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छत्तीसगढ़ एक खोज : पैंतीसवीं कड़ी : हिंदी सिनेमा का नायाब सितारा : किशोर साहू
25-Sep-2021 12:57 PM (102)
छत्तीसगढ़ एक खोज : पैंतीसवीं कड़ी : हिंदी सिनेमा का नायाब सितारा : किशोर साहू

-रमेश अनुपम

सन 1952 में हिंदी फिल्म में नई-नई आई हुई माला सिन्हा को लेकर किशोर साहू ने शेक्सपियर के मशहूर नाटक ‘हैमलेट’ पर इसी नाम से एक फिल्म का निर्माण किया। इसके नायक की भूमिका में वे स्वयं थे और नायिका ओफिलिया की भूमिका में माला सिन्हा। किन्ही कारणों से  किशोर साहू की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।

सन 1953 में किशोर साहू ने एक महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मयूर पंख’ का निर्माण किया। यह फिल्म कई दृष्टि से एक ऐतिहासिक महत्व की फिल्म थी। इस फिल्म की दो नायिकाओं में एक ओडेट फर्ग्यूसन थी, जो उस जमाने की एक मशहूर फ्रेंच अभिनेत्री थी।

दूसरी अभिनेत्री के रूप में हिंदी फिल्म की जानी मानी अभिनेत्री सुमित्रा देवी थीं। किशोर साहू ने इस फिल्म को ईस्टमैन कलर में बनाने का निर्णय लिया, जो उस जमाने में काफी महंगी मानी जाती थी। इस फिल्म के नायक की भूमिका में स्वयं किशोर साहू थे और निर्देशन भी उन्हीं का था।

यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट गई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस फिल्म को बेहद सराहा गया। सन 1954 में कांस फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को ग्रैंड पुरुस्कार के लिए नामांकित किया गया।

इस फिल्म  के निर्माण के समय का एक  दिलचस्प प्रसंग  का जिक्र भी जरूरी है।  इस फिल्म के निर्माण के दरम्यान किशोर साहू का मध्यप्रदेश के दो दिग्गज राज नेताओं से परिचय हुआ। वे दो राजनेता कोई और नहीं, बल्कि श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल थे।

श्यामाचरण शुक्ल जब भी बंबई जाते, किशोर साहू के निवास ‘वाटिका’ में खाने पर अवश्य निमंत्रित किए जाते।

एक बार किशोर साहू ने श्यामाचरण शुक्ल से उनके भविष्य की कार्ययोजना के बारे में पूछा। जिसके जवाब में श्यामाचरण शुक्ल ने कहा ‘कि मैं तय नहीं कर पा रहा हूं कि मैं बिजनेस में जाऊं या पॉलिटिक्स म’।

किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-

‘तब मैं नहीं जानता था, न वे ही जानते थे कि एक दिन वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे। पिता के बाद कोई  पुत्र किसी प्रांत का मुख्यमंत्री बना हो ऐसा उदाहरण स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व था।’

विद्याचरण शुक्ल ‘मयूर पंख’ फिल्म का एक हिस्सा बन चुके थे। सन 1953 में विद्याचरण शुक्ल ‘एल्विन कूपर’ नामक एक शिकार कंपनी चला रहे थे। ‘मयूरपंख’  फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग कान्हा किसली में की गई, जिसका ठेका विद्याचरण शुक्ल को दिया गया। इस फिल्म की शूटिंग के दरम्यान किशोर साहू ने विद्याचरण शुक्ल को बेहद  निकट से देखा और जाना था।

अपनी आत्मकथा में किशोर साहू ने उन दिनों को याद करते हुए विद्याचरण शुक्ल के बारे में जो लिखा है वह अत्यंत महत्वपूर्ण है- ‘उनमें सतर्क दिमाग की पैनी धार थी।’

आगे चलकर किशोर साहू की यह भविष्यवाणी कितनी सच साबित हुई है, हम सब इसके गवाह हैं। विद्याचरण शुक्ल भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह सिद्ध हुए।

श्रीमती इंदिरा गांधी के निकट के राजनेताओं में उनकी गिनती होती थी। सतर्क दिमाग की पैनी धार अंत तक उनमें विद्यमान रही।

सन 1958 किशोर साहू के फिल्मी कैरियर के लिए एक नया मोड़ साबित हुआ। उन दिनों कमाल अमरोही, राजकुमार और मीना कुमारी को लेकर ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ बनाने की सोच रहे थे। उन्होंने किशोर साहू को इस फिल्म के निर्देशन का ऑफर दिया। इस फिल्म में वे पहले से ही राजकुमार को हीरो के रूप में ले चुके थे।

किशोर साहू राजकुमार की जगह दिलीप कुमार को बतौर हीरो लेना चाहते थे, मीनाकुमारी भी यही चाहती थी, पर कमाल अमरोही राजकुमार को ही इस फिल्म में हीरो के रूप में लेना चाहते थे। मीना कुमारी तब तक कमाल अमरोही से शादी कर चुकी थी।

मीना कुमारी तो किशोर साहू को इस फिल्म में हीरो के रूप में लेना चाहती थी, पर कमाल अमरोही को न दिलीप कुमार चाहिए था और न ही किशोर साहू, राजकुमार पर वे अडिग थे।

बहरहाल 20 जून सन 1958 को इस फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। 1959 में बनकर तैयार भी हो गई। इस फिल्म का ट्रायल शो हुआ जिसमें कमाल अमरोही, शंकर जयकिशन, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मीना कुमारी, राजकुमार और किशोर साहू का परिवार शामिल हुआ।

फिल्म सबको पसंद आई पर कमाल अमरोही को यह फिल्म बिल्कुल ही पसंद नहीं आई। शैलेंद्र ने भी कमाल अमरोही का साथ दिया।

फिल्म की कहानी और सीन बदलने के लिए कमाल अमरोही ने किशोर साहू पर तरह-तरह के  दबाव बनाने शुरू किए, पर किशोर साहू को वे इसके लिए राजी नहीं कर सके। किशोर साहू अपनी इस फिल्म में किसी तरह के छेड़छाड़ के खिलाफ थे।

मीना कुमारी और राजकुमार भी किशोर साहू की राय पर कायम थे।

कमाल अमरोही की जिद के चलते यह फिल्म काफी दिनों तक रिलीज नहीं हो पाई। अंत में के. आसिफ के कारण ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ फिल्म प्रदर्शन का मुंह देख पाई, लेकिन कमाल अमरोही ने निर्माता से अपना नाम हटाकर मीना कुमारी के सेक्रेटरी एस.ए.बाकर का नाम डलवा दिया, यह सोचकर कि यह फिल्म बुरी तरह से फ्लॉप सिद्ध होगी।

29 अप्रैल 1960 को यह फिल्म बंबई के रॉक्सी और कोहिनूर थियेटर में रिलीज हुई। ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ सुपरहिट फिल्म साबित हुई।

कमाल अमरोही का बुरा हाल था।इस फिल्म की अपार सफलता को देखकर उन्होंने मुंबई में लगे हुए सारे पोस्टरों से निर्माता एस.ए. बाकर का नाम मिटवा कर अपना नाम लिखवाना शुरू कर  दिया।

यह था किशोर साहू के निर्देशन का जादू , जो सर चढक़र बोलता था।

कहना न होगा ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ हिंदी फिल्म में एक मील का पत्थर साबित हुई।

फिल्म की कहानी, राजकुमार और मीना कुमारी का अभिनय, शंकर जयकिशन का संगीत और  किशोर साहू के निर्देशन को भुला पाना सबके लिए मुश्किल साबित हुआ।

(बाकी अगले हफ्ते)

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