संपादकीय
अभी महाराष्ट्र के नासिक में पकड़ाए एक तथाकथित आध्यात्मिक गुरू, और ज्योतिषी के सेक्स-वीडियो से सोशल मीडिया पटा हुआ है। ऐसा लगता है कि पिछले हफ्ते-दस दिन से हर दिन इस पर हर वह व्यक्ति रील बना रहे हैं, जिनके पास एक मोबाइल फोन है, मुंह है, आवाज है, और इस बाबा, अशोक खरात की कोई भी वीडियो क्लिप है। लोग आधे हिस्से में इसकी वीडियो क्लिप लगाकर आधे हिस्से में अपना चेहरा दिखाकर, सनसनीखेज सुर्खी लगाकर दर्शक बटोर रहे हैं। लेकिन यह केस है तो पूरी तरह हकीकत। उसके पास पहुंचने वाली महिलाओं को वह उनके पति को लेकर कई तरह से डराता था, खतरा टालने का कोई ऐसा तरीका सुझाता था जिसे वह यौन पूजा कहता था, और इस तरह उन महिलाओं का या तो सिलसिलेवार, लगातार यौन शोषण करता था, अपने ही सीसीटीवी कैमरों पर रिकॉर्ड करता था, और फिर उन्हें ब्लैकमेल करके यौन शोषण को बढ़ाता था, या उगाही भी करता था। इसके पास से कोई डेढ़ सौ करोड़ की दौलत भी मिली है।
इस पर लिखने को नया बहुत कुछ नहीं रहता, अगर आज सुबह सूरत की एक और खबर बहुत सारे वीडियो और ऑडियो के साथ नहीं आई रहती। वहां एक जैन मुनि के ऑडियो-वीडियो से गुजरात उबल रहा है, जिसमें एक महिला के साथ इस जैन मुनि के सेक्स का नजारा है, इसके अलावा उसके कुछ टेलीफोन कॉल भी है जो इस, या ऐसी ही किसी दूसरी महिला, या लडक़ी से फोटो-वीडियो की ही बात करते हुए है। यह आरोप किसी विरोधी ने नहीं लगाया है, यह गुजरात में जैन समाज की महिलाओं ने ही जाकर पुलिस को दिया है कि एक जैन मुनि के ऐसे वीडियो-ऑडियो से पूरे समाज की बदनामी हो रही है, धर्म पर आंच आ रही है, और इस मुनि को सन्यासी चोले से बाहर निकालकर सांसारिक कपड़े पहनाए जाएं। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही एक दूसरे जैन मुनि को बलात्कार में दस साल की कठोर कैद हुई है। इसने 2017 में अपनी एक 19 वर्षीय छात्रा-अनुयायी को दीक्षा देने, और शुद्धिकरण के बहाने से एक कमरे में बुलाकर बलात्कार किया था, और डराया था कि अगर यह बात किसी को बताई तो उसके परिवार पर दैवीय प्रकोप होगा। इस छात्रा के हौसले से डटे रहने, और मेडिकल सुबूतों के आधार पर इस मुनि को उम्रकैद हुई, बाद में उसे दस साल की कड़ी कैद में बदला गया। एक और मामला हरिद्वार और दिल्ली के पास का था जिसमें एक जैन मुनि एक छात्रा के साथ आपत्तिजनक यौन मुद्रा में दिख रहा था, बाद में वह फरार भी हो गया था, और समाज की पंचायत ने उसे सन्यास से हटा दिया था। देश का इतिहास हर कुछ महीनों में धर्म, आध्यात्म, या योग से जुड़े हुए ऐसे किसी बलात्कारी की खबरों को दर्ज करता है। केरल-तमिलनाडु की सीमा पर आश्रम चलाने वाले स्वामी प्रेमानंद पर 13 लड़कियों से बलात्कार, एक पुरूष की हत्या का आरोप साबित हुआ था, और सुप्रीम कोर्ट तक ने उसकी दोहरी उम्रकैद को बरकरार रखा था। भारत के कई टीवी चैनलों के दिल के टुकड़े, दिल्ली और राजस्थान के पाली में विशाल आश्रम चलाने वाले दाती महाराज नाम के अजीब हुलिए वाले एक धार्मिक चोगाधारी पर उसकी ही शिष्या ने सालों तक बलात्कार का आरोप लगाया था, और मामला सीबीआई तक गया था। दिल्ली के एक आध्यात्मिक विश्वविद्यालय के वीरेन्द्र देव दीक्षित के आश्रम से 2017 में सौ से अधिक लड़कियों, और महिलाओं को लोहे के पिंजरों से निकाला गया था। यह दीक्षित खुद को कृष्ण का अवतार बताता था, और लड़कियों को गोपियां बनाने के नाम पर नशा देता था, और उनका यौन शोषण करता था। अब 8 सालों से वह फरार है, और सीबीआई उसे दुनिया भर में ढूंढ रही है। फिर आसाराम नाम के एक बलात्कारी के नाम को भला देश में अब कौन नहीं जानते? इससे परे राम-रहीम नाम का एक दूसरा बाबा जेल काटकर अभी शायद बाहर निकला हुआ है।
भारत में ही नहीं, दूसरों देशों में भी जो हिन्दुस्तानी योग, ध्यान, आध्यात्म जैसे धंधों में लगे हुए हैं, उन पर समय-समय पर जुर्म दर्ज होते रहे हैं। भारत के विदेशों में सबसे अधिक चर्चित इस दर्जे के आचार्य रजनीश, बाद में स्वघोषित ओशो, पर भी कितने तरह के मामले चले, और बाद में अमरीका से निकाल दिया गया। योग सिखाने वाले एक विक्रम चौधरी पर अमरीका में 6 पूर्व शिष्याओं ने बलात्कार के मुकदमे दर्ज कराए, अमरीकी अदालत ने उस पर करीब 58 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया, वह अमरीका छोडक़र भाग गया, और उसकी सारी सम्पत्तियां जब्त कर ली गई हैं। लेकिन ऐसे मामलों की लिस्ट हम जब तक गिनाते रहेंगे, तब तक तो ऐसे एक-दो और मामले भी आ जाएंगे। आखिर यह नौबत आती क्यों है, इसे समझने की जरूरत है।
बस्तर में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हुई है, या तकरीबन खत्म हुई है, इस विवाद में हम पडऩा नहीं चाहते। जिस हद तक वह खत्म हुई है, वह केन्द्र और राज्य सरकार की घोषणाओं के मुताबिक ही है। अब अगर बहुत थोड़ी सी गिनती में नक्सली बचे हुए हैं, तो जाहिर है कि उनकी मारक क्षमता खत्म हो चुकी है, और वे शायद अपने आखिरी हथियारबंद दिन गुजार रहे हैं। कल संसद में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सल मोर्चे पर कामयाबी गिनाते हुए छत्तीसगढ़ में पांच बरस कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे भूपेश बघेल पर भी एक सीधा हमला किया है कि उनकी सरकार ने नक्सलियों को संरक्षण दिया, जिससे नक्सल उन्मूलन अभियान में देर हुई। उन्होंने चुनौती दी और कहा कि भूपेश बघेल को पूछो, सुबूत दूं क्या, और कहा कि अगर भूपेश हां बोलेंगे, तो फंस जाएंगे। यह संसद में कांग्रेस की किसी प्रदेश सरकार पर केन्द्रीय गृहमंत्री का अब तक का सबसे बड़ा हमला था, और भूपेश ने संसद के बाहर अमित शाह को सुबूत देने की चुनौती दी है, साथ ही यह कहा है कि उनके पांच बरस के कार्यकाल में केन्द्र सरकार के साथ नक्सल मोर्चे पर लगातार बैठकें हुईं, और किसी भी बैठक में केन्द्रीय गृहमंत्री या केन्द्र सरकार की तरफ से छत्तीसगढ़ की भूपेश-कांग्रेस सरकार के खिलाफ ऐसी कोई शिकायत नहीं की गई। अब अचानक यह बात कही जा रही है।
दरअसल बस्तर के नक्सल मोर्चे पर आज के घटनाक्रम इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनका श्रेय लेने के लिए कोशिश करने, या दावा करने का हक सत्तारूढ़ पार्टी का बनता ही है। दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार की लगाई गई इतनी बड़ी तोहमत पर भूपेश बघेल की जवाबदेही भी बनती है, और उन्होंने अपनी जवाबदेही अमित शाह से एक सवाल करके पूरी की है। ये दोनों चुनौतियां इतनी दिलचस्प हो चुकी हैं कि जनता इंतजार करेगी कि अमित शाह कुछ अधिक जानकारी सामने रखें, सुबूत बताएं, और जनता अपनी सोच तय करे। इसके पहले भी एक ऐसी नौबत आई थी, लेकिन उस वक्त मुख्यमंत्री बनने के पहले के भूपेश बघेल ने यह दावा किया था कि उनके पास झीरम घाटी हमले की साजिश के सुबूत हैं, और उन्हें वे सही जांच एजेंसी को देंगे। कई तरह की जांच एजेंसियां झीरम की जांच करती रही, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से एनआईए की जांच चलते-चलते भी भूपेश सरकार की पुलिस को जांच करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी भूपेश बघेल ने झीरम साजिश के कोई सुबूत किसी एजेंसी को नहीं दिए जिन्हें कि वे अपनी जेब में लेकर चलने का दावा करते थे। हम तो जनता के जानने के हक के तहत पहले भी इस बात को बार-बार लिख चुके हैं कि न सिर्फ मुख्यमंत्री को, बल्कि देश के किसी आम नागरिक को भी किसी भी जुर्म या साजिश की जानकारी होने पर यह उनकी नागरिक जिम्मेदारी बनती है कि वे उसे जांच एजेंसी को दें। ऐसे में विपक्ष के नेता के रूप में भूपेश बरसों झीरम के सुबूत जेब में थपथपाते रहे, लेकिन दिए कभी नहीं। मुख्यमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी की शपथ लेने के बाद भी उन्होंने कभी सुबूत जांच एजेंसी को देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की। अब संसद में अमित शाह ने भूपेश बघेल को जो चुनौती दी है, उस पर हम अपनी पुरानी सोच को दोहराते हुए यही कहेंगे कि भूपेश बघेल उनसे सुबूत न भी मांगें, तब भी देश का यह हक है कि अगर कांग्रेस सरकार ने पांच बरस नक्सलियों को संरक्षण दिया, तो इसके सुबूत जनता के सामने आने चाहिए। यह बात किसी भी पार्टी के किसी भी संगठन के साथ रिश्तों पर लागू होती है, अगर कोई कानून तोड़े जाते हैं। चाहे ऐसे संगठन हथियारबंद हों, या साम्प्रदायिकता से लैस हों, रिश्तों के सुबूत, और शपथ ली हुई सरकार द्वारा दिए गए संरक्षण तो उजागर होने ही चाहिए।
अब हम इन दोनों नेताओं की एक-दूसरे को दी गई चुनौतियों का मजा लेते हुए, इनके आगे बढऩे का इंतजार करेंगे, क्योंकि यह पारदर्शिता जनता के हक में है। ऐसी राजनीतिक बातें जनता के किसी सूचना पाने के अधिकार के तहत नहीं रहती हैं, ऐसी बातें नेताओं के सूचना देने की जिम्मेदारी के तहत आती हैं, जिसके लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है, बस एक सार्वजनिक जीवन की नैतिकता जरूरी रहती है। लोकतंत्र में ऐसी गंभीर बातें खुलकर सामने आनी चाहिए। दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में इस किस्म के बहुत से मामलों में श्वेतपत्र जारी करने की भी परंपरा रही है जिसमें सरकार उसे हासिल तमाम किस्म के तथ्यों को एक दस्तावेज की तरह जनता के लिए जारी करती है। बस्तर के नक्सल मोर्चे को लेकर अगर अमित शाह के पास सचमुच ही कांग्रेस सरकार के दिए हुए संरक्षण के सुबूत हैं, तो उन्हें श्वेतपत्र के रूप में भी जारी किया जा सकता है।
भारतीय संसद के दोनों सदनों में अभी ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक मंजूर किया गया है, और इसका खुलासा सामने आने के बाद ट्रांसजेंडर समुदायों के बीच इसका जमकर विरोध हो रहा है। हमारे यूट्यूब चैनल से एक इंटरव्यू में ट्रांसजेंडरों ने रोते हुए कहा कि इससे तो अच्छा है कि उन्हें जहर दे दिया जाए। अब सरकार के नजरिए से देखें, तो 2019 के कानून में ट्रांसजेंडर की परिभाषा काफी व्यापक थी, और अब सात साल के भीतर ही किए जा रहे इस संशोधन विधेयक में इस वर्ग में जैविक और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों को ही प्राथमिकता दी गई है। संशोधन विधेयक में यह साफ कहा गया है कि जो लोग खुद अपनी शारीरिक-मानसिक भावनाओं के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान स्थापित करना चाहते हैं, या अपना यौन रूझान बताना चाहते हैं, उन्हें इस विधेयक के दायरे में नहीं रखा जाएगा। यानी बिना एक मेडिकल बोर्ड के किसी ट्रांसजेंडर की पहचान सिर्फ उसकी मर्जी से तय नहीं होगी। अभी तक जो लोग अपने आपको किसी दूसरे जेंडर के शरीर में कैद महसूस करते थे, वे कोई ऑपरेशन कराकर भी जेंडर बदलवा सकते थे, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो सरकार ऐसे सेक्स-चेंज ऑपरेशन का खर्च भी उठाती थी। अब इस नए विधेयक में यह खतरा खड़ा हो गया है कि किसी मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होकर अपनी खुद की पहचान साबित करने के लिए बोर्ड के डॉक्टरी पैमानों पर खुद को साबित करना, पूरी तरह अपमानजनक भी है, और यह मेडिकली संभव नहीं है कि किसी की मन की अपनी भावनाएं डॉक्टर पहचान सकें, और मान सकें। आज ट्रांस लोगों की व्यापक परिभाषा में कई तरह की यौन-पहचान, या यौन-पसंद वाले लोग आते हैं, और इस नए विधेयक में उनमें से बहुत सारे लोगों को ट्रांस नहीं माना जाएगा, और वे कानूनी सुरक्षा खो बैठेंगे। इस विधेयक में यह भी है कि किसी पर ट्रांसजेंडर पहचान थोपी गई, तो वह जुर्म कहलाएगा, और उस पर बड़ी कड़ी सजा होगी। ट्रांस-कार्यकर्ताओं को डर है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल उन डॉक्टरों, एनजीओ, या सहायता समूहों के खिलाफ हो सकता है जो लोगों को अपनी मर्जी की सेक्स पहचान पाने में डॉक्टरी मदद करते हैं। इसमें ट्रांस लोगों की शादी, गोद लेने, उत्तराधिकार, और आरक्षण जैसे नागरिक अधिकारों का कोई जिक्र नहीं है। सरकार का कहना है कि ट्रांस लोगों की पुरानी परिभाषा में बहुत सारे फर्जी लोग भी फायदे पा रहे थे, इसलिए इसकी एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा जरूरी हो गई थी। दूसरी तरफ कई प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, वगैरह इस विधेयक को एक ऐतिहासिक गलती बतला रहे हैं, और उन्होंने राष्ट्रपति से अपील की है कि इसे मंजूरी न दें।
ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 में लोगों को अपनी ट्रांस पहचान तय करने के लिए जिस तरह एक मेडिकल बोर्ड की मजबूरी डाली गई है, उससे सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों के साथ इस विधेयक का टकराव हो रहा है। भारत में ट्रांस अधिकारों को लेकर न्यायिक इतिहास का सबसे बड़ा फैसला नाल्सा-जजमेंट माना जाता है। 2014 में दो जजों की बेंच ने यह तय किया था कि किसी व्यक्ति की जेंडर-पहचान उसके आत्मसम्मान और उसके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि किसी व्यक्ति को अपनी जेंडर-पहचान तय करने के लिए किसी डॉक्टरी जांच या सर्जरी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, व्यक्ति जैसा महसूस करते हैं, उन्हें वैसी ही मान्यता पाने का हक है। सुप्रीम कोर्ट ने यह लिखा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत गरिमा के साथ जीने में अपनी पहचान खुद तय करना शामिल है। इस फैसले के बाद एक दूसरे फैसले में एक और जज ने यह लिखा था कि राज्य को किसी व्यक्ति की निजी पहचान की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोई बहुत बड़ा सार्वजनिक हित न हो।
अभी ट्रांस-कार्यकर्ताओं की आशंका यह है कि यह नया विधेयक उनके लोगों को मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए मजबूर करके अपमानित भी करता है, और यह किसी व्यक्ति की गरिमा को एक डॉक्टरी मामला बना देता है। उनकी यह भी आशंका है कि मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता से यह प्रक्रिया लंबी और कठिन हो जाएगी, और पहचान प्रमाणपत्र पाने में भ्रष्टाचार बढ़ेगा। कानून के कुछ जानकारों का कहना है कि 2026 का यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के नाल्सा-फैसले की मूल भावना के खिलाफ है, और इसे अदालत में अगर चुनौती दी जाएगी, तो इसके टिकने की संभावना पर शक है। यहां दो-तीन बातों को समझ लेना जरूरी होगा कि 2014 और 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद 2019 में बने हुए ट्रांसजेंडर कानून को सात बरस के भीतर इस तरह आमूलचूल बदलने की क्या जरूरत आ गई है? ट्रांसजेंडरों के अधिकारों का ऐसा कौन सा बेजा इस्तेमाल होने लगा था कि जिसकी वजह से सरकार ने उनकी पहचान को डॉक्टर जांच और सर्टिफिकेट से स्थापित करना अनिवार्य समझा है?
पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर अब ये अटकलें लगने लगी हैं कि किन राज्यों में राजनीतिक दल कौन से फॉर्मूले इस्तेमाल करेंगे। अभी सुप्रीम कोर्ट में फ्रीबीज नाम का एक मामला चल ही रहा है जिसमें न केवल चुनाव के वक्त, बल्कि सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक दल जनता को कौन-कौन सी चीजें ‘मुफ्त’ देते हैं। इनमें इन दिनों सबसे अधिक चर्चा महिलाओं के बैंक खातों में सीधे भेजी जाने वाली रकम है जो कि कमजोर महिलाओं के सशक्तिकरण के तर्क के साथ शुरू हुई हैं। राजनीतिक आंकलन यह है कि महिलाओं को सीधे नगद मदद भेजने से कई राज्यों में ऐसी पार्टी की जीत हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हमने पिछले विधानसभा चुनाव में यह देखा है कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में तकरीबन हर महिला को हजार रूपए महीने देने की महतारी वंदन योजना घोषित की, और चुनावी नतीजे उसके पक्ष में चले गए। हालांकि इसके साथ-साथ भाजपा ने धान किसानों से 31 सौ रूपए क्विंटल, प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक खरीदने का वायदा भी किया था, लेकिन किसानों के लिए तो वायदा कांग्रेस का भी था। जो भी हो, भारतीय चुनाव किन वजहों से प्रभावित हुए, इसका अंदाज लगाना बड़ा ही मुश्किल रहता है।
फिलहाल इस बरस असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में दस दिन बाद वोट डलना शुरू हो जाएंगे, और आज से पांच हफ्ते के भीतर सारे नतीजे आ जाएंगे। भारत के चुनावों की लिस्ट देखें, तो हर बरस चार-छह राज्यों के चुनाव होते हैं। और हर पांच बरस में लोकसभा के चुनाव होते हैं जो कि अब 2029 में इसी वक्त होंगे। इसके अलावा देश में पंचायत और म्युनिसिपल चुनाव भी एक संवैधानिक बाध्यता हैं, और हर राज्य में इनका समय अलग-अलग है। कई राज्यों में ये तीनों किस्म के चुनाव साल-साल भर के फासले से भी होते हैं, नतीजा यह होता है कि ये राज्य पूरे पांच बरस चुनावी मोड में रहते हैं। सरकारें कोई कड़े फैसले कर नहीं पातीं, हर थोड़े-थोड़े अरसे में कुछ लुभावने फैसले लेने पड़ते हैं, और हर चुनाव की आचार संहिता के दौर में कई तरह के काम थम जाते हैं। फिर सत्तारूढ़ पार्टी हो, या विपक्षी दल, सबके नेता प्रचार में लग जाते हैं, और गैरचुनावी लोकतांत्रिक-सरकारी काम प्रभावित होते हैं। अभी जैसे जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहां पर उन राज्यों के नेता भी जाकर प्रचार कर रहे हैं, जहां पर चुनाव नहीं हैं। मतलब यह कि सत्ता के नेता हों, या विपक्ष के, वे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी के इलाकों से दूर जाकर चुनाव प्रचार में लगे हैं। देश में वन नेशन-वन इलेक्शन की सोच इन वजहों से भी बनती है, और हम इसका समर्थन भी करते आए हैं। हालांकि देश के बहुत से समझदार दलों ने इस सोच का विरोध किया है, और यह कहा है कि राष्ट्रीय चुनाव अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं, प्रदेश के चुनाव अलग मुद्दों पर, और स्थानीय चुनावों के मुद्दे इन दोनों से अलग रहते हैं। ऐसे में अगर ये सभी चुनाव एक साथ करवाए जाएंगे, तो कोई राष्ट्रीय मुद्दा राष्ट्र में भी किसी पार्टी की सरकार बनवा देगा, और राष्ट्रीय मुद्दा ही पंचायत-म्युनिसिपल चुनाव पर भी हावी हो जाएगा। हम इस तर्क से असहमत नहीं हैं, फिर भी हमारा यह मानना है कि जब लोकसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों के चुनाव भी हुए हैं, तो भी उनमें जनता कुछ जगहों पर इतनी समझदार रही है कि उसने देश में एक पार्टी की सरकार चुनी, और प्रदेश में उसी पोलिंग बूथ से, उसी दिन वोट डालते हुए दूसरी पार्टी की सरकार चुनी। भारत के आज के विपक्षी दलों की आशंका के खिलाफ हमें तो यह भी लगता है कि पंचायत और म्युनिसिपल के स्तर पर किसी पार्टी के उम्मीदवार देखकर, उसके पिछले कार्यकाल का कामकाज देखकर, हो सकता है कि वोटर उसी दिन के वोट में संसदीय चुनाव में भी उस पार्टी के खिलाफ वोट डाल दे। और ऐसा ही राज्य स्तर पर किसी पार्टी की बदनामी की वजह से उसके संसदीय चुनाव पर असर पड़ जाए। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को लेकर अधिक आशंका से नहीं घिरना चाहिए, मतदाता की सोच लोकल से नेशनल, या नेशनल से लोकल, दोनों तरह से प्रभावित हो सकती है।
खैर, आज का हमारा मुद्दा वन नेशन-वन इलेक्शन नहीं है। हम तो यह सोच रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदान के नतीजों को, या उसके बाद बनने वाली सरकार को ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कामयाबी मान लिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि ये सारे चुनाव, और चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया तरह-तरह के अलोकतांत्रिक प्रभावों से भरे रहते हैं। सुनने में अच्छा लगे या नहीं, राजनीतिक दल ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाते हैं, जो चाहे परले दर्जे के मुजरिम ही क्यों न हों, उनकी जीत की क्षमता रहनी चाहिए, आमतौर पर उम्मीदवार के पास गैरकानूनी खर्च के लायक अंधाधुंध पैसा होना चाहिए। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि धर्म और जाति का ध्रुवीकरण कैसे करवाया जा सकता है, कैसे साम्प्रदायिकता खड़ी करके उससे उपजने वाली नफरत को वोटों की शक्ल में भुनाया जा सकता है। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि किस तरह वोटरों को शराब या नोट बांटकर आखिरी के दो-तीन दिनों में उनका रूख अपनी तरफ किया जा सकता है। वे यह भी देखते हैं कि किस तरह दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को खरीदकर बिठाया जा सकता है, कार्यकर्ताओं को खरीदकर विपक्षी उम्मीदवार को कमजोर किया जा सकता है। हमने कई तरह के नाजायज काम देखे हैं। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने लोकसभा चुनाव लड़ते हुए अपने सामने के भाजपा उम्मीदवार चन्दूलाल साहू के नाम वाले आधा दर्जन और चन्दूलाल साहू ढूंढकर उनसे नामांकन भरवा दिया था, और फिर उन सबको मतदान तक गायब कर दिया था। इसी छत्तीसगढ़ में अंतागढ़ के कांग्रेस उम्मीद्वार की खरीदी-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग आज भी चारों तरफ घूमती है। हमने अपने ही आसपास के शहरों में देखा है कि किस तरह मुस्लिम वोटरों को शक से देखने वालों ने ऐन मतदान के दिन उनकी अजमेर की टिकटें करवा दी थीं, और एक दूसरे उम्मीदवार ने मतदान के एक दिन पहले मुस्लिम वोटरों को बुला-बुलाकर उनकी उंगलियों पर काली चुनावी स्याही लगाकर नगद भुगतान कर दिया था, ताकि वे अगले दिन वोट न डाल सकें। इस तरह की सैकड़ों तिकड़में भारत के चुनावों में होती हैं जिनकी कोई आशंका भी देश के संविधान और चुनाव आयोग के नियमों में नहीं है। फिर अब तो चुनाव आयोग का हाल यह है कि उसके बारे में लतीफे बनते हैं कि वह फलां गठबंधन में शामिल नहीं हो रहा, वह बाहर से समर्थन करेगा। शेषन की साख वाले चुनाव आयोग की शेष न रह गई साख के बारे में अब क्या ही कहा जाए! अभी तो बहुत से लोगों का यह मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण से ही अगले चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं।
नेपाल में हाल ही में आई नई सरकार ने एक जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पिछले प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली, और पिछले गृहमंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार कर लिया है। अभी नए नौजवान प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ ली थी। मंत्रिमंडल ने यह तय किया था कि ओली सरकार के दौरान हुए जनप्रदर्शनों पर जो सरकारी कार्रवाई हुई थी, और पिछली सरकार के दूसरे मामलों को लेकर एक आयोग की जो जांच रिपोर्ट आई थी, उसे लागू किया जाएगा। उसी के मुताबिक यह कार्रवाई की गई है। नेपाल के चुनावी नतीजों को जिन लोगों ने बारीकी से देखा है वे जानते हैं एक रैप सिंगर से राजनेता बने बालेन शाह ने चुनाव में ओली को भारी लीड से हराया था, और अपनी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया था। नेपाल के चुनाव भ्रष्टाचार, और बेरोजगारी के अलावा एक बड़े भावनात्मक मुद्दे को लेकर भी हुए थे। वहां सत्तारूढ़ नेताओं की औलादें अपनी रईसी, ऐशोआराम, और देश-विदेश की फिजूलखर्ची सोशल मीडिया पर पोस्ट करती थीं, और उन्हें देख-देखकर नौजवान पीढ़ी अधिक भडक़ी हुई थी। पिछले बरस सितंबर के इस आंदोलन में 76 लोग मारे गए थे, जिनमें से कई मौतें पुलिस गोलियों से हुई थीं। ऐसे में एक जनक्रांति की तरह नेपाल में बहुत बड़ा आंदोलन हुआ, और जनता ने ही सरकार को बर्खास्त कर दिया, पिछली सरकार के सारे नेता किसी तरह जान बचाकर भागे थे। अब ऐसे में पिछले पीएम और गृहमंत्री को आपराधिक लापरवाही के आरोप में गिरफ्तार करने की चर्चा है, जांच आयोग ने इन दोनों को इस बात का दोषी ठहराया है कि इन्होंने जनआंदोलन को हिंसक तरीके से दबाने की अनुमति दी थी।
यह केवल नेपाल की बात नहीं है, दुनिया के दर्जनों देशों में अलग-अलग वक्त पर ऐसा होता है कि नई आई सरकार पिछली सरकार के खिलाफ कार्रवाई करती है। भारत में ही आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी सरकार ने देश भर में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ जांच आयोग बिठाए थे, और इंदिरा गांधी को गिरफ्तार भी किया था। अमरीका में अभी ट्रम्प ने पिछले राष्ट्रपति के कार्यकाल के जाने कितने ही बड़े-बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करवाई, जुर्म दर्ज करवाए, उन्हें बर्खास्त किया, क्योंकि पिछली डेमोक्रेटिक सरकार के कार्यकाल में इन लोगों ने ट्रम्प के तरह-तरह के जुर्म पर संवैधानिक और कानूनी कार्रवाई की थी। ऐसा बांग्लादेश में भी देखने आया, पाकिस्तान में भी, और श्रीलंका में भी। पाकिस्तान में तो हालत यह थी कि जनरल जिया उल हक की फौजी तानाशाह सरकार ने पिछले प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी ही दे दी थी। भारत के बहुत से प्रदेशों में भी नाटकीय से लेकर शर्मनाक तक घटनाएं सामने आई हैं। लोगों को तमिलनाडु का वह नजारा नहीं भूलता जब जयललिता की सरकार ने एक बुजुर्ग नेता, और पिछले मुख्यमंत्री एम.करूणानिधि को गिरफ्तार करवाया था, और रात दो बजे उनके घर में बड़ी संख्या में पुलिस घुसी थी, और 78 साल के करूणानिधि को बिस्तर से उठाकर घसीटते हुए, और फिर पूरा का पूरा उठाकर ले जाया गया था। इस दौरान उनके साथ बदसलूकी भी हुई थी, उन्हें गिरा भी दिया गया था, और वे दर्द से चीखते भी रहे थे। ऐसा कई देश-प्रदेश में होता है, और इनको गिरफ्तार होने वाले नेता बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार देते हैं, और सरकार कहती है कि कानून अपना काम कर रहा है। कानून से परे भी बदले और अपमान की भावना से होने वाली कुछ घटनाएं भयानक तरीके से याद रहती हैं। तमिलनाडु में करूणानिधि की गिरफ्तारी के 12 बरस पहले, विधानसभा में विपक्ष की पहली महिला नेता जयललिता एक हंगामे के बीच चलती हुई चप्पलों से विचलित जब सदन से बाहर जा रही थीं, तो उनकी विरोधी पार्टी डीएमके के एक मंत्री ने उनकी साड़ी का पल्लू पकडक़र खींचा था, कंधे पर साड़ी से लगी सेफ्टी पिन अलग हो गई थी, खून निकलने लगा था, और फटी हुई अस्त-व्यस्त साड़ी, बिखरे हुए बालों सहित रोती हुई जयललिता ने सदन छोड़ा था। शायद करूणानिधि की गिरफ्तारी इसी का हिसाब चुकता करना था। जयललिता उस दिन कसम खाकर निकली थीं कि वे मुख्यमंत्री बनने के बाद ही सदन में लौटेंगी, और दो साल के भीतर ही 1991 में ऐसी नौबत आ गई थी।
दुनिया भर में टेलीफोन पर लोगों को ठगने, धमकाने, ब्लैकमेल करने के संगठित जुर्म लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं। भारत के पड़ोस में राजनीतिक अस्थिरता, और फौजी तानाशाही से गुजरते हुए म्यांमार में हजारों लोगों को कैद करके उनसे ऐसे कॉलसेंटर चलवाए जा रहे हैं जो भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोगों से साइबर ठगी-जालसाजी करते हैं, उन्हें धमकाते हैं, डिजिटल अरेस्ट का झांसा देते हैं, और उनकी जिंदगी भर की कमाई को खाली कर देते हैं। ऐसे साइबर क्राइम की खबरें हर दिन आती हैं, लेकिन अभी दो दिन पहले आई एक खबर कुछ अनोखी निकली। जिस छत्तीसगढ़ में हर दिन दर्जनों लोग साइबर-ठगी के शिकार होते हैं, उस छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ऐसा एक अपराधी कॉलसेंटर चल रहा था, जो दुनिया के दूसरे देशों, खासकर अमरीका और यूएई के लोगों को लोन दिलाने के नाम पर ठग रहा था। छत्तीसगढ़ पुलिस ने रायपुर के एक संपन्न इलाके में फायनेंस कंपनी की आड़ में चल रहे ऐसे कॉलसेंटर को पकड़ा, और यहां से 42 लोगों को गिरफ्तार किया। इनके पास से कई दर्जन मोबाइल फोन, डेढ़ दर्जन लैपटॉप, दो दर्जन से अधिक कम्प्यूटर, और बाकी चीजें गिरफ्तार की गईं। पुलिस की जानकारी के अनुसार अहमदाबाद में बैठा हुआ एक व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क को कंट्रोल कर रहा था, वही यह कॉलसेंटर चला रहा था, कर्मचारियों का इंतजाम कर रहा था, और वसूली-उगाही कर रहा था। अभी तक छत्तीसगढ़ का नाम ठगने वाले मुजरिम प्रदेशों की लिस्ट में नहीं था, लेकिन अब अहमदाबाद में बैठे एक मुजरिम की वजह से यह प्रदेश भी ठग-जालसाज प्रदेश की तरह पहली बार सामने आया है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का कोई बहुत अंतरराष्ट्रीय लेन-देन कभी नहीं रहा। कुल मिलाकर थोड़ा-बहुत आयरन ओर, और कुछ चावल ही यहां से निर्यात होता है, लेकिन धोखाधड़ी-जालसाजी निर्यात होने का यह पहला मौका सामने आया है। अमरीका और योरप के वक्त के मुताबिक रायपुर में यह कॉलसेंटर शाम में काम शुरू करता था, और दूसरे देशों में लोन का फर्जी प्रस्ताव देकर ठगी करता था। जो लोग यहां से गिरफ्तार हुए हैं, वे सारे के सारे इस प्रदेश के बाहर के हैं, शायद इसलिए कि स्थानीय लोगों से बात बाहर जाने का खतरा अधिक हो सकता था। गिरफ्तार नौजवान कई प्रदेशों से यहां जुटाए गए थे, और यहां ठगी से जुटाया गया पैसा हवाला या क्रिप्टोकरेंसी के जरिए विदेश भेज देने की जानकारी भी सामने आई है। दिलचस्प बात यह भी है कि अधिकतर आरोपी दसवीं या बारहवीं पास हैं, मतलब यह कि जितनी पढ़ाई पर हिन्दुस्तान में ढंग का कोई काम नहीं मिल सकता, वे यहां बैठे हुए अमरीका और योरप के लोगों को ठग रहे थे। रोजगार की इन नई संभावनाओं से यह भी पता लगता है कि अगर मौका मिले, तो हिन्दुस्तानी अर्धशिक्षित बेरोजगार भी कहीं तक भी पहुंच सकते हैं।
जब संपन्न और विकसित देशों के लोग ठगी का शिकार हो सकते हैं, तो यह बात भी उठती है कि क्या साइबर-ठगी, और दूसरे किस्म के साइबर-जुर्म से बचाव के लिए बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए सरकार को शिक्षण-प्रशिक्षण का कोई इंतजाम तुरंत नहीं करना चाहिए? हाल के बरसों में जो मामले सामने आए हैं, उनमें फौज के बड़े-बड़े तीन स्टार जनरल रह चुके रिटायर्ड अफसर भी साइबर-ठगी में करोड़ों रूपए गंवा चुके हैं, देश के बहुत से प्रदेशों में बहुत से लोग अपने आपको डिजिटल अरेस्ट में गिरफ्तार मानकर अपनी सारी जमापूंजी ठगों के बैंक खातों में डाल चुके हैं। कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें तीन-चार हफ्तों तक कोई बुजुर्ग, या परिवार के सारे लोग अपने के डिजिटल अरेस्ट में मानकर कैद रहे, ठगों के हुक्म मानते रहे, बैंक अफसरों के समझाने पर भी समझने को तैयार नहीं हुए, और अपनी पूरी रकम ठगों के खातों में डालते रहे। इनमें ऐसे-ऐसे बुजुर्ग और बीमार लोग शामिल थे, जो कि ऐसे तनाव में मर सकते थे। अब अगर ऐसी मौतें हुई भी होंगी, तो भी वे हमें अभी तुरंत याद नहीं पड़ रही हैं। फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि अभी इसी वक्त अमरीका के एक राज्य में एक अदालत ने फेसबुक की कंपनी, मेटा पर सैकड़ों करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया है क्योंकि उसने अपने प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को जुर्म का शिकार होने से बचाने के लिए जरूरत के मुताबिक सावधानी नहीं बरती थी। ऐसे में दुनिया भर के साइबर और ऑनलाइन मुजरिम अमरीका, ब्रिटेन जैसे बहुत से देशों में छोटे स्कूली बच्चों को फंसा लेते हैं, उनकी नग्न तस्वीरें ले लेते हैं, और फिर उन्हें ब्लैकमेलिंग के एक रैकेट में फंसाकर उनसे वसूली करते हैं। खुद अमरीका में ऐसी ब्लैकमेलिंग से थके हुए दहशत के शिकार कई बच्चों ने खुदकुशी तक कर ली है। अभी भारत जैसा देश इस तरह की साइबर-सावधानी बरतने से कोसों दूर है। इस देश के एक-दो राज्य, तेलंगाना, और कर्नाटक यह पहल जरूर कर रहे हैं कि कमउम्र बच्चों को किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर दाखिला न दिया जाए, लेकिन ऐसे कानून भी जब तक देश के स्तर पर नहीं बनेंगे, बाकी प्रदेशों के बच्चे तो खतरे में रहेंगे ही। फिर मेटा जैसी दानवाकार कंपनी से लडऩे-भिडऩे की ताकत किसी एक प्रदेश की नहीं हो सकती, और इसके लिए भारत सरकार जैसी एक बड़ी ताकत की जरूरत होगी।
लड़कियों और महिलाओं की माहवारी का मामला लगातार किसी न किसी खबर में बने रहता है। यह एक किस्म से अच्छी नौबत है कि एक-दो पीढ़ी पहले जिस बात की चर्चा भी शर्मिंदगी मानी जाती थी, वह बात अब पहले के मुकाबले कुछ अधिक खुलकर की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दो अलग-अलग मामलों में माहवारी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है, और टिप्पणी की है। एक मामले में उसने तमाम राज्य सरकारों को कहा है कि स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी पैड दिए जाएं, और उनके लिए शैक्षणिक संस्थाओं में ऐसे अलग शौचालय बनाए जाएं, जहां पर वे माहवारी के दिनों में सहूलियत से पैड बदल सकें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मानना राज्य सरकारों के लिए एक बंदिश है, यह एक अलग बात है कि ऐसे कई फैसलों पर अमल करने में राज्य सुस्ती दिखाते हैं, और आसानी से आदेश पूरा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी कुछ लोगों को खटक सकती है कि कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दिनों में अनिवार्य छुट्टी का प्रावधान बनाने से महिलाओं में हीनभावना भी आ सकती है, और नौकरी देने वाले लोग भी महिलाओं को काम पर रखने से कतरा सकते हैं। ये दोनों ही मामले अलग-अलग किस्म के थे, छुट्टी वाली याचिका अदालत ने खारिज कर दी, और कहा कि ऐसे स्वैच्छिक अवकाश की नीति बनाने पर सरकार विचार कर सकती है, लेकिन इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने का मतलब महिलाओं के कामकाज का नुकसान करना हो जाएगा।
आज इस पर चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं कि महाराष्ट्र के नासिक का एक ताजा समाचार है कि वहां स्कूल की बोर्ड इम्तिहान दे रही एक छात्रा ने जब वहां मौजूद शिक्षिका को बताया कि उसकी माहवारी शुरू हो गई है, तो भी शिक्षिका ने उसे बाथरूम तक नहीं जाने दिया, और उसी हालत में उसे बाद के एक घंटे तक बैठना पड़ा। इस घटना की खबर उजागर होने पर बोर्ड के चेयरमैन ने इसे गलत फैसला बताया, और कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि परीक्षा दे रहे छात्र-छात्राओं को शौचालय न जाने दिया जाए। उन्होंने कहा कि शरीर की प्राकृतिक जरूरतों को नहीं दबाया जा सकता, और शिक्षकों को ऐसे नियम बनाने और थोपने का कोई अधिकार नहीं है। बोर्ड की तरफ से इस शिक्षिका को नोटिस भी जारी किया जा रहा है कि उसने इस छात्रा के कहने पर भी उसे बाथरूम तक जाने की छूट क्यों नहीं दी। छात्रा का कहना है कि माहवारी शुरू होने के बाद उसके लिए पर्चा लेकर बैठना मुमकिन नहीं था, और उसके पूरे कपड़े खून से भर गए। इम्तिहान के बाद भी उसे अपनी सहेलियों के घेरे में निकलना पड़ा, क्योंकि ऐसे कपड़े शर्मिंदगी की वजह थे। जब उसने स्कूल की एक कर्मचारी से सेनेटरी नेपकिन मांगा, तो उसने कहा कि स्कूल में इसे नहीं रखा जाता। परिवार ने इसकी शिकायत करते हुए कहा कि शिक्षिका को सजा दिलवाना नहीं चाहते, लेकिन वे बोर्ड के नियमों और निर्देशों को अधिक संवेदनशील बनवाना चाहते हैं।
महाराष्ट्र एक विकसित प्रदेश माना जाता है जहां पर साक्षरता, शिक्षा, जागरूकता, और संपन्नता सभी देश के औसत से अधिक होनी चाहिए। इसके बाद भी अगर सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के फैसलों और निर्देशों के बाद भी इम्तिहान के दौरान अगर स्कूलों में पैड का इंतजाम नहीं है, शिक्षिका में संवेदनशीलता नहीं है, तो यह बड़ी ही फिक्र की बात है। कई शिक्षक-शिक्षिकाएं नियमों को कड़ाई से लागू करने के लिए अमानवीय हद तक चले जाते हैं। देश में जगह-जगह छोटे-छोटे बच्चों को भयानक अमानवीय सजा देने वाले टीचर्स गिरफ्तार भी होते हैं, लेकिन फिर भी हर किसी को समझ नहीं आती है। ऐसे में समाज के भीतर ही अपनी जिम्मेदारी, और दूसरों के अधिकार को लेकर एक बेहतर सामाजिक चेतना की जरूरत है। आज भारत का हाल यह है कि लोगों को अपने अधिकार, और दूसरों की जिम्मेदारी से परे कुछ नहीं सूझता है।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर कल देश भर में एक खलबली मची। बहुत से लोगों ने जाने किस वजह से खुशियां मनाईं, कुछ राजनीतिक दलों के प्रवक्ता इसे जीत की तरह साबित करने पर उतारू हो गए, कुछ जातियों के संगठन भी खुशियां मनाने लगे। और फैसला महज इतना था कि जो दलित हिन्दू, बौद्ध, या सिक्ख धर्म से परे के किसी भी धर्म में जाते हैं, तो उनका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो जाता है। मतलब यह कि उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, और अनुसूचित जाति को जुल्म से बचाने के लिए जो एक कानूनी संरक्षण बनाया गया है, उसका लाभ भी नहीं मिलेगा। यह 1950 में भारत में लागू हुए संविधान में ही लिखा हुआ है, और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक, या कि किसी छोटी अदालत तक भी जाने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में इतना लचीलापन है कि संविधान के कई बुनियादी तत्वों को भी लोग चुनौतियां दे सकते हैं, और अदालतें काफी दूर तक उन्हें सुनने-समझने की कोशिश भी करती हैं कि शायद संविधान के किसी पहलू की कोई नई व्याख्या निकल आए।
अब इस मामले को देखें, तो यह आंध्रप्रदेश का एक मामला था जिसमें ईसाई बन चुके एक दलित पादरी ने शिकायत की थी कि उन्हें 2020 में कुछ लोगों ने घर पर प्रार्थना के बीच जाति आधारित गालियां दी थीं। उन्होंने एसटी-एससी एक्ट के तहत पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। अभियुक्तों का कहना था कि वे सालों से ईसाई हैं, इसलिए वे एससी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज नहीं कर सकते। इस तर्क के आधार पर मामला आंध्र हाईकोर्ट तक पहुंचा, और पिछले बरस आंध्र हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत करने वाला पादरी दस साल से ईसाई है, और चूंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं, इसलिए दलितों को जाति के संरक्षण से बाहर कर दिया गया है। यह शिकायत खारिज होने पर यह भूतपूर्व दलित पादरी सुप्रीम कोर्ट गया, और सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि सिर्फ हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध धर्मों में ही जाति व्यवस्था का ऐसा ढांचा है कि उसमें दलितों से भेदभाव की परंपरा है, इसलिए इन धर्मों में जो लोग दलित हैं, वे भी कोई दूसरा धर्म अपनाने पर इस लाभ से बाहर हो जाते हैं।
अदालत के सामने इस मामले में दलितों के इन तीन धर्मों से परे के किसी धर्म में जाने पर सिर्फ कानूनी संरक्षण का मुद्दा था, आरक्षण का मुद्दा तो पहले से ही पूरी तरह तय हो चुका है कि धर्मांतरित दलित इन तीन धर्मों के बाहर जाने पर आरक्षण के भी हकदार नहीं रह जाते। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बिना कोई नई बात कहे 1950 की संवैधानिक व्यवस्था को ही दुहराया है, और इस पर जाने क्या-क्या सोचकर कौन-कौन से तबके खुशियां मनाने में जुट गए हैं। एक दिलचस्प दूसरा पहलू यह भी है कि ओबीसी तबकों के जो लोग ईसाई या मुस्लिम बनते हैं, उन्हें अभी तक ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलता है। जाहिर है कि पिछड़े वर्ग की व्यवस्था हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध से परे के कुछ धर्मों में भी लागू होती हो, और केन्द्र सरकार वहां भी ओबीसी आरक्षण का हकदार उन्हें मानती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 2004 से एक ऐसी याचिका खड़ी हुई है जिसमें कहा गया है कि इस्लाम और ईसाई धर्म में जाने वाले हिन्दू, दलितों को भी अनुसूचित जाति में गिना जाना चाहिए, और उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक केन्द्र सरकार ने इसका विरोध किया है, लेकिन एक कमेटी गठित की है, जो कि यह गौर कर रही है कि क्या मुसलमान और ईसाई हो चुके हिन्दू-दलितों को अनुसूचित जाति के दर्जे में रखा जाना चाहिए? अभी तक इस मामले में कुछ तय नहीं हुआ है, इसलिए 1950 से चली आ रही संवैधानिक व्यवस्था ही जारी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल के सिर्फ 14 महीनों में इतनी बार अपनी नीतियां, वादे और फैसले पलट चुके हैं कि अब यह उनकी कार्यशैली का स्थायी चरित्र बन गया है। कुछ लोग इसे लचीलेपन और कल्पनाशील सौदेबाजी कहकर बचाव करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इतने कम समय में इतने बड़े-बड़े फैसले उलट-पलट करने वाला कोई निर्वाचित राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में पहले नहीं हुआ। ट्रम्प अब ‘यू-टर्न राष्ट्रपति’ बन चुके हैं। हर हफ्ते नया पलटाव, नई अनिश्चितता, नया विश्वासघात।
ट्रम्प के यू-टर्न की सूची लंबी और चौंकाने वाली है। ईरान पर अधिकतम दबाव का दावा करते हुए उन्होंने ईरानी तेल पर छूट दे दी। रूस पर सख्ती का ऐलान कर रूसी तेल खरीदने का रास्ता खोल दिया। कनाडा-मैक्सिको पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, फिर टाल दिया। यूक्रेन युद्ध 24 घंटे में खत्म करने का दावा किया, फिर मदद जारी रखी। ग्रीनलैंड खरीदने का ड्रामा रचा, फिर चुपचाप पीछे हट गए। टिकटॉक बैन का वादा किया, अब एक अमरीकी कंपनी को जोडक़र चीनी मालिक के साथ समझौता कर रहे हैं। क्रिप्टो पर दुश्मनी का रवैया रखा, अब रणनीतिक स्टॉक बनाने की बात कर रहे हैं। यह सिर्फ नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि सिद्धांतों का खुला त्याग है।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ट्रम्प के इन यू-टर्न से नैटो देशों, यूरोप और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों का भरोसा पूरी तरह टूट गया है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा के नेता अब खुलकर कह रहे हैं कि ‘ट्रम्प की कोई नीति स्थायी नहीं है। आज जो वादा करते हैं, कल पलट देते हैं।’ नतीजा यह कि नैटो देश अब अपनी रक्षा पर खुद ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यूरोप में अमरीका-प्रथम को अब महज-अमरीका के रूप में देखा जा रहा है। ट्रम्प ने न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे अमरीका की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
इसके अलावा, ट्रम्प की कमजोर नब्जों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एपस्टीन से जुड़ी खबरों को दबाने की कोशिशें और इजराइली मोसाद के हाथ में ट्रम्प की कुछ कमजोरियां होने की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। कई रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों में दावा किया जा रहा है कि नेतन्याहू इन कमजोरियों का इस्तेमाल करके ट्रम्प से वह सब करवा रहे हैं, जो आधी सदी में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति से नहीं करवा सके। साथ ही ट्रम्प परिवार के कारोबारी हित भी विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं। क्रिप्टोकरेंसी, रेयर मिनरल्स और अन्य क्षेत्रों में ट्रम्प परिवार के हितों की खबरें बार-बार सामने आ रही हैं। कई देशों से जुड़े इन व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभों के कारण अमेरिकी विदेश नीति व्यक्तिगत स्वार्थ की दिशा में मुड़ती दिख रही है।
ट्रम्प की इस अस्थिरता और व्यक्तिगत हितों की नीति ने पूरी दुनिया की चैरिटी, पर्यावरण, कारोबार और रोजगार को जिस बुरी तरह प्रभावित किया है, उतना तो हिटलर भी नहीं कर पाया था। पर्यावरण समझौतों से पीछे हटना, ग्लोबल वार्मिंग पर चुप्पी, कारोबारी युद्ध, टैरिफ की अनिश्चितता और रोजगार के अवसरों का नुकसान, सब कुछ एक साथ हुआ है।
सबसे बड़ा और लंबे समय तक रहने वाला खतरा यह है कि ट्रम्प का यह मिजाज अगले किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए नवसामान्य बन सकता है। एक बार जब एक निर्वाचित राष्ट्रपति दिखा देता है कि बड़े-बड़े वादे और नीतियाँ इतनी आसानी से पलटी जा सकती हैं, तो भविष्य के नेता भी इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय समझौतों की विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी, सहयोगी देश खुद को सुरक्षित रखने के लिए अलग गठबंधन बनाने लगेंगे और अमेरिका की वैश्विक लीडरशिप स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगी। यह छोटा खतरा नहीं है। यह लोकतंत्र और वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।
ट्रम्प का हर हफ्ते यू-टर्न अब कोई छोटी बात नहीं रह गया है। यह अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को कमजोर कर रहा है, सहयोगियों का भरोसा तोड़ रहा है और दुनिया भर में अनिश्चितता फैला रहा है। कुछ इसे लचीलापन कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह अस्थिरता है, जिसकी कीमत न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया चुका रही है। और सबसे अधिक खुद अमरीका चुका रहा है जिसके भीतर यह पूरी तरह, और बुरी तरह स्थापित हो चुका है कि वहां के संविधान में कुछ बुनियादी दरारें हैं जिनकी वजह से वहां के राष्ट्रपति को एक पिशाच-तानाशाह बन जाने का पूरा मौका हासिल हुआ है। इस ट्रंप ने पूरी दुनिया के सामने घटियापन की नई मिसालें कायम की हैं, और इसकी काट किसी भी लोकतांत्रिक देश में आसानी से नहीं निकल पाएगी, इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे घटिया राष्ट्रपति की तरह दर्ज हो जाना तय है।
भारत में जब-जब मानसून में किसी शहर में बाढ़ की नौबत आ जाती है, तो श्मशान वैराग्य की तरह पॉलीथीन-कचरे पर रोकथाम की बात होने लगती है। फिर जैसे-जैसे बाढ़ का पानी उतरता है, शहरी घरों से कीचड़ धुल जाता है, सडक़ों पर आवाजाही शुरू हो जाती है, लोग फिर से कचरा फैलाने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी तीर्थ से लौटते ही लोग नए उत्साह के साथ पाप करने में जुट जाते हैं। आज शहरों की हालत यह होती जा रही है कि नालियों को लोग घूरों की तरह इस्तेमाल करते हैं, हर नाली में तरह-तरह का कचरा पटा हुआ रहता है। लोग प्लास्टिक के कचरे को अधिक खतरनाक मानते हैं क्योंकि पतली झिल्लियां जगह-जगह फंस जाती हैं, और पानी आगे बढऩा बंद हो जाता है। लेकिन न सिर्फ सिंगल यूज प्लास्टिक कही जाने वाली ऐसी पतली झिल्लियों का खतरा है, बल्कि हर वह कचरा खतरा है जो कि नालियों में डाल दिया जाता है। इसके पीछे की अलग-अलग वजहों को समझने की जरूरत है।
एक तो यह कि भारत में निर्वाचित स्थानीय जनप्रतिनिधियों में जनता में अनुशासन लागू करने का हौसला नहीं रहता। महापौर या निगम-पालिका अध्यक्ष न किसी अवैध निर्माण को रोक पाते, न अवैध कब्जे को, और ऐसे में नालियों में कचरा फेंकने वाले लोगों को, या कि हर रात दुकान बंद करते समय बाहर सडक़ों पर पैकिंग का अपार कचरा छोडक़र जाने वाले लोगों पर किसी कार्रवाई की चर्चा भी औसत शहर में नहीं होती। हो सकता है कि देश के कुछ चुनिंदा शहरों में निर्वाचित प्रतिनिधि, और म्युनिसिपलों में तैनात अफसर दिल कड़ा करके कचरा फैलाने वालों पर कुछ सख्ती दिखाने की सोचते भी हों, लेकिन स्थानीय शासन की कुर्सियों पर बैठे अधिकतर लोगों को समझाने, और उनसे अमल करवाने के बजाय सरकारी खर्च पर कचरा इकट्ठा करवाने को अधिक सहूलियत का पाते हैं। नतीजा यह होता है कि जब जनता जिम्मेदार नहीं होती, तो घरों और बाजारों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग छांटने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जिस कचरे को सड़ाकर खाद बनाई जा सकती है, या जो सडक़र खुद ही खत्म हो सकता है, ऐसे बायोडीग्रेडेबल कचरे के भी प्लास्टिक और दूसरे कचरे के साथ मिलाकर जब कचरा गाडिय़ों में डाला जाता है, तो फिर उसमें से प्लास्टिक अलग करके उसकी री-साइकिलिंग की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
कुछ आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालाना करीब एक करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, और इसमें से सिंगल यूज प्लास्टिक, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है, वह सिर्फ दो-तीन फीसदी रहता है। बाकी सारा कचरा अलग-अलग किस्म की पैकिंग का रहता है, जो अभी भी बिना रोक-टोक धड़ल्ले से चल रही है। अभी सरकार ने एक कानून बनाकर इतना जरूर किया है कि प्लास्टिक के अलग-अलग ग्रेड की पैकिंग इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को अपने इस्तेमाल जितनी मात्रा के उन ग्रेड के प्लास्टिक की री-साइकिलिंग के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसके लिए सरकार की रजिस्टर्ड री-साइकिलिंग यूनिट्स हैं, लेकिन यह पूरा सिलसिला सरकारी फर्जीवाड़े से घिरा हुआ है, और जिस तरह गाडिय़ों के प्रदूषण वाले सर्टिफिकेट फर्जी तरीके से बन जाते हैं, वैसे ही प्लास्टिक री-साइकिलिंग के सर्टिफिकेट खरीद लिए जाते हैं।
भारत बहुत सारी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच जीने वाला देश है। यहां एक तरफ आम जनता को हासिल सरकारी अस्पताल बदहाल हैं, कई प्रदेशों में तो इलाज का ढांचा इतना कमजोर है कि लोगों को पास के किसी महानगर जाकर वहां संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी तरफ ऐसा कोई दिन नहीं होता जब देश के किसी न किसी शहर में कोई बहुत महंगा अस्पताल शुरू न होता हो, या कोई बड़ा सा डायग्नोस्टिक सेंटर न बनता हो। अमीर और गरीब के बीच बंटी हुई दो किस्म की चिकित्सा-सुविधाओं के अलावा एक तीसरे किस्म की चिकित्सा सुविधा देश में और विकसित होती चल रही है, और वह है दूसरे देशों से इलाज के लिए भारत पहुंचने वाले संपन्न विदेशियों की। दुनिया के संपन्न और विकसित देशों में इलाज इतना महंगा है कि वहां चिकित्सा बीमे के लिए लोगों को बड़ी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। ऐसे में न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के कुछ दूसरे कम महंगे देशों की तरफ भी मरीजों का जाना चलते रहता है। और तो और एक महंगे देश ब्रिटेन से दूसरे देशों में, हंगरी, टर्की, पोलैंड, रोमानिया, स्पेन, पुर्तगाल, थाइलैंड, मैक्सिको, और भारत दांतों का इलाज कराने के लिए हर दिन हजारों लोग चले जाते हैं, और यह इलाज इन दूसरे देशों में ब्रिटेन के मुकाबले खासा सस्ता पड़ता है।
भारत के बारे में यह समझने की जरूरत है कि इतने विशाल देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम अलग-अलग रहता है, और दूसरे देशों से आने वाले लोगों को अपनी पसंद और प्राथमिकता के भारतीय इलाके मिल जाते हैं। फिर यहां के महंगे अस्पताल विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले हैं, हिन्दुस्तानी डॉक्टर पूरी दुनिया में कामयाबी से काम करते हैं, हर विकसित देश में भारतीय नर्सें दिख जाती हैं, और अब कोई ऐसी अंतरराष्ट्रीय आधुनिक चिकित्सा-मशीनें नहीं हैं जो कि भारत में न हों। ऐसे में महंगे देशों के मुकाबले भारत में इलाज का खर्च काफी कम पड़ता है, यहां मरीजों के साथ रहने वाले परिवार को भी बाहर सस्ते में मकान या होटल मिल जाते हैं। इसके साथ-साथ जब वे हिन्दुस्तान आ ही जाते हैं, तो वे ऑपरेशन या लंबे इलाज के साथ-साथ देश के अपने पसंदीदा हिस्से में घूमने भी जा सकते हैं। मरीजों और उनके परिवारों का इलाज का ऐसा भारत भ्रमण उन्हें कुल मिलाकर सस्ता और सहूलियत का पड़ता है। कई किस्म के महंगे इलाज पर अमरीका के मुकाबले भारत में एक चौथाई से भी कम खर्च आता है। भारत से जाकर दूसरे देशों में बसे हुए, और भारतीय पैमानों पर संपन्न हो चुके मरीज तो बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते ही हैं, खाड़ी के देशों के संपन्न लोगों के लिए भी हिन्दुस्तान एक बड़ी पसंद है।
भारत और अंतरराष्ट्रीय जुबान में इसे भारत का मेडिकल टूरिज्म कहा जाता है। अब इस देश में बड़े अस्पतालों के ढांचे जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, हर तरह का पर्यटन भारत में जिस तरह बढ़ रहा है, वह देखने लायक है। इस क्षेत्र के एक जानकार विशेषज्ञ से अभी बीच में रूककर ही हमने बात की, तो पता लगा कि देश के कुछ सबसे बड़े निजी अस्पतालों का 30-40 फीसदी बिल तो विदेशी मरीजों का ही बन रहा है, और उनकी वजह से भारत के मरीजों का इलाज कुछ कम दाम पर हो जाता है। उन्होंने बताया कि आंध्रप्रदेश में तो पर्यटन विकास निगम मेडिकल टूरिज्म और वेलनेस टूरिज्म को अभियान के रूप में जोड़ चुका है, और इसकी वेबसाइट पर इसे अलग से बढ़ावा दिया जा रहा है। आंध्र की राजधानी में दो सौ एकड़ में एक मेगा ग्लोबल मेडिसिटी बनाई जा रही है, जो कि अंतरराष्ट्रीय मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देगी। इसी से जुड़ी हुई जानकारी खंगालते हुए यह दिखा कि केन्द्र सरकार ने अपने ताजा बजट में ऐसे पांच क्षेत्रीय मेडिकल केन्द्र बनाने की घोषणा की है, और टीडीपी के चन्द्राबाबू नायडू तो ऐसा फायदा उठाने वाले सबसे पहले राज्य रहेंगे ही।
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने अभी दो नए विधेयक पास किए हैं, और राज्यपाल से इन पर मंजूरी मिल जाने पर वे कानून बन जाएंगे। भारत में जैसी राजनीतिक परंपरा है, उसके मुताबिक यह बात साफ है कि जिस पार्टी की राज्य सरकार रहती है, केन्द्र से अगर उसी पार्टी की सरकार ने राज्यपाल नियुक्त किए हैं, तो वे उस सरकार के भेजे विधेयकों पर अड़ंगा नहीं लगाते। छत्तीसगढ़ में एक कानून धार्मिक स्वतंत्रता का है जिसमें धर्मांतरण करवाने वाले लोगों पर पहले के मुकाबले कई गुना अधिक कड़ी कार्रवाई का इंतजाम है। पहले भी लालच देकर, दबाव डालकर, या प्रताडि़त करके, धोखा देकर धर्मांतरण करवाने पर सजा का इंतजाम था, अब उस सजा को इस नए विधेयक में बहुत बढ़ा दिया गया है। यह एक अलग बात है कि देश के अलग-अलग कई राज्यों के इसी तरह के धार्मिक स्वतंत्रता, या धर्मांतरण विधेयकों, या कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, और उन पर एक साथ सुनवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने जो दूसरा विधेयक पास किया है, वह किसी भी तरह के इम्तिहान में पर्चे आउट करने वाले लोगों को बड़ी लंबी और कड़ी सजा देने का है। इसमें नकल करने वाले लोगों को भी कई बरस के लिए अपात्र कर दिया जाएगा, और साजिश के तहत पेपर लीक करने वालों को उम्रकैद तक की सजा, एक करोड़ तक का जुर्माना नए कानून में रहेगा, और उनकी सम्पत्ति जब्त करके उससे भी जुर्माना वसूल किया जाएगा। दोनों ही कानून बहुत कड़े हैं, और दोनों में ही उम्रकैद जैसे प्रावधान रखे गए हैं, जो कि आमतौर पर सामूहिक बलात्कार, या कत्ल जैसे हिंसक अपराधों में ही रहते आए हैं।
देश की सरकार को, या हर प्रदेश को अपनी विचारधारा के मुताबिक कानून बनाने का हक है, और उसके लिए संसद या विधानसभाओं में जितने बहुमत की जरूरत रहती है, वह अगर सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी को हासिल है, तो फिर सदन में असहमति कोई मायने नहीं रखती। संसदीय व्यवस्था, और परंपरा यही है कि बिना किसी बहस के ध्वनिमत से भी विधेयक पास हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति को दर्ज कराने के लिए मतदान में हारने के बजाय कई बार सदन छोडक़र भी चले जाता है। लेकिन जहां कहीं भी कोई नया कानून बनता है, वहां एक लोकतांत्रिक परंपरा शुरू करने की जरूरत है। चूंकि सदनों में चर्चा का माहौल घटते चल रहा है, बहुत से मुद्दों पर विपक्ष को सदनों में बोलने की इजाजत ही नहीं मिलती, इसलिए इसे सरकार की जिम्मेदारी बनाना चाहिए कि वह सदन के अलावा सडक़ के लोगों को भी अपनी बात समझाने के लिए सरल शब्दों में यह बताए कि इस नए कानून की जरूरत क्या है। लोगों की राजनीतिक चेतना के लिए यह जरूरी है कि जटिल कानूनों की सरल व्याख्या उनके सामने रखी जाए। वैसे तो सरकारें यह कह सकती हैं कि वे विधेयकों को पेश करने के पहले उन पर जनता की राय जानने के लिए वेबसाइट पर लोगों से रायशुमारी करती हैं, लेकिन आम जनता वेबसाइट पर भी जटिल बातों को न पढ़ पाती है, न उन पर प्रतिक्रिया दे पाती है। इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे अपने विधेयकों को एक सामाजिक ऑडिट के लिए जनता के सामने भी पेश करें। अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में जनता के सामने कुछ पेश करने का एक माध्यम मीडिया होता है, लेकिन अगर उसके लोग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए तल्ख सवाल न करें, और महज डिक्टेशन लेकर, बयान रिकॉर्ड करके लौट जाएं, तो जनता के लिए जरूरी उसका लोकतांत्रिक हक किनारे धरा रह जाता है।
सामाजिक ऑडिट से हमारा एक मतलब यह भी है कि सरकारों को यह साफ करना चाहिए कि मौजूदा कानूनों में कौन सी कमी थी जिसकी वजह से नए कानून की जरूरत आन पड़ी है। क्या जांच की कमी, सुबूत दर्ज करने की कमजोरी, बेअसर हद तक धीमी हो चुकी अदालतें कानूनों के बेअसर होने के लिए जिम्मेदार हैं, या कि इन सब पहलुओं के मजबूत कर देने के बाद भी मुजरिम छूट जा रहे हैं, उन्हें सजा का खौफ नहीं रह गया है? आमतौर पर हमारा तजुर्बा यह है कि सरकारें मौजूदा कानूनों का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, जांच में कमी रहती है, सुबूत ठीक से दर्ज नहीं होते हैं, गवाही समय पर और सही तरीके से नहीं हो पाती, अदालत में सरकारी वकील कमजोर पड़ जाते हैं, और हर स्तर पर कुछ बाहरी वजहें भी असर डालने लगती हैं, जिनसे मुजरिमों को सजा नहीं हो पाती। अब अगर मौजूदा कानून, और उनकी जगह आने जा रहे अधिक कड़े कानून दोनों पर अमल की तुलना करें, तो अगर अमल ही कमजोर है, तो नया अधिक कड़ा कानून भला किस काम आएगा? अभी एक-दो दिन पहले ही दो नौजवानों को देश के एक सबसे कड़े और खतरनाक कानून यूएपीए से अदालत ने शायद सात बरस बाद रिहा कर दिया कि उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त सुबूत नहीं थे। अब जिस एक सबसे बड़े कानून के तहत पांच-पांच बरस तक तो जमानत नहीं होती, उस कानून की जगह अगर और कड़ा कानून भी लागू कर दिया जाए, और उसके तहत दस-दस बरस तक जमानत न हो, और सुबूतों के अभाव में अदालत से लोग छूट जाएं, तो ऐसे अधिक कड़े कानून किस काम के रहेंगे? सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि क्या सरकारें मौजूदा कानूनों का पूरी हद तक इस्तेमाल करने के बाद भी, पूरी बारीकी बरतने के बाद भी असफल हो रही हैं? अगर ऐसा है तब तो नए अधिक कड़े कानून की जरूरत है, वरना ऐसे कानून जनता को संतुष्ट करने के लिए अधिक बनते हैं कि सरकार किसी मामले में कितनी गंभीर है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बड़े निजी अस्पताल में गंदे पानी का ट्रीटमेंट करने वाले टैंक में सफाई कर्मचारी उतरे, तो उनमें से तीन की मौत वहां बनी हुई गैस से हो गई। सफाई कर्मचारियों के साथ देश भर में जगह-जगह ऐसे हादसे होते रहते हैं, और जब बाकी पूरी दुनिया ऐसी सफाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल करती है, सफाई कर्मचारी गैस मास्क लगाकर ही ऐसी टंकियों में या गटर-नालों में उतरते हैं, तब भारत इन मशीनों से दूर है। मशीनें हैं जरूर, लेकिन वे जरूरत जितनी नहीं हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि दमकल गाडिय़ां हैं जरूर, लेकिन जरूरत जितनी नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि इधर गटर में उतरे हुए सफाई कर्मचारी दम घुटने से मरते हैं, तो उधर फायर ब्रिगेड का इंतजार करते हुए लोग दम घुटने से जिंदगी खो बैठते हैं। पूरे देश में ये दोनों ही सहूलियतें शहरी विकास के साथ जुड़ी हुई हैं, और शहरों का बाकी विकास तो हो जाता है, लेकिन सफाई की मशीनी क्षमता, और आग बुझाने की पर्याप्त क्षमता अधिकतर राज्यों में स्थानीय शासन की प्राथमिकता नहीं रहती।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में फायर ब्रिगेड को म्युनिसिपल से लेकर पुलिस को इसलिए दिया गया था कि पुलिस अधिक कड़ाई और अनुशासन से इस इमरजेंसी सेवा को बेहतर चला सकेगी। लेकिन जिम्मा तो पुलिस को दे दिया गया, सहूलियतें नहीं दी गईं, नतीजा यह हुआ कि बिना पर्याप्त गाडिय़ों, और बिना पर्याप्त कर्मचारियों के अब फायर ब्रिगेड मानो किसी की जिम्मेदारी नहीं रह गई। अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पूरे प्रदेश के बारे में सरकार से जवाब-तलब कर रहा था कि आग से जूझने की क्षमता विकसित करने में इतनी लापरवाही क्यों है? ठीक इसी तरह अब जब म्युनिसिपल के इलाके में, राज्य की राजधानी में सफाई कर्मचारी मर गए हैं, तो यह बात सामने आ रही है कि अस्पताल में नगर निगम से एसटीपी की सफाई का अनुरोध किया था, और म्युनिसिपल ने इसे खुद करवाने कह दिया था। अब खबरें बताती हैं कि खुद म्युनिसिपल के पास इस विशाल और विकराल हो चुके शहर में शौचालयों और गटरों की सफाई के लायक मशीनें गिनी-चुनी हैं। जाहिर है कि नेताओं, और अफसरों के बंगलों से वक्त मिलने पर ही बाकी जगह गाडिय़ां जा पाती होंगी, और इस अस्पताल की तरह बहुत से लोग ठेकेदारों के मोहताज रहते होंगे सफाई के लिए।
साथ-साथ चल रही इन दोनों खबरों से यह लगता है कि क्या ऐसी शहर सरकार को सचमुच ही गौरवपथ नाम की कोई चीज बनानी चाहिए? क्या शहर का गौरव किसी चौराहे से, बगीचे या सडक़ से होता है, या फिर वह आंखों से दूर एक ऐसी छुपी हुई सुविधा से होता है जिसकी चर्चा तो नहीं होती, लेकिन जिससे शहर का, और नागरिकों का जीवन सुरक्षित होता है, और सहूलियत का रहता है। आज शहरों में जगह-जगह कहीं गौरवपथ, कहीं गौरव गार्डन, कहीं सडक़ के डिवाइडरों का सौंदर्यीकरण, तो कहीं किसी नई प्रतिमा का स्थापना, अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ-साथ नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा, और उनके अहंकार को पूरा करना भी प्राथमिकता में रहता है। नतीजा यह होता है कि बुनियादी जरूरतें किनारे धरी रह जाती हैं। जब से स्थानीय शासन, या म्युनिसिपल की धारणा शुरू हुई, तब से ही साफ पानी, साफ शहर, रौशनी और सडक़, ये ही म्युनिसिपल की प्राथमिकताएं मानी जाती हैं। अब इन बुनियादी जरूरतों के पूरे न होने पर भी म्युनिसिपल साज-सज्जा, और राजनीतिक स्मारकों में जुट जाती हैं, जनता की साफ और सुरक्षित जिंदगी की जरूरतें हाशिए पर चली जाती हैं।
दशकों से स्थानीय संस्थाओं को देखते हुए अभी भी हमारे लिए यह तय करना दुविधा का मामला है कि इन्हें चलाने के लिए अफसर बेहतर होते हैं, या निर्वाचित जनप्रतिनिधि? कानून के हिसाब से पंचायत हो या म्युनिसिपल, इनके निर्धारित चुनाव करवाना एक संवैधानिक जिम्मेदारी है, ठीक उसी तरह, जिस तरह संसद और विधानसभाओं के चुनाव तय समय पर होते हैं। लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का जो हाल स्थानीय संस्थाओं में दिखता है, उससे मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या सचमुच ही भारत के इस हिस्से के शहर ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए तैयार हैं, या फिर यहां अफसरों से ही म्युनिसिपलों को चलवाना चाहिए? यह सवाल कुछ अलोकतांत्रिक लग सकता है, लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी अपनी जिम्मेदारियों, और अधिकारों के बीच तालमेल बैठाते बहुत कम दिखते हैं। फिर इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ये जनप्रतिनिधि वही तो बन सकते हैं जिन्हें राजनीतिक दल उम्मीदवार मनोनीत करते हैं। ये उम्मीदवारी किसी भी तरह से स्थानीय संस्थाओं को चलाने को ध्यान में रखने की क्षमता के हिसाब से तय नहीं की जाती, धर्म, जाति, उपजाति, और जीत की संभावना को देखते हुए जब स्थानीय संस्थाओं की लीडरशिप के लिए उम्मीदवार तय होते हैं तो इन्हें चलाने की क्षमता किसी प्राथमिकता सूची में नहीं रहती। ऐसे में लगता है कि इनके राजनीतिक दबाव और नियंत्रण से परे शायद अफसर अकेले ही कुछ बातों को बेहतर तरीके से तय कर पाते, लेकिन पंचायती राज कानून के बाद अब हमारी यह चर्चा केवल एक काल्पनिक चर्चा है जिसकी कोई संभावना नहीं है।
भारत में रसोई गैस की कमी से खलबली तो मची हुई है, लेकिन नौबत भगदड़ तक नहीं पहुंची है। घरेलू गैस सिलेंडर कुछ देर से सही, मिल तो जा रहे हैं, और बाजार के लिए कारोबारी गैस सिलेंडर की सप्लाई तकरीबन बंद है, लेकिन इस देश में कालाबाजारी इतनी संगठित और व्यवस्थित है कि कुछ शहरों में गिने-चुने रेस्त्रां छोडक़र बाकी सबका हाल खींचतान कर चल ही रहा है। पोहे के ठेलेवालों ने 30 रूपए का पोहा 50 रूपया कर दिया है, जाहिर है कि यह कालाबाजारी में महंगे मिलने वाले सिलेंडर का अतिरिक्त दाम है। एक प्लेट पोहे पर ब्लैक में मिले सिलेंडर से शायद एक-दो रूपए का ही फर्क पड़ा होगा, लेकिन दाम 20 रूपए बढ़ाने का एक मौका मिल गया। अभी भारत में ईरान के तंग रास्ते से गुजरते हुए दो एलपीजी जहाज पहुंचे हैं, लेकिन उनसे कितने दिन की सप्लाई होगी, कितने दिन की एलपीजी की कमी कायम रहेगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर आज भी अमरीकी इजाजत से भारत में रूसी तेल आ रहा है, और अगले कुछ हफ्तों में अमरीका इस इजाजत को खत्म भी कर देगा, तो क्या उसके बाद पेट्रोल-डीजल की कोई कमी होगी, यह भी अभी साफ नहीं है। साफ तो अभी जंग के बादल ही नहीं हैं कि खाड़ी के देशों में चल रही बमबारी से वहां से तेल और गैस का बाहर निकलना कब तक कितना प्रभावित रहेगा। ऐसे में भारत के लोगों को अपनी पेट्रोल-डीजल, और गैस की खपत के बारे में खुद होकर भी सोचना चाहिए। सरकार शायद अधिक कड़े फैसले तेजी से न ले पाती है, न उसकी घोषणा सरकार के लिए सहूलियत की बात रहती, लेकिन बाजार, घरेलू खपत, और संस्थागत ईंधन की खपत को काबू में करने की बात सभी लोगों को सोचनी चाहिए, न सिर्फ आज के इस परेशानी के दौर में, बल्कि बाद में भी।
आज दुनिया में अलग-अलग देशों ने इस नौबत से जूझने के लिए कई तरह के कड़े फैसले लिए हैं। पाकिस्तान में बिजली की कमी हो गई है, जिसकी वजह से स्कूलें बंद कर दी गई हैं, और दफ्तरों को चार दिन का कर दिया गया है। पाकिस्तान में एलएनजी से बिजली बनाने के प्लांट बंद कर दिए थे क्योंकि रूस-यूक्रेन संकट से वही सबक निकला था। अब पाकिस्तान तेजी से सौर ऊर्जा को बढ़ा रहा है, और कोयले से बिजली भी बढ़ाई जा रही है ताकि आयातित तेल या गैस पर मोहताज रहना घट सके। भारत के ही बगल के बांग्लादेश में यूनिवर्सिटी और बहुत से स्कूल बंद कर दिए गए हैं, बिजली कटौती आम हैं, एलएनजी आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कोयले से बिजली उत्पादन बढ़ाया जा रहा है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है। लेकिन उसने कोयले से बिजली बनाना बढ़ा दिया है, और कोयले के निर्यात को फिलहाल रोक दिया है ताकि घरेलू बिजली उत्पादन में कमी न रहे। चीन को रूस और ईरान से तेल मिलना जारी है, लेकिन उसने अपने बिजली घरों को अधिकतम क्षमता पर ले जाना जारी रखा है। दक्षिण कोरिया में कोयले से बिजली पर लगी गई एक सीमा को हटा दिया गया है, उसे अधिक से अधिक बनाया जा रहा है, परमाणु बिजली उत्पादन भी बढ़ाया जा रहा है, और बाहर से आने वाली एलएनजी की खपत को कम करने के लिए सभी उद्योगों को कह दिया गया है। थाईलैंड ने ऊर्जा बचत के कई तरीके लागू किए हैं, और लोगों से गैरजरूरी जमाखोरी न करने को कहा है। योरप में गैस की कीमतें 50 फीसदी तक बढ़ गई हैं, बहुत से देश कोयला और परमाणउ बिजलीघरों पर वापिस लौट रहे हैं, और बड़े-बड़े विकसित देशों जर्मनी, फ्रांस, और ब्रिटेन ने ऊर्जा बचत के अभियान चलाए हैं। जापान ने कोयले से बिजली बनाने को सबसे तेज किया है, ताकि एलएनजी पर निर्भरता कम रहे।
पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है, और अगले महीने 9 से 29 तारीख के बीच असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में चुनाव हो जाएंगे। इन पांच राज्यों में तीन राज्य कुछ अधिक दिलचस्प हैं जहां मुस्लिम और ईसाई आबादी काफी है। इनमें असम में करीब 34 फीसदी मुस्लिम, और 4 फीसदी ईसाई वोटर हैं। कुछ जिले ऐसे भी हैं जहां मुस्लिम वोटर 50 से 70 फीसदी तक हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मुस्लिम आबादी को बरसों से एक बड़ा मुद्दा बनाकर चल रहे हैं कि राज्य का ढांचा ही बढ़ते मुस्लिमों से बदल जाएगा। मुस्लिमों के साथ-साथ असम और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आकर बसे हुए लोगों का भी एक बड़ा मुद्दा है जिनकी छंटनी करने में चुनाव आयोग लगा हुआ है, और दसियों लाख वोटरों के कागजात की छानबीन बंगाल में अभी बाकी है। वहां सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस ने यह सवाल भी उठाया है कि चुनाव की घोषणा के दिन तक 50 लाख से अधिक वोटरों के कागजात की जांच बाकी है, और ऐसे में चुनाव कैसे करवाए जा सकते हैं? बंगाल में असम से कम, लेकिन 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। कुछ जिलों में मुस्लिम वोटरों का अनुपात खासा है। बंगाल में भी वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस को पीछे छोडक़र भाजपा प्रमुख विपक्षी दल बनी हुई है, और उसने बांग्लादेशी घुसपैठियों का एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। अब केरल चलते हैं जहां पर 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, और 18 फीसदी ईसाई वोटर हैं। इन दोनों प्रमुख अल्पसंख्यक समुदायों को देखें, तो केरल इन सारे पांच राज्यों में सबसे आगे है। तमिलनाडु और पुदुचेरी में मुस्लिम और ईसाई वोटर मिलाकर करीब 12 फीसदी हैं, और इन राज्यों में धार्मिक ध्रुवीकरण जैसी नौबत नहीं है।
इस मुद्दे पर लिखने की आज इसलिए सूझी कि मुस्लिम बहुल राज्यों में आज एक अलग किस्म का तनाव भी चल रहा होगा। इजराइल और अमरीका, दोनों गैरमुस्लिम, और एक किस्म से मुस्लिम-विरोधी देशों ने एक शिया-मुस्लिम देश ईरान पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला किया है। फिर इसके जवाब में ईरान ने अड़ोस-पड़ोस के दूसरे मुस्लिम देशों पर हमला किया है, जहां पर अमरीकी फौजी अड्डे हैं। कहने के लिए ये हमले सिर्फ फौजी ठिकानों पर हो रहे हैं, लेकिन पूरी दुनिया में ऐसे कोई हमले दर्ज नहीं हो रहे जो फौज पर किए जाएं, और फौज पर ही निशाना लगे। यूक्रेन से लेकर गाजा तक, और ईरान के पड़ोसियों से लेकर अफगानिस्तान के काबुल तक नागरिक ठिकानों पर हमले आम बात हैं, और केरल से खाड़ी के देशों में जाकर बसे हुए और काम करने वाले लाखों मलयाली लोगों पर ईरान-युद्ध का क्या असर होगा, यह अभी साफ नहीं है। भारत के मुस्लिमों में शिया मुस्लिम बहुत कम हैं, इसलिए जब खाड़ी के दूसरे गैरशिया मुस्लिम देशों पर शिया-ईरान का हमला हो रहा है, तो ऐसे देशों में बसे हुए भारतीय मुस्लिम, और गैरमुस्लिमों की क्या प्रतिक्रिया होगी, यह अभी साफ नहीं है। फिर यह भी साफ नहीं है कि क्या भारत के घरेलू प्रादेशिक चुनावों में इन सबका कोई असर होगा। लेकिन हम जिस तरह असम और बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठिया मुस्लिमों, और बाकी मुस्लिमों के मुद्दे को देख रहे हैं, उसी तरह केरल में भी हम मुस्लिम और ईसाई समुदाय की भावनाओं को समझना चाहते हैं क्योंकि केरल अपने लोगों की परदेस में मौजूदगी की वजह से हो सकता है कि कई भावनाओं से, घटनाओं से प्रभावित होता हो।
हमने अंदाज लगाने की कोशिश की, तो बंगाल और असम में तो बांग्लादेशी, और दीगर मुस्लिमों के मुद्दे सबसे बड़े हैं। एक तरफ भाजपा खुलकर इन दोनों तबकों के खिलाफ हैं, हिमंत बिस्वा सरमा तो हेट-स्पीच की सीमा में भीतर दूर तक जाकर बयान देते हैं, और बंगाल में भी जिन दसियों लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से अभी तक बाहर हैं, उनमें शायद मुस्लिम ही सबसे अधिक हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण का अभियान चुनावी नतीजे पहले ही तय कर चुका है। बंगाल में एक वक्त जो मुस्लिम समुदाय वामपंथियों के साथ था, वह अब पूरी तरह से ममता बैनर्जी के साथ है, क्योंकि वामपंथी किसी भी तरह से भाजपा को रोकने की ताकत अब नहीं रखते। ऐसे में ममता के पक्ष में मुस्लिमों का एक मजबूत ध्रुवीकरण चुनावी नतीजों को ममता के खिलाफ भी ले जा सकता है, क्योंकि करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं में से एक बड़े हिस्से के मतदाता सूची से बाहर हो जाने का आसार दिख रहा है।
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का यह दूसरा कार्यकाल अभी सवा साल भी पूरा नहीं कर सका है, और पिछले चार दिनों में जो बात सबसे तल्खी से उभरकर आई है, वह यह कि आज ट्रम्प खुद, और उसके चक्कर में अमरीका दुनिया में सबसे अलग-थलग पड़ चुके हैं। आज अमरीका के कल तक के अपने पिट्ठू इजराइल के अलावा कोई देश उसके साथ बचा नहीं है, और खुद ट्रम्प आज इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का पिट्ठू दिख रहा है। अब तक जो पूरी दुनिया पर साम, दाम, दंड, भेद से राज करते आया था, आज अपनी गुंडागर्दी में दूसरे देशों की मदद मांग रहा है, लेकिन कोई देश उसके साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है। क्या पिछले सौ-पचास बरस में अमरीका का यह बदहाल किसी और राष्ट्रपति ने आज तक किया था? जिस अमरीका की तरफ देखे बिना नैटो देशों की सुबह नहीं होती थी, नैटो देशों के मुखिया सोने के पहले यह देखते थे कि क्या अमरीका का कोई संदेश आया है, या उससे जुड़ी हुई कोई जरूरी बात है, उसके बाद ही सोने जाते थे। आज उसी अमरीका के राष्ट्रपति की फौजी-मदद की अपील को एक-एक करके वे सारे देश खारिज कर चुके हैं जिन देशों ने मध्य-पूर्व के अलग-अलग देशों पर हमले में अब तक अमरीका का साथ दिया था, बदनामी और तोहमतें झेलने की कीमत पर भी। ट्रम्प आज ठीक उस तरह अकेला पड़ गया है जिस तरह रैबीजग्रस्त कोई कुत्ता अकेले रह जाता है, जिसे पकडक़र पिंजरे में बंद कर देना जरूरी समझा जाता है, आज ट्रम्प दुनिया के लिए रैबीज-डॉग जैसा ही खतरनाक हो चुका है, और उसके काटे की कोई वैक्सीन भी नहीं है। हम रैबीज-डॉग से तुलना नाजायज मानते हैं क्योंकि कोई कुत्ता खुद होकर तो रैबीज-संक्रमित होता नहीं है, ट्रम्प तो आज जो कुछ कर रहा है, सब अपनी बददिमागी से। ऐसे में एक बेकसूर कुत्ते की मिसाल का इस्तेमाल हम मजबूरी में इसलिए कर रहे हैं कि ट्रम्प दुनिया के लिए ठीक उतना ही खतरनाक हो चुका है। रैबीज-संक्रमित कुत्ते के सामने तो जिंदगी बचे-खुचे दिनों की रहती है, ट्रम्प के सामने तो करीब पौने तीन बरस का कार्यकाल बाकी है।
हमने आज इस पर लिखना जरूरी इसलिए समझा कि ईरान के मोर्चे पर एक समुद्री रास्ता खोलने के लिए ट्रम्प ने दुनिया भर के देशों से फौजी मदद मांगी है, और उसने खासकर नैटो-देशों को यह खुली धमकी दी है कि अगर वे साथ नहीं देते हैं, तो यह नैटो के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात होगी। अभी ईरान की जंग में अमरीकी जनता की मर्जी के खिलाफ अमरीका को फंसा देने वाले ट्रम्प की फौजी मदद की इस अपील पर फ्रांस ने कह दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। जापान ने भी सहयोग से इंकार कर दिया, और कहा कि वह तेल आयात पर निर्भर तो है, लेकिन अमरीका के साथ मिलकर युद्ध में शामिल नहीं होगा। दक्षिण कोरिया ने मना कर दिया, और कहा कि वे क्षेत्रीय स्थिरता चाहते हैं, लेकिन अमरीकी गठबंधन में नहीं। ब्रिटेन ने भी अपने युद्धपोत भेजने से मना कर दिया, और कहा कि वह कूटनीति पर जोर देगा। खाड़ी के अमरीकी-सहयोगी देशों, यूएई, और सउदी अरब ने भी जंग में अमरीका का साथ देने से मना कर दिया, और कहा कि उन्हें पहले सूचना नहीं दी गई, और वे अमरीका-इजराइल की नीति से असहमत भी हैं। खाड़ी के जिन देशों में अमरीका फौजी अड्डे बनाकर चल रहा है, वे भी आज लड़ाई में ईरान के हमले झेल रहे हैं, लेकिन जंग में वे साथ नहीं उतरे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने ट्रम्प की मांग को खारिज कर दिया, और कहा कि वे जंग में शामिल नहीं होगा। तुर्की ने ट्रम्प की अपील को अमरीका की गलती कहा, और जंग में शामिल होने से मना कर दिया। जर्मनी तो ग्रीनलैंड को लेकर अमरीकी गुंडागर्दी के समय से ट्रम्प का बड़ा मुखर आलोचक रहा है, और उसने ग्रीनलैंड और ईरान दोनों पर ट्रम्प के फैसलों को खारिज करते हुए खतरनाक बताया है। उसने अभी ट्रम्प की अपील पर कहा है कि वह अपने जहाज नहीं भेजेगा, यह उसकी लड़ाई नहीं है, और अमरीका को पहले कूटनीति पर जोर देना चाहिए। जर्मनी ने कहा कि ईरान पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं, और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा पर खतरा गहराएगा। जर्मनी ने यूरोपीय संघ के साथ मिलकर कहा कि वह ईरान के जंग में अमरीका को कोई फौजी समर्थन नहीं देगा, और ट्रम्प की नीतियां एकतरफा और खतरनाक हैं। इटली को ट्रम्प का करीबी माना जाता था, उसने ट्रम्प की धमकी को नामंजूर कर दिया है, और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून का पूरा सम्मान होना चाहिए। इटली ग्रीनलैंड से लेकर ईरान के जंग तक खुलकर अमरीका के खिलाफ है, और उसने साफ-साफ कहा कि यह जंग अमरीका की समस्या है, जिसे कि कूटनीति से हल किया जाना चाहिए। इस मामले में इटली यूरोपीय संघ के साथ है, जिसने यह कहा है कि वह ट्रम्प के हमलों के साथ नहीं हैं। इस पूरे महीने में ईरान पर हमले को लेकर यूरोपीय संघ ट्रम्प के खुलकर खिलाफ है, और वह इसके पहले भी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर पूरी तरह से डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ था। ईरान पर ईयू ने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह उसकी लड़ाई नहीं है। ईयू की मुखिया ने ईरान पर हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ कहा।
अमरीका के अंदर भी ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग 36-40 फीसदी के आसपास है। जो मतदाता दोनों प्रमुख पार्टियों से परे हैं, वे बेचैन हैं। महंगाई, तरह-तरह के टैरिफ, और पेट्रोलियम अचानक बहुत महंगे हो जाने से लोग खफा हैं। खुद ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी में फूट है, और संसद में जरूर इन सांसदों ने जंग के फैसले पर सरकार का साथ दे दिया है, लेकिन बाहर खुलकर कई रिपब्लिकन सांसद जंग के खिलाफ बोल रहे हैं। जिस हिन्दुस्तान में ट्रम्प के लिए हवन-पूजन होता था, वहां वह अब न सिर्फ मुस्लिम समुदाय की धिक्कार पा रहा है, बल्कि देश के विचारवान लोग भी अब उसे धिक्कार रहे हैं। ऐसे लोग और ऐसे महिला आंदोलनकारी भी, जो कि ईरान की मुल्ला-सरकार के कट्टरपंथ के खिलाफ रहते हैं, वे भी आज ईरान पर इस तरह के फौजी हमले के मुद्दे पर ईरान के साथ खड़े हो गए हैं।
पिछले हफ्ते भर से उत्तरप्रदेश का संभल एक बार फिर खबरों में बना हुआ है। वहां के एक मंझले पुलिस अफसर ईद की तैयारियों की शांति समिति की बैठक के वायरल हुए वीडियो में कहते सुनाई दे रहे हैं- बहुत सारे लोगों को खुजली मची हुई है कि ईरान और इजराइल-अमरीका का झगड़ा हो रहा है, अगर इतनी परेशानी है तो जहाज का टिकट कटवाओ, और ईरान चले जाओ। इस अफसर ने इसी बैठक में खुलकर कहा कि ईरान के लिए छाती पीटने वालों को ईरान चले जाना चाहिए। उसने यह भी कहा कि अगर सडक़ पर नमाज पढ़ी तो जेल भेज देंगे, इलाज करेंगे। जो लोग ईरान के समर्थन में या अमरीका-इजराइल के खिलाफ रील बना रहे हैं, उनके संदर्भ में इस अफसर ने बैठक में कहा-रील बनाई, तो रेल बना देंगे। इन हमलावर बयानों पर देश के बहुत से भले लोग लिख रहे हैं कि क्या अगर कोई हिन्दू अमरीका और इजराइल के लिए हवन और प्रार्थना करे, तो क्या पुलिस की यही जुबान होगी? देश के एक बड़े मुस्लिम नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा- यह मुल्क आपके बाप का नहीं है, पुलिस का काम हिफाजत देना है, धमकी देना नहीं है। कुल मिलाकर साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील चले आ रहा एक जिला, यूपी का संभल अब अपने एक खुले आक्रामक साम्प्रदायिक अफसर को और देख रहा है। इसके पहले भी यहां ऐसे दूसरे अफसर आ चुके हैं।
कल 15 मार्च को ही संयुक्त राष्ट्र में दुनिया भर के लिए इस्लामोफोबिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की याद दिलाई है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि सरकारों को नफरत फैलाने वाले बयानों को रोकने, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने, और भेदभाव के खिलाफ ठोस कदम उठाने होंगे, जिनमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का पूर्ण पालन सुनिश्चित करना भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतेरेश ने कहा कि ऑनलाइन मंचों को हेट स्पीच और उत्पीडऩ समाप्त करने के लिए काम करना होगा जो किसी व्यक्ति के धर्म या उसकी आस्था के आधार पर उसे निशाना बनाते हैं। 15 मार्च के इस अंतरराष्ट्रीय दिवस के मौके पर एक और बड़ी चीज हुई।
यूपी के ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह महत्वपूर्ण फैसला दिया कि किसी निजी सम्पत्ति में बनी हुई मस्जिद, या किसी निजी जगह पर नमाज पढऩे पर, या धार्मिक सभा आयोजित करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है। हाईकोर्ट ने इसी जिले संभल के साथ-साथ एक और जिले बदायूं के अफसरों को कड़ी फटकार लगाई कि निजी सम्पत्ति के भीतर धार्मिक गतिविधियों के लिए प्रशासन से किसी भी तरह की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, और अफसर निजी परिसरों में होने वाली नमाज या प्रार्थनाओं में दखल न दें। अदालत ने ऐसी प्रार्थना या उपासना को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार माना, और अफसरों को फटकार लगाई कि अगर उन्हें कानून व्यवस्था बिगडऩे का डर है, तो या तो वे उसे संभालने की जिम्मेदारी दिखाएं, या अपना तबादला करवा लें, या इस्तीफा दे दें। अदालत ने कहा कि कोई धार्मिक गतिविधि सार्वजनिक सडक़ या सम्पत्ति पर होती है, तभी पुलिस की इजाजत जरूरी होगी। इन दो जिलों में प्रशासन ने लोगों की निजी सम्पत्ति पर भी नमाज पढऩे पर रोक लगाई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस का काम निजी सम्पत्ति पर, या मस्जिद में नमाज पढ़ रहे लोगों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वे शांतिपूर्ण ऐसा कर सकें, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का जिम्मा उस पर है। अदालत ने हैरानी जाहिर की कि पुलिस सुरक्षा देने के बजाय नमाज पढऩे पर ही रोक लगा रही थी। अदालत ने कहा कि पुलिस सिर्फ इस आधार पर किसी धार्मिक आयोजन को निजी सम्पत्ति पर नहीं रोक सकती कि वहां भीड़ है, या वहां तनाव हो सकता है। संभल में एक मस्जिद में रमजान के दौरान प्रशासन ने यह प्रतिबंध लगाया था कि वहां कुल 20 लोग नमाज पढ़ेंगे। दो अलग-अलग बेंचों में आए हुए दो अलग-अलग जिलों के मामलों में जजों ने अफसरों को फटकार लगाई है, और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला भी दिया है कि निजी स्थान पर धार्मिक गतिविधियां पूर्ण रूप से संरक्षित हैं, और संभावित तनाव के नाम पर लोगों के धार्मिक अधिकार नहीं छीने जा सकते। कानून के विश्लेषकों का मानना है कि उत्तरप्रदेश का यह फैसला इस साम्प्रदायिक बना दिए गए प्रदेश में अल्पसंख्यकों के लिए राहत की बात है जो निजी मस्जिदों या घरों में प्रार्थना करते हैं, और उस पर पुलिस और प्रशासन तरह-तरह की नाजायज कार्रवाई करते हैं। कानून के जानकार कहते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के ये दो फैसले मिसाल कायम करते हैं कि निजी सम्पत्ति पर धार्मिक आयोजन के लिए कोई पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है।
भारत को पिछले कुछ समय से दुनिया का डायबिटीज-कैपिटल भी कहा जा रहा है, और यह भी कहा जा रहा है कि यह दुनिया में कमउम्र बच्चों में डायबिटीज की सबसे बड़ी जगह बन गया है। आंकड़ों के साथ एक दिक्कत यह है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय आंकड़े अलग-अलग देशों में ऐसे कुल मरीजों की संख्या बताते हैं। होना तो यह चाहिए कि उन देशों की आबादी के अनुपात में ऐसे डायबेटिक कितने हैं, वह समझ आना चाहिए। फिलहाल जिस तरह भी आंकड़े हैं उनके मुताबिक भारत में चाइल्डहुड ओबेसिटी (बचपन में मोटापा) चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। करीब डेढ़ करोड़ बच्चे और ढाई-पौने तीन करोड़ किशोर-किशोरियां बहुत अधिक वजन वाले हैं। ये आंकड़े बढ़ते ही चल रहे हैं। और इनका पहला असर इन लोगों के आगे चलकर डायबिटीज का शिकार होने की शक्ल में सामने आता है। हम बहुत अधिक मोटापे (ओबेसिटी) और डायबिटीज को जोडक़र दोनों के लिए जिम्मेदार बातों पर कुछ चर्चा जरूरी समझते हैं।
बच्चों के बीच बाजार में मिलने वाले फास्टफूड, तरह-तरह के कोल्डड्रिंक्स, आइसक्रीम, चॉकलेट, और मिठाइयों जैसी भयानक मीठी चीजें तेजी से फैल रही हैं। जो संपन्न तबका है, उसके पास इन चीजों को खरीदने के लिए हमेशा ही पैसे रहते हैं, और अब घर बैठे कुछ भी बुला लेने की सहूलियत ने लोगों को रबड़ी या कुल्फी भी घर बुलाकर खाने का आराम दे दिया है। जब बाहर निकलने की जहमत भी न उठानी पड़े, तो यह खानपान खतरनाक हद तक बढऩा ही है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और चीजें भी हो गई हैं। कोरोना-लॉकडाउन के दौर में जिस तरह बच्चों को ऑनलाइन काम करना पड़ा, उनका स्क्रीन के साथ वह रिश्ता चलते रह गया। आज हिन्दुस्तान में किसी भी आय वर्ग के बच्चे और बड़े हर दिन कई घंटे स्क्रीन पर उलझे रहते हैं। खाने में भारी घी-तेल-मक्खन, नमक और शक्कर, मैदा और दूसरी नुकसानदेह चीजें, और चलने-फिरने, खेलने-कूदने की जगह स्क्रीन की कैद! नतीजा यह हो रहा है कि शक्कर और कैलोरी, घी और दीगर चीजें भीतर जा रही हैं, और बदन इनमें से किसी को खर्च नहीं कर रहा है। खेल के मैदान घटते चले गए हैं, गली-मोहल्ले की सडक़ों पर खेलने वाले बच्चों को माँ-बाप सडक़ हादसे के डर से वहां खेलने नहीं देते, घूम-फिरकर सबके पास मोबाइल फोन, टीवी, वीडियो गेम, या कम्प्यूटर पर वक्त गुजारना रह गया है। आज किसी भी तरह की भीड़ के बीच अगर यह देखें कि औसत वजन से अधिक के कितने लोग हैं, तो भीड़ उन्हीं की दिखती है।
हम भारत में अतिमोटापे के आंकड़ों को देखें, तो दस लाख की आबादी पर 34 हजार अतिमोटे बच्चे हैं। जंकफूड के प्रचार की वजह से 70 फीसदी बच्चे हफ्ते में 3 से अधिक बार जंकफूड खाते हैं। लेकिन जब हमने यह ढूंढना शुरू किया कि क्या मोटापे का अनुपात देशों की संपन्नता के अनुपात में होता है? गरीब देशों या समाजों के बच्चे आखिर क्या खाकर मोटे होंगे, तो एआई से मिला विश्लेषण बतलाता है कि गरीबों के बीच भी परंपरा घरेलू खानपान से हटकर अब लोग बाजार के बने हुए तरह-तरह के जंकफूड की तरफ जाते हैं क्योंकि मजदूर और कामकाजी माँ-बाप के लिए बच्चों को आसानी से तुरंत कुछ खाना देना आसान हो जाता है। कई गरीब देशों में बच्चे बाजार में मिलने वाले अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड अधिक पा जाते हैं क्योंकि परिवार फल-सब्जियों को अधिक महंगा पाते हैं। जंकफूड से बदन में कैलोरी तो जमा होती रहती है, लेकिन शारीरिक विकास के लिए जरूरी पोषण आहार नहीं मिलता। इसे ‘डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रीशन’ कहा जाता है। भारत जैसे विकासशील देशों में गरीब परिवारों में एक ही वक्त कुपोषण भी है, और मोटापा बढ़ाने वाले ओवरन्यूट्रीशन भी हैं! यह बात कुछ विरोधाभासी लग सकती है, लेकिन इस सच्चाई का विश्लेषण करने वाले कहते हैं कि भूख और मोटापा एक ही घर में रहते हैं!
हमने डायबिटीज के विशेषज्ञ कई डॉक्टरों से पूछा तो उनका कहना था कि खूब शारीरिक मजदूरी करने वाले गरीब भी इन दिनों डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं। भारत सरकार के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि शहरी गरीबों के बीच कुपोषण और अतिपोषण का यह दोहरा बोझ तेजी से बढ़ रहा है। गरीब ग्रामीण महिलाओं में भी मोटापा चौथे सर्वे से पांचवें सर्वे के बीच चार फीसदी से बढक़र चौदह फीसदी तक हो गया, और शहरी गरीब महिलाओं में तो यह 20-30 फीसदी तक पहुंच गया है। अब बच्चे अगर मोटे दिख रहे हैं, तो जरूरी नहीं है कि वे सेहतमंद हों, वे कुपोषण के शिकार भी हो सकते हैं। ये सारे आंकड़े, और यह निष्कर्ष अटपटे लग सकते हैं, लेकिन ये सब सरकारी सर्वे से मिले हुए नतीजे हैं।
भारत के सुप्रीम कोर्ट में कल एक जनहित याचिका को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह कहते हुए खारिज किया कि महिलाओं को माहवारी की छुट्टी का अनिवार्य हक देने से उनके ही रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना था कि यह बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन रोजगार देने वालों को जब यह पता लगेगा कि उन्हें कानूनी शर्त के तहत महिलाओं को हर महीने 3-4 दिन छुट्टी देनी ही होगी, तो ऐसे मालिक या कंपनी महिलाओं को काम पर रखने से ही परहेज करेंगे। इसके पहले एक पिछले सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने भी 2024 में इसी तरह की बात कही थी कि ऐसी छुट्टी महिलाओं को रोजगार से बाहर करने की वजह बन सकती है। जो लोग अदालत में इस जनहित याचिका को लेकर गए थे उनका तर्क है कि महिलाओं की माहवारी उनकी एक शारीरिक स्थिति है जो उनकी पसंद से नहीं रहती। ऐसे में अधिकतर महिलाएं कई तरह की तकलीफ महसूस करती हैं, और कुछ को तो छुट्टी भी लेनी पड़ती है। इसलिए मानवीयता के आधार पर या महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए, उनकी गरिमा की रक्षा के लिए ऐसा कानून बनाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि माहवारी को लेकर समाज के बीच में जिस तरह की एक नकारात्मक सोच बनी हुई है, वह भी कानूनी छुट्टी मिलने से कुछ कमजोर होगी। याचिका में तो यह तक कहा गया कि बहुत सी महिलाएं तकलीफ के ऐसे दिनों में भी काम पर जाने के लिए मजबूर होने पर काम ही छोड़ देती हैं।
वर्तमान और एक पिछले मुख्य न्यायाधीश के तर्क को भी समझने की जरूरत है जिनका कहना है कि छोटे कारोबारों में, या अनौपचारिक क्षेत्रों में कर्मचारियों पर खर्च एक बड़ा अनुपात रहता है, और अगर वहां पर महिला कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से माहवारी की छुट्टी देनी पड़ेगी, तो लोग उन्हें काम पर रखने पर ही कतराएंगे। आज भी भारत में बहुत से देशों के मुकाबले कामगारों में महिलाओं का अनुपात बड़ा नीचे है, प्रसूति अवकाश और महिलाओं के बच्चों की देखरेख के कानूनी अवकाश जहां-जहां लागू हैं, वहां-वहां नियोक्ता महिलाओं को काम पर रखने में कतराते भी हैं।
इन दोनों पक्षों को देखने के साथ-साथ महाराष्ट्र की एक पुरानी चली आ रही नौबत की चर्चा भी जरूरी है। वहां बीड जिले में गन्ने के खेतों में काम करने वाली महिलाओं को लगातार 12-18 घंटे तक काम पर लगाया जाता है। उन्हें कोई छुट्टी नहीं दी जाती, शौचालय तक जाने का समय नहीं दिया जाता। ठेकेदार इन खेतों में पति-पत्नी दोनों को रोजी पर एकसाथ रखते हैं, और अगर पत्नी ने माहवारी की छुट्टी ली, तो मजदूरी दोनों की काट ली जाती है। इससे बचने के लिए वहां पर बड़ी संख्या में महिलाएं गर्भाशय निकलवा देती हैं ताकि माहवारी ही बंद हो जाए, और गन्ने के खेतों से छुट्टी लेने की नौबत ही न आए। इस पर महाराष्ट्र सरकार ने औपचारिक जांच भी करवाई थी, और पता लगा कि गन्ना उत्पादक बीड जिले में गर्भाशय निकलवाने की राष्ट्रीय औसत दर 3 फीसदी से आगे बढक़र कई गांवों में 36 फीसदी तक है। कुछ महिलाओं ने 20-30 साल की उम्र में ही गर्भाशय निकलवा दिए ताकि खेतों की मजदूरी न कटे। खेत-मजदूरी के ठेकेदार इस सर्जरी के लिए मजदूरों को कर्ज देते हैं जो कि बाद में उनकी रोजी से काटते हैं।
महाराष्ट्र की यह विकराल समस्या अपने पूरे अमानवीय रूप के साथ पूरी दुनिया में कुख्यात है। लेकिन इससे परे भी पूरे देश में हाल यही है कि महिलाओं को काम पर रखने के पहले नियोक्ता यह अंदाज लगा लेते हैं कि माहवारी, गर्भ, प्रसूति, शिशु पालन के साथ-साथ हर किस्म के त्यौहारों का बोझ भी महिलाओं पर आता है, और परिवारों में कोई भी बीमार रहे, रिश्तेदारी में कोई भी मरे, अड़ोस-पड़ोस से लेकर जात-बिरादरी तक कोई भी शादी हो, उसका पहला बोझ महिलाओं पर ही पड़ता है। इसलिए लोग महिलाओं को काम देने के पहले यह सोच लेते हैं कि उनकी छुट्टियां पुरूष सहकर्मियों के मुकाबले अधिक रहेंगी। इसके साथ-साथ यह बात भी रहती है कि शिफ्ट वाले काम में महिलाओं को रात की शिफ्ट में रखना बहुत ही कम जगहों पर संभव हो पाता है। इन सब वजहों से लोग महिलाओं को अधिक काम देना नहीं चाहते हैं। नियोक्ता की अपनी मजबूरियां रहती हैं, उसे बाजार के मुकाबले में अपनी कंपनी या अपने कारोबार को चलाना रहता है, उसे प्रकृति के नियमों से अधिक लेना-देना नहीं रहता। फिर कुछ श्रम कानून तो काम की जगहों पर एक संख्या से अधिक महिलाओं के रहने पर उनके बच्चों के लिए भी कुछ तरह के इंतजाम की शर्त रखते हैं। इन सबकी वजह से महिलाओं की उत्पादकता को कम मान लिया जाता है। अब अगर कानून माहवारी की छुट्टी को अनिवार्य बना देगा, तो इसका मतलब महिला के काम के दिन दस फीसदी तक कम हो जाना होगा, 30 दिनों के महीने में 3-4 दिनों की छुट्टी, कोई भी मालिक पसंद नहीं करेंगे।
मुख्य न्यायाधीश की यह फिक्र देश के कुछ अलग-अलग राज्यों में पिछले कुछ समय से लागू कानून के साथ जोडक़र देखने की जरूरत है। बिहार में 1992 से ही सरकारी महिला कर्मचारियों को हर महीने दो दिन का माहवारी अवकाश मिलता है। कर्नाटक में अभी पिछले साल से सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में महीने में एक दिन की ऐसी छुट्टी अनिवार्य कर दी गई है। ओडिशा में 2024 से हर महीने एक दिन की छुट्टी मिलती है। केरल में 2023 से उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं को छुट्टी मिलती है, और उनकी हाजिरी 75 फीसदी के बजाय, 73 फीसदी ही अनिवार्य है। कुछ बड़ी निजी कंपनियां भारत में भी महिला कर्मचारियों को ये सहूलियत देती हैं।
पूरे देश में कुल कामगारों को अगर देखें, तो कुछ राज्य सरकारों के, और कुछ बहुत बड़ी निजी कंपनियों के सीमित कर्मचारियों के लिए ही ऐसा हक लागू किया गया है। इसलिए अभी यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल है कि अगर इसे पूरे देश में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के लिए अनिवार्य किया जाता है, तो मालिक या नियोक्ता की प्रतिक्रिया इस पर किस तरह की होगी। ऐसा न हो कि महिलाओं को हक देने के लिए कोई ऐसा कानून बना दिया जाए जो कि व्यावहारिक रूप से उनके ही पूरे तबके की रोजगार की संभावनाओं को घटा दे। सरकारी क्षेत्र में तो महिला आरक्षण लागू है, लेकिन निजी क्षेत्रों में तो कोई महिला आरक्षण भी नहीं है, और कम काम मिलने पर भी पूरी तनख्वाह देना बिजनेस मैनेजमेंट की समझ के खिलाफ भी जा सकता है। आज गिनी-चुनी कंपनियां ही ऐसी हैं जो कि महिला अधिकारों, या दूसरे मजदूर कानूनों की फिक्र और परवाह करती है, बाकी तो आज महिलाओं से परे के भी मजदूर कानूनों की कोई परवाह नहीं करतीं। ऐसे में बाजार की क्या प्रतिक्रिया ऐसे माहवारी-अधिकार पर होगी, उसे भी सोचना चाहिए, वरना हवन करते महिलाओं के ही हाथ जलेंगे।
ब्रिटिश संसद ने अभी एक फैसला लिया है जिसकी वजह से वहां सदियों से चली आ रही एक परंपरा खत्म होने जा रही है। वहां के लोकतंत्र में जो सामंती परंपराएं चली आ रही हैं, उनके खिलाफ नई सोच वाले लोग आलोचना करते आए हैं, और अब संसद में मतदान से यह तय किया है कि वहां के उच्च सदन (भारत की राज्यसभा जैसे) में राज परिवारों के लोग अपने शाही खिताबों की वजह से नहीं बैठ सकेंगे। एक विकसित, पश्चिमी, और आधुनिक लोकतंत्र किस तरह सदियों पुरानी सामंती परंपराओं का गुलाम बने रह सकता है, यह उसकी बहुत बड़ी मिसाल है। जिन शाही परिवारों के सेक्स-स्कैंडल न सिर्फ ब्रिटेन बल्कि पूरी पश्चिमी दुनिया को हिलाते, और गुदगुदाते रहे हैं, वैसे ब्रिटिश शाही परिवारों के लोग हाऊस ऑफ लॉड्र्स में अपने खिताब की वजह से बैठते थे। एक दिलचस्प बात यह भी है कि वहां चर्च ऑफ इंग्लैंड के वरिष्ठ पदाधिकारी भी बैठते हैं। शाही परिवारों के अलावा राजा अपने समर्थक सामंतों को भी जमीन या उपाधि दे देते थे, और यह उपाधि उनके परिवारों में किसी शाही विरासत की तरह चलती थी, और ऐसे कुनबों में पैदा होने की वजह से लोग ब्रिटिश संसद के उच्च सदन में बैठते थे! किसी पारिवारिक फर्म के मालिक की संतान जैसे दुकान की मालिक हो सकती है, कुछ उसी तरह का ब्रिटेन में वहां की उच्च सदन की सदस्यता का भी था। पहले ऐसे सैकड़ों सदस्य थे, लेकिन 1999 में इन्हें घटाकर 92 ऐसे वारिस-सदस्य रखे गए थे। चर्च ऑफ इंग्लैंड के 26 वरिष्ठ बिशप उच्च सदन के सदस्य रहते हैं, सदन की बहस में भाग लेते हैं, और कानूनों पर मतदान भी कर सकते हैं। कहने को ब्रिटेन एक धर्मनिरपेक्ष देश लगता है, लेकिन वहां चर्च ऑफ इंग्लैंड को राजकीय चर्च माना जाता है।
भारत की संसदीय व्यवस्था का बुनियादी ढांचा ब्रिटेन से प्रेरित है, यहां ब्रिटिश हाऊस ऑफ कॉमंस की तरह लोकसभा बनाई गई, और हाऊस ऑफ लॉड्र्स की तरह राज्यसभा। दिलचस्प बात यह भी है कि भारत में इन दोनों सदनों की सीटों का रंग भी लंदन के संसदीय भवन के दोनों सदनों की सीटों की तरह रखा गया था। लेकिन जब भारतीय संसदीय व्यवस्था तय की गई तो संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश परंपराओं से ऊपर उठकर उससे बेहतर, और अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई थी। इसे महज अधिक कहना बेइंसाफी होगी भारत में पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई। भारत में कोई वंशानुगत सांसद नहीं हैं, कोई धार्मिक प्रतिनिधि स्वत: इसके सदस्य नहीं हैं। इसके अलावा भारत में संसद से परे भी पुराने राजा-महाराजा, नवाब जैसे रहे हुए लोगों की राजकीय उपाधियों को कानून बनाकर खत्म कर दिया। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था राजपरिवार के बोझ को भी ढोती है। वहां एक ही शाही परिवार संविधान प्रमुख चले आ रहा है, और उसके भीतर विरासत की पीढिय़ां तय हो जाती हैं। जब तक पिछली रानी गुजर नहीं गई, तब तक उनका बूढ़ा हो चुका राजकुमार बेटा राजा नहीं बन पाया! दिलचस्प बात यह भी है कि ब्रिटिश शाही परिवार बहुत सारे देशों के आजाद हो जाने के बाद भी वहां का संविधान प्रमुख बना हुआ है। इसके पीछे ब्रिटेन की कोई ताकत नहीं है, लेकिन उन देशों की इससे उबरने की हसरत भी नहीं है। वो देश अपने आपमें पूरी तरह स्वतंत्र हैं, लेकिन ऐसे 15 देशों में ब्रिटिश सम्राट ही संवैधानिक प्रमुख हैं, उन्हीं की तस्वीर नोट, सिक्कों, और डाक टिकटों पर छपती हैं। इनमें बहुत से तो एक वक्त अंग्रेजों के गुलाम रहे हुए छोटे देश हैं, लेकिन कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और न्यूजीलैंड जैसे कुछ बड़े देश भी ब्रिटिश राजा को अपना संवैधानिक प्रमुख मानते हैं। इसके साथ भारत के संविधान-प्रमुख, राष्ट्रपति के पद की तुलना करके देखें, तो यह पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यह किसी कुनबे की गुलाम नहीं है, बल्कि राजनीतिक दल मिलकर राष्ट्रपति को अपने सांसदों और विधायकों के वोटों से चुनते हैं, जो किसी भी धर्म, जाति के हो सकते हैं। भारत में अब तक बहुत से धर्मों के लोग, और महिलाएं भी राष्ट्रपति बन चुके हैं, और भारत की यह संवैधानिक व्यवस्था ब्रिटेन जैसे देश के सामने एक मिसाल है।
आज जब ईरान पर अमरीका और इजराइल की मिलिट्री के जमकर हमले चल रहे हैं, और इसके जवाब में ईरान अपने अड़ोस-पड़ोस के उन देशों पर हमले कर रहा है जहां अमरीकी फौजी अड्डे हैं, तो इन धमाकों के बीच पर्यावरण की सोचने की किसी को न जरूरत लग रही है, न मुमकिन ही है। पांच बरस से रूस और यूक्रेन के बीच जंग चल रही है, पिछले कुछ बरसों में इजराइल ने फिलीस्तीन के गाजा पर जितने फौजी हमले किए हैं, पड़ोस के लेबनान पर वहां बसे हुए हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला पर हमले अभी भी जारी हैं, उनसे कितना प्रदूषण हो रहा है, पर्यावरण कितना तबाह हो रहा है, और धरती पर जंग और हथियारों को चलाने के लिए, इनके कारखानों से धरती पर कार्बन कितना बढ़ा है, पर्यावरण कितना चौपट हुआ है, उसका कोई हिसाब नहीं है। अभी तो ईरान के मोर्चे पर जंग बढ़ते ही दिख रही है, इसलिए उसके कम होने की अटकलें बेबुनियाद हैं। फिर कुछ छोटी-मोटी जंग और चलती रहती है, जो कि लड़ाई के दर्जे में गिनी जाती है। हाल के महीनों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान ने एक-दूसरे पर कुछ फौजी-हथियारबंद हमले किए हैं।
आज जब दुनिया वैसे जलवायु-संकट में है, जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरी दुनिया में मौसम इस रफ्तार से बदल रहा है, और उसकी चरम मार धरती पर इतना बुरा असर डाल रही है कि लोगों ने ऐसी तबाही पहले देखी नहीं थी। फिर यह भी है कि यह तबाही बढ़ती ही चल रही है। अभी जंग से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में एक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ का एक इंटरव्यू आ रहा था जिसमें वे बता रहे थे कि किस तरह दुनिया की फौजों को खड़ा करने के लिए बहुत सारे हथियारों और दूसरे सामानों का निर्माण होता है, बड़े-बड़े ढांचे बनते हैं, बड़े-बड़े जहाज बनते हैं, कुछ खास किस्म के हवाई जहाज और पनडुब्बी बनाने के लिए कुछ खास किस्म की धातु और दूसरी सामग्री इस्तेमाल होती है जिसे बनाने के लिए बहुत सारी ऊर्जा लगती है, और बहुत सारा प्रदूषण होता है। फिर इन फौजों के नियमित अभ्यास में भी गोला-बारूद से लेकर बाकी सामानों का उसी तरह इस्तेमाल होता है जिस तरह कि किसी असल जंग में। बड़े-बड़े जहाजी बेड़ों के साथ उनकी हिफाजत करते हुए दूसरे जहाजों का दस्ता चलता है, और इन सबमें खूब ईंधन लगता है। जंग में जब कोई जहाज डुबाया जाता है, जैसा कि अभी भारत के बगल में ही ईरान का एक फौजी जहाज अमरीकी पनडुब्बी ने समंदर में डुबा दिया, तो उससे भी हर तरह का प्रदूषण समंदर में चले गया, सौ से अधिक जिंदगियां भी गईं, लेकिन वह एक अलग मामला है।
एक अंदाज यह है कि दुनिया की फौजें मिलकर दुनिया भर में पैदा होने वाली ग्रीन हाऊस गैस का करीब साढ़े पांच फीसदी पैदा करती हैं। और यह मात्रा नागरिक विमानों, और मालवाहक जहाजों से होने वाली ग्रीन हाऊस गैसों से अधिक है। एक जानकार विशेषज्ञ बता रहे थे कि अपनी फौज की गोपनीयता बनाए रखने के लिए दुनिया की कोई भी फौज न तो अपने सामानों की पूरी जानकारी देती, न अपने अभ्यास की। इन सबसे उन्हें अपने पर खतरा दिखता है, इसलिए कोई भी देश अपनी फौजी हलचल से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को अपने आंकड़ों में शामिल नहीं करते। जंग में किसी तरह की प्रदूषणमुक्त ऊर्जा इस्तेमाल नहीं होती। विमानों से लेकर जहाजों तक तरह-तरह के पेट्रोल और डीजल ही इस्तेमाल होते हैं, और वे नागरिक विमानों, और जहाजों के मुकाबले बहुत अधिक ईंधन खपाते हैं। इसलिए किसी भी युद्ध में, या फौजी हमले में दुनिया पर कार्बन का खूब सारा बोझ बढ़ जाता है।
अमरीका के न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय की एक रिसर्च-रिपोर्ट कहती है कि जो लोग नकारात्मक लोगों के साथ अधिक रहते हैं, या अधिक नकारात्मक लोगों के साथ रहते हैं, वे जल्दी उम्रदराज होने लगते हैं। शोधकर्ताओं ने 23 सौ से अधिक लोगों के मनोवैज्ञानिक अध्ययन के साथ-साथ उनकी लार के नमूनों को डीएनए विश्लेषण भी किया, और इन सबसे यह समझ आया कि तकरीबन हर किसी की जिंदगी में परेशान करने वाले लोग रहते हैं, और ऐसे एक नकारात्मक व्यक्ति की मौजूदगी से उम्र बढऩे की रफ्तार करीब डेढ़ फीसदी बढ़ जाती है। मतलब यह कि पूरी जिंदगी अगर एक नकारात्मक व्यक्ति आसपास है, तो लोगों की जिंदगी 9 महीने तक घट सकती है। अब इसे हम दिल्ली के प्रदूषण से जोडक़र देखना नहीं चाहते जहां वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां की प्रदूषित हवा में जीने वाले लोगों की उम्र कई बरस घट जा रही है, शायद 9 बरस तक। अब नकारात्मकता का यह एक नए किस्म का प्रदूषण सामने आया है।
हम पहले से नकारात्मकता के नुकसानों को समझते आ रहे थे, और इस बारे में बीच-बीच में कभी लिखते भी थे। नकारात्मकता सिर्फ निजी जिंदगी में नहीं, अगर देश-प्रदेश की हवा में है, शहर या मुहल्ले में लगातार कोई तनाव बने रहता है, नफरत की कोई वजह रहती है, तो उसका भी असर लोगों के जल्द बूढ़े होने की शक्ल में सामने आता है। आज की खबर में जिस वैज्ञानिक निष्कर्ष का जिक्र है, उसके बिना भी हमारी बुनियादी समझ का निष्कर्ष यही था, और हम किसी भी जगह नकारात्मकता, नफरत, हिंसा की हवा के खिलाफ लिखते आए हैं। हमारा तो यह भी मानना है कि लगातार इनके बीच जीने वाले लोगों के तन-मन का असर उनकी अगली पीढिय़ों तक भी जाता होगा, और हो सकता है कि एआई की मेहरबानी से अगले कुछ बरसों में ऐसे शोध-निष्कर्ष सामने आ भी जाएं कि नकारात्मकता की हवा लोगों के डीएनए में किस तरह का बदलाव लाती है जो कि अगली पीढिय़ों तक जाता है।
फिलहाल हम आज की बात करें, तो कुछ समझदार लोग पहले से इसका ख्याल रखते हैं कि उनके आसपास के लोग बहुत नकारात्मक सोच के न हों। फिर कई ऐसे लोग रहते हैं जो खुद तो बहुत नकारात्मक नहीं रहते, लेकिन जिन्हें अपने आसपास के कुछ और लोगों की जिंदगी की तकलीफों की कहानी का बखान बड़ा सुहाता है, और वे दूसरों की दिलचस्पी या जरूरत के बिना भी उन पर अपनी देखी या सुनी गई दुखदाई कहानियों को दुहराते रहते हैं। अगर दूसरों की जिंदगी के ऐसे दुख में आपके करने का कुछ नहीं है, आप उनकी कोई मदद नहीं कर सकते, तो उसे सुन-सुनकर उसमें डूब जाने का कोई मतलब नहीं रहता। हर किसी की अपनी जिंदगी की नकारात्मकता काफी रहती है, दूसरों से बिना मतलब उसे न सुनना चाहिए, न देखना चाहिए। जहां आपके सामाजिक सरोकार आपको मदद करना सुझाते हैं, वहीं पर आप शामिल हों, वरना अपने आसपास के किस्सेबाजों से कह दें कि आप इस तरह की बातों को सुनना नहीं चाहते।
यह बात सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन की नहीं रह गई है, अब तरह-तरह की चिकित्सा शास्त्रीय रिसर्च भी यही सुझाती है कि लगातार नकारात्मक रिश्तों की वजह से, वैसी बातों, या वैसे माहौल की वजह से लोगों में अलग किस्म के हार्मोन पैदा होते हैं, बदन में सूजन बढ़ सकती है, प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है, दिल की बीमारी, डायबिटीज, और मानसिक रोगों का खतरा बढ़ सकता है। रिसर्च बताती है कि तनावपूर्ण रिश्तों, और कहानियों से शरीर की कोशिकाओं में डीएनए के स्तर पर बदलाव होने लगता है जिससे जैविक उम्र तेजी से बढ़ सकती है। कुछ और शोध नतीजे बताते हैं कि लगातार नकारात्मक सामाजिक अनुभवों से अवसाद (डिप्रेशन) और स्मृति का नुकसान भी हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि लोगों का अपने जीवनसाथी के साथ होने वाला तनाव कम नुकसानदेह रहता है, बजाय दूसरे लोगों से मिले हुए तनाव के। आज सोशल मीडिया की वजह से लोगों की असल जिंदगी में कुछ और किस्म के तनाव जुड़ गए हैं, इनसे भी छुटकारा पाने की जरूरत है।
अभी छत्तीसगढ़ में परिवार के भीतर एक भयानक हत्या हुई। एक व्यक्ति को जब पहली पत्नी से बच्चे नहीं हुए, तो दूसरी शादी की, उससे भी बच्चे नहीं हुए, तो एक बीवी पर जादू-टोना करने का शक हुआ। ऐसे में पति, सौत, और परिवार के दूसरे लोगों ने मिलकर एक पत्नी को इतनी बुरी तरह मारा कि उसका ब्यौरा यहां देना लोगों का दिल दहला देगा। पोस्टमार्टम में पता लगा कि मरने वाली के बदन में लकड़ी ठूंसकर उसे मार डाला गया। परिवार के भीतर इस तरह की हिंसा के बहुत सारे मामले सामने आ रहे हैं। फिर परिवारों से परे भी ऐसे कत्ल हो रहे हैं। ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता है जब किसी न किसी हत्या या बलात्कार के मामले में लोगों की गिरफ्तारी की खबर न आती हो। पुलिस अपने सोशल मीडिया पेज पर भी फोटो सहित ऐसी जानकारी डालती है, और प्रेस-टीवी से भी तकरीबन रोज लोगों तक पहुंचती है। इन दिनों दूसरे किस्म के समाचार-माध्यम भी बढ़ चले हैं, और लोगों को वॉट्सऐप पर घंटे भर के भीतर ही जुर्म, और गिरफ्तारी जैसी खबरें मिलती रहती हैं। अदालती खबरों से यह भी पता लगता है कि हत्या और बलात्कार जैसे मामलों में सात साल, दस-बीस बरस, या उम्रकैद सुनाई जाती है। इसके बावजूद लोगों के मन में जेल और कैद का खौफ नहीं दिखता!
कोई पेशेवर मुजरिम रहे, उनका जुर्म करना तो समझ आता है, लेकिन जो लोग जुर्म की कमाई पर जिंदा नहीं हैं, भाड़े के हत्यारे नहीं हैं, वे जब ऐसे बड़े जुर्म करते हैं, तो उन्हें तो अपने काम का अंत अच्छी तरह मालूम रहता है। इसके बावजूद लोग ऐसे संगीन जुर्म से कतराते नहीं हैं। यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, न सिर्फ खबरों में, बल्कि संगीन जुर्म के आंकड़ों में भी। और अब तो कत्ल और बलात्कार जैसे मामलों में नाबालिगों की हिस्सेदारी भी बढ़ती चल रही है। हर दिन कोई न कोई ऐसी खबर रहती है, जिसमें पकड़ाए गए लोगों में से कुछ के नाम और चेहरे कानूनी जरूरत के मुताबिक छुपाने पड़ते हैं, क्योंकि वे नाबालिग रहते हैं।
अब हम अलग-अलग वजहों पर जाने के बजाय यह सोचते हैं कि ये कैसे लोग हैं जिनके लिए अगले दस-बीस बरस खुली हवा में जीने, और जेल में कैद रहने में कोई फर्क नहीं है? ऐसा नहीं है कि इन लोगों को गिरफ्तारी और कैद का खतरा समझ न आता हो, क्योंकि कोई बड़ी मुजरिम अब गिरफ्तारी से बचते नहीं हैं, वे दिन हवा हो चुके हैं। तो क्या इन लोगों को अपनी जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह गई है? यह सवाल कुछ परेशान करता है, इसलिए भी कि अगर लोगों में अपने भविष्य को लेकर कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, और वे इस हद तक लापरवाह हो गए हैं, तो फिर वे किसी और तरह का भी जुर्म कर सकते हैं, अभी जितना भयानक जुर्म किया है, उससे भी भयानक। क्या इन लोगों की जिंदगी में परिवार और समाज के साथ सुख से जीने की संभावनाएं नहीं रह गई हैं, क्या इनके पास कोई महत्वाकांक्षाएं नहीं रह गई हैं, ऐसी बातों पर गंभीरता से सोचना चाहिए। लोग जुर्म से परे के कई पहलुओं पर बात करते हुए भी यह कहते हैं कि जिसे कमाई की परवाह न हो, उसे कारोबार नहीं करना चाहिए, जिसे राज-पाट जारी रखने की परवाह न हो, उसे राजा नहीं बनना चाहिए, और जिन लोगों के लिए उनकी तनख्वाह मायने नहीं रखती हो, उन्हें नौकरी नहीं करनी चाहिए। जब लोग बिना जरूरत के कोई काम करते हैं, तो वे एक खतरा खड़ा कर सकते हैं। हर किसी को अपने मिजाज का ही काम करना चाहिए। ऐसे में जब हिन्दुस्तान के आम लोगों का बेहतर जिंदगी जीने का मिजाज न रह गया हो, तो वे खतरनाक हो सकते हैं। जिन्हें आगे कोई संभावनाएं न दिखती हों, जिन्हें साख की परवाह न हो, जिन्हें एक आजाद दुनिया की खुली हवा में सांस लेने, और बरसों कैद रहने में कोई बड़ा फर्क न दिखता हो, वे ही लोग आपा खोकर, या सोच-समझकर, या शान दिखाने के लिए कत्ल कर सकते हैं, या बरसों की कैद का खतरा उठाकर बलात्कार कर सकते हैं।
घूम-फिरकर बात अमरीका पर ही आ टिकती है कि आज वह खुद अपनी फौजों की ताकत से, और अपने मवाली-साथी इजराइल के साथ मिलकर दुनिया पर किस तरह का कहर ढा रहा है। अभी सालभर ही हुआ है कि डॉनल्ड ट्रंप ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया, और ऐसी मनमानी चालू की कि अमरीकी संसद से लेकर अमरीकी सुप्रीम कोर्ट तक, सब हिल गए। संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह खारिज करते हुए ट्रंप ने एक कोई अपना घरेलू शांति का बोर्ड बना लिया है, जिसमें भुगतान करके लोग स्थायी सदस्य बन सकते हैं। भारत के लिए अब तक इज्जत बचने की एक बात यह है कि ट्रंप के बांह मरोडऩे के बावजूद भारत इसमें शामिल नहीं हुआ है। लेकिन ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप जिस तरह गुंडागर्दी कर रहा है, वह अभी दस दिन पहले तक की उसकी खुद की गुंडागर्दी को बहुत पीछे छोड़ चुका है। आज या तो उसकी शह पर, या अपनी किसी मनमर्जी से इजराइल सरकार अपनी वेबसाइट पर यह घोषणा कर रही है कि ईरान जिसे भी अपना अगला सुप्रीम लीडर बनाएगा, इजराइल उसका कत्ल कर देगा! दुनिया के इतिहास में किसी देश ने लोकतांत्रिक होने का ढकोसला करते हुए इस तरह की बातें नहीं की थीं, जैसी ट्रंप और इजराइल आज कर रहे हैं। यह ट्रंप खुद अपनी संसद को यह नहीं समझा पाया कि ईरान पर हमला क्यों जरूरी था, उसका क्या न्यायोचित कारण है। लेकिन पहली बार दुनिया को यह समझ में आ रहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति को वहां के संविधान में मिले हुए अघोषित, असीमित, और धुंध से घिरे हुए अधिकारों के चलते उसके तानाशाह बन जाने का इतना बड़ा खतरा है। ट्रंप अमरीकी इतिहास का सबसे बड़ा तानाशाह-राष्ट्रपति साबित हो चुका है, और अभी उसका कार्यकाल एक तिहाई भी नहीं गुजरा है।
हम आज सिर्फ अमरीका, इजराइल, और ईरान को लेकर बात नहीं कर रहे हैं, हम इस जंग से प्रभावित दूसरे देशों को लेकर भी बात करना चाहते हैं। आज दुनिया इस बात पर भी हैरान है कि रूस और चीन, ईरान के जो दो सबसे ताकतवर दोस्त दिखते आ रहे थे, वे अचानक चुप बैठ गए हैं। अमरीका और इजराइल के, इतिहास के सबसे नाजायज हमलों पर भी वे ईरान के साथ नहीं खड़े हैं, बल्कि कोई कड़े बयान तक इन दो महाशक्तियों से नहीं आए हैं। चीन के बारे में आज सुबह एक अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक कह रहे थे कि अगले महीने ट्रंप चीन जा रहा है, और चीन ऐसे नाजुक मौके पर ईरान के बारे में कोई कड़ी या कड़वी बात कहकर ट्रंप का मूड खराब करना नहीं चाहता है। दुनिया का सबसे बड़ा मवाली जाने किस बात से भडक़ जाए, या गब्बर किस बात पर आपा खोकर गोलियां चलाने लगे, यह किसे पता है।
ऐसे माहौल में भारत के भीतर सरकार की खासी आलोचना हो रही है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल से लेकर आज तक कभी उनकी इतनी आलोचना नहीं हुई थी जितनी ट्रंप के सामने उनकी चुप्पी को लेकर हो रही है। मोदी एक नेता के रूप में ही नहीं, भारत एक देश के रूप में भी ट्रंप के बकवासी बयानों पर असाधारण चुप्पी साधे हुए है। कई लोगों का ऐसा मानना है कि यह भारत के राष्ट्रीय सम्मान के खिलाफ है, लोग 1971 की इंदिरा गांधी को याद करते हैं जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाते हुए अमरीका की किसी धमकी को नहीं सुना था। दो मिसालों को जोडऩे से एक बड़ी दिक्कत यह रहती है कि उन दोनों के बीच की समानताएं गिनाने के पहले उनके बीच की असमानताएं उभरकर सामने आ जाती हैं। 1971 की दुनिया अलग किस्म की थी, उस वक्त अमरीका के ईर्द-गिर्द दुनिया एकध्रुवीय नहीं घूम रही थी, उस वक्त रूस रूस नहीं था, वह सोवियत संघ था, और उसकी बड़ी ताकत थी, दुनिया में गुट-निरपेक्ष आंदोलन बहुत मजबूत था, और भारत नेहरू की वैश्विक लीडरशिप की रौशनी में बना हुआ था, उनके बाद इंदिरा गांधी उसी लीडरशिप की विरासत को आगे बढ़ा रही थीं। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बहुत रफ्तार से अमरीका ने एकध्रुवीय साम्राज्य कायम कर लिया, और अब तो उसके बाद से गंगा में बहुत पानी बह चुका है, और अमरीका के सामने दुनिया में कुछ नहीं बचा है। ऐसे में जब अमरीका का राष्ट्रपति अपने नाटो के साथी देशों से भी हिकारत दिखाते हुए, उन्हें धमकियां देते हुए, कहीं ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की मुनादी करते हुए गुंडागर्दी कर रहा है, तो भारत उसके सामने सीना तानकर खड़ा हो, यह एक देश के रूप में तो अच्छी बात होगी, लेकिन यह अमरीका में बसे हुए लाखों कामकाजियों के लिए भी अच्छी बात होगी या नहीं, अमरीका से आयात-निर्यात पर जिंदा लाखों भारतीय कारोबारियों के लिए अच्छी बात होगी या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है। इंदिरा गांधी के वक्त दुनिया के देशों के रिश्तों में कारोबार का इतना दखल नहीं रहता था, जितना कि हाल के बरसों में हुआ है। इंदिरा के वक्त आर्थिक उदारीकरण की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन बाद के बरसों में राजीव गांधी, नरसिंह राव, और फिर मनमोहन सिंह के कार्यकालों ने भारत की आर्थिक फिलॉसफी को बदलकर रख दिया था। आज भारत के लोग भी देश के भीतर उस पुरानी अर्थव्यवस्था में वापिसी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए न सिर्फ भारत, बल्कि रूस और चीन जैसी सरकारों को, और योरप के तमाम नाटो-सदस्य देशों को भी ट्रंप को बर्दाश्त करना पड़ रहा है। हम इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोडक़र तो देखते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक बिफरे हुए गैंगस्टर की बंदूकों के सामने खड़े होते हुए बरती जा रही सावधानी से भी जोडक़र देखते हैं। आज दुनिया में अमरीका का सबसे बड़ा मुकाबला जिस चीन से है, वह चीन भी ईरान के बारे में कुछ बोलने के पहले सौ बार सोच रहा है, और याद रख रहा है कि अगले ही महीने यह गैंगस्टर चीन पहुंचने वाला है।
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर चारों तरफ जलसे चल रहे हैं। इन दो दिनों में इतने अधिक कार्यक्रम हमारे इर्द-गिर्द हो रहे हैं कि वे किसी बिना सोची-समझी साजिश जैसे अधिक लग रहे हैं कि महिलाओं को निरर्थक समारोहों में इतना व्यस्त कर दिया जाए, कि वे काम का कोई काम न कर सकें। इसमें नई बात कुछ नहीं होगी क्योंकि बनने-संवरने के पैमाने, गहने और कपड़ों की फैशन, मेहंदी से लेकर दूसरी साज-सज्जा तक, अनगिनत ऐसे तरीके अनंतकाल से चले आ रहे हैं, जिनमें महिलाओं को व्यस्त रखा जाता है। ऐसा शायद इसलिए भी किया जाता रहा होगा कि अगर वे काम करने लगेंगी, तो मर्दों के दबदबे के एकाधिकार का टूटना तय हो जाएगा। आज मुल्लाओं की मनमानी वाले ईरान में भी उच्च शिक्षा, और सरकारी कामकाज, दूसरे ओहदों तक पहुंचने में महिलाओं ने गजब का कमाल किया हुआ है। जब दबी-कुचली महिलाएं भी पढऩे का मौका मिलने पर इतना कुछ कर सकती हैं, तो जाहिर है कि पड़ोस के जाहिल तालिबान दहशत में रहते होंगे कि लडक़ी पढ़ेगी, तो मुसीबत बनेगी। अभी महिला दिवस पर एक-एक सरकारी और गैरसरकारी संगठन महिलाओं के सम्मान, और उनकी भागीदारी के जितने कार्यक्रम कर रहे हैं, उनका एक प्रतीकात्मक आडंबर से परे महिलाओं की भलाई से कोई लेना-देना नहीं है। इस सिलसिले से महिलाएं कैसे बचेंगी, और कैसे उबरेंगी, यह पता नहीं है। एक किसी पुराने गाने की तर्ज पर ऐसा लगता है कि मर्दों की दुनिया चाहती यही है कि औरतों की, उम्र जलसों में गुजर हो...
आज दुनिया के सबसे खूंखार तालिबानियों से लेकर सबसे संपन्न और विकसित अमरीका तक को देखें, जो कि अपने आपको लोकतंत्र का मुखिया कहता है, और दादा बनकर चलता है, तो वहां भी लड़कियों और महिलाओं की हालत भयानक दिखती है। एपस्टीन फाइलों को देखें, तो न सिर्फ अमरीका बल्कि पूरी पश्चिमी दुनिया से लेकर खाड़ी के शेखों तक, और हिन्दुस्तान के ताकतवर लोगों तक की जैसी यारी नाबालिग लड़कियों के भड़वे-दलाल एपस्टीन से रही है, उससे समझ पड़ता है कि लड़कियों और महिलाओं के बारे में मर्दों का क्या कहना है। आज जो ट्रम्प पूरी दुनिया का बेताज माफिया सरगना बना हुआ है, उस ट्रम्प ने लाख कोशिश की कि उसके सेक्स-हमलों की फाइलें दबी रह जाएं, लेकिन अमरीकी संसद की साफ-साफ चेतावनी के बाद अब सरकार को बहुत मजबूरी में रोते-झींकते इनमें से कुछ फाइलों को जारी करना पड़ा है। जिस देश का राष्ट्रपति नाबालिग लड़कियों से लेकर दूसरी महिलाओं तक पर सेक्स-हमले करने के लिए जाना जाता हो, अदालत में गुनहगार साबित हो चुका हो, उसके राज में लड़कियों और महिलाओं की हालत की कल्पना की जा सकती है। जब यह एपस्टीन निजी जेट विमानों में नाबालिग लड़कियों को लादकर ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रीव के लिए अमरीका से वहां पहुंचता था, तो ब्रिटिश एयरफोर्स के हवाईअड्डों पर उसके विमान का स्वागत होता था। जब दुनिया की इतनी बड़ी ताकतें नाबालिगों से बलात्कार में जुटी हुई हों, तो फिर किसी लडक़ी की देह बच कैसे सकती है? आज जब दुनिया में विश्व महिला दिवस मनाया जा रहा है, तो एक बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि क्या महिला का एक ही दिन होना चाहिए, और साल के बाकी दिन क्या उसके नहीं होने चाहिए?
शायद हिन्दी के विख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि दिवस हमेशा कमजोर का मनाया जाता है, जैसे महिला दिवस, शिक्षक दिवस, मजदूर दिवस वगैरह। उनका कहना था कि कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता। अब यह उनके नाम के साथ प्रचलित बात है, जिससे सहमत होते हुए हम और भी याद करते हैं कि भारत में सरकारी स्तर पर हिन्दी दिवस भी मनाया जाता है जो कि राष्ट्रभाषा कही जाती है, लेकिन राजभाषा भी नहीं है। इसी तरह महिलाओं के नाम पर साल में एक दिन मनाकर एक-एक जत्थे में सौ-सौ महिलाओं का सम्मान-अभिनंदन करके, उन्हें नाच-गाने, और रैलियों में व्यस्त रखकर, उन्हें छोटे-मोटे तोहफे देकर महज यही साबित किया जाता है कि उनके अस्तित्व को मान लिया गया है, उन्हें इससे ऊपर कुछ करने की जरूरत नहीं है। फिर आम हिन्दुस्तानी भीड़ में किसी को यह सुझाना तो निहायत ही फिजूल की बात होगी कि कोई उनका सम्मान कर रहे हैं, तो क्या उन्हें यह सवाल नहीं करना चाहिए कि सम्मान करने वाले लोगों का इरादा और मकसद क्या है? क्या उनका संगठन इसी काम के लिए बना है? क्या उनका कोई निष्पक्ष और निर्विवाद निर्णायक मंडल भी था जिसने ये सम्मान तय किए हों? और सम्मान लेने वाले लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि उनके कौन से काम सम्मान के लायक माने गए हैं? लेकिन भारत में न पुरूष, न महिला, किसी को भी सम्मान से परहेज नहीं रहता, और तकरीबन हर कोई इसे लेने पर उसी तरह आमादा रहते हैं, जिस तरह कई त्यौहारों पर सडक़ किनारे लगने वाले भंडारों में मुफ्त का खाते हुए लोगों को यह भी नहीं लगता कि क्या वे मुफ्त के खाने के हकदार हैं या नहीं? इसी तरह सम्मान की कतार में महिलाओं को लगाकर राजनीतिक दल, सरकारें, राजभवन, अलग-अलग संगठन सब महिलाओं के प्रति सम्मान की अपनी तथाकथित भावना को दिखा देते हैं, और अगले दिन से महिलाओं के हितों को अनदेखा करना शुरू कर देते हैं। महिला दिवस न सिर्फ भारत में, बल्कि दुनिया के अधिकतर हिस्सों में एक सालाना प्रायश्चित की तरह होता है, जो कि चर्च के कन्फेशन-चैम्बर की तरह का रहता है। साल भर मर्द, खासकर ताकतवर और ओहदेदार मर्द जिस अंदाज में बड़ी-बड़ी अदालतों के जज बने हुए, या अमरीका का राष्ट्रपति बने हुए यह साबित करते हैं कि कामयाब मर्द जिस औरत को चाहे, उसे उसके गुप्तांगों से दबोच सकता है, साल भर की ऐसी सोच का सालाना प्रायश्चित एक-एक टिफिन देकर, या एक-एक प्लेट नाश्ता देकर बहुत सारे लोग कर लेते हैं।


