोसेमंद ब्राँड
लेकिन इस सब के बावजूद रतन टाटा की गिनती हमेशा भारत के सबसे भरोसेमंद उद्योगपतियों में रही।
जब भारत में कोविड महामारी फैली तो रतन टाटा ने तत्काल 500 करोड़ रुपए टाटा न्यास से और 1000 करोड़ रुपए टाटा कंपनियों के माध्यम से महामारी और लॉकडाउन के आर्थिक परिणामों से निपटने के लिए दिए।
ख़ुद को गंभीर जोखिम में डालने वालों डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के रहने हेतु अपने लक्जरी होटलों के इस्तेमाल की पेशकश करने वाले पहले शख्स भी रतन टाटा ही थे।
आज भी भारतीय ट्रक चालक अपने वाहनों के पिछले हिस्से पर ‘ओके टाटा’ लिखवाते हैं ताकि ये पता चल सके कि ये ट्रक टाटा का है, इसलिए भरोसेमंद है।
टाटा के पास एक विशाल वैश्विक फुटप्रिंट भी है। ये ‘जैगुआर’ और ‘लैंडरोवर’ कारों का निर्माण करता है और ‘टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज़’ दुनिया की नामी सॉफ्टवेयर कंपनियों में से एक है।
इन सबको बनाने में रतन टाटा की भूमिका को हमेशा याद रखा जाएगा। (bbc.com/hindi)
-अश्विन बटावीया
जब भी गरमी समाप्ति की ओर होती है, और थोड़ा पानी गिर कर रूकता है, उमस अपनी चरम सीमा पर होती है, तभी ईश्वर मेरी सुनता है और मेरी पीठ पर घमोरियां होती हैं। ईश्वर हर वर्ष मुझे आशीर्वाद देता है-घमोरियों के रूप में। मेरा मुंह मांगा ईनाम। घमोरियों के बहुत से फायदे हैं।
आप अपनी धर्मपत्नी को नहाते समय बुलाकर कह सकते हो। आओ, तो थोड़ी पीठ देख लो। घमोरियों के बीच साफ-सफाई कर दो। पर थोड़ा उलाहना भी मिलेगा, अनुभव से कह रहा हूं।
आते ही पत्नी बोलेगी गर्दन कितनी काली है-अच्छे से रोज रगड़ते क्यों नहीं?
आप कह देना, पसीने से थोड़ा कालापन आ जाता है। पहले जैसे साबुन भी अब कहां रहे, और अब मेरी तरफ देखता भी कौन है? पसीने से थोड़ा कालापन आ जाता है।
पत्नी दया दिखाती हुई तुरंत गर्दन रगड़ देगी। फिर यह आप पर है कि उसके अनचाहे मन से बाक़ी बदन साफ करवा सको तो करवा लो।
वैसे एक बात बता दूं-मैं और मेरी घमोरियां आपस में बात करते हैं। वो कहती है यदि मैं पाँव के तलवे में होती, तो मैं कहता चल नहीं पाता, वो कहती हथेली पर होती तो? मैं कहता दाईं पर होना, सुना है दाईं हथेली पर खाज आने से धन मिलता है। मैं यह भी कहता हूं उदर पर होने से लोग मुझको दामोदर तो कहेंगे नहीं, घमोरी उदर जरूर कहेंगे, पर घमोरियां तुम वहां भी न होना और मेरी 56 इंच चौड़ी छाती पर हरगिज नहीं क्योंकि लड़कियां जेम्सबांड और रणजीत खलनायक के बाद मेरी ही छाती पसंद करती हैं, तुम्हारी जगह पीठ पर ही ठीक है।
पत्नी रोज 10-15 वर्षों से पीठ दिखाती है, आमने-सामने खुशी-खुशी तो हो नहीं पाते हैं, तुम्हारे बहाने पीठ मैं भी दिखा देता हूं।
वैसे घमोरियों वाली पीठ, पीठ नहीं होतीं, होती हैं-पूरा तारामंडल।
इन्हीं घमोरियों की तुलना आसमान के तारों से कर सकते हैं। ध्यान से देखेंगे तो इसी में सप्तऋषी तारे दिखेंगे और सप्तऋषी तारे के आखिरी दो तारों के बीच से सीधा ऊपर की ओर देखेंगे, तो ध्रुव तारों जैसी-एक बड़ी घमोरी दिखाई देगी।
इसमें सूरज (जो कि एक तारा है) पक गई एक घमोरी में नजर आयेगा। जो बड़ी और लाल हो गई होगी। सूरज के लावे की तरह इसमें मवाद जैसा भी भरा नजर आएगा।
एक तारा क्षमा करें, एक-दो घमोरी पक कर फूट भी जाएगी और उसमें से निकलने वाला पस पुच्छल तारे के जैसा दिखेगा। अंत में यही कहूंगा यह सब मेरी पीठ पर है और आपकी पीठ पर?
-दिलनवाज पाशा
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के नतीजे स्पष्ट होते ही जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्लाह ने कहा कि उमर अब्दुल्लाह ही जम्मू-कश्मीर के नए मुख्यमंत्री होंगे।
जम्मू-कश्मीर के प्रमुख राजनीतिक परिवार से आने वाले 54 साल के उमर अब्दुल्लाह दूसरी बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। पहली बार वे साल 2009 में मुख्यमंत्री बने थे। जम्मू-कश्मीर में दस साल के अंतराल के बाद चुनाव हुए हैं और इसके विशेष राज्य का दर्जा समाप्त हुए भी पांच साल हो चुके हैं।
जीत के बाद पत्रकारों से बात करते हुए उमर अब्दुल्लाह ने कहा, ‘2018 के बाद एक लोकतांत्रिक सेट-अप जम्मू-कश्मीर का चार्ज लेगा। बीजेपी ने कश्मीर की पार्टियों को निशाने पर लिया, ख़ासतौर पर नेशनल
कॉन्फ्रेंस को। हमें कमज़ोर करने की कोशिश की गई। हमारे ख़िलाफ़ पार्टियों को खड़ा करने का भी प्रयास हुआ लेकिन इन चुनावों ने उन सब कोशिशों को मिटा दिया है।’
उमर अब्दुल्लाह इस साल हुए लोकसभा चुनावों में बारामुला से उम्मीदवार थे लेकिन वो उस समय तिहाड़ जेल से चुनाव लड़ रहे इंजीनियर रशीद से चुनाव हार गए थे।
राज्य को संविधान के तहत विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को भारतीय जनता पार्टी सरकार ने पांच अगस्त 2019 को समाप्त कर दिया था। जम्मू-कश्मीर अब पूर्ण राज्य नहीं है बल्कि केंद्र शासित प्रदेश है और लद्दाख इस क्षेत्र से अलग हो चुका है।
जम्मू-कश्मीर की सरकार भी अब बहुत हद तक उपराज्यपाल के ज़रिए केंद्र सरकार के नियंत्रण में होगी और मुख्यमंत्री के रूप में उमर अब्दुल्लाह के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं होगा।
हालांकि विश्लेषक ये मान रहे हैं कि उमर अब्दुल्लाह ये संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि कश्मीर के लोग अब भी उन पर विश्वास कर रहे हैं।
लेकिन इस साल जुलाई तक अब्दुल्लाह कह रहे थे कि वो चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि जम्मू-कश्मीर अब एक केंद्र शासित प्रदेश है। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, ‘मैं एक पूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री रहा हूं। मैं खुद को ऐसी स्थिति में नहीं देख सकता जहां मुझे उपराज्यपाल से चपरासी चुनने के लिए कहना पड़े या बाहर बैठकर फाइल पर उनके हस्ताक्षर करने का इंतजार करना पड़े।’
क्या कह रहे हैं विश्लेषक?
शोधकर्ता और लेखक मोहम्मद यूसुफ टेंग मानते हैं कि ये कश्मीर के लिए अहम पड़ाव है और इन चुनावों ने ये संदेश दिया है कि कश्मीर की पहचान से समझौता नहीं किया जा सकता है और यही कश्मीर के लोगों के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा है।
टेंग कहते हैं, ‘उमर अब्दुल्लाह ने नेशनल कांफ्रेंस के चुनाव अभियान का नेतृत्व किया और वो अपनी ये बात समझाने में कामयाब रहे कि दिल्ली ने किस तरह से कश्मीरियत का नुकसान किया और कश्मीर के लोगों की उम्मीदों को किस तरह से कुचला।’
उनके मुताबिक उमर उब्दुल्लाह लोगों को अपने साथ जोडऩे में कामयाब रहे और कश्मीर के लोगों ने उन्हें अपना नेता मान लिया है।
टेंग कहते हैं कि कश्मीर के लोगों ने ये बताया है कि उनके पास जो मताधिकार है, वो उसका अपनी मर्जी से इस्तेमाल करेंगे।
हालांकि कश्मीर के बदले राजनीतिक हालात में,अब जो मुख्यमंत्री होगा उसके पास बहुत सीमित राजनीतिक ताकत ही होगी।
उमर अब्दुल्लाह की जीत अहम क्यों?
विश्लेषक मान रहे हैं कि राजनीतिक रूप से भले ही उमर अब्दुल्ला बहुत ताक़तवर न रहें लेकिन फिर भी प्रतीकात्मक रूप से उनकी पार्टी की ये जीत बहुत अहम है।
अब केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर में उप-राज्यपाल का पद बहुत ताकतवर है, मुख्यमंत्री को उसके मातहत ही काम करना होगा, लेकिन बावजूद इसके, उमर अब्दुल्ला ये संदेश देने में तो कामयाब ही रहे हैं कि कश्मीर की जनता की पसंद वो ही हैं।
टेंग कहते हैं, ‘उमर अब्दुल्ला के अपने हाथ में क्या होगा, वो एक क्षेत्रीय नेता हैं, लेकिन कश्मीर में सरकार दिल्ली से चल रही है। अगर जम्मू-कश्मीर में एक मामूली ट्रांसफर भी करना होगा,उमर अब्दुल्लाह नहीं कर पाएंगे। बावजूद इसके, वो कश्मीर के लोगों के नेता हैं और यहां की जनता की उम्मीदों का बोझ उन पर ही होगा।’
चुनाव अभियान के दौरान जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कई वादे किए थे। इनमें सबसे अहम वादा कश्मीर के लोगों के अधिकारों के लिए लडऩा और रोजगार के बेहतर मौक़े पैदा करना है।
पिछले पांच साल से उपराज्यपाल के दफ्तर से कश्मीर में प्रशासन चल रहा है। आम लोगों ने अपने आप को सत्ता से दूर महसूस किया।
टेंग कहते हैं, ‘ के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वो लोगों को ये अहसास करा पाएं कि अब सत्ता और शासन उनके करीब है।’
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने लोगों के अधिकारों की रक्षा करने और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दोबारा दिलाने के लिए जद्दोजहद करने का वादा भी किया है। इन वादों को पूरा करने का बोझ भी उमर अब्दुल्लाह के कंधों पर ही होगा।
कैसा रहा है उमर अब्दुल्लाह का सियासी सफर
उमर अब्दुल्लाह का जन्म 10 मार्च 1970 को न्यूयॉर्क के रोचेस्टर में हुआ था। उनके परिवार के पास जम्मू-कश्मीर में लंबी राजनीतिक विरासत है।
उमर के दादा शेख अब्दुल्लाह प्रमुख कश्मीरी नेता और राज्य के पहले प्रधानमंत्री थे।
उमर अब्दुल्लाह ने श्रीनगर के बर्न हॉल स्कूल से शुरुआती शिक्षा ली और फिर मुंबई की सिडेनहैम कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल की।
परिवार के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए राजनीति में उमर का आना स्वभाविक ही था।
उमर अब्दुल्लाह ने साल 1998 में श्रीनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और 28 साल की उम्र में संसद पहुंच गए। उमर अब्दुल्लाह देश के सबसे युवा सांसदों में से एक थे। वो अटल बिहारी वाजयेपी की सरकार में राज्यमंत्री भी रहे।
इसके अगले साल ही वो नेशनल कॉन्फ्रेंस की यूथ विंग के अध्यक्ष बन गए और उन्हें सिर्फ अपनी पार्टी के भीतर ही नहीं बल्कि देश में भी पहचान मिली।
इसके ठीक दस साल बाद, साल 2009 में जब नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार आई तब युवा उमर अब्दुल्लाह मुख्यमंत्री बने।
अपने पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान उमर अब्दुल्लाह ने शिक्षा, ढांचागत विकास और स्वास्थ्य सेवाएं विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कश्मीर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी कदम उठाए।
लेकिन आसान नहीं थी राह
लेकिन उमर अब्दुल्लाह के लिए सबकुछ आसान नहीं था। भारतीय संसद पर हमल के अभियुक्त अफजल गुरु को फांसी दिए जाने और साल 2010 में जम्मू-कश्मीर में पैदा हुए तनावपूर्ण हालात ने उनके सामने मुश्किल चुनौतियां पेश की।
2010 में कश्मीर में फिर से उठे अलगाववाद से निपटने में भी वो बहुत कामयाब नहीं रहे और इसका खमियाजा उन्हें अगले चुनावों में भुगतने को मिला।
2014 विधानसभा चुनावों में पार्टी की बुरी हार के बावजूद वो नेशनल कांफ्ऱेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहे।
2019 में जब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किया और अनुच्छेद 370 को हटा दिया तो वो सरकार के इस फैसले के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक आवाज बनकर उभरे।
उमर अब्दुल्लाह लंबे समय तक नजरबंद भी रहे। बावजूद इसके, वो ये संदेश देते रहे कि कश्मीर के लोग विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किए जाने के केंद्र सरकार के फ़ैसले को कभी स्वीकार नहीं करेंगे और इसका विरोध जारी रखेंगे।
अब एक बार फिर सत्ता की कमान उनके हाथ में होगी, लेकिन इस बार उनके सामने सिर्फ हालात ही अलग नहीं होंगे बल्कि चुनौतियां भी नई होंगीं। (bbc.com/hindi)
-अंशुल सिंह
इंडिया टुडे-सी वोटर: कांग्रेस को 50 से 58 सीटें और बीजेपी को 20 से 28 सीटें।
एक्सिस माई-इंडिया: कांग्रेस को 53 से 65 सीटें और बीजेपी को 18 से 28 सीटें।
भास्कर रिपोर्टर्स पोल: कांग्रेस को 44 से 54 और बीजेपी को 19 से 29 सीटें।
रिपब्लिक मैट्रिज: कांग्रेस को 55 से 62 और बीजेपी को 18 से 24 सीटें।
ये कुछ एग्जि़ट पोल हैं जिनमें हरियाणा में कांग्रेस की स्पष्ट बहुमत से सरकार बनने की बात कही गई थी। लेकिन जब नतीजे आए तो इसके ठीक उलट हुआ।
हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी ने अपने दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल किया और राज्य में जीत की हैट्रिक लगाई। नतीजों में बीजेपी को 48 और कांग्रेस को 37 सीटें मिली हैं। 90 सीटों वाली हरियाणा विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 46 है।
इन चुनावी नतीजों ने एक बार फिर एग्जि़ट पोल और उनको करने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में ला दिया है।
हालांकि जम्मू-कश्मीर के नतीजे एग्जि़ट पोल के इर्द-गिर्द रहे। यहां नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन को बहुमत मिला है।
एग्जिट पोल पर उठे सवाल
ऐसा पहली बार नहीं है जब नतीजों के बाद एग्जिट पोल करने वालीं सर्वे एजेंसियों को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
कुछ महीने पहले लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे तब भी एग्जि़ट पोल्स को लेकर कमोबेश ऐसी ही स्थिति थी क्योंकि नतीजे एग्जि़ट पोल से अलग थे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्लाह एग्जिट पोल्स की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं।
मतगणना वाले दिन भी उमर अब्दुल्लाह ने इस विषय को लेकर एक्स पर एक पोस्ट लिखा है।
उमर ने लिखा, ‘यदि आप एग्जि़ट पोल्स के लिए भुगतान करते हैं या उन पर चर्चा करने में समय बर्बाद करते हैं तो आप सभी चुटकुलों/मीम्स/उपहास के पात्र हैं। कुछ दिन पहले मैंने उन्हें समय की बर्बादी कहने का एक कारण बताया था।’
5 अक्टूबर को उमर अब्दुल्ला ने एग्जिट पोल्स को टाइम पास बताते हुए इग्नोर करने की बात कही थी।
नतीजे के दिन पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सवाल पूछते हुए लिखा, ‘एग्जि़ट पोल्स से एग्जिट तक?’
पत्रकार निधि राजदान ने भी एग्जि़ट पोल्स को लेकर अपनी राय साझा की है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर निधि ने लिखा, ‘अगर अब भी कोई एग्जिट पोल को गंभीरता से लेता है, तो वो मजाक का पात्र है।’
क्यों गलत साबित हुए एग्जिट पोल?
पिछले साल के अंत में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हुए थे। यहां भी नतीजे एग्जिट पोल के मुताबिक नहीं आए थे।
आखिर हरियाणा समेत दूसरे राज्यों में ऐसे अहम मौक़ों पर सर्वे करने वाली एजेंसियों से कहां चूक हुई?
इस सवाल के जवाब में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग स्टडीज (सीएसडीएस)-लोकनीति के सह निदेशक प्रोफेसर संजय कुमार एग्जिट पोल्स की कार्य पद्धति को कठघरे में खड़ा करते हैं।
संजय कुमार कहते हैं, ‘जिस तरह से धड़ल्ले से पोल्स सामने आ रहे हैं उनमें मेथोडोलॉजी को फॉलो नहीं किया जा रहा है। कोई भी पोल करने से पहले वोटरों के पास जाना होता और कुछ सवाल पूछने होते हैं। तो कम से कम सभी एजेंसियों को ये सवाल, वोट शेयर और अन्य जानकारियां सामने रखनी चाहिए क्योंकि इसके बाद ही हम सही आकलन कर सकते हैं।’
संजय कुमार का कहना है कि मेथोडोलॉजी (कार्य पद्धति) में ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ी है तभी ये सारे एग्जि़ट पोल्स ग़लत साबित हो रहे हैं।
यशवंत देशमुख सेंटर फॉर वोटिंग ओपिनियन एंड ट्रेंड्स इन इलेक्शन रिसर्च यानी सी वोटर के निदेशक और संस्थापक संपादक हैं।
सी वोटर भारत में चुनाव संबंधी सर्वे के लिए एक जानी-मानी एजेंसी है और दो राज्यों के विधानसभा चुनाव में सीवोटर ने इंडिया टुडे मीडिया समूह के साथ एग्जि़ट पोल सर्वे किया था।
यशवंत देशमुख का कहना है एग्जिट पोल से सीटों की अपेक्षा सही नहीं है क्योंकि कई बार यह सीधा न होकर टेढ़ी खीर होता है।
यशवंत कहते हैं, ‘फस्र्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम में सबसे पहली ज़रूरत होती है कि आप वोट शेयर को सही से पकड़ें। फिर वोट शेयर को सीट में बदलने की क़वायद तिरछी है और वो सर्वे के विज्ञान का हिस्सा नहीं है। इसलिए ब्रिटेन में भी सिर्फ वोट शेयर बताया जाता है, सीटों की संख्या नहीं। एजेंसियों का काम वोट को सीट में बदलने का नहीं है यह काम सांख्यिकीविद करते हैं।’
यशवंत आगे बताते हैं, ‘सीवोटर ने हरियाणा में 10 साल सत्ता रहने के बाद बीजेपी के वोट शेयर बढऩे की बात कही है। कांग्रेस का भी वोट शेयर बढऩे की बात कही है क्योंकि वो अन्य क्षेत्रीय दलों के वोटरों को अपने पाले में खींच रही है। आम धारणा यह कहती है कि जिसे वोट ज़्यादा उसकी सीटें ज्यादा लेकिन फस्र्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम में ऐसा नहीं होता है।’
वो कहते हैं, ‘आज हरियाणा में कांग्रेस को बीजेपी के बराबर वोट मिला लेकिन सीटें नहीं मिलीं। कर्नाटक में बीजेपी जब-जब सत्ता में आई तब-तब कांग्रेस का वोट शेयर ज़्यादा रहा। ये उलटबांसियां सिस्टम में होती हैं और इन उलटबांसियों के चलते सीट शेयर का आकलन मुश्किल हो जाता है।’
एग्जि़ट पोल की ‘कमियां’ कैसे दूर होंगी?
बीबीसी से बातचीत में यशवंत देशमुख सर्वे एजेंसियों की सर्वे की पद्धति को दर्शक के सामने रखने पर ज़ोर देते हैं।
यशवंत बताते हैं, ‘सर्वे एजेंसियों को अपनी क्षमताओं को ध्यान में रखकर बहुत साफ बोलना चाहिए कि वोट शेयर, मुद्दे और लोकप्रियता के मानकों पर ये आंकड़े सही हैं लेकिन यह जरूरी नहीं वोट शेयर जब सीट के आंकड़ों में बदलेगा तब उतना ही सटीक हो। दुर्भाग्य यह है कि वोट शेयर कोई बताए न बताए लेकिन हर कोई सीट शेयर बताने पर आमादा होता है। सारे एग्जिट पोल्स में दो या तीन ही ऐसे होंगे जिन्होंने वोट शेयर बताया हो अन्यथा किसी ने भी यह जहमत नहीं उठाई है। साथ ही वोट को सीट में बदलने वाले अवैज्ञानिक हिस्से को भी खुलकर दर्शकों या पाठकों को बताना चाहिए।’
यशवंत का मानना है कि मीडिया को चुनावी सर्वे के संबंध में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की गाइडलाइन्स को फॉलो करना चाहिए और दर्शकों को बताना चाहिए कि एग्जिट पोल से क्या अपेक्षाएं रखनी हैं और क्या नहीं।
अक्सर जब एग्जि़ट पोल ग़लत साबित होते हैं तो एक बहस शुरू हो जाती है कि क्या इस तरह के पोल या सर्वे को बंद कर देना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में यशवंत जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देते हैं।
वो कहते हैं, ‘अगर आप जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं से एग्जिट पोल को बंद करने की बात कहेंगे तो शायद उनका जवाब ना होगा क्योंकि वहां एग्जिट पोल्स सही हुए हैं। इसलिए बंद का तो सवाल ही नहीं उठता है।’
एग्जिट पोल क्या है और कैसे किया जाता है?
अंग्रेजी भाषा के शब्द एग्जिट का मतलब होता है बाहर निकलना। इसलिए एग्जिट शब्द ही बताता है कि यह पोल क्या है।
जब मतदाता चुनाव में वोट देकर बूथ से बाहर निकलता है तो उससे पूछा जाता है कि क्या आप बताना चाहेंगे कि आपने किस पार्टी या किस उम्मीदवार को वोट दिया है।
एग्जिट पोल कराने वाली एजेंसियां अपने लोगों को पोलिंग बूथ के बाहर खड़ा कर देती हैं। जैसे-जैसे मतदाता वोट देकर बाहर आते हैं, उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने किसे वोट दिया।
कुछ और सवाल भी पूछे जा सकते हैं, जैसे प्रधानमंत्री पद के लिए आपका पसंदीदा उम्मीदवार कौन है वगैरह।
आम तौर पर एक पोलिंग बूथ पर हर दसवें मतदाता या अगर पोलिंग स्टेशन बड़ा है तो हर बीसवें मतदाता से सवाल पूछा जाता है।
मतदाताओं से मिली जानकारी का विश्लेषण करके यह अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है कि चुनावी नतीजे क्या होंगे।
सी-वोटर, एक्सिस माई इंडिया, सीएनएक्स भारत की कुछ प्रमुख एजेंसिया हैं जो एग्जिट पोल करती हैं।
एग्जिट पोल से जुड़े नियम-कानून क्या हैं?
रिप्रेजेंन्टेशन ऑफ द पीपल्स एक्ट, 1951 के सेक्शन 126ए के तहत एग्जिट पोल को नियंत्रित किया जाता है।
भारत में, चुनाव आयोग ने एग्जि़ट पोल को लेकर कुछ नियम बनाए हैं। इन नियमों का मकसद यह होता है कि किसी भी तरह से चुनाव को प्रभावित नहीं होने दिया जाए।
चुनाव आयोग समय-समय पर एग्जि़ट पोल को लेकर दिशा-निर्देश जारी करता है। इसमें यह बताया जाता है कि एग्जिट पोल करने का क्या तरीका होना चाहिए।
एक आम नियम यह है कि एग्जिट पोल के नतीजों को मतदान के दिन प्रसारित नहीं किया जा सकता है।
चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से लेकर आखिरी चरण के मतदान खत्म होने के आधे घंटे बाद तक एग्जिट पोल को प्रसारित नहीं किया जा सकता है।
इसके अलावा एग्जिट पोल के परिणामों को मतदान के बाद प्रसारित करने के लिए, सर्वेक्षण-एजेंसी को चुनाव आयोग से अनुमति लेनी होती है। (bbc.com/hindi)
-आर.के.विज
सेवानिवृत पुलिस महानिदेशक
‘बाल यौन शोषण और दुव्र्यवहार सामग्री’
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट के एक निर्णय को पलटते हुए स्पष्ट निर्णय दिया है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी को डाउनलोड करना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आई.टी. एक्ट) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम के तहत एक गंभीर अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो की धारा 15की व्याख्या करते हुए कहा कि इसके तीनों खंड पृथक-पृथक स्वतंत्र तीन अपराध है। यदि कोई व्यक्ति चाइल्ड पोर्नोग्राफी डाउनलोड करता है और उसे तत्काल नष्ट नहीं करता और न ही पुलिस को उसकी रिपोर्ट करता है तो उसे धारा 15(1)के तहत अपराध माना जाएगा। इसी प्रकार, यदि ऐसी आपत्तिजनक सामग्री डाउनलोड करने के बाद व्यक्ति उसे दूसरों के साथ साझा करने के लिए या ट्रांसमिट करने के लिए कुछ कदम उठाता है तो वह धारा 15(2)के तहत तुलनात्मक रूप से पहले से गंभीर अपराध के लिए जिम्मेदार होगा। इसी प्रकार, यदि आपत्तिजनक सामग्री डाउनलोड करने के बाद वह उसे मुनाफे के लिए लोगों से साझा करने के लिए कोई कदम उठाता है वह धारा 15(3)के तहत एक पृथक एवं स्वतंत्र अपराध का भागी होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 15की तीनों उप-धाराओं में चाइल्ड पोर्नोग्राफी को दूसरों से साझा करना जरूरी नहीं है। यदि व्यक्ति द्वारा डाउनलोडेड सामग्री नष्ट नहीं की जाती है तो अपराध के लिए आवश्यक मंशा की अवधारणा की जा सकती है। पोक्सो की धारा 30के तहत इस अवधारणा का आरोपी द्वारा विरोध किया जा सकता है, परंतु उसे यह संदेह से परे सिद्ध करना होगा कि उसकी मंशा धारा 15के तहत अपराध करने की नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 15के अपराधों को इनकोहैट अर्थात अपूर्ण या अपरिपक्क अपराध, अर्थात गंभीर अपराध घटित करने से पहले की तैयारी वाले अपराध की संज्ञा दी। परंतु इन अपराधों में पुलिस और अभियोजन को आपत्तिजनक सामग्री पर आरोपी का भौतिक या रचनात्मक (कंस्ट्रक्टिव) कब्जा सिद्ध करना जरूरी होगा। ऐसा कब्जा सिद्ध करने पर ही अपराध के लिए आवश्यक मंशा की अवधारणा की जा सकेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि आई.टी. एक्ट की धारा 67(बी) चाइल्ड पॉर्नोग्राफी अपराध संबंधी एक पूर्ण कोड है जिसकी उप-धारा (बी) के अंतर्गत चाइल्ड पोर्नोग्राफी को ढूंढना, ब्राउजिंग करना, या डाउनलोड करना एक दंडनीय अपराध है। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को केवल प्राथमिक सूचना प्रतिवेदन के आधार पर नहीं बल्कि आरोप-पत्र सहित विवेचना में जुटाई गई समस्त सामग्री का संज्ञान लेने के बाद ही कोई आदेश जारी करना चाहिए था। जब पुलिस द्वारा आरोप-पत्र पोक्सो की धारा 15के तहत दर्ज किया गया था तो कोर्ट केवल प्राथमिक सूचना प्रतिवेदन के समय लगाई गई धारा 14के तहत अंतर्गत निर्णय नहीं कर सकती। फलस्वरुप, सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट मुकदमे की सुनवाई कर मेरिट पर उसका निराकरण करें।
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स/ मध्यवर्ती संस्थाएं (इंटरमेडयरीज) की भूमिका पर भी सवाल उठाए। वर्तमान में गृह मंत्रालय के तहत एन.सी.आर.बी. द्वारा अमेरिका की एक संस्था ‘नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एवं एक्सप्लोइटेड चिल्ड्रन’ से एक अनुबंध के तहत इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स द्वारा चाइल्ड पोर्नोग्राफी संबंधी सामग्री उपरोक्त संस्था से साझा की जाती है, परंतु पोक्सो के तहत ऐसी आपत्तिजनक सामग्री के संबंध में स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी जाती। पोक्सो नियम का नियम 11, इंटरमेडयरीज पर बंधनकारी है जो यह प्रावधान करता है कि पोक्सो के तहत अपराधों की सूचना अनिवार्य रूप से पुलिस को देना एवं आपत्तिजनक सामग्री को एविडेंस हेतू सुरक्षित रखना जरूरी है। यदि इंटरनेट संस्थाएं ड्यू डिलिजेंस के तहत ऐसा करने में विफल रहती हैं तो उन्हें आई.टी. एक्ट की धारा 79के तहत ‘सेफ हार्बर’ की छूट नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कानून में उपयोग की जाने वाली शब्दावली ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ के उपयोग पर भी आपत्ति जताई। चाइल्ड पोर्नोग्राफी शब्द बच्चों के शोषण के सही रूप एवं अर्थ को नहीं दर्शाता, बल्कि कहीं न कहीं सहमति की ओर इंगित करता है। इसलिए कोर्ट ने केंद्र सरकार को पोक्सो में एक संशोधन लाकर चाइल्ड पोर्नोग्राफी के स्थान पर ‘बाल यौन शोषण और दुव्र्यवहार सामग्री’ (चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लोइटेटिव एंड एब्यूज मटेरियल /सी.एस.इ.ए.एम.) को प्रतिस्थापित करने के लिए भी निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत्ते भविष्य में चाइल्ड पोर्नोग्राफी शब्द का उपयोग नहीं करेंगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षित करने के उद्देश्य से लोगों को जागरूक करने बाबत पोक्सो में सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को महती जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए वे पोक्सो कानून के प्रावधानों की जानकारी लोगों तक पहुंचाएं। सुप्रीम कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास विभाग को यह निर्देश दिए कि बालकों को उनकी उम्र के अनुसार यौन शिक्षा देने और पीडि़त बच्चों के लिए सपोर्ट सर्विस एवं पुनर्वास की दिशा में आवश्यक कदम उठाने के भी निर्देश दिए।
समग्र रूप से देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का उक्त आदेश बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसला है जिसका पालन समाज, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर, एवं पुलिस सहित संबंधित सरकारी विभागों को ईमानदारी से करना होगा।
सोमवार को इलेक्ट्रिक स्कूटर निर्माता कंपनी ओला इलेक्ट्रिक के शेयर में कऱीब 9त्न प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि भारतीय शेयर बाज़ार में पिछले हफ़्ते से ही गिरावट जारी है लेकिन ओला इलेक्ट्रिक के शेयर इसके पहले से ही गिर रहे थे। ओला इलेक्ट्रिक स्कूटर के ग्राहकों की शिकायतों के अंबार के बाद इसके शेयर में गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ था, जो अब भी नहीं थमा है।
ग्राहकों की शिकायत लेकर ही चर्चित कॉमेडियन कुणाल कामरा सोशल मीडिया एक्स पर आए तो ओला इलेक्ट्रिक के सीईओ भाविश अग्रवाल को यह रास नहीं आया।
सोशल मीडिया पर दोनों के बीच हुई तीखी बहस में आम लोग भी शामिल हुए।
कुणाल कामरा की एक टिप्पणी पर भाविश अग्रवाल बुरी तरह से भडक़ गए। अग्रवाल के इस रुख़ की एक्स पर कई लोगों ने आलोचना की और उन्हें अहंकारी कहा।
रविवार को कुणाल कामरा ने एक्स पर एक तस्वीर डाली थी, जिसमें एक शोरूम के बाहर खड़ी ओला इलेक्ट्रिक स्कूटरों पर धूल की परतें दिखाई दे रही हैं।
इस पोस्ट में कुणाल कामरा ने लिखा, ‘क्या भारतीय ग्राहकों की कोई आवाज़ है? क्या वे इसके हक़दार हैं? दोपहिया वाहन दिहाड़ी वर्करों की जि़ंदगी है। नितिन गडकरी, क्या इसी तरह भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन इस्तेमाल करेंगे? जिस किसी को भी ओला इलेक्ट्रिक के साथ दिक्क़त आ रही है, वो सबको टैग करते हुए अपनी कहानी यहां पोस्ट करें।’
इस पोस्ट में उन्होंने जागो ग्राहक जागो को भी टैग करते हुए, इस पर कुछ बोलने को कहा।
इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर ओला के असंतुष्ट ग्राहकों की शिकायतों का अंबार लग गया।
ओला के मालिक भाविश अग्रवाल ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्विटर पर लिखा, ‘चूंकि आप इतने चिंतित हैं कुणाल कामरा, तो आइए हमारी मदद करिए! आपको मैं इस पेड ट्वीट या फ्लॉप कॉमेडी करियर से अधिक पैसे दूंगा। या चुप बैठिये और हमें ग्राहकों के असली मुद्दों को हल करने पर ध्यान केंद्रित करने दीजिए। हम अपने सर्विस नेटवर्क का तेज़ी से विस्तार कर रहे हैं और बचे हुए कामों को जल्द पूरा कर लिया जाएगा।’
हालांकि ओला इलेक्ट्रिक ग्राहकों ने अपनी जो कहानियां बयां कीं और शिकायतों की जो झड़ी लगी, उससे कंपनी की छवि पर असर पड़ा है।
कामरा और अग्रवाल के बीच कहासुनी
ट्विटर पर यह विवाद एक के बाद एक ट्वीट से और गहरा हो गया। कुणाल कामरा और भाविश अग्रवाल के बीच विवाद तीखा हो गया।
कुणाल कामरा ने अग्रवाल को अहंकारी और घटिया व्यक्ति कहा तो अग्रवाल ने लिखा, ‘चोट लगी? दर्द हुआ? सर्विस सेंटर पर आ जाइए। बहुत काम है। मैं आपके फ़्लॉप शो से अधिक पैसे दूंगा। अपने स्रोताओं को दिखाइए कि आप कितनी चिंता करते हैं।।।या फिर ये आपकी हवाबाज़ी मात्र है।’
कामरा ने उन्हें चुनौती दी कि वो ये साबित करें कि शुरुआती शिकायतें ‘पेड’ थीं।
उन्होंने लिखा, ‘अगर आप साबित कर दें कि इस ट्वीट या मैंने किसी प्राइवेट कंपनी के ख़िलाफ़ जो कहा होगा, उसके लिए मुझे भुगतान किया जाता है तो मैं अपने सभी सोशल मीडिया को डिलीट कर दूंगा और हमेशा के लिए शांत बैठ जाऊंगा।’
इसके बाद उन्होंने शिकायतों को निपटारा करने के लिए ओला की मदद करने का प्रस्ताव किया।
पिछले महीने 18 सितंबर को मिंट में छपी ख़बर के अनुसार, ओला इलेक्ट्रिक वाहन से जुड़ी शिकायतें एक महीने में 80,000 तक पहुंच गईं।
रिपोर्ट के अनुसार, कभी-कभी तो एक दिन में ही 6,000 से 7,000 शिकायतें आ जाती हैं और सर्विस सेंटर मांग पूरी करने में ख़ुद को अक्षम पाते हैं।
ग्राहकों का पैसा वापस करने की मांग
लेकिन दोनों यहीं नहीं रुके। कामरा ने ओला की रिफ़ंड पॉलिसी को लेकर सवाल किया, ‘पिछले चार महीने में जिसने ओला इलेक्ट्रिक स्कूटर खऱीदी है और इसे वापस करना चाहता है, उन्हें कुल रिफ़ंड किए गए भुगतान को बता सकते हैं? मुझे आपके पैसे की ज़रूरत नहीं, लोग अपने काम पर नहीं जा पा रहे हैं और आपकी जवाबदेही बनती है। अपने ग्राहकों को दिखाइए कि आपको उनकी चिंता है।’
इस पर भाविश अग्रवाल ने लिखा, ‘हमारे ग्राहकों को सेवाओं में देरी का सामना करना पड़ता है तो हमारे पास पर्याप्त योजनाएं हैं। अगर आप सच हैं तो आपको पता होगा। फिर से, आप कोशिश मत करिए और पीछे मत हटिए। आराम से कुर्सी पर बैठ आलोचना करने की बजाय आइए और कुछ असली काम करिए।’
इसके जवाब में कामरा ने ओला को रिफ़ंड पॉलिसी लागू करने के सुझाव दिए।
कामरा ने लिखा, ‘तो पिछले चार महीनों में जिन लोगों ने ओला वाहन खऱीदा, जो कि असली ग्राहक हैं, उन्हें 100 प्रतिशत रिफ़ंड नहीं कर सकते।।।लेकिन आप मुझे भुगतान करना चाहते हैं, जो आपका ग्राहक नहीं है। मैं आपको कुछ और विकल्प देता हूं। क्या आप एक या दो महीने के लिए 85त्न रीफ़ंड दे सकते हैं?’
‘भागिए मत, मैं असली ग्राहकों की सूची तैयार करने में और उन्हें रिफ़ंड सुनिश्चित करने में आपकी मदद करूंगा। उनकी ख़ुशी ही मेरे लिए काफ़ी होगी। मुझे नौकरी पर रखने की जब आप कोशिश छोड़ देंगे और अपने असली ग्राहकों पर ध्यान देंगे, मैं अगले ट्वीट में एक इमेल आईडी दूंगा।’
लेकिन अग्रवाल ने कामरा पर फिर तंज़ किया, ‘कॉमेडियन बन ना सके, चौधरी बनने चले। अगली बार अपनी खोजबीन पक्की करके बोलें और हमारे सर्विस सेंटर पर आकर मदद करने की पेशकश अब भी खुली है। चुनौती स्वीकार करिए। हो सकता है कि एक बदलाव के लिए ही सही आप कुछ असली हुनर सीख पाएंगे।’
लोग भी इस बहस में हुए शामिल
कुणाल कामरा और भाविश अग्रवाल के बीच हुई कहासुनी में सोशल मीडिया यूज़र्स मूकदर्शक नहीं रहे और उन्होंने भी अपने प्रतिक्रिया ज़ाहिर की।
इनमें से अधिकांश ओला के ग्राहक थे और कई लोगों ने कामरा के पक्ष में अपनी राय ज़ाहिर की।
कई यूज़र्स ने शिकायतों को लेकर रुख़ी प्रतिक्रिया देने के लिए अग्रवाल को आड़े हाथों लिया।
एक यूजऱ ने कहा, ‘खाना बनाना मैं नहीं जानता लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि स्वाद अच्छा या बुरा है, इसके बारे में नहीं बता सकता। वो कितने अच्छे कॉमेडियन हैं, इसका आपकी ओला सर्विस कितनी बुरी है, से कोई संबंध नहीं है।’
एक और यूजऱ ने कहा, ‘सबसे खऱाब अहंकार है, नजऱअंदाज़ करने की आदत से पैदा हुआ अहंकार। जागिए और दीवार पर लिखी इबारत को पढि़ए।’
एक अन्य यूजऱ ने लिखा, ‘निश्चित तौर पर, यह आदमी अपने अहंकार से नाकाम होगा।’
एक अन्य यूजऱ ने लिखा, ‘देश भक्ति का ढोंग करके, एलन मस्क बनने चले। स्कैम की अगली कड़ी ओला होगी। ख़ुद रिसर्च करके प्रोडक्ट लॉन्च करते तो इतनी शिकायतें नहीं आतीं। चुनौती आप लीजिए और ग्राहकों की मेहनत की कमाई वापस कीजिए।’
एक यूजऱ ने लिखा, ‘उस कार्य संस्कृति के बारे में कल्पना कीजिए, जो इस शख़्स की कंपनी में लागू है। अब, जो प्रोडक्ट बाहर आ रहा है, उसकी कल्पना करिए। सब कुछ समझ में आ जाएगा।’
एक और यूजऱ ने कामरा का समर्थन करते हुए कहा, ‘आपको अपनी पोस्ट पर आए कॉमेंट्स को पढऩा चाहिए, सारे जवाब मिल जाएंगे।’
एक अन्य यूजऱ ने कहा, ‘कामरा ने आपके ग्राहकों के पैसे नहीं लिए और घटिया सर्विस दी। ये आपने किया है। ट्विटर पर सेलिब्रिटी से बेशर्मी से लडऩे की बजाय, इसके लिए कुछ तो जि़म्मेदारी लीजिए।’
कई सारे ऐसे कॉमेंट्स हैं, जो ओला ग्राहकों के हैं। ऐसे ही एक ग्राहक ने पोस्ट किया, "सर, मैं ओला एस1 प्रो का पुराना ग्राहक हूँ और ये सच है कि आपके सर्विस सेंटर के लोग ग्राहकों से अच्छा बर्ताव नहीं करते। सच कहूं तो सॉफ़्टवेयर सबसे बड़ी समस्या है। इन टिप्पणियों की बजाय आप इस मुद्दे को हल करें और सॉफ़्टवेयर की समस्याओं को सुधारें।’
एक अन्य यूजऱ ने लिखा, ‘इस तरह के आप अहंकारी व्यक्ति हैं। अपनी दौलत का प्रदर्शन करना बंद करें। ऐसे बहुत से अहंकारी सीईओ के उदाहरण हैं जो आसमान से सडक़ पर आ गए। अपने असफल प्रोडक्ट और सर्विस मॉडल को ठीक करने पर ध्यान दें।’
जयप्रकाश मिश्रा नामके यूजऱ ने लिखा, ‘छह महीने से मेरी ओला गाड़ी खड़ी थी, थक हारकर मैंने जुगाड़ से उसे ठीक किया है।’
भारतीय ई स्कूटर बाज़ार में ओला की 27त्न हिस्सेदारी है, बावजूद बीते अगस्त महीने में ताज़ा आईपीओ लाने के बाद से उसके शेयरों में 43त्न की गिरावट आ चुकी है। अपनी सर्विस की गुणवत्ता को लेकर कंपनी को सोशल मीडिया पर काफ़ी आक्रोश का सामना करना पड़ता है।
जानकारों ने भी कंपनी की गिरती बाज़ार हिस्सेदारी को लेकर चिंता ज़ाहिर की है, जो कि बीते लगातार पाँच महीनों से घट रहा है क्योंकि बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ गई है और कंपनी सर्विस से संबंधित समस्याओं में उलझ गई है। (bbc.com/hindi)
बाट्शेवा को यह नहीं पता कि उनके पति जि़ंदा हैं या उनकी मौत हो गई, अब्दुल्ला किशोरावस्था में अनाथ हो गए, क्रिस्टीना और अब्दुलरहमान को उम्मीद है कि वो फिर से चल पाएंगे।
बीबीसी को इसराइल, गज़़ा, लेबनान और वेस्ट बैंक में रह रहे इन लोगों ने बताया कि पिछले साल सात अक्टूबर को हुए हमले के बाद उनकी जि़ंदगी कैसे बदल गई।
एक साल हो गया जब हमास ने इसराइल पर हमला कर 1200 लोगों की हत्या कर दी थी और 251 लोगों को बंधक बना लिया था।
इसराइल ने इसके जवाब में गाजा में बड़े पैमाने पर हवाई और जमीनी हमले किए। हमास द्वारा संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक इसमें 41,000 से अधिक लोगों की मौत हुई है।
‘सबसे मुश्किल है नहीं पता होना’
सात अक्टूबर से एक दिन पहले ओहद याहलोमी और उनकी 10 साल की बेटी याऐल पास के ग्राउंड में जानवरों की तलाश में गए। याऐल के बड़े भाई ऐथान (12) अपने दोस्तों के साथ फुटबॉल खेल रहे थे। ओहद की पत्नी बाट्शेवा अपनी सबसे छोटी बेटी के साथ घर पर थीं जो कि अभी दो साल की भी नहीं थी।
गाजा की सीमा से लगभग एक मील दूर दक्षिण इसराइल में 400 से कम लोगों का समुदाय नीर ओज किबुत्ज़ में रह रहा है। यहां का जीवन काफी अलग है।
45 वर्षीय बाट्शेवा ने कहा, ‘हमें वहां का जीवन बहुंत पसंद था और हम काफी सीधे हैं। यह हमारे लिए स्वर्ग जैसा था।’
अगले दिन की सुबह परिवार रॉकेट हमले को लेकर बजाए जाने वाले अलर्ट सायरन के बजने से जगा।
लेकिन कुछ ही मिनटों के बाद ऐसे संकेत मिले कि ये सिर्फ कोई रॉकेट हमला नहीं था। बाहर से लोगों के ‘अल्लाहु अकबर’ कहने और गोलियों की आवाज़ सुनाई दी।
कई घंटों तक परिवार भयभीत होकर अपने ‘सेफ रूम’ में इंतज़ार करता रहा, लेकिन हमलावर घर में घुसने की कोशिश करने लगे। इसके बाद अपने परिवार के लोगों को बचाने के लिए ओहद ने ‘सेफ रूम’ छोड़ दिया और हमलावरों को रोकने का प्रयास करने लगे।
बाट्शेवा ने बताया, ‘वह हर कुछ मिनटों में हमसे कहते थे कि वो हमसे प्यार करते हैं।’
कलाश्निकोव राइफल और ग्रेनेड जैकेट पहने हमलावर घर में घुसे और ‘सेफ रूम’ में प्रवेश करने से पहले ओहद को गोली मार दी।
बाट्शेवा ने बताया, ‘हमलावरों ने हम पर राइफल तानते हुए अंग्रेजी में कहा कि गाजा चलो। मैं इसके बाद तुरंत समझ गईं कि वो क्या चाहते हैं।’
बाट्शेवा और उनकी बेटियों को एक मोटरसाइकिल पर गाजा ले जाने के लिए बिठाया गया। वहीं ऐथान को विदेशी वर्कर के साथ दूसरी मोटरसाइकिल पर भेजा गया। मोटरसाइकिल के फंसने से बाट्शेवा और उनकी बेटियां भागने में सफल रहीं, लेकिन ऐथान और पिता को ले जाया गया।
ऐथान को हमास ने गज़़ा में 52 दिनों तक बंधक बनाकर रखा। बाट्शेवा ने बताया कि ऐथान को ज़बरदस्ती सात अक्टूबर को बनाए गए वीडियो दिखाए गए।
‘उसने (बेटे) देखा कि कैसे उन्होंने लोगों, बच्चों और महिलाओं की क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी।’
बाट्शेवा ने बताया कि ऐथान को नवंबर में बंधकों की रिहाई के लिए हुए समझौते के बाद बाद छोड़ा गया। हमास और इसराइल के बीच चल रहे संघर्ष के बाद से यानी पिछले एक साल में सिर्फ एक बार ये समझौता हुआ है।
हथियारबंद फ़लस्तीनी गुट ने जनवरी में ओहद का वीडियो जारी किया और इसमें वो घायल दिख रहे हैं, लेकिन जि़ंदा हैं। इसके बाद से गुट कह रहा है कि इसराइली हमले में वो मारे गए।
वहीं इसराइली सेना ने बाट्शेवा को बताया कि वो ओहद को लेकर किए जा रहे दावे की पुष्टि नहीं कर सकते या उनकी स्थिति को लेकर कोई अपडेट नहीं दे सकते।
पिछले साल सात अक्टूबर को हुए हमले में नीर ओज सबसे अधिक प्रभावित हुए समुदाय में से एक है। कई दर्जन नागरिकों को मार दिया गया या फिर अपहरण कर लिया गया। जले हुए घर इस बात की याद दिलाते हैं कि क्या हुआ था।
बाट्शेवा ने कहा कि उनके बच्चों को बुरे सपने आते हैं और लगभग एक साल से मेरे साथ उसी बिस्तर पर सो रहे हैं जिस पर कि मैं सोती हूं। मेरे बच्चे बार-बार पूछते हैं कि पापा कब लौटेंगे। ऐथान के तो बाल झड़ रहे हैं।
‘सबसे मुश्किल है ये नहीं पता होना कि उनके (ओहद) साथ क्या हो रहा है। वो जि़ंदा हैं या नहीं। हम ऐसे अपना जीवन नहीं बिता सकते।’
‘बेहतर होता अगर मैं शहीद हो जाता’
हमास ने जब सात अक्टूबर को इसराइल पर हमला किया था तो अब्दुल्ला करीब 13 साल के थे। इससे पहले उनका जीवन उत्तरी गाजा के पास स्थित अल-तावान में स्कूल, दोस्तों के साथ फुटबॉल खेलने, समुद्र बीच पर घूमने, माता-पिता, भाई और दो बहनों के साथ मस्ती करते हुए बीतता था।
अब्दुल्ला के जन्मदिन से एक दिन पहले लोगों को दक्षिण की ओर जाने को कहा गया। इसके तुरंत बाद अब्दुल्ला के परिवार ने जल्दी-जल्दी में ज़रूरत का सामान बांधा और उस सलाह अल-दीन रोड की ओर निकल पड़े जिसे कि इसराइली सेना ने कहा था कि यहां से लोग निकल सकते हैं।
लेकिन जब वो सलाह अल-दीन रोड की तरफ़ बढ़े तो वाहन पर इसराइली हवाई हमला हुआ।
अब्दुल्ला ने कहा, ‘मैं और मेरा भाई अहमद इस हमले से हवा में उछलते हुए कार से बाहर आ गए।’
जब हवाई हमला हुआ था तो अहमद 16 साल के थे और उसके एक पैर को काटना पड़ा। दूसरे पैर में मेटल प्लेट्स लगी हुई है।
अब्दुल्ला के हाथ, सिर, कमर और मुँह में चोट लगी और उसके पेट पर दो लंबे निशान दिखाई देते हैं।
अब्दुल्ला, उसके परिवार और कई चश्मदीदों ने बीबीसी से कहा कि ड्रोन के माध्यम से मिसाइल हमला किया गया था।
वहीं इस दावे को इसराइली सेना ने खारिज करते हुए कहा कि उसने उस दिन नागरिकों के काफिले पर हमला नहीं किया था और इसे झूठे आरोप करार दिया।
बीबीसी से प्रवक्ता ने कहा, ‘जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जो ये साबित करता हो कि आईडीएफ ने हमला किया था।’
अब्दुल्ला ने बताया कि उन्हें याद है कि कैसे अस्पताल के कर्मी उनके माता-पिता को लेकर पूछे जा रहे सवालों को टाल रहे थे। ‘मेरे कजिन और दादी ने मुझे जो बताया उसके बारे में मुझे पहले से ही लग रहा था।’
‘मुझे इसके बारे में हमेशा से पता था।’
वो आगे कहते हैं, ‘मैं अगर शहीद हो गया होता तो यह उससे अच्छा होता जो अब मेरे साथ हो रहा है।’
अब्दुल्ला हाथ में लगी चोट के निशान की तरफ देखते हुए कहते हैं, ‘मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा हाथ पहले ही काट दिया गया है। उन्होंने इसे ठीक करने की कोशिश की, लेकिन सब बेकार रहा।’
अब्दुल्ला और उनकी दो बहनें मिन्ना (18) और हाला (11) अपनी दादी के साथ दक्षिण गाजा के इलाके खान यूनिस में रह रहे हैं।
जिस दिन माता-पिता की हमले में मौत हुई तो उस दिन अब्दुल्ला की दोनों बहनें उत्तरी गज़़ा में ही थीं क्योंकि वाहन में उनके लिए जगह नहीं थी। वहीं अहमद इलाज के लिए क़तर में रह रहे हैं।
अब्दुल्ला ने कहा, ‘हँसी और अच्छा समय चला गया। हमने अपने मां, पिता और चाचा को खो दिया।’
‘ये लोग पूरे परिवार के लिए खुशी का जरिया थे।’
‘हम उनके बिना सही से नहीं जी रहे हैं।’
‘हम स्कूल जाते थे, खेलते और हँसते थे। गज़़ा ख़ूबसूरत हुआ करता था, लेकिन अब सब ख़त्म हो गया।’
अब्दुल्ला ने बताया कि उसका अपने दोस्तों से संपर्क नहीं हो पाता और कई युद्ध में मारे जा चुके हैं।
‘इसराइल को मेरा ये मैसेज है। आपने हमारे साथ ये किया। आपने मेरे माता-पिता की जान ले ली। मेरी शिक्षा छीन ली। आपने मुझसे मेरा सब कुछ ले लिया।’
‘मुझे राहत मिली कि मैंने केवल एक पैर खोया है’
क्रिस्टीना असी ने कहा, ‘मैं अपनी पहचान फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर बताती थी, लेकिन आज मैं अपनी पहचान वॉर क्राइम सर्वाइवर बताती हूं।’
क्रिस्टीना न्यूज़ एजेंसी एएफपी के लिए फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर अपने देश लेबनान में दक्षिणी सीमा पर हो रही लड़ाई को कवर करने गई थीं।
सात अक्टूबर को किए गए हमले को देखते हुए हथियारबंद गुट हिज्बुल्लाह ने इसराइल पर रॉकेट हमला शुरू कर दिया था। इसने बाद में बड़े संघर्ष का रूप ले लिया।
पिछले साल 13 अक्टूबर को क्रिस्टीना और पत्रकारों का एक समूह लेबनान के दक्षिण में उस गांव में गया था जो कि इसराइल की सीमा से करीब एक किलोमीटर दूर था। यह वो गांव था जहां झड़प हो रही थी।
29 वर्षीय क्रिस्टीना ने कहा कि हमने प्रेस लिखी हुई जैकेट और हेलमेट पहना हुआ था। वहीं कार के बोनट पर पीले रंग की टेप से टीवी लिखा हुआ था। लगा था कि हम सुरक्षित हैं।
उन्होंने बताया कि ‘अचानक से गोलीबारी होने लगी। मुझे याद है कि बगल वाली कार में आग लगी हुई थी और मैं भागने की कोशिश करने लगी। बुलेट प्रूफ जैकेट के भारी होने और कैमरे के कारण हिलने में परेशानी हो रही थी।’
‘मैं देख सकती थी कि मेरे पैर से खून निकल रहा है। मैं खड़ी नहीं हो पर रही थी।’
12 दिनों के बाद क्रिस्टीना की ऑंख अस्पताल में खुली और उन्होंने कहा, ‘मुझे राहत मिली कि मैंने सिर्फ एक पैर खोया।’
हमले में 37 वर्षीय रॉयटर्स के पत्रकार इसाम अब्दुल्ला की मौत हो गई और छह घायल हो गए। इसको लेकर क्रिस्टीना ने कहा, ‘मुझसे नर्स ने पूछा कि किसकी जान गई तो मैंने ऑनलाइन उनका नाम देखा। मैं हेडलाइन पर विश्वास नहीं कर पाई।’
यूनाइटेड नेशंस इंटरिम फोर्स इन लेबनान ने जांच करने के बाद बताया कि अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए इसराइल ने 120 एमएम के गोले ‘साफ तौर से पहचाने जाने वाले पत्रकारों’ के ग्रुप पर दागे थे।
कई मानवाधिकार समूहों ने कहा कि इस मामले की जांच संभावित युद्ध अपराध के रूप में की जानी चाहिए।
आईडीएफ ने बीबीसी से कहा कि उसके सैनिकों को इसराइली क्षेत्र में ‘आतंकवादियों की घुसपैठ’ का शक हुआ था। इसे रोकने के लिए टैंक और आर्टिलरी फायर का इस्तेमाल किया गया। मामले को देखा जा रहा है।
क्रिस्टीना ने कहा कि उन्हें गुस्सा आता है और जो उनके साथ हुआ उसको लेकर चिढ़ होती है।
‘आप हर चीज़ पर भरोसा खो देते हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानून और अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर मुझे पहले पत्रकार होने के तौर पर विश्वास था।’
दुनिया भर में घायल और मारे गए पत्रकारों के सम्मान में जुलाई में एएफपी के अपने सहकर्मियों के साथ क्रिस्टीना व्हीलचेयर पर ओलंपिक की मशाल लेकर चलीं।
उन्हें उम्मीद है कि वो एक बार फिर से ग्राउंड पर पत्रकार के तौर पर उतर सकेंगी।
‘जिस दिन मैं खड़ी हो सकूंगी, चल सकूंगी, कैमरा लेकर अपने काम पर लौटूंगी और वो चीज फिर से कर सकूंगी जिससे मुझे प्यार है तो तब मेरी जीत होगी।’
‘मैंने चिल्लाना शुरू किया लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया’
अब्दुलरहमान अल अश्कर ने बताया कि शाम का समय था। वो भुट्टा बेचने के बाद सिगरेट पीते हुए अपने दोस्त लैथ शावनेह के साथ घूम रहे थे।
18 वर्षीय अब्दुलरहमान 1 सितंबर की रात को याद करते हुए कहते हैं, ‘अचानक बमबारी हो जाती है।’
दोनों इसराइल के कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में स्थित सिलाट अल हरिथिया गांव में हुए इसराइली एयरक्राफ्ट की ज़द में आ जाते हैं।
अब्दुलरहमान ने बताया कि उन्हें रॉकेट की आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन बचने का समय नहीं होता। उन्होंने कहा, ‘मैं सिर्फ एक क़दम पीछे ले सका।’
‘मैंने चिल्लाना शुरू किया लेकिन लैथ ने कोई जवाब नहीं दिया।’
16 वर्षीय लैथ की मौत हो जाती है और अब्दुलरहमान गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। उनके दोनों पैरे के घुटने से नीचे का हिस्सा अलग करना पड़ता है।
अब्दुलरहमान ने कहा कि वो 10 दिन बाद होश में आते हैं और उन्हें बताया जाता है कि दिल का धडक़ना तीन बार अब तक रुक चुका है
अब्दुल रहमान अभी भी अस्पताल में हैं। मेटल प्लेट्स एक हाथ में लगी हुई है, दो उंगलियां खराब हो चुकी हैं। साथ ही पेट की कई सर्जरी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि दर्द लगातार होता है।
वेस्ट बैंक में 7 अक्टूबर के बाद से हिंसा बढ़ गई है। इसराइल का कहना है कि हमारा मकसद हमारे देश में जानलेवा हमलों को रोकना है। हमले में सैकड़ों फिलस्तीनी मारे गए हैं।
अब्दुलरहमान हमले से पहले दूसरे लोगों की तरह सामान्य जीवन जी रहे थे। उनका जीवन सुबह की प्रार्थना, दोस्तों के साथ नाश्ता, काम में पिता की मदद और भुट्टा बेचते हुए बीतता था।
लेकिन अब वो हर रोज के कामों के लिए जैसे कि बाथरूम जाने के लिए अपने भाई पर निर्भर हो गए हैं। उन्हें उनकी मां खाना खिलाती हैं।
बीबीसी ने हमले के बाद आईडीएफ से संपर्क साधा था। इस दौरान आईडीएफ ने कहा था, ‘जेनिन क्षेत्र में तैनात मेनाशे ब्रिगेड के बलों पर विस्फोटक फेंके देखे जाने के तुरंत बाद एक आतंकवादी सेल पर एयरक्राफ्ट से हमला किया।’
जब उनसे पूछा गया कि क्या वो हथियार लिए हुए थे तो उसने कहा, ‘कैसे हथियार? मैं घर से तुरंत निकला था। मैं सफेद कपड़े पहने हुए सडक़ पर चल रहा था।।मैं बस बाहर जा रहा था।’
वो बताते हैं कि मैं सिर्फ ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने और एक कार खरीदने का सपना देखता था।
‘आज मैं किसी बात की चाहत रखता हूं तो वो चलना है।’ (bbc.com/hindi)
-विनायक होगाडे
पुणे के येरवडा की झुग्गी-झोपड़ी से लेकर अमेरिका में प्रोफेसर बनने तक का बेहतरीन सफर तय करने वाली शैलजा पाइक अब प्रतिष्ठित ‘मैकआर्थर’ फैलोशिप पाने वाली पहली दलित महिला बन गई हैं।
इस फैलोशिप के तहत चयनित उम्मीदवारों को पांच साल के लिए कई चरणों में 8 लाख डॉलर (भारतीय मुद्रा में 6 करोड़ 71 लाख रुपये) की राशि मिलती है।
शैलजा पाइक ने अपने शोध अध्ययन के माध्यम से दलित महिलाओं के जीवन को गहराई से प्रस्तुत किया है। उन्हें एक ऐसी इतिहासकार के रूप में जाना जाता है जिन्होंने दलित महिलाओं के योगदान और उनकी आत्मचेतना की जागृति का इतिहास लिखा है।
जॉन डी. और कैथरीन टी. मैकआर्थर फाउंडेशन की ओर से ‘मैकआर्थर फैलो प्रोग्राम’ की ‘जीनियस ग्रांट’ फैलोशिप अमेरिका में अलग-अलग क्षेत्रों के 20 से 30 शोधकर्ताओं और विद्वानों को हर साल दी जाती है।
इस साल भी लेखकों, कलाकारों, समाजशास्त्रियों, शिक्षकों, मीडियाकर्मियों, आईटी, उद्योग, अनुसंधान जैसे विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित लोगों के लिए इस फ़ैलोशिप की घोषणा की गई है और इसमें इतिहासकार के तौर पर शैलजा पाइक भी शामिल हैं।
बीबीसी मराठी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं इस फैलोशिप को पाकर बहुत खुश हूं। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं बादलों पर चल रही हूं।’
येरवडा से अमरीका का दौरा
शैलजा पाइक पुणे के येरवडा की रहने वाली हैं। वह अपनी तीन बहनों के साथ येरवडा की झुग्गियों में बीस बाई बीस फीट के छोटे से घर में पली बढ़ीं।
अपने बचपन के बारे में बीबीसी मराठी से वो बताती हैं, ‘हमारे पास न तो पीने के पानी की सुविधा थी, न ही शौचालय। यह सच है कि मैं कचरे और यहां तक कि गंदगी से घिरे इलाके, जहां सूअर घूमते रहते थे, वहां बड़ी हुई, सार्वजनिक शौचलायों की वो यादें, मुझे आज भी परेशान करती हैं।’
बस्ती में सार्वजनिक नल का पानी ही घर में खाना पकाने या सफाई जैसे कामों का आधार था।
उन्हें यह भी याद है कि इस पानी के लिए उन्हें लंबी कतार में लगना पड़ता था। शैलजा का कहना है कि इसके बावजूद उनके पिता देवराम और मां सरिता ने उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में शिक्षा दिलाई।
शैलजा कहती हैं, ‘सामाजिक, शैक्षिक, भावनात्मक और मानसिक सभी स्तरों पर, इन सबका निश्चित रूप से गहरा प्रभाव पड़ता है। इतना मुश्किल जीवन जीने और येरवडा जैसे इलाके़ में रहने के बाद भी इन हालात से बाहर निकलने में शिक्षा के महत्व को मेरे माता-पिता ने पहचाना और मुझे इसके लिए प्रोत्साहित किया। यही कारण है कि मैं ख़ुद को पढ़ाई के लिए समर्पित कर पायी।’
उस समय की अपनी यादों को साझा करते हुए वो बताती हैं, ‘वास्तव में ऐसे माहौल में पढ़ाई करना एक बड़ी चुनौती थी। मैं शाम को 7.30 बजे सो जाती थी और आधी रात को 2-3 बजे उठकर सुबह के छह सात बजे तक पढ़ती थी, फिर स्कूल जाती थी।’
अपने संघर्ष के बारे में बात करते हुए उन्होंने यह भी कहा, ‘एक दलित होने के नाते निश्चित रूप से कई बार मुझे भेदभाव का सामना करना पड़ा।’
‘उदाहरण के लिए, जब मुझे ‘फोर्ड फाउंडेशन फैलोशिप’ मिली, तो मेरे आस-पास के कुछ लोगों को इस पर विश्वास नहीं हुआ। वे अक्सर मुझसे पूछते थे, तुम्हें यह कैसे मिला? मुझे जो फैलोशिप मिली वह मेरे काम के लिए थी, लेकिन एक दलित महिला को मिली फैलोशिप से वे बहुत आश्चर्यचकित थे।’
इस फैलोशिप का क्या महत्व है?
‘जीनियस ग्रांट’ के नाम से मशहूर यह फ़ैलोशिप इस साल 22 लोगों को दी गई है।
‘रचनात्मकता’ मैकआर्थर फैलोशिप का एक मूलभूत मानदंड है। इस फ़ैलोशिप का उद्देश्य नवीन विचारों वाले उभरते इनोवेटर्स के काम में निवेश करना, उसे प्रोत्साहित करना और उसका समर्थन करना है।
इस फ़ैलोशिप को देने के पीछे मूल विचार उन लोगों को सामने लाना है जो जोखिम उठाते हुए समाज की जटिल समस्याओं का सामना करते हैं और जो लोग लीक से हटकर सोचते हैं और सुंदर, रचनात्मक और प्रेरणादायक चीजें बनाते हैं।
फैलोशिप के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं, ‘मुझे उम्मीद है कि यह फैलोशिप दक्षिण एशिया और उसके बाहर दलितों और गैर-दलितों दोनों के लिए जातिवाद के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करेगी।’
इस फैलोशिप के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रमुख श्रद्धा कुम्बोजकर ने बीबीसी मराठी को बताया, ‘इस फ़ैलोशिप की राशि भारतीय मुद्रा में भी बहुत बड़ी है। मैकआर्थर फाउंडेशन प्रतिभाशाली लोगों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से यह फ़ैलोशिप प्रदान करता है। यह फैलोशिप इन लोगों की प्रतिभा में यकीन करती है।’
इस फैलोशिप के लिए कोई आवेदन या साक्षात्कार प्रक्रिया नहीं है। फैलोशिप के लिए विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा नामांकित विद्वान और होनहार उम्मीदवारों पर विचार किया जाता है।
‘दलितों में दलित यानी दलित महिलाएं’
शैलजा पाइक का अध्ययन दलित महिलाओं के जीवन के नजरिए से आधुनिक भारत में जाति, लिंग और सेक्सुअलिटी की पड़ताल करता है।
अपने समग्र अध्ययन के बारे में उन्होंने कहा, ‘भारत की कुल आबादी में दलित 17 प्रतिशत हैं। मैंने देखा कि दलित महिलाओं की शिक्षा पर बहुत काम नहीं किया गया है। आंकड़े तो हैं लेकिन सटीक स्थिति के बारे में कोई गुणात्मक शोध नहीं है। इन दलित महिलाओं का इतिहास किसी ने ठीक से नहीं लिखा इसलिए मैंने तय किया कि मुझे ये काम करना है।’
‘ऐतिहासिक रूप से इतनी बड़ी आबादी को किसी भी प्रकार की शिक्षा, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक जल निकायों या कुओं के इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी, चप्पल या नए कपड़े पहनने की तो बात ही छोड़ दें, भले ही कोई उनका ख़र्च उठाने की स्थिति में ही क्यों न हो।’
‘दलित महिलाएं निस्संदेह सबसे अधिक वंचित और उत्पीडि़त हैं। दलितों में उनकी स्थिति ‘दलित’जैसी है। यही वह समाज है जहां से मैं आती हूं। यही कारण है कि पिछले 25 वर्षों से मेरे अध्ययन, शोध और लेखन का विषय यही रहा है।’
दलित महिलाओं के जीवन का अध्ययन
शैलजा पाइक एक आधुनिक इतिहासकार हैं जो जाति, लिंग और सेक्सुअलिटी के चश्मे से दलित महिलाओं के जीवन का अध्ययन करती हैं।
पाइक ने अपने अध्ययन के माध्यम से जाति प्रभुत्व के इतिहास पर एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। इसके साथ ही, उन्होंने अपने लेखन के ज़रिए बताया है कि लिंग और सेक्सुअलिटी ने दलित महिलाओं के आत्मसम्मान और उनके व्यक्तित्व के शोषण को कैसे प्रभावित किया है।
उनके संपूर्ण लेखन के केंद्र में दलित और दलित महिलाएं हैं। अंग्रेजी, मराठी और हिंदी भाषाओं के साहित्य के अलावा उन्होंने समकालीन दलित महिलाओं के साक्षात्कार और उनके अनुभवों को जोडक़र आज के संदर्भ में एक नया दृष्टिकोण तैयार किया है।
उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘आधुनिक भारत में दलित महिला शिक्षा: दोहरा भेदभाव’ (2014) और ‘जाति की अश्लीलता: दलित, सेक्सुअलिटी और आधुनिक भारत में मानवता’। पहली किताब में उन्होंने महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में शिक्षा के लिए दलित महिलाओं के संघर्ष की तुलना ब्रिटिश कालीन हालात से की है।
पढ़ाई लिखाई कहां से हुई?
शैलजा पाइक 2010 से ‘सिनसिनाटी विश्वविद्यालय’ से जुड़ी हुई हैं जहां वह ‘महिला, लिंग और सेक्सुअलिटी अध्ययन और एशियाई अध्ययन’ की शोध प्रोफेसर हैं।
निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से आने वालीं शैलजा ने एमए की पढ़ाई 1994-96 के दौरान सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से पूरी की है।
2000 में, उन्हें एमफिल के लिए विदेश जाने के लिए भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) से फैलोशिप मिली। फिर वह इंग्लैंड चली गईं।
इसके बाद उन्हें आगे की शिक्षा के लिए अमेरिका जाने का मौका मिला। आज तक उनके शोध लेखन को अमेरिकन काउंसिल ऑफ लर्नड सोसाइटीज, स्टैनफर्ड ह्यूमैनिटीज़ सेंटर, नेशनल एंडोमेंट फॉर द ह्यूमैनिटीज़, अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज, येल यूनिवर्सिटी, एमोरी यूनिवर्सिटी, फोर्ड फाउंडेशन और चाल्र्स फेल्प्स टैफ्ट रिसर्च सेंटर से फंडिंग मिली है।
उन्होंने 2007 में इंग्लैंड के वारविक विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त की। उन्होंने 2008-2010 के दौरान यूनियन कॉलेज में इतिहास के विजि़टिंग सहायक प्रोफेसर और येल विश्वविद्यालय में 2012-2013 के दौरान दक्षिण एशियाई इतिहास के पोस्ट डॉक्टरल एसोसिएट और सहायक प्रोफेसर के रूप में भी काम किया है। (bbc.com/hindi)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
आध्यात्मिकता भारतीय संस्कृति के साथ इतनी महीनता से रची गुंथी है कि वह नागरिकों के डी एन ए और खून में भी रच बस गई है। दुर्भाग्य से हम भारतीय इसी वजह से आए दिन नए नए बाबाओं और धर्मगुरुओं के मायाजाल में इस तरह फंस जाते हैं कि इससे बाहर निकलना टेढ़ी खीर हो गया। यही कारण है कि हर दौर में जब किसी पुराने बाबा की गद्दी हिलती है या जब उसकी पोल पट्टी खुलती है तो खाली स्थान भरने के लिए कोई नया बाबा या धर्मगुरु प्रकट हो जाता है। इन तमाम धर्मगुरुओं की नजर दो तीन तरह के लोगों पर सबसे ज्यादा टिकती है, कोई बड़ा नेता, जो इनके फाइव स्टार सुविधाओं से युक्त लंबे चौड़े आश्रम के लिए कोई भूखंड सस्ते में दिलाने या सरकारी जमीन पर कब्जा कराने में मदद कर सके, कुछ अमीर उद्योगपति और व्यापारी जो अपने धंधे की नेटवर्किंग के बदले इन्हें भव्य आश्रम निर्माण के लिए करोड़ों का चंदा दे सके और कोई फिल्मी सितारा जो इनके आकर्षण में चार चांद लगाने में मदद कर सके।
इसी प्रक्रिया को अपनाकर आजाद भारत में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, ओशो, चंद्रा स्वामी, आशाराम बापू और राम रहीम आदि ने बहुत सालों तक आध्यात्मिक चोला ओढक़र राज किया है और जैसे ही विवादों में उलझकर इनका सूर्यास्त हुआ खाली जगह भरने के लिए कोई नया बाबा आ जाता है। यह स्थिति तो राष्ट्रीय स्तर के बाबाओं और धर्मगुरुओं की है, स्थानीय स्तर पर भी विभिन्न इलाकों में धीरेन्द्र शास्त्री और प्रदीप मिश्रा जैसे न जाने कितने बाबा, कथावाचक और धर्मगुरु होते रहे हैं जिनकी पहुंच भाषाई अवरोध और क्षमता की सीमा के चलते राष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंच पाती।
इधर नए बाबाओं की एक ऐसी खेप भी तैयार हुई है जो संस्कृत और हिंदी जैसी पुरानी और क्षेत्र विशेष तक सीमित भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पूरे देश के पढ़े लिखे नौजवानों और विदेशियों को भी आकर्षित कर सकते हैं। ऐसे दो सबसे चर्चित धर्मगुरु जिन्होंने दक्षिण भारत से अपनी शुरूआत की श्री श्री रवि शंकर और जग्गी वासुदेव हैं। इन्होंने क्रमश: बैंगलौर और कोयंबतूर को अपना मुख्यालय बनाकर देश और देश के बाहर अपने प्रशंसकों की बड़ी फौज तैयार की है। रवि शंकर के परिचितों में अक्सर कई देशों के राष्ट्रध्यक्ष की फोटो प्रचारित की जाती है। उसी तरह से जग्गी वासुदेव अपने साथ प्रधानमंत्री मोदी का नाम जोड़ते हैं। इन संतों को सीकरी (दिल्ली) की गद्दी से बड़ा प्रेम है।रवि शंकर अपने आध्यात्मिक साम्राज्य का उत्साही अंतरराष्ट्रीय विस्तार करने में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के शिकंजे में फंस गए थे जब उन्होंने दिल्ली की दम तोड़ती यमुना के पर्यावरण की दृष्टि से अतिसंवेदनशील क्षेत्र को नुकसान पहुंचाया था।
आजकल जग्गी वासुदेव मद्रास उच्च न्यायालय में एक मामले में घिरे हैं। अखबार की रिपोर्ट्स के अनुसार उनके कोयंबतूर स्थिति आश्रम पर पुलिस ने छापा मारा है हालांकि उनके आश्रम के सूत्र कहते हैं कि पुलिस वहां समान्य जानकारी के लिए आई थी। ताजा विवाद का कारण एक बुजुर्ग व्यक्ति का यह आरोप है कि जग्गी वासुदेव ने अपनी बेटी की तो शादी कर दी लेकिन वे अन्य युवाओं और युवतियों को सन्यासी बनाने के लिए उनका ब्रेनवाश करते हैं। उन्होंने उनकी दो बेटियों का इसी तरह ब्रेनवाश कर आश्रम में रखा है। संभवत: उन्हीं युवतियों की खोज में पुलिस आश्रम में आई थी। वर्तमान समय में जग्गी वासुदेव केवल दक्षिण भारत में ही नहीं बल्कि पूरे देश में चर्चित हैं और विदेशों में भी उनके काफी अनुयाई हैं। वे फर्राटे से अंग्रेजी, हिंदी और दक्षिण भारत की कुछ भाषाएं बोलते हैं। उनके शिष्यों में काफी उच्च शिक्षा प्राप्त युवक और युवतियां भी हैं। प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिए भी उनके प्रयास का प्रचार होता है। वे पुराने जमाने की सादगी वाली आध्यात्मिकता के बजाय तामझाम वाले गुरु हैं जिनकी वेशभूषा और आश्रम से किसी प्राकृतिक महंगे रिसॉर्ट जैसा अहसास होता है। अब इस मामले को मद्रास उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पास ले लिया, देखते हैं उसमें क्या निर्णय आता है!
-मोहम्मद हनीफ
वैसे कहने को तो पाकिस्तान में बहुत सारी समस्याएं हैं। बहुत सारे घाटे हैं। हमारा खज़़ाना अक्सर ख़ाली रहता है।
हमें अपने ख़र्चों को पूरा करने के लिए कभी आईएमएफ तो कभी चीन और सऊदी अरब जैसे देशों के पास जाना पड़ता है। हमारे कोई दो-ढाई करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिन्होंने कभी स्कूल की शक्ल भी नहीं देखी है।
अगर कोई काम करने वाला मज़दूर बीमार पड़ जाए तो उसे अपना इलाज कराने के लिए उसे अपनी मोटरसाइकिल बेचनी पड़ती है।
वैसे तो हम एक समृद्ध देश हैं लेकिन कभी गेहूं की कमी हो जाती है तो कभी चीनी बाहर से मंगवानी पड़ती है।
ये सारे घाटे हमारे अंदर हैं लेकिन एक मामले में अल्लाह की बड़ी मेहरबानी है कि पाकिस्तान में मुफ़्तियों और मौलवियों की कमी नहीं है।
यहां आपको हर मिज़ाज, हर हुलिये का आलिम-ए-दीन मिलेगा। यहां आपको मधुर और सुरीले मौलवी मिलेंगे साथ ही बक-बक करने वाले और अपशब्द बोलने वाले मौलवी भी यहां मिल जाएंगे ।
मुफ़्तियों, मौलवियों का ‘ओलंपिक’ और पाकिस्तान
यहां आपको ऐसे मौलवी भी मिलेंगे जो आपका गला काटने का फ़तवा देंगे। उस फ़तवा देने वाले का भी फ़तवा देने वाले मौलवी मिल जाएंगे। कुछ ऐसे भी हैं जो ख़ुद से गला काटने की बात करते हैं।
अब गऱीब का बच्चा अगर स्कूल नहीं जाएगा तो शायद मदरसे में चला जाए। उस बेचारे ने तो फिर वहां से मौलवी बनकर ही बाहर निकलना है। लेकिन यहां संपन्न मध्यम वर्ग के लोग भी अपने बेटे को कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई के लिए यूनिवर्सिटी भेजते हैं।
और दो साल बाद वह मुफ़्ती बन जाता है और घर आकर अपनी मां और बहन को इस्लाम में पर्दा करने के मुद्दे पर लेक्चर देता है।
अगर दुनिया में कहीं मुफ़्तियों या मौलवियों का ओलंपिक होता तो मुझे यक़ीन है कि सारे मेडल पाकिस्तान ने जीत लेने थे और हमारी हर गली में एक अरशद नदीम घूम रहा होता।
अब इस माहौल में पता नहीं हमारी सरकार को ऐसा क्यों लगा कि हम लोगों को रोटी, शिक्षा और बिजली तो नहीं दे सकते, लेकिन हमें उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय मौलवी तो देना ही चाहिए।
हुकूमत ने जनाब ज़ाकिर नाइक साहब को एक महीने के लिए पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया है।
वे हमारे मेहमान हैं। वेलकम। उनकी प्रसिद्धि यह है कि एक तो वे कोट-पैंट पहनते हैं और दूसरी यह कि वे ‘काफिऱों’ को मुसलमान बनाते जा रहे हैं।
‘ज़ाकिर साहब पाकिस्तान में किसे मुसलमान बनाना चाहते हैं’
सुना है कि उन्होंने लाखों काफिऱों को मुसलमान बनाया है। आते ही उन्होंने इस बात की पुष्टि भी कर दी कि मुझे भारत से इसलिए निकल दिया गया है क्योंकि हिंदू मेरी बातें सुन-सुन कर मुसलमान बनने लगे थे।
अब पता नहीं कि वे पाकिस्तान में किसे मुसलमान बनाना चाहते हैं। हमारे पास तो काफिऱ बचे ही बहुत कम थे।
इसीलिए हमने ख़ुद ही प्रोडक्शन शुरू कर दी है कि अच्छे भले कलमा पढऩे वाले मुसलमानों को हम कभी काफिऱ बनाकर मार देते हैं और कभी उन पर फ़तवा थोप देते हैं।
शायद सरकार सोचती है कि हमारे ही पगड़ी वाले मौलवियों ने हमारा धर्म थोड़ा खऱाब कर दिया है।
इसलिए यह सूटेड-बूटेड आलिम हमें आकर सीधा कर देगा। इसलिए हमारी स्थापना का यह पुराना तरीक़ा रहा है कि जब चीज़ें हाथ से बाहर हो जाती हैं तो मौलवियों को सडक़ों पर उतार देते हैं और उनसे फ़तवा जारी करवाते हैं ।
अब शायद उन्होंने यह सोचा होगा कि देशी मर्दों को जऱकाने के लिए इस कोट-पैंट वाले मौलवी को इम्पोर्ट किया जाए।
ज़ाकिर नाइक साहब हमारे बड़े -बड़े नेताओं और मुफ़्ितयों से मिल रहे हैं। वे मीठी-मीठी बातें करते हैं ।
पिछले दिनों एक अनाथालय में मेहमान-ए-ख़ुसूसी थे। वहां सिर से पैर तक पर्दा किए हुए अनाथ लड़कियों से टकराव हुआ और वे यह कहते हुए मंच से भाग गए कि यह तो अशोभनीय है।
अब पाकिस्तान में लगभग 12-13 करोड़ मुस्लिम लड़कियाँ और महिलाएँ हैं। उनका ईमान पता नहीं कौन ठीक करेगा।
वैसे भी जो मुसलमान पर्दानशीन अनाथ लड़कियों को देखकर अपने आप पर काबू नहीं रख पाता, वे पता नहीं हमारे आदमियों और ख़ासकर हमारे मौलवियों के ईमान को कैसे कायम रखेगा।
आपने देखा होगा कि बसों में या कभी-कभी लॉरी स्टेशन पर एक बोर्ड लगा होता है कि यात्री को अपने सामान की सुरक्षा ख़ुद करनी चाहिए।
और ज़ाकिर नाइक साहब हमारे मेहमान हैं इसलिए फिर से वेलकम लेकिन डर है कि कहीं हमारा कोई देशी मौलवी उनके कोट-पैंट पर ही फ़तवा न दे दे।
इसलिए ज़ाकिर नाइक साहब वेलकम, लेकिन अपने ईमान की पाकिस्तान में रक्षा ख़ुद करें । हम अपना ख़ुद ही देख लेंगे । रब राखा!
एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि उष्णकटिबंधीय तूफानों से लंबी अवधि में होने वाली मौतों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों से लगभग 300 गुना अधिक हो सकती है.
पिछले हफ्ते दक्षिण-पूर्वी अमेरिका में आए चक्रवातीय तूफान हेलेन ने कम से कम 155 लोगों की जान ले ली। उससे पहले ‘जॉन’ नाम के तूफान ने पिछले सप्ताह मेक्सिको में कम से कम 16 लोगों की जान ली। ताइवान में क्राथोन नाम के तूफान का कहर अब तक दो लोगों की जान ले चुका है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन उष्णकटिबंधीय तूफानों के दौरान दर्ज की गई तात्कालिक मौतें उनके असली प्रभाव का केवल एक छोटा सा हिस्सा दिखाती हैं। नए शोध के अनुसार, तूफान के गुजरने के कई वर्षों बाद तक इनका असली असर जीवन पर पड़ता है।
साथ ही, मानव-निर्मित जलवायु परिवर्तन से इन उष्णकटिबंधीय तूफानों के और भी तीव्र होने की संभावना है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने कहा कि इन प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को अधिक सहायता की जरूरत है। कई शोध बता चुके हैं कि समुद्री तूफान और ज्यादा प्रचंड हो रहे हैं।
501 तूफानों का अध्ययन
यह शोध ‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका रेचल यंग ने एएफपी को बताया कि यह पहली बार है जब सांख्यिकी मॉडलिंग तकनीक का उपयोग करके यह अनुमान लगाया गया है कि लंबे समय तक तूफानों का मौतों पर क्या प्रभाव पड़ता है।
शोधकर्ताओं ने 1930 से 2015 के बीच अमेरिकी मुख्य भूमि पर आए 501 उष्णकटिबंधीय तूफानों की जांच की और उन क्षेत्रों में तूफान के 15 साल बाद तक सभी कारणों से हुई अतिरिक्त मौतों की संख्या का विश्लेषण किया।
हर तूफान के दौरान औसतन 24 मौतें आधिकारिक तौर पर दर्ज की गईं। लेकिन अध्ययन के अनुसार अगर तूफान के बाद के वर्षों में अप्रत्यक्ष मौतों की गिनती की जाए, तो प्रति तूफान औसतन 7,000 से 11,000 मौतें हो सकती हैं, जो सरकारी आंकड़ों से लगभग 300 गुना अधिक है।
इसका मतलब यह होगा कि 85 वर्षों में अमेरिकी अटलांटिक तट के प्रभावित क्षेत्रों में हुई कुल मौतों में से तीन से पांच प्रतिशत मौतें उष्णकटिबंधीय तूफानों से संबंधित हो सकती हैं और कुल मौतों की संख्या 50 लाख तक हो सकती है। शोध के मुताबिक इसका मतलब है कि उष्णकटिबंधीय तूफानों ने कार दुर्घटनाओं, संक्रामक बीमारियों या युद्ध में हुई मौतों से भी अधिक लोगों की जान ली है।
क्यों हुआ ऐसा, स्पष्ट नहीं
यंग कहती हैं कि जब शोधकर्ताओं ने देखा कि तूफानों का विनाशकारी प्रभाव कितने लंबे समय तक समुदायों पर बना रहता है, जो इतनी बड़ी संख्या का कारण था, तो वे ‘बहुत हैरान और बहुत सशंकित’ थे।
बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की शोधकर्ता यंग ने कहा कि ‘किसी को भी यह नहीं पता था कि ऐसा हो रहा है।’
यंग और स्टैन्फर्ड विश्वविद्यालय के सोलोमन हसियांग ने इन आंकड़ों के अन्य संभावित कारणों को समझने के लिए कई साल बिताए, लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए। अध्ययन यह नहीं दिखा पाया कि कोई विशेष तूफान किसी भी अतिरिक्त मौत का सीधा कारण कैसे बना।
यंग ने इन परिणामों की तुलना इस बात से की कि कैसे महामारी के दौरान दुनिया में प्रत्यक्ष कोविड-19 से होने वाली मौतों की तुलना में कहीं अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं। लेकिन शोधकर्ताओं ने इस बात के कुछ सिद्धांत पेश किए कि कैसे तूफानों ने वर्षों में इतनी ज्यादा मौतों में भूमिका निभाई हो सकती है। इनमें आर्थिक संकट, बुनियादी ढांचे की क्षति, बढ़ता प्रदूषण और तनाव, और कामकाजी उम्र के लोगों का पलायन शामिल हैं।
यंग ने एक उदाहरण दिया कि कोई व्यक्ति जो रिटायरमेंट की बचत का इस्तेमाल अपने घर की मरम्मत के लिए करता है, वह जीवन के बाद के वर्षों में स्वास्थ्य देखभाल के लिए पैसे की कमी से जूझ सकता है।
यंग ने कहा कि पिछले शोधों ने यह भी दिखाया है कि तूफान प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय और राज्य सरकारों का बजट कम होता है, जिससे इन समुदायों को और अधिक वंचित कर दिया जाता है।
कई लोग इस बात से अनजान हैं कि तूफान के बाद उनके स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा है। यह बात भी कुछ शोधों में सामने आई है कि आपदाओं में जान बच भी जाए तो संपत्ति का नुकसान बहुत ज्यादा होता है।
तूफानों से जुड़े अतिरिक्त खतरे
अध्ययन में पाया गया कि तूफान प्रभावित क्षेत्रों में पांच से दस साल बाद पैदा हुए बच्चों में जल्दी मरने का जोखिम काफी अधिक था। अश्वेत लोगों में भी जल्दी मरने का जोखिम बहुत अधिक था। अध्ययन ने अनुमान लगाया कि अन्य कारकों को जोडऩे के बाद भी, 1930 से 2015 के बीच अश्वेत लोगों की सभी मौतों में से 15.6 प्रतिशत तूफान प्रभावित क्षेत्रों में रहने के कारण हुईं।
इन प्राकृति आपदाओं के कारण राज्यवार मृत्यु दर अलग-अलग थी। फ्लोरिडा में 13 फीसदी, उत्तरी कैरोलाइना में 11 फीसदी, दक्षिणी कैरोलाइना में 9 फीसदी और लुइजियाना में 8 फीसदी मौतों को तूफानों से जोड़ा जा सकता है।
यंग ने चेतावनी दी कि जिन राज्यों में अधिक तूफान आते हैं, जैसे फ्लोरिडा, वहां लोग समय के साथ अधिक लचीले हो गए हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन अगर नए क्षेत्रों की ओर तूफानों को धकेलता है, तो इन क्षेत्रों में मौतों की संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है।
कैंब्रिज विश्वविद्यालय के महामारी विशेषज्ञ स्टीफन बर्जेस, जो इस शोध में शामिल नहीं थे, ने एएफपी को बताया कि इस शोध की कार्यप्रणाली सही थी लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया हमेशा से उष्णकटिबंधीय तूफानों का सामना करती आई है।
उन्होंने कहा, ‘लेखक यह सवाल पूछ रहे हैं: अगर उष्णकटिबंधीय तूफान नहीं होते तो क्या होता? लेकिन यह एक ऐसा कारक नहीं है जिसे हम बदल सकते हैं।’



