विचार/लेख
मनीष सिंह
आखिरकार 1906 में ब्रिटेन रानी और रूस राजा ने तिब्बत पर चीन राजा की सुजेर्निटी मान ली। सुजेर्निटी का मतलब सरल भाषा में ‘तुम जानो -तुम्हारा काम जाने’ होता है।
1912 चीन मे राजतंत्र खत्म हुआ, नेशनलिस्ट सरकार बनी। तो राजा की फौजों ने अपने आपको नेशनलिस्ट सरकार के अंडर मे मान लिया। 1949 तक यही व्यवस्था चली, जब तक कि माओ ने यहां सीधा नियंत्रण न ले लिया।
संघी इतिहास के अनुसार यह भारत की अक्ष्म्य गलती थी। उनके अनुसार एक स्वत्रंत देश पर चीन ने कब्जा कर लिया और नेहरू चुपचाप बैठे रहे ।
तिब्बत क्या है? मेरा मतलब, नेहरू की गलती के अलावे और क्या है ...
आठवीं के बाद भूगोल और इतिहास कभी न पढऩे वाले ज्यादातर लोग इस बात को नहीं जानते कि नेहरू की अनगिनत गलतियों में से एक तिब्बत दरअसल एक पठार भी है। न जानने वालों के लिए, पठार का मतलब एक टेबल टॉप की तरह की जमीन है, जो आसपास की धरती से बेहद ऊंचा होता है। नीचे से देखने पर वह पहाड़ की तरह लगता है, मगर टॉप पर मैदान होता है।
तिब्बत का पठार दुनिया की छत है। छत, याने ऐसी जगह से जहां से बारिश का पानी नीचे आता है। ठीक वैसे ही तिब्बत के पठार से जो नदियां निकलती हैं, वह दुनिया की एक तिहाई आबादी का पोषण करती हैं।
दुनिया का पोषण करने वाला पठार को प्रकृति ने बड़ा कुपोषित रखा है। एवरेज चार हजार मीटर की हाइट पर साल के आठ महीने बर्फ, बेहद ठंड और साल भर सूखी सर्द हवा होती हैं। दुनिया के सबसे कम आबादी के घनत्व का यह पठार चीन के मध्य तक घुसा हुआ है। तीन ओर चीन है और चौथी ओर हिमालय.. हिमालय के नीचे हम।
जी हां, आप तिब्बत को हिमालय पर बसा देश समझते हैं। ऐसा नहीं है, जहां से हिमालय खत्म होता है, वहां से तिब्बत का पठार शुरू होता है। मगर भूमि की संरचना इस प्रकार मिलीजुली है कि यह बताना कठिन है कि कहां से हिमालय खत्म होता है, कहां तिब्बत शुरू होता है। ऐसे में आपका कन्फयूज होना लाजिमी हैै।
मगर कन्फयूजन पर बात करने के पहले हिस्टी-जियोग्राफी जान लेना अच्छा है। तिब्बत का पठार एक तरफ मध्य एशिया के दूसरे ऊंचे पठारों से जुडा़ है, और दूसरी ओर चीन से। भारत और इस पठार के बीच की लक्ष्मण रेखा हिमालय है, इसलिए हमारा इससे ज्यादा वास्ता नहीं रहा। इसके इतिहास के सफहे, बीजिंग के राजघरानों और मध्य एशिया के चंगेज खान टाइप के लोगों के बीच डोलता रहा है।
बेहद कम आबादी के इस क्षेत्र में सातवीं-आठवीं शताब्दी के दौरान, यह इलाका कबीलों में बंटा, एक होता, फिर बंटता रहा। 1244 में मध्य एशिया से आए मंगोलों ने इस इलाके को जीता। मगर उनका शासन ढीला-ढाला था। तिब्बत के लोग उनके अंडर थे, मगर इन्टर्नल ऑटोनमी थी। इस इलाके में शासन करना दुरूह था। मंगोलों ने बढिय़ा युक्ति निकाली।
यहां ज्यादातर लोग बुद्धिष्ट थे। सो एक लामा को दलाई लामा घोषित किया, जो तिब्बत का लीडर होगा। सारे कबीले वाले दलाई लामा के अंडर में होंगे, और दलाई लामा मंगोलों के अन्डर में। इस अनोखी व्यवस्था में, अलग-अलग क्षेत्र के प्रमुख तो वहीं के कबीले वाले थे, मगर सारे अपने आप को बाबाजी की स्प्रिचुअल कमांड में मानते। न मानते तो मंगोल आकर सजा देते। मगर फिर मंगोल कमजोर हुए और चीन के राजा लोग मजबूत तब यही व्यवस्था चीन के अंडर में चलने लगी।
मंगोलों के अंडर दलाई लामा, याने कि उनके अंडर के कबीले वालों को काफी स्वायत्ता थी। मगर चीन राजा के अंडर वैसी स्वायत्ता नहीं थी। वे अपनी फौज भी गाहे-बगाहे भेजते। 1717 मंगोलों का फिर से अटैक हुआ, उन्होंने दलाई लामा को हटा दिया। चीनी सम्राट ने अपनी फौज लगाकर उन्हें भगाया। फिर से दलाई लामा को बिठाया। लेकिन साथ में अपनी स्थाई फौज तथा रेजीडेंट कमिश्नर भी बिठा दिया।
चीनी कमिश्नर की दखलंदाजी ज्यादा थी। तिब्बत पठार के कुछ इलाके चीन राजा ने डायरेक्ट अपने शासन में ले लिया। 1750 के आते आते, चीन राजा के विरूद्ध कबीलों ने विद्रोह कर दिया। चीन ने विद्रोह दबाया। अब तक नीचे भारत में अंग्रेज आ चुके थे। उन्होंने हिमालयी दर्रों के रास्ते व्यापार के प्रपोजल भेजे। चीन राजा न माने, तो आतंकी गतिविधियां शुरू कर दी गई।
जी हां, ये टैक्टिक उस जमाने में भी थी। नेपाली घुसपैठियों की मदद से तिब्बती कबीलों मे असंतोष भडक़ाया गया। चीन ने स्थाई फौज रख दी। एक और काम किया। दलाई लामा का पद वंशानुगत नहीं होता, उसे तो वर्तमान दलाई लामा चुनता है। चीन ने चुनने की इस व्यवस्था को अपने रेजिडेंट और फौज के सुपरविजन में रख दिया। विदेशियों का आना बैन कर दिया।
आखिरकार 1906 में ब्रिटेन रानी और रूस राजा ने तिब्बत पर चीन राजा की सुजेर्निटी मान ली। सुजेर्निटी का मतलब सरल भाषा में ‘तुम जानो-तुम्हारा काम जाने’ होता है।
1912 चीन मे राजतंत्र खत्म हुआ, नेशनलिस्ट सरकार बनी। तो राजा की फौजों ने अपने आपको नेशनलिस्ट सरकार के अंडर मे मान लिया। 1949 तक यही व्यवस्था चली, जब तक कि माओ ने यहां सीधा नियंत्रण न ले लिया।
संघी इतिहास के अनुसार यह भारत की अक्ष्म्य गलती थी। उनके अनुसार एक स्वत्रंत देश पर चीन ने कब्जा कर लिया और नेहरू चुपचाप बैठे रहे ।
रात की न उतरने पर अलसुबह हैंगओवर में आये ख्बाबो के अनुसार, जुम्मा-जुम्मा दो साल पहले पैदा हुए भारत के प्रधानमंत्री नेहरू को चाहिए था कि तिब्बत में फौज घुसाकर उसे चीन के पंजों से निकाल लेते। दलाई लामा को वापस गद्दी पर बिठाकर जयकारा लगवाते। दलाई लामा की सुरक्षा के लिए दो-चार लाख की फौज वहां छोड़ देते।
ऐसा अगर हो जाता तो भारत की सीमा चीन से कभी मिलती ही नहीं। मुझे लगता है कि भाजपा के इतिहास के कुछ दिग्गज तब के पीएम होते तो ऐसा पक्के तौर पर हो जाता।
इनके पास तीन दिन में तैयार होने वाली सेना जो थी।
(इन सबके बाद भी भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा न माना। अटल बिहारी ने पहली बार तिब्बत को चीन का हिस्सा माना।)
राज ढाल
शिव सेना के बारे में कइयों को बहुत गलतफहमी हो गई है। कई उनको अंडर एस्टीमेट कर रहे है। मैं उनको कहना चाहता हूँ कि वो ऐसी भूल ना करे। सत्ताएं आती हैं जाती हैं समझौते बनते हैं टूटते हैं लेकिन ये सत्ताएं किसी विचारधारा को खत्म नहीं कर सकती।
मराठा कौम को जानना जरूरी है तभी मराठों की स्ट्रेंथ पता चलेगी। ये कौम अपनी कला साहित्य रंगमंच और राजनीति में गहन समझ रखती है। आजादी के बाद बनिया गुजरातियों के महाराष्ट्र पर वर्चस्व ने इन्हें अलग राज्य बनाने को प्रेरित किया।
(तब महाराष्ट्र गुजरात का ही एक हिस्सा था)
सत्ता तब भी अकड़ में थी, गुजराती मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने अलग राज्य की मांग करते मराठाओं को अपने काफिले की चलती कारों से कुचलवा दिया था लेकिन फिर भी महाराष्ट्र वजूद में आया और उसके साथ वजूद में आई शिव सेना यानी शिवाजी की सेना जिसका काम मुख्यत: मराठा अस्मिता की रक्षा करने का था।
जब बिहारी बिहार की अस्मिता की बात कर सकता है तमिलियन तमिल इलम की तो मराठा मराठियों की अस्मिता की बात क्यों नहीं कर सकता?
क्यों उसके राज्य में पहले नौकरी किसी बिहारी को गुजराती को या तमिलियन को मिले?
पहला हक मराठाओं का होना चाहिए मराठाओं को अगर महाराष्ट्र में ही नौकरीं नहीं मिलेगी तो और कहां मिलेगी..?
हां अगर उनको देने के बाद बच जाए तो दूसरो को मिले, इसमें कोई क्षेत्रवाद नहीं है। ये सीधे-सीधे अपने हितों को संरक्षण देना है। इसमें कोई दोष नहीं।
शिवसेना इसी सोच से पनपी
उसका महाराष्ट्र से बाहर आने का कोई इरादा नहीं था लेकिन मुसलमानों के अग्रेशन ने उन्हें अपने विस्तार का मौका दिया। किसी जमाने में मुसलमानों के एक बड़े तबके को अपनी बाजुओं पर बड़ा नाज रहता था। ताकत की जुबान समझते और समझाते थे।
हिन्दुओं को दाल-चावल खाने वाले समझते और गोश्त खाने वालों से क्या मुकाबला करेंगे ऐसी सोच रखते थे। रामजन्म भूमि बाबरी विवाद ने ये सोच और गहरी कर दी।
हिन्दुओं को अग्रेशन सिखाया शिवसेना ने ना कि भाजपा ने। आज मोदी मोदी का जाप करने वाले नहीं जानते कि मोदी बाला साहब ठाकरे के प्रशंसक थे उनका आशीर्वाद लेने जाते थे।
कौन नहीं जानता कि उस समय बाल ठाकरे क्या हैसियत रखते थे। अब चूंकि सत्ता का केंद्रीय पक्ष भाजपा के पास है वो शिवसेना को मामूली समझ रही है जबकि राज्यस्तर पर शिवसैनिक जमीन पर मौजूद है।
बाल ठाकरे मरे हैं, शिवसैनिक नहीं, मराठाओं को उनकी अस्मिता को चुनौती देने वाले इस बात को समझें। शिवसेना सत्ता में रहे या ना रहे, पर शिव सेना महाराष्ट्र में हमेशा रहेगी।
बिहार को उतरप्रदेश को गुजरात को ये बात समझ जानी चाहिए और उन्हें बाबर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए ।
वो कट्टर हिन्दू है और उनका हिंदुत्व भाजपा का मोहताज नहीं जहाँ मराठी अस्मिता का सवाल खड़ा होगा वहां मराठी एक ही पाले में होगा।
अगर कोई उन्हें हिन्दू मुस्लिम के खेल में कटघरे में खड़ा करने की चेष्ठा करेगा तो वो जान ले कि मराठाओं को हिन्दू सर्टिफिकेट लेने की नही बल्कि दूसरों को देने की आदत है।
ध्रुव गुप्त
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया।चीन और पाक के छक्के छुड़ाने के लिए सीमा पर राफेल की तैनाती हो गई। न्यूज चैनलों ने मोदी जी की कूटनीति की डंका बजा दी। रिया जेल चली गई।
कंगना को वाई-प्लस सुरक्षा मिल गई। अपने देश में चुनाव जीतने के लिए इससे ज्यादा और क्या चाहिए ? बेरोजगारी, श्रमिकों की बदहाली, गिरते विकास दर, बाढ़ की विनाशलीला, चरमराती शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को इस देश में चुनावी मुद्दा बनने में अभी वक़्त लगेगा।
सो बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की अगुवाई में एन.डी.ए आत्मविश्वास से भरा हुआ है।उसके मुकाबले विपक्ष तेजहीन और अपाहिज नजऱ आ रहा है। लालू प्रसाद के चुनावी परिदृश्य से हट जाने के बाद उनके बेटों -तेजस्वी या तेज प्रताप का नेतृत्व स्वीकार करने में राजद की सहयोगी पार्टियों में ही नहीं, खुद राजद के वरिष्ठ नेताओं में भी असमंजस है। इस परिवारवाद के कारण ‘हम’ पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी गठबंधन छोड एन.डी.ए का दामन थाम चुके हैं।
राजद के सबसे अनुभवी, स्वच्छ छवि के नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने अपनी उपेक्षा से आहत होकर राजद से त्यागपत्र दे दिया है। आने वाले दिनों में अब्दुल बारी सिद्दीकी सहित पार्टी के कुछ और वरिष्ठ नेता उनका अनुसरण कर सकते हैं।
दूसरे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस की छवि राजद के पिछलग्गू की है जिसके पास ऐसा कोई प्रभावशाली चेहरा नहीं है जो अपने बूते पांच-दस सीटें भी जितवा सके। एक-दो जगहों को छोड़ दें तो कम्युनिस्ट पार्टियों की बिहार में पकड़ अब नहीं रही।
बिहार का राजनीतिक समीकरण अभी एन.डी.ए के पक्ष में है।राज्य का प्रमुख विपक्षी दल राजद यदि परिवार के बाहर निकल रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता को वापस लाकर उनके नेतृत्व में चुनाव लडऩे की सोचे तो विपक्ष की एकता भी बनी रह सकती है और एन डी.ए को राज्य में एक बड़ी चुनौती भी मिलेगी। लेकिन क्या यह संभव है ? अगर नहीं तो बिहार एक बार फिर एनडीए शासन के लिए तैयार हैं।
बेबाक विचार डॉ. वेदप्रताप वैदिक
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की गठबंधन सरकार की कई गांठें एक साथ ढीली पड़ रही हैं। कोरोना की महामारी ने सबसे ज्यादा महाराष्ट्र की जनता को ही परेशान कर रखा है। इसके बाद उस पर दो मुसीबतें एक साथ और आन पड़ी है। एक तो फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत की और दूसरी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मराठा आरक्षण को रद्द करने की। कल जिस तरह से कंगना के दफ्तर को मुंबई में आनन-फानन में तोड़ा गया, क्या उससे शिवसेना और ठाकरे की छवि कुछ ऊंची हुई होगी ? बिल्कुल नहीं। शिवसेना यह कहकर अपने हाथ धो रही है कि इस घटना से उसका क्या लेना-देना है ?
यह कार्रवाई तो मुंबई महानगर निगम ने की है। शिवसेना की सादगी पर कौन कुर्बान नहीं हो जाएगा? क्या लोग उसे बताएंगे कि महानगर निगम भी आपकी ही है ? इस घटना से साफ जाहिर होता है कि महाराष्ट्र सरकार ने गुस्से में आकर यह तोड़-फोड़ गैर-कानूनी ढंग से की है। अदालत ने उस पर रोक भी लगाई है। कंगना ने अपने दफ्तर के निर्माण पर यदि 48 करोड़ रु. खर्च किए थे तो महाराष्ट्र सरकार पर कम से कम 60 करोड़ रु. का जुर्माना तो ठोका जाना चाहिए।
शिवसेना का कहना है कि उनकी सरकार ने सिर्फ अवैध निर्माण-कार्यों को ढहाया है। हो सकता है कि यह ठीक हो लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि कंगना को पहले नोटिस क्यों नहीं दिया गया और इसी तरह के अवैध-निर्माण मुंबई में हजारों हैं तो सिर्फ कंगना के दफ्तर को ही निशाना क्यों बनाया गया? यह ठीक है कि कंगना के बयानों में अतिवाद होता है, जैसे मुंबई को पाकिस्तानी ‘आजाद कश्मीर’ कहना और अपने दफ्तर को राम मंदिर बताना और शिव सैनिकों को बाबर के प_े कहना आदि। लेकिन कंगना या कोई भी व्यक्ति इस तरह की अटपटी बातें कहता रहे तो भी उसका महत्व क्या है ? उसे फिजूल तूल क्यों देना ? यह प्रश्न शरद पवार ने भी उठाया है। यह मामला अब भाजपा और शिवसेना के बीच का हो गया है। इसीलिए केंद्र सरकार ने कंगना की सुरक्षा का विशेष प्रबंध किया है। ठाकरे-सरकार को जो दूसरा धक्का लगा है, वह उसके मराठा आरक्षण पर लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार के मराठा जाति के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा-संस्थाओं में 16 प्रतिशत आरक्षण के कानून को भी फिलहाल अधर में लटका दिया है। वह अभी लागू नहीं होगा, क्योंकि कुल आरक्षण 64-65 प्रतिशत हो जाएगा, जो कि 50 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। कई राज्यों ने भी अदालत द्वारा निर्धारित इस सीमा का उल्लंघन कर रखा है। मैं तो चाहता हूं कि नौकरियों में जन्म के आधार पर आरक्षण पूरी तरह खत्म किया जाना चाहिए। सिर्फ शिक्षा में 80 प्रतिशत तक आरक्षण की सुविधा दे दी जानी चाहिए, जन्म के नहीं, जरुरत के आधार पर ! (नया इंडिया की अनुमति से)
-सत्याग्रह ब्यूरो
11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले की जो सबसे ज्यादा देखी गई तस्वीरें हैं उनमें लोग नहीं हैं. वे बार-बार वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के 110 मंजिला टॉवरों और उनसे टकराते जहाजों को ही दिखाती हैं. बहुत हुआ तो टॉवरों के गिरने से उठे धूल के गुबार को.
लेकिन इसी हादसे की एक और तस्वीर है जो बनिस्बत कम देखे जाने के बावजूद इतिहास में अमर हो गई है. इसमें खुद को बचाने के लिए कूदा एक शख्स दिखता है. छटपटाहट के बगैर वह जैसे किसी तीर की तरह धरती की तरफ जाता नजर आता है. फोटो पत्रकारिता के इतिहास की सबसे चर्चित तस्वीरों में से एक इस तस्वीर का नाम है द फॉलिंग मैन.
यह तस्वीर एसोसिएटेड प्रेस के फोटोग्राफर रिचर्ड ड्रूयू ने खींची थी. एक साक्षात्कार में रिचर्ड उस क्षण को याद करते हुए बताते हैं, ‘लोग हादसे वाली जगह से दूर भाग रहे थे. लेकिन हमारा पेशा ऐसा है कि हमें ऐसी जगहों की तरफ भागना पड़ता है.’
रिचर्ड बताते हैं कि इसी दौरान उन्होंने 110 मंजिला टॉवर की ऊपर मंजिलों की खिड़कियों पर खड़े कई लोगों को जान बचाने के लिए कूदते देखा. इन्हीं में यह शख्स भी था जो 106वीं मंजिल से कूदा था. रिचर्ड ने तेजी से गिरते इस व्यक्ति की कई तस्वीरें लीं. इनमें से एक फ्रेम ऐसा था जिसमें यह शख्स किसी तीर की तरह नीचे जाता दिख रहा था. अगले दिन न्यूयॉर्क टाइम्स सहित कई प्रकाशनों ने इसे अपने यहां छापा.
हालांकि पाठकों ने इस पर बहुत नाराजगी भरी प्रतिक्रिया दी. ज्यादातर का कहना था कि जिस शख्स का कुछ सेकेंड बाद मरना तय हो, उसकी तस्वीर छापकर प्रेस ने अच्छा काम नहीं किया है. यही वजह है कि बाद में इस तस्वीर की कम ही चर्चा हुई. लेकिन आज इसे किसी त्रासदी को सबसे प्रभावशाली तरीके से बयां करने वाली ऐतिहासिक तस्वीरों में से एक माना जाता है.
लेकिन यह शख्स था कौन? यह अब तक कयास का ही विषय है क्योंकि सरकार ने उसकी पहचान कभी नहीं बताई. उस दिन इस तरह से करीब 200 लोगों ने जान बचाने के लिए छलांग लगाई थी. पहले कहा गया कि ये 106वीं मंजिल पर बने विंडोज ऑन द वर्ल्ड नाम के रेस्टोरेंट कम बार में काम करने वाले पेस्ट्री शेफ नॉर्बेर्तो हेर्नांडिस थे. उनके परिवार के लोगों ने भी यह बात कही. लेकिन जब उन्होंने रिचर्ड ड्र्यू की सारी तस्वीरों और कपड़ों को ध्यान से देखा तो पता चला कि ऐसा नहीं था.
एक दूसरे अनुमान में कहा गया कि यह शख्स जॉनाथन ब्रिली थे. 43 साल के ब्रिली भी विंडोज ऑन द वर्ल्ड में काम करते थे और ऑडियो टेकनीशियन थे. उनके एक सहकर्मी और भाई ने भी इसकी पुष्टि की. हालांकि इस बात पर भी कोई अंतिम राय नहीं बन पाई है.
खैर, वह जो भी रहा हो, माना जाता है कि यह तस्वीर उस शख्स से ज्यादा उस त्रासदी की कहानी कहती है जिसमें दो पक्षों की लड़ाई का शिकार किसी ऐसे को बनना पड़ता है जिसका इस लड़ाई से कोई लेना-देना न हो. (satyagrah)
-डॉ. अजय खेमरिया
मप्र में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य के पद से हटाए गए अफसर बीए पास कर आईएएस बने है। इसी तरह न्यूक्लियर साइंस से एम टेक एक आईएएस पहले चिकित्सा शिक्षा, खाद्य और अब सँस्कृति के प्रमुख सचिव है। एमबीबीएस एमडी पृष्ठभूमि से आये अफसर बिजली कम्पनी के सीएमडी या जनसंपर्क के कमिश्नर हैं। इसे भारतीय प्रशासन तन्त्र की एक विसंगति और इससे खड़ी हुई व्यवस्थागत त्रासदी के रूप में विश्लेषित किये जाने की सामयिक आवश्यकता है। आजादी के 74 साल बाद भी क्या भारत एक सक्षम एवं उत्कृष्ट नागर प्रशासनिक सेवा के लिए भटक रहा है? अनुभवजन्य जबाव हमारी सिविल सेवा के लिए समेकित रूप से कटघरे में खड़ा करते है।
सुशासन, नवोन्मेष, लोककल्याण और राष्ट्रीय पुनर्निमाण में सिविल सेवा के सामाजिक अंकेक्षण का यह सबसे उपयुक्त समय भी कहा जा सकता है। कोविड संकट के बाद जब पूरी दुनियां में जीवन से जुड़े प्रतिमान ध्वस्त हुए है और नए विकल्प तेजी के साथ विश्व व्यवस्था का हिस्सा बन रहे है तब भारतीय नौकरशाही को लेकर चर्चा स्वाभाविक ही है। बुनियादी रूप से कुछ पहलुओं पर हमें सोचना होगा मसलन जिस संघ लोकसेवा आयोग की विश्वसनीयता पर कभी सवाल नहीं उठा उसके द्वारा चयनित लोकसेवक देश में वैसी ही साख अपनी कार्यसंस्कृति के मामले में क्यों नही बना पाए है? दूसरा क्या इस जटिल और पराक्रम केंद्रित परीक्षा को पास करने वाले अभ्यर्थी विशेषज्ञ के रूप में स्वत: अधिमान्यता प्राप्त कर लेनें के स्वाभाविक हकदार है? कलेक्टर यानी जिलाधिकारी के रूप में हम जिस आईएएस को सिविल सेवक के रुप में देखते हैं वह उसी सीमित भूमिका में 60 साल की आयु तक काम नही करता है। सेवावधि बढऩे के साथ ही उसे मौजूदा प्रशासनिक ढांचे में नीति निर्माता के रूप में भी काम करना होता है। सवाल यही है कि क्या नीतियों का निर्माण केवल पब्लिक पॉलिसी में विदेशी डिग्री हासिल करने से समावेशी हो सकता है? जैसा कि अधिकतर आईएएस अफसर इस डिग्री को सेवा में आने के बाद हासिल करते रहते है।
सवाल यह भी है कि जो विशेषज्ञ अफसर इस सेवा में मौजूद है उनकी एकेडमिक पृष्ठभूमि का उपयोग मौजूदा ढांचे में कहां तक हो पाता है। कोविड संकट के दौरान करीब साढ़े तीन हजार आदेश, सरक्युलर, एडवाइजरी, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए है। यह प्रशासन के ‘लेवियाथन’ स्वरूप को प्रमाणित करने वाला पक्ष है। जबकि प्रधानमंत्री मोदी ‘मिनिमम गवर्मेंट मैक्सिमम गवर्नेंस’ के दर्शन में भरोसा करते है। कोविड संकट में कभी आगरा तो कभी भीलवाड़ा मॉडल की चर्चाएं हमने मीडिया में सुनीं लेकिन अंतत: नतीजे सिफर रहे।
देश में एक भी जिला कलेक्टर अपनी निर्णयन क्षमता के आधार पर कोविड मामले में नवोन्मेषी और अनुकरणीय साबित नही हुआ। जबकि यह एक ऐसा अवसर भी था जब भारत के सर्वाधिक प्रज्ञावान अफसर अपने सुपर एलीट और एक्सपर्टीज वैशिष्ट्य को प्रमाणित कर सकते थे। मैदानी स्तर पर सभी कलेक्टर अपने राज्यों की राजधानियों या दिल्ली के सरक्युलर का इंतजार कर तत्संबंधी आदेश अपनी पदमुद्राएँ लगाकर जारी करते रहे। धारा 144 औऱ कफऱ््यू के लिए पाबन्द करती मैदानी पदस्थापना ऐसी कोई मिसाल प्रस्तुत नहीं कर पाईं जो तत्कालीन संकट में अनुकरणीय हो।
जिस अंग्रेजियत मनोविज्ञान और नफासत के लिए भारत की सिविल सेवा बदनाम है उसका उच्चतम स्वरूप हमें कोविड में भी नजर आया।कल्पना कीजिये अगर हर जिले का डीएम अपने जिले के व्यापारियों, धार्मिक ट्रस्टों, एनजीओ के प्रतिनिधियों से व्यक्तिगत संपर्क, संवाद कर वंचितों और प्रवासी श्रमिकों के लिए मदद के हाथ फैलाता तो क्या बदली हुई तस्वीरें सामने नहीं आई होती। हर जिले में कलेक्टर एक टीम लीडर की तरह नजर आ सकते थे वे जनभागीदारी की वैश्विक मिसाल कायम कर सकते थे। लेकिन अधिकतर जगह बिल्कुल उलट हुआ जिला और पुलिस प्रशासन का पूरा जोर डंडे के बल पर लोकडाउन सफल करने में रहा। जबकि यह लॉकडाउन कानून व्यवस्था या सुरक्षा से सीधा जुड़ा न होकर जनस्वास्थ्य से संबद्ध था। लेकिन हमारी सिविल सर्विस बिल्कुल अंग्रेजी हुकूमत की तरह काम करती दिखी जबकि आवश्यकता एक भरोसे को कायम करने की थी।
कानूनी सख्ती में भी न समरूपता नजर आई न निष्पक्षता। विवेकाधिकार के रूप में डीएम उन कामों से भी किनारा करते रहे जो इस दौरान प्रशासन और गरीब वर्ग के बीच नया रिश्ता कायम कर सकते थे। मसलन हजारों गरीब राशन के लिए दफ्तरों में चक्कर लगाते रहे लेकिन किसी डीएम ने ऐसे वास्तविक जरूरतमंद लोगों के हक में सरकारों से अनुमति की प्रत्याशा में उपलब्ध अनाज का वितरण तक नहीं किया। क्या एक कलेक्टर अपने स्तर पर अपने हजारों कर्मचारियों के प्रमाणीकरण के आधार पर ऐसा नहीं कर सकता था? संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाइए की लगभग 40 फीसदी पीडीएस का कोटा तो इस दौरान वितरित ही नहीं हुआ है। खुद खाद्य मंत्री रामविलास पासवान इस पर अफसोस जाहिर कर चुके है। क्या जिलों में इस स्थिति को अपना पूरा पराक्रम झोंक कर आईएएस अफसर बदल नही सकते थे। लेकिन वे अतिरिक्त रिस्क और पश्चावर्ती शिकवा शिकायत से डरे नजर आए। जबकि तथ्य यह है कि हर शिकायत की तस्दीक सरकार के लिए अंतिम रूप से आईएएस ही करते हैं।
जाहिर है त्वरित निर्णयन,लोककल्याण और संवेदनशीलता के मोर्चे पर भारतीय सिविल सेवा का ढांचा आज भी यथास्थितिवाद पर अबलंबित है।
जर्मन विद्वान मैक्स वेबर ने 1920 में अपनी पुस्तक ‘the theory of social and economic organization’ में पहली बार ब्यूरोक्रेसी को लोकतन्त्र का आदर्श प्रतिरूप कहा। उन्होंने ‘निष्पक्षता’ और ‘तटस्थता’ को नौकरशाही का बुनियादी तत्व भी निरूपित किया है।
संविधान सभा में आईसीएस को समाप्त करने या न करने को लेकर व्यापक बहस हुई थी। इस दौरान यह विनिश्चय किया गया कि नई अखिल भारतीय सेवाएं लोककल्याण और संवैधानिक प्रत्याभूति को समर्पित रहेंगी। हालांकि डॉ राममनोहर लोहिया इस औपनिवेशिक व्यवस्था के विरोधी थे। सरदार पटेल ने तत्कालीन परिस्थितियों के लिहाज से इसकी वकालत करते हुए इस सेवा को ‘स्टील फ्रेम’ की संज्ञा दी थी।
73 साल बाद भारत का नागरिक प्रशासन तंत्र क्या इसके ध्येय अनुरूप अबलंबित रहा है? इस सवाल के जबाब में हमें हांगकांग की एक प्रतिष्ठित कंसल्टेंट फर्म ‘पॉलिटिकल एन्ड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी लिमिटेड’ की वैश्विक व्यूरोक्रेसी रैंकिंग पर नजर डालनी होगी। भारत की ब्यूरोक्रेसी को 10 में से 9.21वें स्थान पर रखा गया है। यानी सबसे बदतर। वियतनाम 8.54, इंडोनेशिया 8.37, फिलीपींस 7.57, चीन 7.11, सिंगापुर 2.25, हांगकांग 3.53, थाईलैंड 5.25, जापान 5.77, दक्षिण कोरिया 5.87, मलेशिया 5.84 रैंक पर रखे गए है। इस रपट में भारत की अफसरशाही को सबसे खराब रैंकिंग दी गई है। सवाल यह है कि क्या इस स्थिति के लिए केवल नेताओं को दोषी ठहराया जाना चाहिए?
सरकारें बदलना जम्हूरियत में एक स्वाभाविक घटनाक्रम है। नई सरकार अपनी सुविधा और भरोसे के अनुरूप अफसरों को पदस्थ कर सकती है। बुनियादी रूप से शीर्ष अफसरशाही को न केवल कोड ऑफ कंडक्ट बल्कि कोड ऑफ इथिक्स का पालन करना चाहिये। लेकिन अनुभव बताते हैं कि अफसर अपनी सुविधा के लिए दोनों कोड खूंटी पर टांग देते हंै। जिन्हें जनता की बोली में मलाईदार कुर्सी कहा जाता है उसे पाने के लिए आज अधिकतर अफसर मंत्रियों के इर्द गिर्द परिक्रमा करते रहते है। मुख्यमंत्री के परिजनों, उनके सम्पर्क के सत्ताधारी कार्यकर्ताओं को साधते है। जिलों में कलेक्टर, एसपी, एसएसपी, डीएफओ की मैदानी पोस्टिंग के लिए क्या क्या हथकंडे अफसर नही अपनाते यह अब किसी से छिपा नहीं है। यह आमधारणा बन गई है कि कलेक्टर, एसपी, डीएफओ की कुर्सी मुफ्त में नहीं मिलती है। इसी तरह माइनिंग, आबकारी, मंडी बोर्ड, परिवहन, जनसंपर्क, ट्राइबल, बिजली कम्पनी की कमान संभालने वाले अफसर केवल योग्यता के बल पर पदस्थापना नहीं पाते हैं।
खासबात यह है कि राज्य का मुख्यसचिव, डीजीपी भी केवल तभी तक पद पर रह सकते है जब उन्हें मुख्यमंत्री का निजी बिश्वास हासिल रहता है। अफसरों ने इस स्थिति को खुद अपनी नैतिक समझौता परस्ती से निर्मित किया है क्योंकि आज के किसी मुख्य सचिव या डीजीपी में इतना नैतिक साहस नही रहता है कि वह मुख्यमंत्री से आंख मिलाकर बात कर सकें। अधिकतर मुख्य सचिव और डीजीपी वरिष्ठताक्रम को दरकिनार कर कुर्सी पा रहे है और यह अनुकम्पा विशेष और व्यक्तिगत समर्पण के संभव नहीं होती है। मैदानी और मलाईदार पदस्थापना के लालच में अधिकतर अफसर नैतिक रूप से पथभृष्ट हो जाते हैं और वे राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र को अमल में लाने की प्रतिस्पर्धा में जुट रहते है। दिग्विजय सिंह के बारे में कहा जाता था कि वे प्राय: रोज सभी कलेक्टर और एस पी से टेलीफोन पर चर्चा करते थे।
अफसर खुद अपने व्यवहार से सत्ताधारी दल के अर्दली की भूमिका ले लेते है। जिस दल की सरकार होती है उसके विधायक और स्थानीय कार्यक्रमों के तमाम कलेक्टर एसपी अपने चैम्बर में चाय पिलाते हैं और विपक्षी विधायकों को बाहर इंतजार कराते हंै। जबकि सत्कार नियम ‘पदक्रम’ कहता है विधायक राज्य के मुख्य सचिव के समकक्ष है। किसी भी राज्य में इस कानून का पालन नहीं होता है। यानी राज्य की अफसरशाही दलीय एजेंडे के हिसाब से काम करती है। विरोधियों को कुचलने के लिए अब न केवल पुलिस बल्कि प्रशासन के अफसर भी चैम्पियन की तरह काम करते हंै। जबकि कानून ऐसे किसी राजनीति आधारित भेदभाव की इजाजत नहीं देता है। समझा जा सकता है यह समझौता परस्ती क्यों और किस निमित्त से होती है। नेताओं ने अफसरशाही के इस दुर्बल पक्ष को पकड़ लिया है वे भी समानांतर रूप से संविधान के मूल्यों और भावनाओं को रौंदने में इनका उपयोग करते है।
शुचिता और निष्पक्षता की मान्य परम्पराओं आजादी के बाद शुरुआती दौर में दोनों पक्षों ने कायम रखने की कोशिशें की थी।एक जिले में पदस्थ कलेक्टर और एसपी अमूमन अपने सेवाकाल में फिर से उस जिले में पदस्थ नही किये जाते थे। गृह जिलों के आसपास भी अफसरों को तैनात करने से परहेज होता था।आज हालात यह है कि जिन डीएम एसपी को चुनाव में निर्वाचन आयोग शिकायतों के बाद हटा देता है। वे अचार सहिंता हटते ही ठसक के साथ उन्हीं जिलों में पदस्थ कर दिये जाते हैं। मानो सरकार उन्हें अपने चुनावी एजेंडे पर काम करने का इनाम दे रहीं हो।
देश भर की मीडिया में थप्पड़ कांड के चलते छाई रहीं राजगढ़ की कलेक्टर निधि निवेदिता को शिवराज सिंह ने शपथ लेते ही हटा दिया।सवाल यह है कि सीएए समर्थक बीजेपी के कार्यकर्ताओं को थप्पड़ मारकर क्या निधि निवेदिता तत्कालीन कमलनाथ सरकार के लिए स्वप्रेरित रोल मॉडल नहीं बन रही थी? उनका यह कृत्य कलेक्टर संस्था को बीजेपी कांग्रेस में बांटने का काम कर गया। सीएए पर राज्यों में बीजेपी और गैर बीजेपी राज्यों के कलेक्टर ने धरना, प्रदर्शन, जुलूस अनुमतियों के मामले में विशुद्ध राजनीतिक आधार पर निर्णय लिए।यहां कोड ऑफ कंडक्ट का कोई पालन नहीं हुआ।
एक दौर तक डीएम या एसपी मुख्यमंत्री या दूसरे मंत्रियों के साथ सार्वजनिक मंचों पर नहीं आते थे। अब लगभग सभी अफसर ठसक से मंच साझा करते है जहां विशुद्ध राजनीतिक प्रलाप होते हैं। बेशर्मी की सीमाएं लांघते हुए अधिकतर कलेक्टर सीएम, पीएम या अन्य नेताओं की सभाओं के लिए भीड़ जुटाने में सरकारी मशीनरी का प्रयोग करते हैं। यह स्थिति देश के सभी राज्यों में है। तथ्य यह है कि मैदानी और मंत्रालय के अफसर सत्ताधारी दल के एजेंट बनकर रह गए है। असल में खुद को सबसे ताकतवर समझने वाली आईएएस, आईपीएस बिरादरी खुद नैतिक रूप से आज इतनी कमजोर है कि वह अशोक खेमका (हरियाणा), श्रीमती गौरी सिंह (मप्र) अभिताभ ठाकुर (यूपी) जैसे कई अफसरों के साथ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाती हैं।
जाहिर है एक ऐसी सिविल सेवा की आज आवश्यकता है जो इस औपनिवेशिक मनोविज्ञान की जगह बदलती जनाकांक्षाओं के अनुरूप हो। लैटरल इंट्री के जरिये जो प्रयोग मोदी सरकार ने किया है उसे आगे विस्तार देने की आवश्यकता है। भर्ती प्रक्रिया में विशेषज्ञता के प्रावधान जोडऩे से फ्लैगशिप स्कीमों का क्रियान्वयन त्वरित होगा। मसलन स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीकी, कला, विज्ञान और खेल जैसे क्षेत्रों के लिए स्थाई सिविल सेवा कोटा बनाया जाए। ऊर्जा, स्वास्थ्य, सूचना तकनीकी जैसे क्षेत्र के विशेषज्ञ उपाधिधारक रिटायरमेंट तक अपने ही क्षेत्र में काम करें। इससे सबंधित क्षेत्रों में नीति निर्माण से लेकर क्रियान्वयन तक मे बेहतर नतीजे आएंगे। सिविल सेवा भर्ती का दायरा भी सीमित किया जाना चाहिये यानी नागरिक प्रशासन के लिए यूपीएससी की सयुंक्त भर्ती को खत्म किया जाए ताकि वित्त, विदेश, सूचना, पुलिस, के लिए अलग से विशेषज्ञ प्रशासक मिल सकें। आईएएस के स्थान पर भारतीय नागरिक सेवा का विशिष्ट संवर्ग मैदानी प्रशासन के लिए कारगर साबित हो सकता है और इसके लिए आवश्यक है कि भर्ती की न्यूनतम और अधिकतम आयु सीमा को 1970 के नियमों पर लाया जाए ताकि युवा और ऊर्जावान जिलाधिकारी देश को मिल सकें।बेहतर होगा यूएसए की तर्ज पर निश्चित समयावधि के लिए भी इन अफसरों की भर्ती का प्रावधान हो ताकि मिशन मोड़ वाले कार्यक्रम अपने उद्देश्यों में सफल हो।
फिलहाल विसंगतियों का आलम यह है कि बीए पास आईएएस हैल्थ मिशन चलाते है अगले कुछ दिनों वही अफसर जलग्रहण मिशन, शिक्षा मिशन के डायरेक्टर हो जाते है। इस सरंचणात्मक ढांचे में न कोई विशिष्टता है न कार्यक्रमों को लागू करने की प्रतिबद्धता ही। आईएएस परीक्षा पास करने वाले प्रज्ञावान अफसर एक वक्त के बाद बड़े बाबू बनकर रह जाते हंै। यह भारत जैसे देश के लिए बेहद गंभीर स्थिति है। नए आईएएस अफसरों को। संबोधित करते हुए कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने कहा था कि वह सिस्टम की प्रोसेस को आज तक नहीं समझ पाए हैं क्योंकि जिस काम के लिए वह निजी तौर पर निर्देश देते है वह घण्टों में हो जाता है और रूटीन काम प्रोसेस के नाम पर सालों तक फाइलों में कैद रहते हैं। प्रधानमंत्री असल में इसी बाबूशाही और जड़ता की बात कर रहे थे। बेहतर होगा सरकार लेटरल इंट्री पर आगे बढ़े। बगैर आईएएस के पतंजलि, अमूल जैसे सहकारी संस्थानों ने जो गजब की प्रगति की है उसे हम सड़ चुके समाजवाद के नाम पर ढोने के लिये क्यों विवश है।
स्वयंसेवी संगठन पीपुल्स एक्शन फॉर इम्प्लायमेंट जनरेशन गारंटी ने मनरेगा पर अपनी रिपोर्ट जारी की
- Raju Sajwan
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गांव धमना में मनरेगा के काम से लौटे लोग। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गांव धमना में मनरेगा के काम से लौटे लोग। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गांव धमना में मनरेगा के काम से लौटे लोग।
कोरोनावायरस संक्रमण को रोकने के लिए देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान बेशक महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ही एकमात्र कार्यक्रम था, जिसके तहत लोगों को रिकॉर्ड रोजगार दिया गया, लेकिन फिर भी लगभग 1.55 करोड़ लोगों ने काम मांगा और उन्हें काम नहीं दिया गया। पीपुल्स एक्शन फॉर इम्प्लायमेंट जनरेशन गारंटी (पीएईजी) द्वारा जारी रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
10 सितंबर को पीईएजी ने एक प्रेस कांफ्रेस में यह रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में मनरेगा के लिए आवंटित राशि छह माह के भीतर ही खर्च कर दी गई है। बजट में 60 हजार करोड़ रुपए का आवंटन किया गया था, जबकि नौ सितंबर 2020 तक 64,000 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। सरकार ने वादा किया था कि कोरोना राहत पैकेज के तौर पर मनरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रुपए जारी किए जाएंगे, जो अब तक जारी नहीं किए गए हैं। कई राज्यों ने आवंटित फंड से ज्यादा खर्च कर दिया है।
आठ सितंबर 2020 तक के आंकड़े बताते हैं कि बिहार को मनरेगा के तहत 4,149 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जबकि बिहार 4,373 करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। इसी तरह छत्तीसगढ़ सबसे अधिक 3,170 करोड़ रुपए अधिक खर्च कर चुका है। पीईएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र के मनरेगा मद में 481 करोड़ रुपए का नेगेटिव बैलेंस है। यानी कि यह राशि देनदारी की है। हालांकि केंद्र सरकार छत्तीसगढ़ को लगभग 3,200 करोड़ रुपए दे अतिरिक्त दे चुका है। उत्तर प्रदेश भी आवंटित बजट से लगभग 93.87 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च कर चुका है
जून के बाद घटा काम
रिपोर्ट बताती है कि 2020-21 में सबसे अधिक काम जून 2020 में दिया गया। इस माह में 3.9 करोड़ परिवारों को काम दिया गया, जबकि इससे पहले मई में 3.3 करोड़ और अप्रैल में 1.1 करोड़ परिवारों को काम दिया गया। लेकिन जून के बाद काम देने का सिलसिला कम होता गया। जुलाई 2020 में 2.8 करोड़ परिवारों को काम दिया गया, जबकि अगस्त में 1.8 करोड़ परिवारों को काम दिया गया।
केवल 1.4 फीसदी परिवारों को 100 दिन काम
रिपोर्ट में कहा गया है कि 6.8 लाख परिवारों ने 100 दिन का काम कर लिया है, लेकिन नरेगा के तहत दिए गए कुल रोजगार के मुकाबले यह केवल 1.2 प्रतिशत है। इसके अलावा 51 लाख परिवार 70 दिन का काम कर चुके हैं, जबकि पिछले पांच साल का औसत देखें तो 42 लाख परिवार ही साल भर में 100 दिन का काम कर पाते हैं।
बिहार में 2 हजार परिवार को ही मिला 100 दिन काम
अगर राज्यवार आंकड़े देखा तो सबसे अधिक आंध्र प्रदेश ने 2.65 परिवारों को 100 दिन का काम दिया है, लेकिन बिहार में केवल 2000 परिवार ही 100 दिन का काम कर पाएं हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि लॉकडाउन के चलते बिहार में बड़ी तादात में प्रवासी मजदूर लौटे थे और वहां मनरेगा का काम मांग रहे थे। इसी तरह उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक प्रवासी मजदूर लौटे, लेकिन यहां केवल 29 हजार परिवारों को ही 100 दिन का काम दिया जा सका है।
16 फीसदी को नहीं मिला काम
लॉकडाउन के बाद पीएईजी ने तीन नरेगा ट्रेकर जारी किए हैं। पहला ट्रेकर 10 जुलाई 2020 को जारी किया, जिसमें बताया गया कि नरेगा के तहत काम मांगने वाले और काम पाने वाले परिवारों की संख्या में लगभग 1.76 करोड़ का अंतर था। यानी कि 1.76 करोड़ परिवारों को काम नहीं मिला। यानी कि 1.74 करोड़ लोगों को काम नहीं मिल पाया। 3 अगस्त 2020 को पीएईजी की रिपोर्ट में कहा गया कि 1.52 करोड़ लोगों को काम नहीं मिल पाया, जबकि 8 सितंबर 2020 तक 1.55 करोड़ लोगों को काम नहीं मिल पाया।
मनरेगा के तहत सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में काम मांगने वालों को काम नहीं मिल पाया। यहां 35 लाख लोगों को काम नहीं मिला। इसी तरह छत्तीसगढ़ में 11.74 लाख, राजस्थान में 13.7 लाख लोगों को मांगने के बावजूद काम नहीं मिल पाया।
कैसे मिलेगी 1200 करोड़ रुपए मजदूरी
रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच साल से जुलाई 2020 तक लगभग 5 करोड़ वित्तीय लेनदेन (ट्रांजेक्शन) रद्द हो चुके हैं और लगभग 4800 करोड़ रुपए की मजदूरी, मजदूरों को नहीं दी गई है। यानी कि 23 में से 1 ट्रांजेक्शन रिजेक्ट हुआ है। इस तरह लगभग 6.43 करोड़ दिन की मजदूरी लोगों को नहीं मिली है। सबसे अधिक ट्रांजेक्शन मध्य प्रदेश, फिर छत्तीसगढ़, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश में रिजेक्ट हुई है।(downtoearth)
-कृष्ण कांत
एक तरफ एक अभिनेत्री का आशियाना है। दूसरी तरफ 48 हजार घर हैं। इन घरों को सभ्य समाज घर नहीं, झुग्गियां कहता है। इन दोनों पर अवैध होने का आरोप है। अभिनेत्री के आशियाने पर बड़े-बड़े नेता, पत्रकार और तमाम जनता ने आंसू बहाया, सरकारी कार्रवाई की मजम्मत की। 48 हजार घरों के ढहाए जाने के आदेश पर कहीं कोई चर्चा तक नहीं।
अभिनेत्री के पास हजारों विकल्प हैं। उनके पास अकूल संपत्ति है। उन्हें देश की सत्ताधारी पार्टी का समर्थन है। लेकिन उन 48 हजार गरीब परिवारों के पास न दूसरी जमीनें हैं, न संपत्ति है, न कोई समर्थन है। इनमें बहुत से लोग ऐसे होंगे जिनको आजकल काम भी नहीं मिल रहा होगा। उन्हें उजाड़ दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि नई दिल्ली रेलवे ट्रैक के आसपास बनीं झुग्गियां तीन महीने के भीतर हटा दी जाएं। कोर्ट ने ये भी निर्देश दिया है कि कोई भी अदालत इन झुग्गी-झोपडिय़ों को हटाने को लेकर कोई स्टे न दे।
वे कौन लोग हैं जो आकर रेल की पटरियों के आसपास झोपड़ी बनाकर बस गए? वे इसी देश के गरीब लोग हैं जो रोजी कमाने के लिए अपने-अपने गांव घर छोडक़र शहर आए हैं। वे मजदूर और कामगार हैं। कोई बोरा ढोता होगा, कोई बर्तन मांजता होगा, कोई घर बनाता होगा, कोई बाल काटता होगा, कोई कुली होगा, कोई ड्राइवर होगा।
कानून कहता है कि वे अवैध हैं, उन्हें उजाड़ देना चाहिए। कानून ये कभी नहीं कहता कि उन्हें कहीं बसा देना चाहिए। कानून ये भी नहीं कहता कि उन्हें उनके घरों में ही रोजगार दे देना चाहिए।
वही कानून जिसने आदेश दिया है कि अभिनेत्री का घर फिलहाल बचा रहना चाहिए।
कानून का सिद्धांत सबके लिए समान है, लेकिन कानून का क्रियान्वयन हमेशा ताकतवर के पक्ष में होता है।
हमारी संवेदनाएं भी इसी तरह उफनती हैं। गांधी जी जिस गरीबी को अभिशाप मानते थे, उसने अब भी भारतीय जनता का पीछा नहीं छोड़ा है। अमीरों ने भी देश के तमाम संसाधन कब्जाएं हैं। छत्तीसगढ़ के हजारों आदिवासी आजकल अपने पहाड़ बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। एक दिन कानून उन आदिवासियों को भी अवैध कह देगा और पूंजीपति के पक्ष में फैसला देगा कि गांव को उजाड़ कर पहाड़ खोद दिए जाएं।
अमीरों के साथ पूरा सिस्टम है, इसलिए अमीरों के हर कारनामे वैधानिक हैं। गरीबों के साथ कोई नहीं है, इसलिए उनकी मौजूदगी भी अवैध है। ये दुनिया ऐसे ही अन्यायपूर्ण तरीके से चलती है और हमें बड़ी सुंदर लगती है।
राम पुनियानी
हम आज ऐसे दौर में हैं, जहां धार्मिक पहचान अपना घिनौना चेहरा बेपर्दा कर रही है। पहचान की राजनीति के सबसे बड़े शिकार मुसलमान हैं। भारत में ऐसी सोच का मुख्य स्त्रोत देश विभाजन है, जबकि यूरोप में पश्चिम एशिया में युद्धों के कारण वहां से आने वाले शरणार्थी हैं।
पैगंबर हजरत मोहम्मद के बारे में आपत्तिजनक पोस्ट और कुरान की प्रतियां जलाने की प्रतिक्रिया स्वरूप अभी हाल में अनेक हिंसक घटनाएं हुई हैं। हाल में नवीन कुमार, जो बेंगलुरू के एक कांग्रेस विधायक के भतीजे हैं, ने फेसबुक पर पैगम्बर मोहम्मद के बारे में अत्यधिक आपत्तिजनक पोस्ट लिखा। इसके बाद मुस्लिम समुदाय का एक नेता, भीड़ के साथ नवीन के विरूद्ध थाने में शिकायत दर्ज कराने गया। पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी की। इस दरम्यान भीड़ बढ़ती गई और उसने तोडफ़ोड़ शुरू कर दी। पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसके नतीजे में तीन लोगों की मौत हो गई।
स्वीडन के मेल्मो शहर में अगस्त के अंत में एक दक्षिणपंथी नेता ने कुरान की प्रति को आग के हवाले कर दिया। यह भडक़ाऊ घटना ऐसी जगह हुई जहां मुस्लिम प्रवासी रहते हैं। ‘स्वीडन डेमोक्रेट्स’ नाम की नव-नाजीवादी पार्टी स्वीडन की संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। इस पार्टी का मानना है कि स्वीडन की सारी समस्याओं की जड़ वहां बसे शरणार्थी हैं। मेल्मो में लगभग तीन सौ लोगों की भीड़ ने कुरान के अपमान का विरोध करते हुए हिंसा की। स्वीडन की दक्षिणपंथी पार्टियों का आरोप है कि नार्डिक देशों का इस्लामीकरण किया जा रहा है और इन देशों में बढ़ते अपराधों के पीछे सीरिया के युद्ध के बाद वहां आए मुसलमान हैं।
इस बीच अनेक यूरोपीय देशों में भी दक्षिणपंथी ताकतों का दबदबा बढ़ रहा है। एएफजी (अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी) ऐसी ही एक दक्षिणपंथी पार्टी है। ऐसी सभी पार्टियों का वैचारिक आधार फासिज्म है। ये दल अति-राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं और प्रवासियों को निशाना बनाते हैं। प्रवासियों ने पश्चिम एशिया में युद्ध और हिंसा के कारण यूरोपीय देशों में शरण ली है।
इस युद्ध और हिंसा का कारण है बढ़ती इस्लामिक कट्टरपंथी राजनीति। इस राजनीति को हवा दे रहे हैं अलकायदा, आईएसआईएस और आईएस। इन संगठनों को सशक्त किया है अमेरिका की कट्टर इस्लाम को प्रोत्साहन देने की नीति ने। सच पूछा जाए तो तेल की लिप्सा इस इलाके में अमेरिकी हस्तक्षेप का मुख्य कारण है।
एक अन्य घटना में ‘शार्ली हेब्दो’ नामक फ्रांस की कार्टून पत्रिका ने हाल में पैगम्बर मोहम्मद से संबंधित कार्टूनों का पुनप्रर्काशन ऐसे समय किया, जब उन आतंकवादियों पर मुकदमा शुरू हुआ था, जिन्होंने 2015 में इस पत्रिका के दफ्तर पर हमला किया था। उल्लेखनीय है कि पत्रिका ने जो कार्टून प्रकशित किए थे, वे अनेक लोगों की नजर में अत्यधिक आपत्तिजनक थे। आतंकी हमले में पत्रिका के अनेक कार्टूनिस्ट मारे गए थे। इस घटना के अपराधी गिरफ्तार कर लिए गए थे और वे इस समय अदालत के सामने हैं।
इसी तरह साल 2007 में फ्रांस में उस समय एकाएक हिंसा भडक़ उठी, जब पुलिस ने दो मुस्लिम प्रवासी युवकों को मार डाला। यह घटना पुलिस द्वारा एक श्वेत नागरिक की हत्या की जांच के दौरान हुई। ये युवक गैर-कानूनी प्रवासी थे और इसलिए छिपकर रह रहे थे। उनकी हत्या के बाद फ्रांस में अनेक हिंसक घटनाएं हुईं। फ्रांस में रहने वाले अधिकांश प्रवासी मोरक्को, टयूनिशिया, माली, सेनेगल और अल्जीरिया समेत ऐसे देशों से आए हैं, जो एक जमाने में फ्रेंच साम्राज्य का हिस्सा थे। ये सब 1950 और 1960 के दशकों में फ्रांस में बसे थे। ये सब मुस्लिम और अश्वेत हैं और पेरिस और फ्रांस के अन्य शहरों में अत्यधिक दयनीय स्थिति में रह रहे हैं।
हमें बोको हरम द्वारा बच्चों के अपहरण और पाकिस्तान के पेशावर में तालिबानियों द्वारा बच्चों की हत्या जैसी अत्यधिक लोमहर्षक घटनाएं याद हैं। जिस तरह हमारे देश में मुसलमानों को उनके पिछड़ेपन और बड़े परिवारों के लिए दोषी ठहराया जाता है, उसी तरह यूरोप में भी दक्षिणपंथियों का मानना है कि मुसलमान उन देशों की संस्कृति में घुलना-मिलना नहीं चाहते और अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं। कुछ दक्षिणपंथी अतिवादी नेता, आबादी के इस हिस्से को नीची निगाहों से देखते हैं और उन्हें कीड़े-मकोड़े, बर्बर और जाने क्या-क्या कहते हैं।
हम आज एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जिसमें धार्मिक पहचान अपना घिनौना चेहरा बेपर्दा कर रही है। पहचान की राजनीति के सबसे प्रमुख शिकार मुसलमान हैं। भारत में इस तरह की सोच का मुख्य स्त्रोत देश का विभाजन है, जिसके चलते संपन्न मुसलमान पाकिस्तान चले गए और यहां बड़ी संख्या में गरीब और हाशिए पर पड़े मुसलमान रह गए। समय-समय पर होने वाली हिंसक घटनाओं के कारण उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती गई और इसका एक असर यह हुआ कि वे अपने-अपने मोहल्लों में सिमट गए।
यूरोप में इस्लामोफोबिया के दूसरे कारण हैं। पश्चिम एशिया में लगातार होने वाले युद्धों के कारण वहां के निवासी, शरणार्थियों की हैसियत से यूरोप के देशों में बस गए। स्वीडन उन देशों में है जिन्होंने इन शरणार्थियों को जगह दी। इनमें से बहुसंख्यकों को इसलिए कोई रोजगार नहीं मिल सका, क्योंकि वे लगभग अशिक्षित थे। वे इन देशों में पूरी तरह सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर थे। इन्हीं मुद्दों को उठाकर नव-नाजी पार्टियां उन्हें निशाना बना रही हैं।
पूरी दुनिया में इस्लामोफोबिया को हवा दे रही है अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां। अमेरिका की नीतियों ने जिस तरह की राजनीति को गढ़ा उससे दुनिया के एक बड़े हिस्से की नियति तय हुई। पाकिस्तान में मदरसों के माध्यम से अल्कायदा को प्रशिक्षित किया गया। इसके साथ ही तेल उत्पादक क्षेत्र में हिंसा के बीज बोए गए। कट्टर इस्लामवादियों को अमेरिका द्वारा प्रोत्साहन दिया गया।
परंतु 9/11 के हमले ने सब कुछ बदल दिया। अमेरिका को यह अहसास हो गया कि उसने एक भस्मासुर को जन्म दे दिया है। इस हमले के बाद अमेरिकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढक़र मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया। दुनिया के अनेक अन्य राष्ट्रों के मीडिया ने इस दुष्प्रचार को और हवा दी। हमारा देश भी इस मामले में पीछे नहीं रहा। अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति ने साम्प्रदायिकता के लिए उपजाऊ जमीन पहले ही तैयार कर दी थी। 21वीं सदी में अमेरिका की नीतियों की खाद-मिट्टी पाकर इस जमीन पर घृणा की फसल लहलहाने लगी।
इस बीच जहां अनेक मुस्लिम देशों ने विभिन्न रास्तों से धर्मनिरपेक्षता की ओर कदम बढ़ाने शुरू किये, वहीं दुनिया के तेल उत्पादक देश कट्टरवाद के चंगुल में फंसते गए। तुर्की, जो 1920 के आसपास से धर्मनिरपेक्षता का गढ़ बन गया था, वहां अब कट्टरवादी ताकतें मजबूत होती जा रही हैं। सूडान में राज्य और धर्म में कोई नाता नहीं रह गया है। इंडोनेशिया और मलेशिया दो ऐसे मुस्लिम बहुल राष्ट्र हैं जो कट्टरपंथी विचारधारा से दूरी बना रहे हैं। इसके विपरीत पश्चिम एशिया के देश अभी तक पोंगापंथ के जाल में फंसे हुए हैं।
यह बहुत स्पष्ट है कि यदि भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के देशों में रहने वाले मुसलमान पिछड़ेपन का शिकार हैं तो उसका कारण इस्लाम नहीं है। उसका असली कारण दुनिया की बड़ी ताकतों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं हैं, जो इस्लाम का सहारा लेकर अपने आर्थिक स्वार्थों को पूरा कर रही हैं। सच पूछा जाए तो मुसलमानों का वह हिस्सा जो अपनी धार्मिक पहचान को प्राथमिकता देता है, वास्तव में एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चक्रव्यूह का शिकार है। (navjivanindia.com)
(लेख का हिंदी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)
प्रशांत चाहल
रूस की सरकार अपने यहाँ बनी कोरोना वैक्सीन ‘स्पूतनिक-5’ के उत्पादन में तेज़ी लाने के लिए भारत के साथ चर्चा में है।
रूसी चाहते हैं कि अपनी वैक्सीन के ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादन के लिए वो भारत की औद्योगिक सुविधाओं और क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करें। वहीं भारत को भी यह ’सिफऱ् फ़ायदे‘ की ही बात लग रही है।
भारत में कोविड-19 वैक्सीन संबंधी राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह के प्रमुख और नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉक्टर वी के पॉल ने कहा है कि भारत बड़ी मात्रा में उस (स्पूतनिक-5) वैक्सीन का उत्पादन कर सकता है जो रूस के लिए तो बढिय़ा होगा ही, साथ ही भारत के लिए भी यह एक ज़बरदस्त मौक़ा होगा। साथ ही दुनिया को भी हम वैक्सीन उपलब्ध करा पायेंगे।
उन्होंने जानकारी दी है कि ‘रूस ने अपने कोविड-19 वैक्सीन ‘स्पूतनिक-5’ के तीसरे चरण के परीक्षण और भारतीय कंपनियों द्वारा इसके विनिर्माण के लिए उचित माध्यमों के ज़रिये भारत सरकार से बात शुरू की, और अच्छी बात ये है कि दोनों पक्षों के बीच इसे लेकर सकारात्मक विमर्श हो रहा है।’ उन्होंने बताया कि ‘भारतीय वैज्ञानिक स्पूतनिक-5 के पहले के दो ट्रायल्स के डेटा का अध्ययन कर रहे हैं जिसके बाद जरूरत के आधार पर तीसरे चरण के ट्रायल की कार्यवाही शुरू की जायेगी।’
भारतीय दवा कंपनियों से सहयोग की उम्मीद
रूस ने स्पूतनिक-5 को बाजार में लाने के लिए ‘फ़ास्ट-ट्रैक’ तरीका आजमाया है जिसके तहत पुतिन प्रशासन ने इस वैक्सीन को कुछ आपातकालीन स्वीकृतियाँ दी हैं। हालांकि लेंसेट हेल्थ जर्नल में छपी रिपोर्ट के अनुसार, स्पूतनिक-5 के नतीज़े कोरोना से लडऩे में बढिय़ा पाये गए हैं।
रूस चाहता है कि इस वैक्सीन को जल्द से जल्द सभी स्वीकृतियाँ दिलाकर बाजार में लाया जाये, मगर फिर भी रूस के सामने जो एक बड़ी चुनौती बचती है, वो इस वैक्सीन के उत्पादन की है और इसी के लिए रूस की सरकार ने भारत सरकार के ज़रिये भारतीय दवा कंपनियों से सहयोग माँगा है। डॉक्टर पॉल के अनुसार, ‘भारत सरकार ने कई भारतीय कंपनियों से पूछा है कि कौन-कौन इस रूसी वैक्सीन को तैयार करने की इच्छुक हैं? तो तीन भारतीय कंपनियाँ अब तक सामने आयी हैं जिन्होंने इसकी इच्छा जाहिर की है। कई कंपनियाँ रूस सरकार के प्रस्ताव का अध्ययन कर रही हैं और कई अपनी रूसी समकक्षों से इस बारे में चर्चा कर रही हैं।’
सबकी निगाहें कोरोना वायरस की वैक्सीन पर
दुनिया भर में अब तक कोरोना संक्रमण के 2 करोड़ 75 लाख से ज़्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं और कऱीब नौ लाख लोगों की कोविड-19 से मौत हो गई है।
संक्रमण के मामले में अब ब्राज़ील को पीछे छोड़, भारत दूसरे स्थान पर आ गया है। ऐसी स्थिति में जाहिर है कि सबकी निगाहें कोरोना वायरस की वैक्सीन पर हैं जिसे भारत समेत कई देश बनाने की कोशिश में हैं।
दुनिया भर में कोरोना वैक्सीन के दर्जनों क्लीनिकल ट्रायल हो रहे हैं और कुछ देशों में अब तीसरे फ़ेज के ट्रायल शुरू करने की बात हो रही है। वैक्सीन के इंतजार के बीच यह काफ़ी हद तक स्पष्ट हुआ है कि महज़ वैक्सीन बन जाने से लोगों की मुश्किलें रातों-रात ख़त्म नहीं हो जायेंगी क्योंकि आम लोगों तक इसे पहुँचाने की एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है।
ग्लोबल इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट (वैश्विक बौद्धिक संपदा अधिकार) के तहत वैक्सीन बनानेवाले को 14 साल तक डिज़ाइन और 20 साल तक पेटेंट का अधिकार मिलता है, लेकिन इस अप्रत्याशित महामारी के प्रकोप को देखते हुए सरकारें 'अनिवार्य लाइसेंसिंग' का ज़रिया भी अपना रही हैं ताकि कोई थर्ड-पार्टी इसे बना सके। यानी कोरोना महामारी से जूझ रहे किसी देश की सरकार कुछ दवा कंपनियों को इसके निर्माण की इजाज़त दे सकती हैं। (बाकी पेज 8 पर)
कितना बड़ा है भारत का वैक्सीन बाज़ार?
बात दवाओं की हो तो जेनेरिक दवाएं बनाने और उनके निर्यात के मामले में भारत टॉप के देशों में शामिल है। साल 2019 में भारत ने 201 देशों को जेनेरिक दवाईयाँ बेचीं और अरबों रुपये की कमाई की।
मगर इंटरनेशनल मार्केट एनालिसिस रिसर्च एंड कन्सल्टिंग (आईएमएआरसी) ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, ‘भारत इस समय दुनिया में वैक्सीन उत्पादक और आपूर्तिकर्ता देशों की फ़ेहरिस्त में भी ‘सबसे अग्रणी देशों में से एक’ है जो अकेले ही यूनीसेफ़ को 60 प्रतिशत वैक्सीन बनाकर देता है।’
चूंकि भारत में क्लीनिकल ट्रायल का ख़र्च कम आता है और उत्पादन में लागत भी तुलनात्मक रूप से कम आती है, इसलिए अन्य विकसित और विकासशील देशों की तुलना में भारत को वैक्सीन के उत्पादन के लिहाज़ से सही जगह माना जाता है।
15 जुलाई 2020 को एक प्रेस वार्ता में ‘कोरोना वैक्सीन बनाने की दिशा में भारत के योगदान’ के सवाल पर आईसीएमआर के प्रमुख डॉक्टर बलराम भार्गव ने कहा था कि ‘कोरोना वैक्सीन भले ही दुनिया के किसी भी कोने में विकसित की जाये, मगर उसके व्यापक उत्पादन में भारत के सहयोग के बिना क़ामयाबी हासिल करना संभव नहीं होगा।’
60 फीसदी वैक्सीन का उत्पादक
भारतीय फ़ार्मा इंडस्ट्री की क्षमताओं और उम्मीदों पर बात करते हुए डॉक्टर भार्गव ने बताया था कि ‘भारत के फ़ार्मा क्षेत्र का दुनिया में नाम है। भारत दुनिया की 60 प्रतिशत वैक्सीन की आपूर्ति करता है, चाहे अफ्ऱीका, यूरोप, दक्षिण पूर्व एशिया या संसार का कोई और हिस्सा हो। सभी जगह भारत में बनी वैक्सीन की बड़ी सप्लाई है।’
उन्होंने कहा था कि ‘भारत कोरोना वैक्सीन के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक होने वाला है, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।’
आईएमएआरसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते वर्षों में बेहतर तकनीक विकसित होने और कोल्ड स्टोरेज की बड़ी व्यवस्थाएं विकसित होने के कारण भारत की वैक्सीन उत्पादन क्षमता पहले से काफ़ी बढ़ी है।
इस समूह का आंकलन है कि भारत का वैक्सीन बाज़ार वर्ष 2025 तक 250 अरब रुपये से अधिक का हो जायेगा, जिसका आकार वर्ष 2019 में 94 अरब रुपये रहा था।
साल 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेक्सो स्मिथ क्लाइन भारत के वैक्सीन बाजार में सबसे बड़ा खिलाड़ी था। उसके बाद सिनोफी एवेंटिस, फाइजर, नोवार्टिस और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का नाम भारत के बड़े वैक्सीन उत्पादकों की लिस्ट में आता है।
काया पलट करने का मौक़ा
पूरी दुनिया में, कम से कम 140 कोरोना वैक्सीन पर काम चल रहा है जिनमें से 11 को ह्यूमन ट्रायल की अनुमति मिली है जो अलग-अलग लेवल पर हैं। इनमें से दो वैक्सीन भारतीय कंपनियों के हैं जो ह्यूमन ट्रायल के चरण में पहुँचे हैं और इनकी सफलता की उम्मीद की जा रही है।
जिन दो भारतीय कंपनियों ने कोरोना की संभावित वैक्सीन तैयार करने में सफलता हासिल की है, उनमें पहली कंपनी है हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड जिसने आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी के साथ मिलकर कोवाक्सिन नामक वैक्सीन तैयार की है। वहीं दूसरी दवा कंपनी है ज़ायडस कैडिला जिसकी वैक्सीन को हाल ही में ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया से ह्यूमन ट्रायल करने की अनुमति मिली है। दोनों ही कंपनियों की वैक्सीन दूसरे और तीसरे चरण के ट्रायल के लिए अनुमति प्राप्त कर चुकी हैं।
भारत बायोटेक कंपनी जिसने कोवाक्सिन तैयार की है, वो इससे पहले पोलियो, रोटा वायरस और जीका वायरस का टीका भी विकसित कर चुकी है।
माना जा रहा है कि अगर कोई भारतीय वैक्सीन 'सबसे शुरुआती वैक्सीन' के तौर पर बाज़ार में आ पाया तो उससे भारतीय वैक्सीन और फ़ार्मा इंडस्ट्री की काया पलट पूरी तरह से पलट जायेगी। (bbc.com/hind)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सर्वोच्च प्रमुख मोहन भागवत ने तीन राष्ट्रीय मुद्दों पर बहुत ही तर्कसंगत विचार प्रस्तुत किए हैं। ये मुद्दे हैं- काशी और मथुरा के मंदिर, समान आचार संहिता और शरणार्थी कानून। इन तीनों मुद्दों को लेकर संघ और भाजपा पर आरोप लगाया जाता है कि उनकी दृष्टि अत्यंत संकीर्ण, सांप्रदायिक और समाज-विरोधी है लेकिन इन तीनों मुद्दों पर पहले जो भी कुछ लिखा और कहा जाता रहा हो, वर्तमान सर संघचालक ने एक ऐसा दृष्टिकोण पेश किया है, जो पुरानी धारणाओं को रद्द करता है। कुछ समय पहले विज्ञान भवन में भाषण देते हुए मोहनजी ने कहा था कि जो भारत में पैदा हुआ और जो भी भारत का नागरिक है, वह हिंदू है। हिंदू होने और भारतीय होने में कोई फर्क नहीं है। यही बात मैंने दस साल पहले मेरी पुस्तक ‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’ में विस्तार से कही थी। ‘हिंदू’ शब्द संस्कृत और प्राकृत का नहीं है। यह शब्द किसी वेद, किसी दर्शन ग्रंथ या किसी उपनिषद में कहीं नहीं है। इसका सीधा-सादा अर्थ यह है कि जो सिंधु नदी के पार रहते हैं, वे सब हिंदू हैं। चीन में भी प्रत्येक भारतीय को ‘इन्दुरैन’ कहा जाता है।
हिंदू या इंदू शब्द हमें विदेशियों का दिया हुआ है। जब इन विदेशियों ने भारत पर हमला बोला तो उन्होंने हमारे पूजा-केंद्रों को तोड़ा, औरतों के साथ बलात्कार किया और हमारी संपत्ति लूटकर अपने देश ले गए। उन्होंने कई मंदिर तोड़े तो मस्जिदें भी तोड़ीं। अफगानिस्तान में तो मस्जिदों के साथ-साथ दरगाहें भी तोड़ी गईं। यूरोप में गिरजाघर तोड़े गए। मजहब की आड़ में यह सब सत्ता का खेल रहा। अयोध्या में राम मंदिर फिर से बन रहा है। इसे मुसलमानों ने भी स्वीकार किया है। अब काशी और मथुरा की मस्जिदें तुड़वाने पर संघ उत्साहित नहीं है, हालांकि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने इस मुद्दे पर आंदोलन चलाने का प्रस्ताव पारित किया है। इस मुद्दे पर और समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर भी मोहनजी की राय है कि सर्वसम्मति के बिना इसे लागू करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसके कई प्रावधानों पर मुसलमानों और ईसाइयों के साथ-साथ हिंदुओं को भी आपत्ति हो सकती है। इसी प्रकार पड़ोसी देशों से आने वाले मुसलमान शरणार्थियों के बारे में संघ का विचार भी बहुत ही उदार है। उसका कहना है कि जो भी पीडि़त है, उसे किसी भेदभाव के बिना शरण दी जानी चाहिए। आशा है, मोदी सरकार संघ के इस रवैए को ध्यान में रखकर अपने कानून में जरुरी संशोधन करेगी। उक्त तीनों मुद्दों पर संघ ने जो राय व्यक्त की है, वह उसे सचमुच ‘राष्ट्रीय संघ’ की हैसियत प्रदान करता है, किसी सांप्रदायिक संगठन की नहीं। इसीलिए सर संघचालक मोहन भागवत बधाई के पात्र हैं। उनका बौद्धिक साहस सराहनीय है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
कोरोना महामारी के शुरुआती दौर की तुलना में कोविड-19 से होने वाली मृत्यु दर में कमी देखी जा रही है। यह परिवर्तन विशेष रूप से यूरोप में देखा गया है लेकिन इसके पीछे के कारणों पर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के जैसन ओक और उनके सहयोगियों ने बताया है कि इंग्लैंड में जून से अगस्त माह के दौरान विभिन्न डैटा सेट के अनुसार संक्रमण से मृत्यु दर (आईएफआर) में 55 से 80 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। 17 अगस्त से शुरू होने वाले सप्ताह में ब्रिटेन में 7000 से अधिक संक्रमितों में से 95 लोगों की मृत्यु हुई (आईएफआर 1.4) जबकि अप्रैल के पहले हफ्ते में 40,000 पॉजिटिव मामलों में से 7164 लोगों की मृत्यु हुई थी (आईएफआर 17.9)।
आईएफआर का पता पॉजिटिव मामलों को मृत्यु की संख्या से विभाजित कर लगाया जाता है लेकिन ओक इन आकड़ों को सही आईएफआर नहीं मानते क्योंकि एक तो संक्रमण और उससे होने वाली मौतों के बीच कुछ सप्ताह का फर्क रहता है और समय के साथ परीक्षण में भी बदलाव होता है। फिर भी इन आंकड़ों से मोटा-मोटा अंदाज तो मिलता ही है। ओक और उनके सहयोगियों ने आईएफआर में बदलाव का अनुमान लगाने के लिए अधिक परिष्कृत विधि का उपयोग किया है। उन्होंने पाया कि पूरे यूरोप में पैटर्न यही रहा है। लेकिन इसका कारण स्पष्ट नहीं है।
आंकड़ों के आधार पर एक कारण यह हो सकता है कि अप्रैल माह के दौरान संक्रमितों में युवा लोगों का अनुपात कम था और 10-16 अगस्त के बीच संक्रमितों में 15-44 वर्ष के लोगों का का अनुपात अधिक था। मान्यता यह है कि युवाओं में मौत का जोखिम कम रहता है। लेकिन ओक इसे पर्याप्त व्याख्या नहीं मानते हैं। अभी भी पाए जाने वाले पॉजिटिव मामलों में वृद्ध लोगों की संख्या काफी अधिक है।
कुछ शोधकर्ता अस्पतालों में बेहतर उपचार व्यवस्था को भी घटती मृत्यु दर का कारण मानते हैं।
इसी संदर्भ में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के पॉल टमब्या का दावा है कि कोरोनावायरस का उत्परिवर्तित संस्करण (डी614जी) इस बीमारी की जानलेवा प्रकृति को कम कर रहा है। इस नए संस्करण से संक्रमण दर में तो वृद्धि हुई है लेकिन जान का जोखिम कम हो गया है। अन्य शोधकर्ता सहमत नहीं हैं।
जैसे, इम्पीरियल कॉलेज लंदन के एरिक वोल्ज के नेतृत्व में ब्रिटेन के 19,000 रोगियों से लिए गए वायरस के नमूनों के जीनोम पर अध्ययन किया गया। इस अध्ययन की अभी समकक्ष समीक्षा तो नहीं हुई है लेकिन वोल्ज़ के अनुसार वायरस के डी614जी संस्करण के कम जानलेवा होने के कोई प्रमाण प्राप्त नहीं हैं। (स्रोत फीचर्स)
और इनमें से हजारों लोगों की जान इस तरह से बचाई जा सकती थी कि कई जनजातीय समुदायों को रोजगार भी मिल जाता
- अश्वनी कबीर और दिक्षा नारंग
कुछ बीमारियां तो मौसमी हैं जो खास समय और जलवायु में फैलती हैं. और कुछ कोविड-19 की तरह अचानक ही हमारे सामने आ जाती हैं. लेकिन क्या तमाम मौसमी बीमारियों और कोरोना महामारी के बीच किसी को इस बात की भी सुध है कि बीते दो महीनों में 20 हज़ार से ज्यादा लोग ‘सर्पदंश’ के शिकार होकर हमारे बीच नहीं हैं.
पिछले पखवाड़े राजस्थान के बूंदी ज़िले की बालचंदपाड़ा तहसील में रहने वाले राजकुमार धोबी को सांप ने काट लिया. वे अपने खेत में जा रहे थे तभी यह घटना हुई. सूचना मिलते ही राजकुमार के परिजन उन्हें तेजाजी के थान पर ले गए. तेजाजी एक स्थानीय लोक देवता हैं जिन्हें शिव का अवतार या सांपों का देवता भी माना जाता है. वहां उन्हें करीब दो घंटे तक रखा गया. जब राजकुमार की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो उन्हें दूर जिला अस्पताल ले जाया गया. वहां उनका इलाज शुरु हो पाता तब तक उनकी मौत हो चुकी थी. राजस्थान में अकेले बीकानेर ज़िले में ही बीते 15 दिनों में करीब 500 से ज्यादा सांप द्वारा काटे जाने के मामले सामने आये हैं.
दूसरे राज्यों की बात करें तो सात अगस्त को उत्तर-प्रदेश के सीतापुर ज़िले के सदरपुर थाना क्षेत्र में तीन सगे भाइयों की मौत सांप के काटने से हो गई. वहीं बहराइच ज़िले के रुपईडीहा थाना क्षेत्र में बीते 15 दिनों में 30 से ज्यादा लोगों को सांप ने डसा हैं. बिहार में जहां एक तरफ तो बाढ़ का तांडव है, वहीं दूसरी ओर पानी के साथ सांपों ने भी घरों में डेरा जमाया हुआ है. छत्तीसगढ़ में एक कवारन्टीन सेन्टर में कोरोना से ज्यादा सांपों के काटने से मौत हुई हैं. मीडिया रिपोर्टों की मानें तो जुलाई के महीने तक यहां 40 से ज्यादा लोगों की मौत सर्पदंश से हो चुकी थी.
सर्पदंश के आंकड़ों की कहानी
पूरी दुनिया में हर वर्ष सवा लाख से ज्यादा लोग सांप के काटने से मर जाते हैं. इन मरने वाले लोगों में करीब आधे भारतीय होते हैं. हमारे यहां हर वर्ष करीब 60 हज़ार लोग सर्पदंश के कारण अपनी जान गंवा देते हैं. इनमें से 60 फ़ीसदी मौतें अकेले जून से सितंबर के महीनों में होती हैं. इनमें से भी 97 फीसदी मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में जबकि तीन फीसदी मौतें शहरी क्षेत्रों में होती हैं.
जून से सितंबर का समय मानसून (बारिश) या उसके तुरंत बाद का होता है. इस दौरान बारिश का पानी सांपों के बिलों और बाम्बियों में भर जाता है जिससे सांप सुरक्षित स्थान की तलाश में बाहर निकलता है. यही समय सांप की मेटिंग का भी होता है. इसके कारण भी उसका व्यवहार थोड़ा आक्रामक रहता है. और इसी बारिश के मौसम में किसान और मजदूर धान, सोयाबीन ओर बाजरे की फसल की बुवाई करते हैं जिसकी वजह से इस दौरान सर्पदंश की घटनाएं और भी ज्यादा होती हैं.
टोरंटो विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर ग्लोबल रिसर्च ने यूनाइटेड किंगडम के सहयोग से इस मामले पर एक शोध के नतीजे सार्वजनिक किए हैं. इसमें कहा गया है कि वर्ष 2000 से 2019 के दौरान भारत में करीब 12 लाख लोग सर्पदंश से मौत के मुंह में समा गए. इन मौतों में से 70 फ़ीसदी केवल बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में ही हुई हैं.
सांपों की दुनिया
धरती पर पाया जाने वाला बगैर पैर और पुतलियों का यह प्राणी बड़ा ही अजीब है. पूरी दुनिया में करीब 2500 प्रजातियों के सांप पाये जाते हैं. इनमें से केवल 40 फीसदी सांपों में ही विष पाया जाता है. इनमें भी मात्र 10 फीसदी सांप ऐसे होते हैं जिनके काटने से इंसान की मौत हो सकती है. अकेले भारत में 270 से ज्यादा प्रकार के सांप पाये जाते हैं जिनमें महज 50 प्रजातियां ही जहरीली हैं और इनमें से भी पांच ही ऐसी हैं जो ज्यादातर जगहों पर पाये जाने की वजह से इंसानी मौत का कारण बनती हैं.
जिन सांपों के काटने से इंसान की मौत होती हैं उनमें ‘कोबरा’ सबसे आगे है. इसे नाग भी कहा जाता है. इसके फन से इसे पहचानना बहुत आसान होता है. ‘कॉमन करैत’ नाम का सांप अधिकांश रात में ही काटता है. इस सांप को इंसानी गंध पसंद हैं. रसेल वाइपर ओर सो-स्केल वाइपर को सबसे आक्रामक सांप माना जाता है और इसकी आवाज दूर से ही सुनाई पड़ती है. ये दोनो सांप अजगर से मिलते -जुलते हैं. इनके अलावा पश्चिमी पठार, दलदली एवं वन क्षेत्र में किंग कोबरा सांप भी मिलता हैं. यह सांप करीब 15 से 18 फीट लंबा होता हैं. पहले ये चारों तरह के सांप पूरे भारत में पाए जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. इन चारों सांपों को बिग-4 के नाम से जाना जाता है.
सांपों की प्रकृति के बारे में भारत में जो कुछ समुदाय सबसे ज्यादा जानकारी रखते हैं उनमें से एक है राजस्थान का कालबेलिया समुदाय. सांप एक तरह से इस समुदाय का एक सदस्य ही होता है. डूंगरपुर के कालबेलिया समुदाय से आने वाले 70 वर्षीय जोरानाथ हमें बताते हैं कि नुगरा (कोबरा) सांप अधिकांश सुबह या शाम को ही काटता है. जबकि थुगरा (कॉमन करैत) सांप के काटने का अक्सर पता ही नहीं चल पाता. इसके काटने पर न के बराबर दर्द होता है और यह अक्सर रात को ही काटता है इसलिए इसके द्वारा काटे जाने पर अधिकांश लोग नींद में ही मर जाते हैं. जबकि फुगरा (वाइपर) सांप सबसे ज्यादा तेज और चालक होता है. उसको गुस्सा भी बहुत ज्यादा आता है.
सांप के विष का गणित
सांपों के जहर को न्यूरोटॉक्सिक और हीमोटॉक्सिक वर्ग में विभाजित किया जाता है. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है न्यूरोटॉक्सिक जहर हमारे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और हीमोटॉक्सिक रक्त और हृदय से जुड़े शरीर के क्रियाकलापों को. कोबरा व करैत जैसे सांपों का जहर न्यूरोटॉक्सिक होता है और वाइपर का हीमोटॉक्सिक. सांप का ज़हर असल में प्रोटीन और एनजाइम्स से बना होता है. यह सांप के ऊपरी जबड़े में स्थित थैलियों में मौजूद रहता है. ऊपरी जबड़े के दोनों ओर स्थित एक-एक थैली ज़हरीले दांतों की जड़ों में खुलती है.
वाइपर के ज़हरीले दांत अंदर से नलीनुमा होते हैं (इन्जेक्शन की सुई की तरह) इसलिए ज़हर ठीक शरीर के अंदर चला जाता है. और कुछ कोबरा जैसे सांप जिस जगह पर काटते हैं वहां जहर की एक पिचकारी सी छोड़ते हैं.
यहां सर्पदंश का इलाज
सांप के विष के प्रभाव को रोकने के लिये उसके जहर से ही दवा बनाई जाती है. इस दवा को एंटीवेनिन या एंटीवेनम सीरम कहा जाता है. सरकारी दावों के मुताबिक यह दवा हमारे यहां के सभी जिला अस्पतालों, प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स (पीएचसी) एवं कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स (सीएचसी) पर निशुल्क उपलब्ध है. इसलिए जब कोई व्यक्ति सर्पदंश का शिकार बन जाता है तो उसको नजदीक के इन केंद्रों पर ले जाया जाता है.
लेकिन एंटीवेनम सीरम की उपब्धता एवं आपूर्ति पर सवाल उठाते हुए राजस्थान समग्र सेवा संघ के सदस्य अनिल गोस्वामी बताते हैं, “कहने को तो एंटीवेनम सीरम पीएचसी एवं सीएचसी पर उपलब्ध हैं, किंतु हकीकत में जिला अस्पतालों में भी इसकी ठीक आपूर्ति नहीं हैं. पीएचसी एवं सीएचसी केंद्रों पर जब फ्रिज की सुविधा ही नहीं हैं तो फिर इसे वे रखेंगे कहां पर?’
राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी अनिल गोस्वामी की आधी बात से सहमत होते हुए बताते हैं कि ट्रेंड स्टाफ ओर सीरम की पर्याप्त उपलब्धता होने की वजह से यहां के जिला अस्पतालों की स्थिति बाकी स्वास्थ्य केंद्रों के मुकाबले अलग है.
लेकन अनिल गोस्वामी का यह तर्क भी सही है कि अगर ऐसा कुछ जगहों पर है भी तो “सांप के काटने से मरता कौन हैं? गांव-देहात में रहने वाले लोग. यदि उन्हें अपने पास के स्वास्थ्य केंद्रों पर सीरम मिल भी गई तो वहां ट्रेंड स्टाफ नहीं होता. यदि एंटीवेनम सीरम ज्यादा मात्रा में दे दी जाए तो व्यक्ति की वैसे ही मौत निश्चित है.’ शायद यह भी एक वजह है कि सांप काटने के बाद पीएचसी ओर सीएचसी पहुंचने वाले अधिकांश मरीजों के बचने की संभावना काफी कम होती है.
जयपुर के प्रख्यात स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ राकेश पारिख एंटीवेनम से जुड़ी एक और समस्या की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ”दवा कंपनियां भी एटीवेनम सीरम कम बनाती हैं. इससे इस सीरम की आपूर्ति कम होती है. इसके पीछे एक बड़ा कारण मुनाफा कम होना हैं. बाजार में एंटीवेनम सीरम की औसत कीमत 5 से 6 हज़ार के बीच है. हमें इसका उत्पादन बढ़ाना होगा जिससे इसकी आपूर्ति बढ़ाई जा सके, अन्यथा हम सर्पदंश से हुई मौत पर रोक नहीं लगा सकेंगे.”
लेकिन सर्पदंश के इलाज में मौजूद जटिलताएं सिर्फ इतनी ही नहीं हैं. एक तो किसी एक सांप के एंटीवेनम का उपयोग दूसरे सांप द्वारा काटने पर नहीं किया जा सकता, और दूसरा यह सोचना भी सही नहीं है कि यदि सांप की प्रजाति एक समान है तो उनका एंटीवेनम एक ही होगा. उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु के कोबरा सांप के जहर से बना एंटीवेनम सीरम राजस्थान या झारखंड के कोबरा सांप के सर्पदंश में ज्यादा प्रभावी नहीं होता. ऐसे ही राजस्थान के रसेल वाइपर सांप के जहर से बने एंटीवेनम सीरम का कर्नाटक या पश्चिम बंगाल के रसेल वाइपर के सर्पदंश पर खास असर नहीं होता.
तरह-तरह के भ्रम और धारणाएं
सांप को लेकर बहुत सी गलत धारणाएं भी प्रचलित हैं. जिनमें से एक यह है कि यदि किसी इंसान को सांप ने काट लिया और ओझा मंत्र पढ़ेगा तो वह सांप वापस आकर उस जहर को चूस लेगा. ऐसे अंधविश्वासों के चलते भी सर्पदंश का इलाज करना आसान नहीं होता. दरअसल सांप काटने के बाद के 1-2 घण्टे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. उसमें अगर कोई व्यक्ति ऐसे फालतू के चक्करों में उलझ जाता है तो फिर उसका बचना मुश्किल हो जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश से होने वाली मौतों के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है.
सांपों से जुड़ी एक अजीबोगरीब धारणा यह भी है कि इच्छाधारी नाग या कोबरा के सर पर एक मणि होती है जिसे हासिल करके इंसान अमर हो सकता है. ऐसी कुछ धारणाएं न केवल सांपों के मरने की बल्कि उनके द्वारा काटे जाने की वजह भी बनती रही हैं.
इरुला कोऑपरेटिव सोसाइटी का सफल मॉडल
भारत के सुदूर दक्षिण राज्यों तमिलनाडु और कर्नाटक में इरुला आदिवासी जनजाति रहती है जो सदियों से सांपों के साथ अपना जीवन जीती आई है. इरुला लोग सांप से जहर लेने, सर्पदंश का इलाज करने तथा जड़ी-बूटियों के जानकार लोग माने जाते हैं. भारत सरकार ने 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम बना दिया जिससे सांप पकड़ने ओर जंगल के गहराई में जाने पर रोक लग गई.इसके बाद एक अमेरिकन प्रकृतिविद रोम व्हाइटेकर ने 1978 में फारेस्ट विभाग से अनुमति प्राप्त करके सांपों से जहर एकत्रित करने का काम शुरु किया. इस काम में इरुला आदिवासी समुदाय को जोड़ा गया. इरुला का काम जंगल से जहरीले सांपों को पकड़ना, उनसे जहर लेना/निकालना फिर उन्हें वापस जंगल में छोड़ देना हैं.
इरुला कोऑपरेटिव सोसायटी को हॉपकिंस इंस्टीट्यूट के साथ जोड़ा गया है. यह इंस्टीट्यूट उससे जहर लेकर एंटीवेनम सीरम तैयार करता है. इस प्रक्रिया में वेनम की कम मात्रा को एक घोड़े में इंजेक्ट किया जाता है जिससे उसके शरीर मे एंटीजन बन सकें. उन एंटीजन को बाहर निकाल लिया जाता है, जिससे एंटीवेनम सीरम तैयार होता है.
इरुला कोऑपरेटिव सोसायटी की रिपोर्ट बताती है कि इरुला जनजाति से पहले दवा कम्पनी के लोग ही सांप पकड़ा करते थे. इनमें से अधिकांश जहरीले नहीं होते थे इसलिए उन्हें वापस छोड़ना पड़ता था. जब विषैला सांप मिलता तो वे जिस तरह से उन्हें पकड़ते और उनका जहर निकालते उससे कई सांप जख्मी हो जाते थे और जब उनको वापस जंगल में छोड़ा जाता तो उनमें से कई मर जाते थे. रिपोर्ट बताती है कि यह प्रक्रिया ज्यादा खर्चीली और समयखाऊ थी और सबसे बड़ी बात इससे वन्य जीवों (सांपों) को नुकसान भी पहुचता था.
अब इरुला लोग बगैर नुकसान पहुचाए आसानी से केवल जहरीले सांपों को ही पकड़ते हैं. वे बड़ी सावधानी से कई-कई बार उनका जहर निकालते हैं और फिर उन्हें वापस जंगल में छोड़ देते हैं. रिपोर्ट के अनुसार इस प्रक्रिया का सफलता अनुपात 93 फीसद है. मतलब 100 जहरीले सांपों में से 93 सांप बच जाते हैं केवल सात ही मरते हैं.
इस कोऑपरेटिव सोसायटी के बनने से इरुला समुदाय को स्थाई रोजगार मिल गया है. उनका सदियों का सीखा हुआ ज्ञान/हुनर बच गया. इससे दवा कंपनियों को भी आसानी से कम पैसा खर्च किये सांप का ऐसा जहर मिल गया जिससे एंटीवेनम सीरम तैयार किया जा सकता है. और सबसे बड़ी बात यह कि इससे वन्य जीवन की भी क्षति नहीं हुई.
यह प्रयोग दोहराया क्यों नहीं गया?
केवल इरुला समुदाय ही नहीं है जिसका भारत में सांपों से इतना घनिष्ठ रिश्ता है. इरुला तमिलनाडु और कर्नाटक में रहता है और जैसा कि हम थोड़ा सा ऊपर जान चुके हैं इनकी ही तरह का एक और समुदाय कालबेलिया है जो राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा में पाया जाता है. इनके अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में सपेरा समुदाय है. महाराष्ट्र एवं पंजाब में जोगी समुदाय. और उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व झारखंड में मुरिया जनजाति. ये सभी समुदाय सांपों के साथ ही अपने जीवन को जीते आये हैं.
“हम अपने बच्चों को जन्म से ही सांपों के साथ रहना सिखाते हैं’ कालबेलिया समुदाय के सांपों से रिश्ते के बारे में इसी समुदाय से आने वाले जोरानाथ कहते हैं “सांप तो हमारी मोहब्बत हैं. मोहब्बत जितनी पुरानी होती है. उसका नशा उतना ही ज्यादा चढ़ता है. हम तो उसी नशे के साथ ही जीते हैं और उसी के आग़ोश में मरते हैं. ये हमारी मोहब्बत ही है जिसे सदियों से हम अपने कंधों पर डाले गली-गली घूम रहे हैं.”
ये समुदाय केवल भावनाओं की वजह से ही नहीं बल्कि ठोस कारणों की वजह से भी सांप को अपने और समाज के लिए उपयोगी मानते हैं. “सांप तो किसान का मित्र होता है जो खेतों में चूहों, कीटों, मेंढकों व छिपकलियों की संख्या को बढ़ने नहीं देता. वो छोटे पक्षियों के अंडे तथा टिड्डियों को भी खाता है” सांप की खूबियों पर प्रकाश डालते हुए जैसलमेर के मिश्रनाथ कालबेलिया कहते हैं.
इरुला कोऑपरेटिव सोयायटी को बने आज 42 वर्ष गुजर गए हैं किन्तु कोई दूसरी इस तरह की सोयायटी फिर नहीं बनाई गई. पिछले 20 वर्षों में जो 12 लाख लोग सांप काटने की वजह से मारे गए हैं. यदि उससे पहले भी 20 वर्षों का आंकड़ा जोड़ दें तो ये संख्या 24 लाख पहुंचती हैं. क्या इनमें से कुछ हजार लोगों को भी कुछ और प्रयास करके हम नहीं बचा सकते थे? या कुछ लाख?
राज्य सरकारों ने सर्पदंश को राज्य आपदा घोषित किया है. इसे भूकम्प, बाढ़, सूखा, बादल फटना, सुनामी इत्यादि की सूची में रखा जाता हैं. राज्य सरकारें इसके लिए मुवावजा देती हैं. मध्य प्रदेश और बिहार सरकार सांप काटने के कारण हुई मौत पर पांच लाख रुपये का मुआवज़ा देती हैं. उत्तर प्रदेश, उड़ीसा व राजस्थान की सरकारें चार लाख रुपये, पंजाब सरकार तीन लाख रुपये, झारखंड 2.5 लाख रुपये, बंगाल दो लाख और केरल एक लाख रुपये. मुआवजा लेने के लिए सर्पदंश से मृत व्यक्ति का पोस्टमार्टम होना और उसकी रिपोर्ट में यह उल्लेखित होना जरूरी है कि उस व्यक्ति की मौत सर्पदंश से हुई. उसी रिपोर्ट व पहचान के अन्य दस्तावेजों के आधार पर क्लेम किया जाता है.
एक वर्ष में सर्पदंश से होने वाली करीब 60 हज़ार मौतों का 2.5 लाख रुपये के औसत मुआवजे के हिसाब से 1500 करोड़ रुपये होते हैं. पिछले 40 साल के लिए यह आंकड़ा 60 हजार करोड़ रुपये हो जाता है. फिर इतने धन और इतने लोगों की जान बचाने और लाखों लोगों को रोजगार देने और उनके परंपरागत ज्ञान को बचाने के लिए इरुला जैसा कोई और प्रयोग क्यों नहीं किया गया?
यह मुद्दा अगर कभी हमारी चिंता की कोई बड़ी वजह नहीं बन सका तो इसका दोषी कौन है? बस सांपों से परंपरागत तरीके से जुड़े रहे समुदायों को कोऑपरेटिव सोसायटी या किसी अन्य तरीके से दवा कम्पनियों से ही तो जोड़ना था ताकि उचित एंटीवेनम सीरम की देश में कमी न हो. ये समुदाय हमें तरह तरह के सांपों से बचाव के लिए उनके ही जहर उपलब्ध करवा सकते थे. और जब हमारे पास 1500 करोड़ रुपये साल में खर्च करने के लिए हैं तो फिर पीएचसी और सीएचसी केंद्रों में फ्रिज का भी इंतजाम किया ही जा सकता था.
लेकिन जब जागो, तभी सवेरा. यदि विभिन्न राज्य सरकारें चाहें तो कभी भी ऐसा कर सकती हैं. ताकि सांपों के काटने से होने वाली मौतों का आंकड़ा नीचे आ सके और देश भर में फैले कई समुदायों का जीवन स्तर बहुत नीचे से थोड़ा ऊपर जा सके.(satyagrah)
औषधियां, जो सामान्य पानी को खुशबूदार और स्वास्थ्यवर्धक पेय में बदलकर जीवन में नई स्फूर्ति पैदा करती हैं
- Vibha Varshney
आयुर्वेद कहता है कि हर खाद्य पदार्थ अपने आप में एक औषधि है। इसी को मूल मंत्र मानते हुए केरल के लोगों ने सामान्यत: पानी को भी औषधीय गुणों से परिष्कृत करने के लिए एक तरीका ढूंढ निकाला है। सामान्यतः केरल जैसे तटीय राज्यों में पानी को उबाल कर पीने की परम्परा रही है, जिससे पानी के कारण होने वाली बीमारियों से बचा जा सके। इस क्षेत्र के लोग पानी को उबालने के क्रम में कुछ औषधियां (जड़ी-बूटी) डाल देते हैं, ताकि पानी में उस औषधि के गुण घुल-मिल जाएं। जड़ी-बूटी मिश्रित इस पानी को दाहशमनी के नाम से जाना जाता है।
यह सर्वविदित है कि मनुष्य के शरीर को प्रतिदिन दो से तीन लीटर पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि पेयजल औषधीय गुणों को भी धारण करता हो, तो यह सोने पे सुहागा जैसा हो जाता है। दाहशमनी में प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो वर्तमान के प्रदूषित वातावरण में एक वरदान से कम नहीं है। हालांकि, मौजूदा वक्त में स्पार्कलिंग (कार्बोनेटेड) वाटर, हर्बल चाय और फलों को भिगोकर बना पानी (इनफ्यूज्ड वाटर) स्वास्थ्य के प्रति सचेत लोगों में काफी लोकप्रिय हैं। इनके सामने केरल के इस औषधीय व गुणकारी पानी को जितना महत्व मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया है।
दाहशमनी को तैयार करने के लिए कई प्रकार की जड़ी-बूटियों और मसालों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें सोंठ (सूखी अदरख), इलाइची, लौंग, धनिया, जीरा, खस और चंदन की लकड़ी शामिल हैं। जीरे के साथ तैयार पानी को जीरका वेला और धनिया से तैयार पानी को मल्ली वेला कहा जाता है। इस गुणकारी पानी को तैयार करने के लिए इसमें अपनी पसंद की जड़ी-बूटियों या मसालों का उपयोग किया जा सकता है।
हालांकि, आयुर्वेदिक दवाओं की दुकानों में कुछ तैयार मिश्रण भी मिल जाते हैं। जड़ी-बूटियों के इन पैकेटों में एक औषधि ऐसी भी होती है जो पानी के रंग को गुलाबी बना देती है। इस औषधीय जल का सेवन मैंने पहली बार तब किया था, जब मैं चिकनगुनिया की रिपोर्टिंग करने केरल के कई गांवों में गई थी। वहां मुझे गांव के लोगों ने पीने के लिए यही गुलाबी पानी दिया था।
दाहशमनी में यह गुलाबी रंग हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले पेड़ की लकड़ी से आता है, जिसे पदिमुखम के नाम से जाना जाता है। यह पेड़ हिमालय के जंगलों में पाया जाता है, इसलिए इसे जंगली हिमालयन चेरी (प्रूनस सेरासोइड्स) भी कहा जाता है। यह रोजेसी परिवार का पेड़ है। सेब भी इसी परिवार का हिस्सा है। केरल फाॅरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक पी सुजनपाल बताते हैं कि केरल में यह पेड़ नहीं पाए जाते हैं। हिमालय के जंगलों से यहां तक पहुंचने में इसकी कीमत काफी बढ़ जाती है, इसलिए केरल के कई गांवों में दाहशमनी बनाने के लिए पदिमुखम के स्थान पर झाड़ीदार पेड़ सिसलपीनिया सप्पन की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। सुजनपाल बताते हैं, “इंडो-मलेशियन क्षेत्र का यह झाड़ीनुमा पेड़ केरल के जलवायु में पनपने के लिए बिल्कुल मुफीद है। कभी-कभी इसका इस्तेमाल जंगल के चारों तरफ बाड़ के तौर पर भी किया जाता है, ताकि जंगली जानवरों को बचाया जा सके।”
औषधीय गुणों से भरपूर
पदिमुखम के पेड़ शुष्क मिट्टी पसंद करते हैं और किसी अन्य पेड़ों की छाया में अच्छी तरह से पनपते हैं। पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इस पेड़ के विभिन्न हिस्सों का इस्तेमाल कई प्रकार की दवाओं के निर्माण में किया जाता है, जिनमें दशमूलारिष्ट, द्रक्षादि क्वाथ चूर्ण, कुंकुमादी तेल और चंदनादि तेल शामिल हैं। कई नए अध्ययनों के परिणाम भी पदिमुखम की लकड़ी के औषधीय गुणों की पुष्टि करते हैं। हाल ही में फायटोथेरेपी रिसर्च नामक जर्नल में जून 2020 में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है, जिसमें पदिमुखम के पेड़ के विभिन्न हिस्सों में प्रचुर मात्रा में फ्लावोनेस और आइसोफ्लावोनेस पाए जाने की पुष्टि की गई है। ये दोनों तत्व महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद शुरू होने वाले लक्षणों को सुस्त करने में मदद कर सकते हैं। यह अध्ययन दक्षिण कोरिया, अमेरिका और चीन के शोधकर्ताओं ने किया है।
पानी को शुद्ध करने की पेड़ों की क्षमता को गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा किये गए शोध के परिणामों से भी आंका जा सकता है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पेड़ों के घटकों की जांच कर इनके एंटीमाइक्रोबियल व्यवहार को जानने की कोशिश की। उन्होंने पाया कि इथाइल एसिटेट का उपयोग कर इस पेड़ की लकड़ी से निकाले गए रस में ऐसे बैक्टीरिया को मारने की क्षमता मौजूद है, जिन पर अन्य एंटीबायोटिक रसायनों का असर नहीं होता। अगस्त 2019 में एप्लाइड बायोकेमिस्ट्री एंड बायोटेक्नोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित इस शोध के परिणाम बताते हैं कि जंगली हिमालयन चेरी के तत्व बहुऔषधि प्रतिरोधी कीटाणुओं (मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट बैक्टीरिया) को मारने के लिए बनाई जाने वाली दवाई के लिए संभावित स्रोत हो सकते हैं।
मिजोरम में पारंपरिक तौर पर इस पेड़ की छालों का इस्तेमाल चर्म रोगों, सूजन और घावों के उपचार के लिए किया जाता रहा है। सितंबर 2014 में एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ऑफ मिजोरम, आइजोल के शोधकर्ताओं ने इस पेड़ की लकड़ी में आयरन, जिंक, कॉपर, मैंगनीज, कोबाल्ट और वेनेडियम की मौजूदगी की पुष्टि की है, जिसके कारण यह चर्म रोगों के उपचार में कारगर है।
कई शोध बताते हैं कि इस पेड़ की लकड़ी का रस श्वसन तंत्र और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने के साथ ही शरीर को भी स्वस्थ रखने में मदद करता है। हालांकि इस पेड़ के नए कोंपल और बीज में साय्नोजेनिक ग्लायकोसाइड्स (एक विषैला रसायन) पाया जाता है, जिसका अत्यधिक मात्रा में इस्तेमाल घातक साबित हो सकता है।
सप्पल की लकड़ी है विकल्प
दाहशमनी में पारंपरिक तौर पर इस्तेमाल होने वाली सामग्री में सप्पन की लकड़ी का इस्तेमाल भले ही ज्यादा प्रचलित न हो, लेकिन यह अपने आप में अनेक गुणों को धारण करता है। सप्पन की लकड़ी में लाल रंग का एक रंजक पाया जाता है, जिसका इस्तेमाल कपड़ों को रंगने के लिए और पेंट एवं स्याही बनाने के लिए किया जाता है। इससे बनने वाले रंजक का इस्तेमाल आज भी सूती, रेशमी और ऊनी कपड़ों को रंगने के लिए किया जाता है। हालांकि कृत्रिम रसायनों से बने रंजकों के सस्ता होने के कारण अब इस प्राकृतिक रंजक के इस्तेमाल में बेहद गिरावट दर्ज की जा रही है। तमिलनाडु के शोधकर्ताओं के अनुसार, सप्पन के पेड़ से निकलने वाले रंजक अन्य रसायनों की तुलना में विषैले नहीं होते हैं, इसलिए इसका इस्तेमाल खाद्य रंगों के तौर पर भी मनुष्यों के लिए सुरक्षित है।(downtoearth)
पूजा पवार
ये हैं संयुक्ता हेगड़े, संयुक्ता साउथ इंडियन फिल्म एक्ट्रेस हैं और कर्नाटक की रहने वाली हैं।
बैंगलोर के अगारा लेक पार्क में 4 सितंबर को संयुक्ता और उसकी दो दोस्त स्पोर्ट्स ब्रा पहनकर वर्कआउट कर रही थीं। तभी कांग्रेस की नेता कविता रेड्डी संयुक्ता और उसकी दोनों दोस्तों को शर्म, हया और लाज-लज्जा का पाठ पढ़ाने लगीं।
कविता रेड्डी ने भीड़ इक_ा करके उनको गाली-गलौज की, साथ ही पार्क के मेन गेट पर ताला लगवाकर संयुक्ता और उसकी दोस्तों को पार्क में ही कैद कर लिया।
कविता रेड्डी ने संयुक्ता की एक दोस्त को थप्पड़ तक मारने की कोशिश की। पर संयुक्ता और उसकी दोनों दोस्त कविता रेड्डी और भीड़ से डरी नहीं। संयुक्ता ने पूरे इंसिडेंस का लाइव वीडियो बनाया और लोगों को पूरी घटना से अवगत करवाया।
इसी बीच पुलिस आई और पुलिस ने भी कविता तथा भीड़ का साथ देते हुए संयुक्ता और उसकी दोस्तों को ‘नंगा नाच करने वाली’ तक कहा।
संयुक्ता ने बाद में कविता रेड्डी के खिलाफ एफआईआर लिखवाई।
सोशल साइट्स पर भी कविता रेड्डी संयुक्ता को उलटा सीधा लिख रही थीं। जिस पर कविता की खिंचाई खूब हुई।
इन सबका नतीजा यह हुआ कि आज कविता ने संयुक्ता से सार्वजनिक माफी भी मांग ली।
संयुक्ता साउथ इंडियन फिल्म्स का जाना-पहचाना चेहरा है। वे कई फिल्म्स और शो कर चुकी हैं।
उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग रोल के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड मिल चुका है। कुल मिलाकर इस पूरे इंसिडेंस के निचोड़ के रूप में यह सवाल उठते हैं कि यह देश कब लड़कियों के कपड़े देखकर उसको कैरेक्टर सर्टिफिकेट बांटना बंद करेगा?
कब लड़कियों की मोरल पुलिसिंग बंद होगी?और कब लड़कियों के साथ इस तरह की सार्वजनिक हिंसा बंद होगी??
संयुक्ता एक फिल्म एक्ट्रेस हैं इसलिए वे इतनी हिम्मत कर गईं। क्या कोई आम लडक़ी किसी नेता का इतना सामना कर पातीं?
मनीष सिंह
कोविड के विकराल होते स्वरूप के बीच स्कूलों के खुलने की संभावनाएं धूमिल होती जा रही है। मौजूदा हालात में स्कूलों का खुलना बेहद रिस्की है, और इस सत्र में स्कूलों का शुरू होना असंभव दिखता है। मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा कि अगले बरस का सत्र भी विलंबित हो।
तमाम प्रयास के बावजूद ऑनलाइन पढ़ाई का असर सीमित ही होगा। इसलिए कि इससे अकादमिक हिस्सा ही पूरा किया जा सकता है। मगर कक्षा का माहौल, खेलकूद, शिक्षक की आमने-सामने की निगहबानी को क्युरिकुलर तथा एक्स्ट्रा क्युरिकुलर एक्टिविटीज का पूरा असर, ऑनलाइन शिक्षण नहीं दे सकता।
बच्चों पर अलग किस्म का दबाव है। घंटों मोबाइल स्क्रीन पर ताकते रहना, एकाग्रता बनाए रखना बेहद कठिन है। नजर की कमजोरी और सरदर्द जैसी शिकायतों के साथ ऊब और मानसिक थकान की समस्याएं भी दिख रही होंगी।
दरअसल इस तरीके में डिलीवरी और रिसीविंग में तिगुनी मेहनत लगती है। किशोरावस्था की ओर आ रहे बच्चे, जिनमें सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी पनप गई है, वह तो मैनेज कर सकते हैं। मगर छोटी क्लासों के बच्चों के लिए बेहद कठिन दौर है।
मां-बाप की जिम्मेदारी बेहद बढ़ गई है। बच्चों को मोबाइल या टैब दिला देने से काम नहीं चलेगा। उनके साथ समय बिताना, स्टडी पर निगाह रखना उंसके शिक्षकों से नियमित सम्पर्क रखना और बताए अनुसार फॉलो करवाना फिलहाल आपके हिस्से में है।
दिक्कत यह है कि ज्यादातर लोग गलत पेरेंटिंग में बड़े हुए हैं। स्कूल ट्यूशन की फीस, लाने-ले जाने और ‘कंट्रोल’ में रखने तक पेरेंटिंग सीमित रही है। अभी इन रोल्स को री-डिफाइन करना होगा। किताब-कॉपियों में घुसना होगा। दो-चार सवाल करने होंगे। टीचर से बतियाना होगा। और उसकी सलाह से जो भी मानसिक और शारीरिक विकास की गतिविधियां संभव हो, उसे घर पर करवाने की जरूरत है। याद रखिये, इस वक्त आपका घर, बच्चे की जेल है।
पेरेंटिंग से जुड़े हुए वीडियो, यू ट्यूब पर बहुतेरे उपलब्ध है। सपत्नीक देखिये। संबित और रिया को देखने से बेहतर नतीजे आएंगे, इसकी मैं गारंटी लेता हूँ।
पुनश्च यह कहना जरूरी है कि एक डिस्टेंस भी रखें। बच्चा एक इंडिविजुअल है। उसकी प्राइवेसी है, उसकी अपनी होशियारियाँ हैं। सब कुछ आपको पता होना जरूरी नहीं है। अगर पता है, तो यह बताना जरूरी नहीं कि आपको पता है। समझ गए? नहीं समझे?
वो नहीं समझने वाले ही गड़बड़ पेरेंटिंग के प्रोडक्ट है!
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राज्यपालों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े पते की बात कह दी। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति सरकार की नीति नहीं है, देश की नीति है। बिल्कुल वैसे ही जैसी कि विदेश नीति या रक्षा नीति होती है। उन्होंने शिक्षा नीति पर सर्वसम्मति की मांग की है लेकिन कुछ विपक्षी दल इस नई शिक्षा नीति में सुधार के लिए रचनात्मक सुझाव देने की बजाय उसकी भत्र्सना करने में जुटे हुए हैं।
प. बंगाल के एक तृणमूल-नेता ने कह दिया कि उनकी सरकार इस नीति को इसलिए लागू नहीं करेगी कि बांग्ला-भाषा को प्राचीन या शास्त्रीय भाषा का दर्जा क्यों नहीं दिया गया ? उनसे कोई पूछे कि बांग्ला को यह दर्जा दिया जाए तो देश की अन्य दर्जन भर भाषाओं को भी क्यों नहीं दिया जाए ? अब संसद के सत्र में इस नई शिक्षा नीति पर जमकर बहस होगी। इस नई शिक्षा नीति की प्रशंसा में अगणित लेख लिखे गए हैं और विशेषज्ञों ने अपनी शंकाएं और आपत्तियां भी दर्ज करवाई हैं। प्रधानमंत्री का आश्वासन है कि सरकार उन पर पूरा-पूरा ध्यान देगी। इस नई शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होगी। यह अत्यंत सराहनीय कदम है लेकिन असली सवाल यह है कि संसद, सरकार और अदालतों के सभी महत्वपूर्ण कार्य अंग्रेजी में होंगे तो मातृभाषा के माध्यम से अपने बच्चों को कौन पढ़ाएंगे ?
ये लोग वही होंगे, जो ग्रामीण हैं, गरीब हैं, किसान हैं, पिछड़े हैं, आदिवासी हैं, मजदूर हैं। जो मध्यम वर्ग के हैं, ऊंची जात के हैं, शहरी हैं, पहले से सुशिक्षित हैं, वे तो अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाएंगे। नतीजा क्या होगा ? भारत के दो मानसिक टुकड़े हो जाएंगे। एक भारत और दूसरा इंडिया। यदि इस विभीषिका से बचना है तो बच्चों की पढ़ाई में से अंग्रेजी माध्यम पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा, जैसा कि मादक द्रव्यों पर है। अंग्रेजी माध्यम पर यदि प्रतिबंध नहीं लगा तो तथाकथित पब्लिक स्कूलों की बाढ़ आ जाएगी। इसी तरह विदेशी विश्वविद्यालयों की भी भारत में भरमार हो जाएगी और वे वर्गभेद बढ़ाएंगे। जहां तक ‘पढ़ते की विद्या’ के साथ-साथ ‘करते की विद्या’ सिखाने की बात है, इससे बढिय़ा पहल क्या हो सकती है लेकिन जब तक देश में मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम का भेद कम नहीं होगा, कामधंधों का प्रशिक्षण लेनेवाले छात्र व्यावसायिक क्षेत्र में ‘शूद्र’ ही बने रहेंगे। दूसरे शब्दों में शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन तभी होगा, जबकि समाज के मूल ढांचे में हम आधारभूत बदलाव लाएंगे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-अनंत प्रकाश
बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने महाराष्ट्र सरकार को चुनौती देते हुए कहा है कि अगर जाँच में उनके और ड्रग पैडलर्स के बीच किसी तरह के संबंध होने के सबूत मिलता है तो वह हमेशा के लिए मुंबई छोडऩे के लिए तैयार हैं। कंगना की ओर से ये ट्वीट तब आया है जब महाराष्ट्र सरकार के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा है कि महाराष्ट्र सरकार कंगना रनौत के ड्रग्स लेने के मामले की जाँच करेगी। लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब कंगना और महाराष्ट्र सरकार आमने-सामने आए हों। कंगना रनौत और ठाकरे सरकार बीते तीन महीनों में कई बार टकरा चुके हैं। दोनों पक्षों की ओर से आक्रामक बयानबाज़ी जारी है। इसी बीच केंद्र सरकार ने कंगना को ‘वाई ग्रेड’ की सुरक्षा दे दी है।
कंगना बनाम ठाकरे सरकार
बीते सोमवार कंगना रनौत ने एक ट्वीट से दावा किया था कि उन्हें सूचना मिली है कि बीएमसी मंगलवार को उनका दफ़्तर तोडऩे आ रही है। इसके बाद मंगलवार को कंगना ने ट्वीट किया कि उनके समर्थकों की आलोचना के बाद बीएमसी उनके दफ़्तर पर बुलडोजर लेकर नहीं आई, बल्कि लीकेज रोकने का नोटिस लगाकर गई।
बीबीसी ने बीएमसी के अधिकारियों से बात कर कंगना के दावे की पुष्टि करने की कोशिश की। बीएमसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर ये स्वीकार किया कि बीएमसी के अधिकारी कंगना के दफ्तर पहुँचे थे। उन्होंने कहा, ‘बीएमसी की टीम कंगना के दफ्तर पहुंची थी। लेकिन ये दौरा क्यों किया गया इसे लेकर जानकारी नहीं है। वार्ड अफसर ही बता सकेंगे कि आखिर बीएमसी की टीम क्यों गई थी।’ लेकिन इस समय कंगना रनौत और शिवसेना के नेतृत्व वाली बीएमसी के बीच जो कुछ चल रहा है, वो एक बड़ी कहानी का छोटा सा अंश मात्र लगता है।
ऐसे में सवाल ये उठता है कि कंगना और महाराष्ट्र सरकार के बीच कलह की शुरुआत क्यों हुई और इस कलह की जड़ क्या है?
इस सवाल का जवाब कंगना के उस ट्वीट में मिलता है जिसमें उन्होंने सवाल किया था कि मुंबई धीरे-धीरे ‘पाक कब्जेवाला कश्मीर’ क्यों लगने लगी है। इस पर शिवसेना नेता संजय राउत समेत कई फिल्मी हस्तियों की ओर से कंगना रनौत की आलोचना की गई। शिवसेना नेता की ओर से कंगना के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया। फिर कंगना ने भी इसका जवाब शिवसेना के अंदाज वाली आक्रामकता से दिया।
बॉलीवुड के बड़े एक्टर्स पर भी उठाए सवाल
17 साल की उम्र में ‘गैंगस्टर’ जैसी फिल्म से अपने करियर की शुरुआत करने वाली कंगना ने ‘क्वीन’ और ‘तनु वेड्स मनु’ जैसी फिल्मों से बॉलीवुड में अपनी एक खास जगह बनाई है। तीन नेशनल अवॉर्ड्स समेत कमर्शियल फिल्मों में धमाकेदार कमाई के बावजूद कंगना रनौत नेपोटिज्म से लेकर बॉलीवुड माफिय़ा वगैरह पर खुलकर बोलती रही हैं। पिछले विवादों और इस विवाद में एक अंतर ये है कि अब तक ये विवाद बॉलीवुड एक्टर्स के बीच रहा करते थे। लेकिन ये पहला मौका है जब कंगना एक ऐसे मुद्दे के केंद्र में आ गई हैं जिसमें उनके निशाने पर मुंबई पुलिस, बीएमसी और महाराष्ट्र सरकार है। कंगना ने बीते दिनों बॉलीवुड में ड्रग्स के इस्तेमाल को लेकर बड़े दावे किए हैं।
कंगना ने अपने ट्वीट में लिखा है, ‘मैं रणवीर सिंह, रनबीर कपूर, अयान मुखर्जी, विक्की कौशिक से प्रार्थना करती हूँ कि ड्रग टेस्ट के लिए अपने ब्लड सैंपल दें, अफवाह उड़ रही है कि ये कोकीन के आदी हैं। मैं चाहती हूँ कि इन अफवाहों को ख़त्म कर दें। ये युवा पुरुष अगर अपने क्लीन सैंपल दे सकें तो ये लाखों लोगों को प्रेरित कर सकते हैं।’ उन्होंने ये भी कहा है कि वह नारकोटिक्स ब्यूरो की मदद करने को तैयार हैं क्योंकि उन्हें बॉलीवुड पार्टीज में ड्रग्स के इस्तेमाल को लेकर काफी जानकारी है। उन्होंने लिखा, ‘मैं नारकोटिक्स ब्यूरो की मदद करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। लेकिन मुझे केंद्र सरकार से सुरक्षा चाहिए। मैंने सिर्फ अपने करियर को जोखिम में नहीं डाला है। बल्कि मैंने अपनी जि़ंदगी को भी जोख़िम में डाला है। ये काफी स्पष्ट है कि सुशांत को कुछ बुरे राज़ पता थे, इसलिए उसे मार दिया गया।’
कंगना ऐसा क्यों कर रही हैं?
फिल्म समीक्षक तनुल ठाकुर मानते हैं कि कंगना ने एक अभिनेत्री के रूप में अपने करियर को महत्व देना कम कर दिया है। वह कहते हैं, ‘मैं उन्हें क्वीन और उससे पहले से देखता आ रहा हूँ। एक कलाकार के रूप में वह समय के साथ बेहतर से बेहतरीन हुई हैं। मुझे ये कहने में गुरेज नहीं है कि वह एक महान अदाकारा हैं। लेकिन जब बात आती है कि एक शख्स के रूप में कंगना के व्यवहार की तो मुझे काफी दुख होता है कि उन्होंने शायद अपने एक्टिंग करियर को महत्व देना बंद कर दिया है। और शायद वह राजनीति में जाने के संकेत दे रही हैं।’
‘मैं ये बात इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि वह एक ख़ास पार्टी की विचारधारा में यक़ीन रखती हैं। बल्कि मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जिस तरह वह अपने एक्टिंग करियर के रास्ते बंद कर रही हैं, ऐसे में उनके साथ कौन काम कर पाएगा? साल 2017-18 तक कंगना मुख्यधारा की अभिनेत्रियों में गिनी जाती थीं जिन्होंने अपने अच्छे काम से जगह बनाई लेकिन इसके बाद धीरे-धीरे उनकी टिप्पणियां इतनी अपमानजनक होती गईं कि अब लोगों के लिए उनके साथ काम करना मुश्किल होगा।’
हाल ही में एक प्रतिष्ठित डायरेक्टर ऑफ़ फोटोग्राफी पीसी श्रीराम ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कंगना के साथ काम न करने का ऐलान किया है।
तनुल इस स्थिति को समझाते हुए कहते हैं, ‘बात ये नहीं है कि लोग उन्हें पसंद नहीं करते हैं। एक अभिनेत्री के रूप में लोग उन्हें आज भी तरजीह देते हैं। लेकिन कंगना जिस तरह किसी भी विचार को एक हथियार की शक्ल देती हैं, उससे उनके साथ काम करने वाले असहज हो जाते हैं। ये एक ऐसी स्थिति पैदा करती है जिसमें कंगना स्वयं फिल्म बनाएंगी ‘जबकि वह कई सारे बेहतरीन फिल्म मेकर्स, एक्टर्स, और टेक्नीशियंस के साथ काम कर सकती थीं।’
क्या इसके पीछे राजनीति है वजह?
लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो कंगना-शिवसेना विवाद के पीछे एक राजनीतिक अंडर करंट है जिसकी वजह से दोनों पक्षों के बीच आक्रामकता इतनी ज़्यादा बढ़ गई है।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत देसाई मानते हैं कि ये एक ऐसी स्थिति है जिसमें शिवसेना और बीजेपी दोनों ही पक्षों को भारी फायदा हो रहा है।
वह कहते हैं, ‘एक तरह से देखा जाए तो ये मुद्दा महाविकास अगाड़ी सरकार को फायदा पहुंचा रहा है क्योंकि महाराष्ट्र में पुणे और कोल्हापुर, सोल्हापुर जैसे छोटे शहरों में कोरोना वायरस बहुत तेजी से फैल रहा है। इसके लिए राज्य सरकार को दोषी ठहराया जा सकता है लेकिन इस सबकी जगह वह सदन में अर्नब गोस्वामी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लेकर आ रहे हैं। और उनके खिलाफ कोरोना को लेकर सवाल नहीं उठ रहे हैं।’
‘वहीं, दूसरी ओर ये मुद्दा बीजेपी के लिए भी फायदेमंद है क्योंकि इस वजह से उसे उत्तर भारतीय राज्यों में राजनीतिक फायदा होगा। अब अगर बात करें कि कंगना इस पूरे खेल में क्या कर रही हैं तो वह एक खिलाड़ी की भूमिका में हैं।’
हेमंत देसाई कहते हैं, ‘कंगना के करियर का पीक एक तरह से खत्म हो गया है। अब उनकी राष्ट्रीय छवि बढ़ रही है। अभी वह इसका फायदा भी उठा रही हैं। शायद वह राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा जा सकती हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएं बड़ी हो सकती हैं। वह इसका राजनीतिक लाभ ले रही हैं। शिवसेना भी इसके जाल में फंसती नजर आ रही है। जैसे अभी उनके घर और दफ़्तर पर जाकर वैध या अवैध की जांच करने का मामला। मुंबई कॉरपोरेशन को पहले देखना चाहिए था कि निर्माण वैध या अवैध है। ऐसे में शिवसेना और कॉरपोरेशन जो कर रही है, वो पूरी तरह से गलत है।’ हालांकि इसी बीच बीते कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर कंगना रनौत की जगह पहले से काफी मजबूत हो गई है। ट्विटर पर हाल ही में उनके फॉलोअर्स की संख्या 13 लाख पहुंच चुकी है। (bbc.com/hindi)
आज भारत का किसान अनुदानों की भीख नहीं बल्कि आत्मसम्मान के मूल्यों के लिये संघर्ष कर रहा है
- Ramesh Sharma
बहुसंख्यक ग्रामीण भारत इस सत्य को मानता है कि "कृषि, भारतीय अर्थतंत्र की रीढ़ है"। वास्तव में पुराने पाठ्यपुस्तकों में भी कृषि को भारतीय अर्थतंत्र की रीढ़ के रूप में मान्यता दी गयी थी। लेकिन भारतीय (राज) नीति के आधुनिकीकरण और शिक्षा के अतिआधुनिकीकरण ने इस रीढ़ को राजतंत्र से निकाल बाहर कर दिया है। वह महज संयोग नहीं था कि उदारीकरण के उदय के साथ-साथ तत्कालीन भारत सरकार के योजना भवन में अक्सर गंभीर बहसें होती थी कि- आखिर कैसे कृषि तंत्र से (तथाकथित अनुपयोगी) श्रमशक्ति को बाहर निकालकर उनका उद्धार किया जाये। योजना आयोग की अनेक रिपोर्टों में इन तर्कों और तथ्यों के आधार पर बनाये गये लालबुझक्कड़ी योजनाओं की अधूरी कहानियों, और उन कहानियों के नायकों-खलनायकों में- इसके इतिहास, वर्तमान और भविष्य को देखा-पढ़ा जा सकता है।
एक के बाद एक अनगिनत रिपोर्टें आयीं, शोध हुये, वार्तायें आयोजित की गयी, समितियों का गठन हुआ जिसका समग्र परिणाम ये रहा कि सकल घरेलू उत्पाद (अर्थात जीडीपी) में भारतीय कृषि का योगदान, गर्त में गिरता चला गया। केवल यही नहीं, दिशाहीन कायदे-कानूनों के चलते लाखों किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। दुर्भाग्य से यह उस महात्मा गांधी जी के भारत में हुआ, जो मानते और कहते थे स्वाधीनता के बाद हमारा ध्येय 'भूमिहीनों को किसान' बनाने का होना चाहिये।
इसके साथ-साथ भारतीय कृषि के इतिहास का सबसे काला अध्याय शुरू हुआ जब 'अनिश्चितताओं, असुरक्षाओं और आपदाओं' की त्रासदी से त्रस्त हजारों अन्नदाताओं ने हिम्मत हारकर अपनी जान दे दी। आश्चर्य है खेती-किसानी के लिये मानसून को अनिश्चितता का जुआ मानने वाला, तमाम जोखिमों के बाद भी कृषि-तंत्र में मानवीय दायित्वों का वहन करने वाला, अपनी विपन्नता को लादकर भी देश को संपन्न करने वाला भारतीय अर्थतंत्र का स्थापित योद्धा, आखिर आत्महत्या के लिये क्यों प्रेरित हुआ? क्या उन कारणों और लोगों की निष्पक्ष पड़ताल नहीं होना चाहिये, जिन्होंने हजारों किसानों को आत्महत्या के कगार पर धकेल दिया? आखिर क्यों लाखों किसानों को खेती से बाहर धकियाते हुये उन्हें शहरों का सस्ता मजदूर बना दिया गया ? क्या समाज और सरकार दोनों ही किसानों के अधिकारों के अवमानना के दोषी नहीं हैं? ऐसे अनेक अनुत्तरित सवालों का जवाब, तलाशे और तराशे बिना भारतीय कृषि के परमार्थ के प्रयास न केवल अधूरे रहेंगे, बल्कि पूरे कृषि तंत्र को ही पतन की ओर धकेल देंगे। सकल घरेलू उत्पाद (अर्थात जीडीपी) में कृषि के योगदान का लगातार घटता अनुपात, इस त्रासदी का केवल एक अधूरा अक्स है।
भारतीय प्रशासनिक/अर्थ - व्यवस्था के हकीमों को यह जानना ही चाहिये कि वर्ष 1970 में कृषि का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 25 बिलियन डॉलर था, जिसमें विगत पांच दशकों के दौरान मेहनतकश किसानों के अथक प्रयासों के चलते उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत सरकार (जुलाई 2020) के अनुसार आज कृषि का सकल घरेलू उत्पाद अनुमानतः 4546 बिलियन रुपए (अर्थात 619 बिलियन डॉलर) हो चुका है। अर्थात केवल 50 बरस के दौरान कृषि के सकल घरेलू उत्पाद में बेहद सकारात्मक 24 गुना से अधिक की वृद्धि हुई है। सरकार यदि इस विकास और वृद्धि का श्रेय लेना चाहती है तो उसे इस बात का उत्तर पहले देना चाहिये कि वर्ष 1970 से 2020 के मध्य, कृषि के लिये निर्धारित बजट में आखिर कब-कैसे-क्यों और कितने गुना की वृद्धि हुई है?
आज महामारी के दौर में जब विकास की मीनारों के नीचे की ज़मीन खिसक रही हैं तब केवल और केवल किसान-मज़दूर ही हैं जो अपने ज़मीन और ज़मीर की ओर पूरी हिम्मत के साथ लौट रहे हैं। भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट (सितम्बर 2020) के अनुसार औद्योगिक विकास, करोड़ों रुपयों की ज्ञात-अज्ञात राजकीय सहायता के बावज़ूद 38 फ़ीसदी के ऋणात्मक विकास पर पूरी रफ़्तार के साथ उलटी राह चल पड़ा है। करोड़ों बेरोज़गारों को पालने का कागज़ी दावा करने वाला सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) 20 फ़ीसदी ऋणात्मक विकास दर के साथ अब तक के सबसे बड़े ढलान पर बेबस औंधा पड़ा है। समाज और सरकार को आज गर्व होना ही चाहिये कि हज़ारों किसानों के असामयिक अंत के दुःख के बावज़ूद भी किसान ही हैं जो देश की उम्मीदों का ध्वजवाहक बना हुआ है।
सैद्धांतिक तौर पर यह सही है कि वर्ष 2024 तक (अर्थात अब से मात्र 3-4 वर्ष के भीतर) किसानों की आय दोगुनी होनी ही चाहिये लेकिन अभी तय होना बाकी है कि यह किसान तय करेगा अथवा सरकार ? सरकार जो कुछ कर सकती थी/है, वह सब तो केवल किसानों की आत्महत्या की जिंदा कहानियों और उनके बेमौत त्रासदी के सापेक्ष हुये राजनैतिक और नैतिक प्रायश्चितों के बानगी देखा-समझा जा सकता है। आज महामारी के दौर में भी कृषि क्षेत्र में विकास दर 3.4 फ़ीसदी रहने का अर्थ समझने के लिये समाज और सरकारों को योजनाओं की आत्मकेंद्रित राजनीति के दौर से बाहर आना चाहिये। किसानों को अपनी आय दुगुनी करने के लिये योजनाओं का मानसून नहीं बल्कि अधिकारों की ठोस ज़मीन चाहिये। अच्छा होता यदि आय दुगुनी करने के राजनैतिक अवसरों के बजाये किसानों को उनके नैतिक अधिकार दिये जाते।
गर्व होना चाहिये कि आज भारत का किसान अनुदानों की भीख नहीं बल्कि आत्मसम्मान के मूल्यों के लिये संघर्ष कर रहा है। यह परिस्थितियाँ, संपन्न उत्तरी देशों के उन नीतियों से बिलकुल अलग है जहाँ स्वयं सरकारें, किसानों के ख़ातिर रंग-बिरंगे अनुदानों के पक्ष में खड़ी हैं। भारतीय किसानों की तो अभी, लागत मूल्य के अधिकार की पहली मैदानी लड़ाई भी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में किसानों के लिये घोषित, अंतहीन योजनाओं की कोई भी राजनैतिक परियोजना अब तक तो आधा-अधूरा प्रयोग ही साबित होता आया है। इसीलिये महामारी के दौर में किसानों के लिये घोषित विभिन्न योजनाओं में अवसर और उनके असर भी सीमित ही हैं/होंगे। दुर्भाग्य है कि आजादी के सात दशकों के बाद भी इस देश के नीति-नियंता, राजनैतिक योजनाओं के चौसर में अंतहीन बाजी खेल रहे हैं। यथार्थ तो यह है कि इस देश का बहुसंख्यक किसान, योजनायें के अवसर नहीं, बल्कि अपने नैतिक - राजनैतिक अधिकार चाहता है। योजनाएं तो केवल एक पात्रता का आधा-अधूरा अवसर है - इस सत्य को समझने और स्वीकारने में अब तक लगभग हरेक सरकारों की समग्र विफलतायें ही भारतीय कृषि और कृषकों की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुकी है।
बरसों पहले, भारत देश / देह से कृषि की रीढ़ को निकालने वाले अनगिनत नीति-निर्माताओं, योग्य-राजनेताओं, नीमहकीम-विशेषज्ञों और बुद्धिजीवी-प्रशासकों के सामने ही नहीं, उस स्वकेंद्रित उपभोक्ता- समाज के समक्ष भी आज, किसानों के परमार्थ के रास्ते सीमित ही हैं। यदि सब चाहें तो अवसाद के कगार पर खड़े लाखों करोड़ों अन्नदाताओं को उनके अपने सपने और अधिकारों की नई इबारतें स्वयं गढ़ने की स्वाधीनता दे सकते हैं जिसका अर्थ होगा कि हम रीढ़ को पुनः सम्मानपूर्वक, देश/देह में स्थापित कर सकेंगे। किंतु यदि ऐसा नहीं होता तो भारतीय कृषि को तबाह करने वाला एक ऐसा नया तंत्र उठ खड़ा होगा जिसमें अन्नदाताओं को अपना अंतिम चुनाव करने से कदाचित कोई नहीं रोक सकेगा। भारतीय कृषि का इतिहास और भारतीय कृषकों का भविष्य, आज इसी दोराहे पर मौन खड़ा है।
(लेखक रमेश शर्मा - एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं)(downtoearth)
क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व वाली शोध टीम ने खुलासा किया है कि कई लुप्तप्राय स्तनपायी प्रजातियां संरक्षित क्षेत्रों पर निर्भर हैं। संरक्षित क्षेत्रों के बिना ये प्रजातियां गायब हो जाएंगी
- Dayanidhi
संरक्षित क्षेत्र जैव विविधता संरक्षण के लिए आवश्यक हैं। यह क्षेत्र लुप्तप्राय होती जा रही प्रजातियों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। संरक्षण पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को बनाए रखने में मदद करता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार संरक्षित क्षेत्र दुनिया के भूमि क्षेत्र का लगभग 15.4 फीसदी और वैश्विक महासागर क्षेत्र का 3.4 फीसदी है। संरक्षित निवास स्थान प्रजातियों के नुकसान को कम करने में मदद करते हैं।
क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व वाली शोध टीम ने खुलासा किया है कि कई लुप्तप्राय स्तनपायी प्रजातियां संरक्षित क्षेत्रों पर निर्भर हैं। संरक्षित क्षेत्रों के बिना ये प्रजातियां गायब हो जाएंगी।
वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ क्वींसलैंड (यूक्यू) के प्रोफेसर जेम्स वाटसन ने कहा कि संरक्षित क्षेत्रों की सफलता के बावजूद, संरक्षण करने के उपकरण के रूप में उनकी लोकप्रियता कम होने लगी है।
वाटसन ने कहा 1970 के दशक के बाद से, दुनिया भर में संरक्षित क्षेत्रों के नेटवर्क चार गुना बढ़े हैं। इनमें से कुछ संरक्षित क्षेत्र वन्यजीव आबादी को बचाने और यहां तक कि बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि लुप्तप्राय होने वाली प्रजातियों को बनाए रखने में वैश्विक संरक्षित क्षेत्र की संपत्ति की भूमिका के बारे में चर्चा बढ़ रही है। हमारे शोध ने जो स्पष्ट रूप से दिखाया है संरक्षित क्षेत्र, जब अच्छी तरह से वित्त पोषित होते हैं और अच्छी तरह से इनकी निगरानी की जाती है, तो खतरे वाली प्रजातियों को बचाया जा सकता है। इन संरक्षित क्षेत्रों में हमने जिन 80 प्रतिशत स्तनपायी प्रजातियों की निगरानी की है। उन्होंने पिछले 50 वर्षों में कम से कम संरक्षित क्षेत्रों में विस्तार (कवरेज) को दोगुना कर दिया है।
वैज्ञानिकों ने मौजूदा 237 खतरे वाली प्रजातियों की तुलना 1970 के दशक के सीमाओं में हुए परिवर्तन को मापा, फिर उन्हें संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क के साथ मिलाया हैं।
प्रोफेसर वॉटसन ने कहा इसका एक अच्छा उदाहरण यह है कि एक से अधिक सींग वाले गैंडे (राइनोसेरोस यूनिकॉर्निस), जिनकी संख्या अब संरक्षित क्षेत्र में 80 फीसदी है। उनकी संख्या अन्य जगहों पर कम हो गई है। पिछले 50 वर्षों में प्रजातियों को अपने विस्तार के 99 फीसदी से अधिक सीमा का नुकसान हुआ है। अब शेष 87 प्रतिशत पशु केवल दो संरक्षित क्षेत्रों में रहते हैं - भारत में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और नेपाल में चितवन राष्ट्रीय उद्यान। यह शोध कंजर्वेशन लेटर्स नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
प्रोफेसर वॉटसन ने कहा कि स्तनधारी संरक्षित क्षेत्रों में पीछे हट रहे हैं और दुनिया की जैव विविधता की रक्षा के लिए संरक्षित क्षेत्र पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि संरक्षित क्षेत्रों के बिना बाघ और पहाड़ी गोरिल्ला जैसी अद्भुत प्रजातियां गुम हो जाएंगी।
यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि विलुप्त होने के संकट को समाप्त करने के लिए, हमें बेहतर वित्त पोषित और अधिक संरक्षित क्षेत्रों की आवश्यकता है। इन्हें सरकारों और अन्य भूमि प्रबंधकों द्वारा अच्छी तरह से समर्थित और प्रबंधित होना चाहिए। साथ ही, हमें उन प्रयासों को पुरस्कृत करने की आवश्यकता है जो संरक्षित क्षेत्र की सीमाओं से अलग दूसरे क्षेत्रों में वन्यजीव आबादी के पुन: विस्तार और पुनर्स्थापन को सुनिश्चित करते हैं। हमें पृथ्वी के शेष अखंड पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने पर ध्यान देना चाहिए, जिसमें प्रमुख संरक्षित क्षेत्र हों। (downtoearth)
छत्तीसगढ़ के दो दोस्तों की कहानी !
-डॉ. परिवेश मिश्रा
छत्तीसगढ़ के रायपुर में दो हमउम्र स्कूली बच्चों के पिता मित्र थे सो बच्चों में भी मित्रता हो गयी। समय के साथ बच्चे भी बड़े हुए और मित्रता भी बढ़ी। एक समय ऐसा आया कि एक ही वर्ष - 1969 - में मात्र चार महीने के अंतराल में एक मित्र टैक्सी में बैठकर राजभवन पहुंचा और मुख्यमंत्री बना। दूसरा एक अदद सहयोगी के साथ अपनी कार ड्राईव करते हुए राष्ट्रपति भवन पहुंचा और राष्ट्रपति बना।
इसमें से मुख्यमंत्री बनने वाले मित्र थे सारंगढ़ के राजा नरेशचन्द्र सिंह। राज्यपाल के.सी. रेड्डी और राजा साहब पुराने मित्र थे। शपथ के बाद दोनों ने साथ काॅफी पी और कार्यक्रम सम्पन्न हो गया था। बिना किसी तामझाम के।
यह कहानी मैं 9 अगस्त 2020 को विस्तार से लिख चुका हूं। Facebook टाईमलाईन पर है, यहां दोहराऊंगा नहीं।
आज की कहानी दूसरे मित्र मोहम्मद हिदायतुल्ला जी की है जो उसी वर्ष चार महीने के बाद एक दिन सुप्रीम कोर्ट में लंच ब्रेक में अपनी काॅफी छोड़ कर राष्ट्रपति भवन पंहुचे थे और वहां काॅफी का प्याला समाप्त होते तक उनका राष्ट्रपति बनना तय हो गया था।
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लेकिन पहले एक आवश्यक फ्लैश बैक
समय : 1915 से 1920 का काल
छत्तीसगढ़ में बस्तर राज्य के दीवान थे ख़ान बहादुर हाफ़िज़ मोहम्मद विलायतुल्ला (इनका ज़िक्र दुर्ग के जटार क्लब के बारे में 2 सितंबर 2020 को लिखी और Facebook टाईमलाईन में मौजूद मेरी पोस्ट में है)।
क्लिक करें और यह भी पढ़ें : आत्मसम्मान और उसूलों के लिये अड़ने की कहानी में तिलक और हिदायतुल्ला
राज्य के दीवान आमतौर पर राजा के द्वारा नियुक्त किये अधिकारी होते थे। किन्तु उन दिनों का बस्तर राज्य अपवाद था। कुछ विशेष परिस्थितियों के चलते ( बस्तर की इन असामान्य परिस्थितियों के बारे मे विस्तार से किसी और पोस्ट में) अंग्रेज़ों ने वहां दीवान को प्रशासक का अतिरिक्त जिम्मा सौंप कर अपने अधिकारी नियुक्त करना शुरू कर दिया था। इस प्रकार दीवान-सह-प्रशासक के रूप में एक वरिष्ठ अधिकारी मो. विलायतुल्ला को छिंदवाड़ा से बस्तर पदस्थ कर भेजा गया था।
रायपुर में राजकुमार काॅलेज के कैम्पस में दो बंगले थे जो उन्नीसवीं सदी की समाप्ति से पहले नागपुर के कस्तूरचंद पार्क वाले डागा परिवार से अंग्रेज़ों ने प्राप्त किये थे। (उनकी कहानी भविष्य की पोस्ट में। वर्तमान में ये काॅलेज के प्रिन्सिपल और वाईस-प्रिन्सिपल के निवास हैं।) उन दिनों इनमें छत्तीसगढ़ के दो सबसे महत्वपूर्ण अंग्रेज़ अफ़सर रहा करते थे। एक थे रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग (अंग्रेज़ों का द्रुग और छत्तीसगढियों का दुरुग) ज़िलों के कमिश्नर और दूसरे थे उन्ही के समकक्ष अधिकारी पोलिटिकल एजेंट। ब्रिटिश या खालसा इलाके के प्रभारी थे कमिश्नर। बाकी बचा पूरा छत्तीसगढ़ राजाओं के अधीन था और इस इलाके के लिए अधिकारी थे पोलिटिकल एजेंट।
उन दिनों राजकुमार काॅलेज की प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष थे सारंगढ़ के राजा जवाहिर सिंह। उनके बेटे नरेशचन्द्र सिंह उसी काॅलेज (स्कूल को ही काॅलेज कहा जाता था) में विद्यार्थी थे और वहीं रहते थे।
मो. विलायतुल्ला बस्तर में सात वर्ष रहे। इस दौरान वे रिपोर्ट करते थे छत्तीसगढ़ के पोलिटिकल एजेंट को। सो रायपुर के राजकुमार काॅलेज में आना जाना बना रहता था।
विलायतुल्ला ने रायपुर के बैरन बाज़ार इलाके में एक मकान किराये पर ले कर बेटों - इकरामुल्ला, अहमदुल्ला तथा हिदायतुल्ला - को पहले सेन्ट पाॅल और फिर कुछ ही दिनों में गवर्नमेंट हाई स्कूल में भर्ती करा दिया था।
अपनी बौद्धिक विलक्षणता के कारण डबल-प्रमोशन की छलांग लगा कर हिदायतुल्ला जी 1921 में मैट्रिक तक पंहुच तो गये किन्तु परीक्षा में बैठने की उम्र न होने के कारण उन्हें एक वर्ष का खाली समय बिताना पड़ा था। इन्ही दिनों राजकुमार काॅलेज में अच्छे राजा और प्रशासक बनने की शिक्षा और प्रशिक्षण पा रहे कुमार नरेशचन्द्र सिंह जी रायपुर शहर के ऑनरेरी मजिस्ट्रेट नियुक्त किये जा चुके थे। दोनों के बीच मित्रता प्रगाढ़ होने के अवसर पैदा हुए।
1949 से 1956 तक राजा नरेशचन्द्र सिंह जी मंत्री के रूप में नागपुर में रहे (पहले मनोनीत तथा 1952 से निर्वाचित विधायक थे)। दोनों मित्रों का फिर साथ हुआ। हिदायतुल्ला जी नागपुर हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे, बाद में मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हो गये थे। दिन में दोनों अपना काम करते और शाम गोल्फ कोर्स में नियमित साथ खेलते व्यतीत होती।
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अब आते हैं 1969 पर
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भोपाल मे 13 मार्च 1969 के दिन राजा नरेशचन्द्र सिंह जी ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इधर हिदायतुल्ला जी तब तक सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बन चुके थे।
15 जुलाई 1969 के दिन सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ एक मामले की सुनवाई कर रही थी। एक से दो बजे का लंच ब्रेक हुआ तो पीठ की अध्यक्षता कर रहे मुख्य न्यायाधीश अपने चेम्बर मे आये। देखा तो उनके सचिव फोन हाथ में लिए खड़े हैं। भारत के राष्ट्रपति बात करना चाहते थे।
राष्ट्रपति ने फौरन लाईन पर आ कर कहा : "मैं आप से मिलना चाहता हूँ। क्या आप आ सकते हैं?"
हिदायतुल्ला जी ने निवेदन किया कि सुनवाई पूरी कर चार बजे आना चाहता हूँ।
किन्तु राष्ट्रपति ने कहा "नहीं, नहीं। बहुत ज़रूरी बात है। अभी आइये। और सीक्रेसी का ध्यान रखें। किसी को पता नहीं चलना चाहिए "।
जिन राष्ट्रपति से हिदायतुल्ला जी की बात हुई वे थे श्री वराह गिरी वेन्कट गिरी (वी वी गिरी)। श्री गिरी 1967 में भारत के उपराष्ट्रपति चुने गये थे। ठीक दो वर्ष के बाद 3 मई 1969 के दिन राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन का निधन हो गया। उसी दिन देर दोपहर राष्ट्रपति भवन के एक हिस्से में डॉ. ज़ाकिर हुसैन का शव रखा था और दूसरे हिस्से में श्री वी वी गिरी को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गयी थी। शपथ दिलाने वाले थे चीफ जस्टिस हिदायतुल्ला।
15 जुलाई 1969 की उस दोपहर राष्ट्रपति जी से बात होने के फौरन बाद हिदायतुल्ला जी ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार श्री देसाई (वे आगे चल कर गुजरात हाईकोर्ट के जज बने थे) को बुलाकर अपनी व्यक्तिगत कार बिना ड्राइवर के पोर्च में लगाने का निर्देश दिया। अपने लंच और काॅफी को छोड़ हिदायतुल्ला जी बाहर निकले। हमेशा की तरह लिफ्ट का इस्तेमाल करने की बजाए सीढ़ियों से उतरे। जब तक लोग देख पाते कार में बैठे और तब जाकर उन्होंने देसाई को बताया कि वे दोनों राष्ट्रपति भवन जा रहे हैं। पंहुच कर उन्होंने देसाई से कार में प्रतीक्षा करने को कहा। ए.डी.सी राह देखते खड़ा था। उसने अंदर पंहुचाकर दरवाजा बंद कर दिया। एकांत में श्री गिरी के साथ जो बातचीत हुई उसका विवरण हिदायतुल्ला जी ने अपनी पुस्तक "माय ओन बाॅज़वेल" में दिया है। ढीला अनुवाद कुछ इस तरह है :-
राष्ट्रपति (Prez) : मैंने फैसला किया है कि आपको राष्ट्रपति बनाऊं।
मुख्य न्यायाधीश (CJ): मेहरबानी कर अपनी बात स्पष्ट करें
Prez : मैंने तय किया है कि मैं इस्तीफा दे कर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ूंगा। लेकिन बताएं मैं किसे अपना इस्तीफा दूं।
आपको दूं ?
CJ : क्षमा कीजिये। मैं एक जज हूँ और यह सलाह मैं आपको नहीं दे सकता।
Prez : तो मैं किससे पूछें?
CJ : प्रधानमंत्री से पूछ सकते हैं, अटाॅर्नी जनरल से पूछ सकते हैं।
Prez : अच्छा तो इतना ही बता दीजिये मैं इस्तीफा किस पद से दूं ? राष्ट्रपति के पद से या उपराष्ट्रपति के ?
CJ : आप केवल उपराष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हुए हैं। राष्ट्रपति का पद तो कार्यकारी है और उपराष्ट्रपति होने की बदौलत ही मिला है।
इस दौरान दोनों ने काॅफी पी और दो बजने से पांच मिनिट पहले चीफ जस्टिस सुप्रीम कोर्ट वापस पंहुच गये।
(श्री वी वी गिरी ने जिस चुनाव का उल्लेख किया वह सामान्य चुनाव नहीं था। 1967 में डॉ ज़ाकिर हुसैन देश के तीसरे राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्षों का होता है। डॉ राजेंद्र प्रसाद (पांच-पांच वर्ष के दो कार्यकाल) तथा डॉ राधाकृष्णन के कार्यकाल भारतीय संसद के पांच सालों के साथ समानांतर चले थे। 3 मई 1969 के दिन डॉ ज़ाकिर हुसैन का निधन हो गया। इस समय देश में ऐसी स्थिति पहली बार निर्मित हुई जब राष्ट्रपति पद का चुनाव अनियमित समय पर कराए गये थे। पहले वाक्य में लिखा है यह चुनाव सामान्य नहीं था। दूसरा कारण जिसने इसे विशिष्ट बनाया वह था श्री वी वी गिरी का निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरना और विजयी होना (यह अपने आप में एक पूरी पोस्ट का विषय है, सो, कभी और)। 1969 में अगस्त माह में यह चुनाव सम्पन्न हुआ था।)
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डॉ ज़ाकिर हुसैन भारत के पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जिनकी मृत्यु पद में रहते हुए और कार्यकाल पूरा होने से पहले हुई थी। सांविधानिक व्यवस्था के अनुरूप उस समय उपराष्ट्रपति को कार्यकारी राष्ट्रपति बना दिया गया था। लेकिन यदि कार्यकारी राष्ट्रपति की भी मृत्यु हो जाए या किसी अन्य कारण से उन्हें पद छोड़ना पड़े तो कौन राष्ट्रपति पद की शपथ लेगा इसका प्रावधान संविधान में तब तक नहीं था। इस कमी को कुछ ही दिनों में (मई 1969 में ही) सुधार लिया गया था। नये प्रावधानों के अनुसार ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (और वे भी अनुपस्थिति हों तो वरिष्ठता के क्रम में दूसरे जज) कार्यकारी राष्ट्रपति बनते हैं। (यह व्यवस्था आज भी लागू है।)
संविधान के इसी संशोधन ने श्री हिदायतुल्ला के लिए कार्यकारी राष्ट्रपति बनने का अवसर पैदा किया था।
दो दिन लगे पर श्री वी वी गिरी ने आखिर गुत्थी सुलझा ही ली। 18 जुलाई को उपराष्ट्रपति वी वी गिरी ने कार्यकारी राष्ट्रपति वी वी गिरी को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र लिखा और एक कवरिंग लेटर के साथ श्री हिदायतुल्ला के पास भेज कर आगे की कार्यवाही करने का निवेदन किया। श्री हिदायतुल्ला ने अपने सबसे वरिष्ठ सहयोगी जस्टिस जे.सी.शाह को कार्यकारी चीफ जस्टिस की शपथ दिलाई। दोनों राष्ट्रपति भवन पंहुचे और वहां जस्टिस शाह ने श्री हिदायतुल्ला को कार्यकारी राष्ट्रपति के पद की शपथ ग्रहण करायी।
1969 का वर्ष छत्तीसगढ़ के दोनों मित्रों के जीवन में मील का पत्थर साबित हुआ।
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(गिरिविलास पैलेस, सारंगढ़)
प्रकाश दुबे
महात्मा गांधी दिल्ली में हरिजन बस्ती में रहते थे। 1977 में जनता सरकार आने के बाद आदिवासियों के बीच काम करने वाले मामा बालेश्वर दयाल राज्यसभा के लिए चुने गए। वे कई बार रेलवे स्टेशन से सरकारी निवास तक पैदल चल देते। इस सरकार के कुछ मंत्री कभी कभी साइकल से संसद जाते हैं। सांसद मुखर्जी संसद भवन के निकट छोटी कोठी में रहते थे। लोकसभा में सत्तारूढ़ दल के नेता रहे। वित्त, रक्षा आदि मंत्रालय संभाले। बड़ी कोठी का मोह नहीं पाला।
आतंकवादियों के निशाने पर रहने के कारण मनिंदरजीत सिंह बिट्टा को बाद में उसी मार्ग पर कोठी आवंटित की गई। बिट्टा की कोठी फ़ौजी छावनी था। लोग उसे मुखर्जी का बंगला समझते। मुखर्जी दादा के यहां गेट पर मात्र एक रक्षक। राष्ट्रपति बने। साहित्यकारों को राष्ट्रपति भवन में रहकर लिखने के लिए आमंत्रित किया। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तीन मूर्ति भवन में रहते थे। वर्तमान प्रधानमंत्री आवास में उस आकार की आधा दर्जन कोठियां शामिल की जा चुकी हैं। शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी न तो भूत हो चुके पूर्व सांसदों से कोठियां खाली करा पा रहे हैं और न सही मापदंड लागू करा सके।
की बोले मां?
ममता बनर्जी की कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी से अनेक मुद्दों पर असहमति रहती थी। इसके बावजूद उनकी राय लेती थीं। पश्चिम बंगाल में मां दुर्गा की पूजा की जाती है। राष्ट्रपति मुखर्जी ने वर्ष 2018 में पैतृक ग्राम मिरासी में दुर्गा पूजा की। सुरक्षा एजेंसियां आनाकानी कर रही थीं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता ने पूरी सुरक्षा का वादा किया। निभाया। दादा हिंदी समझ लेते हैं। बोलने में अटकते हैं, इसलिए बोलने से बचते रहे। मां के बारे में हिंदी काव्य पर उनकी उत्सुकता और याददाश्त का प्रसंग।
बरसों पहले अविनाश पांडे अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव और फिर सांसद बने। नरसिंहराव और मुखर्जी के विश्वासपात्र अविनाश ने अपने गुरु के मां पर लिखे वृहद काव्य की मुखर्जी से चर्चा की होगी। पक्की याददाश्त के धनी राष्ट्रपति ने रचनाकार से मुलाकात की। पुस्तक प्राप्त की। विश्व की आत्मा मां पर विश्वात्मा रचने वाले का नाम सुनकर हंसना मत। मधुप पांडेय की ख्याति व्यंग्य कवि की है।
करनी, करने वाले की
राजनीति में छोटा बड़ा नहीं होता। उस बात को सबसे अच्छी तरह जानते हैं-अरे भाई, लाल कृष्ण आडवाणी से पहले भी याद करो। इंदिरा गांधी के निधन के बाद ज्ञानी जेल सिंह, राजीव गांधी को शपथ दिलाने की हड़बड़ी में थे। प्रणव मुखर्जी की वरिष्ठता की अनदेखी करने के लिए सारे तार जोड़े गए। आडवाणी जी तो एक झटका खाकर मौन मार्गदर्शक बन गए। कर्मण्येवाधिकारस्ते पर भरोसा करने वाले मुखर्जी डटे रहे। बरस 1984 में दुनिया के सबसे यशस्वी वित्त मंत्री के रूप में सम्मानित हो चुके थे। जिसे रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया, वह प्रधानमंत्री बना। इसके बावजूद नेता प्रणव थे। डा मनमोहन सिंह लोकसभा के सदस्य नहीं थे। इसलिए साल 2009 से 2012 तक लोकसभा में सत्ता दल के नेता मुखर्जी थे। वित्त मंत्री की छोटी सी कोठी में जासूसी के तार मिले। हंगामा मचा। दादा से पहले वित्त मंत्रालय संभालने वाले पी चिदम्बरम गृह मंत्री थे। दुनिया रंग रंगीली बाबा, क्या छोटा? कौन बड़ा यहां पर??
तेरहवीं से पहले खनका कंगना
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने पांच बरस पहले राष्ट्र के नाम संबोधन में भाईचारा बनाए रखने की अपील की। अभिनेता आम खान की पत्नी की राय पर विरोध हुआ। देशभक्ति का फरसा दिखाने के शौकीन सांसद सहित कुछ लोगों ने बिनमांगे देश छोडऩे की कीमती सलाह दी थी। राष्ट्रपति भवन छोडऩे के बाद प्रणव दा नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय पहुंचे। निडरता से भारत की समरसता की विरासत सहेज कर रखने की सलाह दी। महात्मा गांधी की याद दिलाई।
मुखर्जी की तेरहवीं से पहले अभिनेत्री कंगना रनौत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से मुंबई शहर की तुलना कर श्रद्धांजलि देने का पुण्य कमाया। किरण राव ने कहा था-जिस तरह असहमति जताने वालों पर हमले हो रहे हैं, उससे देश में रहने में डर लगता है। उस सांसद पर अब तक कार्रवाई नहीं। कंगना को प्यार से समझाने की पहल का इंतजार है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
कनुप्रिया
रिया चक्रवर्ती अगर किसी मामले की दोषी हैं तो कानून अपनी कार्यवाही करेगा, मगर रिया चक्रवर्ती के बहाने अगर ये मान्यता स्थापित और पुष्ट की जा रही है कि स्त्रियाँ मक्कार, स्वार्थी, दौलत पर निगाह रखने वाली, ऐय्याश होती हैं और रिया को सजा समाज की स्त्रियों के लिए एक सबक है तो हम एक नजऱ इन तथ्यों पर भी डाल लें।
द हिन्दू की रिपोर्ट कहती है कि महज लॉकडाऊन के दौरान घरेलू हिंसा के मामले पिछले 10 सालो में सबसे ज़्यादा दर्ज हुए हैं, यह तब है जब शिकार महिलाओं में से 86 फीसदी कहीं से मदद लेने की कभी कोशिश नहीं करतीं और 77 फीसदी महिलाएँ किसी को अपनी तकलीफ तक नहीं कहतीं। इसके अलावा आत्महत्या की बात की जाए तो देश मे सबसे ज़्यादा आत्महत्याएँ दिहाड़ी मजदूर, किसान, बेरोजगार और गृहिणियों द्वारा की जाती हैं। 2019 की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)के अनुसार दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्या के बाद देश में दूसरे नम्बर पर आत्महत्या के आँकड़े गृहिणियों के हैं।
उधर प्रजनन संबंधी सुविधाएँ भारत मे यूँ भी बड़ी समस्या हैं, नवजात मृत्यु दर की दर पहले ही काफी ज्यादा है, इसके अलावा परिवार नियोजन की समस्या इस लॉकडाऊन में विशेष रूप से महिलाओं को झेलनी पड़ी। आईपास डिवेलपमेंट फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक लॉकडाऊन के तीन महीनों (25 मार्च से 24 जून) के दौरान 18 लाख 50 हजार महिलाओं ने असुरक्षित गर्भपात कराया या अनचाहा गर्भ हुआ। हमारे देश में सामाजिक पक्षपात के कारण लड़कियों के लिए शिक्षा ग्रहण करना पहले ही एक संघर्ष है, अनुमान है कि इस महामारी के दौर के बाद महिला छात्र जो पहले ही 2 घंटे घर के काम के बाद माध्यमिक तक बमुश्किल शिक्षा प्राप्त कर पाती थीं उनके द्वारा स्थाई रूप से स्कूल छोडऩे का जोखिम बढ़ गया है, यानि स्त्रीशिक्षा में जो इतने दशकों में सुधार हुआ उसका फायदा खत्म होने की दिशा में है।
यानि देश की बहुसंख्यक स्त्रियाँ जो शिक्षा, चिकित्सा, काम के अधिकार से लेकर घरेलू हिंसा तक हर मामले में पुरुषों से कई गुना ज्यादा महामारी की मार झेल रही हैं, उन सब समस्याओं को कार्पेट के नीचे घुसाकर हमारा मीडिया स्त्री द्वेषी समाज से रिया चक्रवर्ती पर टीआरपी लूट रहा है।
आप जितनी खिडक़ी खोलोगे बाहर दुनिया उतनी ही दिखाई देगी, वो और उतना ही दृश्य आपका व्यक्तिगत सच हो सकता है मगर उससे हकीकत और तथ्य नहीं बदलते। आँकड़े और भी हैं, और देश में स्त्रियों की स्थिति की भयावह सच्चाई बयान करते हैं मगर टीआरपी खोर मीडिया हमारी दृष्टि और सोच को सीमित और संकुचित बनाए रखना चाहता है।
सवाल यह है कि क्या हम भी यही चाहते हैं?
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने डॉ. कफील खान को रिहा करने का फैसला दिया था, उस पर मैंने जो लेख लिखा था, उस पर सैकड़ों पाठकों की सहमति आई लेकिन एक-दो पाठकों ने काफी अमर्यादित प्रतिक्रिया भी भेजी। उन्होंने इसे हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखा। मेरा निवेदन यह है कि न्याय तो न्याय होता है। वह सबके लिए समान होना चाहिए। उसके सामने मजहब, जात, ओहदा और हैसियत आदि का कोई ख्याल नहीं होना चाहिए। यदि डॉ. कफील खान की जगह कोई डॉ. रामचंद्र या डॉ. पीटर होते तो भी मैं यही कहता कि वे दोषी हों तो उन्हें दंडित किया जाए और निर्दोष हों तो उन्हें सजा क्यों दी जाए ? यह कानून दिसंबर 1980 में इंदिरा गांधी की सरकार ने बनाया था। इसका असली मकसद क्या रहा होगा, यह कहने की जरुरत नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के नाम पर आप किसी को भी पकडक़र जेल में डाल दें, यह उचित नहीं। गिरफ्तार व्यक्ति को साल भर तक न जमानत मिले, न ही अदालत उसके बारे में शीघ्र फैसला करे, यह अपने आप में अन्याय है।
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून आखिर किसलिए लाया गया था? दावा किया गया था कि इससे भारतीय संविधान की व्यवस्था सुरक्षित रहेगी। देश में कोई बड़ी अराजकता न फैले, किसी विदेशी शक्ति के साथ सांठ-गांठ करके कोई देशद्रोही गतिविधि नहीं चलाई जा रही हो या देश की शांति और व्यवस्था को भंग करने की कोशिश न की जाए। जिन प्रादेशिक और केंद्र सरकार ने इस कानून के तहत सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया हुआ है, क्या देश में इतने देशद्रोही पैदा हो गए हैं? इन तथाकथित देशद्रोहियों में हिंदू और मुसलमान दोनों हैं। किसी को कोई भाषण देने पर, किसी को लेख लिखने पर और किसी को किसी प्रदर्शन में भाग लेने पर गिरफ्तार कर लिया गया है। एक व्यक्ति को सांप्रदायिक तनाव फैलाने की आशंका में पकड़ लिया गया, क्योंकि उसके खेत में किसी पशु का कंकाल मिल गया था। इस तरह की गिरफ्तारियां इस कानून का पूर्ण दुरुपयोग है। वास्तव में इस कानून का इस्तेमाल बहुत गंभीर अपराधियों के विरुद्ध होना चाहिए लेकिन सत्तारुढ़ लोग अपने विरोधियों के विरुद्ध इसे इस्तेमाल करने में जरा भी नहीं चूकते। 1977 में अपदस्थ होने के बाद इंदिराजी यह कानून इसी डर के मारे लाई थीं कि कहीं वही इतिहास दुबारा नहीं दोहराया जाए। यह कानून अंग्रेजों के ‘रोलेट एक्ट’ की तरह दमनकारी है। इसे ‘डीआईआर’ और ‘मीसा’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह ‘रासुका’ संविधान की मूल भावना से मेल नहीं खाता। इसका क्रियान्वयन इतना गड़बड़ है कि संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का यह अक्सर उल्लंघन कर देता है। सरकार इस पर पुनर्विचार कर सकती है। यह आपात्काल की अवांछित संतान है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
विटामिन डी की कमी वाले लोगों को कोविड-19 जल्दी चपेट में ले रहा है। देखा जा रहा है कि जहां विटामिन-डी कमी वाली आबादी अधिक है, वहां कोविड-19 का प्रकोप अधिक है
- Vibha Varshney
लीजिए, अब अच्छे खाने पर एक और खतरा मंडराने लगा है। पहले ही उद्योग और सरकार फूड फॉर्टिफिकेशन से विटामिन-डी बढ़ाने में लगी थी और अब उनकी कोशिश को समर्थन मिल गया है। ये देखा जा रहा है कि विटामिन-डी से नोवल कोरोनावायरस से होने वाली बीमारी (कोविड-19) से बचा जा सकता है। यह देखा गया है कि जिन लोगों को विटामिन डी की कमी होती है, वे कोविड-19 के शिकार हो रहे हैं और उनमें मौत की दर भी ज्यादा देखी जा रही है।
उदाहरण के लिए, स्पेन और इटली में लोगों में विटामिन डी की कमी अधिक पाई जाती है और यहां कोविड-19 की वजह से मौतें भी अधिक दर्ज की गई हैं। जबकि स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड में लोगों के खाने में विटामिन डी की मात्रा अधिक होती हैं, वहां कोविड-19 के मामले कम दर्ज किए गए हैं।
3 सितंबर 2020 को जामा नेटवर्क ओपन में एक अध्ययन प्रकाशित हआ, जिसमें पाया गया कि विटामिन डी की कमी के शिकार मरीजों में कोविड होने की 77 फीसदी अधिक आशंका रहती है।
इसके चलते, कोविड-19 से बचने के लिए डॉक्टर विटामिन-डी की मात्रा बढ़ाने के लिए सलाह दे रहे हैं। साथ ही, लोग खुद ही ऐसे भोजन और सप्लीमेंट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे कि विटामिन डी की कमी दूर हो जाए।
विटामिन डी ऐसा आहार है, जिसे जानवर खुद ही अपने लिए पैदा करते हैं जैसे कि पौधे अपने लिए प्रकाश संश्लेषण करते हैं। सूरज की रोशनी की अल्ट्रावायलेट किरणें जब जानवरों की त्वचा पर पड़ती हैं तो उसमें विटामिन डी विकसित होता है। यही प्रक्रिया इंसानों में भी होती है।
साथ ही, इंसान द्वारा खाए जाने वाले सभी जानवरों के मांस में विटामिन डी की मात्रा होती है। इसलिए अगर इंसान इन जानवरों का मांस खाता है तो उसे एक साथ बड़ी मात्रा में विटामिन मिल सकता है।
हालांकि विटामिन डी का सबसे बड़ा फायदा यह माना जाता है कि यह हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है और सूखा रोग व हड्डियों की कमजोरी से बचाता है। पर इसके और भी फायदे हैं, जैसे कि इससे मांसपेशी मजबूत होती हैं और इम्यून (रोगों से लड़ने की प्रतिक्रिया) क्रिया भी मजबूत होती है।
लॉकडाउन के दौरान न तो लोग बाहर खुले में निकल कर सूरज की रोशनी ले पाए और ना ही उन्होंने मांस खाया। बल्कि लॉकडाउन खुलने के बावजूद लोगों ने खुद को ज्यादा-ज्यादा ढके रखा। इन वजहों से विटामिन डी की मात्रा कम होने का अंदेशा जताया जा रहा है।
परंतु विटामिन डी की मात्रा बढ़ाने के कृत्रिम तरीकों को अपनाने से पहले यह अच्छा होगा कि हम ये समझें कि विटामिन-डी और कोविड-19 का संबंध हर जगह एक सा नहीं है। ग्रीस, ऐसा देश है, जहां लोगों में विटामिन डी की कमी काफी ज्यादा है, लेकिन कोविड-19 के मरीज और मौतें फिर भी कम हैं। जबकि ब्राजील जहां सूरज की रोशनी प्रचुर मात्रा में है, वहां कोविड-19 के केस बहुत ज्यादा हैं। भारत में भी विटामिन डी की कमी काफी मात्रा में है, लेकिन फिर भी यहां कोविड-19 के कारण होने वाली मौतें के आंकड़े कम हैं।
बिना समझे विटामिन डी को बढ़ावा देने में खतरा है कि इंडस्ट्री इसका फायदा उठा सकती है। भारत में विटामिन डी की कमी को दूर करने के लिए पहले ही दूध और तेल में इस विटामिन का इजाफा करने पर जोर दिया जाता है। कई कंपनियां भी विटामिन डी फोर्टिफिकेशन के फायदों का दावा करती हैं, हालांकि यह काफी विवादित भी है।
लेकिन भारत में एक और विकल्प है। भारत में बड़ी तादात में कपास की खेती की जाती है, जिसके कपड़े बनाए जाते हैं। 2014 में जर्नल ऑफ फोटोकैमेस्ट्री एंड फोटोबायोलॉजी बी में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि 100 फीसदी सूती कपड़े पहनने पर लगभग 15 फीसदी सौर अल्ट्रावायलेट किरणें शरीर तक पहुंचती हैं, जो शरीर में विटामिन डी3 पहुंचाती हैं और इससे त्वचा कैंसर का खतरा भी नहीं रहता।
हाल के वर्षों में डेनिम के रूप में सिंथेटिक्स और मोटे कपड़ों का चलन बढ़ा है। इन कपड़ों की वजह से सूर्य का प्रकाश शरीर तक नहीं पहुंच पाता, जिस कारण विटामिन-डी पैदा होने में रुकावट आती है।
सूती कपड़े के इस लाभकारी असर का विस्तार से अध्ययन नहीं किया गया है, अब तक जो अध्ययन किए भी गए हैं, वो कैंसर से संबंधित हैं। यह माना जाता है कि कपड़ों के द्वारा त्वचा कैंसर से बचा जा सकता है। यहां हमें अपनी समझ का इस्तेमाल करना पड़ेगा। जैसा कि एक शोध बताता है कि एक सूती टी शर्ट सूरज की रोशनी से पर्याप्त बचाव नहीं करती है। तो क्यों न उसी टी शर्ट को पहन का विटामिन डी को बढ़ाया जाए और साथ ही कोविड-19 से भी बचा जाए।(downtoearth)


