विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जैसे कि कल मैंने अपने लेख में आशंका व्यक्त की थी, सरकार और किसानों के बीच सीधी मुठभेड़ का दौर शुरु हो गया है। आठवें दौर की बातचीत में जो कटुता बढ़ी है, वह दोनों पक्षों के आचरण में भी उतर आई है। करनाल और जालंधर जैसे शहरों से अब किसानों और पुलिस की मुठभेड़ की खबरें आने लगी हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि दिल्ली पर डटे हुए किसान संगठनों का भी धैर्य अब टूट जाए और वे भी तोड़-फोड़ पर उतारु हो जाएं।
यह अच्छा ही हुआ कि हरयाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने करनाल के एक गांव में आयोजित किसानों की महापंचायत के जलसे को स्थगित कर दिया। यदि वे जलसा करने पर अड़े रहते तो निश्चय ही पुलिस को गोलियां चलानी पड़तीं, किसान संगठन भी परस्पर विरोधियों पर हमला करते और भयंकर रक्तपात होता। लेकिन किसान संगठनों ने भी कोई कमी नहीं रखी। उन्होंने सभा-स्थल पर लगाए गए बेरिकेड तोड़ दिए, मंच को तहस-नहस कर दिया और जिस हेलीपेड पर मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर उतरना था, उसे ध्वस्त कर दिया।
किसान नेता इस बात पर अपना सीना जरुर फुला सकते हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री को मार भगाया लेकिन वे यह क्यों नहीं समझते कि सरकार के पास उनसे कहीं ज्यादा ताकत है। यदि खट्टर की जगह कोई और मुख्यमंत्री होता तो पता नहीं आज हरयाणा का क्या हाल होता ? करनाल में किसानों के नाम पर किन्हीं भी तत्वों ने जो कुछ किया, क्या उसे किसानों के हित में माना जाएगा ? मुश्किल ही है। क्योंकि अभी तक किसानों का आंदोलन गांधीवादी शैली में अहिंसक और अनुशासित रहा है और उसने नेताओं को भी आदर्श व्यवहार सिखाया है लेकिन अब यदि ऐसी मुठभेड़ें बढ़ती गईं तो किसानों की छवि बिगड़ती चली जाएगी।
यदि किसान नेता अपने धरनों और वार्ता के जरिए अपना पक्ष पेश कर रहे हैं तो उन्हें चाहिए कि वे सरकार को भी अपना पक्ष पेश करने दें। लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष को अपनी बात कहने की समान छूट होनी चाहिए। यह स्वाभाविक है कि कड़ाके की ठंड, आए दिन होनेवाली मौतों और आत्महत्याओं के कारण किसानों की बेचैनी बढ़ रही है लेकिन बातचीत के जरिए ही रास्ता निकालना ठीक है। यह समझ में नहीं आता कि सरकार भी क्यों अड़ी हुई है ? या तो रास्ता निकलने तक वह कानून को स्थगित क्यों नहीं कर देती या राज्यों को उसे लागू करने की छूट वह क्यों नहीं दे देती? (नया इंडिया की अनुमति से)
मृणाल पाण्डे-
2021 की शुरुआत में लग रहा है कि शायद 2019 के लोकसभा चुनावों ने देश के लैंडस्केप से पार्टियों का ही नहीं, राजनीति में वैचारिकता, विविधता का भी लगभग सफाया कर दिया है। कई विचारों का घालमेल होते हुए भी कांग्रेस 2014 तक एक लोकतांत्रिक विचार तो थी ही। जीवंत चलती-फिरती लोकतांत्रिकता से जरूरी जन मुद्दों की बाबत जो बहस-मुबाहसे और संसदीय टकराव निकलते हैं, उनके क्षीण ही सही लेकिन प्रामाणिक दर्शन हमको हर बरस संसद सत्रों के दौरान हो ही जाते थे। बड़े उपक्रम, व्यापक मनरेगा जैसी योजनाएं और आईआईटी और एम्स जैसे तकनीकी तथा चिकित्सकीय शिक्षा के उन्नत संस्थान और साहित्य, संगीत, कला वगैरा से जुड़ी अकादमियां तब सरकार के लिए सिर्फ डींग भरी गर्व का विषय नहीं, मूलत: एक उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के हिस्से भी थे। सच है कि कांग्रेस में भीतरी टकराव और गुटबाजी तब भी थी, यह भी संभव है कि चुनाव-दर-चुनाव भीतर खाने जमीनी राजनीति के शातिर राजनीतिक जोड़-तोड़ या भाव-ताव तब भी चलते रहते हों, लेकिन इसमें शक नहीं कि तब तक वैचारिक धरातल पर मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, प्रकाश करात, नरेंद्र मोदी और योगी जी सबके पास अपनी खास वैचारिक जमीन थी। और उसके बूते वे बहुत कुछ ऐसा सार्वजनिक तौर से ऐलानिया कहा, किया करते थे, (मसलन एमएसपी का विरोध, निर्भया रेप कांड के बहाने कानून-प्रशासन की निंदा अथवा स्वास्थ्य या शिक्षा क्षेत्र में सरकारी निवेश का समर्थन), जिसका फायदा उनको 2014 में मिला। पर आज जब वे खुद सत्ता में हैं, लगभग वही काम उसी तर्ज पर वे खुद भी कर रहे हैं। 2019 के बाद से विपक्ष की वैचारिक जमीनें कब्जाने का संघर्ष क्रमश: तीखा और कटु होता गया है। 2021 तक आते-आते सरकार के हर नुमाइंदे को सरकारी काम देश प्रेम का प्रतीक और उससे इतर खड़े नेता या किसी जनांदोलन का सरकार के इकतरफा अहम फैसलों पर सवालिया निशान लगा देना बांझ और देश विरोधी नजर आता है जिसे साम-दाम-दंड-भेद हर तरह से रोकना जायज है।
यह एकाएक नहीं हुआ। 2004 के बाद जब मनरेगा और मिड-डे मील जैसी खर्चीली योजनाओं ने 2009 तक वोटरों, खासकर महिला वोटरों के मर्म को छू लिया था, गरीब लोगों को लगने लगा था कि इनके पीछे एक तरह की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का अहसास है जो अर्थव्यवस्था के खुलने के फायदों को सबसे नीचे की सीढ़ी के वोटर तक आंशिक रूप से ही सही, लेकिन पहुंचाते रहने का एक ठोस चैनल बना रही है। फिर 2014 में वैकल्पिक विचारों का एक बड़ा हाहाकार देश में उठा कर कांग्रेस को पश्चिमोन्मुखी, छद्म लिबरल और छद्म बुद्धिजीवियों को पालने वाली बताते हुए भाजपा नीत गठजोड़ ने दिल्ली का सिंहासन हासिल कर लिया। इसके बाद जो कई दक्षिणपंथी नेता, साधु-साध्वी बानाधारी भाजपा कार्यकर्ता पन्ना प्रमुख आदि बाबरी ध्वंस के बाद के बरसों में हर धार्मिक मेले हरि कथा रामचरित मानस के मोहल्ला स्तरीय अखंड पाठ के समय आपस में सुना-सुना कर कहते थे कि हाय हिंदुत्व खतरे में है, उनको भी मौका मिला कि वे अपने बड़े नेताओं को शत-शत नमन करते हुए अपनी तरह का हिंदू नीत देश रचें। और शेष धर्मावलंबियों का जो हो, यज्ञ, हवन, अखंड आरतियों, कथित वैदिक रूढ़ि-रिवाजों को हिंदुत्व प्रचार का नाम देकर संसद से सड़क तक फैला दिया जाए।
अगर नोटबंदी, हाथरस कांड, कोविड और अब देशव्यापी किसान धरने ने 2014-21 के बीच हर भारतीय के आगे हमारी अर्थव्यवस्था ही नहीं, कानून प्रशासनऔर राजकीय स्वास्थ्य कल्याण सहित संसदीय व्यवस्था का पोलापन न उजागर कर दिया होता, तो हिंदुओं को शायद लगता कि हिंदू भारत उनके लिए सचमुच एक नई तरह की कामधेनु है। पर सरकार ने इधर कोविड की वैक्सीन को लेकर जो घोषणाएं की हैं, जिस तरह जबरन, बिना समुचित परीक्षण के प्रमाण हरी झंडी दे कर कोविशील्ड और कोवैक्सिनको ‘आत्मनिर्भर भारत’ का प्रतीक बता कर उसने साफ कर दिया है कि हिंदू राष्ट्रवादियों में तर्कसंगत वैज्ञानिकता और सही वैचारिक नुस्खे, दोनों नहीं बचे हैं। क्या आज तक बिना जरूरी उपकरणों और चिकित्सकीय परामर्श के, कोई जवान पर्वतारोही भी एवरेस्ट पर चढ़ा है? पर हम हैं कि गंभीर विश्व महामारी से जूझ रहे लाखों मरीजों और उनकी सेवा तथा इलाज करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को ‘आत्मनिर्भर भारत’ और देश प्रेम के नाम पर एक ऐसी वैक्सीन के लिए गिनीपिग बनाए दे रहे हैं जिसके स्नायुतंत्र अथवा ब्रेन पर कोई गंभीर स्थायी दुष्परिणामों की बाबत अभी तक कोई पक्की जानकारियां नहीं हैं। अचरज नहीं कि संयुक्त राष्ट्र संगठन की प्रतिनिधि डॉ. कांग ने सरकार और उसके चिकित्सातंत्र की ऐसी उतावली और रोग निरोधी टीके को इलाज के समतुल्य ठहराने को ‘समझ से परे’ करार दे दिया है।
अब तक यह साफ हो चुका है कि कोविड-19 के रूप में वैज्ञानिक एक नई तरह के वायरस को देख रहे हैं। इसकी सही काट के लिए कारगर रोग निरोधी टीका बनाना हो तो उसके लिए तयशुदा वैज्ञानिक प्रक्रिया में राजनीतिक दबावों की तहत कोई शॉर्टकट निकालना घातक होगा। इसलिए हर वैक्सीन का तीन चरणों में मानवीय वॉलंटियरों पर परीक्षण करना होता है, फिर उसके नतीजों से मिला सारा डेटा पारदर्शी तरीके से अपने पेशे के अन्य विशेषज्ञों से उसको जंचवाना होता है। उनकी स्वीकृति पाने के बाद ही किसी भी दवा का मसौदा कमर्शियल उत्पादन के लिए सरकार को सौंपने का विधान है। सरकार खुद अपने विशेषज्ञों से उनकी संतुष्टि का सबूत मिलने के बाद ही उत्पादन को हरी झंडी देती है। हमारे यहां एक वैक्सीन ऑक्सफॉर्ड एस्ट्रा का भारतीय संस्करण है, जिसका पुणे में पूनावाला सीरम इंस्टीट्यूट ब्रिटिश निर्माताओं के साथ सह-उत्पादन कर रहा है। वह आपात्कालीन दशा में इस्तेमाल के लिए ब्रिटिश सरकार से ब्रिटेन में स्वीकृति पा चुकी है हालांकि1600 वॉलंटियरों पर किए गए उसके तीसरे चरण के प्रयोग का डेटा अभी सार्वजनिक होना है। लेकिन अधिक विवाद हैदराबाद की बायोटेक कंपनी और भारतीय चिकित्सा शोध परिषद द्वारा सह-उत्पादित कोवैक्सीन को लेकर हो रहा है, जिसका तीसरा चरण शुरू भी नहीं हुआ, उसके लिए अभी वॉलंटियर खोजे ही जा रहे हैं। और जिसके पहले दो चरणों का डेटा भी अभी सार्वजनिक होना है।
कोविशील्ड के निर्माताओं का दावा है कि परीक्षण के दौरान उनका कोविड निरोधी टीका 70 फीसदी सफल पाया गया है जबकि भारतीय ड्रग कंट्रोलर जनरल वीजी सोमानी इसे 110 प्रतिशत सेफ बता चुके हैं। कोवैक्सीन को हरी झंडी दिए जाने की बाबत एम्स के प्रमुख डॉ. गुलेरिया का कहना है कि कोवैक्सीन का इस्तेमाल ‘फॉल बैक’ यानी आपात्कालीन स्थिति में बतौर विकल्प ही प्रयोग होगा। लेकिन उन्होंने इसकी संदिग्ध क्षमता की बाबत इतना ही कहा कि उसका प्रयोग किया गया तो सफलता संभव (लाइकली टु) है।
इस बिंदु पर जानकार लोगों के बीच भारत निर्मित वैक्सीनों को लेकर तीन मुख्य चिंताएं हैं। एक, कि रोग निरोधी टीकों का इस्तेमाल उपचार नहीं रोग निरोध के लिए किया जाता है। इसलिए जब रोग उफान पर हो बिना संपूर्ण परीक्षणों से गुजरी वैक्सीन का प्रयोग अगर सही नतीजे न दे, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? वे वैज्ञानिक जो इस पर काम करते रहे हैं, या वे राजनीतिक तत्वजो अपनी नाक बचाने को इसका परीक्षण पूरा होने से पहले इसका भारी मात्रा में उत्पादन जायज बना रहे हैं? दो, कोविशील्ड की बाबत एम्स के प्रमुख का कहना कि उम्मीद है वैक्सीन जब इस्तेमाल होगी तो संभवत: सफल ही होगी, क्या इस बात का परिचायक नहीं कि एक उम्दा अनुभवी चिकित्सक होने के नाते वह उसकी सफलता की पक्की गारंटी देने की बजाय उसे ‘संभावित’ बता रहे हैं। तीन, हमारे ड्रग कंट्रोलर जनरल ऐसे टीके की, जिसे अभी पूरी परीक्षाओं में खरा उतरना बाकी है, जिसका डेटा अपारदर्शी बना हुआ है, 110 प्रतिशत सफल होने की भविष्यवाणी कैसे कर रहे हैं? अगर आज सरीखे नाजुक आपात्काल में भी सरकारें सोच विचार से तलाक लेकर कानून की बजाय सनक, सिद्धांत की बजाय कंपनी विशेष की सिफारिश और जनहित की बजाय अमीरों के प्रति पक्षपात और गरीब गिनीपिगों के लिए दादागिरी दिखाते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे नारे के आधार पर लाखों नाजुक स्वास्थ्य वाले नागरिकों को नए टीके के परीक्षण का गिनीपिग बनाना गलत न मानें, तो इसका साफ मतलब है वे ‘विचार विहीन मही मैं जानी’ की गर्वोक्ति से अपनी छाती फुला रहे हैं।
दुनिया में अगर सबसे अधिक प्रतिगामी कोई चीज़ है, तो वह विचारहीनता ही है। शायद इसी कारण निरंतर चुनावी मोड में रहने वाले राजनेताओं ने ही नहीं, हमारे गोदी मीडिया, सरकारी बाबुओं, वैज्ञानिकों और उद्योग जगत ने भी कोविड की आपदा में पीड़ित जनता के कष्ट निवारण करने की बजाय मसला ए वैक्सीन को अपने लिए कोई रत्न जटित सिंहासन या पंच हजारी ओहदा हथिया ने का नायाब अवसर बना डाला है। (navjivan)
-नवनीत मिश्रा
प्रिय मीडिया के साथियों,
सिविल सर्विसेज का रिजल्ट आने पर एक सावधानी जरूर बरतें। हर सफल उम्मीदवार को सीधे आईएएस मत घोषित करिए। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की पुत्री के आईएएस होने की खबर वायरल है। हिंदी छोड़िए, अंग्रेजी मीडिया ने भी अंजलि के आईएएस होने की खबरें जारी कर दीं। जबकि यह सरासर गलत है। सिविल सर्विसेज में सफल हुआ हर व्यक्ति आईएएस नहीं हो जाता। अंजलि बिरला का नाम सिविल सर्विसेज परीक्षा 2019 की मंगलवार को घोषित हुई रिजर्व लिस्ट में आया है। रिजर्व लिस्ट तब बनती है, जब पहली लिस्ट से वैंकेसी पूरी नहीं होती। इस लिस्ट में मेरिट में आने से छूटे अभ्यर्थियों को मौका मिलता है।
2019 की जिस सिविल सर्विसेज परीक्षा में अंजलि सफल हुईं हैं, उसका परिणाम पिछले साल 4 अगस्त में आया था। तब कुल 829 सफल उम्मीदवारों की पहली सूची जारी हुई थी। अब वैंकेसी के हिसाब से संघ लोक सेवा आयोग ने 89 और सफल अभ्यर्थियों की सूची जारी की है, जिसमें अंजलि 67 वें नंबर पर हैं। अंजलि की रैंक को देखते हुए मुझे लगता है कि उन्हें आईएएस, आईपीएस और आईआरएस भी नहीं बल्कि ग्रुप बी की केंद्रीय सेवाओं में ही मौका मिलने की संभावना है। यहां तक कि पहली लिस्ट के 829 में से आधे से भी ज्यादा अभ्यर्थी आईएएएस, आईपीएस छोड़िए, आईआरएस भी नहीं बन पाए होंगे। ऐसे में दूसरी लिस्ट वाले आईएएस कहां से बन पाएंगे? लेकिन, अंग्रेजी लेकर हिंदी मीडिया ने अंजलि को तत्काल प्रभाव से आईएएस घोषित कर दिया। नतीजा, सब आईएएस होने की बधाई देने लगे। यह मामला अंजलि का नहीं है, हर साल मीडिया इसी तरह भेड़चाल का शिकार होती है।
दोस्तों, अंजलि को क्या काडर मिलेगा, क्या नहीं, यह उनकी मेरिट और कई मानकों के हिसाब से तय होगा। उन्हें आईएएस काडर ही मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हर साल वैकेंसी के हिसाब से सात, आठ, नौ सौ लोग सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सफल होते हैं। लेकिन, सभी आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस ही नहीं बन जाते। सिविल सर्विसेज परीक्षा के माध्यम से इन चार प्रमुख काडर के अतिरिक्त ग्रुप ए और ग्रुप बी की दो दर्जन सेवाओं के लिए भी चयन होता है।
कहने का मतलब है कि CSE में सफलता अलग बात है और IAS, IPS, IFS, IRS... आदि बनना अलग बात है। प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार कुल मिलाकर तीन चरणों में संघ लोक सेवा आयोग की ओर से होने वाली सिविल सर्विसेज परीक्षा में हर साल वैकेंसी के हिसाब से अभ्यर्थी सफल होते हैं। अभ्यर्थियों की रैंक और उनके द्वारा Detailed Application Form (DAF) में बताई गई प्राथमिकता सहित कई मानकों के आधार पर काडर का आवंटन होता है। मेरिट के आधार पर कोई भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएएस) में जाता है तो कोई भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय वन सेवा, भारतीय राजस्व सेवा, भारतीय रेल सेवा आदि में जाता है।
और हां। सिविल सर्विसेज में सफलता अपने आप में बड़ी बात है। इस प्रतिष्ठित परीक्षा से अलग-अलग सेवाओं में लोग चुने जाते हैं। रैंक महज कुछ अंकों का खेल होता है बस। कोई आईएएस बन जाता है तो कोई कुछ और। लेकिन कुछ और बनने वाला आईएएस से कतई कम नहीं होता। लेकिन बिना आईएएस हुए किसी को आईएएस लिखना, क्या गलत नहीं है?
सिविल सर्विसेज को आईएएस का पर्याय मान लेना भी गलत है। आईएएस होना ही सर्वोत्कृष्ट होने की गारंटी नहीं है। कुछ अंकों से चूककर आईपीएस या आईआरएस बनने वाला भी बराबर योग्यता का होता है। ऐसे में मुझे लगता है कि सिविल सर्विसेज को आईएएस होने के नजरिए से देखना बंद करना चाहिए। सिविल सर्विसेज की सभी सेवाओं का बराबर सम्मान करना चाहिए।
अनुरोध है कि अगले साल जब सिविल सर्विसेज का रिजल्ट आएगा तो फिर एडवांस में किसी को IAS- IPS घोषित करने की जगह सिर्फ इतनी सूचना देंगे अमुक ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विसेज परीक्षा में सफलता हासिल की... रैंक के हिसाब से फला काडर मिलने की उम्मीद है.... आदि... आदि। न कि सीधे आप काडर भी रिजल्ट के साथ घोषित कर देंगे। काडर घोषित करने का काम संघ लोक सेवा आयोग और कार्मिक मंत्रालय को करने दीजिए।
ट्रंप के समर्थकों द्वारा कैपिटल बिल्डिंग पर हमला किए जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस में अपने ही समर्थकों की बेरुख़ी का सामना करना पड़ रहा है.
अमेरिका : कई रिपब्लिकन सीनेटर अब उनके समर्थन में खड़े होने को तैयार नहीं हैं और ट्रंप द्वारा नियुक्त किए गए कुछ लोगों ने उस घटना के बाद इस्तीफ़ा दे दिया है.
तय कार्यक्रम के अनुसार, अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को 20 जनवरी के दिन व्हाइट हाउस छोड़ना है और उसी दिन अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन कार्यभार लेंगे.
लेकिन कैपिटल बिल्डिंग में हुई हिंसा के बाद डेमोक्रेट नेता इंतज़ार के लिए तैयार नहीं हैं. वो चाहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप जल्द से जल्द ऑफ़िस खाली करें. साथ ही उन पर दोबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने से रोक लगाई जाए.
अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने शुक्रवार को कहा कि वो ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करेंगी, अगर उन्होंने जल्द से जल्द व्हाइट हाउस छोड़ने की घोषणा नहीं की.
पेलोसी का कहना है कि ट्रंप की बयानबाज़ी के कारण ही हिंसा भड़की जिसमें एक पुलिस अफ़सर समेत पाँच लोगों की मौत हुई.
ट्रंप के ख़िलाफ़ इससे पहले हुई महाभियोग की कार्यवाही के समय जो रिपब्लिकन सीनेटर उनके साथ खड़े थे, उनमें से कई अब उनके साथ नहीं हैं.
हालांकि, वो उनके ख़िलाफ़ जाने को भी तैयार नहीं दिखाई देते - यानी डोनाल्ड ट्रंप अपने लाखों समर्थकों की सहानुभूति खो चुके हैं, भले ही वो अब भी उनके वफ़ादार हों.
वहीं ट्रंप ने यह कसम ली है कि वो उन सभी रिपब्लिकन सीनेटरों के समानांतर नए उम्मीदवार उतारेंगे जिन्होंने संसद में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को चुनौती नहीं दी और बाइडन की जीत को नहीं रोका.

इस्तीफ़े और आशंकाएं
अमेरिकी कैपिटल में ट्रंप समर्थकों द्वारा की गई हिंसा की चौतरफ़ा आलोचना हुई है. कई वफ़ादार रिपब्लिकन नेताओं ने भी इस घटना की खुलकर निंदा की है. आलोचना करने वालों में ट्रंप प्रशासन के कई पूर्व मंत्री और वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक भी शामिल हैं.
कैपिटल हिंसा के बाद, संसद की कार्यवाही में दोनों पार्टियों के नेताओं ने राष्ट्रपति की हरकतों की निंदा की.
डेमोक्रेट नेताओं ने कहा कि ट्रंप को तुरंत दफ़्तर छोड़ देना चाहिए. डेमोक्रेट नेताओं का मानना है कि 'ट्रंप देश के लिए ख़तरा हैं. उनके रुख़ का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है, इसलिए व्हाइट हाउस में उन्हें 11 दिन और देने का कोई मतलब नहीं.'
अगर ट्रंप को वक्त से पहले उनके पद से हटाया गया, तो वे अगला चुनाव नहीं लड़ सकेंगे.
इसके लिए अमेरिका के उप-राष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनाव में उनके पार्टनर रहे माइक पेंस और मंत्रियों को राष्ट्रपति ट्रंप को रिटायर करने की कार्यवाही शुरू करनी होगी.
अमेरिकी संविधान के 25वें संशोधन के तहत ऐसा किया जा सकता है और संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी और सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर पहले ही माइक पेंस को यह क़दम उठाने के लिए कह चुके हैं.
लेकिन पेंस ने अब तक उनकी अपील पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
कुछ लोगों का मानना है कि वे इस योजना का समर्थन भी कर सकते हैं, क्योंकि ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी सांकेतिक रूप से इसका विरोध कर चुके हैं - जैसे कई अधिकारियों ने पिछले दिनों में इस्तीफ़ा दे दिया है.
इससे पहले जब डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही करनी चाही थी, तो ट्रंप कैबिनेट का समर्थन ना मिलने की वजह से वह सफल नहीं हो पायी थी.
लेकिन इस बार स्पीकर नैंसी पेलोसी उनके सहयोगियों से भी बात कर रही हैं. वे उन्हें समझाने की कोशिश कर रही हैं कि ट्रंप के 'एक्शन' ख़तरनाक हैं. उनका कहना है कि ट्रंप एक बड़ा ख़तरा साबित हो सकते हैं.

परमाणु हमले का डर
पेलोसी ने अपने एक पत्र में लिखा है कि उन्होंने अमेरिकी जनरल ऑफ़ स्टाफ़ जनरल मार्क मिली से बात की है कि अगर अस्थिर राष्ट्रपति ट्रंप किसी युद्ध का आदेश देते हैं या परमाणु हमले का आदेश देते हैं तो क्या होगा?
इस पर जनरल ने क्या जवाब दिया, सार्वजनिक रूप से इसकी कोई जानकारी नहीं है.
नेन्सी पेलोसी की चेतावनी के अनुसार, अगर ट्रंप इस सप्ताह में व्हाइट हाउस नहीं छोड़ते हैं, तो अगले कुछ दिनों में ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही शुरू हो सकती है.
संसद के निचले सदन में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत है जो ट्रंप के ख़िलाफ़ इस कार्यवाही को शुरू कर सकता है, और अगर ऐसा हुआ, तो ट्रंप अकेले अमेरिकी राष्ट्रपति होंगे जिनके ख़िलाफ़ दो बार महाभियोग की कार्यवाही होगी.
लेकिन सीनेट में अब भी डेमोक्रेटिक पार्टी के पास इतने वोट नहीं हैं कि बिना रिपब्लिकन नेताओं के समर्थन के उनके ख़िलाफ़ यह कार्यवाही पूरी की जा सके.
सीनेट में जो नेता ट्रंप के रवैये से नाखुश भी हैं, उन्हें भी ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की कोई जल्दी नहीं है.
साल 2019 में जब डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा इसी तरह की कार्यवाही की कोशिश की गई थी, तो रिपब्लिकन सीनेटरों ने इसका खंडन किया था. अब उनमें से अधिकांश सीनेटर शांत हैं और कुछ खुलेतौर पर कह रहे हैं कि कैपिटल बिल्डिंग वाली घटना में ट्रंप की कोई ग़लती नहीं थी.
'ट्रंप को हटाकर फ़ायदा कम, नुक़सान ज़्यादा'
साउथ कैरोलाइन से रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा है कि "कार्यकाल के अंतिम दिनों में अगर ट्रंप के ख़िलाफ़ कार्यवाही की गई, तो उससे फ़ायदा की जगह नुकसान ही होगा. मुझे उम्मीद है कि जो बाइडन इसका आकलन करेंगे कि इससे कितना नुकसान हो सकता है."
कुछ अन्य रिपब्लिकन नेताओं ने भी यही तर्क दिया है.
रिपब्लिकन नेताओं का कहना है कि अंतिम दिनों में ट्रंप के ख़िलाफ़ कार्यवाही शुरू करने से देश और विभाजित होगा.
राष्ट्रपति ट्रंप ख़ुद को राष्ट्रपति चुनाव का विजेता बताते आये हैं और वे बार-बार यह दावा करते हैं कि चुनावों में धांधली हुई. हालांकि, अब तक उनके द्वारा कोई पुख़्ता सबूत पेश नहीं किया गया है.
उनके समर्थक भी उनकी बात पर विश्वास कर रहे हैं. उनके समर्थकों ने लोकतंत्र बचाओ के नारे के साथ अमेरिका के कई राज्यों में प्रदर्शन किये हैं और उनका कहना है कि 'चुनाव में चोरी से उनके नेता को हराया गया.'
अमेरिकी संसद ने नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को राष्ट्रपति चुनाव में उनकी जीत का सर्टिफ़िकेट तो दे दिया है, लेकिन अगले कुछ दिन यह तय करेंगे कि राष्ट्रपति ट्रंप की विदाई व्हाइट हाउस से कैसे होने वाली है.(bbc.com/hindi)
-ध्रुव गुप्त
दक्षिण भारत से आने वाली हिंदी फिल्मों की सबसे मधुर और संजीदा आवाज येशु दास अपनी तरह के बिल्कुल अलग-से गायक रहे हैं। ऐसे गायक जिनके सुर गले से नहीं, रूह से उठते हैं। हिंदी सिनेमा को आए न बालम का करूं सजनी, जब दीप जले आना, मधुबन खुशबू देता है, तू जो मेरे सुर में सुर मिला दे, दिल के टुकड़े-टुकड़े कर के मुस्कुरा के चल दिए, चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा, तुम्हें देखकर जग वाले पर यकीं नहीं क्योंकर होगा, ऐ मेरे उदास मन चल दोनों कहीं दूर चलें, गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखा है, जानेमन जानेमन तेरे दो नयन, आज से पहले आज से ज्यादा ख़ुशी आजतक नहीं मिली, चांद अकेला जाए सखी री, कोई गाता मैं सो जाता, कहां से आए बदरा, माना हो तुम बेहद हसीं, काली घोड़ी द्वार खड़ी, सुरमई आंखों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे जैसे सैकड़ों बेहतरीन गीत देने वाले काट्टश्शेरि जोसफ़ येशुदास अपनी आवाज की शास्त्रीयता और दिल में उतर जाने वाली सादगी के लिए जाने जाते हैं। संगीतकार सलिल चौधरी के साथ फिल्म ‘आनंद महल’ के गीत ‘आ आ रे मितवा’ से हिंदी सिनेमा में शुरूआत करने वाले येशुदास देश के पहले गायक हैं जिन्होंने हिंदी, संस्कृत, मलयालम, तमिल, तेलगु, कन्नड़, गुजराती, मराठी, उडिय़ा, पंजाबी, अंग्रेजी, लैटिन, रूसी और अरबी भाषाओं में पचपन हज़ार से ज्यादा गीत गाए हैं। इतना सब कुछ हासिल करने के बावज़ूद उनकी एक तमन्ना रह गई कि वो केरल के मशहूर गुरुवायुर मन्दिर में बैठकर कृष्ण की स्तुति गाएं। मन्दिर के नियमों के अनुसार ईसाई येशुदास को कभी भी मन्दिर में प्रवेश नही मिल सका। येशुदास को उनकी बेमिसाल गायिकी के लिए 7 राष्ट्रीय और 43 अन्य पुरस्कार हासिल हैं।
पश्चिमी संगीत के शोर में अरसे से हिंदी सिनेमा के परिदृश्य से ओझल येशुदास के जन्मदिन (10 जनवरी) पर उनके सुरीले जीवन की शुभकामनाएं!
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सरकार और किसानों का आठवाँ संवाद भी निष्फल रहा। इस संवाद के दौरान जऱा साफगोई भी हुई और कटुता भी बढ़ी। थोड़ी देर के लिए बातचीत रुक भी गई। सरकार के मंत्रियों और किसान नेताओं ने अपनी-अपनी स्थिति का बयान दो-टूक शब्दों में कर दिया।
सरकार ने कह दिया कि वह तीनों कानून वापस नहीं लेगी और किसानों ने कह दिया कि यदि कानून वापस नहीं होंगे तो किसान भी वापस नहीं जाएंगे। धरने पर डटे रहेंगे। बल्कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में एक लाख ट्रेक्टरों की परेड करेंगे। किसानों ने इन कानूनों में संशोधन के लिए एक संयुक्त कमेटी के सरकारी प्रस्ताव को भी रद्द कर दिया है। जितना समय बीतता जा रहा है, हरियाणा और पंजाब के इन किसानों की तकलीफें बढ़ती जा रही हैं। भयंकर ठंड में किसानों की मौत की खबरें रोज आ रही हैं। लेकिन उन्होंने अहिंसक सत्याग्रह का अनुपम उदाहरण पेश किया है।
संतोष का विषय है कि इन दोनों प्रांतों के किसान काफी मालदार और दमदार हैं। उन्होंने धरनाधारी किसानों, आढ़तियों और अपने मजदूरों के लिए दिल्ली की सीमा पर क्या-क्या सुविधाएं नहीं जुटाई हैं।
यदि उन्हें यहां कुछ माह तक और टिकना पड़ेगा तो वे टिक पाएंगे। वे यदि इसी तरह से शांतिपूर्वक टिक रहते हैं तो टिके रहें। दो-चार माह में तंग आकर वे अपने आप लौट जाएंगे। लेकिन यदि उन्होंने रास्ते रोके, तोड़-फोड़ की और यदि वे हिंसा पर उतारु हो गए तो सरकार को मजबूरन सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी। वैसी हालत में किसानों की जायज़ मांगें भी हवा में उड़ जाएंगी और जनता के बीच उनके प्रति जो थोड़ी-बहुत आत्मीयता दिखाई पड़ रही है, वह भी खत्म हो जाएगी। भारत का मुर्दार प्रतिपक्ष कुछ बड़बड़ाकर चुप हो जाएगा। इस कानून को बनाते वक्त सरकार ने जो लापरवाही बरती थी, वह भी जनता की नजऱों से ओझल हो जाएगी। कुुछ किसान नेताअेां का यह अहंकार कि वे संसद को भी अपने चरणों में झुकाकर रहेंगे, उन्हें काफी भारी पड़ सकता है। अब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आनेवाले फैसले को भी मानने से मना कर दिया है तो इसका अर्थ क्या है?अदालत में कौन गया है? सरकार या किसान? खुद किसान नेता गए हैं। इसके बावजूद किसान नेता सरकार पर तोहमत लगा रहे हैं कि वह अदालत के जरिए किसानों को दबाना चाहती है। मु_ी भर किसान नेताओं का यह अहंकार और दुराग्रह देश के अन्नदाताओं को नुकसान पहुंचाए बिना नहीं रहेगा। उन्हें संयम और विवेक से काम लेना होगा। देश के ज्यादातर गरीब और साधनहीन किसान दिल्ली में चल रही इन मालदार किसान नेताओं की इस नौटंकी पर हतप्रभ हैं। देश के 94 प्रतिशत गरीब किसानों की हालत सुधरे और हमारी खेती 4-6 गुना ज्यादा उत्पादन करे, इस लक्ष्य पर सरकार और किसानों को आज गहरा संवाद करने की जरुरत है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-ईश्वर सिंह दोस्त
सवाल एक ट्रंप का नहीं है। उसके पीछे लाखों श्वेत अमेरिकी खड़े हैं। सवाल श्वेत चौधराहट का भी नहीं है। उसके पीछे अमेरिका के शीर्ष कॉर्पोरेट पूँजीपतियों की ताकत खड़ी है। इसलिए अमेरिकी संसद भवन केपिटल पर हमले का खेल खत्म नहीं हुआ है। यह अभी शुरू हुआ है। निश्चित ही अभी ट्रंप समर्थक एक कदम पीछे हो जाएंगे, ताकि भविष्य में लोकतंत्र को नष्ट करने के लिए दो कदम बढ़ाने का मौका खुला रहे।
यह लंबे समय चलने वाली रस्साकशी होगी। लोकतंत्र के खेमे में जो अब हैं, उन्हें यह समझना होगा कि रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ ट्रंप का सनकीपन नहीं है, जिसे पिछले साल भर से अमेरिका के ही कुछ शीर्ष मनोवैज्ञानिक उनकी तेजी से गिरती हुई मानसिक स्थिति बता रहे हैं।
रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ रिपब्लिकन पार्टी नहीं है, जो ट्रंप और उसके एजेंडे को सर आँखों पर बैठाए हुए थी। रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ पगलाई हुई श्वेत जनसंख्या नहीं है। जो पिछले चार सालों से नस्लीय नफरत और प्रतिहिंसा की आग में जल रही है। रस्सी के दूसरी तरफ सिर्फ अंधाधुंध मुनाफे के लालच में अंधे हो चुके चंद कॉर्पोरेट पूँजीपति नहीं हैं।
बल्कि देखना यह होगा कि रस्सी के दूसरी तरफ पूँजीवाद और लोकतंत्र की बढ़ती रार भी है। रस्सी के दूसरे तरफ महामंदी के भँवर में फँसी पूँजीवादी पद्धति भी है, जो नवउदारवादी भूमंडलीकरण के नाकाम होने के बाद से बौराई हुई है। रस्सी के दूसरी तरफ बढ़ती विषमता के बीच लोकतंत्र के असुरक्षित होने व अस्मिताओं की अफीम के सुलभ होने की दास्तान भी है।
ट्रंप तो मुफ्त में बदनाम है। हकीकत यह है कि ट्रंप के झूठ अकेले ट्रंप के झूठ नहीं हैं। वे अमेरिका की बहुसंख्यक श्वेत जनसंख्या के झूठ भी हैं। वह झूठ सुनना चाहती है। वह झूठ दोहराना चाहती है। वह झूठ जीना चाहती है। वह कह रही है कि मैं जो कहूं वही कानून है और मैं जो करूं वही व्यवस्था है। तभी तो जो पुलिस कुछ महीनों पहले यहीं हुए फ्लायड लायड के समर्थन में हुई रैली के समय चाक-चौबंद थी, कैपिटल पर हुए हमले में अनमनी सी थी।
भीड़ के खत्म होने के बाद पुलिस नहीं है बल्कि भीड़ और पुलिस की विभाजक रेखा धुंधली हो गई है। अमेरिका की पुलिस इसके पहले भी चाहे लाख नस्लीय झुकाव वाली हो, मगर केपिटल के चौराहे पर उभरी यह नई पुलिस है, जिसके साथ बाइडन और हैरिस को अपना राज चलाना होगा। यह सोचना भयंकर भूल होगी कि अमेरिका की लोकतांत्रिक संस्थाएं इतिहास की काल गति से निरपेक्ष रहकर मजबूत बनी खड़ी रहेंगी। ये संस्थाएं जिस प्रतियोगी पूँजीवाद के दौर की उपज थी, वह अब नहीं है। ये संस्थाएं जिस पूँजीवादी उदारवाद के दौर की उपज थी, वह अब नवउदारवाद में तब्दील हो चुका है।
उदारवादी लोकतंत्र की इबारतों की दुनिया भर में रोज धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। दुनिया भर में देशों के संविधान कांप रहे हैं और डोल रहे हैं। बाइडन और हैरिस अमेरिकी संविधान को तब तक नहीं बचा पाएंगे, जब तक कि उनके पास लोकतंत्र से ऊब चले कार्पोरेट को खुश करने और साथ ही हावी न होने देने की रणनीति नहीं होगी।
यहां एक और लोकतंत्र भारत का ही उदाहरण लें। 2014 में मनमोहन सरकार ने जनता का विश्वास खोने से कहीं पहले भारत के कॉर्पोरेट जगत का विश्वास खो दिया था। वे मनरेगा, शिक्षा अधिकार, खाद्य सुरक्षा जैसे कदमों से बेचैन हो गए थे। उन्हें लगने लगा था कि देश के पैसे देश की जनता के लिए ही खर्च होंगे तो फिर हमारा क्या होगा।
मनमोहन सरकार के एक हाथ में नवउदारवाद का फंडा और दूसरे में नव-नेहरूवाद का मिनी झंडा था। कॉर्पोरेट उद्विग्न था कि इसके दोनों हाथों में नवउदारवाद का फंडा क्यों नहीं है। बेचैन कॉर्पोरेट ने नफरत की राजनीति को समर्थन का दांव खेला।
यही अमेरिका और दुनिया के तमाम देशों में हुआ था। अति दक्षिण यूं ही मजबूत नहीं हुआ है। यूं ही पिछले साल जर्मनी की संसद पर ऐसा ही हमला नहीं हो गया था।
दुनिया भर में तमाम देशों में जो पहचानें बहुसंख्या में हैं या आर्थिक व सामाजिक रूप से ज्यादा मजबूत हैं, उनमें एक तरह का पीडि़तवाद पैदा कर दिया गया है। वे सोचने लगे हैं कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय उन्हें पीडि़त बनाए रखने के कायदे-कानून हैं। कॉर्पोरेट भी नए कानून चाहता है, नई व्यवस्था चाहता है। ये ताकतवर ‘पीडि़त’ भी नए कानून चाहते हैं, नई व्यवस्था चाहते हैं।
कॉर्पोरेट पूँजी का एजेंडा सिर्फ मेहनतकशों या किसानों के भविष्य को ही नहीं बल्कि छोटे पूँजीपतियों, मध्यवर्ग व व्यापारियों के भविष्य को भी नष्ट करता है, इसीलिए बिना नफरत के रसायन के उसके साथ भीड़ नहीं जुड़ती।
इसलिए जो बड़ा सवाल है वह यह है कि ताकतवरों के पीडि़तवाद से लोकतंत्र को कैसे बचाया जाए।
सवाल यह है कि लोकतंत्र और नवउदारवाद की चूहा-बिल्ली जैसी दुश्मनी कैसे खत्म हो? अब या तो लोकतंत्र को झटका लगेगा या फिर नवउदारवाद को!
यह भी ख्याल रखना होगा कि कथित समाजवादी देशों का राजकीय पूँजीवादी मॉडल या सामाजिक पूँजीवादी मॉडल या फिर चीन जैसा अर्ध राजकीय- अर्ध नवउदारवादी मॉडल विकल्प नहीं है। लोकतंत्र में उसकी कोई रुचि नहीं है।
कथित समाजवादी देशों में औंधे मुँह पड़े मार्क्स को कोई सीधा करेगा या फिर कोई नई सोच आएगी? रास्ता कहाँ से मिलेगा? वाशिंगटन के कैपिटल से नवउदारवादी नफरत व लोकतंत्र की टक्कर की लाइव रिपोर्ट के बीच में ही यह सब भी सोचना समझना होगा।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
डोनाल्ड ट्रंप ने सिद्ध कर दिया है कि वह अमेरिका के कलंक हैं। अमेरिका के इतिहास में राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कुछ विवाद कभी-कभी जरूर हुए हैं लेकिन इस बार ट्रंप ने अमेरिकी लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। उन्होंने चुनाव परिणामों को रद्द करते हुए यहां तक कह दिया कि वे व्हाइट हाउस (राष्ट्रपति भवन) खाली नहीं करेंगे। वे 20 जनवरी को जो बाइडन को राष्ट्रपति की शपथ नहीं लेने देंगे। उनके इस गुस्से को सारी दुनिया ने तात्कालिक समझा और उनके परिवार के सदस्यों की सलाह पर वे कुछ नरम पड़ते दिखाई पड़े लेकिन अब जबकि अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के दोनों सदन बाइडन के चुनाव पर मोहर लगाने के लिए आयोजित हुए तो ट्रंप के समर्थकों ने जो किया, वह शर्मनाक है।
वे राजधानी वाशिंगटन में हजारों की संख्या में इक_े हुए और उन्होंने संसद भवन पर हमला बोल दिया। उत्तेजक नारे लगाए। तोडफ़ोड़ की। धक्का-मुक्की की और गोलियां भी चलाईं। चार लोग मारे गए। एक महिला को पुलिस की गोली लगी। भीड़ ने इतना आक्रामक रुख अपनाया कि सांसदों ने एक बंद पड़े भवन में घुसकर अपनी जान बचाई। इन लोगों को भडक़ाने की जिम्मेदारी डोनाल्ड ट्रंप की ही है, क्योंकि वे व्हाइट हाउस में बैठे-बैठे अपनी पीठ ठोंकते रहे। खुद उनके बीच नहीं गए।
ट्रंप की इस घनघोर अराजक वृत्ति के बावजूद अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने बाइडन और कमला हैरिस की जीत पर अपनी मुहर लगा दी। उन विवेकशील रिपब्लिकन सांसदों पर हर लोकतंत्रप्रेमी गर्व करेगा, जिन्होंने अपने नेता ट्रंप के खिलाफ वोट दिया। ट्रंप तुरंत समझ गए कि उनकी अपनी पार्टी के नेता उनका विरोध कर रहे हैं। अब उन्हें राष्ट्रपति भवन में कोई टिकने नहीं देगा। उनकी हवा खिसक गई। उन्होंने हारकर बयान जारी कर दिया है कि 20 जनवरी को सत्ता-परिवर्तन शांतिपूर्वक हो जाएगा लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि उनका असली संघर्ष अब शुरू होगा।
वे ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि उन्होंने अपने चार साल के कार्यकाल में मानसिक रुप से अमेरिका के दो टुकड़े कर दिए हैं। दूसरे शब्दों में बाइडन की राह में अब वे कांटे बिछाने की कोशिश जमकर करेंगे। अमेरिका के लिए बेहतर यही होगा कि रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप को बाहर का रास्ता दिखा दे।
जिन रिपब्लिकन सांसदों ने इस वक्त ट्रंप की तिकड़मों को विफल किया है, यदि वे पहल करेंगे तो निश्चय ही अमेरिकी लोकतंत्र गड्ढे में उतरने से बच जाएगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-एंथनी जर्चर
इस तरह से ट्रंप का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है. किसी शोर से नहीं, एक धमाके से.
कई हफ़्तों से डोनाल्ड ट्रंप छह जनवरी का ज़िक्र कर रहे थे. उन्होंने अपने समर्थकों से राजधानी वाशिंगटन डीसी आने और संसद को चुनौती देने को कहा था. इसके अलावा उन्होंने उप-राष्ट्रपति माइक पेंस को नवंबर के चुनावी नतीजों को ख़ारिज करने को कहा था.
बुधवार की सुबह राष्ट्रपति और उनके तैयार वक्ताओं ने शुरुआत की.
राष्ट्रपति के निजी वकील रूडी जियुलियानी ने चुनावी विवाद को 'ट्रायल बाय कॉम्बेट' से सुलझाने की बात कही.
ट्रंप के सबसे बड़े बेटे का अपनी पार्टी के सदस्यों के लिए भी संदेश था.
उन्होंने कहा, "ये उनकी रिपब्लिकन पार्टी नहीं है. ये डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी है."
उसके बाद राष्ट्रपति ने बढ़ती भीड़ को व्हाइट हाउस से दो मील दूर संसद भवन की ओर मार्च करने के लिए उकसाया. राष्ट्रपति के उकसाने पर भीड़ 'चोरी रोको', 'बकवास' जैसे नारे लगा रही थी.
राष्ट्रपति ने कहा, "हम कभी हार नहीं मानेंगे. हम कभी हार स्वीकार नहीं करेंगे. हमारे देश ने बहुत सहन कर लिया. अब और नहीं."
जैसे ही राष्ट्रपति का भाषण ख़त्म होने लगा, एक अलग तरह का ड्रामा संसद के अंदर ही शुरू हो गया जहां सदन के साझा सत्र में हर राज्य के नतीजे रखे जाने लगे.
पहले पेंस ने बयान दिया कि उनके पास ज़्यादा शक्तियां नहीं हैं और उनकी भूमिका प्रक्रिया निभाने के तौर पर ज़्यादा है.
उसके बाद रिपब्लिकन नेताओं ने एरिज़ोना के चुनाव पर अपनी पहली आपत्ति पेश की और इसके बाद सदन में अलग-अलग चर्चा शुरू हुई कि वहां जो बाइडन की जीत को स्वीकार किया जाए या नहीं.
सदन की कार्यवाही में काफ़ी हंगामा रहा, दोनों पक्ष के लोग अपने अपने स्पीकरों की टिप्पणियों पर ख़ुशी मना रहे थे.
नई निर्वाचित सांसद लॉरेन बोबर्ट ने कहा, "पिछले रविवार को जो मैंने संविधान की सुरक्षा और समर्थन की शपथ ली है, उसकी वजह से मेरे लिए ये ज़रूरी है कि मैं ग़लत बात पर आपत्ति जताऊं."
"मैं लोगों को नज़रअंदाज़ नहीं होने दूंगी."
सीनेट में अलग ही स्वर में बहस चल रही थी. सीनेट के बहुमत नेता मिच मैक्कॉनल काले रंग के सूट और टाई में थे जो किसी अंतिम क्रिया के लिए फिट बैठती है. वे डोनाल्ड ट्रंप को 'दफ़नाने' आए थे, उनकी तारीफ़ करने नहीं.
उन्होंने कहा, "अगर इस चुनाव को हारे हुए पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों के आधार पर ही ख़ारिज कर दिया जाएगा तो हमारा लोकतंत्र मौत के कुएं में दाख़िल हो जाएगा."
"इसके बाद कोई ऐसा चुनाव नहीं दिखेगा जिसे पूरा देश स्वीकार करेगा. हर चार साल में किसी भी हाल में सत्ता के लिए ऐसी छीना-झपटी होगी."
ड्रामा रूक-रूक कर शुरू हुआ. टीवी के कैमरों ने प्रदर्शनकारियों की संसद भवन की सीढ़ियों पर नाचने और झंडे लहराने की तस्वीरें दिखाई. सोशल मीडिया पर बिल्डिंग में घुसे दंगाइयों की फ़ोटो और वीडियो आने लगीं जो निर्वाचित सदस्यों के दफ्तरों में घुसने की कोशिश कर रहे थे, उनके साथ सुरक्षा अधिकारियों को संसद के निचले सदन में बंदूक़ें निकालने की तस्वीरें भी सामने आई.
विलमिंगटन, डेलावेयर में राष्ट्रपति-इलेक्ट जो बाइडन ने अर्थव्यवस्था पर अपने तय भाषण को हटाया और वाशिंगटन में हो रही 'बग़ावत' की निंदा की.
उन्होंने कहा, "इस वक़्त हमारे लोकतंत्र पर अभूतपूर्व हमला हो रहा है जो हमने आधुनिक युग में कभी नहीं देखा. स्वतंत्रता की पहचान संसद पर हमला."
उन्होंने अंत में ट्रंप को चुनौती देते हुए कहा कि वे टीवी पर जाकर हिंसा की निंदा करें और इसे रोकने की माँग करें.
कुछ मिनट बाद ही ट्रंप ने देश के नाम अपना संदेश दिया लेकिन ये वो नहीं था जो बाइडन ने सुझाया था.
उसकी बजाय चुनाव को लेकर उनकी पुरानी शिकायतों को बताते हुए उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि 'घर जाइए, हम आपसे प्यार करते हैं, आप बहुत ख़ास हैं.'
ट्रंप के सोशल मीडिया पर प्रतिबंद्ध
ये उसी तरह था जैसे ट्रंप ने अपने समर्थकों के अपराधों पर हमेशा प्रतिक्रिया दी है. चाहे समर्थकों की रैली में हिंसा हो, या शार्लेटविले में व्हाइट सुपरमेसिस्ट रैली में झड़प के बाद 'दोनों तरफ़ के अच्छे लोग' वाला बयान या बाइडन के साथ उनकी पहली डिबेट में घोर-दक्षिणपंथी लड़कों के ग्रुप को उनका 'स्टैंड बैक स्टैंड बाय' वाला संदेश.
ट्रंप के दो ट्वीट, जिसमें वे अपने समर्थकों की तारीफ़ कर रहे हैं, उन्हें ट्विटर ने हटा दिया और 12 घंटे के लिए राष्ट्रपति का अकाउंट भी लॉक कर दिया जो पहले कभी नहीं हुआ था.
फ़ेसबुक ने भी ऐसा ही किया और ट्रंप को पूरे दिन के लिए प्रतिबंधित कर दिया.
ट्रंप के कार्यकाल में पहली बार, उनके सोशल मीडिया से लंबे क़रीबी रिश्ते में पहली बार ट्रंप को चुप करवाया गया.
अगर ये पल डोनाल्ड ट्रंप के लिए 'तुम में कोई शर्म बची है या नहीं' वाला पल है तो ये ऐसे आ रहा है जहां एक तरफ़ कैपिटल में ख़ून और टूटे कांच साफ़ किये जा रहे हैं.
दोपहर से शाम हो गई और आख़िरकार जब पुलिस संसद भवन को सुरक्षित करने में कामयाब हुई तो दाएं बाएं से हिंसा के विरोध में स्वर उठने लगे.
ये जानकर हैरानी नहीं होगी कि चक शूमर जैसे डेमोक्रेट्स ने हिंसा का दोष ट्रंप पर मढ़ा.
उन्होंने कहा, "छह जनवरी अमेरिका के इतिहास में सबसे काले दिनों में से एक होगा. ये हमारे देश को एक अंतिम चेतावनी है कि लोगों की भावनाओं को भड़काने वाले उस राष्ट्रपति की वजह से, उसका साथ देने वालों की वजह से, उसे मानने वालों की वजह से और उसके झूठ को बार-बार दोहराने वाली ग़ुलाम मीडिया की वजह से क्या परिणाम हो सकते हैं जो अमेरिका को बर्बादी के रास्ते पर धकेल रहा है."

रिपब्लिकन भी कर रहे हैं ट्रंप की आलोचना
ग़ौरतलब है कि रिपब्लिकन भी कुछ ऐसा ही कह रहे हैं.
ट्रंप की आलोचक और रिपब्लिकन सांसद लिन चिनेय ने ट्वीट किया, "अपना संवैधानिक फ़र्ज़ निभाने से रोकने के लिए अभी संसद में हमने एक हिंसक भीड़ का हमला देखा. इस बात पर कोई सवाल नहीं कि राष्ट्रपति ने ही ये भीड़ बनाई है, भीड़ को उकसाया है और इस भीड़ को संबोधित किया है."
लेकिन सिर्फ़ ट्रंप के आलोचक ही नहीं, अक्सर उनका साथ देने वाले सांसद टॉम कॉटन ने भी उनके ख़िलाफ़ बोला है.
उन्होंने कहा, "अब काफ़ी वक़्त हो चुका है कि राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को स्वीकार कर लें, अमेरिका के लोगों को भ्रमित करना छोड़ दें और हिंसक भीड़ को ख़ारिज करें."
मिलानिया ट्रंप की स्टाफ़ प्रमुख स्टेफ़नी ग्रीशम और व्हाइट हाउस की डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी साराह मैथ्यूस ने विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया. ऐसी भी ख़बरें आ रही हैं कि अगले 24 घंटे में कई प्रशासनिक अधिकारी इस्तीफ़ा दे सकते हैं.
सीबीएस न्यूज़ के मुताबिक़ ट्रंप के कैबिनेट अधिकारी अमेरिकी संविधान के 25वें संशोधन पर चर्चा कर रहे हैं जिसमें प्रावधान है कि कैसे उप-राष्ट्रपति और कैबिनेट राष्ट्रपति को अस्थायी तौर पर हटा सकती है.
चाहे उप-राष्ट्रपति पेंस और कैबिनेट इस पर आगे बढ़ें न बढ़ें लेकिन ट्रंप का कार्यकाल दो हफ़्तों में ख़त्म हो जाएगा. इस वक़्त रिपब्लिकन नेताओं के सामने भविष्य को लेकर सवाल है जहां वे सत्ता खो चुके हैं, व्हाइट हाउस खो चुके हैं और एक पूर्व राष्ट्रपति है जिसकी छवि बुरी तरह ख़राब हो चुकी है लेकिन फिर भी पार्टी के सपोर्ट बेस के एक तबक़े पर उसका अच्छा प्रभाव है.
ट्रंप की चुप्पी
बुधवार की घटनाओं के बाद पार्टी की दिशा के लिए एक लड़ाई शुरू हो सकती है क्योंकि पार्टी के अंदर के लोग ही ट्रंप और उनके वफ़ादारों से नियंत्रण छीनने की कोशिश कर रहे हैं.
आज मैक्कॉनल की टिप्पणियों से भी ये नज़र आता है. इसके अलावा यूताह के सांसद और पूर्व राष्ट्रपति उम्मीदवार मिट रोमनी भी नेतृत्व की भूमिका में आ सकते हैं.
इन लोगों को पार्टी के दूसरे लोगों से चुनौती मिल सकती है जो ट्रंप की लोकलुभावन राजनीति पर दावा करने में दिलचस्पी रखते हैं.
ग़ौर करने वाली बात है कि सबसे पहले सीनेट में चुनाव नतीजों को चुनौती देने की घोषणा करने वाले मिसूरी के सांसद जॉश हॉले अपनी आपत्ति से पीछे नहीं हटे, तब भी नहीं जब कैपिटल में हिंसा होने के बाद सीनेट की कार्यवाही शुरू हुई.
संकट एक राजनीतिक मौक़ा लेकर आता है और बहुत से नेता हैं जो इसका फ़ायदा उठाने से चूकेंगे नहीं.
बहरहाल, ट्रंप अब भी सत्ता में हैं. हालांकि फ़िलहाल वे चुप होंगे, व्हाइट हाउस में अपने सोशल मीडिया के बिना बैठ कर टीवी देख रहे होंगे लेकिन वे देर तक चुप नहीं रहेंगे.
और एक बार जब वे अपने नए फ्लोरिडा वाले घर के लिए निकल जाएंगे, वे हिसाब चुकता करने की योजना पर काम करना शुरू कर सकते हैं और शायद दोबारा सत्ता में आएं तो एक विरासत बना पाएं जो फ़िलहाल बर्बाद हो चुकी है.(https://www.bbc.com/hindi)
-सतीश जयसवाल
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध बाँस गायक-वादक हमारे जानते, देखते में इतिहास की बात होते जा रहे है।उनके साथ उनका "बाँस" भी।यह "बाँस" वस्तुतः बांसुरी का ही एक रूप है।छत्तीसगढ़ का बिल्कुल अपना।खूब लम्बी बांसुरी,जिसे बजाने के लिए उतनी ही लम्बी और दमदार साँस भी चाहिए।जो "बाँस" को भर सके।
बिलासपुर के चकरभाठा एयरपोर्ट से लगे हुए एक गांव- अचानकपुर के पंजूराम बरेठ के पास इतनी लंबी और दमदार साँस है।यह साँस उसे अपने पिता से विरासत में मिली है।इस लम्बी साँस के साथ उसके पिता का बनाया हुआ, कलात्मक "बाँस वाद्य" भी उसे विरासत में मिला है।अब यह विरासत 100 बरस से भी पुरानी हो चुकी।
खुद पंजूराम 60 पार कर चुका।और जुठेल राम बरेठ, उसके पिता ने जब उसे सौंपा था तब वह सत्तर पार कर चुके थे। या, शायद इससे भी अधिक। जुठेल राम, उसके पिता अब नहीं रहे। अब 10 बरस से अधिक हुए।
जुठेल राम ने अपना "बाँस वाद्य" खुद बनाया था।उसकी कलात्मक सजावट भी खुद ही की थी।पंजूराम ने उसे ही सम्हाल कर रखा है।और उसे ही बजाता है।लेकिन उसके पिता ने उसे "बाँस" वादन-गायन के साथ बनाना और सजना भी सिखाया था।छत्तीसगढ़ के यदुवंशी राउत बाँस गायन-वादन के साथ इसके बनाने-कलात्मक सजावट में भी पारंगत होते हैं।एक तरह से यह कला उनकी अपनी जातिगत परम्परा है।
जुठेल राम भी यादव ही था।लेकिन उसने अपनी जाति से बाहर एक बरेठ स्त्री से विवाह किया।बाहर होकर खुद भी बरेठ हो गया।अब उसका वंश भी बरेठ ही हुआ।लेकिन जब तक वह रहा, बाँस गायन की शान बनकर रहा।
बाँस वादन और गायन साथ चलते हैं। यह गायन पारंपरिक धुन में चलता है।ऐसे ही यहाँ की कोई पारंपरिक लोक गाथा भी इसके साथ-साथ चलती है। और लोक-संगीत का अनोखा रूप रचती है।
अब पंजूराम अपने पिता की स्मृतियों की कोई एक गाथा अपने भीतर समाये किसी ना किसी पारंपरिक लोक-गाथा को बाँस गीत की धुन में बांधता, रोजाना गांव से शहर आता है।और दिन भर घूमता है। रोजी-रोटी ढूंढता है। फिर लौट जाता है।
हाँ, अपने पिता और उनके पिता की वंशगत कला-परंपरा के साथ अपने बाँस की कलात्मक सजावट और खुद अपनी आकर्षक रंगीन पोषाक और वही रौबदार घनी मूँछें भी सम्हाले हुए है।और शहर के लिए खुद को दर्शनीय बनाये हुए है।
ऐसे में भी कोई सुनने वाला मिल जाये तो वहां घर में,शाम का चूल्हा जल सके।वैसे प्रति माह 300 रुपयों की सरकारी पेंशन का भी एक सहारा है।
-गिरीश मालवीय
दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर का फायदा हो जाता है। देश में कोरोना वैक्सीन के इमरजेंसी यूज का अप्रूवल पाने वाली दोनों बड़ी फार्मा कंपनियां, भारत बायोटेक के CEO ओर सीरम इंस्टीट्यूट के CEO आपस में भिड़ गए, ओर हम जैसे तथाकथित ‘कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट’ का फायदा हो गया
दोनों कम्पनियों ने एक-दूसरे की कोरोना वैक्सीन की ऐसी पोल पट्टी खोली कि लोग असलियत जानकर हैरान रह गए। हम जैसे लोग यह बात बताते तो लोग यकीन ही नहीं करते और बोलते कि आप तो वैक्सीन के बारे में भी भ्रम फैला रहे हो।
यह मामला तब शुरू हुआ जब सीरम इंस्टीट्यूट के अदार पूनावाला ने दावा किया कि हमारी वैक्सीन में दम है बाकी सबमें पानी कम है। अदार पूनावाला ने रविवार को फाइजर, मॉडर्ना और ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड के अलावा बाकी सभी वैक्सीन को पानी की तरह बता दिया। उनके इस दावे से भारत बायोटेक के सीईओ कृष्णा इल्ला के तनबदन में आग लग गई। उन्होंने सीरम इंस्टीट्यूट समेत एम्स के निदेशक तक को निशाने पर ले लिया।
भारत बायोटेक के रूष्ठ कृष्णा एल्ला ने कहा कि एस्ट्राजेनेका ने वॉलंटियर्स को वैक्सीन के साथ पैरासिटामॉल दी थी, ताकि वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स (ड्डस्र1द्गह्म्ह्यद्ग ह्म्द्गड्डष्ह्लद्बशठ्ठ) को दबाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और यूरोप ने यूके के एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के परीक्षण डेटा को मंजूर करने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह स्पष्ट नहीं था लेकिन कोई भी ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के डेटा पर सवाल नहीं उठा रहा है
यह बहुत बड़ा आरोप थे इसे सुनकर सीरम इंस्टीट्यूट वाले अदार पूनावाला की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी ओर कल शाम को मोदी सरकार द्वारा दोनों कंपनियों पर इस तकरार को खत्म करने का दबाव बनाया गया और दोनों कम्पनियो ने सुलह का ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी कर दिया
दरअसल यह दो वैक्सीन निर्माता कंपनियों की आपसी प्रतिद्वंदिता से अधिक सरकार द्वारा की गई जल्दबाजी पर सवाल अधिक है जहाँ वेक्सीन केंडिडेट पर थर्ड ट्रायल के परिणामो का असर जाने बिना अनुमति प्रदान कर दी गयी है
भारत बायोटेक की वैक्सीन के थर्ड ट्रायल पूरे हुए ही नही है ओर सीरम के कोवीशील्ड के ट्रायल्स को दरअसल फेज-2/3 ट्रायल्स कहा जा रहा है। क्योकि इसमें वहीं सब है जो दुनियाभर में फेज-2 ट्रायल्स में होता है। इसमें सेफ्टी और इम्युनोजेनेसिटी देखी जा रही है, उसके असर का एनालिसिस नहीं हो रहा है।
दोनों ही वेक्सीन को इमरजेंसी अप्रूवल देना कितना गलत था यह इन दोनों कंपनियों के ष्टश्वह्र के बीच आरोप प्रत्यारोप से साफ हो गया है
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना से जैसा युद्ध भारत करेगा, वैसा कोई और देश करने की स्थिति में नहीं है। 30 करोड़ लोगों को फिलहाल टीका लगाने की तैयारी है। इतने लोग तो बस दो-तीन देशों में ही हैं। धीरे-धीरे भारत में 140 करोड़ लोगों को भी कोरोना का टीका मिल सकेगा। मकर संक्राति के दिन से टीकाकरण की यह क्रांति शुरु हो जाएगी। इस टीका-क्रांति को लेकर दो टीका-टिप्पणी हो रही है। एक तो पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच और दूसरी टीका निर्माता दो भारतीय कंपनियों के बीच। दोनों कंपनियों-भारत बायोटेक और सीरम-इंस्टीट्यूट ने एक-दूसरे के टीके के बारे में जो विवाद खड़ा किया था, उसे अब उन्होंने खुद ही सुलझा लिया है। इन दोनों के टीके दुनिया के सबसे सस्ते टीके होंगे। ये टीके भारत के वातावरण के भी अनुकूल होंगे।
इन्हें सदा 200 या 300 डिग्री ठंडे शीतमान में रखने की जरुरत नहीं होगी। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने हजारों शीतयंत्र तैयार कर लिये हैं। 37 राज्यों के 41 हवाई अड्डों पर इस टीके को भिजवाने का इंतजाम हो गया है। हवाई अड्डे से टीका-केंद्र तक भी टीका मिनटों में सुरक्षित पहुंचवाने की व्यवस्था की जा रही है। हर प्रदेश में हजारों टीका-केंद्र बनाए जा रहे हैं ताकि बुजुर्ग और कमजोर लोगों की भी समुचित सेवा हो सके।सरकार को इस अभियान में अभी 13,500 करोड़ रु. खर्च करने होंगे। अंदाज है कि सरकार को लगभग 30 हजार कोल्ड चेनों, 45 हजार बर्फीले रेफ्रीजरेटरों और 41 हजार डीप फ्रीजरों का प्रबंध करना होगा। यह टीका बुजुर्गों और बीमारों को पहले दिया जाएगा। इस गणित को भी स्वास्थ्य मंत्रालय सुलझा रहा है। वास्तव में कई मंत्रालयों के सहयोग से ही यह अभियान सफल होगा।
यह अभियान लगभग वैसा ही है, बल्कि उससे भी ज्यादा गंभीर है, जो हमारे देश में चुनावों के दौर में होता है। इस अभियान में देश के सभी लोग का अधिकतम सहयोग होना चाहिए लेकिन हमारे विपक्षी नेताओं ने इस राष्ट्रसेवा के मामले में भी विवाद खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि इस टीके का तीसरे परीक्षण के पहले ही उपयोग करना खतरनाक है। क्या हम अपने वैज्ञानिकों से भी ज्यादा उनकी बात को प्रामणिक मानें?
यदि कुछ खतरा होगा तो उसका पता तुरंत चलेगा और तत्काल समुचित कार्रवाई होगी। कुछ लोग टीके के बारे में यह भ्रम भी फैला रहे हैं कि इसमें सूअर या गाय की चर्बी है और उसको लगवाने वाला नपुंसक हो जाएगा। इन विघ्नसंतोषी टीका-टिप्पणियों को दरकिनार करके इस अभियान को सफल बनाना हर भारतीय का कर्तव्य है। (नया इंडिया की अनुमति से)
2020 में जलवायु परिवर्तन की वजह से 10 सबसे बड़ी मौसमी विपदाओं में से दो भारत में हुई थीं जिनसे अरबों रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा नुकसान झेलने वाले देशों में भारत भी आता है.
डॉयचे वैले पर शिवप्रसाद जोशी का लिखा-
ब्रिटेन की स्वयंसेवी संस्था क्रिश्चियन एड की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में जो दस सबसे बड़ी कुदरती आफतें आई थीं वे मानव जाति को बहुत "महंगी” भी पड़ी हैं. उनसे जानमाल के करीब 150 अरब डॉलर के नुकसान का अंदाजा लगाया गया है. इन विपदाओं की वजह से साढ़े तीन करोड़ लोगों की जानें गईं और एक करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए.
2020 को जलवायु ब्रेकडाउन का साल कहने वाली इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे बुरी मार गरीब देशों पर पड़ी है जहां क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए जानमाल का कोई बीमा भी नहीं था. और ये मार चौतरफा पड़ी है, एशियाई भूभाग में आई बाढ़ हो, अफ्रीका में टिड्डियों का आतंक हो या यूरोप और अमेरिका में आए भयंकर तूफान.
जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि का दीर्घकालीन प्रभाव भी इस नुकसान में साफ झलकता है. ऐसा नहीं है कि मानवनिर्मित ग्लोबल वॉर्मिंग से पहले कुदरती आफतें इंसान पर नहीं टूटी हैं लेकिन एक सदी से अधिक के तापमान के डाटा और दशकों के सैटेलाइट डाटा के जरिए हासिल हुए चक्रवात और समुद्र के स्तर में वृद्धि के आंकड़ों के आधार पर कहा जा सका है कि धरती तप रही है और विपदाएं बढ़ रही हैं- अतिवृष्टि और तूफान से लेकर लू और जंगल की आग तक, और डायबिटीज और हृदयरोग जैसी बीमारियों से लेकर वैश्विक महामारी तक.
अम्फान की तबाही
2020 में सबसे ज़्यादा "महंगी” साबित हुई 10 कुदरती आफतों में से दो का कहर भारत के विभिन्न हिस्सों पर टूटा था. मई 2020 में अम्फान नाम का सुपर साइक्लोन इस वैश्विक सूची में चौथे और जून से अक्टूबर के दौरान आई बाढ़ पांचवे नंबर पर है. बंगाल की खाड़ी में उठने वाले अम्फान ने 270 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाओं के साथ भारत और बांग्लादेश में तबाही मचाई थी. दोनों देशों को करीब 95 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. कम से कम 128 लोग मारे गए थे और करीब पांच करोड़ लोग विस्थापित हो गए थे.
जून और अक्टूबर के बीच असम से लेकर केरल तक, मॉनसून से हुई अत्यधिक बारिश के चलते बाढ़ और भूस्खलन की काफी घटनाएं दर्ज की गई थीं. रिपोर्ट के मुताबिक इन बाढ़ों से भारत को करीब 73 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था और दो हजार लोगों की मौत हो गई थी.
बात सिर्फ इतने बड़े आर्थिक नुकसान की नहीं है, बड़ी चिंता ये है कि ऐसी आफतें आने वाले समय में आवृत्ति और शक्ति के लिहाज से और तीव्र हो सकती हैं. जलवायु परिवर्तन ऐसी घटनाओं के लिए कैटालिस्ट की तरह काम करता आ रहा है. नवंबर 2021 में ग्लासगो में अगला जलवायु सम्मेलन होना है. 2015 के पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और 2030 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन आधा करने का लक्ष्य रखा गया था. इसके तहत हर साल उत्सर्जन में करीब साढ़े सात प्रतिशत कटौती की जानी है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक लक्ष्य कम होने के बजाय दूर होता जा रहा है.
कोविड-19 महामारी से त्रस्त दुनिया में इन कुदरती आफतों से हुई तबाहियों ने गरीबों को और पीछे धकेला है. हिंद महासागर क्षेत्र में वैश्विक तापमान बढ़ने से साइक्लोन की ताकत भी बढ़ती जा रही है और नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी. अम्फान के अलावा भारत पिछले साल जून में एक और शक्तिशाली साइक्लोन- निसर्ग के वार को झेल चुका है.
पर्यावरण से जुड़ी लड़ाइयां और चिंताएं
वैज्ञानिकों का मानना है कि 2020 अतिरेक रूप से गरम साल था, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में 30 से 33 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किए गए थे. जलवायु परिवर्तन कितना बड़ा खतरा बनता जा रहा है इसका एक अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले साल के पहले छह महीनों में ही 200 से अधिक प्राकृतिक विपदाएं आ चुकी थीं. ये आंकड़ा 21वीं सदी के 2000-2019 की अवधि में 185 विपदाओं के औसत से ऊपर है. 2019 के मुकाबले 2020 में कुदरती आफतों की घटनाओं में पहले छह महीने की अवधि में 27 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.
पर्यावरण से जुड़ी लड़ाइयों और चिंताओं को इसीलिए खारिज करने की मूर्खता नहीं की जा सकती. परियोजनाएं और निर्माण जरूरी हैं लेकिन वे समावेशी और सुचिंतित विकास के पैमानों पर होने चाहिए ना कि अंधाधुंध! उत्तराखंड में चार धाम सड़क परियोजना को लेकर विवाद थमा नहीं है, इसी तरह सुप्रीम कोर्ट की बहुमत से हरी झंडी के बावजूद सरकार के सेंट्रल विस्ता प्लैन को लेकर पर्यावरणवादियों और अन्य एक्टिविस्टों में शंकाएं और सवाल बने हुए हैं. वैसे एक राहत की बात ये है कि भारत हरित ऊर्जा अभियान को भी जोरशोर से चलाता दिख रहा है.
कुछ सप्ताह पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के कच्छ में 30 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन वाले और उनके मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े पुनर्चक्रित ऊर्जा पार्क का शिलान्यास किया था. खबरों के मुताबिक ये विशाल प्रोजेक्ट एक लाख 80 हजार एकड़ यानी सिंगापुर के आकार जितने भूभाग में फैला हुआ है. इसमें सौर पैनल, सौर ऊर्जा भंडारण यूनिट और पवनचक्कियां लगाई जाएंगी. दावा है कि इस प्रोजेक्ट से हर साल भारत कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जन में पांच करोड़ टन की कटौती करने में सफल हो सकेगा. ये परियोजना भारत के उस महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य का हिस्सा है जिसके तहत 2022 तक 175 गीगावॉट और 2030 तक 450 गीगावॉट पुनर्चक्रित ऊर्जा का उत्पादन किया जाना है. इससे हर साल 20 अरब डॉलर के बिजनेस अवसर भी बनने की बड़ी उम्मीद भी जताई गई है.
सौर ऊर्जा के अलावा गैस पाइपलाइन के जरिए भारत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोशिशों में जुटा है. सरकार की योजना अगले चार से छह साल में देश में 16 हजार किलोमीटर लंबी प्राकृतिक गैस पाइपलाइन बिछाकर चालू करने की योजना भी है. पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने 450 किलोमीटर लंबी कोच्चि-मंगलुरू गैस पाइपलाइन का उद्घाटन किया था. भारत के प्राथमिक ऊर्जा स्रोतो में गैस का हिस्सा अभी करीब छह प्रतिशत है जबकि वैश्विक औसत 24 प्रतिशत है. 2030 तक भारत इस हिस्से को 15 प्रतिशत करना चाहता है. हरित ऊर्जा का दायरा बढ़ाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपने कार्बन फुटप्रिंट में 2005 के स्तरों से 2030 तक 33-35 प्रतिशत कटौती करने का लक्ष्य रखा है. (dw.com)
-कनुप्रिया
बहुत साल पहले एक फि़ल्म देखी थी ‘अकेले हम अकेले तुम।’ फिल्म का नायक गायक होता है और नायिका गायिका, यूँ तो हर फिल्म में नायक नायिकाएँ बहुत अच्छा ही गाते हैं मगर इस फिल्म के किरदारों की ये खासियत अलग से दिखाई गई। शादी के बाद नायक अपने गायिकी के करियर को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हो जाता है और नायिका जो समान रूप से प्रतिभाशाली है घर और बेटे को संभालने में व्यस्त हो जाती है, मगर वो चाहती है कि नायक जब अपने लिए काम खोजे तो उसके लिए भी खोजे, इसी मुद्दे पर उनका विवाद बढ़ जाता है और नायिका घर छोडक़र चली जाती है।
अब नायक पर जिम्मेदारी आ जाती है कि वो बेटा सम्भाले, वो अपने करियर पर फोकस नही कर सकता, वो छोटी मोटी नौकरी ढूँढता है और बच्चा संभालता है वहीं नायिका अपनी प्रतिभा के कारण करियर के ऊँचे पायदान पर पहुँचती है।
फिल्म में जो यह रोल रिवर्सल था वो यह दिखाता है कि नायक के साथ जो बीता वो unusual था इसलिये दर्शक उससे सहानुभूति भले कर लें मगर यही अगर usual pattern होता यानी नायिका घर बच्चा सम्भालती रहती और उसका करियर ख़त्म हो जाता तो किसी को उसमे कुछ भी असामान्य नही लगता। समाज के ठ्ठशह्म्द्वह्य ऐसे ही होते हैं वो असामान्य को भी सामान्य की महसूस कराते हैं।
संसार के किसी भी जीव के प्राथमिक कर्तव्यों में होता है उसकी प्रजाति बचाना, और इसके लिये जीव क्या क्या नही करते, ड्डठ्ठद्बद्वड्डद्य द्मद्बठ्ठद्दस्रशद्व ऐसी ऐसी जानकारियों से भरा है कि चकित हो जाएँ। जैकलीन कैनेडी पर एक डॉक्युमेंट्री देखी थी वो vogue में जूनियर सब एडिटर की तरह काम कर चुकी थीं और वाशिंगटन नैशनल हेराल्ड में फोटोग्राफर का कर रही थीं जब वो जॉन कैनेडी से मिली और शादी के बाद एक दृश्य में वो कहती हैं कि मुझसे कहा गया बच्चे पैदा करना और सम्भालना स्त्री का पहला कर्तव्य है और यह अमेरिका की फर्स्ट लेडी कह रही थी 60 के दशक में।
कई धर्म जो स्त्रियों को दूर रखने की बात करते हैं जिनका कहना है कि स्त्रियों के कारण ध्यान और मोक्ष में दिक्कत आती है वो सब मुख्यत: पुरुषोनमुखी धर्म हैं, जो पुरुष के मोक्ष और ज्ञान की राह में स्त्री की स्थिति देखते हैं, क्योकि जिन कारणों से वो स्त्रियों को दूर रखने की बात करते हैं उन्ही कारणों से पुरुषों को दूर रखा जाता अगर उनकी प्राथमिकता में स्त्री का ध्यान और मोक्ष होता। मगर स्त्री मनुष्य प्रजाति के महत्वपूर्ण काम मे लगी थी।
ध्यान से ध्यान आया कुछ साल पहले एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने , मैं नाम भूल रही हूँ, स्त्रियों के प्रयोगशाला में काम करने पर रोक लगाने की बात कही थी, उसके अनुसार इससे पुरुष रिसर्चर्स का ध्यान बंटता था, कमाल है कि उसने स्त्री रिसर्चर्स के ध्यान बंटने की बात नहीं कही थी। और लोग कहते हैं कि ध्यान और मोक्ष स्त्री के बस का नहीं।
यह सच है कि स्त्री हमेशा ही मनुष्य सन्तति को जन्म देने और भविष्य के विश्व नागरिको के पालन पोषण की गुरुतर जिम्मेदारी को अपने कंधों पर ज़्यादा उठाती आई है और इसके बदले में उसे कम प्रतिभाशाली, कम योग्य, ध्यान मोक्ष के लायक नही , विज्ञान तकनीक जितनी बुद्धि नहीं, आदि तानो से नवाज़ा जाता रहा है। दरअसल उससे वाँछित सामाजिक दायित्व की पूर्ति करवाने का यह एक harrasment वाला तरीक़ा है कि उसे किसी दूसरे रास्ते के क़ाबिल ही न समझा जाये, वहीं दूसरा तरीका महानता वाला है जिसने उससे अति मानव होने की अपेक्षा की है कि वो अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं का गला भी पूरी तरह घोटे रखे, जबकि ज़रूरत बस इतनी भर थी इस मानव समाज मे उसके इस योगदान को समझा जाए, appreciate किया जाए और ज़्यादा से ज़्यादा सहयोग किया जाए।
एक मूर्ख समर्थक अपने नेता को गाली दिलवा देता है, जय श्रीराम के नारे ने राम के नाम को भय की वस्तु बना दिया, जिहाद की आक्रामकता ने इस्लाम पर सवाल उठवा दिए, यीशु तो ख़ुद सूली पर पहले ही चढ़े हुए थे, कल से एक बुद्धिस्ट की नासमझी के पीछे बेचारे बुद्ध गरियाये जा रहे हैं और बुद्ध बनाम यशोधरा स्त्री बनाम पुरुष का सवाल बना दिया गया, जबकि बुद्ध ने महत्वपूर्ण सामाजिक कर्तव्य निभाया और यशोधरा ने मातृत्व का। पितृसत्ता के विरोध का पुरुष बनाम स्त्री का झगड़ा हो जाना मानो सर फुटौव्वल के सिवा कहीं नही पहुँचना है, जबकि इसके विरोध का मामला महज स्त्री के हित तक सीमित नही। इस सबके बीच अभी तो बेचारे बुद्ध बख्शे जाएँ बाकी स्त्रियाँ तो अपना रास्ता इस सबके बीच से निकालना सीखती ही रहेंगी।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आशा के विपरीत सरकार और किसानों का 7 वां संवाद बेनतीजा रहा। छठे संवाद में जो परस्पर सौहार्द दिखाई पड़ा था, वह इस बार नदारद था। किसानों और मंत्रियों ने इस बार साथ-साथ भोजन भी नहीं किया। अब 8 जनवरी को फिर दोनों पक्षों की बैठक होगी लेकिन उसमें से भी कुछ ठोस समाधान निकलने की संभावना कम ही दिखाई पड़ रही है, क्योंकि दोनों पक्ष अपनी-अपनी टेक पर अड़े हुए हैं।
किसान कहते हैं कि तीनों कानून वापस लो जबकि सरकार कहती है कि उसमें जो भी सुधार करना हो, बताते जाइए, हम संशोधन करने की कोशिश करेंगे। वैसे तो किसानों के लिए दरवाजा खुल गया है। वे चाहें तो इतने संशोधन और अभिवर्द्धन बता दें कि उनके हो जाने के बाद ये तीनों कानून पहचाने ही न जाएं। उनका होना या न होना या रहना या न रहना पता ही न चले। लेकिन इस प्रक्रिया में पेंच है। वह यह कि यह द्विपक्षीय संवाद, संवाद न रहकर द्रौपदी का चीर बन सकता है। पहले ही इस 40 दिन पुराने धरने में 55 किसान स्वर्गवासी हो गए हैं। कुछ आत्महत्याएं भी हुई हैं। इतने अहिंसक और निरापद धरने गांधी-सत्याग्रहों की याद ताजा कराते हैं। दिल्ली की इस भयंकर ठंड और बेमौसम बरसात में ये तो पंजाब, हरयाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों का दमगुर्दा है कि वे टिके हुए हैं। उनकी जगह यदि किसी राजनीतिक दल के लेाग हुए होते तो वे अब तक भाग खड़े होते।
यह तो अच्छा हुआ कि अभी तक कोई किसान आमरण अनशन पर नहीं बैठा। वह अकेला अनशन इस लंबे धरने से भी भारी पड़ता। सरकार का दावा है कि ये तीनों कानून उसने किसानों के भले के लिए बनाए हैं। यदि वे सहमत नहीं है तो सरकार उनके गले में इन्हें जबर्दस्ती क्यों ठूंस रही है ? जो राज्य इसे मानना चाहें, उन्हें और जो नहीं मानना चाहें, उन्हें भी वह छूट क्यों नहीं दे देती ?यों भी इन तीनों कानूनों के बिना भी देश के 94 प्रतिशत किसान मुक्त-खेती और मुक्त-बिक्री के लिए स्वतंत्र हैं। जहां तक 6 प्रतिशत संपन्न किसान, जो सरकार को अपना गेहूं और धान बेचते हैं, वे भी फल और सब्जियां भी उगाना शुरु कर सकते हैं, यदि सरकार उन उत्पादों के लिए भी केरल की तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती रहे। असली मुद्दा यही है। यह मुद्दा आसानी से हल हो सकता है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रकाश दुबे
कंगूरे देखने वाले नींव के पत्थर के योगदान को क्या समझें? मंत्रिमंडल की चमकदार सूची में मनसुख भाई मांडविया का नाम बहुत नीचे हैं। जवाहर लाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट पर निजीकरण का जहाज लंगर डालने वाला है। मुंद्रा, कांडला से लेकर जेएनपीटी तक के रास्ते स्वर्ण युग भारत प्रवेश में उतरेगा। सदियों पहले की तरह पश्चिम भारत के व्यापारी जहाजों में रत्न आभूषण लाद कर लाएंगे। मनसुख भाई की पहल से पलड़ा पश्चिम की ओर झुक रहा है। पुरबिया भारत में मालवाही जहाजों ने बगावत कर दी। काला पानी के पानी में तैरने वाले जहाजरानी निगम के आधा दर्जन कीमती जहाजों में से एक को छोडक़र बाकी सब दिव्यांग हुए। संविधान से अनुच्छेद 370 का विलोप होने के बाद से चार तो मरम्मत के लिए पड़े हैं। मज़ा यह, कि दोनों घटनाओं का आपस में संबंध नहीं है। दो जहाज कोरोना आने के बाद बीमार हुए। इकलौता एमवी सेंटीनेल पानी पर चलने फिरने में सक्षम है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के सेंटीनली आदिवासियों से उसे यह नाम मिला।
नए बरस का न्याय
मुफ्ती मोहम्मद सईद, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद, कल्याण सिंह समेत कई धांसू नेताओं की संतानों से जेल काट चुके जगन अधिक ताकतवर हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से बाहर रहते हुए मोदी आर्कस्ट्रा में उनकी धुन शामिल रहती है। पूरे देश में किसान आंदोलन के दौरान एनडीए में खींचतान मची। भाजपा के मंत्री और संतरी बचाव करते बयान देने लगे। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन्मोहन रेड्?डी ने किसानों के नाम योजना शुरु कर विरोध ठंडा करने में मदद की। लाल टोपी और सफेद दाढ़ी वाले सांताक्लाज सिर्फ तस्वीरों और बहुरूपियों में मिलते हैं। जगन के क्रिसमस उपहार से प्रसन्न दिल्ली के सांता ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पहले मुख्य न्यायाधीश जितेन्द्र कुमार माहेश्वरी का तबादला कर दिया। वह भी सबसे छोटे राज्य सिक्किम में। मुख्यमंत्री जगन को जजों से शिकायत थी। मध्यप्रदेश के जावरा में पले बढ़े न्यायमूर्ति माहेश्वरी गृहप्रदेश पर खासे मोहित हैं। पिछले बरस शपथ में आंध्र के बजाय मध्य प्रदेश बोल गए थे।
खतरों का खिलाड़ी
रजनीकांत की दर्जनों फिल्में हिंदी में डब होने के बाद कमाई कर गईं। समाजसेवी रजनी की हिंदी में डब फिल्मों के नाम बिगड़ते रहे हैं। मसलन-खतरों का खिलाडि़। हिंदी में मात्रा छोटी रह गई। रजनी की राजनीति में भी यही हुआ। प्यारे दोस्त कमल हासन ने साथ देने के बजाय अलग राजनीतिक पार्टी बना ली। खतरों-के हीरो की नायिका खुशबू कांग्रेस छोडक़र भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुई। जोश जोश में रजनी ने अपनी पार्टी बनाने का ऐलान कर डाला। 2020 में धमाका कर 2021 को हिलाने वाले थे। गांव-देहात के बंद सिनेमाघरों के बाहर प्रशंसकों ने दीवारें पोत रखी थीं। फिल्मी परदे पर सिगरेट नचाने से लेकर रोबो तक को हराने में माहिर रजनी ने खतरा मोल नहीं लिया। इसके पीछे बेवज़ह धौंस,धमक या राजनीतिक तलाशना बेकार है। तेलंगाना में शूटिंग के दौरान तरह तरह के किरदार बीमार पडऩे लगे। अच्छे से अच्छे डाक्टरों ने जांच की। रजनी को छोडक़र सब कोरोना संक्रमित निकले। नरमदिल रजनी का दिल बैठ गया। अब बताओ, ऐसे वक्त की राजनीति पर न रजनी का रोब चलता है और न रोबो का।
नियम, सभा बुलाने और टालने के
राजगोपाल ने नाम कई कीर्तिमान हैं। केरल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के समर्पित कार्यकर्ता को मध्य प्रदेश से राज्यसभा में भेजकर भाजपा ने मलयाली को केन्द्र सरकार में पहली बार प्रतिनिधित्व दिलाया। ओ राजगोपाल केरल विधानसभा में पहुंचने वाले भाजपा के पहले और एकमात्र सदस्य हैं। तीन कृषि विधेयकों के विरोध में प्रस्ताव करने केरल सरकार ने विधानसभा का अधिवेशन बुलाया। अनमने ढंग से राज्यपाल ने अनुमति दी। केरल विधानसभा में राजगोपाल सहित सभी विधायकों ने सर्वसम्मति ने तीनों कृषि विधेयक रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया। बाहर आकर राजगोपाल पलटी मार गए। केरल में विधानसभा को नियम सभा कहते हैं। 2020 के अंतिम दिन की केरल की घटना से राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने 2021 के लिए सबक लिया। अपने समकालीन संघ प्रचारक राजगोपाल की तरह बेहाल होने से बचने केलिए कलराज ने अशोक गहलोत सरकार को विधानसभा की बैठक बुलाने की अनुमति ही नहीं दी। राज्यपाल ने पहले भी गहलोत सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए बैठक बुलाने की अनुमति नहीं दी थी। बैठक टलने के बावजूद गहलोत की कुर्सी नहीं डिगी सो नहीं डिगी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
गाजियाबाद के मुरादनगर श्मशान घाट में छत गिरने से 25 लोगों से ज्यादा की मौत हो गई और लगभग सौ लोग बुरी तरह से घायल हो गए। यह छत कोई 100-150 साल पुरानी नहीं थी। यह अंग्रेजों की बनाई हुई नहीं थी। इसे बने हुए अभी सिर्फ दो महिने हुए थे। यह नई छत थी, कोई पुराना पुल नहीं, जिस पर बहुत भारी टैंक चले हों और जिनके कारण वह बैठ गई हो। इतने लोगों का मरना, एक साथ मरना और श्मशान घाट में मरना मेरी याद में यह ऐसी पहली दुर्घटना है।
सारी दुनिया में शवों को श्मशान या कब्रिस्तान ले जाया जाता है लेकिन मुरादनगर के श्मशान से ये शव घर लाए गए। सारी दुर्घटना कितनी रोंगटे खड़े करनेवाली थी, इसका अंदाज हमारे टीवी चैनलों और अखबारों से लगाया जा सकता है। जिस व्यक्ति की अंत्येष्टि के लिए लोग श्मशान में जुटे थे, उसका पुत्र भी दब गया। उसके कई रिश्तेदार और मित्र, जो उसके अंतिम संस्कार के लिए वहां गए थे, उन्हें क्या पता था कि उनके भी अंतिम संस्कार की तैयारी हो गई है। जो लोग दिवंगत नहीं हुए, उनके सिर फूट गए, हाथ-पांव टूट गए और यों कहें तो ठीक रहेगा कि वे अब जीते जी भी मरते ही रहेंगे।
मृतकों को उत्तरप्रदेश की सरकार ने दो-दो लाख रु. की कृपा-राशि दी है। इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है? किसी परिवार का कमाऊ मुखिया चला जाए तो क्या उसका गुजारा एक हजार रु. महिने में हो जाएगा? दो लाख रु. का ब्याज उस परिवार को कितना मिलेगा? सरकार को चाहिए कि हर परिवार को कम से कम एक-एक करोड़ रु. दे। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने हताहतों के लिए शोक और सहानुभूति बताई, यह तो ठीक है लेकिन उन्हें उनकी जिम्मेदारी का भी कुछ एहसास है या नहीं ? श्मशान-घाट की वह छत मुरादनगर की नगर निगम ने बनवाई थी। सरकारी पैसे से बनी 55 लाख रु. की यह छत दो माह में ही ढह गई।
इस छत के साथ-साथ हमारे नेताओं और अफसरों की इज्जत भी क्या पैंदे में नहीं बैठ गई ? छत बनानेवाले ठेकेदार, इंजीनियर तथा जिम्मेदार नेता को कम से कम दस-दस साल की सजा हो, उनकी निजी संपत्तियां जब्त की जाएं, उनसे इस्तीफे लिए जाएं, उनकी भविष्य निधि और पेंशन रोक ली जाए। उन्हें दिल्ली की सडक़ों पर कोड़े लगवाए जाएं ताकि सारा भारत और पड़ौसी देश भी देखें कि लालच में फंसे भ्रष्ट अफसरों, नेताओं और ठेकेदारों के साथ यह राष्ट्रवादी सरकार कैसे पेश आती है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रमोद जोशी
बाइडेन ने 2006 में कहा था, ‘मेरा सपना है कि 2020 में अमेरिका और भारत दुनिया में दो निकटतम मित्र बनें।’ उपराष्ट्रपति के रूप में 2013 में भारत आने पर भी बाइडेन ने वही बात कही। देखना होगा कि 20 जनवरी के बाद वह सबसे पहले किन देशों के नेताओं से बात करते हैं।
आगामी 20 जनवरी को जो बाइडेन अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में काम संभाल लेंगे। उनका पहला काम कोविड-19 की महामारी को रोकने का होगा। यह स्वाभाविक है। पर इसके साथ ही कुछ दूसरी बड़ी घोषणाएं वह काम के पहले दिन कर सकते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने दर्जनों और महत्वाकांक्षी कार्यक्रम गिनाए हैं। इनमें आर्थिक और पर्यावरण से जुड़े मसले हैं। सामाजिक न्याय, शिक्षा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बातें हैं।
डोनल्ड ट्रंप की कुछ नीतियों को वापस लेने या उनमें सुधार के काम भी कर सकते हैं। उन्होंने अपने पहले 100 दिन के जो काम घोषित किए हैं, उनमें प्रवास से जुड़ी दर्जन भर बातें हैं जिन्हें लागू करना आसान नहीं। सबसे बड़ी परेशानी संसद में होगी। प्रतिनिधि सदन में डेमोक्रेटिक को बहुमत जरूर है, पर वहां भी रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति बेहतर है। सीनेट की शक्ल जनवरी में जॉर्जिया की दो सीटों पर मतदान के बाद स्पष्ट होगी।
संसद में बाइडेन को अपनी पार्टी के ऐसे नीतिगत फैसलों को लागू करने में दिक्कत होगी जिन्हें रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन नहीं है; जैसे, हेल्थ केयर और पर्यावरण। इसलिए वह शुरू में कोविड-19 और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार जैसे कार्यक्रमों को ही बढ़ा पाएंगे। उन्होंने डॉ एंथनी फाउची से नेशनल इंस्टीट्यूटऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शंस डिजीज का डायरेक्टर बने रहने का आग्रह किया है। वह इस पद पर 1984 से हैं। उनकी सलाह ट्रंप ने नहीं मानी थी।
पेरिस संधि और डब्लूएचओ
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट जेम्स एम लिंडसे ने लिखा है कि पेरिस संधि और विश्व स्वास्थ्य संगठन में शामिल होना शायद उनके पहले वैश्विक निर्णय होंगे। लगता है कि वह चीन संग व्यापार-युद्ध को फिलहाल रोकने की कोशिश करेंगे। उनकी पहली परीक्षा ईरान के साथ परमाणु संधि पर होगी। इसके अलावा रूसी हैकरों की घुसपैठ पर भी वह पहले विचार करेंगे। बाइडेन से अपेक्षाएं ज्यादा हैं और राजनीतिक रूप से वह उतने ताकतवर नहीं हैं जबकि उन्होंने कुछ ऐसे फैसलों की घोषणा कर रखी है जो उन्हें अलोकप्रिय बनाएंगे।
राजनीतिक फैसले
बाइडेन ने प्रचार के दौरान कहा था कि राष्ट्रपति पद ग्रहण करने के पहले दिन कॉरपोरेट आयकर 21 से बढ़ाकर 28 फीसदी करेंगे। ट्रंप प्रशासन ने 2017 में इसकी दर घटाकर 21 फीसदी की थी। उनका वादा है कि सालाना चार लाख डॉलर से कम आय वालों पर कम टैक्स लगेगा। पहले दिन के जिन फैसलों का वायदा उन्होंने किया है, उनमें 1.1 करोड़ प्रवासियों को नागरिकता देना भी है।
उन्होंने कुछ मुस्लिम देशों के नागरिकों की अमेरिका यात्रा पर लगी रोक को खत्म करने का वादा भी किया है। शरणागत- नीतियों को बदलने और खासतौर से मैक्सिको से आने वालों के साथ होने वाले व्यवहार को रोकने का वादा है। उन्होंने दक्षिणी सीमा पर बन रही दीवार के लिए और पैसे नहीं देने की घोषणा की है, पर बनी दीवार को गिराने का भी इरादा नहीं है।
पिछले दिनों अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड तथा कुछ अन्य अश्वेतों की हत्याओं पर खड़े ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के संदर्भ में उनका वादा है कि वह पुलिस ओवर साइट कमीशन नियुक्ति करेंगे। पुलिस व्यवस्था को ओवरहॉल करने की दिशा में यह बड़ा कदम होगा। उन्होंने बड़े स्तर पर निवेश के सहारे 50 लाख नए रोजगार का वादा किया है। ‘मेड इन अमेरिका’ पॉलिसी की घोषणा भी की है।
चीन की चुनौती और भारत
लगता है, हमारे अमेरिका से रिश्तों में स्थिरता का समय आ गया है। दूसरी तरफ चीन और अमेरिका के रिश्तों में तल्खी आ रही है और भारत से सुधार। शुरुआत रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के समय हुई और डेमोक्रेट बराक ओबामा के समय में यह पुष्ट हुई। ट्रंप के कार्यकाल में कुछ महत्वपूर्ण सामरिक समझौते हुए। जो बाइडेन इसे आगे बढ़ाएंगे।
भारत की दिलचस्पी आर्थिक विकास में है। अमेरिका के सामने चीन एक तरफ आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है तो दूसरी तरफ सामरिक चुनौती बन कर खड़ा है। इस चुनौती को अमेरिकी प्रशासन और उसके सहयोगी देश जापान ने सन 2000 में ही देख लिया था। इसीलिए 1998 के एटमी धमाकों के बाद लगाई पाबंदियों को इन्होंने धीरे-धीरे खत्म किया और आज ये दो देश भारत के निकटतम सामरिक सहयोगी हैं। सामरिक सहयोग बगैर आर्थिक सहयोग अधूरा है। बाइडेन प्रशासन के समय में ही आर्थिक सहयोग की बुनियाद पडऩी चाहिए।
चीन केवल सामरिक चुनौती ही पेश नहीं कर रहा है, बल्कि तकनीकी महाशक्ति के रूप में स्थापित अमेरिका के वर्चस्व को भी चुनौती दे रहा है। हुवावेई की 5-जी तकनीक इसका उदाहरण है। अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर चीन के विस्तार को रोकेगा। इधर भारत और चीन के कारोबारी रिश्तों में रुकावट आई है। लद्दाख की घटना ने इसे और तेज कर दिया है। इस साल क्वॉड की दिशा में न केवल प्रगति हुई बल्कि मालाबार अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हुआ।
ट्रंप में हंगामा करने की कला थी। पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि बाइडेन खामोशी से चीन-विरोधी अभियान चलाएंगे। इसमें भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समर्थन मिलेगा क्योंकि इन तीनों देशों को भी चीन से शिकायतें हैं।
पाकिस्तान और भारत
हमारे लिए अमेरिका की पाकिस्तान-नीति ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाने का फैसला कर लिया है। यह फैसला इस बिना पर किया कि तालिबान पर पाकिस्तान के जरिये दबाव रखा जाएगा। पाकिस्तान को पुचकारने और तमाचा जडऩे की नीति जारी रहनी चाहिए। अफगानिस्तान में अब चीन और रूस की दिलचस्पी भी है। भारत चाहता है कि अमेरिकी सेना की उपस्थिति किसी-न- किसी रूप में बनी रहे। बाइडेन प्रशासन की इस नीति पर भारत की निगाहें रहेंगी।
भारत की दिलचस्पी रोजगार और शिक्षा के लिए अमेरिकी वीजा में भी है। ट्रंप की नीतियों में भारत के लिए किसी किस्म की रियायत नहीं थी। फरवरी, 2020 में ट्रंप की दिल्ली-यात्रा के दौरान व्यापार-समझौते पर बात हुई। अब बाइडेन प्रशासन से इस पर बात करनी होगी।
भारत शुल्क मुक्त निर्यात योजना (जीएसपी) को बहाल करने पर भी बात कर सकता है। ट्रंप प्रशासन ने 2019 में जीएसपी सूची से भारत को हटा दिया था। इसके तहत भारत 2,000 से अधिक उत्पादों का अमेरिका को शुल्क मुक्त निर्यात करता था।
बाइडेन ने सन 2006 में ही कहा था, ‘मेरा सपना है कि 2020 में अमेरिका और भारत दुनिया में दो निकटतम मित्र बनें।’ यह सपना अब पूरा हो रहा है। उपराष्ट्रपति के रूप में 2013 में भारत आने पर भी बाइडेन ने वही बात कही। देखना होगा कि 20 जनवरी के बाद वह सबसे पहले किन देशों के नेताओं से बात करते हैं। (navjivanindia.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कोरोना महामारी को ध्वस्त करने का ब्रह्मास्त्र अब भारत के हाथ में भी आ गया है। कोरोना के दो टीके, जो भारत में ही बने हैं, अब शीघ्र ही जरुरतमंदों को लगने शुरु हो जाएंगे। 30 करोड़ लोगों के लिए जो इंतजाम अभी हुआ है, उसमें उन तीन करोड़ लोगों को यह टीका सबसे पहले लगेगा, जो डाक्टर, नर्स और मरीज़ों की सेवा में लगे रहते हैं। ये सच्चे जन-सेवक हैं। इन लोगों ने अपनी जान पर खेलकर लोगों की जान बचाई है।
अब भी ये लोग उत्साहपूर्वक देश की सेवा करते रहें, इसके लिए जरुरी है कि सबसे पहले इनको सुरक्षा प्रदान की जाए। जाहिर है कि हमारे नेता लोग चाहेंगे कि इन सेवाकर्मियों के भी पहले इस टीके से उन्हें कृतार्थ किया जाए लेकिन वे जरा अपनी तुलना इन डाक्टरों, नर्सों, वार्डबायों और मरीजगाडिय़ों के ड्राइवरों से करके देखें। ये लोग जब अपनी जान की बाजी लगाए हुए थे, तब ज्यादातर नेता अपने-अपने घरों में दुबके हुए थे। वे भूखे लोगों को खाना बांटने में भी संकोच करते थे।
हालांकि मेरी राय है कि यदि वे फिर भी यह टीका पहले लगवाना चाहें तो उन्हें यह सुविधा दे दी जाए लेकिन उनसे लागत से भी दुगुना-चौगुना पैसा वसूल किया जाए, जिसका इस्तेमाल उस टीके को मुफ्त बांटने में किया जाए। यह ठीक है कि करोड़ों लोगों को मुफ्त टीका देने में सरकार के अरबों रु. खर्च हो जाएंगे लेकिन यदि वह निजी अस्पतालों को यह छूट दे दे तो भारत में 30 से 40 करोड़ लोग उच्च और निम्न मध्यम वर्ग के ऐसे हैं, जो हजार-दो हजार रु. खर्च करके यह टीका ले सकते हैं।
इसके कारण जो राशि सरकार को मिलेगी, वह मुफ्त टीका लगाने में तो इस्तेमाल होगी ही, मुफ्त टीकाकरण का बोझ भी हल्का होगा। सरकारी टीकाकर्मियों की संख्या सिर्फ सवा लाख है। इतने ही टीकाकर्मी निजी अस्पताल भी जुटा सकते हैं। 50 साल से ज्यादा उम्र वाले लगभग 50 करोड़ और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को यह टीका देने की तैयारी हमारे स्वास्थ्य मंत्रालय ने ठीक ढंग से कर रखी है। यदि जरुरत पड़ी तो सरकार विदेशी कंपनियों से भी दवाइयां खरीद सकती है।
यों भी कोरोना का हमला भारत में आजकल बहुत धीमा पड़ता जा रहा है। भारत के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित यह टीका पश्चिमी टीकों के मुकाबले सस्ता और कम नखरे वाला है। यह भारत को तो महामारीमुक्त करेगा ही, पड़ौसी देशों और अफ्रीकी देशों की भी अपूर्व सेवा का अवसर भारत को प्रदान करेगा। भारत के लिए और एशिया-अफ्रीका के देशों के लिए नए साल की यह सबसे बड़ी खुश खबर है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
आरंभ से लेकर अब तक छत्तीसगढ़ विधान सभा ने संसदीय मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन के साथ-साथ अपनी सामाजिक सरोकारिता को भी सिद्ध किया है। यहॉ जो उत्कृष्ट संसदीय वातावरण बना हुआ है इसका पूरा श्रेय सदन के सभी सम्माननीय सदस्यों को जाता है । जिन्होंने पक्ष-प्रतिपक्ष की भूमिका से ऊपर उठकर अपनी दलीय प्रतिबद्धता के बावजूद प्रत्येक परिस्थिति में सदन में परस्पर सम्मान, सौहार्द्र एवं समादर का भाव बनाये रखा है।
संसदीय लोकतंत्र में संसद एवं राज्य विधान मंडल केन्द्र बिन्दु होते हैं, छत्तीसगढ़ विधान सभा सफलता और सम्मान के अनेक नये अध्यायों को सृजित करते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सफल रही हैं । सभा में संसदीय मूल्यों की स्थापना तथा प्रजातांत्रिक सिद्धातों के अनुकूल कार्यवाही संचालन की प्रतिबद्धता छत्तीसगढ़ विधानसभा का सदैव मूल मंत्र रहा है।
दिनांक 04 जनवरी, 2019 को छत्तीसगढ़ विधान सभा का अध्यक्ष बनने के बाद आसंदी से अपने पहले अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. चरणदास महंत ने संत कबीर दास जी का दोहा पढक़र अपनी मंशा जाहिर की थी-
‘‘कबीरा खड़ा बजार में, मॉगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’’
उन्होंने कहा था कि-हम प्रतिबद्ध और वचन बद्ध हैं, हमें सदन की गरिमा का ध्यान रखना होगा, और वह सभी मान. सदस्यों के सहयोग के बगैर संभव नहीं है। हम सर्वकल्याण के उद्देश्य से चलें। सदन की कार्यवाही के दौरान हममें मत-भेद हो सकते हैं, लेकिन मन-भेद नहीं होना चाहिए। आदर्श लोकतंत्र की इस परिकल्पना के अनुरूप छत्तीसगढ़ की पंचम विधान सभा के पक्ष और प्रतिपक्ष के सदस्यों ने सदन के बाहर और अंदर सदैव अपने कार्य, विचार एवं व्यवहार से इस कथन को आत्मसात् किया है ।
गांधीजी के विचारों से प्रभावित होने के फलस्वरूप सत्य, अहिंसा और मानवता के प्रतीक राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी जी की 150वीं जयंती पर ‘‘छत्तीसगढ़ विधान सभा’’ का दो दिवसीय विशेष सत्र 02 एवं 03 अक्टूबर, 2019 को आयोजित किया गया। इस सत्र में गॉधी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर मान. सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए। इस विशेष-सत्र के अवसर पर गॉधी जी के जीवन दर्शन पर केन्द्रित प्रदर्शनी, नाटक एवं व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। देश में इस तरह के विशेष सत्र का आयोजन करने वाला छत्तीसढ़ प्रथम राज्य बना। गॉधी जी के प्रति भावनात्मक लगाव को महसूस करने के लिए सभी मान. सदस्यों एवं छत्तीसगढ़ राज्य के संसद सदस्यों को खादी एवं कोसे के परिधान प्रदाय किये गए।
पहली बार पंचम विधान सभा के नव-निर्वाचित सदस्यों कीे शपथ तथा गांधी जी की 150 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित विशेष-सत्र की कार्यवाही का दूरदर्शन से सीधा प्रसारण किया गया ।
छत्तीसगढ़ की पंचम विधान सभा में पहली बार 28 मान. सदस्यों ने सदन मे छत्तीसगढ़ी भाषा में शपथ ली । डॉ. महंत ने फरवरी, 2019 सत्र में महिला एवं बाल विकास विभाग की चर्चा में केवल मान. महिला सदस्यों को चर्चा में भाग लेने का अवसर प्रदान किया । 25 नवम्बर, 2019 से सत्र की कार्यवाही के प्रथम दिवस राष्ट्रगीत ‘‘वंदे मातरम’’ के साथ राज्य गीत ‘‘अरपा पइरी के धार’’ का सदन में गायन हुआ। भारत के संविधान के अंगीकरण की 70 वीं वर्षगांठ पर 26 नवम्बर, 2019 को सभा में विशेष चर्चा कराई गई। दिनांक 28 नवम्बर, को ‘‘छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस‘‘ के अवसर पर मान. अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत की व्यवस्था के फलस्वरूप सदन की सम्पूर्ण कार्यवाही छत्तीसगढ़ी भाषा में सम्पन्न हुई । इससे यह स्थापित हुआ कि छत्तीसगढ़ विधान सभा अपनी लोक-संस्कृति, लोक-परम्परा और लोकाचार के प्रति पूर्णत: सजग और गंभीर है ।
डॉ. चरणदास महंत की परिकल्पना के अनुरूप 29 अगस्त, 2020 को नवा रायपुर के सेक्टर-19 में नवीन विधान सभा भवन के निर्माण हेतु भूमिपूजन का कार्यक्रम भी संपन्न हुआ ।
छत्तीसगढ़ की पंचम विधान सभा के कार्यकाल से छत्तीसगढ़ विधानसभा की अशोधित कार्यवाही को वेबसाइट पर आनलाईन उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे कि सभी मान. सदस्य, पत्रकारगण एवं आम नागरिक इस सुविधा का अधिक से अधिक लाभ ले सकें ।
छत्तीसगढ़ में कोरोना काल में विषम एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विधान सभा सत्र आहूत किया गया, जबकि संसद और अन्य राज्यों में सत्रों को स्थगित कर दिया गया । यद्यपि छत्तीगढ़ विधान सभा में भी कोविड-19 के संक्रमण के दौरान सत्र का आयोजन चुनौतीपूर्ण था। लेकिन सजगता एवं सावधानी पूर्वक समस्त बातों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2020 में विधान सभा के 05 सत्र आहूत किये गये । छत्तीसगढ़ विधान सभा में वर्ष 2019 के मानसून एवं शीतकालीन सत्र में जितनी बैठकें हुई वर्ष 2020 के कोरोना काल में भी मानसून एवं शीतकालीन सत्र में उतनी ही बैठकें हुई इसका तात्पर्य यह है कि कोरोना की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद छत्तीसगढ़ विधान सभा ने अपने कुशल प्रबंधन के माध्यम से सत्र की बैठकें आयोजित कर संसदीय प्रजातांत्रिक मूल्यों को जीवित रखा ।
कोविड-19 संक्रमण के दौरान विधान सभा में ग्लास-पार्टीशन के माध्यम से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन निश्चित रूप से सराहनीय एवं अनुकरणीय था । विधायकों के परिसर एवं सदन में प्रवेश के पहले उनकी सम्पूर्ण जॉच की व्यवस्था की गयी । सदन में बैठक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए थ्री एवं फोर सीटर सोफे के स्थान पर टू-सीटर सोफे तैयार कराये गये, जिससे कि सोफों के बीच सुलभ तरीके से आवागमन एवं ग्लास पार्टीशन हो सके । कोरोना की विषम परिस्थितियों में जब सदन की समस्त दीर्घाए बंद कर दी गयी थी, सदन की कार्यवाही आम जनता तक पहुॅच सके, इसके लिए विधान सभा परिसर स्थित प्रेक्षागृह में सामाजिक दूरी का पूरी तरह से पालन करते हुए मीडिया के प्रतिनिधियों के लिए एक बड़ी स्क्रीन में सभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण कर देखने की व्यवस्था की गयी ।
पिछले सत्र में तो मीडिया प्रतिनिधियों की मांग के अनुरूप उन्हें पत्रकार दीर्घा के साथ दर्शक दीर्घा में सामाजिक दूरी का पालन करते हुए कवरेज की अनुमति दी गई । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों/ कैमरामेन को भी सदन के समीप स्थान उपलब्ध कराया गया, जिससे सदन की कार्यवाही से संबंधित मान. मुख्यमंत्री, मान. मंत्रीगण एवं मान. सदस्यों की विषय-विशेष पर प्रतिक्रिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से आम जनता तक पहुंच सके ।
आरंभ से लेकर अब तक छत्तीसगढ़ विधान सभा ने संसदीय मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन के साथ-साथ अपनी सामाजिक सरोकारिता को भी सिद्ध किया है। यहॉ जो उत्कृष्ट संसदीय वातावरण बना हुआ है इसका पूरा श्रेय सदन के सभी सम्माननीय सदस्यों को जाता है । जिन्होंने पक्ष-प्रतिपक्ष की भूमिका से ऊपर उठकर अपनी दलीय प्रतिबद्धता के बावजूद प्रत्येक परिस्थिति में सदन में परस्पर सम्मान, सौहार्द्र एवं समादर का भाव बनाये रखा है।
-ध्रुव गुप्त
आज देश में स्त्री शिक्षा की अलख जगाने वाली और स्त्रियों के अधिकारों की योद्धा सावित्री बाई फुले की जयंती है। यह सुखद है कि देश उन्हें नहीं भूला है। हां, यह देखकर तकलीफ जरूर होती है कि स्त्री शिक्षा, विशेषकर मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा के लिए जीवन भर उनके साथ कदम से कदम मिलाकर काम करने वाली फातिमा शेख को लोगों ने विस्मृत ही कर दिया है। फातिमा शेख के बगैर सावित्री बाई की कहानी भी अधूरी है और उपलब्धियां भी। यह वह समय था जब सावित्री बाई और उनके पति जोतीराव फुले द्वारा लड़कियों को घर से निकालकर स्कूल ले जाने की कोशिशों का सनातनियों द्वारा प्रबल विरोध हो रहा था। चौतरफा विरोध के बीच पति-पत्नी को अपना घर छोडक़र जाना पडा था। पूना के गंजपेठ के उनके एक दोस्त उस्मान शेख ने उन्हें रहने के लिए अपना घर दिया। उस्मान के घर में ही उन दोनों का पहला स्कूल शुरू हुआ। उस्मान की बहन फातिमा ने इसी स्कूल में शिक्षा हासिल की और अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद सावित्री बाई के साथ उसी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। वह देश की पहली मुस्लिम महिला थीं जिन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित किया था। वे घर-घर जाकर लोगों को लड़कियों की शिक्षा की आवश्यकता समझातीं और अभिभावकों को उन्हें स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करतीं थी। शुरू-शुरू में फ़ातिमा जी को बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ा। रूढि़वादी मुस्लिमों में उनका विरोध भी हुआ और उनका मज़ाक भी बना। उनकी लगातार कोशिशों से धीरे-धीरे लोगों के विचारों में परिवर्तन आने लगा और स्कूल में मुस्लिम लड़कियों की उपस्थिति बढऩे लगी। उस वक़्त के मुस्लिम समाज की दृष्टि से यह क्रांतिकारी परिवर्तन था और इस परिवर्तन की सूत्रधार बनीं फातिमा शेख।
आज सावित्री बाई फुले की जयंती पर उन्हें और स्त्री शिक्षा के अभियान में उनकी सहयात्री बनी फातिमा शेख को नमन !
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वाह प्रांत में एक कृष्ण मंदिर को भीड़ ने ढहा दिया। उस भीड़ को भडक़ाया मौलाना मोहम्मद शरीफ ने, जिसका कहना था कि किसी मुस्लिम देश में मंदिरों को ढहाना तो पुण्य-कर्म है। ‘जमीयते उलेमा इस्लाम’ के इस नेता के साथ गए लगभग एक हजार लोगों ने इस मंदिर को ढहाते वक्त सोचा होगा कि उनके इस कारे-सवाब (पुण्य कर्म) पर पाकिस्तान की सरकार उनकी पीठ ठोकेगी लेकिन पाकिस्तान के उस सीमांत प्रांत की पुलिस ने दर्जनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया है और 350 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं इस कुकर्म का संज्ञान लिया है और अब आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत इन पर मुकदमा भी चलेगा। खैबर-पख्तूनख्वाह के मुख्यमंत्री ने उस मंदिर के पुनर्निमाण की घोषणा की है और यह भी कहा है कि इस्लाम किसी के भी पूजा-स्थल को ध्वस्त करने की इजाजत नहीं देता। पाकिस्तान के नेताओं की इस तरह की घोषणाओं का महत्व क्या है? आम जनता तो जाकिऱ नाइक जैसे मौलानाओं के फतवों को सही मानती है।
नाइक ने मलेशिया में बैठे हुए बयान जारी किया है कि किसी इस्लामी देश में मंदिर वगैरह होने ही नहीं चाहिए। इस मूर्खतापूर्ण ख़्याल को अमली जामा पहनाने के लिए अनेक मुस्लिम बादशाहों और आक्रांताओं ने भारत, अफगानिस्तान तथा एशिया और यूरोप के कई देशों में मंदिरों और गिरजाघरों को तबाह किया है लेकिन उनसे कोई पूछे कि यदि यही नियम अन्य मजहबों के लोग मस्जिदों और दरगाहों पर लागू कर दें तो कैसा रहेगा? क्या एशिया, यूरोप और अमरीकी महाद्वीप के ज्यादातर देशों में कोई मस्जिद बच पाएगी? जिन देशों में हिंदू, ईसाई, यहूदी या कम्युनिस्ट बहुसंख्या में हैं, क्या वहां इस्लाम का नामो-निशान भी बच पाएगा ? दुनिया के लगभग 200 देशों में रहने वाले शांतिप्रिय और सभ्य मुसलमानों का जीना क्या ये कट्टरपंथी मौलाना दूभर नहीं कर देंगे? एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान की विफलता का मूल कारण यही है। आज के पाकिस्तान ने जिन्ना के सपनों के पाकिस्तान को उल्टा टांग रखा है। पाकिस्तान बनाने वालों का संकल्प यही था कि वे ‘पाक’ याने ‘पवित्र’ स्थान बनाएंगे। जहां मजहबी तास्सुब (भेदभाव) की कोई जगह नहीं होगी लेकिन अपनी नापाक हरकतों के कारण पाकिस्तान सारी दुनिया में बदनाम हो गया है।
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं उसका हुक्का-पानी बंद करने पर उतारु हैं। इस्लाम की बेहतर नहीं, बदतर मिसाल बनता जा रहा है, पाकिस्तान जबकि संयुक्त अरब अमारात (यूएई) इस्लाम का उदारवादी चेहरा बनकर उभर रहा है। पाकिस्तान जब बना था, वहां 480 मंदिर थे। अब 20 भी नहीं हैं। उसकी 15 प्रतिशत आबादी हिंदू थी। अब दो प्रतिशत भी नहीं है।
उसके कई प्रधानमंत्रियों-बेनजीर भुट्टो, नवाज शरीफ, इमरान खान, चौधरी शुजात हुसैन, शौकत अजीज आदि को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता रहा हूं। उनमें से कुछ ने मुझे पाकिस्तान के हिंदू मंदिरों की यात्रा के लिए प्रेरित भी किया लेकिन इस्लाम के ठेकेदार बने कट्टरपंथियों को कौन समझाए ? वे इस्लाम और पाकिस्तान, दोनों की कुसेवा कर रहे हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-सैय्यद खुर्रम रज़ा
शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही और विरोध प्रदर्शन करने वाले किसानों को खालिस्तानी कहने से देश को लंबे समय में नुकसान ही होगा। अहंकार से सुशासन नहीं आता। सरकार को आग से खेलने से बाज आना चाहिए।
शाहीन बाग धरने को महामारी की वजह से खत्म करना पड़ा। आजाद हिन्दुस्तान में पहली बार मुस्लिम महिलाएं घर से बाहर आईं और उन्होंने नए नागरिकता संशोधन कानून और प्रस्तावित एनआरसी का विरोध शुरू किया। मौसम तब भी कम बेरहम नहीं था। लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। 14 दिसंबर, 2019 को विरोध प्रदर्शन शुरू किया और तब तक जारी रखा जब तक पैर पसारती महामारी ने उन्हें कदम पीछे खींचने के लिए मजबूर नहीं कर दिया। महामारी से ऐन पहले मैं शाहीन बाग गया था और अभी 26 दिसंबर को सिंघु बॉर्डर गया जहां नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। शाहीन बाग में लोग नए नागरिकता कानून को वापस लेने की मांग कर रहे थे, सिंघु बॉर्डर पर जमे लोग कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
सिंघु बॉर्डर जाने से मुझे यह बात तो कायदे से समझ में आ गई कि जो लोग दोनों विरोध प्रदर्शनों में रिश्ता खोजने में जुटे हुए हैं, वे दोनों ही प्रदर्शनकारियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। जो लोग कहते हैं कि किसानों के विरोध के पीछे वही लोग हैं जो शाहीन बाग के विरोध के पीछे थे, वे दरअसल प्रदर्शनकारी किसानों की चिंताओं का अपमान कर रहे हैं। हां, इनमें एक बात जरूर आम है कि दोनों स्थलों पर प्रदर्शनकारी बीजेपी के बहुमत वाली संसद से बने नए कानूनों के विरोध के लिए सड़क पर निकले।
सिंघु बॉर्डर पर पहुंचते ही यह साफ हो जाता है कि प्रदर्शनकारी किसानों में ज्यादातर पंजाब और हरियाणा के हैं और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि यह इलाका दिल्ली-चंडीगढ़ हाईवे पर है। दोनों मामलों में जोशो खरोश भी एक-सा है लेकिन कई मामलों में ये दोनों प्रदर्शन अलग हैं। चूंकि शाहीन बाग का विरोध जामिया विश्वविद्यालय में हिंसा के दो दिन बाद शुरू हुआ, इस पर छात्रों और शिक्षाविदों का प्रभाव था। शाहीन बाग में इंडिया गेट की प्रतिकृति बनाई गई थी, पुस्तकालय बनाए गए थे, ऊंची कक्षाके छात्र नीचे की कक्षा के छात्रों को पढ़ा रहे थे और देशभक्ति के गीत गाए जा रहे थे। लेकिन सिंघु सीमा पर नजारा अलग है। हर पचास मीटर पर मेडिकल स्टॉल और डॉक्टर। जगह-जगह मुफ्त में इलाज हो रहा है। लंगर चल रहा है। कुछ लोग तो ब्रेड बनाने की मशीन और देसी गीजर भी लेकर आए हैं। चूंकि विरोध करने वाले किसान संपन्न हैं, वे बड़ी संख्या में जरूरत की हर चीज का खर्च उठाने की स्थिति में हैं।
प्रदर्शन स्थल कई किलोमीटर में फैला हुआ है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, पिज्जा और अन्य खाद्य पदार्थों के लिए लंबी कतारें दिखाई देती हैं। फुटपाथ पर खड़े होकर लोग मूंगफली, नमकीन वगैरह बांट रहे हैं। ठंड के इस मौसम में चाय की बड़ी तलब महसूस होती है, सो जगह-जगह इसका इंतजाम है। लेकिन कहीं नॉन-वेज खाना नहीं है। किसान अच्छी तरह जानते हैं कि शाहीन बाग के प्रदर्शन को बिरयानी के नाम पर बदनाम किया गया इसलिए ऐतिहासिक रूप से सिख-मुस्लिम एकता के लिए प्रसिद्ध मालेरकोटला के मुस्लिम किसान जर्दा बांट रहे हैं, न कि बिरयानी। जर्दा मुस्लिम समारोहों में परोसा जाने वाले मीठे चावल को कहते हैं। दरअसल, यहां देघ देखकर हम भी रुक गए थे। देघ वह बर्तन है जिनमें आमतौर पर बिरयानी बनाई जाती है। लेकिन नजदीक लगे टेंट पर लटके इस बोर्ड को देख-पढ़कर हम भी मुस्कुराए बिना नहीं रहेः आपकी आंखों पर पर्दा है, यह बिरयानी नहीं जर्दा है।
सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शनकारी ज्यादा मुखर हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ बोलने से कतराते नहीं। कार सेवा करने वाले युवाओं और किशोरों को भी पता है किवे यहां क्यों हैं, उनकी मांग क्या है और वे यह सब बताने को भी तैयार हैं।
सिंघु बॉर्डर पर एक चीज बिल्कुल नई है और वह है बड़ी तादादमें घोड़ों की मौजूदगी। निहंग सिख घोड़ों पर पंजाब से आए हैं। एक ओर खुद को जंजीरों से बांधकर नए कृषि कानूनों के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार करता एक किसान दिखा। विरोध स्थल पर दिए जा रहे भाषणों की लाइव स्ट्रीमिंग का इंतजाम किया गया है। इतना तो साफ है कि सिंघु बॉर्डर और शाहीन बाग का नजारा और इनमें भाग लेने वाले बिल्कुल अलग हैं लेकिन दोनों में जोशो खरोश तो एक-जैसा ही दिखता है।
कड़कड़ाती ठंड के बीच सड़क पर डेरा जमाए किसानों को एक माह से ज्यादा समय हो चुका है और सरकार इस विरोध प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ रही। वह इन लोगों की मांग पर गौर करने को तैयार ही नहीं। हालां कि ये प्रदर्शनकारी किसान शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से ज्यादा खुशकिस्मत हैं क्योंकि सरकार उनसे बात कर रही है। शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को तो उनके हाल पर छोड़ दिया गया था और उन्हें सुनने वाला कोई नहीं था।
नए नागरिकता कानून की वजह से समाज का एक वर्ग पहले से ही गुस्से और हताशा में था और अब समाज का एक और वर्ग- किसान कृषि कानूनों को लेकर सड़कों पर है। सरकार ने सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों और कृषि कानून विरोधियों का ही भरोसा नहीं खोया है बल्कि पिछले दो वर्षों में एनडीए के तीन सहयोगियों का समर्थन भी खो दिया है। यह सरकार के लिए चेतावनी का संकेत होना चाहिए।
शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही और विरोध प्रदर्शन करने वाले किसानों को खालिस्तानी कहने से देश को लंबे समय में नुकसान ही होगा। अहंकार से सुशासन नहीं आता। सरकार को आग से खेलने से बाज आना चाहिए। संसद में संख्या बल की वजह से अहंकार में नहीं डूबना चाहिए बल्कि विनम्र हो जाना चाहिए। वही सुशासन का सही नुस्खा है।(https://www.navjivanindia.com/)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने कमाल कर दिया है। अपनी विधानसभा में उसने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीनों कृषि-कानूनों की भर्त्सना की गई है। उसमें केंद्र सरकार से कहा गया है कि वह तीनों कानूनों को वापस ले ले। केरल की सरकार ने वह काम कर दिखाया है, जो पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी सरकारें भी नहीं कर सकीं।
केरल ने केंद्र की यह जो सरकारी निंदा की है, वैसी निंदा मुझे याद नहीं पड़ता कि पहले कभी किसी राज्य सरकार ने की है। और मजा तो इस बात का है कि केरल वह राज्य है, जिसमें केंद्र सरकार के इन तीनों कृषि-कानूनों का कोई खास प्रभाव नहीं होनेवाला है। केरल में न्यूनतम समर्थन मूल्यवाले पदार्थों की खेती बहुत कम होती है। वहां सरकारी खरीद और भंडारण नगण्य है। वहां साग-सब्जी और फलों की पैदावार कुल खेती की 80 प्रतिशत है। केरल सरकार ने 16 सब्जियों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किए हुए हैं। इसके अलावा किसानों की सहायता के लिए 32 करोड़ रु. की राशि अलग की हुई है। इसके बावजूद उसने कृषि-कानूनों पर भर्त्सना-प्रस्ताव पारित किया है याने मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त। केरल ने आ बैल सींग मार की कहावत को चरितार्थ कर दिया है। इसीलिए राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने इसी मुद्दे पर विधानसभा बुलाने की अनुमति टाल दी थी। केरल का मंत्रिमंडल एक दिन के नोटिस पर विधानसभा आहूत करना चाहता था। उसे चाहिए था कि राज्यपाल के संकोच के बाद वह अपना दुराग्रह छोड़ देता लेकिन अब यह प्रस्ताव पारित करके उसने मजाकिया काम कर डाला। आश्चर्य यह भी है कि भाजपा के एक मात्र विधायक ओ. राजगोपाल ने भी इस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया। कांग्रेसी विधायकों ने भी इसका समर्थन किया लेकिन उनको दुख है कि इसमें मोदी सरकार की भर्त्सना नहीं की गई। इस प्रस्ताव में उक्त कानूनों के बारे में जो संदेह व्यक्त किए गए हैं, वे निराधार नहीं हैं और कानून बनाते वक्त केंद्र सरकार ने जिस हड़बड़ी का परिचय दिया है, उसकी आलोचना भी तर्कपूर्ण है लेकिन यह काम तो केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन अपना बयान जारी करके या प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर भी कर सकते थे। विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर किसी केंद्रीय कानून को वापस लेने की मांग करना मुझे काफी अतिवादी कदम मालूम पड़ता है। ऐसे कदम स्वस्थ संघवाद के लिए शुभ नहीं कहे जा सकते।
(नया इंडिया की अनुमति से)
Richard Mahapatra, Anil Ashwani Sharma, Vivek Mishra-
भारत ने 1 जनवरी, 2020 को उम्मीदों और आकांक्षाओं के अलावा एक अन्य वजह के साथ नए साल का स्वागत किया था। इसने इस दिन दुनिया में सबसे अधिक जन्म लेने वाले बच्चों का वैश्विक खिताब अपने नाम किया। इस दिन दुनिया में जन्मे कुल 400,000 बच्चों में से 67,385 भारत में पैदा हुए थे। बच्चों और स्वास्थ्य की तरफ ध्यान खींचने के लिए संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) हर साल इस दिन का यह औपचारिक आंकड़ा जारी करता है। उस दिन यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक, हेनरीएटा फोर ने मीडिया को बताया “एक नए साल और एक नए दशक की शुरुआत न केवल हमारे भविष्य के लिए हमारी उम्मीदों और आकांक्षाओं को, बल्कि हमारे बाद आने वालों के भविष्य को प्रतिबिंबित करने का भी मौका होती हैं।” किसी घटना के होने के बाद उपजी समझदारी में यह सामान्य सा संदेश भविष्य में घटने वाली चीजों की पूर्व चेतावनी के रूप में पढ़ा जा सकता है।
अतीत में झांके तो 31 दिसंबर, 2019 से ठीक एक दिन पहले चीन ने वुहान प्रांत में कोरोनो वायरस संक्रमण का पहला मामला दर्ज किया था। इसका कोई औपचारिक नाम नहीं था और ज्यादातर लोगों ने इसे नोवेल कोरोना वायरस या 2019-एनओसीवी नाम दिया था। चीन की अति संरक्षित शासन के बीच से छिट-पुट मामले ही रिसकर बाहर आ पाए थे। 30 जनवरी, 2020 को भारत ने इस बीमारी का पहला मामला सामने आया। 11 फरवरी, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे नोवेल कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी का औपचारिक नाम दिया, जो कुछ ही हफ्ते में तेजी से फैलने वाली महामारी बन गई। हमने पहली बार इसका डरावना नाम सुना : कोविड-19– जिसमें ‘को’का मतलब कोरोना, ‘वि’का मतलब वायरस और ‘डी’का आशय बीमारी के लिए व ‘19’ का प्रयोग 2019 के लिए है।

भारत में दिसंबर 31, 2020 तक 2.5 करोड़ से ज्यादा बच्चे जन्म ले चुके होंगे। यानी एक पूरी पीढ़ी ने सदी की सबसे लंबी महामारी के दौरान जन्म ले लिया। जब ये बच्चे बड़े होंगे तो इनकी याददाश्त में महामारी एक निर्णायक मिसाल के तौर पर होगी। और महामारी का सामना करने वाली मौजूदा पीढ़ी के रूप में 0-14 वर्ष आयु वर्ग के 35 करोड़ से ज्यादा बच्चे इसके अलग-अलग तरह के असर को अपनी जिंदगी तक ढोएंगे। इस अभूतपूर्व संकट में महामारी ने हमारे अस्तित्व के सभी पहलू पर असर डाला है; हर कोई भविष्य को ज्यादा अनिश्चितता के साथ देखने लगा है। इसने अक्सर न पूछे जाने वाले असामान्य सवालों को जन्म दिया है। मसलन, महामारी के दौरान जिस नई पीढ़ी ने जन्म लिया है, वह इसे कैसे याद करेगी? प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट कहती है कि “किसी व्यक्ति की आयु उसके स्वभाव और व्यवहार में अंतर का पूर्वानुमान करने वाले सबसे आम उपायों में से एक हैं।” भले ही, 15-25 वर्षों के अंतर पर पैदा होने वाले समूह को “पीढ़ी” मानने की एक सामान्य परिभाषा है, लेकिन हम किसी बड़ी घटना या गतिविधि के संदर्भ के साथ भी किसी एक पीढ़ी की पहचान करते हैं। उदाहरण के लिए, हम भारत में 1991 के बाद जन्म लेने वालों को पीढ़ी कहते हैं, क्योंकि इस साल को “मुक्त बाजार” के लिए पहचाना जाता है, जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोल दिया था।
इसलिए, हम नवजात शिशुओं और पांच साल से कम उम्र के बच्चों को ‘महामारी की पीढ़ी’ कह सकते हैं। जाने या अनजाने में, यह पीढ़ी महामारी से सबसे ज्यादा पीड़ित रही है। यूनिसेफ का अनुमान है कि 91 फीसदी बच्चों ने अपने स्कूल के समय में बदलाव का सामना किया, जिसका उनकी पढ़ाई पर असर पड़ा। भारत के मामले में इसका एक मतलब यह भी था कि अधिकांश बच्चों को स्कूल की कैंटीन में मिलने वाला मिड-डे-मील और आंगनबाड़ी का खाना नहीं मिला, जिसे सही पोषण सुनिश्चित करने के लिए सरकार की ओर से चलाया जाता है। वैश्विक स्तर पर, यूनिसेफ के आंकड़े के अनुसार, लगभग 11.9 करोड़ बच्चों को महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुविधा और यहां तक कि जीवन-रक्षक टीकाकरण तक नहीं मिल सका। गैर-लाभकारी संगठन सेव द चिल्ड्रन के अलग-अलग सर्वेक्षणों से सामने आया कि सर्वेक्षण में शामिल 50 प्रतिशत बच्चों ने “चिंतित”,और उनमें से एक तिहाई बच्चों ने “भय” महसूस होने की जानकारी दी। ये दोनों ही बातें उलझन और सब कुछ सुखद होने में कमी का इशारा देती हैं। इस पीढ़ी का महत्व इस तथ्य से उभरता है कि 2040 तक वे भारत जैसे देश की कुल कामकाजी आबादी का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा होंगे।
हमारी दुनिया में फैली विकास की असमानता के बावजूद, महामारी में पैदा हुई पीढ़ी पहले से कहीं अधिक सेहतमंद और समृद्ध दुनिया आई है। हमारे विपरीत, अभी-अभी पैदा हुई नई पीढ़ी को यह याद नहीं रहेगा कि इस पैमाने की महामारी को सहने के लिए इसने हमसे क्या कुछ छीन लिया। क्या इसका यह मतलब है कि वे एक सामान्य पीढ़ी होगी, जो महामारी के बारे में इतिहास की किताबों में पढ़ेगी? हमारी तरह जिन्होंने 1918-20 के स्पैनिश फ्लू महामारी के बारे में किताबों में पढ़ा है? इस जवाब को पाने की कोशिश करने से पहले, यहां पर पुरानी महामारियों या ऐसे ही संकटों के कुछ ऐतिहासिक विवरणों को देखना चाहिए। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने पाया है कि 1918 की महामारी के दौरान पैदा हुए या गर्भ में रहे बच्चों को वयस्क के रूप में कम शिक्षा मिली और वे गरीब भी रहे।
2008 की आर्थिक मंदी के दौरान गर्भवती माताओं, खास तौर पर गरीब परिवारों में, ने कम वजन के शिशुओं को जन्म दिया। 1998 में, एल नीनो के चलते इक्वाडोर में विनाशकारी बाढ़ आई । इस दौरान यहां पैदा हुए बच्चे कम वजन वाले थे और उनमें बौनेपन की समस्या 5-7 साल तक जारी रही। संकट जैसी इन सभी घटनाओं के बाद पड़े प्रभावों में एक बात आम है कि माली हालत खराब होने से विभिन्न तरह के दुष्प्रभाव बढ़ जाते हैं। इसलिए, उपरोक्त प्रश्न का जबाव डराने वाला है। और हमारे पास इसके शुरुआती संकेत मौजूद हैं कि इस सदी की महामारी में जन्मी पीढ़ी की हालत पिछली महामारी में जन्मी पीढ़ी के मुकाबले अलग नहीं होगी। हाल ही में जारी विश्व बैंक की ओर से तैयार किया गया दुनिया का मानव पूंजी सूचकांक (एचसीआई) बताता है कि महामारी में जन्म लेने वाली पीढ़ी इससे सबसे ज्यादा पीड़ित होगी। 2040 में वयस्क होने वाली पीढ़ी कम लंबाई की होगी; मानव पूंजी के मामले में पीछे रहेगी और दुनिया के लिए सबसे कठिन विकास चुनौती भी हो सकती है। एचसीआई में “मानव पूंजी का आकलन होता है जो आज जन्म लेने वाला एक बच्चा अपने 18वें जन्मदिन तक पाने की उम्मीद कर सकता है।” इसमें अब नवजात शिशु के स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार और इससे उसकी भविष्य की उत्पादकता कैसे प्रभावित होगी यह शामिल है।
कोविड-19 पिछली महामारियों की तरह किसी बच्चे या गर्भवती मां की सेहत को प्रभावित नहीं करेगी। लेकिन, महामारी के आर्थिक प्रभाव इस पीढ़ी को तबाह करने वाले होंगे, जिनमें मां के गर्भ में मौजूद बच्चे भी शामिल हैं। इसकी सबसे सरल वजह है कि एक गरीब परिवार स्वास्थ्य, भोजन और शिक्षा पर ज्यादा खर्च नहीं कर पाएगा। बाल मृत्यु दर ऊंची होगी और जो जीवित बच जाएंगे, उनमें बौनेपन की समस्या होगी। इसके अलावा, व्यवस्था बिगड़ने से लाखों बच्चों और गर्भवती माताओं को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल रहीं। एचसीआई के अनुमानों के मुताबिक, कम और मध्यम आय वाले 118 देशों में बाल मृत्यु दर 45 फीसदी बढ़ जाएगी। विश्लेषण से साफ है कि प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 10 फीसदी बढ़ोतरी बाल मृत्यु दर में 4.5 फीसदी गिरावट लाती है। अलग-अलग अनुमानों को देखते हुए साफ है कि अधिकांश देश महामारी की वजह से जीडीपी में बड़ी गिरावट का सामना करने जा रहे हैं। यह इशारा करता है कि बाल मृत्यु दर पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
अक्टूबर, 2020 में संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों ने दुनिया भर में मृत बच्चों का जन्म (स्टिलबर्थ्स) - ऐसे बच्चे का जन्म, जिसमें 28 सप्ताह या इससे ज्यादा की गर्भावस्था पर जीवन का कोई संकेत नहीं है- का संयुक्त अनुमान जारी किया। 2019 में दुनिया भर में कुल 19 लाख मृत बच्चों का जन्म हुआ, जिनमें से 3.4 लाख बच्चे भारत में जन्मे थे, जो इस तरह के बोझ के मामले में भारत को सबसे बड़ा देश बना देता है। भारत ने ऊंची संख्या के बावजूद मृत बच्चों के जन्म में कमी लाने में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। लेकिन साझा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कोविड-19 महामारी भारत समेत पूरी दुनिया में मृत बच्चों के जन्म की संख्या बढ़ा सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं में आई दिक्कतों के कारण महामारी महज 12 महीनों के भीतर (2020-21 के दौरान) निम्न और मध्यम आय वाले 117 देशों में 200,000 से ज्यादा मृत बच्चों के जन्म का कारण बन जाएगी।
यह ऐसे वक्त में है, जब दुनिया ने कुपोषण और गरीबी को घटाने के लिए बहुत कुछ किया है। नये सूचकांक ने स्पष्ट रूप से इस सच्चाई को सामने ला दिया है कि भले ही महामारी एक अस्थायी झटका हो, फिर भी यह अपने पीछे नई पीढ़ी के बच्चों पर कमजोर करने वाले प्रभावों को छोड़ने जा रही है।
जुलाई, 2020 में ग्लोबल हेल्थ साइंस जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि कोविड-19 को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन से पैदा खाद्य के झटके भारत में कुपोषण का बोझ बढ़ा सकते हैं। यह अध्ययन भरपूर आहार नहीं मिलने के कारण वजन घटने के नतीजों पर आधारित है। वजन में पांच फीसदी का नुकसान होने की स्थिति में, भारत कम वजन के 4,393,178 और अति दुर्बलता (वास्टिंग) के 5,140,396 अतिरिक्त मामलों का सामना करेगा। अध्ययन के मुताबिक, गंभीर रूप से कम वजन और अति दुर्बलता के मामले भी बढ़ने का अनुमान है। अध्ययन में कहा गया है कि बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे और कम वजन और अतिदुर्बलता के अतिरिक्त मामलों में गरीब परिवारों की हिस्सा सबसे ज्यादा होगा।
जिसने अभी-अभी जन्म लिया है, इस पीढ़ी के लिए दुनिया के गंभीर होने का यही वक्त है। हम पहले से ही विकास की कमी से जूझ रही अपनी वंचित पीढ़ियों में और इजाफा नहीं कर सकते।

गैर-बराबरी और महामारी
हर सभ्यताओं ने अपनी बीमारियों और महामारियों को जन्म दिया है, यह चर्चित कथन दिवंगत माइक्रोबायोलॉजिस्ट और पर्यावरणविद् रेने डुबोस का है। जो शायद कोरोना विषाणु की इस वैश्विक महामारी के वक्त ज्यादा ध्यान देने लायक बन गया है। यह महामारी हमारे लिए क्या लेकर आएगी, एक शब्द में कहें तो गैर-बराबरी, जिसे अब चर्चित तौर पर “असमानता की महामारी” के रूप में उल्लेख किया जा रहा है। महामारी पर वैश्विक बातचीत दरअसल भूख, गरीबी और असमानता के प्रभावों के इर्द-गिर्द ही घूमती है, जिसने इस दुनिया को फिसलाकर एक बार फिर उसी जगह पर पहुंचा दिया है, जहां से इसने विभिन्न वैश्विक लक्ष्यों जैसे कि सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स ) और सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के बारे में बातें करनी शुरू की थी। अनुमान और विश्लेषण बताता है कि महामारी ने चाहे विकसित हों या फिर विकासशील देश दोनों ही जगह पहले से ही गरीब लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। 2020 नेल्सन मंडेला वार्षिक व्याख्यान में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा “कोविड-19 महामारी ने बढ़ती असमानताओं को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई है। इसने इस मिथक की कलई खोल दी है कि सभी लोग एक ही कश्ती में सवार हैं। जब हम सभी एक ही समुद्र में तैर रहे हैं, तो यह भी स्पष्ट है कि कुछ लोग सुविधा संपन्न पाल नौकाओं में हैं, जबकि अन्य समुद्र में तैरते मलबे से चिपके हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया ने बहुत लंबे समय तक गैर-बराबरी को नजरअंदाज किया है, महामारी के दौरान गरीबों को आगे और अधिक जोखिम में डाल दिया है।
ऐसा नहीं है कि दुनिया ने केवल महामारी के चलते आई मंदी को पहली बार देखा है, बल्कि 1870 के बाद “प्रति व्यक्ति आय में सबसे तेज गिरावट” भी देखी है। निश्चित तौर पर वैश्विक आर्थिक गिरावट का असर बहुत तेजी से रिसकर गरीबों तक पहुंचा है। दुनिया भर में फैले एक गैर-लाभकारी संगठन ऑक्सफैम ने अनुमान लगाया है कि महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, खाद्य उत्पादन और आपूर्ति बाधित होने की वजह के 12.1 करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर आ गए हैं। ऑक्सफैम ने घोषित किया कि “कोविड संबंधी भूख के चलते रोजाना 12,000 लोग मर सकते हैं।” विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) के कार्यकारी निदेशक डेविड बेस्ले ने कहा, “कोरोनो वायरस के खिलाफ लड़ाई का अग्रिम मोर्चा अमीर दुनिया से खिसकर गरीब दुनिया की तरफ जा रहा है।” एक संवाददाता सम्मेलन में बेस्ले ने ऐलान किया कि वैश्विक संस्था लाखों लोगों तक भोजन पहुंचाने के लिए अपना अब तक का सबसे बड़ा मानवीय अभियान चला रही है।
डब्लूएफपी ने 2019 में 9.7 करोड़ लोगों की मदद की, जो उस वक्त रिकॉर्ड था। जुलाई 2020 तक, इसने 13.8 करोड़ लोगों की मदद की। जो लोग पहले से ही किसी तरह जिंदगी गुजार करहे थे या बाहर से आने वाली मदद पर जीवित थे, उनके बीच महामारी के कारण भूख का एक गंभीर संकट पैदा हो गया है। डब्लूएफपी के अनुसार, यह कार्यक्रम जिन देशों में चलाया जाता है, उनमें 2020 तक भूख के शिकार लोगों की संख्या बढ़कर 27 करोड़ पहुंच जाएगी। यह महामारी के तुरंत पहले के स्तर की तुलना में 82 फीसदी की बढ़ोतरी होगी।

हालांकि, भूख का भूगोल पहले जैसा ही है। कोविड-19 महामारी ने उन क्षेत्रों को प्रभावित किया जो पहले से ही सख्त संकट में घिरे थे। पश्चिम और मध्य अफ्रीका में भूख में बहुत स्पष्ट उछाल देखा गया, जिन्होंने खाद्यान्न के मामले में असुरक्षित आबादी में 135 फीसदी, और दक्षिणी अफ्रीका ने 90 फीसदी का उछाल देखा । इसी भौगोलिक इलाके ने जलवायु परिवर्तन, टकराव और विकास सहायता की कमी के प्रकोपों का भी सामना किया। (कोविड-19 से पहले) पिछले चार वर्षों में, खाद्यान्न के लिहाज से गंभीर रूप से असुरक्षित आबादी में 70 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। पहले, ये लोग “खाद्य असुरक्षा के गंभीर स्तर” में गिने नहीं जाते थे या उससे बच जाते थे। लेकिन वे एक बार फिर से गैर-आनुपातिक मात्रा में पीड़ित बन गए। बेस्ले ने कहा, “जब तक हमारे पास एक चिकित्सकीय टीका नहीं आ जाता, उस दिन तक भोजन ही इस अफरा-तफरी के खिलाफ सबसे अच्छा टीका है। इसके बगैर सामाजिक अशांति और विरोध-प्रदर्शनों में बढ़ोतरी, ऊंचा प्रवासन, गहरे संघर्ष और पहले भूख से सुरक्षित रही आबादी के बीच कुपोषण में बढ़ोतरी देख सकते हैं।”
वर्ष 1990 के बाद यह पहला मौका था, जब दुनिया भर में मानव विकास आकलन की अवधारणा को अपनाया गया कि 2020 में मानव विकास का पैमाना घट जाएगा। गैर-बराबरी ने पहले से गरीब और वंचित तबके को स्थिति में किसी भी सुधार के लाभ से बाहर कर दिया है। उदाहरण के लिए, पूर्वानुमान के अनुसार, 2021 में आर्थिक सुधार गरीबों पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल पाएंगे। समय के साथ, आर्थिक विकास की वजह से देशों के बीच आय की असमानता में घटी है। लेकिन वास्तविक तौर पर, 1990 के बाद देशों में आंतरिक स्तर पर आय की असमानता -गिनी गुणांक (संपत्ति का वितरण मापने का सांख्कीय उपाय) में चार फीसदी- तक बढ़ोतरी हुई है। वैश्विक स्तर असमानता में इस बढ़ोतरी का अगुवा चीन, भारत, इंडोनेशिया और अमेरिका में बढ़ती गैर-बराबरी थी। खाद्य और कृषि संगठन के आकलन से पता चला है कि कोविड-19 के कारण सभी देशों की गिनी में 2 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। इस मामले में, गरीबों की संख्या में 35-65 प्रतिशत की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो जाएगी। अकेले भारत में, महामारी के प्रभावों के कारण लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी की चपेट में आ जाएंगे। और इनमें से ज्यादातर लोग असंगठित क्षेत्रों के मजदूर हैं। यह एक बार फिर से दिखाता है कि महामारी के प्रभावों में किस कदर की विषमता मौजूद है।
कर्ज, विकासशील देश और महामारी
कोरोना महामारी से पस्त दुनिया खास तौर पर विकासशील देश कर्ज के बढ़ते बोझ और उसे समय से न चुका पाने की कमी के साथ आर्थिक मंदी जैसे खतरनाक हालातों करने की चुनौती वर्ष 2021 में खड़ी है। ऐसे असमंजस वाले आर्थिक हालात उभरे हैं जो शायद पहले कभी नहीं देखे गए। दुनिया के कई देशों पर कोविड-19 महामारी के पहले से ही कर्ज का भारी-भरकम बोझ था और तिस पर महामारी ने एक आपातस्थिति पैदा कर दी है। इस परिस्थिति ने सभी उपलब्ध अहम संसाधनों को दूसरी तरफ मोड़ दिया है। सिर्फ दो ही विकल्प बचे हैं: कर्ज को जारी रखना- जिसका मतलब है कि स्वास्थ्य की आपातकाल स्थिति से लड़ने के लिए पर्याप्त रूप से कम खर्च करना, या कर्ज न चुकाना।
दोनों ही संभव नहीं है। लेकिन कर्ज की अदायगी को अगर अस्थायी तौर पर रोक दिया जाए तो बाद वाले में बेहतर अवसर हैं । इस बाद वाले विकल्प को लेकर खासी चर्चा है, जिसे अक्सर “वैश्विक कर्ज समझौता” कहा जाता है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसे बहुपक्षीय विकास वित्तपोषण संस्थानों से शुरू होकर संयुक्त राष्ट्र और विकसित व विकासशील दोनों देशों के मंचों तक, कर्ज चुकाने को अस्थायी रूप से रोकने की मांग जोर पकड़ रही है। विकासशील और गरीब देशों के हिस्से में दुनिया की 70 फीसदी आबादी और 33 फीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आता है। महामारी के कारण, पहली बार दुनिया भर में गरीबी बढ़ रही है। ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) का एक पॉलिसी पेपर बताता है दुनिया भर में आर्थिक संकट के कारण विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था के लिए 2020 में बाहरी निजी पूंजी की उपलब्धता 2019 के स्तर के मुकाबले 700 अरब डॉलर कम हो जाएगी। यह 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के तुरंत बाद दर्ज की गई कमी के मुकाबले लगभग 60 फीसदी ज्यादा है। ओईसीडी ने कहा, “इसने विकास के मोर्चे पर नुकसान होने का खतरा बढ़ा दिया है, जिसके नतीजे में यह भविष्य में महामारी, जलवायु परिवर्तन और दुनिया के अन्य सार्वजनिक खतरों के प्रति हमारा जोखिम बढ़ा देगा।”
व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (अंकटाड) और आईएमएफ ने अनुमान लगाया कि विकासशील देशों को अपनी आबादी की आर्थिक सहायता और सुविधा देते हुए महामारी और इसके उतार-चढ़ाव वाले प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल 2.5 खरब डॉलर की जरूरत है। पहले ही 100 देशों ने आईएमएफ से तत्काल आर्थिक सहायता देने की मांग की थी। अफ्रीकी वित्त मंत्रियों ने 100 अरब डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज देने की अपील की थी। अफ्रीकी देशों के लिए इसमें से 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा कर्ज राहत के रूप में था। उन्होंने अगले साल ब्याज के भुगतान पर भी रोक लगाने की मांग की थी। अंकटाड के महासचिव मुखीसा कितुयी ने कहा, “अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को कर्ज चुकाने के लिए विकासशील देशों पर बढ़ते वित्तीय दबाव को घटाने के लिए तत्काल और अधिक कदम उठाने चाहिए, क्योंकि वे कोविड-19 के आर्थिक उठा-पटक के शिकार हैं।”अंकटाड के एक अनुमान के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष और 2021 में, विकासशील देशों को 2.6 खरब से लेकर 3.4 खरब डॉलर के बीच बाहर का सार्वजनिक कर्ज चुकाना होगा।
कोविड-19 महामारी की वजह से वित्तीय संकट एक ऐसे वक्त में आया, जब दुनिया पहले से ही भारी कर्ज में डूबी थी। 2018 में, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सार्वजनिक कर्ज उनकी सकल घरेलू उत्पाद के 51 फीसदी के बराबर था। 2016 के लिए उपलब्ध नए आंकड़ों के अनुसार, कम आय वाले देशों के पास अपने कर्ज का 55 फीसदी हिस्सा गैर-रियायती स्रोतों से था, जिसका अर्थ विश्व बैंक के लिए विशेष कर्ज विपरीत बाजार दर पर लिया गया कर्ज है। हाल के महीनों में कर्ज चुकाने को कुछ समय के लिए रोकने का एक सिलसिला बना है। 13 अप्रैल को, आईएमएफ ने 25 सबसे गरीब विकासशील देशों को अक्टूबर 2020 तक कर्ज न चुकाने की छूट दी। 15 अप्रैल को, जी 20 देशों ने सबसे गरीब देशों में से 73 को मई 2020 के अंत तक कर्ज न चुकाने की राहत दी। लेकिन ऐसी राहत – भले ही यह तत्काल मदद कर सकती है- अभी भी विकासशील देशों की महामारी से लड़ने का खर्च उठाने में मददगार नहीं होगी और इस प्रकार यह उन्हें शिक्षा और अन्य टीकाकरण कार्यक्रमों जैसे अन्य सामाजिक क्षेत्रों के वित्तीय संसाधनों को दूसरी जगहों पर लगाने के लिए मजबूर करेगा। अंकटाड के ग्लोबलाइजेशन डिवीजन, जो रिपोर्ट तैयार करती है, के निदेशक रिचर्ड कोजुल-राइट ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय एकजुटता के लिए हालिया आवाजें सही दिशा में हैं। लेकिन यह अपील अभी तक विकासशील देशों के लिए बहुत थोड़ी मदद ही जुटा पाई है, क्योंकि वे महामारी के तत्काल प्रभावों और इसके आर्थिक नतीजों से निपटने में जुटे हुए हैं।”
अंकटाड ने भविष्य में सार्वभौमिक कर्ज के पुनर्गठन को निर्देशित करने के लिए एक ज्यादा स्थायी अंतरराष्ट्रीय ढांचे के लिए संस्थागत और नियामकीय नींव रखने और उसे लागू करने की निगरानी के लिए एक इंटरनेशनल डेवलपिंग कंट्री डेब्ट अथरिटी बनाने का सुझाव दिया था। यह ‘वैश्विक कर्ज समझौते’ का एक हिस्सा है, जिसका अब बहुत से लोग समर्थन कर रहे हैं। यूएन ने सुझाव दिया है कि “सभी विकासशील देशों के लिए सभी तरह की कर्ज सेवाओं (द्विपक्षीय, बहुपक्षीय और वाणिज्यिक) पर पूरी तरह रोक होनी चाहिए। अत्यधिक कर्ज के बोझ वाले विकासशील देशों के लिए, संयुक्त राष्ट्र ने अतिरिक्त कर्ज राहत का सुझाव दिया, ताकि वे कर्ज चुकाने से न चूकें और उनके पास एसडीजी के तहत अन्य विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संसाधन भी रहे। बिना अधिक कर्ज के बोझ वाले विकासशील देशों के लिए, इसने महामारी से लड़ने के लिए आपातकालीन उपायों के वित्त पोषण के लिए नये कर्ज की मांग की है।
अक्टूबर में, विश्व बैंक ने एक बार फिर खतरे की घंटी बजाई थी। बैंक की एक नई रिपोर्ट में कहा गया था कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों का ज्यादातर बाहरी कर्ज लंबे समय के लिए है और इसका बड़ा हिस्सा सरकारों और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं पर बकाया है। गरीब देशों में लंबी अवधि के कर्ज में सरकारी और सरकार की गारंटी वाले कर्जदारों की जिम्मेदारी वाला हिस्सा 49 फीसदी तक बढ़ गया। 2019 में कम समय के कर्ज का हिस्सा गिरकर 16 फीसदी हो गया।
महामारी ने एक आपात स्थिति पैदा कर दी, जिसने सभी उपलब्ध संसाधनों की दिशा को मोड़ दिया। द लैंसेट कोविड-19 आयोग के एक बयान के मुताबिक, सरकार के सभी स्तर पर सरकारी राजस्व में भारी गिरावट देखी गई थी। आगे हालात और बिगड़ सकते हैं, खासकर विकासशील देशों के लिए क्योंकि उन्हें बढ़ती सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना होगा और उन्हें ज्यादा मदद की जरूरत हो सकती है। यह विश्व बैंक के अध्यक्ष डेविड मलपास ने कहा, यहां तक कि जी-20 लेनदार देशों ने 73 सबसे कम विकसित देशों (एलडीसी) को जून 2021 के आगे कोविड-19 कर्ज राहत देने में उत्सुकता नहीं दिखाई। जी-20 लेनदारों ने अप्रैल में डेब्ट सर्विस सस्पेंशन इनिशिएटिव (डीएसएसआई) के तहत 73 सबसे कम विकसित (एलडीसी) देशों को आधिकारिक द्विपक्षीय कर्ज के भुगतान को साल 2020 के अंत तक निलंबित करने की मंजूरी दी थी। विश्व बैंक की ओर से 13 अक्टूबर को जारी अंतरराष्ट्रीय कर्ज सांख्यिकी-2021 के अनुसार, 2019 में एलडीसी पर कर्ज का बोझ 744 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
वर्ष 2019 में डीएसएसआई योग्य देशों के कर्ज स्टॉक का 178 अरब डॉलर आधिकारिक द्विपक्षीय कर्जदाताओं, जिसमें ज्यादातर ज्यादातर जी-20 देश वाले शामिल हैं, को देय था। रिपोर्ट का कहना है कि इसका 63 फीसदी हिस्सा चीन को देय था। वहीं, कम आय वाले देशों की लंबी अवधि के कर्ज स्टॉक का 27 प्रतिशत था। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 में इन देशों के लिए कर्ज जुटाने की रफ्तार अन्य निम्न और मध्यम आय वाले देशों के मुकाबले लगभग दोगुनी थी। 120 निम्न और मध्यम आय वाले देशों का कुल बाहरी कर्ज, जिसके आंकड़े अंतरराष्ट्रीय कर्ज सांख्यिकी 2021 में दिए गए थे, 2019 में 5.4 प्रतिशत बढ़कर 8.1 अरब डॉलर हो गया।
रिपोर्ट बताती है कि 2019 में उप-सहारा के अफ्रीकी देशों का बाहरी कर्ज स्टॉक का 9.4 फीसदी औसत के साथ सबसे तेजी से बढ़ा। क्षेत्र का कर्ज स्टॉक 2018 में लगभग 571 अरब डॉलर से बढ़कर 2019 में 625 अरब डॉलर से भी ज्यादा हो गया। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका समेत प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और क्षेत्र के अन्य देनदारों के कर्ज स्टॉक में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी के चलते उप-सहारा अफ्रीका की कर्ज की स्थिति आगे और बिगड़ गई थी। दक्षिण अफ्रीका ने 2018 और 2019 के बीच कर्ज के बोझ में 8.7 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की। देश का कर्ज का बोझ 2018 में 173 अरब डॉलर से बढ़कर 2019 में 188.10 अरब डॉलर पहुंच गया। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र में मिस्र सबसे बड़ा देनदार देश था, जहां कर्ज स्टॉक में औसतन 5.3 फीसदी की दर से वृद्धि हुई थी। दक्षिण एशिया ने कर्ज स्टॉक में 7.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की। इस क्षेत्र में बांग्लादेश (9.5 फीसदी) और पाकिस्तान (7.8 फीसदी) के बाद भारत ने कर्ज स्टॉक में छह फीसदी बढ़ोतरी की।
यदि जी-20 देशों मत्थे चढ़े हुए कर्ज में चीन की बढ़ती हिस्सेदारी को आंके तो 2013 में जहां इसकी हिस्सेदारी 45 फीसदी थी, वहीं 2019 के अंत में यह 63 फीसदी तक पहुंच गई।

कोविड-19 के बाद अगली महामारी
इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) ने एक असाधारण शोध पत्र में चेतावनी दी है कि नोवेल कोरोना वायरस रोग (कोविड-19) जैसी महामारी हमें बार-बार नुकसान पहुंचाएंगे और अब की तुलना में ज्यादा लोगों की जिंदगी छीनेंगे। आईपीबीईएस रिपोर्ट को दुनिया भर के 22 विशेषज्ञों ने तैयार किया है। रिपोर्ट में नई बीमारियों के उभरने के पीछे इंसानों की वजह से पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भूमिका का विश्लेषण किया गया है।
अक्टूबर में जारी रिपोर्ट ने कहा, “जमीन के उपयोग में बदलाव वैश्विक स्तर पर महामारी के लिए अहम संचालक है और 1960 के बाद से 30 फीसदी से ज्यादा नए रोगों के उभरने की वजह भी है।” रिपोर्ट ने आगे कहा, “भले ही कोविड-19 की शुरुआत जानवरों पर रहने वाले रोगाणुओं से हुई है, सभी महामारियों की तरह, इसकी शुरुआत भी पूरी तरह से इंसानी गतिविधियों से प्रेरित रही है।” हम अभी तक 17 लाख विषाणुओं की ही पहचान कर सके हैं, जो स्तनधारियों और पक्षियों में मौजूद हैं। इनमें से 50 फीसदी विषाणु में इंसानों को संक्रमित करने के गुण या क्षमता मौजूद है। रिपोर्ट को जारी करने वाले इको हेल्थ एलायंस के अध्यक्ष और आईपीबीईएस वर्कशॉप के प्रमुख पीटर दासजैक ने कहा, “जो मानवीय गतिविधियां जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान को बढ़ाती हैं, वही हमारे पर्यावरण पर अपने प्रभावों के जरिए महामारी के जोखिम भी लाती हैं। जमीन को इस्तेमाल करने के हमारे तरीके में बदलाव, खेती का विस्तार और सघन होना और गैर-टिकाऊ कारोबार, उत्पादन और खपत प्रकृति में तोड़-फोड़ पैदा करते हैं और वन्य जीवों, मवेशियों, रोगाणुओं और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाते हैं। यह महामारियों का पथ है।”
जूनोसिस या जूनोटिक रोग एक ऐसा ही रोग है जो किसी मवेशियों के स्रोत से सीधे या किसी मध्यस्थ प्रजाति के जरिए इंसानी आबादी तक आया है। जूनोटिक संक्रमण बैक्टीरिया, वायरस या प्रकृति में पाए जाने वाले परजीवियों से हो सकता है, जानवर ऐसे संक्रमणों को बचाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जूनोसिस के उदाहरणों में एचआईवी-एड्स, इबोला, लाइम रोग, मलेरिया, रेबीज, वेस्ट नाइल बुखार और मौजूदा कोविड-19 शामिल हैं।
हालांकि, महामारी की आर्थिक कीमत के मुकाबले इसकी रोकथाम के उपाय बहुत कम खर्चीले होंगे। मौजूदा महामारी ने वैश्विक स्तर पर जुलाई 2020 तक लगभग 16 ट्रिलियन डॉलर का बोझ डाला है। रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि भविष्य में आने वाली महामारियों के खतरे को कम करने का खर्च इन महामारियों से निपटने में आने वाले खर्च से कम से कम 100 गुना कम होगा। दासज़ैक ने कहा, “वैज्ञानिक सबूत बहुत सकारात्मक परिणामों की तरफ इशारा करते हैं।” “हमारे पास महामारी को रोकने की बढ़ती हुई क्षमता है - लेकिन अभी हम जिस तरह से उनसे निपट रहे हैं, वह काफी हद तक उस क्षमता की अनदेखी करने वाला है। हमारा नजरिया प्रभावी रूप से स्थिर हो गया है - हम अभी भी रोगों के पैदा होने के बाद टीके और चिकित्सीय उपायों से उन्हें नियंत्रित करने पर भरोसा करते हैं। हम महामारी के युग से बच सकते हैं, लेकिन इसके लिए प्रतिक्रिया के अलावा इनके रोकथाम पर भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है।” यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में इकोलॉजी एंड बायोडायवर्सिटी के चेयर केट जोन्स ने कहा: “ये खर्चे काल्पनिक जरूर हैं, लेकिन दुनिया भर में हमारी जिंदगी की मौजूदा परेशानियों को देखते हुए उचित लगते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पता है कि संक्रामक रोग के प्रकोप कितने खर्चीले हैं। और आप कैसे समझते हैं कि वे अपने जोखिम की सूची में महामारी फ्लू जैसी चीजों को सबसे ऊपर क्यों रखते हैं? हमें अब काम करने वाले वैश्विक नेताओं की जरूरत है।”
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की जलवायु परिवर्तन और भूमि रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन के उपयोग में बदलाव के पीछे भोजन, पशुओं के चारे और रेशे के लिए इस्तेमाल होने वाली कृषि भूमि है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, 2050 तक दुनिया की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए खेती के लिए 50 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा नई जमीन की जरूरत होगी। द इकोनॉमिक्स ऑफ लैंड डिग्रेडेशन इनिशिएटिव के 2015 में आए अध्ययन के मुताबिक, सालाना भूक्षरण के 10.6 खरब डॉलर के पारिस्थितिकीय तंत्र की सेवाएं नष्ट हो जाती हैं। इसने आगे कहा था, इसके विपरीत टिकाऊ भूमि प्रबंधन को अपनाकर फसल उत्पादन की बढ़ोतरी में 1.4 खरब डॉलर जोड़े जा सकते हैं. दुनिया की सबसे बड़ी वैश्विक पुनर्स्थापना प्रयास में, बीते पांच वर्षों में, लगभग 100 देशों में 2030 तक सुधारने और दोबारा पहले की स्थिति में लाने के लिए क्षेत्रों की पहचान की गई है। एक शुरुआती आकलन बताता है कि इस के तहत 40 करोड़ हेक्टेयर जमीन चिन्हित की गई है, जो कि 2050 तक वैश्विक खाद्य की जरूरत पूरी करने के लिए आवश्यक कृषि भूमि का लगभग 80 फीसदी है। भविष्य में जूनोसिस से बचने के लिए नए सिरे से निर्माण की व्यापक परियोजना के हिस्से के तौर पर इन इलाकों की पहले जैसा बनाने के कई अन्य प्रमुख लाभ, खास तौर पर जलवायु परिवर्तन पर लगाम, सामने आएंगे।

जुलाई के शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और अंतरराष्ट्रीय पशुधन अनुसंधान संस्थान (आईएलआरआई) ने “अगली महामारी की रोकथाम: जूनोटिक रोगों और संक्रमण फैलाव की श्रृंखला को कैसे तोड़ें” शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की । इस रिपोर्ट के अनुसार मनुष्यों में मौजूद जिन संक्रामक रोगों की जानकारी है, उनमें लगभग 60 फीसदी और सभी नए संक्रामक रोगों में 75 फीसदी जूनोटिक हैं। यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने इस रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा था, “कोविड-19 महामारी सबसे खराब हो सकती है, लेकिन यह पहली नहीं है।”रिपोर्ट ने कोविड-19 महामारी के दौरान भविष्य के संभावित जूनोटिक रोग के प्रकोप के संदर्भ और प्रकृति पर चर्चा की थी।
इसने जूनोटिक रोग के जन्म को बढ़ावा देने वाले मानव विकास से प्रेरित सात कारकों को पहचाना – पशुओं के प्रोटीन की बढ़ती मांग; गहन और गैर-टिकाऊ खेती में बढ़ोतरी; वन्यजीवों का बढ़ता उपयोग और शोषण; प्राकृतिक संसाधनों का गैर-टिकाऊ इस्तेमाल; यात्रा और परिवहन, खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव और जलवायु परिवर्तन संकट। पशुओं से मिलने वाले भोजन की बढ़ती मांग ने पशु उत्पादन में अधिकता और औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया है, जिसमें ऊंची उत्पादकता और रोगों से सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में आनुवंशिक तौर पर एक जैसे जानवर पाले जाते हैं।
सीमित जैव-सुरक्षा और पशुपालन, खराब कचरा प्रबंधन और इन परिस्थितियों के विकल्प के तौर रोगाणुरोधकों के इस्तेमाल की विशेषताओं के साथ कम आदर्श स्थिति में फॉर्म की सघन बनावट के कारण उन्हें एक-दूसरे के बहुत नजदीक रखकर पाला जा सकता है। यह उन्हें संक्रमण के लिहाज से असुरक्षित बना देता है, जो आगे जूनोटिक रोगों को बढ़ावा दे सकते हैं। फॉर्म की ऐसी व्यवस्था में रोगाणुरोधकों का अंधाधुंध इस्तेमाल रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) का बोझ बढ़ा रहा है, जो अपने आप में ऊंचे नुकसान के साथ वैश्विक जनस्वास्थ्य को खतरे में डालने वाली एक गंभीर महामारी है। इसके अलावा, कृषि उद्देश्यों के लिए वन क्षेत्र का नुकसान, पशुओं के चारे में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले सोया की खेती, भी इंसानों की वन्यजीवों तक पहुंच बढ़ाकर जूनोटिक रोगों के उभार को भी प्रभावित कर रहा है।
रिपोर्ट ने इस बात से पर्दा उठाया कि पर्यावरण-वन्यजीव मिलन बिंदु (इंटरफेस) पर रोगों के पैदा होने में मानव गतिविधियों ने कैसे सक्रिय योगदान दिया। वन्यजीवों का बढ़ता उपयोग और शोषण इंसानों को जंगली जानवरों के बहुत नजदीकी संपर्क में ला सकता है, इसलिए जूनोटिक रोग के उभरने का खतरा बढ़ जाता है। इसमें मांस के लिए जंगली जीवों को पकड़ना, मनोरंजन के लिए वन्यजीवों का शिकार और इस्तेमाल, मनोरंजन के लिए जीवित जानवरों का कारोबार, या सजावट, चिकित्सा या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए जानवरों के अंगों का इस्तेमाल जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
यूएनईपी और आईएलआरआई ने इंसान, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के मिलन स्थलों पर पैदा होने वाले जूनोटिक रोगों के प्रकोप और महामारियों के प्रबंधन और रोकथाम के लिए ‘वन-हेल्थ’ (एकल स्वास्थ्य) दृष्टिकोण के महत्व पर जोर दिया। रिपोर्ट ने एकल स्वास्थ्य दृष्टिकोण के आधार पर दस सिफारिशें कीं जो भविष्य की महामारियों के लिए तालमेल आधारित बहु-क्षेत्रीय प्रतिक्रिया बनाने में मदद कर सकती है। इनमें शामिल था: जूनोटिक बीमारियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना; एकल स्वास्थ्य सहित अंतर-विषयी दृष्टिकोण में निवेश करना; जूनोटिक रोगों को लेकर वैज्ञानिक शोधों को विस्तार देना; रोग के सामाजिक प्रभावों के पूर्ण आकलन के साथ हस्तक्षेपों के लागत-लाभ विश्लेषण में सुधार करना; खाद्य प्रणालियों सहित जूनोटिक रोगों से जुड़ी निगरानी और नियंत्रण के व्यवहारों को मजबूत बनाना; टिकाऊ भूमि प्रबंधन व्यवहारों को बढ़ावा देना और खाद्य सुरक्षा व आजीविका के विकल्प विकसित करना जो आवासीय क्षेत्रों और जैव विविधता को नुकसान न पहुंचाते हों; जैव-सुरक्षा और नियंत्रण में सुधार, पशुपालन में उभरते रोगों के प्रमुख कारणों की पहचान करना और साबित हो चुके प्रबंधन व जूनोटिक रोग नियंत्रण उपायों को प्रोत्साहित करना; कृषि और वन्यजीवों के स्थायी सह-अस्तित्व को बढ़ाने वाले भू क्षेत्रों और समुद्री क्षेत्रों के टिकाऊ प्रबंधन की मदद करना; सभी देशों में स्वास्थ्य से जुड़े सभी हितधारकों की क्षमता को मजबूत करना; और अन्य क्षेत्रों में भूमि-उपयोग और सतत विकास योजनाएं बनाने, लागू करने और निगरानी में एकल स्वास्थ्य दृष्टिकोण को लागू करना।
यह पहला दस्तावेज है, जिसमें कोविड-19 महामारी के दौरान रोग उभरने के जूनोटिक आयाम के पर्यावरण पक्ष पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसने एकल स्वास्थ्य दृष्टिकोण के पर्यावरणीय पक्षों को मजबूत करने की जरूरत को उभारा, क्योंकि यह जूनेसिस का जोखिम घटाने और उसके नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण था। यह एएमआर रोकथाम के प्रयासों का भी एक महत्वपूर्ण तत्व है, क्योंकि रोगागुरोधकों के अत्यधिक इस्तेमाल वाले कचरे से पर्यावरण में एएमआर निर्धारकों (उदाहरण के लिए, एंटीबायोटिक अवशेषों, प्रतिरोधी बैक्टीरिया) के लिए रास्ते खोल दिए हैं। जूनोटिक रोगों के साथ पर्यावरणीय से जुड़ी गहरी समझ में निवेश करने, इंसानी वर्चुस्व वाले क्षेत्रों में ऐसे रोगों की निगरानी करने, पर्यावरणीय परिवर्तन या गिरावट का जूनोटिक रोग के उभार पर आने वाले प्रभावों का बता लगाने, जैसे कदम तत्काल उठाने की जरूरत है।
हमें भोजन के साथ अपने संबंधों पर नए सिरे से विचार करने की शुरुआत जरूर करें, यह कैसे तैयार होता है और इसका हमारे ऊपर और हमारे पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है। यही समय है जब हम खाद्य उत्पादन की टिकाऊ पद्धतियों को चुनें और स्वास्थ्य व पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए गहन व्यवस्थाओं पर निर्भरता घटाएं। एंडरसन ने रिपोर्ट जारी करने वाली प्रेस रिलीज में कहा, “महामारियां हमारे जीवन और हमारी अर्थव्यवस्थाओं के लिए विनाशकारी है, और जैसा कि हमने बीते कुछ महीनों में देखा है, जो सबसे गरीब और सबसे कमजोर हैं, वही सबसे अधिक पीड़ित है। भविष्य में प्रकोप को रोकने के लिए, हमें अपने प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा के लिए और अधिक सतर्क होना चाहिए।” (downtoearth)


