विचार / लेख

स्मिता हम तुम्हारे गुनहगार हैं
18-Oct-2021 1:16 PM (97)
स्मिता हम तुम्हारे गुनहगार हैं

-कनक तिवारी

स्मिता हम तुम्हारे गुनहगार हैं
यह सबके साथ होता है। हमारे साथ भी हुआ।

आज से कोई 50 साल पहले की बात होगी। मैं दुर्ग के जिला न्यायालय में वकालत करता था। मेरा दफ्तर बाजार में मुख्य सडक़ पर था। वहां काफी चहलपहल होती थी। मुअक्किलों के मिल जाने का सुभीता और भरोसा होता था। नए वकीलों को ये सब तिकड़में करनी पड़ती हैं। आठ बरस से ज्यादा महाविद्यालयों में अंगरेजी साहित्य पढ़ा चुका था। हिन्दी भाषा तो मां ने घुट्टी में डालकर पिला रखी है। फितरती छात्र और अध्यापक के रूप में चुप बैठना कभी गवारा नहीं हुआ।

छत्तीसगढ़ के गौरव, नाट्य निर्देशक, सर्जक, हबीब तनवीर मुझे छोटे भाई की तरह प्यार करते। बीच बीच में उनसे मिल जाना भी होता। अचानक फोन आया ‘कनक, मैं बहुत कम समय के लिए लेकिन बहुत ज़रूरी काम से तुम्हारे पास आ रहा हूं।‘ मैंने कहा वह वक्त आपके लिए है। उन्होंने सबब नहीं बताया। वे एक पुरुष और दो महिलाओं के साथ प्रथम तल के मेरे कार्यालय में आ गए। उनके साथी सज्जन श्याम बेनेगल थे जिनकी ख्याति हो चली थी। एकाध बार की मुलाकात भी हो चुकी थी। उन्होंने बताया एक फिल्म की शूटिंग के लिए आए हैं। कुछ दृश्य स्थल मैं बता दूं। बातचीत होने लगी।

मेरे दफ्तर की बालकनी से सामने पटरे पर कपड़ों पर इस्तरी कर रहे धोबी और उसकी दूकान को श्याम बेनेगल के कैमरे ने कैद किया। दुर्ग की सबसे मशहूर कचौरियां मिलने वाली जलाराम की ठीक सामने दूकान से सबको कचौरियां और मशहूर पेड़े खिलाए गए। उनके साथ एक खूबसूरत महिला थी। उनकी कला की समझ मुझे इसलिए अच्छी लगनी थी क्योंकि मैं सुंदर महिलाओं को ही कला समझता रहा हूं। (आज का पता नहीं)। मुझे नाटक, फिल्में, कला वगैरह के लिए दर्शक के रूप में जीवन को दिलचस्प बनाने की जिजीविषा आज तक कायम है। ज्ञान वह तत्व भी है, जो शेखी बघारने के भी काम आता है। इस काम में नौजवान वकील महारत हासिल कर चुका था।

पता लगा ये सबा जैदी हैं। बहुत बाद में मालूम हुआ था वे मशहूर शायर हाली की वंशज थीं। बाद में विदेश चली गईं। कला और फिल्मों को लेकर उनके योगदान की चर्चा होती रही। युवा वकील में कला पारखी तो नहीं उभरा। वह पहले वह पढ़ा चुका है जॉन कीट्स को जिसने लिखा है ‘‘ए थिंग ऑफ ब्यूटी इज़ ज्वाय फॉर एवर।’’ (‘A thing of beauty is joy for ever’) कीट्स को उस दिन धन्यवाद देना इतना अच्छा लगा कि वह अपनी कब्र में हुलस गया होगा मुझे आशीष देने के लिए। कुछ और दृश्य हमने उन्हें बताए। वहां भी श्याम बेनेगल शूट करने गए।

दुबली पतली लेकिन आकर्षक सांवले नाक नक्श, तीखा बोलने को उद्यत आंखें, गहरे नीले रंग की जींस, मटमैली जामुनी रंग की टी शर्ट और चप्पल पहने युवती उत्सुक होकर मेरे बताए जाने को लगा जैसे जज्ब करती जा रही है। उसने चेहरे पर मेकअप भी नहीं किया था। लगता था उसे कहीं देखा तो है।

मेरी पत्नी लगातार साथ थीं क्योंकि मैंने उन्हें बुला लिया था। इसलिए मैं अपनी क्षमता के अनुरूप सबा जैदी की तारीफ में ज्यादा कसीदे नहीं काढ़ पाया था।

स्त्री होने के बावजूद मेरी पत्नी को उस सांवली युवती से औपचारिक बात करना अच्छा तो लगा लेकिन हम यथोचित पारस्परिक नहीं हो सके। कमबख्त यह गोरा रंग कब तक जेहन में उथल पुथल करता रहेगा! सांवली युवती बार बार कुछ सवालों के जरिए हमें कुरेद रही थी। मुझे याद है कॉलेज में खूबसूरत छात्राएं भी सवाल करती थीं। सभी प्रोफेसरों की तरह मैं भी उनके जवाब देने में खास नस्ल की युवा रूमानियत महसूस करता था। यह सांवली युवती मेरे अंतर को उद्वेलित नहीं कर पा रही थी। लेकिन उसकी आवाज और आंखें इतनी आकर्षक थीं कि उससे बेरुख होना संभव नहीं था। उसके प्रति मैंने शराफत और अदब का पूरा इस्तेमाल किया। मेरी पत्नी और वह संतुष्ट लगे।

हबीब तनवीर उस युवती का परिचय कराना भूल गए थे। लौटने लगे तो कुशल नाट्य निर्देशक ने समझ लिया मेरा छोटा भाई चमक दमक के परे नहीं जा पाया। वह कला को क्यों नहीं पहचानता? शायद इसलिए सीढिय़ां उतरते-उतरते उन्होंने कहा ‘कनक, माफ करना। मैं परिचय कराना भूल गया था। ये स्मिता पाटिल हैं।‘ तब तक स्मिता की धमक देश में होने को थी। इसलिए मुझे बड़ा धक्का नहीं लगा। शायद पत्नी को भी नहीं।

बाद के वर्षों में स्मिता पाटिल के अभिनय के समुद्र में ज्वार आया। शायद उस दिन लगा था यह हमारे और सबा जैदी के वार्तालाप के बीच हस्तक्षेप है। हमारी उस बेरुखी के कारण आज चेहरे पर विद्रूप की फसल लहलहा रही है। भ्रूण हत्या तो स्मिता के कलात्मक जीवन की भी हो गई, जो परवान चढ़ते चढ़ते कुदरत के कहर से नीचे मौत ने ढहा दिया। स्मिता की आंखें आज भी सवाल पूछ रही हैं। वे कितनी बोलती हुई थीं। वे आंखें आवाज़ में उस दिन भी हमें देख रही थीं। आज भी बोल रही हैं। हमारे हीरे को पत्थर समझा!

जैसे जैसे समय बीता। स्मिता की शान परवान चढ़ी। उसके उलट अनुपात में मेरे अंदर एक गहरी कोफ्त बढ़ती रही है। मैं अपनी ही निगाह में अभियुक्त हो गया हूं। आईने के सामने खड़े होने से लगता है पीछे से स्मिता पाटिल की आंखें अपने सांवलेपन में कला का उजास मेरी जेहनियत में उलीच देती हैं। कितना मूर्ख था जो स्मिता को पहचान नहीं पाया। सबा जैदी के सौंदर्य, आकर्षण का विकल्प स्मिता की जिज्ञासा, ललक और कॉमरेड की तरह बतकहियों में ढूंढ नहीं पाया। स्मिता तुम कहां हो? अपनी फिल्मों में भी तुमने गुनाहों को माफ किया है। यह बात तो तुमसे कह सकता हूं।

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